मैं और मेरी बाल कविताएँ

प्रकाश मनु

आत्मकथ्य: प्रकाश मनु


अपनी बाल कविताओं पर लिखते हुए अतीत मेरी आँखों के आगे आ गया है और मैं जैसे फिर से बचपन में पहुँच गया हूँ। मैं बच्चों के लिए कब और कैसे लिखने लगा और धीरे-धीरे कैसे यह जादू हुआ कि कविता मुझ पर छा-सी गई, मैं बिलकुल ठीक-ठीक तो नहीं कह सकता। पर लगता है, अपनी पाठ्यपुस्तकों में मैंने दिनकर, हरिऔध, मैथिलीशरण गुप्त, सुभद्राकुमारी चौहान, रामनरेश त्रिपाठी जैसे बड़े और दिग्गज कवियों की जो कविताएँ पढ़ी थीं और जिन्हें मैं बार-बार गाया-गुनगुनाया करता था, शायद उनका ही असर हो कि मैं इस राह पर चल पड़ा।
पाठ्य पुस्तकों के अलावा, हमारे समय में हिंदी की एक सहायक पुस्तक भी चलती थी, ‘भाषा भास्कर’, जिसे हमारे कॉलेज के ही हिंदी के एक साहित्यमना अध्यापक शांतिस्वरूप दीक्षित जी ने लिखा था। उन्हें हम शास्त्री जी कहा करते थे। शास्त्री जी सचमुच हिंदी साहित्य के मर्मज्ञ थे, और बेहद अध्ययनशील भी। उनकी लिखी पुस्तक ‘भाषा भास्कर’, जिसके अलग-अलग खंडों को हमने छठी कक्षा से दसवीं तक पढ़ा था, बड़ी अद्भुत पुस्तक थी। कहना चाहिए, जादू का पिटारा। उसमें हिंदी के एक से एक दिग्गज कवियों की इतनी अच्छी-अच्छी कविताएँ उद्धृत की गई थीं, कि मेरे लिए तो वह एक सुंदर काव्य-स्तवक ही था। हिंदी की सरस और भावपूर्ण कविताओं का एक विशाल गुलदस्ता। यही वजह है कि उसे मैं हर वक्त अपनी छाती से चिपकाए रखता था। 

सुबह उठते ही बेनागा मैं उनमें से कुछ कविताएँ जोर-जोर से बोलकर याद किया करता था। और इन कविताओँ को पढ़ते हुए मेरा पूरा शरीर रोमांचित हो उठता था। कभी जोश तो कभी करुणा की धारा मुझे अपने साथ बहा ले जातीं। पढ़ते हुए कभी-कभी कंठ अवरुद्ध हो जाता, आँखों से आँसू बहने लगते थे। मुझे कुछ ऐसी अनुभूति होती, कि जैसे इन कविताओँ को पढ़ते हुए, मैं आविष्ट सा, विश्वकरुणा की एक महाधारा में बहता जा रहा हूँ। और अपने पर मेरा कोई बस नहीं रहा।

कहना न होगा कि शुरू-शुरू में अनायास ही, मुझे कविताओं की भावनापूर्ण दुनिया में खींच लाने का एक बड़ा काम ‘भाषा भास्कर’ और उसके विद्वान लेखक शांतिस्वरूप दीक्षित जी ने किया था, जिसके लिए मैं जीवन भर उनका कृतज्ञ रहूँगा।

‘भाषा भास्कर’ पढ़ने के बाद जैसे एक विकलता सी मेरे अंदर छा गई। साहित्य की एक बूँद का रस मैंने चख लिया था, और अब प्यास बहुत बढ़ गई थी। वह कुछ बूँदों से नहीं, बल्कि पूरे सागर से ही तृप्त हो सकती थी।

फिर बाल साहित्य, और विशेष रूप से बाल कविता, की ओर आने का एक कारण और भी है। किशोरावस्था में मैं ‘धर्मयुग’ का पाठक था और उसमें छपने वाला बच्चों का पन्ना मुझे बेजोड़ लगता था। उस समय ‘धर्मयुग’ के संपादक धर्मवीर भारती जी उसमें बच्चों के लिए एक से एक अच्छी और अनूठी कविताएँ छापते थे। मुझे वे इतनी अच्छी लगती थीं कि मैं उन्हें एक डायरी में उतारता जाता था। फिर अपने घर-परिवार और अड़ोस-पड़ोस के बच्चों को वे कविताएँ बड़े नाटकीय ढंग से सुनाया करता था। इनमें दामोदर अग्रवाल, शेरजंग गर्ग, सूर्यभानु गुप्त, कन्हैयालाल मत्त और डॉ. श्रीप्रसाद समेत सरीखे कवियों की बड़ी ही सुंदर और लाजवाब कविताएँ हुआ करती थीं। सुनकर बच्चों की आँखों में कैसी चमक आती थी, इसकी मुझे बड़ी ही हर्षाकुल कर देने वाली याद है।

‘धर्मयुग’ के अलावा ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ और ‘दैनिक हिंदुस्तान’, ‘नवभारत टाइम्स’ सरीखे पत्रों में भी एक से एक अच्छी बाल कविताएँ पढ़ने को मिल जाती थीं, जिन्हें पढ़कर मन रीझता था और आनंद से नाचता-गाता था। सच कहूँ तो मेरा बचपन उनसे समृद्ध और संपन्न होता था। बचपन तो आनंद से ही जीने का ही नाम है। पर इन पत्र-पत्रिकाओं में छपी बाल कविताएँ पढ़ते हुए, बचपन का रस-आनंद और खिलंदड़ापन कहीं अधिक बढ़ जाता था। फिर इन नन्ही-मुन्नी कविताओं को पढ़ते हुए, मन में अपने आसपास की दुनिया के लिए एक तरह की जिज्ञासा, उत्सुकता और कौतुक का भाव भी उत्पन्न होता था। दुनिया को देखने का एक नजरिया भी बनता था। यों कह सकते हैं कि इन कविताओं को पढ़ते हुए, मैंने बचपन को और अधिक आनंद और मजे से जीना सीखा। और यह भी कि इस आनंद को औरों को बाँटो तो आनंद और बढ़ता है।

तब शायद पहली बार मुझे समझ में आया कि एक बाल कविता का जादू क्या होता है और कैसे वह दिलों में अपनी जगह बना लेती है। शायद उसके कुछ ही समय बाद जाने-अनजाने बच्चों के लिए कविताएँ लिखने का सिलसिला शुरू हुआ।

आठवें दशक के प्रारंभिक वर्षों में मैं जब-तब बाल कविताएँ लिखने लगा था। शायद सन 72-73 का समय रहा होगा। तब मैं तरुण था, पर मन बड़ों के लिए लिखी जाने वाली कविताओं के अलावा बाल कविताओं में भी खूब रमता था। मैंने बाल कविताओं में अपने बचपन को फिर-फिर जिया और आनंदित होता रहा। अब भी होता हूँ। 
एकदम शुरू-शुरू में काव्य-भाषा चाहे पूरी तरह सध न पाई हो, पर अपनी बाल कविताओं को मैंने भरपूर आनंद लेते हुए लिखा था। यही कारण है कि अपनी बाल कविताओं की चर्चा करते ही मैं एकदम बचपन में पहुँच जाता हूँ और अतीत मेरी आँखों में झाँकने लगता है। 

[2]

मोटे तौर से मेरी कविता लिखने की शुरुआत छात्रावस्था से ही शुरू हो गई थी। मैं शायद आठवीं कक्षा में था, जब मैंने अटपटे ढंग से ही सही, कविता लिखना शुरू कर दिया था। पर इसकी भी एक पृष्ठभूमि है। सन् 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण किया, तब मैं छठे दरजे में था। था तो बच्चा ही, पर मन में गुस्सा और रोष इतना था कि मन करता था कि मैं भी सीमा पर जाऊँ और हाथ में बंदूक लेकर, अपने बहादुर जवानों के साथ मिलकर लड़ूँ। 
आज भी मुझे वह सब कुछ बहुत अच्छी तरह याद है।...चीन ने भारत-चीन मैत्री और पंचशील के सिद्धांत का मजाक उड़ाते हुए, जिस तरह भारत की पीठ में छुरा घोंपा था, उससे पूरा देश मर्माहत था। हर भारतीय के स्वाभिमान पर यह गहरी चोट थी, जिसने हर ओर गुस्से की एक लहर पैदा कर दी थी। अचानक हुए इस आक्रमण में चीनी सेना का मुकाबला करते हुए, भारत के बहादुर सैनिकों को जिस तरह कुर्बानी देनी पड़ी, उससे पूरा देश तड़प उठा था। मेरा मन भी अंदर-अंदर रोता था। 

एक छोटे बच्चे की नन्ही दुनिया में जैसे एक उबाल सा आ गया था। और वह किसी भी तरह से शांत नहीं हो सकता था, क्योंकि देश मुझसे अलग तो नहीं था। देश पर हुए हमले ने मेरी आत्मा को थरथरा दिया था। मन में गुस्सा और रोष इतना था कि भीतर समा नहीं रहा था। तो धीरे-धीरे उसने कविता की राह टटोलनी शुरू की, ताकि भीतर की जो आग और ऊष्मा है, उसे अभिव्यक्ति मिल जाए।

और शायद यही सुर था, जो जल्दी ही देशभक्ति की कविताओं में ढलता चला गया। आठवें दरजे में मैंने बाकायदा कविताओं की एक कापी बना ली थी, जिसमें कविताएँ लिखता था। फिर काट-पीटकर उन्हें ठीक करता था, ताकि उसमें थोड़ी लयात्मकता आ जाए। महाराणा प्रताप, शिवाजी, चंद्रशेखर आजाद, सुभाषचंद्र बोस सरीखे देश के महान नायकों पर मैंने कविताएँ लिखीं। उन्हें अपने सहपाठियों को भी सुनाया करता था। सुनकर अगर कोई अच्छा सुझाव देता और खुद मेरे मन को भी वह जँच जाता, तो उसके अनुरूप कविताओं पर फिर मेहनत करता और उन्हें सुधारता था।

मेरी जीवन-कथा का यह एक छोटा सा अध्याय ही था, जो गुजर गया, पर मेरे मन पर इसकी एक कभी न भूलने वाली छाप पड़ी, और अंततः वही धीरे-धीरे मुझे कविता की ओर खींच लाई। बरसों बाद तरुणाई के दौर में मैंने फिर से कविताएँ लिखनी शुरू कीं, तो पहले बड़ों के लिए कविताएँ लिखी गईं। इनमें ज्यादातर गरीबी, शोषण और सामाजिक विषमता पर लिखी गई कविताएँ थीं।

उन्हीं दिनों मैं चंद्रप्रकाश रुद्र हुआ। मेरा मूल नाम चंद्रप्रकाश था और कुलनाम था, विग। यों मेरा पूरा नाम था चंद्रप्रकाश विग। पर मुझे यह नाम कविता के लिए जँचा नहीं। लगा, चंद्रप्रकाश विग तो कोई दुनियादार आदमी हो सकता है। पर मेरे भीतर कविता लिखने वाला शख्स तो उससे बहुत अलग है। तो नाम भी बदलना चाहिए। मैं उन दिनों रोष और गुस्से की कविताएँ लिखा करता था तो मैं चंद्रप्रकाश रुद्र हो गया।

फिर एक लंबे अंतराल के बाद कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में शोध के लिए आना हुआ, जहाँ पढ़ने-लिखने का एक बिल्कुल अलग परिवेश था। वहाँ का पुस्तकालय भी काफी समृद्ध था, जहाँ मैं घंटों बैठकर अध्ययन करता था, और समय का मुझे कुछ होश नहीं रहता था। तो धीरे-धीरे मेरा स्वभाव बदला, अंतर्मन भी। लगा, अब पहले जैसा गुस्से का भाव नहीं रहा, मैं थोड़ा मननशील होता जा रहा हूँ। खुद अपने भीतर की तन्मयता में डूबा हुआ शख्स। एक अंतर्मुखी सा कवि। और तब फिर मुझे नाम बदलने की जरूरत महसूस हुई।

उन दिनों जयशंकर प्रसाद जी की ‘कामायनी’ मेरी सर्वाधिक प्रिय कृति थी, जो हर वक्त मेरे मन में घुमड़ती थी। वहीं से मनु आया। रुद्र छूटा तो साथ ही नाम का प्रारंभिक हिस्सा चंद्र भी छूट गया, और मैं प्रकाश मनु हुआ। आज साहित्य जगत में सब प्रकाश मनु को ही जानते हैं। चंद्रप्रकाश रुद्र को तो शायद ही कोई जानता हो। पर शिकोहाबाद के साथियों के लिए, जहाँ का मैं हूँ, मैं आज भी या तो रुद्र हूँ, या फिर चंदर। और जब वे प्यार से चंदर कहकर पुकारते हैं, तो सचमुच मुझे बहुत अच्छा लगता है। इसलिए कि चंदर मेरा पारिवारिक नाम भी है। घर में सब मुझे चंदर कहकर ही बुलाते हैं। तो नाम से जो चंद्र हटा, वह हटा नहीं, चंदर बनकर हमेशा के लिए एक प्रीतिकर रूप में मेरे साथ जुड़ गया।

तो यह थी मेरे कवि नाम की कथा। पर नाम की इस कथा ने, शायद थोड़ा भटका भी दिया। इसलिए कि बात तो तरुणाई की कविताओं की हो रही थी। ऐसी कविताएँ जिनमें गुस्सा और रोष था, और मैं उन्हें पढ़ता भी बहुत प्रभावी ढंग से था। तो गुस्से और विद्रोह के कवि के रूप में ही मेरी पहचान भी बनती चली गई। शायद भीतर कोई ज्वालामुखी था, जो मेरी कविताओं की शक्ल ले रहा था। और यह गरम लावा रुकने का नाम ही नहीं लेता था।
पर आश्चर्य, अचानक उस ज्वालामुखी के भीतर से ही शीतल कविताओं की एक नन्ही सी धार भी फूट पड़ी। और यह बाल कविताओं की धारा थी, जो मुझे शायद थोड़ा सुकून देने के लिए चली आई थी। बड़ों के लिए कविताएँ लिखता तो मन में उत्ताप पैदा होता था, पर बच्चों के लिए कविताएँ लिखता तो मन खुब-ब-खुद शीतल होता जाता था। मानो प्रकृति ने ही मुझे थोड़ा रस-आनंद और सुकून देने के लिए यह एक छोटा सा गवाक्ष खोल दिया था। 
हालाँकि तब मैं बिल्कुल नहीं जानता था कि यह गवाक्ष बड़ा होते-होते एक दिन इतना बड़ा होने वाला है कि एक बिल्कुल नई-नई सी दुनिया—बच्चों की भोली और नटखट दुनिया का मैं नागरिक होने वाला हूँ। और धीरे-धीरे बाल मन की जिज्ञासा और कौतुक भरी दुनिया ने मुझे भीतर-बाहर से इस कदर आच्छादित कर लिया, कि यही मेरी मूल पहचान भी बन गई।

मेरी बाल कविताओं के शुरुआती दौर में बेशक ‘देशराग’ की कविताएँ ही ज्यादा लिखी गईं। पर मेरी कोशिश थी कि कविताएँ बोझिल न हों और उनमें बच्चे और बचपन की सरलता भी थोड़ी झलकनी चाहिए। कविता पढ़कर बच्चों को आनंद आए, यह बड़ी बात है। इनमें से एक कविता मुझे आज भी पसंद है और वह कई पाठ्यपुस्तकों में भी शामिल की गई है। कविता की शुरुआती पंक्तियाँ हैं—
छोटे मुँह से कैसे कह दूँ, 
इस भारत की बात रे,
सोने जैसे दिन हैं इसके, 
चाँदी जैसी रात रे!

कहना न होगा कि इसमें एक बच्चे का मन है, जो बच्चे की अपनी सीधी-सादी भाषा में सामने आता है। देश के लिए बच्चे के मन में सच्चा अनुराग है, जिसे किसी ओढ़ी हुई भाषा की दरकार नहीं है। 

यह कविता चंडीगढ़ से निकलने वाली एक बड़ी सुरुचिपूर्ण पत्रिका ‘नन्हे तारे’ में खूबसूरत सज्जा के साथ छपी थी।
कुछ अरसे बाद अपने आसपास की दुनिया, जीवन के तरह-तरह के रूपों और प्रकृति पर कविताएँ लिखने का सिलसिला चल पड़ा। उन्हीं दिनों चाँद पर एक कविता लिखी गई। पर शायद यह थोड़ी अलग-सी कविता थी, इसलिए आज भी मुझे पसंद है और इसे पढ़कर न सिर्फ पुराने दिन याद आते हैं, बल्कि होंठों पर एक मुसकान भी चली आती है। 

कविता में चाँद और बच्चे की दोस्ती है, और यही बात बच्चों के मन को लुभाती है। साथ ही मुझे भी अपने बचपन की याद दिला देती है। कविता का शीर्षक है, ‘आओ चाँद’, और इसकी शुरुआती पंक्तियाँ हैं—
जल्दी आओ भैया चाँद, 
ले लो एक रुपैया चाँद!
नीले नभ का घूँघट लेकर, 
सब तारों को न्योता देकर, 
एक बार तो नाच दिखा दो, 
धा-धिन, ता-ता थैया चाँद!

यह कविता ‘नवभारत टाइम्स’ के इतवारी परिशिष्ट ‘रविवार्ता’ में बड़े सुंदर और आकर्षक ढंग से छपी थी। 
कुछ इसी के आसपास चिड़िया पर भी कविता लिखी गई, पर यह भी एक ऐसी दोस्त चिड़िया है, जिससे मेरी दोस्ती आज भी वैसी ही अटूट है। कविता भी एकदम सीधी-सहज है, जो हर बच्चे के दिल को छूती है—
मुझको तो अच्छी लगती है, 
हरे लॉन पर गाती चिड़िया।
चहक-चहककर जब गाती है, 
पंख खोलकर उड़ जाती है,
तब लगता है, आसमान को 
धरती पर ले आती चिड़िया!

कविता की आखिरी पंक्तियों में शायद चिड़िया और बच्चे की दोस्ती कहीं अधिक मुखर है और मैं चाहूँ तो अपने बचपन का गोलू-मोलू सा चेहरा भी इनमें टटोल सकता हूँ—
जब मैं खूब प्यार से हँसता, 
इससे मन की बातें कहता,
मम्मी, मुझको तब लगता है, 
धीरे से मुसकाती चिड़िया!

यह कविता भी ‘नवभारत टाइम्स’ के इतवारी परिशिष्ट ‘रविवार्ता’ में ही छपी थी, जिसकी उस समय खासी साख और प्रतिष्ठा थी। 

मेरी ये तीन शुरुआती बाल कविताएँ हैं, जिन्हें लिखने के उत्साह और उमंग को आज भी मैं भूला नहीं हूँ। सृजन-क्षणों के बाद, एक पाठक के रूप में खुद ही इन कविताओं को पढ़ते हुए, आनंद और भावावेग से मेरा चेहरा किस तरह आरक्त हो गया था, यह मैं आज भी ठीक-ठीक बता सकता हूँ।

एक तरह से बाल कविता की दुनिया में मेरा प्रवेश इन्हीं तीन कविताओं से होता है। ये ही तीन कविताएँ थीं, जिनसे मैंने ‘खुल जा सिमसिम’ कहा था, और बाल कविताओं की एक बहुरंगी दुनिया मेरे आगे खुलती चली गई थी।
बीसवीं शताब्दी का यह आठवाँ दशक था, जब कि मेरे जीवन और साहित्य-यात्रा में यह एक नया कौतुक द्वार खुल गया था, जिसका रोमांच मैंने तब भी महसूस किया था, और आज भी महसूस करता हूँ।

अपनी शुरुआती बाल कविताओं में ये तीन सीधी-सरल और भावपूर्ण कविताएँ मुझे इसलिए भी पसंद हैं, क्योंकि इसकी भाषा एकदम बोलचाल की भाषा है। हर बच्चे की अपनी भाषा, जिसमें वह हँसता-बोलता, रूठता और मनुहार करता है। इसलिए इसे पढ़ते हुए, मम्मी से बतियाते एक छोटे से मासूम बच्चे का बिंब एकदम आँखों के आगे आ जाता है। शायद इसीलिए ये पंक्तियाँ बरसों बाद भी मेरे भीतर दस्तक देती हैं।

अपने भीतर कुछ और टटोलता हूँ तो लगता है कि ये तीन बाल कविताएँ, जिनका मैंने यहाँ जिक्र किया है, एक तरह से मेरे बाल कविता संसार की कुंजी भी हैं, जिनसे मेरी बाल कविताओं की प्रकृति और बुनावट का तो पता चलता ही है, साथ ही यह भी जाना जा सकता है कि अपनी बाल कविताओं के जरिए मैं क्या करना चाहता था, या कि वह क्या नया-निराला और अद्वितीय था, जिससे करने की ललक के साथ मैं इस ओर आया। 

इतना ही नहीं, मेरी शुरुआती कविता धारा की इन तीन बाल कविताओं का अनुसरण करते हुए, यह भी मोटे तौर से पता चल जाता है कि मेरी बाल कविताएँ औरों की बाल कविताओं से किस मानी में भिन्न हैं।

[3]

कुछ आगे चलकर जो कविताएँ लिखी गईं, उनमें ‘सूरज जीवन है धरती का’ कुछ अलग सी और विशिष्ट कविता है। इसमें सूरज का बड़ा ही गौरवमय रूप है। आखिर सूरज से ही तो यह जीवन है। कविता की शुरुआत में उसका सुबह-सुबह नजर आने वाला कोमल रूप है तो शाम को ढलने पर उपजने वाली छल-छल करुणा भी—

हँसकर रोज जगाया करता
सबको प्यारा सूरज,
गाने चिड़िया के लाता है
रोज हमारा सूरज।
बड़े सवेरे सोने जैसा
लगता बालक भोला,
तेज दौड़ने लगता है फिर
बना आग का गोला।
शाम डूबने से पहले मन
झिलमिल सा हो आता,
जाते-जाते भी अंबर को
आशा से रंग जाता।

फिर सूरज से जुड़ा हमारे जीवन का हर रूप-रंग और कार्य-व्यापार भी तो है। बिना सूरज के भला हम अपने जीवन की कल्पना ही कैसे कर सकते हैं, “सूरज बिन सब ओर अँधेरा, लगता सब-कुछ फीका,/इसीलिए तो कहते सूरज जीवन है धरती का!”

इस कविता के सृजन और संरचना से जुड़ी एक स्मृति मेरे मन में है। वह यह कि एकदम शुरुआत में ही एक पंक्ति मुझे सूझ गई थी, सूरज जीवन है धरती का। मुझे लगा, अरे, यह पंक्ति तो खुद ही एक कविता है। तो इसे क्यों न कविता में ढाला जाए? और बस उसी समय मेरे भीतर इस पंक्ति के साथ-साथ गूँजें-अनुगूँजें शुरू हो गईं। 

कहीं भी आते-जाते, उठते-बैठते बार-बार एक ही पंक्ति मन के भीतर मँडराती, सूरज जीवन है धरती का। और फिर एक दिन अचानक इस पंक्ति को दोहराते हुए मुझे लगा, कि इसके साथसाथ और पंक्तियाँ भी बनती जा रही हैं। और जब लिखना शुरू किया तो पूरी कविता शब्दों में बहती चली गई। मुझे उसमें बहुत थोड़ा फेरफार करना पड़ा। और कविता पढ़ने के बाद मैंने पढ़ा, तो सचमुच एक गहरे संतोशष का भआव मेरे मन में था। लगा कि हाँ, कविता तो बन गई!

यह कविता मुझे याद पड़ता है ‘चंपक’ पत्रिका में छपी थी, जिसमें मेरी और भी बहुत सी कविताएँ छपी थीं। पत्रिका उन दिनों कई भाषाओं में निकलती थी। लिहाजा यह कविता भी अनूदित होकर, देश की अनेक भाषाओं में छपी।
यहीं प्रसंगवश बता दूँ कि ‘चंपक’ में छपी मेरी पहली कविता थी, ‘कितना सुंदर अपना देश’। यह सन् 1975 के आसपास छपी थी और इसका भी कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ था।

प्रकृति का ही एक मनोहारी रूप ‘जाड़े की धूप’ कविता में है। इसमें जाड़े की धूप कभी उजले हंसों की पाँतों-सी लगती है तो कभी पापा के नेह-दुलार जैसी। यहाँ तक कि वह एक नन्हे खरगोश की तरह उछल-कूद भी मचाती है—

पापा का ज्यों नेह-दुलार
भैया का रस-भीगा प्यार,
मम्मी की मीठी चुम्मी-सी
गालों को सहला जाती है—
यह जाड़े की धूप!
जैसे एक नन्हा खरगोश
उछल रहा ले मन में जोश,
इधर घूमती, उधर घूमती
झट छज्जे पर चढ़ जाती है
यह जाड़े की धूप!

इसी तरह अपनी शुरुआती कविताओं में मुझे ‘चिट्ठी का संदेश’ भी प्रिय है। निरंकारदेव सेवक जी ने अपने इतिहास-ग्रंथ ‘बालगीत साहित्य’ में मेरे परिचय के साथ इसी कविता को उद्धृत किया है। इस कविता में कुछ ऐसा है जो आज भी मुझे अच्छा लगता है। कविता की शुरुआती पंक्तियाँ हैं, “चिट्ठी में है मन का प्यार, चिट्ठी है घर का अखबार।” 

सचमुच हर चिट्ठी सुख-दुख की एक मीठी सौगात ही तो है। और फिर चिट्ठी की शक्ल देखकर ही समझ में आ जाता है कि यह किसने लिखी होगी। इसलिए कि हर चिट्ठी की एक अलग तासीर और अलग शख्सियत भी तो होती है। कविता में थोड़े शब्दों में इसका भी जिक्र है—

यह आई मम्मी की चिट्ठी, 
लिखा उन्होंने—प्यारी किट्टी,
मेहनत से तुम प़ढ़ना बिट्टी, 
पढ़-लिखकर होगी होशियार।
पापा पोस्टकार्ड लिखते हैं, 
घने-घने अक्षर दिखते हैं,
जब आता है बड़ा लिफाफा, 
समझो चाचा का उपहार!

*

इसी दौर में कुछ ऐसी कविताएँ भी लिखी गईं, जो नाटकीय शिल्प में हैं। इन्हें एक तरह की कथात्मक कविता भी आप कह सकते हैं, जिनमें कविता और कहानी दोनों का आनंद है। ऐसी ही मेरी एक और पसंदीदा कविता है, ‘हाथी का जूता’। इसमें बड़े लहीम-शहीम हाथी दादा हैं, जो मेला देखने जाना चाहते हैं। पर उससे पहले बढ़िया सा जूता खरीदने के लिए वे एक जूते की दुकान पर जा पहुँचते हैं। बेचारा दुकानदार उनका विशाल डील-डौल देखकर काँप उठता है। जरा देखें तो जूते की दुकान का यह मजेदार दृश्य—

एक बार हाथी दादा ने
खूब मचाया हल्ला,
चलो तुम्हें मेला दिखला दूँ—
खिलवा दूँ रसगुल्ला।
पहले मेरे लिए कहीं से
लाओ नया लबादा,
अधिक नहीं, बस एक तंबू ही
मुझे सजेगा ज्यादा!
तंबू एक ओढ़कर दादा
मन ही मन मुसकाए,
फिर जूते वाली दुकान पर
झटपट दौड़े आए।
दुकानदार ने घबराकर 
पैरों को जब नापा,
जूता नहीं मिलेगा श्रीमन—
कह करके वह काँपा।

अब जरा कविता की आखिरी पंक्तियाँ देखिए और हाथी दादा का यह मनमौजी अंदाज भी, कि अपने लिए ढंग के जूते नहीं मिले, तो मेला देखने का उनका मूड ही खराब हो गया, “खोज लिया हर जगह, नहीं जब मिले कहीं पर जूते,/ दादा बोले—छोड़ो मेला, नहीं हमारे बूते!”

यह मेरी बड़ी मशहूर बाल कविता है और इस नाम से मेरा एक बाल कविता-संग्रह भी है। बाल कविता में जिस शरारती नटखटपन की बात की जाती है, उसकी एक झलक इस कविता में भी है। 

पर सच बताऊँ तो मेरे लिए यह कविता कुछ और ही है। बरसों पहले इसे रचे जाने से लेकर आज तक। बाल साहित्य के पाठकों और अध्येताओं को जानकर हैरानी होगी कि मेरे मन में इस कविता के साथ बहुत गहराई तक निराला की स्मृति जुड़ी है और जाने कैसे निराला का आदमकद, लहीम-शहीम भव्य व्यक्तित्व और उनकी मस्ती भी मेरे लेखे, हाथी दादा में चली आई है। कविता के अंत में जूते की दुकान पर अपने लिए सही जूते न मिलने पर ‘छोड़ो मेला, नहीं हमारे बूते!’ कहने वाली बेफिक्री भी निराला की ही है। 

यह दीगर बात है कि जो भाव इस कविता को लिखते या पढ़ते समय मेरे मन में आता है, वह कितना पाठकों तक पहुँचता होगा, कहना मुश्किल है। पर इस कविता के सृजन-क्षण से ही कम से कम मेरे मन में तो हाथी दादा का निरालापन इस कदर नत्थी है कि कविता पढ़ते समय निराला मुझे याद न आएँ, ऐसा हो नहीं सकता।

ऐसी ही मेरी एक और कल्पनापूर्ण कविता है, ‘अगर कहीं’। कविता में एक से एक नायाब दृश्य और स्थितियाँ हैं। अगर कहीं ऐसा हो जाए तो कैसा लगेगा, सोचते हुए कल्पना और विचारों की लड़ियों पर लड़ियाँ सामने आती जाती हैं। कविता की शुरुआत इन पंक्तियों से होती है, “आसमान में बजे बाँसुरी, धरती सारी झूमे-गाए,/ अगर कहीं ऐसा हो भाई, सचमुच, खूब मजा आ जाए!”

फिर आगे कविता एक सपनीली राह पर आगे बढ़ जाती है, जिसमें एक के बाद एक मनोरम दृश्य आँखों के आगे आते जाते हैं। जरा आप भी इनका आनंद लें—

तारे धरती पर आ जाएँ
चाँद उतर आए आँगन में,
नन्हे-नन्हे सूरज पैदा
हों पृथ्वी पर, वन-उपवन में।
पेड़ों पर पैसे लगते हों
रसगुल्ले हों डाली-डाली,
जगह-जगह नदियाँ-पर्वत हों
हो सब धरती पर हरियाली।
चंद्रलोक में पैदल जाएँ
सूर्यलोक की सैर करें हम,
वहाँ-वहाँ पर घूमें-घामें
जहाँ-जहाँ हो बढ़िया मौसम।

और कविता की आखिरी पंक्तियों में एक सुंदर दुनिया का सपना है, “फूलों जैसी हों मुसकानें, नदी-सरीखा हर दिल गाए,/ अगर कहीं ऐसा हो भाई, सचमुच, सबके मन को भाए!”

ऐसे ही ‘वह कविता रच जाओ’ जैसे मन की सुंदरता और उजाले की कविता है। अगर हमारे दिल में उजाला है, तो हम चारों ओर उजाला ही फैलाएँगे। कविता की लय ऐसी है कि शब्द होंठों पर नाचते हैं और एक बार पढ़ते ही पूरी कविता याद हो जाती है—

नहीं कभी घबराओ, तुम
नहीं कभी झुँझलाओ तुम,
एक नई दुनिया रचने को
आगे कदम बढ़ाओ तुम!...
हर दिल में हरियाली हो
नई सुबह की लाली हो,
ऐसे मीठे सपनों का—
मंडप एक सजाओ तुम!

अगर हम ऐसा सुंदर जीवन जीते हैं, तो वह भी तो एक झिलमिल-झिलमिल कविता सा ही है, “जिससे मन को राह मिले, सुख की ठंडी छाँह मिले, झिलमिल-झिलमिल तारों सी—वह कविता रच जाओ तुम!”

बहुत से लोग मुझसे पूछते हैं, कि कविता में संदेश होना चाहिए या नहीं? इस पर मुझे बाल साहित्य के दिग्गज कवि बालस्वरूप राही जी की बात याद आती है कि कविता में संदेश तो होना चाहिए, पर उपदेश नहीं। या आप कह सकते हैं कि बाल कविता में कुछ उसी तरह की सीख होनी चाहिए, जैसी दादी या नानी की मीठी-मीठी बातों में होती है। वे बच्चों को प्यार से कोई अच्छी बात बताती हैं, तो बच्चे झट उसे अपना लेते हैं। सच तो यह है कि अगर किसी सीख या संदेश के साथ प्यार भी हो, मिठास भी हो और कविता का सुरीलापन भी, तो वह संदेश या सीख भी हमें प्यारी लगने लगती है और हम उसे अपने जीवन में अपनाने के लिए ललक उठते हैं।

बाल कविताओं के शुरुआती दौर में मैंने ऐसी कई कविताएँ लिखीं, जिनमें एक मीठी सी सीख भी है। पर वह सीख बड़ी मोहक कल्पना और कविता के सुरीलेपन में ढलकर आती है, तो बच्चे उसे खेल-खेल में अपनाते भी हैं। 
यही कारण है कि मेरी कविता ‘वह कविता लिख जाओ’ बच्चों की कई पाठ्य पुस्तकों में है और बच्चों ने इसे बहुत पसंद किया है। कई बच्चों ने इसे याद करके स्कूल के कार्यक्रमों में सुनाया तो उन्हें खूब सराहना मिली, और दूसरे बच्चों ने पसंद भी किया। एक कवि के रूप में इससे मन में एक गहरी आश्वस्ति तो मिलती ही है।

[4]

मेरी बाल कविताओं का पहला चरण सन् 1970 से 1985 तक था। 31 जनवरी 1986 को मैं ‘नंदन’ पत्रिका में आ गया, तो बाल कविताओं का अपरंपार संसार मेरे आगे खुल पड़ा। संयोग से ‘नंदन’ में आते ही संपादक जयप्रकाश भारती जी ने मुझे बाल कविताओं के चयन का जिम्मा दे दिया। ‘नंदन’ में प्रकाशन के लिए हर दिन सौ-डेढ़ सौ कविताएँ तो आती ही थीं, जबकि हमें हर महीने केवल चार या पाँच कविताएँ छापनी होती थीं।

रोज ढेरों अच्छी-बुरी कविताएँ पढ़ने को मिलती थीं, जिनमें से मैं कुछ अलग सी, सुंदर और रसपूर्ण बाल कविताओं को छाँटकर, एक अलग फाइल में रखता जाता। यों हर महीने कोई चालीस-पचास कविताएँ मैं भारती जी के आगे रखता था, जिनमें से चयन का काम आगे शुरू होता। भारती जी सचमुच कविताओं के पारखी थे। अच्छी कविताओं को परखना उन्हें आता था और कविता में कहीं भाषागत या अन्य कोई दोष होता, तो उनकी सतर्क निगाहों से वह छिपता नहीं था। यों काफी समय लगाने के बाद उन चालीस-पचास कविताओं में से ऐसी चार-पाँच कविताएँ चुनी जातीं, जो सर्वाधिक सुंदर और प्रभावशाली कविताएँ होती थीं। हर तरह से मुकम्मल बाल कविताएँ, जिनमें चमकदार मोतियों की सी आब होती। 

इस तरह ढेरों सामान्य कविताओँ में से कुछ अलग, विशिष्ट और अनूठी कविताओं के चयन की एक दृष्टि विकसित होती गई। जाहिर है, इससे मेरे मन में बाल कविताओं का एक आलोचनात्मक नजरिया भी बना। फिर जब मैं स्वयं कविताएँ लिखता, तो भी मैं एक आत्मालोचन की दृष्टि से अपनी चीजों को परखता और सोचता कि जो कुछ भी मैं लिखूँ, वह औरों से अलग, विशिष्ट और अनूठा हो। बेशक इसका असर मेरे बाल काव्य सृजन पर पड़ा, और कुछ अलग सी, या कहें, नए रंग-ढंग की रचनाएँ लिखी गईं। इसी तरह ‘नंदन’ की पुरानी फाइलों में मैं हिंदी बाल कविता के दिग्गजों की कविताएँ पढ़ता, तो मन पर उनका गहरा असर पड़ता था। लगता, कविता तो यह है जो मन में बहती चली जाए, और हजारों सामान्य बाल कविताओं से अलग भी नजर आती हो।

कहना चाहिए कि मेरी बाल कविताओं में यह एक बड़ा मोड़ था। मोटे तौर से यह मेरी बाल कविताओं का दूसरा चरण है, जो सन् 1986 से 2010 तक चला। सन् 2011 में मैं बाल पत्रिका ‘नंदन’ से मुक्त हुआ, तो मेरी बाल कविताओं की धारा में खुद-ब-खुद थोड़ी मुक्तता और अनौपचारिकता आई। इस चरण में अधिकतर ऐसी बाल कविताएँ लिखी गईं, जिनमें काफी प्रयोग भी थे और कहीं ज्यादा खुलापन भी। इसी कालखंड में मैंने पहली बार लोरी और प्रभातियाँ लिखीं और बाल पहेलियाँ भी। मेरी बाल कविताओं का यह तीसरा चरण था, जो सन् 2011 से शुरू हुआ, और आज तक चला आता है।

दूसरे चरण की बाल कविताओं में मेरी कई पसंदीदा कविताएँ हैं, जो आज भी मेरे भीतर दस्तक देती हैं। इन्हीं में फूलों पर लिखी गई कुछ-कुछ लिरिकल सी कविता ‘बात सुहानी फूलों की’ भी है, जो आज भी मुझे पसंद है। कविता की शुरुआत किस्से-कहानी वाले अंदाज में हुई है—

सुनो कहानी फूलों की,
बात सुहानी फूलों की।
अब भी ताजादम लगती,
कथा पुरानी फूलों की।
हर डाली पर कविता है,
जानी-मानी फूलों की।

कविता इसी लय में फूलों से जुड़े मन के बहुत से बिंबों को समेटे आगे बढ़ती है। और कविता की आखिरी पंक्तियाँ जैसे बिन कहे ही बहुत कुछ कह देती हैं, “जीवन महक गया जब से,/ महिमा जानी फूलों की।”

हिंदी में गजल के शिल्प में बहुत सी कविताएँ लिखी गई हैं। पर इनमें बहुत सी कविताएँ काफी सपाट सी हैं, जैसे कि बस लिखने के लिए लिख दी गई हों। मैं चाहता था कि ‘बात सुहानी फूलों की’ उनसे कुछ अलग सी और थोड़ी सुरीली कविता हो, जिसे पढ़ते हुए फूलों की सुंदरता का एक कोमल बिंब आँखों के आगे आ जाए। मुझे लगता है कि थोड़ी अलग सी, कोमल और सुरीली कविता तो यह बन पाई है। इसीलिए बच्चों ने भी इसे काफी पसंद किया है।
दूसरे चरण की बाल कविताओं में मेरी दो अत्यंत प्रिय कविताएँ हैं, ‘पापा, तंग करता है भैया’ तथा ‘पापा, दीदी बहुत बुरी है!’ ये घर में भाई-बहन के मीठे झगड़े पर लिखी गई कविताएँ हैं, और संयोग से एक साथ ही लिखी गई थीं। इन झगड़ों में गुस्सा आता है, प्यार भी। सच पूछिए तो इन झगड़ों का भी अपना आनंद है, वरना जिंदगी बेमजा न हो जाए। भाई-बहन के इन मीठे झगड़ों पर लिखी गई अपनी ‘पापा तंग करता है भैया’ कविता पढ़ता हूँ, तो आज भी कुछ हँसी आ जाती है—

पापा, तंग करता है भैया,
कार तोड़ दी इसने मेरी, 
फेंक दिए दो पहिए दूर,
हॉर्न टूटकर लग पड़ा है, 
बत्ती भी है चकनाचूर,
कहता—पापा से मत कहना, 
ले लो मुझसे एक रुपैया!

दूसरी कविता में एक बच्चा पापा से दीदी की शिकायत करता है। उसकी नाराजगी की वजह भी बड़ी मजेदार है—

पापा, दीदी बहुत बुरी है!
बिना बात करती है कुट्टी
सीधे मुँह न करती बात,
मैं कहता हूँ—खेलो मिलकर
मगर चला देती यह लात।
हरदम झल्लाया करती है,
हरदम इसकी नाक चढ़ी है!

कहना न होगा कि ये मेरी सबसे लोकप्रिय कविताएँ भी हैं, जिन्हें बच्चों और बड़ों, दोनों ने ही पसंद किया है।

*

इसी तरह ‘एक मटर का दाना’, ‘एक बिल्ली सैलानी’, ‘अपना घर भी है गुड़ियाघर’, ‘दादा जी और चिंटू’, ‘हमने भी देखा चिड़ियाघर’, ‘दही बड़े’, ‘हाथी दादा’, ‘ये झोंपड़ियों के बच्चे’ भी इस चरण में लिखी गई, मेरी पसंदीदा कविताएँ हैं। इतने बरस बाद भी उन्हें पढ़ते हुए मन में एक हिलोर सी पैदा होती है।

‘एक मटर का दाना’ कविता में मटर का थोड़ा नटखट सा है, इसलिए वह घऱ से निकलकर भाग खड़ा होता है और बहुत खेल-तमाशे दिखाता है। चौराहे पर उसे एक कार मिली तो वह झटपट उसमें सवार हो गया, और फिर—

बैठ कार में
खूब अकड़कर
दौड़ा-दौड़ा...दौड़ा,
गलियाँ, सड़कें
चौरस्ते
सबको ही पीछे छोड़ा।

उस सयाने मटर के दाने ने दिल्ली, जयपुर, कलकत्ता और न किन-किल जगहों पर एक से बढ़कर एक अजूबे देखे, और फिर वापस घर आया तो—

आकर के 
नन्हे चुनमुन को
किस्सा यही सुनाया,
खूब हँसा वह 
औरों को भी
खिल-खिल खूब हँसाया।
बोला—एक घुमक्कड़
समझो
मुझको जाना-माना,
इब्न बतूता
संग घूमा हूँ—
किस्सा बड़ा पुराना!

यानी मटर के इस एक दाने के भीतर भी एक सैलानी मन है। एक बेचैन घुमंतू या कहें एक जिज्ञासु बालक उसके भीतर बैठा है, जो देश-दुनिया के हालचाल जानने और उसके एक से एक सुंदर अजूबों का दीदार करने के लिए आकुल है।

*

अब जरा उस बच्चे से मिलिए, जो सुबह-सुबह बड़ी जल्दी उठ गया है, और इस बात की खुशी उसके अंदर समा नहीं रही। कुछ लीक से हटकर लिखी गई मेरी कविता ‘आज सवेरे’ का नायक यही बच्चा है, जिसने सुबह उठने का आनंद जान लिया है। इसलिए कि प्रकृति सबसे सुंदर और निर्मल रूप में तभी होती है। ओस से एकदम धुली-धुली सी। और इतना ही नहीं, उस समय मन में एक से एक अच्छे विचार आते हैं, और सुबह-सुबह ऐसे अच्छे काम करने का मन होता है कि जिन्हें देखकर सारी दुनिया कहे, वाह...!

याद पड़ता है कि मेरी माँ भोर के समय को जब पौ फटती है, वड्डवेला कहा करती थी। अब समय तो कोई छोटा या बड़ा नहीं होता। तो फिर वड्डवेले का क्या अर्थ? यही कि वह आशा और उम्मीदों का समय है। दिन का सबसे पवित्र समय, जब मन में अच्छाई का भाव कुछ ऐसे विकसित होता है, जैसे बगीचे में सैकड़ों फूल खिलते हैं। माँ ने, जब मैं बहुत छोटा था, अपनी मीठी खरखरी आवाज में वड्ड वेले का बड़ा सुंदर गीत भी याद कराया था, “उठ जाग सवेरे, चिड़ियाँ वी चुनगुन लाया ई...!” 

वह पूरा गीत तो याद नहीं, पर उसके सुंदर दृश्य आज भी मन में मँडराते से हैं। मेरा यह बालगीत ‘आज सवेरे’ भी इसी तरह वड्डवेले का गीत है, जिसमें सुबह-सुबह उठे बच्चे की खुशी छनछनाकर चारों ओर बिखर रही है। आइए, जरा आप भी उसका आनंद लीजिए—

आज सवेरे
काम किए मैंने कुछ अच्छे!
आज सवेरे गया पार्क में
देखा मैंने फूलों को,
फूलों को देखा तो भाई
समझ गया मैं भूलों को।
तय कर डाला मस्त रहूँगा
और हँसूँगा खिल-खिल-खिल,
मेहनत से हर काम करूँगा
दिखलाऊँगा कुछ बनकर।

और बच्चे ने जो सोचा, उसे बड़े अनूठे ढंग से कर भी दिखाया, “आकर होमवर्क कर डाला, फिर पौधों में पानी डाला,/ पापा बोले—देखो-देखो, ऐसे होते अच्छे बच्चे!”

अब जरा एक नटखट बच्चे चिंटू से मिलिए, जिसके दादा जी हमेशा लिखने-पढ़ने में ही लगे रहते हैं। उसे लगता है कि अरे, यह क्या तमाशा है! दादा जी के कमरे में तो बस किताबें ही किताबें हैं, और दादा जी बिल्कुल चुप, शांत उनके बीच घिरे बैठे हैं। अब नटखट चिंटू क्या करे? सो ठिनठिनाता हुआ, वह एक छोटी सी जिज्ञासा लेकर दादा जी के पास पहुँच गया। और फिर हुआ क्या? यह पूरा किस्सा मेरी कविता ‘दादा जी और चिंटू’ में है, जिसमें दादा और पोते का बड़ा मीठा संवाद भी शामिल है।

दादा जी भला नन्हे से चिंटू को क्या समझाएँ, कि किताबों की दुनिया में कितना आनंद समाया हुआ है। आखिर उन्होंने चिंटू के लिए भी एक किताब खोज निकाली, और बिना कुछ कहे ही, यह समझा दिया कि किताबों की दुनिया कितने मजे की दुनिया है, जिसमें बहुत सारी नई-नई, दिलचस्प बातें हैं—  

दादा जी ने ढूँढ़ निकाली
फोटू वाली एक किताब,
फूल छपे थे उसमें बढ़िया
चंपा, जूही और गुलाब।
देख-देख खुश होता चिंटू
ताली बजा-बजा हँसता है,
संग-संग हँस देते दादा जी
तब कितना अच्छा लगता है!

दूसरे चरण में लिखी गई मेरी बाल कविताओं में ‘अपना घर भी है गुड़ियाघर’ बहुत बच्चों ने पसंद की है। इसमें दो बहनों मिंकी और मीशा का किस्सा है, जो बहुत प्यारी-प्यारी सी थीं, पर आपस में लड़ती रहती थीं। एक दिन पापा उन्हें गुड़ियाघर दिखाने ले गए तो तरह-तरह की गुड़ियों का मेला देखकर वे हैरान रह गईं। 

इस पर पापा ने झट उन्हें शीशा दिखाया तो एक बड़ी सच्चाई भी सामने आ गई, जिसने मिंकी और मीशा दोनों को हैरान कर दिया—

पापा हौले से मुसकाए
दिखलाया झट उनको शीशा,
बोले—‘दो गुड़ियाँ तो हैं ही
एक है मिंकी, एक है मीशा।
लड़ना-भिड़ना छोड़ो तुम तो
घर अपना भी है गुड़ियाघर,
सभी कहेंगे प्यारा-प्यारा
देखो, यह कितना बढ़िया घर!’

कविता का अंत भी बड़ा प्यारा है, “सुनकर मिंकी-मीशा बोलीं—अब हम कभी नहीं झगड़ेंगे,/ अपना घर होगा गुड़ियाघर, मस्त रहेंगे, नहीं लड़ेंगे!”

पर इस दौर में ऐसी कविताएँ भी लिखी गईं, जिनमें जीवन की रोजमर्रा की सच्चाइयाँ थीं। ऐसी ही एक कविता थी, ‘ओहो चला गया पानी’। शहरों में पानी के आने का एक निश्चित समय होता है, और कभी-कभी बिजली नहीं होती, तो पानी भी असमय चला जाता है। मगर पानी के साथ तो पूरा जीवन जुड़ा है। इसलिए बिना पानी के हर चीज अधूरी रह जाती है—

देखो पानी की शैतानी,
ओहो! चला गया पानी!!
अभी बहुत थे काम अधूरे
घर भर को अभी नहाना था,
छुटकू कूद रहा है कब से
उसको पिकनिक पर जाना था।
अभी न पोंछा लगा फर्श पर
बर्तन जूठे पड़े हुए हैं,
कैसे पूजा-अर्चन होगा—
दादा जी भी कुढ़े हुए हैं।
भैया जी की शेव अधूरी
देख रहे हैं दाएँ-बाएँ,
कुछ गुस्से, कुछ गरमी में हैं
घूम रहे पापा झल्लाए।
मम्मी के बर्तन खड़के हैं—
पानी, पानी, पानी!
ओहा! चला गया पानी!!

पानी के यों अचानक चले जाने पर, हम सब पर क्या बीतती है, इसका एक जीवंत दृश्य भी इस कविता में नजर आ जाता है—

बूँद-बूँद था टपक रहा, पर
अब तो बिल्कुल डब्बा गोल,
नहीं पढ़ाई हुई अभी तक
अंग्रेजी, हिंदी, भूगोल।
कैसे होमवर्क अब होगा
मम्मी चीख रही है—रानी,
जा, पड़ोस से भरकर ले आ
थोड़ा सा पीने का पानी!

और जब सचमुच बिना पानी के अक्ल चकराने लगती है तो बच्ची यह कहे बिना नहीं रह पाती, “क्या-क्या करूँ, समझ ना आए, पानी बिना अक्ल चकराए,/ उस पर कड़ी धूप के चाँटे, सुबह-सुबह तबीयत अकुलाए।/ बिना नहाए शाला जाऊँ, तुम्ही बताओ नानी?/ ओहो! चला गया पानी!!”

*

इस दौर में लिखी गई मेरी बाल कविताओं में ‘ये झोंपड़ियों के बच्चे’ बिल्कुल अलग सी कविता है। एक यथार्थपरक कविता, जिसमें झोंपड़ियों में रहने वाले उन गरीब बच्चों की बात की गई है, जिनके दिल सोने के हैं, मगर कोई उसे देखना नहीं चाहता। अगर उन्हें मौका मिल जाए तो वे किसी से पीछे नहीं रहेंगे—

मैली झोंपड़ियों के हैं ये
मैले-मैले बच्चे,
उछल-कूदते, खिल-खिल हँसते
हैं ये कितने अच्छे।
मुझ जैसी इनकी दो आँखें
मुझे जैसे दो हाथ,
नहीं पढ़ा करते पर क्यों ये
कभी हमारे साथ?
नहीं हमारे साथ कभी ये
जाते हैं स्कूल,
क्यों इनके कपड़ों पर मम्मी
इतनी ज्यादा धूल?
ढाबों में बरतन मलते हैं 
या बोझा ढोते हैं,
हम स्कूल होते हैं 
तब ये चुप-चुप रोते हैं।
इनके बस्ते और किताबें 
मम्मी, किसने छीने,
वरना ये भी खूब चमकते 
जैसे नए नगीने।

कविता में संभ्रांत परिवार का एक बच्चा अभाव का जीवन जीने वाले अपने समवयस्क बच्चों को देखकर द्रवित हो उठता है, और उसके भीतर सवालों पर सवाल उठते हैं। झोंपड़ियों में रहने वाले ये मैले बच्चे भी तो उसी की तरह हैं। तो भला ये स्कूल क्यों नहीं जाते? उसके मन में इनके लिए हमदर्दी है, करुणा भी। इसलिए कविता के अंत में बच्चा वह बात कहता है, जिसे अगर बड़े भी गाँठ बाँध लें तो यह देश सचमुच स्वर्ग बन जाएगा, और खुशहाली की राह पर आगे बढ़ता नजर आएगा—

मम्मी, सोच लिया है पढ़कर
इनको खूब पढ़ाऊँगा,
ये पढ़कर आगे बढ़ जाएँ
इनको यही सिखाऊँगा।
ये भी भारत के बच्चे हैं
ये भारत की शान हैं,
झोंपड़ियों के हैं तो क्या है,
मन इन पर कुर्बान पर है।

अपनी बाल कविताओँ के इस चरण में भी मैंने देशराग की कविताएँ लिखीं, पर उनमें कुछ नयापन है। ‘होगा महका-महका देश’ पढ़कर पता चलता है कि देश को बनाने वाले तो असल में बच्चे ही हैं—

जब सब बच्चे अच्छे होंगे
होगा अच्छा अपना देश,
जब सब बच्चे सच्चे होंगे
होगा सच्चा अपना देश।
कुछ सपने लेकर आँखों में
नन्हे-नन्हे कदम बढ़ेंगे,
जहाँ जाएँगे उत्सव होगा
जहाँ जाएँगे फूल खिलेंगे।
सभी पढ़ेंगे, सभी लिखेंगे
लेकर उजले, प्यारे बस्ते,
फूलों जैसी मधुर किताबें
बस्ते होंगे वे गुलदस्ते!
महके हुए गुलाबों जैसा
होगा महका-महका देश,
पर दुश्मन की खातिर तब भी
होगा दहका-दहका देश!

जाहिर है, मेरी बाल कविताओं के दूसरे चरण में बहुत कुछ ऐसा है, जिसे शायद मैं कुछ अधिक करीने से और प्रभावी ढंग से कह पाया। शायद बाल कविता की कुछ नई संभावनाएँ भी मैं खोज पाया। 

[5]

सन् 2011 से मेरी बाल कविताओं का तीसरा चरण शुरू होता है, जिसमें मेरी बाल कविताओं में फिर एक नया मोड़ आता है, और उनमें कुछ अधिक खुलापन और विस्तार दिखाई पड़ता है। इस दौर की मेरी बाल कविताओं में जाहिर है, कल्पना को भी कुछ अधिक मुक्त उड़ान मिल जाती है, और कविता कुछ अलग और नई-नई सी राहों पर आगे बढ़ती है। खासकर कविता में एक से एक नए और अनोखे चरित्र नजर आते हैं, और खुद मेरा बचपन तथा बचपन में करीब से देखे गए चरित्र भी उनमें घुलने-मिलने लगते हैं। लिहाजा इस दौर में मेरी बहुत सारी बाल कविताएँ आत्मकथात्मक राह पर भी आगे बढ़ती हैं।

इस कालखंड में लिखी गई अपनी बाल कविताओं में ‘रोज कहानी’, ‘नाव अजब कुक्कू की’, ‘क्रिसमय की ये शाम’, ‘पेड़ नीम का’, ‘आना सांताक्लाज’, ‘परियों की शहजादी’, ‘होगी वर्षा झमझम होगी’, ‘काका जी’, ‘याद मुझे आते नाना जी’, ‘एक बादल से दोस्ती’, ‘गुलगुला’, ‘अपलम जी चपलम जी दिल्ली आए हैं’, ‘पर पहले हम हिंदुस्तानी’, ‘जाग रहा है चौकीदार’ मुझे खास तौर से पसंद हैं। इनमें ‘रोज कहानी’ कविता में कुक्कू कहानियों का शौकीन है और वह नानी से रोज नई कहनी सुनना चाहता है। पर जरा उसकी पसंद की कहानियाँ तो देखिए, जिन्हें नानी से सुनने के लिए वह ललक रहा है—

एक कहानी गिल्लू वाली
पहना जिसने चाँदी छल्ला,
एक कहानी जिसमें चिड़िया
खेल रही थी लेकर बल्ला।
एक कहानी जिसमें मोटा
बिल्ला रस्ता भूल गया,
एक कहानी जिसमें चूहा
खा-खा करके फूल गया।...

इससे पता चलता है कि बच्चे को अकसर ऐसी कहानियाँ अच्छी लगती हैं, जिनमें थोड़ा कौतुक, थोड़ा उतार-चढ़ाव हो, और जो सीधे-सीधे नहीं, थोड़ा घुमावदार रास्तों पर जाए। पर इसके साथ-साथ कहानी में रस भी हो। तभी वह बच्चे के मन को छू पाती लगती है।

इस कविता के नायक कुक्कू को भी लीक से हटकर रची गई कहानियाँ पसंद हैं। पर साथ ही उसकी शर्त यह भी है कि हर किस्से में कुक्कू हो और हर कहानी कुक्कू की ही हो। इस पर कुक्कू और नानी का यह मजेदार संवाद तो देखिए—

ढेर कहानी मुझको सुननी
कहो, सुनाओगी ना नानी,
पर हर किस्से में कुक्कू हो
कुक्कू की हो नई कहानी।
इस पर हँसकर बोली नानी
कुक्कू, यह तो है मनमानी,
आ संग बैठें, रोज बनाएँ
तभी बनेगी नई कहानी।

और कविता का अंत नानी और कुक्कू की अजब दोस्ती से होता है, जिसमें दोनों मिलकर कहानियाँ रचते हैं, “नानी-कुक्कू, कुक्कू-नानी, दोनों बुनते रोज कहानी, हर किस्से में कुक्कू होता, हर किस्से में होती नानी।”

कहना न होगा कि यह ऐसी कविता है जिसमें कविता और कहानी एकमेक होकर आते हैं। यानी कविता में कहानी है और कहानी में कविता।...बेशक कहानी और कविता फैल जाएँ तो दोनों एक-दूसरे को अपनी बाँहों में समेट लेते हैं! साथ ही, यह ऐसी कविता है, जिसमें मेरे बचपन की अनगिनत मीठी यादें छिपी हैं। बचपन में मेरा नाम कुक्कू था। यह भी सहज ही इस कविता में चला आया है। कुक्कू पर नानी के लाड़ का बिंब भी कुछ ऐसा है, जो हर बच्चे को भाता है।

ऐसे ही एक और कविता है, ‘नाव अजब कुक्कू की’। इसमें कागज की नाव पर बैठकर नानी के यहाँ जाने की बड़ी मजेदार कल्पना है—
सोच रहा हूँ, काश, नाव यह
नानी के घर जाए,
अजब तमाशा देख के नानी
पल भर को चकराए।
फिर बोलेगी, ओहो, अब मैं
समझ गई शैतानी,
नाव अजब यह कुक्कू की है—
हँस देगी झट नानी।

बच्चों की दुनिया में अगर कोई स्वर्ग है, तो वह नानी का घर ही है। नानी के घर में उसे जो लाड़-प्यार और मीठी सी सीख मिलती है, वह भला और कहाँ मिलेगी? जब भी नानी के घर जाओ, वह जैसे बाँहें खोले खड़ी होती है और देखते ही देखते बच्चे को अपनी प्यार भरी असीसों से नहला देती है। फिर भला कौन बच्चा होगा, जो नानी के घऱ जाने के लिए मचलता न हो!

और शायद यही कारण है कि बारिश में बच्चा जब बहते पानियों पर अपनी कागज की नाव छोड़ता है, तो वह कहीं और नहीं, सीधे नानी के घर जाती है। और नानी भी उसे देखकर निहाल हो जाती है। नानी के घर जाना जैसे हर बच्चे का सपना है। तो फिर कुक्कू की यह अजब-गजब सी नाव भी भला नानी के घर क्यों न जाए!

ऐसे ही कुछ वर्ष पहले एक बड़े से छतनार नीम के पेड़ पर लिखी गई कविता ‘पेड़ नीम का’ में भी प्रकृति और जीवन का ऐसा विस्तार है, जो एक लेखक के रूप में खुद मुझे आकर्षित करता है। कविता की शुरुआती पंक्तियाँ, जिनमें नाना जी द्वारा पेड़ लगाने का जिक्र है, किसी कहानी की तरह पाठकों के मन में बस जाती हैं। और सचमुच इस कविता को लिखते समय कहानी को कविता में गुनगुनाने सरीखा आनंद ही मुझे महसूस हुआ था। फिर कविता आगे बढ़ती है तो पूरी एक दुनिया उसमें समा जाती है—

आज मगर वह पेड़ नीम का
देखो कितना बड़ा हुआ,
कल तक नन्हा बिरवा था, पर
आज शान से खड़ा हुआ।
सब दिन पथिक किया करते हैं
इसकी छाया में आराम,
चैन पड़ा तो खुश हो कहते—
अजब तेरी माया है राम!
चलते-चलते दोपहरी में
लोग यहीं सब रुक जाते,
थोड़ा-सा सुस्ताते हैं, फिर
धीरे से आगे बढ़ जाते।
मंदिर जाते बूढ़ी दादी 
लोटे से पानी ढुरकाती,
बुद-बुद करके कुछ कहती है
ज्यों पिछली यादें गुहराती।

लगता है कि नीम का यह पेड़ केवल पेड़ नहीं है, बल्कि गली-मोहल्ले में सबका अपना है और सबका प्यार इस पर निसार होता है। इसीलिए जीवन इसके चारों ओर खिलखिला रहा है। यों नीम का यह पेड़ केवल पेड़ नहीं, बल्कि हर किसी के सुख-दुख का साथी बन जाता है, जिसके बिना जीवन की कल्पना करना ही मुश्किल है।
यह सचमुच एक बड़े आयाम की कविता है, और मुझे पसंद है।

[6]

इस दौर में कुछ चरित्रों पर आधारित कविताएँ भी लिखी गईं, जो किस्से-कहानियों वाले अंदाज में आगे बढ़ती हैं। इनमें दो मेरी अत्यंत प्रिय कविताएँ हैं। एक तो ‘काका जी’, और दूसरी ‘याद मुझे आते नाना जी’। इन कविताओं के काका जी और नाना जी, दोनों ही बड़े भव्य चरित्र हैं, और बच्चों से उनका प्यार तो जैसे बात-बात में छलछला सा रहा है। चलिए, पहले बच्चों के प्यारे दोस्त काका जी से मिलते हैं—

एक हमारे काका जी थे
खूब बड़ा था उनका घर,
हम सब बच्चे धमा-चौकड़ी
जहाँ मचाते थे अकसर।
साथ हमारे खेला करते
काका, जिनकी लंबी मूँछ,
साथ-साथ चलता था शेरू 
हिलती रहती जिसकी पूँछ।
शेरू के संग उछला करते
चिल्लाते सब हा-हा-ही,
साथ हमारे जी भर हँसते
पेट पकड़कर काका जी। 

बच्चों और काका जी के साथ-साथ शेरू की इस धमा-चौकड़ी से काकी कई बार चिढ़ भी जाती थीं, लेकिन—“रिझा लिया करती काकी को अपनी भोली-सी चतुराई, हँसती काकी, हँसकर कहती, नटखट है यह टोली भाई!”
और ‘याद मुझे आते नाना जी’ कविता में तो सचमुच मेरे ही नाना जी हैं। मैंने उन्हें देखा नहीं, पर मेरे बड़े भाई कश्मीरी भाईसाहब ने एक बार नाना जी को याद करते हुए, उनके भव्य व्यक्तित्व की जो एक झलक पेश की, वह आज भी मेरी आँखों के आगे ताजा है। और उसी ने नाना जी पर यह कविता भी लिखवा ली, जिसने बच्चों के साथ-साथ कई साहित्यकारों को भी रिझा लिया। 

मैं समझता हूँ, आप भी ऐसे प्यारे नाना जी से मिलने के लिए बेकरार होंगे। तो चलिए, मैं आपको उनसे मिलवा देता हूँ—

चलो सुनाता हूँ एक किस्सा
प्यारे नाना जी थे मेरे,
लंबी-चौड़ी काया उनकी
दिन भर खूब लगाती फेरे।
बड़ी दूर जंगल-पर्वत से
घोड़ा दौड़ाते आते थे,
आए नाना, आए नाना—
हम बच्चे तब चिल्लाते थे।...

और अब नाना जी के प्यार की एक झलक भी देख लीजिए, जिससे हर बच्चा उनका मुरीद हो उठता है— 

हम बच्चों पर प्यार लुटाते
गोदी में लेकर नाना जी,
और सुनाते किस्से जिनका
बड़ा गजब ताना-बाना जी।
नाना जी, अब चिज्जी दे दो
नाना जी, अब हमें घुमाओ,
नाना जी, अब ताना जी का
किस्सा फिर से हमें सुनाओ!
बड़ी गजब फरमाइश करती
हम बच्चों की बाँकी टोली,
नाना जी पर नाना जी थे
हँसकर भरते सबकी झोली।

कविता के अंत में घेली नानी का भी जिक्र है। मेरी नानी को सब घेली नानी ही कहते थे। घेली नानी और नाना जी का यह हँसता हुआ जीवंत चित्र ऐसा है, कि मुझे उसमें पूरा जीवन छलछलाता नजर आता है, “घेली नानी मुझे दिखातीं, देखो, दरिया ऐसे बहता,/ झरने यों झर-झर झरते हैं, जीवन तो बस चलता रहता।/ नानी के संग हँसते नाना, साथ-साथ उनका वो घोड़ा,/ पार समय की चट्टानों को करता था जो सरपट दौड़ा।”

‘गुलगुला’ भी इसी दौर की एक मस्ती भरी कविता है, जो मुझे खासी पसंद है। सब जानते हैं कि गुलगुला घरों में बनता है, और जब वह कड़ाही के गरम तेल से छुन-छुन करके बाहर निकलता है, तो उसे गरम-गरम खाने का मजा ही कुछ और है। मगर इस कविता का गुलगुला जरा शरीर और नटखट है, जो कड़ाही से निकलते ही भाग खड़ा होता है। फिर तो कुछ न कुछ तमाशा होना ही था, सो हुआ—

मम्मी जी ने छुन-छुन करके
एक बनाया गुलगुला,
बड़े मजे का गुल-गुल, गुल-गुल
मीठा-मीठा गुलगुला।
गरम-गरम था, नरम-नरम था
गुलगुला जी, गुलगुला,
मम्मी बोलीं, खाकर देखो
कैसा है यह पुलपुला!
मैं बोला, झटपट खाऊँगा
आ जा, आ जा गुलगुला,
ना-ना, ना ना, मैं ना आऊँ—
कहकर भागा गुलगुला।
ओहो, झटपट निकला घर से
दौड़ा-दौड़ा गुलगुला,
बीच सड़क पर उछल-कूदता
दौड़ा जाता गुलगुला।

पता नहीं, कहाँ-कहाँ की सैर करने के बाद गुलगुला एक पेड़ की डाल पर बैठकर आराम कर रहा था। बच्चा वहाँ भी जाकर उसे मनाने की कोशिश करता है, तो गुलगुला फिर से दौड़ लगा देता है। इस पर बड़ा अनोखा दृश्य देखने को मिलता है—

सुनकर हँसता-हँसता फिर से
भागा-भागा गुलगुला,
पीछे-पीछे मैं था भाई
आगे-आगे गुलगुला।

इस दौर की मेरी बाल कविताओं में बीच-बीच में एक से एक दिलचस्प चरित्र उभरते हैं। उनमें नन्हा-मुन्ना सा हँसोड़ गुलगुला शायद सबसे अलग है, और बहुत प्यारा भी। मुझे तो यह कविता लिखते हुए महसूस हुआ कि इसमें बचपन में माँ और मानी से सुनी हुई कहानियों का-सा रस है। इसलिए ‘गुलगुला’ कहानी भी है, कविता भी।

कविता में जब कभी कहानी आती है, तो उसमें एक अलग ही प्रभाव दिखाई पड़ता है। यह गोलू-मोलू गुलगुला भी ऐसा ही एक अद्भुत कैरीकेचर है, इसलिए मुझे बहुत प्रिय है।

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सच तो यह है कि मैंने बाल कविताएँ लिखीं तो बदले में इन बाल कविताओं ने मुझे जीवन दे दिया और किसी अगाध और निस्सीम समंदर से भी बढ़कर खुशियाँ और आनंद। यह न होता तो न मैं बाल कविता का इतिहास लिख पाता और न बच्चों के लिए कहानियाँ, उपन्यास, नाटक, लेख और बड़े-बड़े आलोचनात्मक लेख, जिनमें से एक-एक लेख को लिखने में कभी-कभी तो महीनों लग गए। पर कोई सच में देखे तो इनके पीछे भी असल में तो वही सुख, वही आनंद है, जो बच्चों के लिए कोई ढंग की कविता लिखने से हासिल होता है और देखते ही देखते हमें भीतर तक रस से सराबोर कर देता है।

हो सकता है कि कोई मेरी बाल कहानियाँ पढ़े तो उसे उनमें कहानी के साथ-साथ कविता भी नजर आ जाए। या कोई मेरे बाल उपन्यास पढ़े तो उसे लगे, कि वह उपन्यास के रूप में कविता ही पढ़ रहा है। कुछ न कुछ तो उनमें ऐसा है ही, जो उन्हें औरों से भिन्न बनाता। और वह शायद यह कि वह एक कवि का लिखा हुआ गद्य है, जिसमें कविता न हो, ऐसा हो नहीं सकता।

लगता है, मैं कुछ भी लिखूँ, बाल साहित्य की किसी भी विधा में—उसमें चाहे-अनचाहे कविता तो होगी ही और वही बार-बार मुझे कलम उठाने के लिए भी प्रेरित करती है। 

कहना न होगा कि मेरी बाल कविताओं में जीवन के अलग-अलग रंग हैं, बचपन की मस्ती और आनंद भी। और साथ ही बदलते हुए वक्त में लगातार अकेले होते बच्चे की परेशानियाँ, शिकवे-शिकायतें और वे छोटे-बड़े दुख भी, जिनमें बाल कविता एक राजदार दोस्त की तरह बिल्कुल उसके साथ खड़ी है।

अगर वय की बात करें तो पाँच-छह बरस के नन्हे-मुन्ने चुनमुन से लेकर पंद्रह-सोलह बरस के किशोर तक मेरी बाल कविताओं के पाठक हैं, जो बड़ी उत्सुकता से इनके निकट जाते हैं, और ये कविताएँ आनंद से उनकी झोली भर देती हैं। साथ ही वे इनमें खुशियों का ऐसा खजाना पा लेते हैं, जो उनके पूरे व्यक्तित्व को चमका देता है।
फिर एक गहरे राज की बात और। और वह यह कि मेरी बाल कविताओं में कहीं न कहीं मेरी आत्मकथा भी छिपी है। इसलिए कि मेरे बचपन की बहुत सारी अबोध छवियाँ और गहरी-गहरी सी अनुभूतियाँ भी मेरी बाल कविताओं में उतर आई हैं। और आश्चर्य, उन्हें आज के बच्चों ने भी पसंद किया है। इससे इतना जरूर पता चलता है कि बचपन चाहे कल का हो या आज का, बचपन तो बचपन है। समय के साथ बहुत कुछ बदल जाने पर भी बचपन का नटखटपन, कौतुक और जिज्ञासाएँ तो वही रहती हैं, जो अकसर मेरी चंचल बाल कविताओं में ढलकर सामने आती हैं, तो बच्चों के साथ-साथ बड़ों को भी लुभा लेती है। और मेरे खयाल से एक अच्छी बाल कविता की कसौटी ही यही है कि वह बच्चों और बड़ों दोनों को अपने साथ बहा ले जाए।

शायद यही कारण है कि मेरी बाल कविताएँ बच्चों को तो भाती ही हैं, पर साथ ही बड़ों को भी रिझाती हैं। बच्चों के मम्मी-पापा या दादा-दादी भी उन्हें पढ़ते हैं, तो फिर से अपने बचपन में पहुँच जाते हैं। इससे वे बच्चों के अंतरंग दोस्त बनकर उनके सुख-दुख और परेशानियों को कहीं अधिक करीब से महसूस कर सकते हैं।

मेरी बाल कविताएँ बच्चों और बचपन की दोस्त कविताएँ बनकर, यह भूमिका निभा पाती हैं, एक लेखक के रूप में मेरे लिए इससे बड़ा सुख और संतोष कुछ और नहीं हो सकता। 
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प्रकाश मनु, 545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008,
चलभाष: + 91 981 060 2327,
ईमेल: prakashmanu333@gmail.com

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