काव्य: शहंशाह आलम

1. मैंने दरख़्त बनना चाहा

मैं दरख़्त बनना चाहता था
उन्होंने मुझे पेड़ की तरह
आरी से काट डाला

मैं समुंदर बनना चाहता था
मुझे नमक बनाने वालों के हाथों 
बेरहमी से बेच डाला गया

जिस तरह वे औरतों को बेचते रहे 
जिस तरह वे बाग़ीचों को बेचते रहे
जिस तरह वे नदियों को बेचते रहे
जिस तरह वे मुल्कों को बेचते रहे
वैसे ही वे मुझे भी बेचते रहे हैं 
रियायतें दिलाने के नाम पर

मैं नाव बनना चाहता था
मुझ में छेद-दर-छेद किए गए
ताकि मैं हुए भटके मुसाफ़िर के 
किसी काम न आ सकूँ

इसमें बस ग़लती मेरी थी
मुझे बहुत पहले जान लेना चाहिए था
कि बेचना उनकी फ़ितरत रही है
इस वास्ते कि उनके जिस्म में
किसी रहमदिल शायर का नहीं
सख़्तदिल कुत्ते का दिल धड़क रहा है

यही वजह है कि उन्हें आरामगाहें नहीं 
क़त्लगाहें ज़्यादा पसंद आती रही हैं

यही वजह है कि उन्हें मुद्दतों से
जीते हुओं का जुलूस नहीं
हारे हुओं की भीड़ बेहद पसंद है

मैं घोड़ा बनना चाहता था मज़बूत काठी का
उन्होंने मुझ पर चाबुक बरसाए अनथक

आख़िर में मैं लोहार का घन बना
और उन पर इस क़दर गिरा
कि वे टूटकर यहाँ-वहाँ बिखर गए।
***


2. जो ज़रा-सा ज़्यादा अच्छे हैं उनके बारे में

जो ज़रा-सा ज़्यादा अच्छे हैं अभी के वक़्त में
उनके दोस्त सभी बनना चाहते हैं अत्यंत प्रखर

इसमें चहुँकने जैसा कुछ भी नहीं है
इसीलिए मैं बताता चलूँ कि मेरी भी दोस्ती है
एक ज़रा-सा ज़्यादा अच्छे आदमी से गहरी 

जिसे ज़रा-सा अच्छा सिद्ध कर दिया गया है
उसके किसी ज़रा-सा अच्छे काम को देखकर
उसके किसी ज़रा-सा अच्छे अंदाज़े-बयाँ पर झूमकर
उसी के गुफ़ानुमा घर में घुसकर आपके द्वारा
तो वह ज़रा-सा ज़्यादा ख़ुशी में लहालोट एकदम
ख़ुद को देवताओं की फ़हरिस्त में डाल लेता है

फिर ओस के दिन हों या उमस के या बारिश के
वह ज़रा-सा अच्छा आदमी पूरी शिद्दत के साथ
अपने पूरे घर को देवताओं का घर बनाने में लग जाता है

फिर आप उस ज़रा-सा ज़्यादा अच्छा 
कहे जा चुके, सिद्ध किए जा चुके आदमी को
अपने घरनुमा घर में चाय पर खाने पर बुलाते हैं
तो वह आपकी दावत क़बूल करने से साफ़ इनकार कर जाता है
इसलिए कि आप ही के आसपास अड़ोस-पड़ोस में
कोई मुश्ताक़ मियाँ कोई इंसान अली कोई मक़सूद कोई हबीबुर रह रहा होता है
जिसे वह ज़्यादा अच्छे आदमी की पंक्ति में 
रख चुका होता है बरसों पहले से बिना सकुचाए

और ऐसे ही आदमियों से अपने रिश्ते ख़राब होने के डर से
ज़रा-सा ज़्यादा अच्छा आदमी कइयों के यहाँ नहीं जाता

फिर किसी मुश्ताक़ मियाँ किसी इंसान अली किसी मक़सूद की अच्छाइयों का असर
उस बेचारे ज़रा-सा ज़्यादा अच्छे आदमी पर इतना गहरा होता है
कि वह भी उनके ज़रिए किए जा रहे हर ग़लत काम के समर्थन में 
लगा-भिड़ा दिखाई देता है उतरा दिखाई देता है अपने तहख़ाने में

फिर जैसे उनके मुश्ताक़ मियाँ इंसान अली मक़सूद क़ब्ज़ा लेते हैं 
आम आदमियों के लिए चलनेवाली ज़मीनें वह भी क़ब्ज़ा लेता है

यही सच है, जैसे हर ज़रा-सा अच्छा सिद्ध किया जा चुका आदमी
मुझ जैसा धुनियाँ, जो रूई धुनने का काम करता है
मुझ जैसा नट, जो खेलतमाशे दिखाने का काम करता है
मुझ जैसा कलईगर, जो बरतनों पर कलई करता है
मुझ जैसा नालबंद, जो घोड़े या बैल के पाँव में नाल बाँधता है
मुझ जैसों के बच्चे के बारे में वह ज़रा-सा अच्छा आदमी
बिना झेंपे बयान दे देता है बिना झेंपे फ़तवा दे देता है
कि ये बच्चे हमेशा सरकारी स्कूलों के लायक़ ही होते हैं

इसलिए कि देश में बचे रह गए बाक़ी सारे स्कूल
उस जैसे ज़रा-सा अच्छे आदमी के बच्चों के लिए आरक्षित होते हैं
इसलिए कि मुझ जैसा बुरा आदमी शिक्षा को कभी ख़रीद नहीं सकता था उनकी तरह

यही सच है साथियो, मुझ जैसा ज़रा-सा ज़्यादा बुरा आदमी
हमेशा उस ज़रा-सा अच्छा घोषित किए जा चुके आदमी की बग़ल से
नज़रें झुकाए गुज़र जाता है किसी नींद में चलनेवाले आदमी की तरह।
***


3. बाँसुरी

मैं जानता हूँ चिलचिलाती धूप के इन कठोर दिनों
यह बाँसुरी जब-जब बजती है तुम्हारे होंठों से लगकर
तुम्हारी भाषा किसी मीठी नदी की तरह बहती हुई
मेरी पीड़ा को दूर बहा ले जाती है बिना धुकड़-पुकड़

मैं जानता हूँ अब बाँसुरी सिर्फ़ तुम्हीं बजाती हो
बिना हारे बिना थके इस मरुथल की घासों के बीच

सूक्ष्म मेरी आत्मा जो खिल-खिल रही है मौन को टूटते देख
पीपल के पत्तों के बीच इठला रहे हरे सुग्गों के झुंड में
तुम्हीं को संबोधित तुम्हीं को सपनाते पानी का सोता फोड़ते

ऐसा होने के पीछे भी तो तुम्हारी ही बाँसुरी के सुर हैं हठीले

मैं जानता हूँ धूप में तपा-धिपा यह पहाड़ पूरा जो लयबद्ध है
तुम्हारी बाँसुरी के गान की पतली धार से बंदी शिविर ढहाते देख

यह पहाड़ मुझे भी देखना चाहता है तुम में ही पूरी तरह संचित।
***


4. घर

कविता में कहाँ पर है यह घर

घर जिसे चूहों दीमकों ने बनाया
चींटियों मधुमक्खियों ने बनाया
साँपों ने भी बनाया बहुविध बहुरंगा

यह घर जो बेहद महीनी से बनाया गया है
झूठ नहीं हो जाता आपके असुंदर कह देने से

इस घर में भी ऋतुचर्या अपनाई जाती होगी

बस यहाँ बल और वीर्य बढ़ाने वाली 
जड़ी नहीं रखी जाती होगी
जैसे आप रखते हैं अपने लिए छिपाकर
ख़ुद को मर्द साबित करने के लिए
अपने घर की औरतों के बीच

हर घर किसी भाषा की तरह होता है
पढ़ लिए समझ लिए जान लिए जाने लायक़

इन घरों में रहने वाले ख़ानाबदोश हो सकते हैं
जैसे कि चांद, जैसे कि सूरज 
सबसे कुशल ख़ानाबदोश होते हैं
लेकिन हर घर अपनी जगह अडिग रहता है
उसके ढह जाने अथवा ढा दिए जाने तक

एक घर परंतु सबके पास कहाँ होता है
जैसे रोज़ थिरकता है रोज़ बजता है
उनका घर उनके मन में उनके तन में साकार

यह भी सच है मेरे भाई!
मेरी बेअक़ली की वजह से मेरे पास
कोई घर कहाँ है उनके घर जैसा

मगर मेरे भीतर रोज़
एक घर बनता है
पूरी ख़ामोशी से जैसे
कोई चिड़िया अपने लिए एक घर।
***

जन्म : 15 जुलाई, 1966, मुंगेर, बिहार
शिक्षा : एम. ए. (हिन्दी), विद्यावाचस्पति (मानद)
प्रकाशन : 'गर दादी की कोई ख़बर आए', 'अभी शेष है पृथ्वी-राग', 'अच्छे दिनों में ऊँटनियों का कोरस', 'वितान', 'इस समय की पटकथा', 'थिरक रहा देह का पानी', ‘आग मुझमें कहाँ नहीं पाई जाती’, 'मेरी बाँसुरी मेरी भाषा है', 'ख़ानाबदोशी' (कविता-संग्रह) प्रकाशित। 'कवि का आलोचक', 'कविता की प्रार्थनासभा', 'कविता का धागा' (आलोचना) प्रकाशित। बारिश विषयक कविताओं का संचयन 'आकाश की सीढ़ी है बारिश' का संपादन। कोयल विषयक कविताओं का संचयन 'कुहू-कुहू' का संपादन। 
विविध : चुनिंदा कविताओं का संचयन 'बारिश की भाषा' का अतिथि संपादन। 'गर दादी की कोई ख़बर आए' कविता-संग्रह बिहार सरकार के राजभाषा विभाग द्वारा पुरस्कृत। 'वितान' (कविता-संग्रह) पर पंजाबी विश्वविद्यालय की छात्रा जसलीन कौर द्वारा शोध-कार्य। देश की सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ छपी हैं। देशी-विदेशी भाषाओं में कई कविताओं के अनुवाद भी छपे हैं। आकाशवाणी और दूरदर्शन से कविताओं का नियमित प्रसारण।
संप्रति, बिहार विधान परिषद् के प्रकाशन विभाग में।
संपर्क : हुसैन कॉलोनी, नोहसा बाग़ीचा, नोहसा रोड, पूरबी पेट्रोल पाइप लेन के नज़दीक, फुलवारीशरीफ़, पटना-801505, बिहार।
चलभाष:  9835417537
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ईमेल : shahanshahalam01@gmail.com
 

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