डॉ० आरती की शाइरी अंधेरे में शुक्लपक्ष की तरह है

समीक्षक: प्रेमकिरण


पुस्तक: साथ रखना है (ग़ज़ल संग्रह)
रचनाकार: आरती कुमारी
प्रकाशक: अभिधा प्रकाशन
पृष्ठ: 112
मूल्य: ₹ 250/-

मार्क्सवादी चिंतक और आलोचक डॉ० राम विलास शर्मा के मतानुसार "ग़ज़ल तो राजदरबारों से निकली हुई विधा है जो प्रगतिशील मूल्यों को व्यक्त करने में अक्षम है।" उनके इस कथन को हिंदी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार दुष्यंत कुमार ने अपनी ग़ज़लगोई से ग़लत साबित कर दिया है। यह बात सत्तर के दशक की है। उस वक़्त केंद्र की निरंकुश सरकार की बर्बरता चरम पर थी। आम आदमी का तथाकथित आज़ादी से मोहभंग हो चुका था। सरकार के ख़िलाफ़ लिखने या बोलने पर पाबंदियाँ थीं। तमाम बुद्धिजीवी वर्ग हतप्रभ था। ऐसे संक्रमण काल में 'नई कविता' किसी और ही कल्पनालोक की सैर पर निकली हुई थी, जहाँ आम आदमी की रसाई मुमकिन ही नहीं थी। उसी वक़्त 'सूर्य के स्वागत' के कवि ने उर्दू ग़ज़ल की सात सौ साल पुरानी एक बोसीदा सिन्फ़ को आज़माया, जिसके बारे में वरिष्ठ कथाकार राजेन्द्र यादव का कथन है कि 'ग़ज़ल अपने 'सेचुरेशन प्वाइंट' पर पहुंच चुकी है, इसमें कुछ भी नया जोड़ना संभव नहीं है'। इन सबको मुँह चिढ़ाते हुए दुष्यंत कुमार ने ऐसी ग़ज़लें कहीं जो हर किसी की ज़बां पर चस्पा हो गयीं। फिर तो उनके नक़्शे क़दम पर छोटे-बड़े सब रचनाकार चल पड़े। इसमें महिलाओं का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। ऐसी ही एक युवा शाइरा हैं डॉ० आरती कुमारी। आप बहुमुखी प्रतिभा की धनी हैं। आपने साहित्य की हर विधा में तबअ आज़माई की है। हाल के दिनों में अपनी ग़ज़लगोई से हिंदी और उर्दू दोनों ज़बानों में एक ख़ास पहचान बना ली है।
ग़ज़ल एक ऐसी सिन्फ़े-सुख़न है कि इससे जिस भी ज़बान वालों ने दिलोजान से मुहब्बत की, वह उन्हीं की होकर रह गयी। डॉ० आरती उन्हीं में से एक हैं। इनकी मातृभाषा हिंदी है और ये इसी भाषा में ग़ज़लें कहती हैं और ख़ूब कहती हैं। इनकी ग़ज़लों से गुज़रते हुए मैं पूरी ज़िम्मेदारी से कह सकता हूँ कि इन्होंने अपनी ग़ज़लों में घर परिवार से लेकर तमाम सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विद्रूपताओं पर बेबाक क़लम चलाई है। इनमें रूमानियत सिर्फ़ नमक की हैसियत रखती है ताकि ग़ज़ल का ज़ायक़ा बना रहे। जैसे यह शेर-

 तेरी याद में जो गुज़ारा गया है
 वही वक़्त अच्छा हमारा गया है

यही रूमानियत जब व्यष्टि से समष्टि की ओर गमन करती है, तब ऐसे अशआर डॉ० आरती की क़लम से निकलते हैं।
 
प्रेम किरण

सच को कोई गवाह भी न मिला
 झूठ ही जीतता रहा आख़िर

ज़ुल्मो-सितम के डर से है मायूस 'आरती'
दिल में कोई उम्मीद न हसरत है आजकल

 ये सियासत थालियाँ बजवा रही है
 किस तरह जाएंगे मजदूरों के दुर्दिन

कोई मुंसिफ़ किसी मुजरिम को सज़ा कैसे दे
जब अदालत में वकीलों की सिफ़ारिश होगी

ऐसे और भी कई ख़ूबसूरत अशआर आपको डॉ० आरती के इस ग़ज़ल संग्रह में देखने को मिल जाएंगे।

आज सारा संसार युद्ध के मुहाने पर खड़ा है। सत्ता में बने रहने के लिए राजनेता वह सब करने पर आमादा हैं, जो आचार-संहिता के विपरीत है। धर्म और जाति के नाम पर समाज को लगातार बांटा जा रहा है। धार्मिक कट्टरता बढ़ती जा रही है। सारा संसार आतंकवाद से त्रस्त है। राह चलती लड़कियाँ असुरक्षित हैं। अर्थाभाव के कारण ग़रीब परिवार के बच्चे पढ़ने-लिखने की उम्र में ढाबे में काम करते या सड़कों पर भीख मांगते नज़र आते हैं। नैतिकता को ताक पर रख कर नौकरी पेशा मुलाजिम अपनी तनख़्वाह से ज़ियादा ऊपरी आमदनी पर यक़ीन करता है। इन सब विषयों को डॉ० आरती ने पूरी जिम्मेदारी से शेरों में ढालने का प्रयास किया है। इसके लिए इन्होंने कहीं बोलचाल की भाषा का इस्तेमाल किया है, कहीं पौराणिक मिथकों का सहारा लिया है, तो कहीं बिंबों और प्रतीकों से काम निकाला है,जो निःसंदेह चमकदार और दर्शनीय है। मिसाल के तौर पर कुछ शेर देखें-

 ताज पाने के लिए क्या क्या नहीं होता यहाँ पर
 क्यों मिला था राम को वनवास हम सब जानते हैं

 बेटी को उसका हक़ मिले सम्मान भी मिले
 अब निर्भया कोई न बने वर्ष भर यहाँ

 सड़क बिजली दवा पानी
 हुई है बात सपने की

 आंधी चली थी शम्अ बुझाने तमाम रात
 जलते रहे थे ख़्वाब सुहाने तमाम रात

युद्ध में कितने ही नरसंहार का कारण बना था
द्रौपदी का वह कुटिल उपहास हम सब जानते हैं

इन तमाम विसंगतियों के बावजूद डॉ० आरती हिम्मत नहीं हारतीं और उम्मीद का दामन कभी नहीं छोड़तीं। तभी तो ये कहती हैं-

 हार मानेंगी नहीं मुश्किल से डरकर लड़कियाँ
 जंग जीतेंगी सदा बनकर सिकन्दर लड़कियाँ

 इन अंधेरों से कोई ख़ौफ़ नहीं है मुझको
 मैं समझती हूँ यहाँ नूर की बारिश होगी

 कब मुश्किलों का नाम है औरत की ज़िंदगी
 हिम्मत को इक सलाम है औरत की ज़िंदगी

डॉ० आरती की शायरी अंधेरे में शुक्ल पक्ष की तरह है, जो जीने की राह को आलोकित करता है। शायरी का मतलब सिर्फ़ आत्मविलाप करना नहीं है, बल्कि एक ख़ूबसूरत दुनिया तामीर करने की पहल करना भी है जिसमें प्रेम और सौहार्द्र हो, हर धर्म के प्रति सम्मान हो, हर भाषा के प्रति अनुराग हो, ऊंच-नीच का भेद-भाव न हो, महिलाओं का मानसिक और शारीरिक शोषण न हो, माता-पिता को वृद्धाश्रम का सहारा न लेना पड़े। परिवार में सब मिलजुलकर सुख और शांतिपूर्वक जीवनयापन करें। इन सबसे बढ़कर देश के हर नागरिक के मानस में राष्ट्रप्रेम सर्वोपरि हो। इन मुद्दों पर डॉ० आरती अत्यंत संवेदनशील प्रतीत होती हैं, इसलिए उपर्युक्त विषय स्वतः स्फूर्त इनकी शायरी का हिस्सा बन गए हैं। कुछ शेर देखें-

 स्वप्न है परिदृश्य बदले प्रेम ही आधार हो
 मिट सकें ये दूरियाँ आशा भरा उद्गार हो

 अंधियारा है ख़ूब घना दिनकर बनने की सोचें
 हर दिन हर पल ख़ुद को हम बेहतर करने की सोचें

शेरगोई एक ऐसा फ़न है जिस पर दस्तरस हासिल करने में एक उम्र निकल जाती है, फिर भी मुझे उम्मीद है कि डॉ० आरती शेरो-सुख़न के इस गहरे समुंदर में गोते लगाकर तजरुबों की सीपियों से और भी नायाब गौहर निकाल कर हिंदी और उर्दू अदब के ख़ज़ाने में इज़ाफ़ा करेंगी।
***

प्रेमकिरण
पटना, बिहार
चलभाष: 9334317153
 

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