बच्चों के सदाबहार कवि बालस्वरूप राही जी

प्रकाश मनु

-प्रकाश मनु


राही जी माने राही जी। हम सबके अपने, सबके प्यारे राही जी। बच्चों के सदाबहार कवि राही जी। पिछले आठ दशकों से उसी फक्कड़ता और बेफिक्र मस्ती से उम्र को थामे बैठे राही जी। जैसा कोई नहीं, वैसे राही जी।...
शायद बचपन में ही अपनी जिंदगी को हरफ-दर-हरफ अपने ढंग से जीने की कसम खा बैठे थे राही जी। तब से जमाना बदला। कितने युग आए, गए। पर एक शख्स जिसने जमाने से कुछ नहीं चाहा, हर हालत और अच्छे-बुरे वक्तों में बस अपनी रौ में जीना चाहा था, वह नहीं बदला। जरा भी नहीं बदला। न उसने अपनी कसम को टूटने दिया, न जमाने की परवाह की। बच्चों जैसा मासूम, मगर खुद्दार वह कवि जिया तो अपनी सदाबहार मस्ती के साथ जिया और दुनिया की हजारों-हजार दुख-तकलीफों और मुश्किलों को फूँक मारकर उड़ाते हुए जिया। और उसी बेफिक्री से हँसते और हँसाते हुए, ठीक उसी ढब, उसी अंदाज में आज भी जी रहा है।
ऐसी नजीर कम, बहुत कम मिलती है। यकीनन।

पर दुनिया में राही भी तो एक ही होता है। कम से कम बालस्वरूप राही तो एक ही होता है।

राही जी अपनी उम्र के नवीं दहाई में हैं। पर अभी तो जवान हैं। नहीं-नहीं, गलत कह गया। माफ कीजिए—अभी तो वे बच्चे हैं, किशोर हैं, जैसे कोई सत्तर बरस पहले रहे होंगे। इतना बड़ा बच्चा, जिसके भीतर से बचपन अविरल झर-झर झरता है, आपने देखा नहीं होगा। शायद आपको यकीन भी न हो। पर आप मेरे साथ चलिए। दिल्ली के मॉडल टाउन इलाके में वह बच्चा आपको अब भी मिल जाएगा, अपनी लाजवाब मस्ती, और बेफिक्री से इस तमाम उठा-पटक वाली चालाक दुनिया को मुँह चिढ़ाता हुआ। और अपने ही सरीखे अपने प्यारे दोस्तों और शागिर्दों के बीच बैठा हँस-हँसकर गाता हुआ, “लौट चलो अब उस खँडहर में जिसको कविता कहते हैं, आलीशान मकानों में तो सिर्फ सयाने रहते हैं...!”

या फिर मूड बदला तो दुनिया के सारे बच्चों के सुर में सुर मिलाकर, बड़ी मासूमियत से गाने लगता है—
अगर न होता चाँद, रात में 
हमको दिशा दिखाता कौन?
अगर न होता सूरज, दिन को 
सोने-सा चमकता कौन?
अगर न होतीं निर्मल नदियाँ
जग की प्यास बुझता कौन?
अगर न होते पर्वत, मीठे 
झरने भला बहता कौन?

और इस तरह के तमाम सवालों की झड़ी लगाने के बाद, आखिर में वह चुपके से एक ऐसा मासूमियत भरा सवाल भी पूछ लेता है कि सुनने वाले एकाएक जैसे चौंक उठते हैं—
अगर न होते हम तो बोलो, 
ये सब प्रश्न उठाता कौन?

ऐं, यह कैसा सवाल...! शायद यह सवाल तो है, पर सवाल के साथ-साथ एक मुकम्मल जवाब भी है। राही जी का अपने अंदाज में जवाब, जिसमें वे बिन कहे यह कह जाते हैं कि इस दुनिया में चाँद, सूरज, नदियाँ, झरने, बादल, इंद्रधनुष समेत प्रकृति की बड़ी से बड़ी सौगातें—ये सब जरूरी हैं, बहुत जरूरी, मगर इस सबके साथ हम भी तो आखिर उतने ही जरूरी हैं। अगर हम न होते तो न चाँद और सूरज का कोई मतलब होता, और न नदी, झरने, बादल और इंद्रधनुष का। आखिर इस सबको अर्थ देने वाले तो हम ही हैं। और उतने ही बड़े, उतने ही महत्त्वपूर्ण और लाजवाब हैं, जितने चाँद-सूरज सरीखे प्रकृति के ये बेशकीमती उपहार। अगर वे इस दुनिया की बड़ी सौगातें हैं, तो हम भी।

और यह राही जी की बाल कविता है—बच्चों के लिए लिखी गई कविता, तो ‘हम’ के मानी एक बच्चा भी है। यानी एक छोटा बच्चा भी चाँद-सूरज, नदी-झरने और बड़े-बड़े विराट गिरिशिखरों से कम नहीं! वह भी अपनी जगह उतना ही बड़ा, उतना ही जरूरी है। आखिर तो यह सारी कायमात उसी से है! वही सब चीजों में गति भरता है, अर्थ भरता है, और अपनी पोपली मुसकान से सब कुछ को सुंदर बना देता है।

मैं बेहिचक कह सकता हूँ कि बाल कविता में यह बात कहने का साहस सिर्फ राही जी ही कर सकते हैं। वही राही जी, जो एक पल हमें बच्चों सरीखे मासूम लगते हैं, तो अगले ही पल उनकी खुद्दारी हमें हतप्रभ कर देती है। 
*

बालस्वरूप राही हिंदी उन विरले कवियों में से हैं, जिन्होंने बच्चों के लिए भी उतने ही मन से लिखा है, जितना बड़ों के लिए। उनकी बाल कविताएँ कई पीढ़ियों से बच्चों के साथ-साथ बड़ों को भी रिझाती आई हैं। कथ्य के अनूठेपन और नदी सरीखी लय के साथ बहती उनकी कविताओं ने बाल कविता का समूचा परिदृश्य ही बदल दिया। सच तो यह है कि राही जी बच्चों के सर्वाधिक पसंदीदा कवियों में से हैं, जिनकी कविताएँ पढ़-पढ़कर एक पीढ़ी जवान हो गई, पर इन कविताओं का जादुई सम्मोहन आज भी वैसा ही है। वैसी ही गमक, वैसी ही तासीर। बल्कि सच कहूँ तो उन्हें पढ़कर फिर से बच्चा बनने का जी करता है।

यों राही जी तो शुरू से ही अपने ढंग से बच्चों के लिए कविताएँ लिख रहे थे। अपनी मस्ती में लिख रहे थे और जी रहे थे। पर उन्हें भी शायद अंदाज न होगा कि वे कितनी दूर तक जाएँगी, और डा. शेरजंग गर्ग, दामोदर अग्रवाल, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, योगेंद्रकुमार लल्ला और डा. श्रीप्रसाद सरीखे हिंदी के कालजेता कवियों की कतार के साथ मिलाकर, युग-परिवर्तन की एक ऐतिहासिक नजीर बन जाएँगी। राही जी की कविताओं में बच्चों के मन, सपनों, इच्छाओं और आकांक्षाओं को बोलचाल की एकदम सीधी-सहज भाषा में ऐसी नायाब अभिव्यक्ति मिली, कि आज भी हजारों बच्चे उनकी बाल कविताओं के मुरीद हैं और उन्हें ढूँढ़-ढूँढ़कर पढ़ते हैं।

पर हमारे मनमौजी राही जी कवि बने कैसे? कौन उन्हें कविता की ओर लाया? एक इंटरव्यू में जिज्ञासु भाव से बाल साहित्यकार शकुंतला कालरा जी के पूछने पर राही जी एकाएक जैसे अपने बचपन में जा पहुँचे। पुरानी यादों के पन्ने पलटते हुए, उन्होंने बचपन की बहुत सारी मजेदार घटनाओं का जिक्र किया। अपने कवि होने का श्रेय उन्होंने अपने परिवार के साहित्यिक वातावरण को दिया। उनके पिता और बड़े भाई भी लिखते थे और कवि के रूप में उनकी अच्छी ख्याति थी। इसका असर भावुक बच्चे बालस्वरूप पर पड़ना ही था। वह पड़ा। पर साथ ही एक बार और कही राही जी ने, और वह बड़ी महत्त्वपूर्ण है। आइए, स्वयं राही जी से ही सुनते हैं— 

“मुझे परिवार में शायराना माहौल मिला। मगर यह जोड़े बिना बात अधूरी रह जाएगी कि मेरा स्वभाव ही ऐसा था कि मैं कवि बने बिना रह ही नहीं सकता था। मैं पढ़ाई में ठीक-ठाक, खेल-कूद में फिसड्डी, परंतु संवेदनशीलता में बहुत आगे था। मेरी प्रतिक्रियाएँ बहुत तीव्र होती थीं। परिवार की सबसे छोटी संतान होने के कारण सभी का लाड़-प्यार जरूरत से ज्यादा मिलने की वजह से मैं तुनुकमिजाज और गुस्सैल हो गया। क्रोध प्रकट करने का मेरा तरीका भी अजीब था। गुस्सा हो जाने पर मैं घर का सामान—कपड़े-लत्ते, रसोई के बरतन आदि लाकर सहन (आँगन) में पटक देता। फिर जमीन पर लेटकर ज़ोर-ज़ोर से रोता और अपने बाल खींचता। मेरा क्रोध उसमें समा नहीं पाता था। जैसे मेरा क्रोध मुझमें समा नहीं पाता था, उसी तरह अन्य भाव भी मुझमें समा नहीं पाते थे। उनकी अभिव्यक्ति तो होनी ही थी, सो होने लगी। पहले रोकर होती थी, फिर कविता के रूप में होने लगी। भावों के उद्वेलन जब मन में समा नहीं पाते तो शब्दों में ढलकर कविता बन जाते हैं।”

बात कहते-कहते राही जी जैसे चुटकियों में यह सूक्ति ईजाद कर देते हैं कि, “भावों के उद्वेलन जब मन में समा नहीं पाते तो शब्दों में ढलकर कविता बन जाते हैं।” यह एक बढ़िया सूक्ति तो है, पर सच पूछिए तो यह कविता की एक मुकम्मल परिभाषा भी है।

तो क्या राही जी का कवि बनना नियति का खेल था? सिर्फ नियति का खेल...! राही जी इस सवाल का जवाब भी अपने खास अंदाज में, बड़े दिलचस्प ढंग से देते हैं, “नियति से बना अथवा नहीं, परंतु वास्तविकता तो यही है कि मेरा साहित्यकार बनना नियत था, तय था। मैं अगर कवि न होता तो कुछ भी न होता।” 

राही जी बचपन में जासूसी साहित्य पढ़ते थे तो जासूस बनने की सोचते। कभी-कभी योगी और संन्यासियों की तरह जंगल में जाकर ध्यान लगाने की बात भी मन में आती। और भी तरह-तरह के खयाल। गो कि उन्हें कुछ अलग करना है। औरों की तरह भीड़ का आदमी बनकर नहीं रह जाना—यह पुकार बार-बार उनके भीतर से आती। पर किशोरावस्था तक आते-आते ये सब कल्पनाएँ थिराने लगीं। साफ हो गया कि उन्हें लेखक बनाना है, “एक बार कलम हाथ में आई तो आई। सर कलम होने की नौबत आती, तब भी नहीं छूटती। जिस तरह से संत ब्रह्मानंद का अनुभव कर लेने के उपरांत और कोई रस चख ही नहीं सकता, वैसे ही कोई कवि काव्य-रस में सराबोर होने के बाद और किसी रस के लिए नहीं तरसता।”

संयोग से राही जी की प्रथम प्रकाशित कविता एक बाल कविता ही है। चंदा मामा पर लिखी गई उस बाल कविता की उठान कुछ इस तरह होती है, ‘चंदा मामा, मेरे आँगन में तुम आना/ कितने सुंदर कितने प्यारे, मन को हर लेते हो हमारे।’ न सिर्फ उनकी यह बाल कविता बड़ी शान से छपी, बल्कि उसका पारिश्रमिक भी आया। पारिश्रमिक था आठ रुपए। जीवन में यह पहला पारिश्रमिक पाने का रोमांच कैसा था, यह भी जरा राही जी से सुनें, “मुझे अब तक याद है कि पत्रिका से पारिश्रमिक स्वरूप आठ रुपए का मनीआर्डर आया था। अब क्या बताऊँ, उसे पाकर कितना निहाल हो गया था। अब हजारों भी मिल जाएँ तो वह खुशी नहीं मिल सकती।”

इसी इंटरव्यू में राही जी बड़े विनोदपूर्ण ढंग से एक ऐसी बात कह जाते हैं, जो मैंने कम से कम किसी बाल साहित्यकार के मुँह से नहीं सुनी। उनके शब्द हैं, “मैं नहीं जानता कि नाम का व्यक्ति पर कितना प्रभाव पड़ता है। मगर यह जानता हूँ कि मैंने कभी इतना ‘ग्रो’ नहीं किया कि बच्चों की दुनिया से दूर चला जाऊँ।...कवि लोग बुढ़ा जाने पर अक्सर कहते हैं, अभी तो मैं जवान हूँ’। मगर मैं तो यही कहूँगा, ‘अभी तो मैं किशोर हूँ’।”

राही जी ने ‘ग्रो’ नहीं किया, यह हिंदी बाल साहित्य का अहोभाग्य है। और मुझे यकीन है कि उम्र की इस नवीं दहाई में तो उनके ‘ग्रो’ करने की आशंका बहुत कम है। यानी अब भी उनसे एक से बढ़कर एक बाल कविताओं की उम्मीद की जा सकती है, जिनमें वही तासीर हो, जो राही जी की बाल कविताओं में होती है। होती आई है सदा से। बल्कि आपको एक राज की बात बताऊँ। अभी हाल में पीले रंग के लिफाफे में बड़े करीने से बंद करके, कहावतों पर लिखी गई कुछ खूबसूरत बाल कविताएँ राही जी ने मुझे भेजी हैं, जिन्हें पढ़ते ही मैं झूम उठा। राही जी पर निकल रहे ‘बालवाटिका’ के विशेषांक ने अरसे से रुकी ही उनकी कलम में चंचलता भर दी। यह ‘बालवाटिका’ और हम सभी के लिए खुशी की बात है।
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मैं राही जी से पहली बार कब मिला? बड़ी धुँधली सी इसकी याद है। शायद किसी साहित्यिक मित्र के घर गोष्ठी थी। उसमें मैं गया था। कुछ पढ़ा भी था उसमें। वहीं राही जी से मिलना हुआ तो मैं अभिभूत सा हो उठा। पर राही जी ने भी मेरे भीतर छिपा हुआ कुछ था, जिसे पहचान लिया था। आज भी जब कभी उनसे बात होती है तो वे याद दिलाते हैं, “मैंने तो तभी पहचान लिया था कि इस युवक में कुछ अलग, कुछ खास बात है। यह साहित्य में कोई बड़ा काम करेगा।”

मैंने साहित्य में ऐसा कुछ किया है, यह गलतफहमी तो मुझे नहीं है। पर राही जी के मन में मेरे लिए कुछ ऐसा भाव आया, इसे मैं उनका स्नेहपूर्ण आशीर्वाद ही मानूँगा।

ऐसे ही मेरे बाल कहानी संग्रह ‘चश्मे वाले मास्टर जी’ का लोकार्पण करते हुए, उन्होंने अपना आशीर्वाद तेते हुए कहा, “बाल साहित्य में—मेरा मानना है कि तीन लोगों ने बहुत बड़ा काम किया है। इनमें पहला नाम मैं जयप्रकाश भारती का लेता हूँ, दूसरा हरिकृष्ण देवसरे का, और तीसरा प्रकाश मनु का। बाल साहित्य में इन तीन लोगों का योगदान बहुत बड़ा है।” कुछ अरसा पहले मेरी पुस्तक ‘दीवाली के नन्हे मेहमान’ के लोकार्पण समारोह की अध्यक्षता करते हुए, फिर उन्होंने बड़े भावविभोर होकर यह बात दोहराई।

हालाँकि मैं जानता हूँ कि यह उनका अपरिमित स्नेह ही है, जो मुझ पर जाने कब से बरस रहा है। अहैतुक कृपा—भोले भंडारी सरीखी! बाल साहित्य में कोई बड़ा काम मैंने किया है, मुझे नहीं लगता। बल्कि मैं तो हमेशा कहता हूँ, ‘कहा बापुरो चंद्र...!’ यानी इस बेचारे चंद्र की क्या हस्ती!! बहुतों ने अपना पूरा जीवन लगाया है, तब बाल साहित्य का मौजूदा रूप बना है। सो बाल साहित्य का एक अदना सा लेखक ही मैं खुद को मानता हूँ, जिसे बड़े-बड़े उस्तादों के चरणों में बैठने का सौभाग्य मिला। मुझे गर्व है तो सिर्फ इस बात का कि मैंने बड़े-बड़े गुरुओं की संगति की है और उनके चरणों में बैठकर थोड़ा-बहुत सीखा है। तो भी राही जी का स्नेह मेरे लिए अनमोल है। जो कुछ वे कहते हैं, उसे घर जाकर सिरहाने तले मैं जरूर रख लेता हूँ। और कभी-कभी उसे सिर-माथे पर लगाकर सोचता हूँ—‘हे प्रभु, तेरी बड़ी कृपा है। यह जीवन एकदम अकारथ तो नहीं गया!...’

यों वे तो बड़े हैं, बहुत बड़े। शुरू से ही मेरे लिए किसी सुपर हीरो से कम नहीं रहे। याद पड़ता है कि तरुणाई के दिनों में अपने गृहनगर शिकोहाबाद में, जो साहित्यिक रुचियों से संपन्न कसबाई अंदाज वाला शहर है—मैंने एक विराट कवि-सम्मेलन में पहलेपहल राही जी को सुना था। मेरे साथ नारायण इंटर कॉलेज के अध्यापक आदित्य जी भी थे, जो मेरे लिए बड़े भाई सरीखे थे और साहित्य में उनकी अच्छी पैठ थी। बल्कि सच कहूँ तो वही मुझे वहाँ लाए भी थे। जैसे ही राही जी कविता पढ़ने के लिए खड़े हुए, उन्होंने मेरी ओर मुड़कर धीरे से फुसफुसाकर कहा, “चंद्रप्रकाश जी, इन्हें बहुत ध्यान से सुनना। ये बहुत बड़े कवि हैं।”

वहाँ राही जी ने अपना मशहूर मुक्तक ‘,,,मगर जिंदा रहने के लिए कुछ गलतफहमियाँ भी जरूरी हैं!’ सुनाया तो हजारों लोगों के कंठस्वर से एक साथ ‘वाह-वाह’ की ध्वनि फूट पड़ी। उन हजारों में एक मैं भी था, जो कवि-सम्मेलन सुनने वाले हजारों श्रोताओं में सबसे पीछे की लाइन में घुसकर खड़ा था। और अभिभूत होकर सिर हिलाता हुआ बार-बार वाह पर वाह किए जा रहा था। मुग्ध और उन्मत्त सा।

वह कवि-सम्मेलनों का दौर था, और कवि हमें आसमान के तारों से भी ऊँचे और बड़े लगते थे। राही जी हजारों-हजार श्रोताओं के हीरो थे। उन हजारों में फकत एक मैं भी था।

इन राही जी से आगे चलकर कभी मिलूँगा, यह बात तो मैं सपने में भी नहीं सोच सकता था। पर मैं ‘नंदन’ में आया तो जो बात मैंने सपने में भी नहीं सोची थी, वह पूरी हो गई। ‘नंदन’ में बहुत बार राही जी से मिलना हुआ। वे कभी-कभी भारती जी से मिलने आते थे। पर जब भी आते, मुझसे जरूर मिलकर जाते। मैं तो उनका आदर करता ही था, पता नहीं, कब, कैसे उनका स्नेह भी मुझ पर झरने लगा। यहाँ तक कि थोड़ी गपशप और साहित्यिक विनोद भी उनसे होने लगा।

ऐसे ही एक साहित्यिक विनोद की मुझे अब भी याद है। और इसकी जड़ में एक श्रीमान चौर्य कला विशारद जी हैं। उन सज्जन को साहित्यिक रचनाएँ चुराकर अपने नाम से छपवाने का बड़ा शौक था। यहाँ तक कि उन्होंने ‘नंदन’ में छपी हुई एक कहानी ही चुराकर, पात्रों के नामों में मामूली अदल-बदल करके फिर से ‘नंदन’ में भेज थी और वह छप भी गई। पर ‘नंदन’ इतनी लोकपिय पत्रिका थी कि इतनी बड़ी चोरी भला कैसे छिपती? ‘नंदन’ में उन चोर महाशय को ब्लैक लिस्टेड कर दिया गया, तो उन्होंने बहुत से अलग-अलग नामों से रचनाएँ भेजनी शुरू कर दीं। एक सा कागज, एक सी टाइपिंग। सब कुछ मिलता-जुलता सा। सो उनकी यह चालाकी भी भला कैसे छिपती? और फिर उस स्थान विशेष से रचनाएँ भेजने वाले बहुत सारे छद्म लेखकों को भी हमें प्रतिबंधित करना पड़ा।

मगर उन महाशय ने तब एक दूसरा रास्ता ढूँढ़ लिया। वे अखबारों में दूसरों की रचनाएँ अपने नाम से भेजने लगे। अब उनकी कृपा कहानियों के बजाय कविताओं पर होने लगी। मेरी एक शुरुआती कविता पर भी ऐसी कृपा हुई। डा. शेरजंग गर्ग सरीखे कवियों की रचनाओं को भी उड़ा लिया गया। और फिर निशाने पर आए राही जी। उनकी एक बेहद खूबसूरत कविता है, ‘जब चलती है लू’। वह ‘नंदन’ में ही कई दशकों पहले छपी थी। सन् 1986 में मैं ‘नंदन’ में आया तो मुझे ‘नंदन’ की पुराने फाइलें पढ़ने का शौक लगा। उन्हीं में मैंने राही जी की यह कविता पढी तो झूम उठा। आज भी गरमियों की लू पर लिखी गई ऐसी शानदार कविता हिंदी में कोई दूसरी नहीं है। उन चौर्यकला विशारद जी को भी यह कविता पसंद आ गई। और हैरानी की बात यह है कि तीन सप्ताह के भीतर हिंदी के तीन बड़े और सुविख्यात पत्रों में वह उन चोर महाशय जी के नाम से छप गई। संभवतः पहले वह ‘दैनिक हिंदुस्तान’ में छपी, फिर ‘नवभारत टाइम्स’ और ‘जनसत्ता’ में। जहाँ तक मेरा खयाल है, हिंदी बाल साहित्य में चोरी का ऐसा भीषण कांड पहले कभी नहीं हुआ था।

पढ़कर मेरा माथा चकरा गया। मैंने फिर से ‘नंदन’ की पुरानी फाइलें खँगालीं, ताकि उस कविता को खोजकर आश्वस्त हो सकूँ कि यह राही जी की ही कविता है न! वह मिली। ‘नंदन’ में चार रंगों में छपी वह खूबसूरत कविता राही जी की ही थी। मैंने अपने सहयोगियों के साथ-साथ भारती जी को भी इन चोर महाशय की इस धूर्तता की खबर दी। सुनकर सब अवाक, हक्के-बक्के से रह गए। उन पत्रों के साहित्य संपादकों तक भी बात पहुँचाई गई। पर कविता तो अब उन चोर महाशय के नाम से छप ही चुकी थी। और एक नही, तीन-तीन जगह।

संयोग से कुछ समय बाद राही जी ‘नंदन’ में आए। भारती जी के साथ बैठकी के बाद वे मुझसे मिलने आए तो मैंने कहा, “राही जी ‘जब चलती है लू’ आपकी कविता है न!”

राही जी मुसकराते हुए बोले, “हाँ भई, पर बात क्या है...?” 

मैंने कहा, “राही जी, वह कविता पहले आपकी थी, पर अब नहीं रही।”

राही जी चकराए। बोले, “क्यों?”

इस पर मैंने उन्हें पूरा वाकया बताया और कहा, “राही जी, वह आपके नाम से तो एक बार छपी, मगर उन चोर महाशय ने उसे एक नहीं, तीन-तीन जगह अपने नाम से छपवा लिया। अब आप बताए कि वह कविता आपकी हुई या उन चोर जी की...?”

इस पर राही जी ने बड़े जोर का ठहाका लगाया। उसी सदाबहार मस्ती और बेफिक्री से भरा ठहाका, जो राही जी की पहचान है। और फिर हाथ ऊपर करके हवा में हिला दिए—यानी चलता रहता है यह सब, अब इसका तो क्या किया जाए!

उनके चेहरे पर न कोई क्रोध था, न कोई मैल। जैसे हँसते हुए वे हमेशा विदा होते थे, उस दिन भी विदा हुए। और मैंने जाना कि बड़ा कवि क्या होता है और अपने सृजन—अपनी रची चीजों के प्रति उसका आत्मविश्वास कितना गहरा होता है। उन चोर सरीखे हजारों मच्छर भिनभिनाते रहें तो भला उन्हें क्या फर्क पड़ता है? वे एक हाथ से उऩ्हें झाड़ देंगे और फिर से अपने काम में लग जाएँगे।

उस दिन मुझे समझ में आया कि महान रचनाएँ बेशक कम, बहुत कम लिखी जाती हैं, पर एक बार लिखी गईं तो उनकी आभा कभी मंद नहीं होती। और कोई चोर उन्हें चुरा भी नहीं सकता। बल्कि ऐसी कोशिश करने वाले के हाथ खुद ही झुलस जाएँगे। और रचना का एक-एक हर्फ बता देगा, कि यह एक असाधारण चीज है और एक बड़े, बहुत बड़े और उस्ताद कवि ने इसे लिखा है!

यह बात अभी दो-चार रोज पहले ही प्रमाणित भी हो गई। हुआ यह कि मैं जाने-माने कवि-कथाकार योगेंद्रदत्त शर्मा से बात कर रहा था। राही जी पर ‘बालवाटिका’ के विशेषांक की बात चली तो वे बड़े आनंदित हुए...और राही जी की एक कविता को उन्होंने बार-बार बड़ी शिद्दत से याद किया। और क्या मैं बताऊँ कि वह कविता कौन सी थी? वह कविता थी, ‘जब चलती है लू’। योगेंद्र ने बड़े डूबे-डूबे स्वर में कहा, “मनु जी, बडी अद्भुत कविता है यह। हिंदी में ऐसी कविता कोई और नहीं...!”

और जब वे यह कह रहे थे, मेरी छाती शीतल हो रही थी, ‘आहा, एक महान कविता यह होती है?’

कुछ देर बाद योगेंद्र जैसे मनुहार करते हुए बोले, “मनु जी, क्या आप राही जी की वह कविता मुझे उपलब्ध करा देंगे...?” फिर अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा, “इसलिए कि वह कविता मुझे बेहद प्रिय है। मैंने बहुत पहले पढ़ी थी। तो भाव तो याद है, पर कविता की पंक्तियाँ अब ठीक-ठीक याद नहीं। अगर संभव हो तो आप इसे मेरे पास भेज दें। मैं अपने निजी संग्रह में उसे सँजोकर रखना चाहता हूँ। उसे जब-जब पढ़ता हूँ, मुझे अंदर से बड़ी ताकत मिलती है।”

क्या अब भी बताना बाकी है कि किसी बड़े कवि द्वारा लिखी गई बड़ी कविता कैसी होती है, और उसकी आभा, उसकी शक्ति, उसका तेज कैसा होता है!

अब मेरा खयाल है, दो पल राही जी की ‘जब चलती है लू’ कविता पर ठहरना जरूरी है। हिंदी बाल कविता को एक बड़ा मोड़ देने वाले राही जी की इस कविता की शानदार शुरुआत होती है इन पंक्तियों से, “घर, मैदान, खेत तप जाते, जब चलती है लू,/ बागों में से उड़ जाती है फूलों की खुशबू।” और जल्दी ही राही जी कविता को एक ऐसी उठान देते हैं कि वह एक ‘क्लासिक कविता’ का दरजा पा लेती है। तो मित्रो, गौर कीजिए, आगे की पंक्तियों में लू सिर्फ लू नहीं है, बल्कि लू चलने को एक बड़ा अर्थ दिया गया है। भला कौन शख्स है जो दुख और मुश्किलों की लू-लपटों को सहे बगैर बड़ा बन पाता है? सुनिए जरा राही जी को—

पर न सोचना, तपन भरी लू यों ही डोल रही,
चुपके-चुपके खरबूजों में मिसरी घोल रही।
कड़ी धूप सह तरबूजों में शर्बत भर जाता,
आँखों में भी तो मीठा रस तपकर ही आता।
जो लू-लपट सहन कर लेते, जीवन-रस पाते,
जो छाया में गए बैठ, बस बैठे ही रह जाते।

बालस्वरूप राही कैसे बाल कवि हैं, और उऩकी कविताओं की तासीर कैसी है, मेरा खयाल है, थोड़ा-थोड़ा तो इससे समझ में आ ही गया होगा।

राही जी अकसर यह बात कहते हैं कि “कविता में उपदेश देने का हामी मैं नहीं हूँ और उसे पसंद भी नहीं करता। पर हाँ, कविता में कोई बड़ा संदेश तो होना ही चाहिए। और वह ऊपर से थोपा हुआ न हो, कविता के कलात्मक गठन का हिस्सा हो—तभी कविता में खूबसूरती आती है।” मगर कविता में कोई संदेश उसके कलात्मक सौष्ठव का हिस्सा बनता कैसे है—इसका उदाहरण अगर आप देखना चाहें तो मैं आपको राही जी की ‘जब चलती है लू’ समेत बहुतेरी कविताएँ पढ़ने की सलाह दूँगा।
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16 मई, 1936 को दिल्ली में जनमे बालस्वरूप राही ने खुद अपने आत्मकथ्य में बड़े दिलचस्प अंदाज में लिखा है, “अब जब मैं बुजुर्ग हो चला हूँ तो मेरे स्नेही मुझसे पूछ बैठते हैं कि जीवन के इस मोड़ पर आप बाल कविता कैसे लिख लेते हैं? इसका उत्तर मैं यह देता हूँ कि आप जानते ही हैं—मेरा नाम बालस्वरूप राही है। जब मैं बड़ों के लिए लिख रहा होता हूँ, तब मैं राही होता हूँ और जब बच्चों के लिए लिख रहा होता हूँ, तब बालस्वरूप होता हूँ। मुझे यह लगता है कि बाल कविता लिखते समय कवि का बच्चा बनना जरूरी होता है।...बचपन और बाल कविताएँ पर्याय हैं। यह मेरा सौभाग्य है कि मैंने कभी अपने को इतना परिपक्व अनुभव नहीं किया कि मैं बच्चों से अलग हो जाऊँ।” (भूमिका, ‘संपूर्ण बाल कविताएँ : बालस्वरूप राही’)

राही जी पूरी तरह बाल कविता में सराबोर कवि हैं। एक समर्थ कवि के रूप में उनकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि उनकी बाल कविताओं की रेंज काफी बड़ी है और उसमें बहुत विविधता है। एक ओर उन्होंने बच्चों के कोमल मनोभावों और शरारतीपन पर खूबसूरत कविताएँ लिखीं तो दूसरी ओर ऐसी कविताएँ भी जिनमें खेल-खेल में, जीवन में काम आने वाली बड़ी बातें कही गई हैं। यहाँ तक कि हमारे पुराने सांस्कृतिक प्रतीकों, त्योहारों, मिथकों और पौराणिक चरित्रों पर भी उन्होंने इतनी जीवंत और रसपूर्ण कविताएँ लिखी हैं कि वे हमारी आज की जिंदगी का एक जरूरी हिस्सा लगते हैं। और दूसरी ओर, वे इतनी ही सहजता और कलात्मकता से हमारी आज की जिंदगी की तमाम हलचलों, नए-नए विचारों तथा वैज्ञानिक आविष्कारों को मानो खेल ही खेल में अपनी बाल कविताओं में ढाल देते हैं। बाल साहित्य में एक ही लाघव के साथ जीवन के इन अलग-अलग छोरों को साध पाना मैं समझता हूँ, बहुत बड़ी बात है।

यही नहीं, राही जी की कविताएँ बच्चों की दोस्त कविताएँ हैं। वे एक अच्छे और समझदार दोस्त की तरह बच्चों को हाथ पकड़कर एक ऐसी दुनिया में ले जाती हैं, जिसमें बड़ों की डाँट-डपट और ‘यह करो, वह न करो’ से मुक्त एक ऐसा मनोरम संसार है, जिसमें प्रकृति के एक से एक सुंदर नजारे हैं, मस्ती की रेल-ठेल, मीठी शरारतें, विनोदपूर्ण करतब और आनंद के सोते बहते हैं। यहाँ तक कि कई जगह तो बच्चों की नन्ही दुनिया बड़ों की दुनिया को मुँह चिढ़ाती हुई, प्रफुल्ल हँसी की एक लहर सी बहा देती है। आखिर बच्चों की दुनिया में न होगी यह मस्ती, यह शरारत, तो भला कहाँ होगी? पर इसके साथ ही राही जी अपनी कविताओं में अनायास ही एक ऐसा प्रीतिकर संदेश भी गूँथ देते हैं, जो बच्चों के दिल में उतर जाता है और उन्हें सुंदर भावनाओं और संकल्पों वाला एक बेहतर इनसान बनाता है।

हालाँकि राही जी की खासियत यह है कि उनकी बाल कविताओं में पिरोया हुआ यह संदेश अपनी कलात्मक उठान के कारण कविताओं के प्रभाव को बढ़ाता ही है, कम नहीं करता। बेशक यही एक बड़े कवि की उस्तादी भी है और वह राही जी की बाल कविताओं में जगह-जगह नजर आती है। 
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बालस्वरूप राही उन बाल कवियों से भिन्न हैं जो इतने परंपरावादी हैं कि आधुनिकता के नए विचारों से कुछ डरे-डरे रहते हैं। जबकि राही जी अपनी बाल कविताओं में परंपरा और आधुनिकता दोनों को एक साथ और इतनी खूबसूरती से निबाहते हैं कि वे आनंद की वस्तु बन जाते हैं। इस लिहाज से मुझे उनकी कई ऐसी बाल कविताएँ याद आ रही हैं, जो अपने नए ढंग के तेवर के कारण चकित ही नहीं करतीं, कुछ-कुछ चौंकाती भी हैं। इनमें ‘चाँद’ पर लिखा गया उनका एक गीत तो इतना प्रसिद्ध हुआ और इसमें चंदा मामा की शक्ल-सूरत इतनी अलग और लासानी है कि इसे हिंदी शिशुगीतों में एक ‘युगांतकारी’ मोड़ के रूप में याद किया जाता है। चंदा मामा की पुरानी शान और ठाठ-बाट यहाँ गायब है और बच्चा कुछ-कुछ ढिठाई से उसकी ‘उधार की चमक-दमक’ पर व्यंग्य करता है। यह नए जमाने के बदले हुए बच्चे का गीत है, जिसे हिंदी के कुछ बड़े और यादगार बालगीतों में स्थान मिलना चाहिए—

चंदा मामा कहो तुम्हारी
शान पुरानी कहाँ गई,
कात रही थी बैठी चरखा
बुढ़िया नानी कहाँ गई?
सूरज से रोशनी चुराकर
चाहे जितनी भी लाओ,
हमें तुम्हारी चाल पता है
अब मत हमको बहलाओ।

आखिरी पंक्तियों में तो बच्चा बिना किसी लिहाजदारी के चाँद से सीधे-सीधे कह ही डालता है कि, “है उधार की चमक-दमक यह/ नकली शान निराली है,/ समझ गए हम चंदा मामा/ रूप तुम्हारा जाली है!”

हिंदी में चंदा मामा पर लिखी हुई एक से एक बेहतरीन कविताएँ मिलती हैं, पर कहना न होगा कि एकदम नए अंदाज में ढले राही जी के इस चुस्त, नटखट गीत का कोई जोड़ नहीं है। यह चंदा मामा पर पारंपरिक ढंग से लिखे गए सैकड़ों शिशुगीतों से अलग और शायद सबसे मूल्यवान भी है। सच तो यह है कि ‘चाँद’ पर लिखी गया उनका यह गीत इतना प्रसिद्ध हुआ कि बच्चों के साथ-साथ बड़ों के लिए लिखने वाले साहित्यिकों में भी उसकी धूम रही और आज भी इसे बाल कविता में एक ‘युगांतकारी’ मोड़ के रूप में याद किया जाता है। चंदा मामा की पुरानी शान और ठाठ-बाट यहाँ गायब है और बच्चा कुछ-कुछ ढिठाई से उसकी ‘उधार की चमक-दमक’ पर व्यंग्य करता है। 
यह नए जमाने के बदले हुए बच्चे का गीत है, जो चंदा मामा पर पारंपरिक ढंग से लिखे गए सैकड़ों बालगीतों से अलग और शायद सबसे मूल्यवान भी है। खास बात यह है कि इस बालगीत में जिस बच्चे का चेहरा झाँकता नजर आता है, वह भोला नहीं, आज का सयाना और समझदार बच्चा है जिसे आसानी से भरमाया नहीं जा सकता। और राही जी का गीत इस मामले में यादगार गीत है कि इसमें पहली बार एक सयाने बच्चे की छवि चित्रित हुई।

राही जी की बहुत सी कविताओं में बच्चों के मनोभावों के साथ-साथ कोई नया विचार भी है, जो सहज ही कविता में ढल गया है। उनकी चर्चित कविता ‘बच्चे और बड़े’ में एक सुंदर विचार है, जो बड़े आसान शब्दों में ढलकर सामने आता है। बच्चे अपने जीवन में आने वाली छोटी-बड़ी मुश्किलों और बंदिशों से इतने परेशान हो जाते हैं कि वे चाहते हैं कि वे झटपट बड़े हो जाएँ, ताकि उन्हें कोई रोकने-टोकने वाला न हो और जो कुछ वे चाहें, उसे कर सकें। जबकि बड़े लोग अकसर बड़ी शिद्दत से अपने मोहक बचपन को याद करते हैं, जो अब बीत चुका है—

सोचा करते हैं हम बच्चे
क्या रक्खा है बचपन में,
शीघ्र बड़े हो जाएँ हम भी
चाह यही रहती मन में।
हम भी रोब जमाएँ सब पर
मूँछें रखकर बड़ी-बड़ी,
ओवरकोट पहनकर घूमें 
लिए हाथ में एक छड़ी।

पर ऐसा सोचने वाले बच्चे यह नहीं जानते कि बचपन एक नेमत है और इसीलिए बड़े भी बच्चा बनना चाहते हैं, “यह सब गड़बड़झाला क्या है/ आखिर कौन बताएगा,/ बच्चे होंगे बड़े, बड़ों को/ बच्चा कौन बनाएगा?”

इस बाल कविता के अंत में राही जी ने एक बड़ा जोरदार सवाल भी गूँथ दिया है। बच्चे तो समय के साथ बड़े हो ही जाएँगे, पर बड़े जो अपने गुजरे हुए बचपन के लिए तरस रहे हैं, वे भला फिर से बच्चे कैसे बनेंगे? 

पर शायद इसका उत्तर भी राही जी की बाल कविताओं में ही छिपा हुआ है। जिस तरह की सुंदर और सजीली बाल कविताएँ वे लिखते हैं, उनमें जगह-जगह बचपन का आनंद और नटखटपन झाँकता है। बड़े इन कविताओं को पढ़ें, तो थोड़ी देर के लिए वे भी सचमुच बच्चे ही बन जाएँगे। यों अच्छी बाल कविताएँ बच्चों के साथ-साथ बड़ों को भी आनंदित करती हैं।
*

राही जी की बाल कविताओं में बच्चे की सुंदर और मोहक छवियाँ ही नहीं, उसका गुस्सा और शिकवे-शिकायतें भी हैं। इनमें से बहुत सी शिकायतें तो बड़ों के प्रति हैं। इसलिए कि जिंदगी की तेज भागमभाग में लगे बड़े लोग कभी समझ ही नहीं पाते कि बच्चे आखिर चाहते क्या हैं। शायद वे समझना चाहते भी नहीं हैं, इसीलिए अपनी इच्छाएँ बच्चों पर थोपते जाते हैं। 

‘छोटा मुँह बात बड़ी’ कविता में राही जी बच्चों की एक सही शिकायत सामने लाते हैं। अकसर बड़े लोग बच्चों के लिए एक से एक बढ़िया चीजें लाकर सोचते हैं कि बस, बच्चों को और क्या चाहिए? पर वे नहीं जानते कि बच्चे तो प्यार के भूखे हैं—

मम्मी-पापा अच्छे तो हैं
लेकिन रूखे-सूखे हैं,
भूल गए वे हम चीजों के
नहीं, प्यार के भूखे हैं।
फुरसत हो तो सुनें हमारे 
दिल में है जो बात गड़ी,
कहने वाले कहें भले ही 
छोटा मुँह पर बात बड़ी।

एक कवि के रूप में यह राही जी की हिम्मत ही कही जाएगी कि वे बच्चों के मुँह से मम्मी-पापा को ‘रूखे-सूखे’ कहलवा देते हैं, फिर भी कविता अटपटी नहीं लगती। आज की बाल कविता में जीवन यथार्थ आना चाहिए, यह तो सब कहते हैं। पर वह आए कैसे, यह राह निकालने का काम राही जी ने किया। सचमुच देखा जाए तो यह एक कड़वा यथार्थ ही है कि रोज-रोज की बेहिसाब भागदौड़ ने बड़ों की दुनिया का सारा रस सुखा दिया है। तो फिर बच्चों के हिस्से में रस और प्यार आएगा कहाँ से?

राही जी की एक और सुंदर कविता ‘दुनिया नई-पुरानी’ में भी एक नया विचार है, जो बड़ी ही सीधी-सरल पंक्तियों में ढल गया है। इस कविता में भी बड़ों और बच्चों की सोच का फर्क है। बड़े लोग हमेशा अपने गुजरे हुए जमाने को याद करते हैं और नया वक्त उन्हें पसंद नहीं आता। जबकि बच्चे नए जमाने की नई चीजों के दीवाने हैं—

सच कहती हैं दादी अम्माँ
दुनिया सचमुच बदल गई,
इस बदली दुनिया में होती
हर दिन कोई बात नई।
सबको अपना समय सुहाता
हमको यह युग भाता है,
नए-नए आविष्कारों से
रोज बदलता जाता है।

आज के नए जमाने को विज्ञान के नए-नए आविष्कारों ने एकदम बदल डाला है। नए जमाने की ये चीजें किस कदर हमारी जिंदगी के साथ घुल-मिल गई हैं, इसका पता तो इसी से चल जाता है कि कल तक टीवी नहीं था, तो जिंदगी कुछ और थी और आज घर में टीवी आते ही जैसे सब कुछ बदल गया। पुरानी दुनिया पीछे छूट गई और अब नई दुनिया नए रंग-ढंग के साथ चल रही है। पर इस बात को खेल-खेल में किसी बाल कविता में कह पाना आसान तो नहीं। राही जी की कविता ‘रंग जमाया टीवी ने’ इस लिहाज से बार-बार पढ़ी जाने लायक है—
फीके पड़े तमाशे सारे, रंग जमाया टीवी ने।

ए-बी-सी-डी-ई-एफ-जी
फिल्मों की है धूम मची,
सबने इतवारों की शाम
कर डाली टीवी के नाम।
सैर-सपाटे खेलकूद का किया सफाया टीवी ने। 

इस कविता की आखिरी पंक्तियाँ बड़ी मजेदार हैं, “अ आ इ ई उ ऊ ए,/ छुटकू भी टीवी घूरे,/ निक्कर तक न सँभलता है,/ टीवी देख मचलता है।/ बच्चा हो या बड़ा, सभी को खूब रिझाया टीवी ने!” 

इसी तरह डाकिए पर राही जी की एक बड़ी दिलचस्प बाल कविता है। जब बड़ों के पत्र आते हैं, तो बच्चे के मन में विचार आता है, काश, उसके पास भी डाकिया इसी तरह पत्र लेकर आता! वह बड़े प्यार से डाकिए से अनुरोध करता है, “सुनो डाकिए भाई,/ एक पत्र मेरा भी ला दो/ दूँगा तुम्हें मिठाई।” साथ ही वह धीरे से यह भी पूछ लेता है कि आखिर वह बड़ों के ही पत्र क्यों लाता है? बड़ों के पत्र लाने में उसे क्या मिलता है—

कहो, बड़ों से क्या पाते हो,
बस उनके ही खत लाते हो,
मुँह तकते ही हम रह जाते,
पत्र हमारा कभी न लाते।
सुनो डाकिए भाई,
तुम तो पढ़ लेते ही होगे
अच्छी-बुरी लिखाई।

यों बच्चे के भोलेपन में थोड़ी चतुराई भी है। लिहाजा डाकिए से थोड़ी दोस्ती गाँठने के बाद बच्चा धीरे से उसके आगे एक छोटी सी फरमाइश कर डालता है, जिसके साथ एक मित्र की यादें नत्थी हैं—

एक मित्र को खत लिक्खा था,
शायद पता गलत लिक्खा था।
उसकी खोज-बीन करवाना,
जल्दी उसका उत्तर लाना।
सुनो डाकिए भाई,
अपने टिकटों के एलबम से
दे दूँगा चौथाई।

बातों-बातों में यहाँ बच्चे के शौक का भी पता चल जाता है। और इस बात का भी कि डाकिया अगर उसके दोस्त का खत ले आए, तो वह कितनी बड़ी कुरबानी करने को तैयार है! कविता क्या है, बच्चे के अंतर्मन की पूरी तसवीर खींच दी है राही जी ने। 
*

इतना ही नहीं, राही जी की बाल कविताओं में हास्य-विनोद के रंग भी कम नहीं हैं। राही जी स्वयं तो विनोदप्रिय हैं ही, रूखी-सूखी कविताएँ भी उन्हें पसंद नहीं। वे बिल्कुल छोटे बच्चों की तरह ही चीजों को हलके-फुलके अंदाज में कहना जानते हैं, जिससे बात में एक अलग रस आ जाता है। कहीं-कहीं तो उनकी बाल कविताओं में हास्य के बड़े ही चुटीले रंग और चुलबुली भंगिमाएँ नजर आती हैं। ऊँट के ऊटपटाँग रंग-ढंग को लेकर लिखा गया उनका यह मजेदार बालगीत ऐसा ही है—

ऊँट बड़े तुम ऊटपटाँग।
गरदन लंबी, पूँछ जरा सी
आँखें छोटी, दाँत बड़े,
ऊबड़-खाबड़ पीठ ऊँघते
रहे अकसर खड़े-खड़े।
बँधी गद्दियाँ हैं पैरों में,
लेकिन झाड़ू जैसी टाँग।

इसी तरह ‘चूहे को निमंत्रण’ बड़ी मजेदार कविता है। इस कविता में किताब-कापियाँ और घर की सारी चीजें कुतर जाने वाले चूहे पर बच्चे का गुस्सा तो है, पर गुस्से के साथ ही हास्य की फुरफुरी भी है। चूहे को लेकर बच्चे की खीज और होशियारी अनोखे हास्य-मिश्रित रंगों में प्रकट होती है—

चूहे राजा आ जा, आ जा,
घी से चुपड़ी रोटी खा जा।
मैंने चूहेदान लगाया
तरह-तरह का माल सजाया,
तूने मुझको बहुत सताया
किशमिश खाई, काजू खाया।
मूँगफली का किया सफाया
फिर भी तुझको चैन न आया।
चढ़ा मेज-कुरसी पर मेरी
चीजें कुतर लगा दी ढेरी,
कई पुस्तकें रद्दी कर दीं
कई कापियाँ भद्दी कर दीं।

कविता में इस बात का जिक्र भी है कि चूहे को पकड़ने के लिए क्या-क्या जतन नहीं किए गए। मगर चूहे की चतुराई से कोई तरीका काम न आया। अब आखिर चूहेदानी लानी ही पड़ी और बच्चे को यकीन है कि शैतान चूहा अब तो काबू में आकर ही रहेगा! 

राही जी की कविताओं की एक बड़ी खासियत यह भी है कि उसमें जगह-जगह बच्चों का इच्छा-संसार झलकता है। बच्चे चाहते हैं कि घर और बाहर उन्हें भी प्यार मिले और उनकी कद्र हो। कोई उन्हें भी समझे कि आखिर वे चाहते क्या हैं! बच्चों के लिए दुनिया भर में ‘बाल वर्ष’ मनाया गया तो जाहिर है, सभी बच्चों को बेतरह खुशी हुई। साथ ही इस बात की निश्चिंतता भी कि अब बड़ों की डाँट-डपट और जोर-जबरदस्ती नहीं चलेगी—

नहीं चलेगी धौंस बड़ों की
है यह पूरा साल हमारा।
बड़-बड़े जाते हैं पिक्चर
हमें छोड़ जाते हैं घर पर,
चिंता नहीं किसी को इसकी
कहाँ सिनेमा हाल हमारा!

बच्चों की शिकायतों का पिटारा एक बार खुलता है तो खुलता ही चला जाता है। उन्हें बड़ों से कई तरह की शिकायतें हैं। एक तो यह कि बड़े लोग जब-तब बच्चों को टोका करते हैं। खेल-कूद के लिए मना करते हैं। फिर कई बार किसी छोटी सी बात पर ही बच्चों के कान खींचे जाते हैं। पर अब पूरा साल बच्चों का है, तो खुद-ब-खुद इस सबकी छुट्टी हो जाएगी, “अब आई है बार हमारी, कसर निकालेंगे हम सारी,/ कर न सकेगा दुनिया भर में कोई बाँका बाल हमारा।”

यह अभिव्यक्ति बच्चों के साथ-साथ खुद भी लड़कपन का आनंद ले रहे, राही जी सरीखे किसी भावसिद्ध कवि की ही हो सकती है।
*

यह बात गौर करने की है राही जी की बाल कविताओं की दुनिया बच्चों से जुड़ी होकर भी बहुत छोटी नहीं है। उसमें जीवन और संसार की बहुत सी चीजें शामिल हैं, जिन्हें कविता में लाना आसान नहीं है। यहाँ तक कि लाल किले पर भी राही जी ने बड़ी सुंदर कविता लिखी है। लाल किला हमारी ऐतिहासिक धरोहर है और उसके साथ इतिहास की बहुत बड़ी-बड़ी घटनाएँ भी जुड़ी हैं। इस छोटी सी कविता में राही जी लाल किले के इतिहास की एक मुकम्मल झाँकी जैसे बाल पाठकों के सामने साकार कर देते हैं—

ताजमहल है कविता जैसा, लाल किला इतिहास है।
लाल किले में पत्थर-पत्थर
कहता एक कहानी है,
शाहजहाँ के ठाट-बाट की
यह बेजोड़ निशानी है।
शाहजहाँ सुनता था सबकी, मिलता था हर एक से,
है दीवाने आम यहाँ तो वह दीवाने खास है।

ताजमहल को ‘कविता’ और लाल किले को ‘इतिहास’ कहना सचमुच खुद में ही एक कविता है। राही जी की यह कविता पढ़ते समय लगता है, मानो लाल किले के पत्थर ही एकाएक बोल पड़े हों!

राही जी की कई कविताएँ इधर लिखी जा रही बाल कविताओं की धारा से इतनी अलग और अद्वितीय हैं कि उन्हें पढ़ना खुद एक अनुभव है। उनकी ऐसी ही यादगार कविता है, ‘सूरज का रथ’। कविता में सूरज के रथ का ऐसा अद्भुत और प्रभावी चित्र खींचा गया है कि यह कविता पढ़ने पर देर तक सात घोड़ों वाले सूरज के रथ का बिंब स्मृतियों में टँका रहता है—

सूरज का रथ बड़ा निराला
जुड़े हुए हैं घोड़े सात।
घोड़ा एक लाल भड़कीला
घोड़ा एक हरा चमकीला,
घोड़ा एक चमाचम पीला
एक बड़ा ही गहरा नीला।
एक आसमानी बर्फीला
एक जामुनी छैल-छबीला,
एक संतरे सा चटकीला
हर घोड़ा बेहद फुर्तीला।
बड़े नियम से ये चलते हैं
सुनते नहीं की की बात!

इसी तरह हिमालय पर लिखी गई उनकी कविता में मन में अभिमान जगा देने वाले प्राचीन गौरव की झाँकी है तो दर्पण सरीखी उसकी उज्ज्वलता का बखान भी है—
केवल ऊँचा नहीं हिमालय
दर्पण सा निर्मल भी है,
इसमें मानसरोवर वाला
अमृत जैसा जल भी है।
यह ऋषियों की तपोभूमि है
यहाँ देवता बसते हैं,
इसमें स्वर्गलोक तक जाने 
वाले अद्भुत रस्ते हैं।

राही जी की कई कविताओं में प्रकृति की बड़ी सुंदर और मनोरम छवियाँ हैं। वे अपनी कविताओं में प्रकृति और इनसान के उस रिश्ते को उकेरते हैं, जिसने दुनिया को आनंद से भर दिया है। ‘सूरजमुखी का फूल’ उनकी ऐसी ही कविता है—

सूरजमुखी और सूरज का बड़ा पुराना नाता है,
सूरज के आने पर खिलता, ढलते ही मुरझाता है।
सुबह-सुबह के सूरज जैसा
इसका रंग सुनहरा है,
इसका भी हर अँधियारे से
बैर बड़ा ही गहरा है।
यह तो दिन भर सूरज की ही ओर ताकता रहता है,
उधर-उधर ही मुँह कर लेता, जिधर-जिधर वह जाता है।

आकाशगंगा पर भी उन्होंने बड़ी सुंदर कविता लिखी है। उन्होंने नभ की इस गंगा की तुलना धरती की गंगा से की है, जो मन को निर्मलता से भर देती है। इस तरह की तुलनात्मक कविताएँ लिखने में राही जी को जैसे सिद्धि हासिल है। और ऐसी हर कविता की रंगत और तासीर भी कुछ अलग है। अलबत्ता, जरा पल भर के लिए उनकी आकाशगंगा का नजारा तो लीजिए—
गंगा एक यहाँ बहती है, एक वहाँ आकाश में।
नभ की गंगा तारों वाली
चाँदी रचे किनारों वाली,
रंगों भरी फुहारों वाली
चमकीली मँझधारों वाली,
हमें रात भर नहलाती है ठंडक भरे प्रकाश में।

इसी तरह ‘राम और हनुमान’ राही जी की बड़ी चर्चित कविता है। राम बड़े थे और हनुमान उनकी हर पल सेवा करने वाले सेवक। पर रामचंद्र जी के सेवक बने हनुमान जी की भी अपनी महत्ता है। रामचंद्र जी ने उनकी ही मदद से इतने बड़े-बड़े काम किए–-

राम नहीं थे साधारण नर, वे तो थे भगवान,
किंतु काम आए थे उनके संकट में हनुमान।
यह मत सोचो, जीवन छोटों का होता है व्यर्थ,
उनके बिना नहीं पा सकते अपना लक्ष्य समर्थ।
जी छोटा मत करना यदि तुम बन पाओ न महान,
बन जाओ यदि बड़े, न करना छोटों का अपमान।

राही जी की एक कविता में भाई-बहन का झगड़ा है, पर कविता पढ़कर पता चलता है कि यह कितना मीठा झगड़ा है। और असल में तो इस झगड़े में भी भाई-बहन का आपसी प्यार ही छिपा हुआ है, जो किसी मनोहर खेल की शक्ल में सामने आता है। जरा पढ़िए तो ‘गुड्डी परी, मुन्ना राजकुमार’ कविता की ये रसभीनी सतरें—

मैं तो बिल्कुल नहीं खेलता नाटक मम्मी जी इस बार,
गुडडी तो परी बनाया, मुझे बनाया राजकुमार।
इसके ठाट-बाट तो देखो 
कैसी शान निराली है,
आँखों में काजल गालों पर
कितनी प्यारी लाली है,
मेरे मुँह पर थोप दिया है बस, सूखा पौडर बेकार।

ऐसी ही एक और चंचल कविता में दादा जी और पोती के प्यार और दोस्ती का वर्णन हैं। यों दादा जी और पोती में समानताएँ भी तो कितनी हैं, जिसकी वजह से दोनों की खूब छनती है—
दादा जी की पोती जी से बड़े मजे की छनती है।
पोटी लुढ़क-लुढ़ककर चलती
लोटपोट हो जाती है,
दादा जी भी चलते डगमग
ऐनक जब खो जाती है,
इसीलिए शायद दोनों में कुछ ज्यादा ही बनती है।

आधुनिकता के बावजूद हमारी जिंदगी में वहम और अंधविश्वास इतने हैं कि बच्चों पर भी उसकी छाया पड़ने लगी है। राही जी की ‘वहम’ कविता इसी पर लिखी गई है। पर राही जी सीधे-सीधे उपदेश देने में यकीन नहीं करते। वे उसके लिए एक खूबसूरत कथानक गढ़ते हैं। कविता में बिल्ली रास्ता काट गई तो पप्पू भला स्कूल कैसे जाते? वे स्कूल के लिए निकले थे, पर डरकर वापस घर आ गए। किसी के समझाने का उन पर असर नहीं पड़ा। पर दीदी ने समझाया तो उनका जोश जाग गया और फिर वहम की भी छुट्टी हो गई—

दीदी बोली—पप्पू भैया
वहम किसलिए करते हो,
होकर बब्बर शेर जरा सी
पूसी से क्यों डरते हो?
जोश आ गया पप्पू जी को
निकल पड़े घर से बाहर,
चले लेफ्टराइट सी करते
जैसे कोई नर नाहर।

इस कविता में एक खूबसूरत इशारा भी है कि बच्चों को कोई चीज कैसे समझाई जाए। घर में सब समझाकर हार गए। लेकिन पप्पू पर कोई असर नहीं। अंत में दीदी ने जोश दिलाया, तो पप्पू जी एकदम हरकत में आ गए। फिर तो वहम की छुट्टी होनी ही थी, सो हुई।
*

राही जी ने बड़े सुंदर और चुस्त-दुरुस्त शिशुगीत भी लिखे हैं। उनके ज्यादातर शिशुगीतों में बड़े मनोहर रंगों के साथ कुछ नई और मोहक भंगिमाएँ हैं। कार पर लिखा गया उनका यह चुटीला शिशुगीत तो बार-बार याद आता है, जिसमें बड़ों की कार को मुँह चिढ़ाते हुए बच्चे का गर्व देखने लायक है—

पापा जी की कार बड़ी है
नन्ही-मुन्नी मेरी कार,
टाँय-टाँय फिस्स उनकी गाड़ी
मेरी कार धमाकेदार।
उनकी कार धुआँ फैलाती
एक रोज होगा चालान,
मेरी कार साफ-सुथरी है,
सब करते इसका गुणगान।

जाहिर है, बच्चे और बड़े की कार की तुलना न होती और बड़ों की कार बच्चों की कार के आगे ‘फिस्स’ न होती, तो इस कविता का आनंद आधा रह जाता। इससे समझा जा सकता है कि कोई कवि बच्चे का मन पढऩा जानता हो, तभी वह ऐसे शिशुगीत लिख पाएगा जो खेल-खेल में बच्चे की जबान पर चढ़ जाएँ। 

राही जी का एक ऐसा ही सुंदर शिशुगीत बच्चे के लंच बॉक्स को लेकर है। लंच बॉक्स में क्या-क्या रखा जाए और क्या-क्या न रखा जाए, बच्चे के लिए इसका बड़ा महत्त्व है। इसलिए कि लंच बॉक्स सिर्फ खाने का डिब्बा नहीं, बच्चे का सपना भी है। इसी से स्कूल जाने का उत्साह और जोश उसमें पैदा होता है। जिन्हें हम छोटी-छोटी चीजें समझते हैं, वे भी बच्चे के लिए बहुत मायने रखती हैं—

मम्मी, छोड़ो लाड़-दुलार
लंच बॉक्स कर दो तैयार।
सब्जी खूब मसालेदार,
गरम पूरियाँ पूरी चार।
पापड़ हो जाता बेकार,
रख दो चटनी और अचार।
क्यों देती केला हर बार,
मम्मी, रखना आज अनार।

किसी नन्हे, नटखट बच्चे का मन शिशुगीत की चंद पंक्तियों में में कैसे बँध जाता है, यह देखना हो तो इससे बढ़िया उदाहरण बहुत कम मिलेंगे। लगता है, राही जी ने बिल्कुल बच्चा बनकर यह गीत लिखा है। इसी तरह बस्ते पर लिखे गए उनके इस गीत में जैसे बस्ते के बढ़ते हुए बोझ से दुखी और त्रस्त बच्चे का मन बोल उठा है—

मुझसे भारी मेरा बस्ता,
कर दी मेरी हालत खस्ता।
इसे उठाकर बढ़ना मुश्किल, 
सभी पुस्तकें पढ़ना मुश्किल।
कोई टीचर को समझाए,
इसको कुछ हल्का करवाए।

यही नहीं, राही जी ने कुछ बड़े सुकोमल शिशुगीत भी लिखे हैं, जिनमें बड़ा रस, संगीतात्मकता और कल्पना का माधुर्य है। परियों पर वे लिखते हैं तो जैसे परियों का एक नया ही छबीला रूप सामने आता है, जैसे राही जी के शब्दों में ढलकर परियाँ कुछ अधिक मोहक हो गई हों—
परियाँ बनकर नाचें हम,
छमक-छमक, छम-छम।
बालों में रेशमी रिबन
पाँवों में गुँघरू छन-छन,
हाथों में कंगन खन-खन
उजली फ्राकें चम-चम-चम।

इसी तरह नन्ही बालिकाओं का खेल तरह-तरह की शक्लों में सामने आता है। परियों सरीखी नन्ही बालिकाओं के हर्षाकुल होकर नाचने-ठुमकने की एक प्यारी सी छवि मानो राही जी के इन शब्दों में उतर गई है—

ठुमक-ठुमककर बल खाएँ
हम लहरों सी लहराएँ,
झूम-झूमकर हम गाएँ
सारे गामा पम-पम-पम।

कुछ अरसा पहले राही जी की संपूर्ण कविताएँ एक साथ एक जिल्द में छपकर आई हैं। उन सरीखे बाल साहित्य के मूर्धन्य कवि की बच्चों के लिए लिखी गई चुस्त-दुरुस्त और मस्ती की लय में ढली कविताएँ एक साथ, एक ही पुस्तक में बच्चों को पढ़ने को मिलें, यह किसी सुखद आश्चर्य से कम नहीं। हिंदी बाल साहित्य की यह ऐतिहासिक घटना है, इसलिए भी कि बाल कविता के इतिहास के सर्वोच्च नायकों में राही का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। उनकी संपूर्ण बाल कविताओं का संचयन बच्चों के साथ-साथ सहृदयजनों और हिंदी के साहित्यिकों को भी हिंदी बाल कविता के सबसे सशक्त और सतेज स्वर से रू-ब-रू होने का अवसर देगा।

अंत में एक बात और। ‘बालवाटिका’ का हम सबके प्यारे और रससिद्ध कवि राही जी पर केंद्रित विशेषांक आ रहा है, यह केवल ‘बालवाटिका’ के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे बाल साहित्य संसार के लिए एक आनंद-पर्व है। एक हर्ष-विह्वल कर देने वाली घटना!...और सच तो यह है कि हम संयोगवश उस दौर में हैं, जब कि हमने राही जी सरीखे बड़े और शिखर कवि को देखा है, उऩसे बातें की हैं—कम से कम मुझे यह अपने जीवन की एक बड़ी रोमांचित करने वाली घटना लगती है। बने रहें राही जी, और वे इसी तरह पूरे रंग और मस्ती में सराबोर होकर खूब-खूब लिखते रहें। हमारे समय—और आने वाले समय के लेखकों का भी ढेर सारा प्यार उनके आगे न्योछावर है! 
***

प्रकाश मनु, 545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008,
मो. 09810602327,
ईमेल – prakashmanu333@gmail.com

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