जिजीविषा सम्पन्न सशक्त स्त्री और इक्कीसवीं शती का प्रवासी हिन्दी उपन्यास (लेखिकाओं के संदर्भ में)

मधु संधु

मधु संधु

समाज में स्त्री पुरुष के लिए निर्धारित और रूढ अलग- अलग मानदंडों के बावजूद 21वीं शती के हिन्दी उपन्यास की स्त्री में विद्रोह करने की, अपने अधिकारों को पहचानने की, गलत को गलत और सही को सही कहने की, दुर्दशा को सुदशा में बदलने की, समय की धड़कन महसूसने की, देश और स्थान के साथ आगे बढ़ने की समझ और क्षमता, संकल्प और शक्ति है। इन्होंने दुनिया देखी है, समझी है और आधी दुनिया के समक्ष सशक्त होने के, जागृत होने के, जीवट बनाए रखने के विकल्प भी रख रही हैं।

जिन उपन्यासकारों ने इस स्त्री का सृजन किया है, उनकी अपनी पृष्ठभूमि भी जीवट और संघर्षों से आपूरित है। उषा प्रियम्वदा समय-समय पर दिल्ली, इलाहाबाद, ब्लूमिंटन, इंडियाना, मैडिसिन एवं विस्कांसिल विश्वविद्यालयों में पठन-पाठन करती- कराती रही हैं। 1977 में उन्हें फुल प्रोफेसर ऑफ इंडियन लिटरेचर का पद मिला। प्रवासी महिला लेखन की बात करें उषा प्रियम्वदा के बाद सुषम बेदी सबसे सशक्त कथाकार हैं। उनके कथा साहित्य में एक दर्जन से भी ज्यादा रचनाएँ आती हैं। सुषम आकाशवाणी, रंगमंच, दूरदर्शन से भी जुड़ी रही। वे दिल्ली चंडीगढ़, कैलिफोर्निया, न्यूयार्क में हिन्दी भाषा और साहित्य की प्रोफेसर रही। देहरादून की अर्चना पेन्यूली विज्ञान में स्नातकोत्तर हैं और डेनमार्क में भी शिक्षा जगत तथा लेखन की कर्मभूमि से जुड़ी हैं। दिव्या माथुर समय समय पर भारतीय उच्चायोग के सांस्कृतिक विभाग, नेत्रहीनता से संबन्धित अनेक संस्थाओं, नेहरू केन्द्र आदि से सम्बद्ध रही हैं और लंदन में हिन्दी समिति की उपाध्यक्ष भी। लंदन में हिन्दी कहानियों के मंचन की शुरुआत का श्रेय भी उन्हीं को जाता है। उनकी अनेक रचनाएँ ब्रेल लिपि में भी प्रकाशित हो चुकी हैं। जालंधर से नॉर्थ कैरोलाइना पहुँची सुधा ओम ढींगरा कथाकार, कवयित्री, पत्रकार, संपादक, अनुवादक और ब्लॉगर हैं। वे रंगमंच, आकाशवाणी और दूरदर्शन की कलाकार भी हैं। ‘पारो- एक उत्तरकथा’ उपन्यास की लेखिका सुदर्शन प्रियदर्शिनी एक शती पुरानी रूमानी कथा को भी सशक्त स्त्री का कवच ओढ़ा देती हैं। कादंबरी मेहरा रहस्य रोमांच भरी अपराध कथा यानी जासूसी उपन्यास लिखने वाली एकाकी प्रवासी महिला उपन्यासकार है। अनिलप्रभा कुमार ने जिस प्रकार ‘ सितारों में सूराख’ में शस्त्रप्रिय अमेरिकन संस्कृति में स्त्री का सशक्त विद्रोही स्वर दिखाया है, उसकी कोई तुलना नहीं। स्वदेश राणा ने देश- विदेश में अनेक महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। 35- 40 देशों की यात्राएं की। वह संयुक्त राष्ट्र संघ के डिसआर्मामेंट विभाग की कन्वेनशनल आर्मड शाखा के प्रमुख का पद संभालने वाली प्रथम भारतीय मूल की महिला हैं। नीना पॉल की स्त्री ने दिखा दिया है कि पराई ज़मीन और पराये लोगों के बीच वर्चस्व कैसे बनाया जाता है। हंसा दीप टोरेंटों विश्व विद्यालय में प्रवक्ता पद पर कार्यरत हैं। 2007 को उषा प्रियंवदा, 2012 को सुषम बेदी, 2014 को सुधा ओम ढींगरा को ‘पदमभूषण मातृ सत्यनारायण पुरस्कार‘ से भारत सरकार के ‘केंद्रीय हिन्दी संस्थान‘ द्वारा सम्मानित किया जा चुका है।।

उषा प्रियंवदा के ‘भया कबीर उदास‘[1] की कैंसर पीड़ित पैंतीस वर्षीय लिली मृत्यु भय पर विजय पा रही है। वह जानलेवा सर्जरी से पहले जीवन के दैहिक सुखों को जीने के लिए शैषेद्र राय से मादक अस्थायी संबंध स्थापित करती है, संबंध- जिसका वास्ता न स्मृति से है, न भविष्य से, न वायदों से। वह सिर्फ तीन दिन के लिए शैषेद्र राय से स्कूली लड़की सा तरंगित प्यार करती है और फिर मंगेश महादेव के चौखट पर शेषेंद्र को त्यागने का संकल्प ले इससे मुक्त हो जाती है। नितांत अकेलेपन और बीमारी के आतंक से थोड़ी- बहुत मुक्ति पाने के लिए यह क्षत- विक्षत, बिना बालों और बिना वक्ष की स्त्री डेढ़ साल की बीमारी के बाद अनिश्चित समय के लिए गोवा चली आती है और होटल मालिक वनमाली के संपर्क को पूरे जीवट के साथ जीने लगती है। वनमाली का स्पर्श उसे सुख देता है, उसका चुंबन हैरान कर जाता है, अजपा जाप की तरह उसकी प्रतीक्षा की आदत हो जाती है। दोनों शादी कर लेते हैं। लिली का जीवट ऐसा है कि कैंसर के डायग्नोसिस, उपचार की घबराहट और आतंक पर नियंत्रण रखने के लिए, थोड़ी शोख़ी, थोड़ी अदा के लिए ब्रेंडी लेना शुरू करती है। कैंसर ने लिली में जिजीविषा भरी है। उसके जीवन का मूलमंत्र है-


“अतीत का पृष्ठ बदल दो, वर्तमान में रहो, भविष्य को देखो। ”[ii]

उषा प्रियम्वदा का‘नदी’[iii] परित्यक्त, मानसिक रूप से टूटी, अकेली, आश्रय की तलाश में, नदी की तरह इधर-उधर भटक रही, आकाशगंगा के जीवट की कहानी है। नायिका का पति गगनेन्द्र उस ठंडे पराये देश अमेरिका में बिना पासपोर्ट, वीज़ा, रुपए-पैसे के पत्नी को छोड़ भारत चला आता है। द्रोपदी की तरह नियति उसके जीवन में चार पुरुष लेकर आती हैं- गगनबिहारी, अर्जुन सिंह, एरिक और प्रवीण और इस सबके बावजूद यह नितांत अकेली स्त्री, जीवट से भरी है, अपना रास्ता खोज ही लेती है।

सुषम बेदी के ‘पानी केरा बुदबुदा’[iv] में स्त्री का व्यक्तित्व ठहरे जल सा न होकर बहती नदी सा गतिशील है। वह कश्मीर से दिल्ली और दिल्ली से विदेश पहुँचती है, डॉक्टर से स्पेशलिस्ट बनती है, पति दामोदर के अत्याचारों से तंग आ स्वतंत्र जीवन का चयन करती है। अपने अकेलेपन, अपनी आज़ादी का पूरा सुख लेती है। यह कड़वा- कसैला दाम्पत्य उसे बताता और महसूस करवाता है कि विवाह जीवन का अंत हो सकता है, उद्देश्य नहीं। पिया अपनी नियति की नियामक है। विदेश की धरती ने उसे अत्याचारों से विद्रोह के लिए स्पेस दी है। अमेरिका पहुँचकर वह महसूसती है कि त्याग, क्षमा, उत्तरदायित्व सिर्फ स्त्री के हिस्से की चीज़ नहीं है। सोचती है-

“अगर पुरुष का अपना अहं है और वह औरत से अपने अहं के सम्मान की अपेक्षा करता है तो औरत के अहं के प्रति वह संवेदनशील क्यों नहीं होता।“[v]

दामोदर से मुक्त होते ही वह नए जीवन, जीवन साथी की खोज में दिखाई देती है। अनुराग का सान्निध्य और साहचर्य उसे मादकता, सरूर और सुकून देते हैं, जबकि निशांत अपनी बेमुरव्वती और विरूपता की हद तक की स्पष्टवादिता के बावजूद उसे बांधता है।

अगर मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है तो समाज में, अपने मरीजों में, अस्पताल में पिया का सम्मानित स्थान है। अगर मनुष्य पारिवारिक प्राणी है, तो वह तनावग्रस्त दाम्पत्य को झटक समय- स्थानानुसार, देशकालानुसार नया संसार गढ़ ही लेती है। मनुष्य अगर आर्थिक प्राणी है, तो पिया अर्थ- सम्पन्न स्त्री है, वह प्रेमियों को अपने यहाँ रख भी सकती है और निकाल भी सकती है।

उसका मूलमंत्र है-

“अपने को सर्वोपरि रखो, दूसरों को महत्त्व ही नहीं दोगे तो वे तुमको कष्ट पहुँचाने के काबिल ही नहीं रहेंगे।“[vi]

अर्चना पेन्यूली के उपन्यास ‘वेयर डू आई बिलांग‘[vii] की प्रवासी स्त्री जानती हैं कि अपने देश को छोड़ कर वह यहाँ कुछ पाने आई हैं। इसलिए परिश्रम और घोर परिश्रम उसकी रग-रग में बसा है। मंदी के दिनों में माँ कमला घर का अर्थतन्त्र संभाल लेती है। कुलीन ब्राह्मण होते हुये भी वह एक पाँच सितारा होटल के बीस कमरों और गुसलखानों की सफाई का काम करती है, खाना बनाने के ठेके लेती है। बेटी सुधा मेक्ड़ोनल में नौकरी करती है। बेटे सुभाष और सुरेश को सुबह-सुबह लोगों के घरों में अखबार बांटने भेजती है। इंडियन रेस्टोरेन्ट खोलती है। कमला बुरे दिनों में घर- गृहस्थी का अर्थतन्त्र संभाल पथभ्रष्ट हो रहे पति का मार्ग दर्शन करती है। रीना अकेले भारत भ्रमण कर आती है। सुधा महिला मित्रों के साथ छुट्टियां मनाने जाती है। स्मिता का पास कमाल की शक्ति है। स्टीफनी मन की रानी है। कुसुम जीवन की हर चुन्नौती डटकर झेलती है। विश्वासघाती बेवफा पति की मृत्यु उसे आश्वस्त करती है। वह भारत आकर केन्द्रीय रक्षा मंत्रालय की अपनी नौकरी में वापिस आ अपने खोये हुये व्यक्तित्व को पुन: प्राप्त कर लेती है।

अर्चना पेन्यूली के ‘कैराली मसाज पार्लर’[viii] की नैन्सी के अंदर आत्मसम्मान भी है और आत्मबोध भी।। पहले भारतीय धर्मगुरु पति अब्राहम को वह इसलिए छोड़ देती है कि वह परस्त्रीगामी है। दांपत्य की नैतिकता का अतिक्रमण करके नैन्सी को अपमानित- उत्पीड़ित करने से बाज़ नहीं आता। डेनमार्क जैसे सभ्य देश के अपने दूसरे पति लार्स को वह उसकी हिंसक वृति और कुंठाओं के कारण छोड़ देती है। तीसरा फ्रेंच पति मार्को भी उसे रास नहीं आता। ज्वलंत प्रश्न है कि ऐसी स्थिति में वह स्वयं को बचाए या शादी को ? स्त्री जान गई है कि लाचार पत्नी से अकेली औरत होना बेहतर विकल्प है। नैन्सी कम्प्युटर एक्सपर्ट है। बी. एस. सी. है.। तैराकी में उसका कोई मुक़ाबला नहीं। मोम्बासा और बैंगलौर में उसने मसाज कला के अनेकों गुर जाने हैं। मोम्बासा में वह एक इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ाती रही है। वह मसाज पार्लर खोलती है। वह मसाज विशेषज्ञ, बॉडी वर्कर है। यह मालिश वात- पित्त, कफ को संतुलित करती है। अब नैन्सी मालिशवाली, मसाज थेरेपिस्ट, बॉडी वर्कर है। यह ‘आयुर्वेदिक हीलिंग रिज़ॉर्ट’ एक स्त्री का पार्लर है, लेकिन यह यूनि- सेक्स है। यहाँ पुरुष- स्त्री दोनों ग्राहक आ सकते हैं, यानी चुनौतीपूर्ण पेशा है।

6 . दिव्या माथुर के ‘शाम भर बातें’ [ix] की स्त्रियाँ भी अस्तित्व सजग हैं। सायरा का पति उससे धंधा करवाना चाहता था, दरिंदों की तरह मारता था। आत्म सजग सायरा उसके अत्याचारों से तंग आ मर्डर कर देती है, भले ही उसे जेल भी जाना पड़ता है। बीच पार्टी के ही घनश्याम प्रिया के रेप की कोशिश करता है तो मीता डंडे से उसकी पिटाई करती है और इला के सुझाव पर पुलिस को बुला उसे जेल भेज देती है।

7 . सुधा ओम ढींगरा के उपन्यास ‘नक्काशीदार कैबिनेट’ में नकली शादियाँ जीवन की ज्वलंत समस्या की तरह उभरी हैं। स्त्री जीवन का संघर्ष जितना विकट है, सशक्तिकरण की चाह उतनी ही प्रबल है। यह संधर्ष मीनल की बलि लेता है जबकि सोनल अपने साहस और धैर्य से बलदेव का भंडाफोड़ कर न जाने कितनी युवतियों का मानव तस्करी से उद्धार करती है। पराये देश में नितांत अकेली होने पर भी वह हिम्मत नहीं हारती, वह न बलदेव के चक्रव्यूह में धँसती है, न भारत वापिस आती है और न सुक्खी से शादी कर आराम से जीवन व्यतीत करने का संकल्प लेती है। वह एक ओर उच्चतम शिक्षा लेती है और दूसरी ओर बलदेव को हिरासत में पहुँचा, उसके गैंग का पर्दाफाश कर न जाने कितनी युवतियों की इस मानव तस्करी से रक्षा करती है। पेरिस में नौकरी करते हुये भी वह भारतीय युवतियों के शोषण के विरूद्ध अपना अभियान ज़िंदा रखती है। सम्पदा समय से पहले रिटायरमेंट ले एशियन स्त्रियॉं के लिए एन. जी. ओ. खोलती है। सोनम की माँ नितांत विपरीत स्थितियों में बेटी का साथ देती हैं और स्थितियाँ सुधर जाने पर हवेली में बच्चों का स्कूल खोल गाँव और देश की उन्नति में अपनी हिस्सेदारी निभाती है। डनीस पराये देश की एक अपरिचित युवती को न मात्र शरण देती और रास्ता दिखाती है, अपितु एक सजग जासूस की तरह मानव तस्कर उस सुलेमान/ बलदेव के घर की पूरी खोज- खबर भी रखती है। यानी उपन्यास की हर स्त्री अंधेरे कोनों में विद्युत बन कर उभरी है।

. 8. सुधा ओम ढींगरा के‘दृश्य से अदृश्य का सफर’में मनोविद डॉ लता अवसादग्रस्त रोगियों का उपचार करती हैं। उनके पास अंतर्दृष्टि है, परकाया प्रवेश की शक्ति है, पूर्वाभास हैं। डॉली का जीवट बहुत सशक्त है। वह हॉकी की खिलाड़ी रही है, टायक्वोंदों जानती है, हॉस्पिटल में नर्स थी। जेठ देवरों का सामूहिक बलात्कार उसे अंदर बाहर से क्षत- विक्षत कर देता है, लेकिन वह पराये देश में, पराये लोगों के बीच होकर भी अपने लिए लड़ती हैं। उसी ज़मीन पर जरूरी पढ़ाई कर अस्पताल में नर्स लगती है। गुरदीप हुड्डा से तलाक लेती है। पुनर्विवाह करती है। तीन बच्चों को जन्म देती है। सायरा पर राजनेता के पुत्र का प्रेम आमंत्रण अस्वीकारने पर भयंकर एसिड अटैक होता है। उसे मातापिता के साथ राजनैतिक शक्ति से इस देश में निष्कासित कर दिया जाता है। उपचार के साथ- साथ वह पीएच. डी. पूरी करती है। ठीक होने पर वह फार्मेसियूटीकल कंपनी में वैज्ञानिक और फिर डॉक्टर बनती है। दक्षिण भारतीय, हैदराबाद की युवती, पुलिस, तेलगू भारतीय महिला और मनोविद डॉक्टर लता की मदद और पिता का विश्वास जीत धीरे धीरे अपने आर्थिक, पारिवारिक, सामाजिक अधिकार पाने और बच्चों का स्नेह- सम्मान जीतने में सफल हो ही जाती है। उपन्यास में पुरुष सत्ताक के लिए चुनौती उभर रही है- मनुष्य बनो। अन्यथा तुम्हारा भी वही हाल होगा, जो गुरदीप हुड्डा का, नेता जी के बेटे या राजा जी का हुआ।

9 . सुदर्शन प्रियदर्शिनी के ‘पारो-उत्तरकथा’ में तो देवदास का नायकत्व ही पारो ने हथिया लिया है। लीलावती उपन्यास की सबसे सशक्त स्त्री है। पति प्रताडित लीलावती पति की मृत्यु के बाद रिश्तेदारों को, हवेली की मान- मर्यादा को, व्यापार की जटिलताओं और जायदाद को, अपने बच्चों को, पूरे साहस, आत्मबल और बौद्धिक विवेक से संभालती है। बहू पारो के सरल और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्तित्व को पहचान उसका साथ देती, वीरेन की हर उच्छृंखलता पर लगाम लगाती कहती है-

“मैंने उन जमीदारों के तेवर उम्र भर देखे और निभाए हैं इसलिए मैं पार्वती के साथ अन्याय न होने दूँगी।-----मैं अभी ज़िंदा हूँ चाहूँ तो आज भी तुम्हें बेदखल कर सकती हूँ वीरेन।“[x]

अल्हड़ प्रेमिका पारो जानती है-

“यह लड़ाई भी मेरी अपनी ही है। यह न मैं देव के लिए लड़ रही हूँ, न रायसाहब के लिए, न अपनी माँ के लिए और न रानी माँ के लिए - - - - मैं स्वयं कितनी सशक्त और अडिग रह सकती हूँ या अपने आप को रखना चाहती हूँ- यह मुझे कोई समझा नहीं सकता।“[xi]

अपनी सारी ऊहापोह, रायसाहब से मिलने वाली अवहेलना और अपमानजनक व्यवहार के बावजूद यह कर्तव्य सजग स्त्री अपने व्यक्तित्व को इतना ऊपर उठा लेती है कि रायसाहब हर निर्णय में, हर मुसीबत में, प्रत्येक घरेलू हलचल में उसकी विवेकशील सलाह लेना अनिवार्य मानते हैं। पारो रायसाहब का कवच बन जाती है।

कंचन जानती है कि समाज में विधवा सिर्फ दया, उपेक्षा और प्रताड़ना की पात्र है। पति प्रमोद की मृत्यु के बाद वह देवर विनोद से शादी की चादर स्वीकारने का सशक्त निर्णय लेती है।

पारो की माँ मंगला भले ही समाज के दोयम दर्जे से सम्बद्ध है, लेकिन उसका आत्मसम्मान उसे सशक्त स्त्री की तरह प्रस्तुत करता है। भुवनशोम द्वारा पारो और देव की शादी से इंकार करने पर वह संकल्प करती है कि बेटी की विदाई सोने की पालकी में होगी और वह भुवनशोम की हवेली से बड़ी हवेली में जाएगी और इस संकल्प को वह पूरा भी करती है। लीलावती हो, पारो हो या कंचन– उपन्यास के स्त्री पात्र हवा का रुख पहचानते हैं, निर्णय की क्षमता रखते हैं। समझौते करने में उन्हें कोई कष्ट नहीं, निर्णय लेने में किसी पक्षपात का आरोपण नहीं, अपना मत देने में संकोच नहीं। वे मस्तक ऊंचा करके व्यक्ति, समाज और परम्पराओं पर आघात भी कर रहे है और दूसरों का पथ प्रशस्त भी कर रहे हैं।

अनिल प्रभा कुमार ‘सितारों में सूराख’में स्त्रियों द्वारा अमेरिका के 50 राज्यों में ‘मी टू’ और ‘मदरज अगेन्स्ट ड्रंक ड्राइविंग’ की तरह ‘मॉमस डिमांड एक्शन फॉर गन सेन्स इन अमेरिका’ आंदोलन भी चलाया जाता है। एंटी गन मूवमेंट में जसलीन, आयशा, लूसी, जेराल्ड जैसी मायेँ हिस्सेदारी निभाने के लिए कूद पड़ती हैं। इस अभियान के लिए चर्च, सिनेगाग, स्कूल, इस्लामिक सेंटर, हैल्थ क्लब, मंदिर में जा लोगों को अपने साथ जोड़ती हैं। परिणामत: रेचर्ड, जय, खान जैसे पुरुष भी उनके साथ जुड़ जाते हैं।

स्वदेश राणा का‘कोठेवाली’ पूर्णिमा बर्मन की वेब पत्रिका ‘अभिव्यक्ति’ में प्रकाशित उपन्यास है। उन्नीसवीं शती के सातवें आठवें दशक की, ब्रिटेन में रहने वाली ’कोठेवाली’ की इस स्त्री का करन की निरंकुशता से छुटकारा पा लेना अस्तित्व सम्पन्न स्त्री का चरित्र उभारता है। लंदन का खुला माहौल ताहिरा के जीवन में संजीवनी बन कर आता है और वह करन द्वारा ओढ़ाए गए उस वैवाहिक बंधन से छुटकारा पा लेती है, जो उस के अस्तित्व का सिर्फ मर्दन ही कर रहा था। वह उन अंध गुफाओं से बाहर आने का रास्ता ढूंढ लेती है, जिनमें बीती पीढ़ी की पत्नी चाँद रानी, प्रेमिका बदरुनिस्सा या बेवा लाजो ताउम्र घुटती रही हैं। देश में कोठेवाली की बेटी होना भले ही उसके अस्तित्व पर बदनुमा दाग हो, पर विदेश में वह इसे आभिजात्य का जामा पहनाने के लिए संकल्पबद्ध है। वह चांदरानी या बदरुनिस्सा की तरह न पुरुष की छाया बन कर रहती है और न लाजो की तरह आत्मदमन का वरण करती है। वह न वैशाली की नगरवधू है न चित्रलेखा। विपरीत स्थितियों के बावजूद अपने अस्तित्व को न मिटाने का संकल्प लिए है। अपने से चिपके अपशब्द ‘ कोठेवाली’ को उसे गरिमा देनी ही है।

नीना पॉल के उपन्यास ‘कुछ गाँव गाँव कुछ शहर शहर’ में युगांडा से खाली हाथ ब्रिटेन पहुँचा एक प्रवासी परिवार है। ब्रिटेन एक महंगा देश है। यहाँ घर चलाने के लिए सुरेश के साथ- साथ सरोज और सरला भी जीवन संग्राम में हिस्सेदारी निभा रही हैं।

13. हंसा दीप के उपन्यास ‘बंद मुट्ठी’ की तान्या बदलते समय में रिश्तों के नए समीकरण की बात करती है। ‘बंद मुट्ठी’ में सिंगापुर में पली-बढ़ी भारतीय तान्या, पोलैंड के सैम से शादी कर, चीन की रिया को गोद ले, बहुसांस्कृतिक देश कैनेडा में रह रही है। यह परिवार और इसका जीवन जातीय, देशीय, भाषीय सीमा रेखाओं से आगे का है। यह ‘बंद मुट्ठी’ सैम, तान्या और रिया के हाथ लिए है। शीर्षक कहता है कि हाथ की लकीरें व्यक्ति स्वयं बनाता है। “सैम का हाथ उसकी हथेली को इस तरह सहलाता है कि लगता है, ऐसी सारी लकीरों को वह बदल रहा है, जो तान्या को परेशान करती हैं।” [xii]

हंसा दीप के केसरिया बालम में राजस्थान के उच्च मध्यवर्ग की इकलौती लाड़ली बेटी धानी के विवाहोपरान्त अमेरिका बसने की कहानी है। उसके पति, उसके केसरिया बालम के संसार में यंत्र की तरह मनुष्य भी जल्दी ही आउट डेटेड या एक्सपायर हो जाते हैं। पत्नी धानी जीवन का यह अलजबरा जल्दी ही समझ जाती है। उसने बेकरी का कोर्स किया हुआ था। वह स्वीट स्पॉट बेकरी को अपना गंतव्य बना काम शुरू कर देती है और अपनी मेहनत से बेकरी को इतना ऊँचा उठा देती है कि मालिक उसे मैनेजर बना देता है। पति की सहमति के बिना अपनी पैतृक संपत्ति दान करना उसके सशक्त चरित्र का प्रमाण है। वह मूल्यवत्ता को दसों अंगुलियों से फिसलने नहीं देती। यान्त्रिकी या भौतिकता को अपने ऊपर हावी नहीं होने देती। पति बाली से तलाक के बाद भी, उसका दिमागी संतुलन बिगड़ने के बाद भी वह मित्र बन उसको संरक्षण देती है। राजस्थान की यह सशक्त बेटी तलाक से मरु हो चुके दाम्पत्य को मैत्री की नदी से सींचने की प्रयास बनाए रखती है।

उपन्यास कहते हैं कि स्त्री अपनी नियति की नियामक बन गई है। दुखद अतीत के पृष्ठ उसने बादल दिये हैं। यह स्त्री विषमतम परिस्थितियों में भी घुटने नहीं टेकती। पीड़ा से ही आत्मबल सँजोती है। उसे बार-बार ओंधे मुंह गिराया जाता है और वह हर बार जूझने की नई ऊर्जा ले उठ खड़ी होती है। यह वारियार स्त्रियां है। उत्पीड़ित स्त्री जब सिर उठाती है, तो नारी सशक्तिकरण का जीवंत उदाहरण बन जाती है। स्त्री अंधेरे कोनों में विद्युत बन उभरी है।


संदर्भ
  1. उषा प्रियम्वदा, भया कबीर उदास, राजकमल, नई दिल्ली, 2007
  2. वही, पृष्ठ 15 
  3. उषा प्रियम्वदा, नदी, राजकमल, 2014 
  4. सुषम बेदी, पानी केरा बुदबुदा, किताब घर, दिल्ली, 2017
  5. वही, पृष्ठ 17 
  6. वही, पृष्ठ 114 
  7. अर्चना पेन्यूली, वेयर डू आई बिलांग, भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली, 2010 
  8. वही, कैराली मसाज पार्लर, भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली, 2020 
  9. दिव्या माथुर, शाम भर बातें, द्वितीय संस्कारण, वाणी, दिल्ली, 2018
  10. वही, पृष्ठ 8 
  11. वही, पृष्ठ 115 
  12. हंसा दीप, बंदमुट्ठी, शिवना, सीहोर, मध्य प्रदेश, 2017, पृष्ठ 12 



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