नारी जीवन की विषमताओं और संघर्ष के साथ नारी सशक्तीकरण की पक्षधरता करता उपन्यास: तारिणी

समीक्षक: दिनेश पाठक ‘शशि’

28, सारंग विहार, मथुरा-6; चलभाष: +91 987 063 1805; ईमेल: drdinesh57@gmail.com

पुस्तक: तारिणी (उपन्यास)
ISBN: 978.93.92380.53.2
लेखिका: पद्मश्री डॉ. उषा यादव
पृष्ठ: 280, प्रकाशन वर्ष: 2022
मूल्य: ₹ 595 रुपये
प्रकाशक: अनन्य प्रकाशन, दिल्ली-32

हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं में साधिकार लेखनी चलाने वाली, प्रखर चिंतक, शिक्षाविद् एवं विदुषी, साहित्यकार पद्मश्री डॉ. उषा यादव जी का उपन्यास “तारिणी” एक ऐसा उपन्यास है जो ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता’ वाले देश में अधिकांश पुरुष वर्ग द्वारा नारी जाति की कमजोर स्थिति का लाभ उठाने वालों के यथार्थ स्वरूप का, उनकी लोलुपता का, उनके उजले तन के अन्दर स्थित काले मन का खुलासा करता नजर आता है तो वहीं सच्चे प्रेम का शाश्वत उदाहरण भी प्रस्तुत करता है।

इस उपन्यास की मुख्य पात्र शालिनी है जो माता-पिता की मृत्यु उपरान्त अपने चाचा-चाची के रहमोकरम पर जीवन यापन करने को बाध्य है।

15 वर्षीया अनिंद्य सुन्दरी शालिनी के सौन्दर्य और चाची के दुर्व्यवहार को सहते हुए भी चुपचाप सहन करने की क्षमता से प्रभावित, गली में एक-दो मुलाकात होने पर पड़ोस का एक युवक शालीनता से उसे अपनी जीवन संगिनी बनाने का प्रस्ताव रखता है जिसे शालिनी विनम्रता से यह कहकर टाल देती है कि वह एक अनाथ लड़की है जो अपने चाचा-चाची के घर का काम करके उनके टुकड़ों पर पल रही है।

किन्तु सुखद आलम्बन के फलस्वरूप युवा हृदयों में प्रथम प्रेम का अंकुर जब फूटता है तो सारी विषमताओं को बिसराकर सुखद अनुभूति होती है। शालिनी के साथ भी यही हुआ-
“जीवन में पहली बार शालिनी नामक किशोरी को अपनी अहमियत पता चली थी। चाचा की बेरुखी, चाची की डाँट, चचेरी बहन मंजरी का बड़बोलापन इस वक्त उसके दिल को ठेस पहुँचाने में असफल थे। हर उम्र के छिछोरे पुरुषों की लार टपकाती आँखों का खौफ भी जाने किन अतल गहराइयों में दब गया था। सागर-मंथन से बाहर निकलने वाले इस अमृत-कलश की बूंद-बूंद उसके सर्वांग में समाहित होती जा रही थी।”

“प्रेम किस चिड़िया का नाम है, भले ही न जानती हो, पर अपने जीवन में मिला यह पहला विवाह-प्रस्ताव उसे बहुत-बहुत सुहाया।” (पृष्ठ-21)

दिनेश पाठक ‘शशि’
गली की लड़कियों में नाक छिदवाने के शौक को देखकर, अपनी नाक छिदवाने की किशोरवय इच्छा से उसने अपनी एक पड़ोसिन सहेली सीमा से सलाह ली तो सीमा ने ईर्ष्यावश अपमान कराने के उद्देश्य से उसे शहर के बड़े जौहरी सेठ रतनलाल के आभूषण भण्डार पर भेज दिया। किन्तु आभूषण भण्डार का मालिक विधुर अशोक भी शालिनी की व्यथाकथा और सौन्दर्य पर इतना मोहित हुआ कि उसने शालिनी की नाक तो छेदी ही उसमें पचास हजार की कीमत की लौंग भी पहना दी साथ ही उसके समक्ष प्रणय निवेदन प्रस्तुत कर दिया जिसे शालिनी ने समय के निर्णय पर छोड़ दिया।

विदुषी लेखिका ने उपन्यास में कई ऐसे मोड़  दिए हैं जो पाठक की उत्सुकता बढ़ाने में उत्प्रेरक का कार्य करते हैं।

शालिनी के हृदय में अपने प्रथम प्रेम, युवा पड़ोसी अमित के प्रति जो कोमलभाव है, जो अमिट विश्वास और आकर्षण है, वह अपने से 30 वर्ष बड़े आभूषण भण्डार के मालिक विधुर अशोक के प्रति कैसे सम्भव है किन्तु अपनी पुत्री का विवाह एक विकलांग युवक के भाई के साथ करने हेतु शालिनी का विवाह उस विकलांग युवक के साथ चुपके से करा देने के चाची के कुचक्र  को छुपकर सुन लेने के बाद न चाहते हुए भी शालिनी को अशोक के प्रस्ताव को स्वीकारना पड़ा। वह नहीं चाहती थी कि आई.ए.एस. की तैयारी कर रहे अमित के साथ भागकर विवाह करके वह अमित को किसी संकट में डाले-
“तय था, चाचा-चाची की दुरभिसंधि सुनते ही अमित ढाल बनकर उसे बचाने के लिए खड़ा हो जायेगा। पर क्या बात यहीं खत्म हो जायेगी? ...नहीं, नाबालिग भतीजी को बहका-फुसलाकर शादी रचाने के जुर्म में चाचा उसे पुलिस-थाने तक खींच ले जायेंगे। कानूनी दाव-पेच में फंसा देंगे। एक बार जेल जाने के बाद उस मेधावी युवक का पूरा भविष्य चौपट हो जायेगा।” (पृष्ठ-43)

पहले से एक पुत्री के पिता 46 वर्षीय विधुर अशोक ने 16 वर्षीया शालिनी के सौन्दर्य से मोहित होकर उससे विवाह कर तो लिया किन्तु पुत्र की जगह शालिनी ने एक-एक कर सात कन्याओं को जन्म दे दिया तो वह कुंठित हो उठा। अपने कुटिल कर्मचारी की चालों में फंसकर शराबी और निकम्मा होकर अपने व्यवसाय को चौपट ही नहीं किया, घर के खर्च चलाना तक भी मुश्किल हो गया तो एक दिन चुपके से शालिनी से उत्पन्न अपनी सातों पुत्रियों को अनाथालय में छोड़ आया। शालिनी को चरित्रहीन बताते हुए अब वह गाली-गलौच व  मारपीट भी करने लगा तो शालिनी ने वह घर छोड़ दिया।

सीमा के कहने पर उसके पति  ने शालिनी को अपने मालिक टिम्बर मर्चेंट अरविन्द से मिलवाया तो अरविन्द भी 29 वर्षीया शालिनी के रूप-सौन्दर्य पर रीझ उठा किन्तु प्रत्यक्ष रूप से उसने शालिनी की सहायता के बहाने अपना मन्तव्य पूरा करने के लिए शालिनी को अलग से एक फ़्लैट दिलवा दिया। उसकी सातों पुत्रियों को भी अनाथालय से ले आया और फिर पुत्रियों के भविष्य संवारने के नाम पर शालिनी के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रख दिया।

“अरविन्द जी, मैं सड़क पर खड़ी थी। आपने मुझे रहने के लिए फ़्लैट दिया, मेरी बच्चियों से मुझे मिलाया। बहुत एहसानमंद हूँ  आपकी। पर अचानक यह विवाह प्रस्ताव?” (पृष्ठ-113)

विदुषी लेखिका डॉ. उषा यादव जी ने इस बीच की सभी घटनाओं का, अनाथालय आदि का विस्तृत सजीव चित्रण किया है जो पाठक-मन को आगे और आगे उपन्यास पढ़ते जाने के लिए बाध्य करता है।

नारी-मन के अन्तर्द्वन्द्व और फिर ममता के लिए अपने बलिदान को गौण सिद्ध करती एक नारी, एक माँ की आत्मा ने अरविन्द के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया-
“एक मन था जिसे वह पहले ही अमित को दे चुकी थी। दूसरा तन था, जिसे वह ब्याह के बाद अपने पति अशोक को सौंप चुकी थी। अब इस तीसरे प्रस्ताव के तहत, अरविन्द को देने के लिए उसके पास था ही क्या?”

“बेटियाँ इस वक्त उसकी प्राथमिकता थीं और इन बेटियों का घटाटोप अंधेरे में गुम होता भविष्य उसे स्पष्ट नजर आ रहा था। इस अंधेरे को मेटने और वहाँ रोशनी के चंद कतरे भरने के लिए क्या उसे अपनी अंतरात्मा को मारना होगा? शायद हाँ। बेटियाँ यदि पढ़-लिखकर कुछ बन गईं तो उसकी देह और मन पर लगे सारे दाग खुद-ब-खुद धुल जायेंगे।” (पृष्ठ-113)

किन्तु मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा ही हमेशा तो नहीं होता। एक दिन जब अरविन्द ने अपने साथ लाये दो आदमियों को शालिनी को परोसना चाहा तो बेटियों का भविष्य उज्ज्वल बनाने के जिस उद्देश्य को सोचकर शालिनी ने अरविन्द के साथ विवाह किया था वह दिवास्वप्न लगने लगा- 
“सेठ रतनलाल के बेटे ने उसके रूप-पारावार की उद्दाम लहरों को जीतने में खुद को असफल भले पाया हो, पर उस सौन्दर्य पर किसी की दृष्टि कभी बरदाश्त नहीं की। रहा अमित, वह तो इस निधि को पलकों की मंजूषा में मूंदकर रखना चाहता था। तो क्या यह अरविन्द ही गलीच साबित हुआ? मन के भीतर झन्न से कुछ टूट गया था।” (पृष्ठ-124)

पहली मुलाकात में ही शालिनी को लेकर अरविन्द  के दिमाग में जो कुटिल योजनाएँ बनी थीं वह उन्हीं की रूपरेखा तैयार करने में लगा था। इसीलिए उसने अपनी पहली पत्नी से उत्पन्न अपने रूठे हुए पुत्र को भी शामिल करने के लिए दिल्ली से आगरा बुला लिया था किन्तु जब शालिनी ने उसपर अपनी पुत्रियों की शिक्षा आदि के समुचित प्रबन्ध हेतु उससे पचास हजार रुपये महीना देने के लिए दबाव बनाया तो अरविन्द ने अपना वर्कशॅाप दिखाने के बहाने शालिनी और बड़ी बेटी खुशबू को कुल्हाड़ी से कटवाकर और शालिनी के गर्भ से उत्पन्न अपने पुत्र कान्हा की गर्दन मरोड़वाकर खत्म करा दिया-
“जैसा आपका हुक्म। कहने के साथ ही मैकू के सिर पर फिर पागलपन हावी हो गया। फर्स पर एक मुचड़े कपड़े की तरह पड़े हुए कान्हा को उसने फौरन उठाया और गला मरोड़ दिया।....... (पृष्ठ-172)

इस उपन्यास को पढ़ने वाला कोई भी पाठक घटनाक्रम को गढ़ने की विदुषी लेखिका डॉ. उषा यादव जी की अद्भुत कल्पनाशक्ति की दाद दिए बिना नहीं रह सकता। समूचे उपन्यास की एक-एक घटना इस तरह प्रस्तुत की गई है कि पाठक वर्ग के समक्ष विभिन्न रसों के साथ उस घटना का साक्षात् चित्र उपस्थित हो उठता है। मनुष्य के समूचे अस्तित्व को हिला देने वाली लोमहर्षक और वीभत्स सत्य घटनाओं को कल्पना के परिधान पहनाकर डॉ. उषा यादव जी ने अपनी लेखनी से नारी की विवशता, उसके ऊपर होते शारीरिक और मानसिक उत्पीडन को अभिव्यक्ति प्रदान करके सामाजिक चेतना जाग्रत करने का स्तुत्य प्रयास किया है-
“अब यदि पति नामधारी जीव उसे अपने दोस्तों के बीच परोसने की कोशिश करेगा, उसके पूर्व पति से जन्मी बेटी पर बुरी निगाह रखेगा और उसकी सभी सातों बेटियों की पढ़ाई-लिखाई के प्रति उदासीन रहेगा, तो वह विक्षुब्ध क्यों न होगी?” (पृष्ठ-174)

माँ, एक बहन और भाई की हत्या हो जाने के बाद शेष छहों बहनों के उस फ़्लैट में बन्द रहते हुए शारीरिक और मानसिक उद्द्वेलन का अति सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक चित्रण विदुषी लेखिका ने किया है। इस दौरान मीडिया कर्मियों की कार्यशैली, एन.जी.ओ. वालों की झूठी सहानुभूति, शातिरों की अलग-अलग तरह की योजनाओं और मनचलों के द्वारा मौके का इंतजार आदि का विस्तृत उल्लेख अपनी लेखनी से लेखिका ने किया है-
“आज न सही कल, ब्यूटी पार्लर, मसाज सेंटर और अन्यान्य नामों से देह-व्यवसाय के फलते-फूलते धंधे में इन लड़कियों को उतारना ही है। इन छह खूबसूरत किशोरियों के बल पर वह आगरा जैसे शहर में मुम्बई की मादक रातों का तिलस्म न खड़ा कर सका तो मजा ही क्या रहा! (पृष्ठ-225)

“दुःख की घड़ी में बच्चियों को यह नाटक बड़ा अशोभन प्रतीत हुआ। तिहरे हत्याकांड के खुलासे के बाद से वे हर पल समाज के जिस दोहरे चरित्र और लोगों के ओड़े हुए मुखौटों को देख रही थीं, क्या आम हालात में इनकी झलक पाना सम्भव था?” (पृष्ठ-203)

 लेखिका ने न्यायालयों द्वारा शीघ्र न्याय न मिलने को भी अन्याय की श्रेणी में रखा है तथा आये दिन अखबारों के पृष्ठों पर छपने वाले नाबालिग बच्चियों के साथ होते रेपकांडों का जिक्र करते हुए समाज के वीभत्स सत्य की कटु आलोचना की है।

फ़्लैट में बन्द छहों बहनों के मन का भय आखिर कैसे समाप्त हुआ? हुआ भी या नहीं और फिर द्रौपदी की तरह उनकी लाज बचाने के लिए किसी ने चीर बढ़ाया या नहीं? यह रहस्य तो पाठकों को पूरा उपन्यास पढ़ने के बाद ही पता चलेगा।

 विदुषी डॉ. उषा यादव जी ने पूरे उपन्यास को सम सामयिक परिवेश से जोड़ते हुए बड़े ही तथ्यपरक उदाहरणों के साथ आगे बढ़ाया है।

माँ की ममता का पूर्ण रूप और विवशता का बहुत ही हृदय विदारक रूप मानव मन की पारखी डॉ. उषा यादव जी ने इस उपन्यास में प्रस्तुत किया है।

280 पृष्ठीय इस उपन्यास में शिल्प की कसावट और प्रयुक्त भाषा-शैली ऐसी है कि पाठक पूरा उपन्यास पढ़ लेने के बाद ही छोड़ता है। पूरे उपन्यास में घटनाक्रम इस तरह पिरोये हुए हैं कि पाठक की जिज्ञासा उसे पढ़ने के प्रति निरन्तर बढ़ती ही जाती है।

उपन्यास का मुद्रण त्रुटिहीन और प्रयुक्त कागज स्तरीय है। हिन्दी साहित्य जगत में उपन्यास प्रसिद्धि के शिखर छूने में सफल होगा, ऐसी आशा है।

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