प्रकाश मनु के बाल नाटकों का बहुरंगी संसार

- अशोक बैरागी


प्रकाश मनु
बाल साहित्य के वरिष्ठ लेखक और बच्चों के चहेते कवि-कथाकार, प्रकाश मनु जी का साहित्यिक चिंतन और सृजन फलक बहुत विराट और भव्य है। इस पर एक साथ विभिन्न दृष्टियों से विचार-विमर्श और मूल्यांकन किया जा सकता है। मनु जी एक साथ कवि, कहानीकार उपन्यासकार, नाटककार, आलोचक, संपादक, पत्रकार और चिंतक हैं। उनके साहित्य की बुनावट में केवल विचार ही प्रेरक नहीं हैं, जीवन के निजी अनुभव भी हैं। वैसे भी जीवन की गहन और घनीभूत संवेदनाओं के बिना ऐसा सुंदर और अतुलनीय सृजन संभव ही नहीं है। मनु जी का सृजन और संवेदना आधुनिक जीवन दृष्टि पर टिकी हुई है। इन्होंने बच्चों और बड़ों के लिए समान अधिकार से लिखा है और बड़े अनोखे ढंग से लिखा है। पूर्ण मौलिकता से लिखा है। उसमें नवीनता है। नवाचार हैं। नई प्रवृत्तियाँ हैं। साथ ही उसमें परंपरागत और प्रगतिशील मूल्यों का समन्वय है। दोनों ही क्षेत्रों में उन्होंने परंपरागत रूढ़ियों को तोड़ा है और बहुत अलग तरह से अपनी पहचान बनाई है।
सच तो यह है कि मनु जी अपने लेखन में हमेशा अलग परिपाटी बनाकर चले हैं। उनकी भाषा-शैली और भाव-संवेदन बिल्कुल निजी और मौलिक हैं। पर बाल साहित्य के क्षेत्र में इन्हें जो सम्मान और पहचान मिली, वह दूसरे साहित्य की अपेक्षा इक्कीस है। इसके साथ ही बाल साहित्य की परिधि में गुणात्मक वृद्धि हुई है और शायद इनका मन भी यहाँ अधिक रमा है। जो आत्मीय खुशी, सुकून और अंतस की उज्ज्वलता उऩ्हें यहाँ मिली, वह अऩ्यत्र दुर्लभ है। फिर एक खास बात यह भी है कि मनु जी का अधिकांश बाल साहित्य इनके अपने जीवन से अनुप्रेरित है।
बाल पाठकों के लिए कविता, कहानी और उपन्यासों के साथ-साथ बाल नाट्य लेखन करके मनु जी ने बहुत उपकार किया है। नाटकों की दुनिया में उनका मन खूब रमा है और उन्होंने बच्चों के मन और उनके सपनों की सतरंगी दुनिया के रेशे-रेशे को खोलकर लिखा है। वह भी बिल्कुल बच्चा बनकर। खेलते, मस्ती करते, हँसते-गाते, शिकायत और मान-मनौव्वल करते लिखा है। इसीलिए इनके नाटक बच्चों के मन से जुड़कर एक ऐसा आत्मीय रिश्ता बना लेते हैं कि एक बार पढ़ने के बाद बच्चे इन्हें भूलते ही नहीं। अपनेपन की सुवास ही उन्हें चुपके-चुपके प्रेम और अच्छाई के रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करती है। इन नाटकों को पढ़ते हुए उनके हृदय में जैसे उजाला सा हो जाता है और मानवीय संवेदना उन्हें सरल, उदार और भावनाशील बना देती है।
अशोक बैरागी
मनु जी के नाटकों में बचपन की अबोधता, सादगी, सरलता और जिज्ञासा की जो अमूल्य निधियाँ बिखरी पड़ी हैं, उन्हें आत्मसात करने और इस अमूल्य धरोहर को सहेजने के लिए हमें इसके भीतर गहरी संवेदना के साथ प्रवेश करना पड़ेगा। दूसरी बात यह कि मनु जी का अपना व्यक्तित्व भी जिज्ञासा और संवेदना से परिपूर्ण हैं। हालाँकि वे बड़े सहज भाव से बोलते हैं और विषय के प्रति गंभीर भी रहते हैं। परंतु उसमें एक अपनेपन की मिठास है। उसमें कोई औपचारिकता नहीं होती। यह भी उनके व्यक्तित्व की एक खासियत है कि वे कोई भी काम करते हैं तो मन से करते हैं, दिखाने या कहने भर के लिए नहीं करते। जीवन और व्यक्तित्व की यही सरलता, सादगी और सीधापन, तथा हर प्रकार के छल-छद्म और दिखावे से दूर रहकर अपने काम में लीन रहना, ये सब चीजें मनु जी के साहित्य में भी ज्यों की त्यों उतर आई है। उनका कहानी कहने का लहजा इतना सरस, कौतुक भरा और स्वाभाविक है, मानो बच्चों का कोई प्रिय दोस्त उनसे अपने बचपन को साझा कर रहा हो। या फिर अपने जीवन की सबसे अनमोल चीजें उन्हें बाँट रहा हो। 
इसी तरह मनु जी अपने नाटकों में कहीं भी सीधे-सीधे उपदेश या शिक्षा नहीं देते, बल्कि दोस्ताना लहजे में ही बातों-बातों में वह सब कह जाते हैं, जो उन्हें कहना होता है। इनके उद्देश्यपूर्ण नाटक दीपक की लौ की तरह हैं, जिसका उजाला तो दिखाई देता है पर उसकी ऊष्मा को हम केवल महसूस कर सकते हैं। इनकी सब नाट्य रचनाएँ कौतुक भरे खिलौनों की तरह लगती हैं। अद्भुत किस्सागोई और भाषा की सरलता से ही ये अनूठी रचनाएँ बच्चों के मन में रच-बस जाती हैं। यही कौशल एक सफल नाटककार के रूप में उन्हें शीर्ष सम्मान के सिंहासन पर विराजमान करता है।
मनु जी के नाटकों के कथानक, संवाद, भाषा, परिवेश और उद्देश्य एक सहज गति और लय में अपनी रोचकता के साथ चलते हैं। कहानी सीधे-सहज ढंग से चलती है, कोई ज्यादा घुमाव-फिराव उसमें नहीं होता। बच्चे उनकी रचनाओं के केंद्रीय पात्र हैं। जहाँ एक तरफ बच्चों के दिल-दिमाग में दुनिया भर की दुख, तकलीफ, अभाव, गरीबी और पीड़ाएँ हैं, वहीं उनकी आँखों में नई दुनिया के सुनहरे सपने जगमग करते हैं। ये खिलंदड़े, अल्हड़, मस्तमौला बच्चे खेल-खेल में बहुत कुछ ऐसा कह जाते हैं, जो कभी भूलता नहीं है। इस तरह अपने रसपूर्ण, चुटीले संवादों से ये पाठकों के मन में सदा-सदा के लिए बस जाते हैं। कहीं ये शरारती-मस्ताने बच्चे हास्य-विनोद द्वारा अपने अभिनय की धाक जमा लेते हैं, तो कहीं अपने भोलेपन और कौतुक से बड़ों को भी दाँतों तले अंगुली दबाने को विवश कर देते हैं। लेकिन कहीं-कहीं अपने दुख-तकलीफों से संघर्ष करते हुए, वे अपनी करुणा से पाठक के हृदय को भिगो भी देते देते हैं।
बच्चों की दुनिया के आसपास बुने गए ये नाटक बाल अंतर्मन की भीतरी तहों को खोलते हैं, तो साथ ही उनकी उलझनें सुलझाकर एक सीख भी दे जाते हैं। मनु जी के नाटकों का वैचारिक कैनवस बहुत ही विस्तृत और विविधता भरा है। उन्होंने ऐतिहासिक, पौराणिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और आधुनिक जीवन से जुड़े, हास्य और कौतुक भरे बड़े ही रसीले नाटक लिखे हैं। कुछ नाटक बड़े साहित्यकारों के जीवन पर आधारित हैं, कुछ लोक कथाओं पर आधारित नाटक है और कुछ नाटक उनके व्यक्तिगत जीवन, विशेषकर स्कूली जीवन आधारित हैं। इन नाटकों के जरिए मनु जी यह प्रयास करते हैं कि बच्चे अपने आसपास की दुनिया के दुख-दर्द और परेशानियों को जानें और उनके मन में भी यह विचार आए कि आखिर एक सुंदर दुनिया बनाने के लिए वे भी तो कुछ कर सकते हैं। कुछ प्रयोगात्मक नाटक तो बहुत ही बेहतरीन और लाजवाब हैं, जो बच्चों के मन की कोमल छवियाँ प्रस्तुत करते हैं। यों मनु जी ने अपने बाल नाटकों के जरिए बचपन को खुशहाल बनाने, आधुनिक और प्रगतिशील मूल्यों को बच्चों के मन में उतारने, जीवन में आने वाली हर छोटी-बड़ी मुसीबत का साहस के साथ सामना करने की सामर्थ्य पैदा करने और साथ ही, बच्चों के जीवन को सृजनात्मक बनाने का सफल प्रयास किया है।
यदि इन नाटकों को मंच पर खेला जाए तो बच्चों के होंठों पर बड़ी ही आनंद भरी मुसकान थिरकती नजर आएगी। और बच्चे खेल-खेल में वह सब सीख भी जाएँगे जो उनके लिए जरूरी है। ऐसे प्रयासों से बच्चों के अंदर दबी रचनात्मक प्रतिभा, कल्पना शक्ति और संवेदना को खुलकर सामने आने का मौका मिलता है।
अगर मैं नाटक की पुस्तकों की बात करूँ तो ‘मुनमुन का छुट्टी क्लब', ‘इक्कीसवीं सदी के बाल नाटक', ‘बच्चों के अनोखे हास्य नाटक,' ‘बच्चों के रंग-रंगीले नाटक,' ‘बच्चों को सीख देते अनोखे नाटक', ‘बच्चों के श्रेष्ठ सामाजिक नाटक', ‘बच्चों की श्रेष्ठ हास्य एकांकी' आदि प्रमुख पुस्तकें हैं, जिनमें प्रकाश मनु जी के दर्जनों नाटक बालमन के साथ-साथ बड़ों से भी धौल-धप्पा करने को तैयार नजर आते हैं।
यों बाल नाटकों के जादुई प्रभाव के विषय में स्वयं मनु जी एक जगह लिखते हैं, “नाटक बच्चों के लिए एक ऐसी जादुई कला है, जो उन्हें सदियों से रिझाती आई है। नाटक में ही बच्चों का मन सबसे अधिक रमता है, लिहाजा गली-मोहल्लों, स्कूल के फंक्शनों या फिर राष्ट्रीय पर्वों पर जब कोई मन को छू लेने वाला अच्छा नाटक होता है, तो अनगिनत आँखें एक साथ भीगती हैं और अनगिनत होंठों पर एक साथ हँसी फुरफुराती है।”
चलिए, अब मनु जी के कुछ नाटकों का अवलोकन करते हैं। ‘अब नहीं लड़ेंगे' उनका बहुत चर्चित नाटक है, जो एक ऐतिहासिक कथ्य को आधार बनाकर लिखा गया नाटक है। यह बच्चों को प्रेम, भाईचारे, अहिंसा, सहिष्णुता और शक्तिशाली होने के अहंकार को त्यागने की सीख देता है। कभी-कभी बच्चे भी औरों से कुछ ज्यादा ही होशियार, सुंदर, बुद्धिमान या फिर अमीर होने का अंहकार पाल लेते हैं, परिणाम स्वरूप प्रेम, सौहार्द और सहयोग का माहौल बिगड़ जाता है। अवंतीपुर का प्रतापी राजा बीसलदेव भी इसी तरह पृथ्वी पर सबसे शक्तिशाली होने के अहंकार से भर जाता है। उसे अपनी अपार ताकत, विशाल साम्राज्य और राज्य में सुख-समृद्धि की श्रेष्ठता का अहंकार हो जाता है। वह भूल जाता है कि इनसानियत से बड़ी कोई ताकत नहीं और मुसीबत में भूखे, प्यासे, असहाय, अपाहिज और जरूरतमंदों की सहायता से बड़ा कोई धर्म नहीं होता। इन्हीं के बल पर इनसान श्रेष्ठ बनता है।
राजमती अपने पति बीसलदेव को समझाने का प्रयास करती है परंतु उसकी बात से राजा उलटा चिढ़ जाता है। वह हँसते हुए कहता है, “वीरों का काम तो लड़ना ही है, राजमती।” यहाँ तक कि घमंड में चूर होकर वह कहता है, “मुझसे वीर और कोई राजा नहीं है।” राजमती बुद्धिमान स्त्री है, वह सहज विनम्रता से समझाती है कि, “आप वीर हैं, प्रतापी हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि पृथ्वी पर कोई और वीर राजा नहीं है।” यहाँ यह भी स्पष्ट होता है कि अहंकारी व्यक्ति अपने बुद्धिमान हितैषी की भी बात नहीं सुनता। भले ही वह कितनी भी अच्छी बात क्यों न कह रहा हो।
आखिर शक्ति एवं राज्य के अहंकार के कारण मुकुंदपाल और बीसलदेव के मध्य युद्ध ठन जाता है। लड़ाई लंबी चलने के कारण बीसलदेव के सैनिक हारने लगते हैं, उनकी रसद खत्म हो जाती है। भूखे, लाचार और घायल सैनिक हथियार नहीं चला पाते। यह स्थिति राजा मुकुंदपाल से देखी नहीं जाती। ऐसे में उसका निर्णय सराहनीय है, जो एक बहुत बड़ा आदर्श स्थापित करता है। देखिए—
“मुकुंदपाल: मैं चाहता हूँ, कुछ समय के लिए युद्ध बंद कर दिया जाए।
बीसलदेव: (हैरान होकर) क्यों?
मुकुंदपाल: इसलिए कि हम युद्ध के नियमों से बँधे हैं। कमजोर, बीमार, भूखे और लाचार लोगों पर हम हथियार नहीं चलाते। मुझे पता है, आपके पास रसद खत्म हो चुकी है। भूखे रहकर आपके सैनिक कैसे लड़ेंगे? खाने-पीने का सामान, फल और सब्जियों से भरी गाड़ियाँ हम आपके लिए भिजवा रहे हैं। मेरी विनती है कि आप इन्हें स्वीकार करें।”
युद्धभूमि में सामने खड़े शत्रु की सहायता करना, वह भी इस कदर विनयपूर्वक, यह बहुत बड़ी बात है। यहाँ एक अप्रत्याशित-सी घटना मनु जी ने संभव कर दिखाई है। मुकुंदपाल द्वारा किया गया निर्णय मानवता के हित में लिया गया निर्णय है। इस युद्ध में न कोई हारा, न कोई जीता। मुकुंदपाल के सद्व्यवहार और विनम्रता से राजा बीसलपुर का अहंकार जाता रहा। वह आँखों में आँसू लिए पश्चात्ताप और आत्मग्लानि से भरकर कहता हैं, “आप सचमुच महान हैं, राजा मुकुंदपाल! मैंने आज तक ऐसा उदार कोई राजा नहीं देखा। आज मैंने पहली बार जाना कि सच्ची वीरता क्या होती है? मैं आपको जीतने के लिए अवंतीपुर से आया हूँ, पर आपकी शूरवीरता से ज्यादा आपकी विनम्रता ने मुझे हरा दिया...!”
विनम्रता, उदारता और साहस सच्चे वीर पुरुष की कसौटी हैं, जिन पर मुकुंदपाल खरा उतरता है। अहंकार विनाश को न्योता देता है और इसका अंत पछतावे और आत्मग्लानि से भरा होता है। नाटक में अहंकारी बीसलदेव का सिर नीचा होना और मुकुंदपाल का किसी देवदूत की तरह सहायता के लिए आगे आना मनु जी के नाट्य कौशल का कमाल है। प्रेम, अहिंसा, उदारता और शांति का संदेश देने वाला यह नाटक हर दृष्टि से सफल है। इसे पढ़ते हुए स्वत: आँखें भीग जाती हैं। 
मनु जी का नाटक ‘गुलगुलिया के बाबा' भी दिल को छू लेता है। यह एक छोटे से बच्चे गुलगुलिया के साहस और संवेदना की कहानी है। बच्चे का मन निर्मल और कोमल होता है। वह किसी को दुख और पीड़ा से कराहते नहीं देख सकता। इस नाटक में ऐसा ही होता है। जब गुलगुलिया के बाबा बच्चे को अपने बुखार की बात बताते हैं तो बालक तुरंत उसकी सेवा में जुट जाता है। वह अबोध बालक डॉक्टर को लेने अकेला शहर जाता है। बच्चे का यह हौसला काबिले तारीफ है। लेकिन अरे! यह क्या? नाटक के दूसरे दृश्य में वर्तमान की भौतिकता और स्वार्थपरकता के आगे मानवीय संवेदना हारती दिख रही है। 
यहाँ शायद मनु जी कहना चाहते हैं कि यह दुनिया केवल भावनाओं से नहीं चलती, बल्कि जीवन तो निरंतर संघर्षों का नाम है। जीवन चलाने के लिए कुछ आवश्यक साधन और संसाधन भी होने जरूरी हैं। मनु जी ने यहाँ बच्चे को वास्तविक दुनिया से, उसकी व्यावहारिकता से जोड़ा है। जहाँ एक ओर डॉक्टर अक्खड़ जैसे घमंडी व्यक्ति हैं, वहीं दूसरी ओर राजकुमार और हरिया देवी जैसी देवदूत भी हैं, जो दूसरों के भले के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। यहाँ बच्चे के हौसले और धैर्य को देखकर ‘जहाँ चाह वहाँ राह' वाली उक्ति चरितार्थ होती दिखती है। जंगल के राजकुमार और हरिया देवी के आशीर्वाद के बाबा ठीक हो जाते हैं। ये दोनों गुलगुलिया को कुछ गेहूँ के दाने देते हैं, जो वास्तव में सच्चे और अच्छे बच्चे के प्रति शुभभावनाएँ और मंगलकामनाएँ हैं।
यथार्थ और फंतासी के मेल से बना यह नाटक मुसीबत के समय धैर्य, साहस, हौसला, और सूझबूझ बनाए रखने की सीख देता है। हरिया देवी के आने से कहानी का यथार्थ और आदर्श भी कहीं अधिक रोचक हो जाता है। बच्चे गुलगुलिया के साथी बनकर उसके साथ चलने लगते हैं। गुलगुलिया के हौसले को देखकर हर बच्चा यही कहेगा, “ऐसा तो मैं भी कर सकता हूँ। और मौका मिलते ही अवश्य करूँगा।”
अब चलिए ‘मुनमुन का छुट्टी क्लब' की सैर करते हैं। वाह! क्या क्लब है! इसके सभी बच्चे रचनात्मक, प्रतिभाशाली, कल्पनाशील, अलमस्त, खिलंदड़े और गुणी हैं। हर बच्चा अपने आप में जीनियस है। ऊपर से मनु जी की सहज भाषा, संवाद कौशल और बच्चों की भाव-भंगिमाओं का कौतुक नाटक में जान डाल देता है। नाटक की शुरुआत भी बड़े सुंदर और प्रेरणात्मक गीत से होती है। मुनमुन नाटक की मुख्य पात्र और सकारात्मक ऊर्जा से भरी लड़की है। इस नाटक की काव्यात्मक भाषा का अनूठापन देखिए। शोभा दीदी कहती हैं, “जैसे ये बच्चे न हों, जुगनू हों, जुगनू! हर क्षण प्रकाश उगलते, नन्हे-नन्हे जुगनू...!” यहाँ सबसे बड़ी बात मुनमुन के क्लब के सभी बच्चों का वास्तव में प्रकाश उगलते जुगनू होना है। प्रकारांतर से यहाँ उनके गुणी स्वभाव की ओर संकेत है। इसके साथ ही ये अनुशासित, नियमित और अपनी-अपनी जिम्मेदारी को निभाने में ईमानदार हैं। कोई आदर्श अध्यापक है, कोई गायक, कोई नर्तक, कोई कहानी लेखक, कोई चित्रकार, कोई नाटककार, कोई अभिनेता और कुछ गप्पी एवं शरारती भी। सब मिलकर खूब रंग जमाते हैं, और वाकई मुनमुन का छुट्टी क्लब नाटक खूब जम जाता है, और बाल पाठकों के दिलों में अपनी जगह बना लेता है।
नाटक का वातावरण अत्यंत उल्लासपूर्ण और भाव-भंगिमाओं से भरा है। नाटक की खास बात यह है कि सभी बच्चे अपनी-अपनी विधा के उस्ताद हैं। मनु जी का कौशल देखिए, खेल-खेल में इन विधाओं की मौलिक और जरूरी बातें बच्चों से ही कहलवा रहे हैं। जैसे कहानी कैसे लिखनी है? चित्रकला और संपादन कला की बारीकियाँ क्या-क्या होती हैं? नाटक कैसे खेला जाता है? आदि-आदि। मनु जी के ऐसे नाटक सांस्कृतिक और साहित्यिक विधाओं की कार्यशालाओं जैसे हैं। वास्तव में ऐसे बच्चे मनु जी के मन के बच्चे हैं। ऐसा लगता है, जैसे मनु जी खुद बच्चे बनकर नाटक खेल रहे हैं, साथ ही उसी कुतूहल, उत्सुकता और निराले अंदाज में कहानी भी कह रहे हैं। पाठक भी बच्चों के साथ उन्हीं भावों में बहने लगते हैं। उनकी आँखों में भी वही खुशी झिलमिल होने लगती है। हृदय में वही उमंग-उत्साह हिलोरें मारने लगते हैं। नाटक का एक संवाद और बात कहने की शैली का मस्ती भरा अंदाज देखिए—
“शोभा दी: वाह! बजरंगी, ये तो खुद एक कहानी बन गई।
मुनमुन: और कहानी सुनाने का अंदाज भी हमारे बजरंगी का ऐसा है कि जब चाहे रुला दे, जब चाहे हँसा दे।”
“बजरंगी: मैं...? जरा मुझे टाइम ज्यादा लगता है दीदी। अक्कल थोड़ी खुट्टल है।
नेहा : तो कोई बात नहीं, मैं थोड़ा सिर खुजाती हूँ। शायद एक आध कहानी टपक पड़े।
बजरंगी: (हँसते हुए) देखो, ज्यादा सिर मत भुला देना छुटकी, नहीं तो कहानियों की बरसात हो जाएगी और हमें खामखा भीगना पड़ेगा।
नेहा: (चिढ़कर) फिर तुमने छुटकी कहा! अजी, मेरा नाम नेहा है, नेहा!”
नाटक में इसी तरह स्वाभाविक मनोविज्ञान, हास्य, खीज, मान-मनौव्वल और प्रेमपगी शरारतों की अनोखी बानगियाँ खूब मिलेंगी।
इतना ही नहीं, इस नाटक में कहानी बाबा जैसे किस्सागो भी हैं, जो क्लब के बच्चों को सुप्रसिद्ध चित्रकार बृजभूषण त्यागी के जीवन संघर्ष से जुड़ी सच्ची कहानी सुनाते हैं, जिससे बच्चे सचमुच प्रेरित और प्रभावित होते हैं। लगता है, बृजभूषण त्यागी जी जरूर मनु जी के अंतरंग मित्रों में रहे होंगे, जो बाद में एक बड़े कुशल नाटककार और निर्देशक बने। इस तरह हम कह सकते हैं कि मनु जी बच्चों को केवल कल्पनालोक में ही विचरण नहीं कराते, बल्कि उन्हें जीवन की वास्तविकता से भी जोड़ते हैं। वे इतने सिद्धहस्त कलाकार हैं कि वे केवल कविता, कहानी लिखना, चित्र बनाना, बल्कि नाटक का निर्देशन करना और और पत्रिकाओं का संपादन करना भी सिखाते हैं। वास्तव में ऐसी कहानियाँ साहित्य ,कला और संस्कृति की पाठशालाएँ हैं। मनु जी बच्चे में छिपी हर प्रकार की प्रतिभा को जाँचने-परखने के लिए छोटे-बड़े सभी को प्रेरित करते हैं। यही इनके नाटकों की सबसे बड़ी खासियत है। ‘मुनमुन का छुट्टी क्लब’ बेशक उनमें अव्वल है और मनु जी के सर्वाधिक प्रतिनिधि नाटकों में इसे शुमार किया जा सकता है।
मनु जी का बाल साहित्य पढ़ते हुए इस बात की ओर मेरा ध्यान गया कि उनकी बाल कहानियाँ और नाटक एक-दूसरे एक-दूसरे के बहुत नजदीक हैं और लगभग साथ-साथ चलते हैं। उनकी ज्यादातर बाल कहानियों में इतनी नाटकीयता और कौतुक है कि उनका नाट्य रूपांतरण बड़ी सहजता से हो जाता है। ‘गंगा दादी जिंदाबाद', ‘जानकीपुर की रामलीला,' ‘रहमान चाचा', ‘एक था वसंत’ आदि उनकी अनेक कहानियाँ हैं, जो बड़े अच्छे नाटकों में ढल गई हैं।
मनु जी के नाटकों में ‘गंगा दादी जिंदाबाद' भी बहुत महत्त्वपूर्ण है। यह बाल मन को संवेदित और प्रेरित करने वाला नाटक है। गंगा दादी गाँव की सबसे वृद्ध महिला है और इस अवस्था में भी अकेली रहने को मजबूर है। अतः बच्चों के तंग करने पर उसका परेशान होना स्वाभाविक है, पर वह दिल की बुरी नहीं है। वास्तव में वह बच्चों से कम, अपने हालात से ज्यादा दुखी है क्योंकि जब उसे अपनों के सहारे की जरूरत थी, तब वह अकेली रहने को मजबूर है। उसका जवान बेटा और पति गुजर चुके हैं। गंगा दादी अपने बगीचे में फल-फूलों के पेड़ों की रखवाली करती है। अब बच्चे तो बच्चे ठहरे! उन्हें चोरी के फल खाना और शरारतें करना अच्छा लगता है। एक शाम को वही हुआ। बच्चे बाग में पहुँच जाते हैं। जब गंगा दादी बच्चों को भगाने के लिए शामू के पीछे भागी तो एक गड्ढे में पैर आने से, वह धड़ाम से गिर पड़ी! दर्द से कराहने लगी। 
अब शुरू होती है असली कहानी। बच्चों की निर्मल संवेदनाएँ, पछतावा, दुख और गंगा दादी के प्रति सेवा और समर्पण का भाव। नाटक में इस स्थल पर भाषा सौंदर्य और संवादों की मार्मिकता इतनी गजब की है कि आपकी आँखें छलछला उठेंगी। जरा देखिए—
“संजू: अरे-अरे! गंगा दादी गिर गई।
गोगना: लगता है, बहुत ज्यादा चोट आई है।
गोलू: हाय राम! अब क्या होगा?
मिठ्ठन: यह तो बुरा हुआ, बहुत बुरा।
गोगना: चलो, गंगा दादी को अंदर चारपाई पर लिटा दें।”
संजू दौड़कर वैद्य को बुलाकर लाता है। बच्चे घर से हलदी वाला दूध लाकर दादी को पिलाते हैं। दवा, मालिश आदि करते हुए सेवा में जुट जाते हैं। बच्चे गंगा दादी से अपनी गलती की माफी माँगते हैं और गंगा दादी का बड़प्पन देखिए, जो उन्हें चोट लगने पर माफ ही नहीं करती, बल्कि खूब प्यार भी करती है। बच्चे भी इतने सच्चे और अच्छे हैं कि जब तक गंगा दादी ठीक नहीं हो जाती, उसकी सेवा में दिन-रात लगे रहते हैं। उन्हें बहुत पछतावा होता है। अब उन्हें क्या करना है, क्या नहीं करना? उनमें यह चेतना स्वत: जाग्रत होती है। अब उन्हें केवल गंगा दादी और अपना कर्तव्य याद है। दादी-पोतों का ऐसा स्नेह भरा मार्मिक दृश्य देखकर बड़के दादा कहते हैं, “हमें मालूम नहीं था, इन दादी-पोतों में इतना स्नेह है।'' बच्चों और बड़ों के हृदय परिवर्तन की यह बहुत जीवंत और मनभावन कहानी है, जो एक अनोखे, भावनात्मक नाटक की शक्ल में सामने आती है।
चलिए अब जरा ‘गोलू-मोलू गप्पू खाँ' के पास चलते हैं, जो गप्पें मारने और शेखी बघारने में अव्वल है। हालाँकि उसे यह अहसास भी है कि यह खराब आदत है। और इतना ही नहीं, वह इससे छुटकारा भी पाना चाहता है। ऐसे में एक प्यारी सी नीली चिड़िया उसकी मदद करती है। जब तक गोलू पूरी तरह इस आदत को छोड़ नहीं देता, वह उसका साथ देती है। यहाँ भाषा बहुत ही मुहावरेदार, सरस और कसी हुई है। मुँह खुला रह जाना, शेखी बघारना, लत लगना आदि मुहावरों का बहुत ही सफल प्रयोग है। हास्य रस से भरा यह नाटक बड़ा रोचक और मजेदार है।
यहाँ मेरा एक छोटा सा संशय है, जब गप्पू शेखी मारता है तो बच्चे एक साथ ‘डब्बा गोल’ कहकर उसकी हँसी उड़ाते हैं। तब एक पंक्ति आती है, “शेखी सारी धरी रह गई गोलू जी की/ किस्मत फूट गई बेचारे गोलू जी की!” यहाँ ‘किस्मत फूट गई' जैसा वाक्यांश कुछ अखरता है। यहाँ ‘खुल गई पोल' या ‘बदल गई चाल' जैसे वाक्यांश आना मेरे विचार से ज्यादा सही होता। खैर, यहाँ लेखक के मन में कोई और संदर्भ भी हो सकता है।
ऐसे ही ‘शेरू ने ढूँढ़ी गेंद' कुछ अलग ढंग का, एक छोटा और प्यारा-सा नाटक है। बच्चा गेंद से खेलता है और बार-बार उसे खो देता है। ऐसे में उसका कुत्ता शेरू गेंद ढूँढ़ने में मदद करता है। वह अपने इस करतब से गेंद खेल रहे बच्चों से इतना घुल-मिल जाता है कि बच्चे उसे ‘हीरो’ और ‘शेरू द ग्रेट’ कहते हुए, अपनी टीम में शामिल कर लेते हैं। बच्चों को भी शेरू के बिना खेलने में आनंद नहीं आता। नाटक का कथ्य बहुत ही सहज है और यह सभी बच्चों के मन का नाटक है। गेंद, कुत्ते, बिल्ली, कबूतर और खरगोश बच्चों के प्रिय दोस्त होते हैं। ये पात्र कहीं नायक है तो कहीं सहायक। ये सभी अपने अपने क्रिया-कलापों द्वारा नाटक को गति और रोचकता प्रदान करते हैं। इनके आने से बाल पाठक नाटक में रमते चले जाते हैं।
इसी तरह अपने खिलौनों पर भी बच्चे जान छिड़कते हैं और ये छोटे-छोटे खिलौने उनके लिए कुबेर के खजाने से कम नहीं होते। खेलते-खेलते पप्पू की नीली गेंद नाली में कहीं खो जाती है। पप्पू के तो मानो प्राण बसते थे, उसमें। अब उसकी दुनिया ही जैसे लुट गई हो। इसी दुख के कारण वह खाना-पीना तक छोड़कर उदास रहने लगता है। माँ के समझाने पर भी उसकी उदासी कम नहीं होती। फिर अचानक उसका दोस्त शेरू उस नीली गेंद को ढूँढ़ लाता है, तब उसकी जान में जान आती है। यहाँ बालमन की सूक्ष्म संवेदनाओं और मनोविज्ञान की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। पप्पू को गेंद के ही सपने आते हैं, जो कभी आसमान में चली जाती है, कभी चाँद-तारे बन जाती है और कभी एकदम सामने जमीन पर आकर टप्पे खाने लगती है। यह बच्चे के अवचेतन मन की सहज अभिव्यक्ति है। नाटक में शेरू, पप्पू और अन्य बच्चों का परस्पर प्रेम भी अनुपम है, जो देखते ही बनता है।
आजकल बच्चों में खानपान संबंधी बदलती आदतें भी एक चिंता का कारण हैं। इन आदतों के कारण बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास रुक जाता है। बच्चे सात्विक भोजन जैसे दूध, साग-सब्जियाँ और फल आदि की अपेक्षा फास्ट फूड और कोल्ड ड्रिंक जैसी बाजारू चीजों को ज्यादा महत्त्व देते हैं। संतुलित भोजन और शाकाहार की आदतों को विकसित करने के लिए मनु जी ने ‘रस-भरे फल, ताजी-ताजी सब्जियाँ' शीर्षक से बहुत सुंदर नाटक लिखा है। शालिनी मैडम हँसते-गाते हुए खेल-खेल में बच्चों को फल-सब्जियों की गुणवत्ता बताती हैं। मैडम का बताने का ढंग लाजवाब है, क्योंकि वह इतना सहज और उत्सुकता भरा है कि बच्चों में जानने की ललक खत्म नहीं होती। बच्चे शुद्ध सात्विक चीजों को खाने के संकल्प को बार-बार दोहराते हैं और मिलकर गाते हैं कि, “खाओगे सब्जी/ तो सेहत होगी अच्छी, खाओगे फल/ तो हँसोगे पल-पल।”
इन नाटकों की एक अच्छी बात यह है कि इनकी कथावस्तु बहुत ही प्रासंगिक है। दूसरी बात यह कि मनु जी शुरू में ही बड़े रोचक ढंग से पात्रों का परिचय कराते हैं। परिचय भी गुण, स्वभाव के अनुसार, जिसके कारण उत्सुकता निरंतर बढ़ती जाती है। फिर नाटक में विभिन्न स्थलों पर पात्रों के मनोभाव और भाव-भंगिमाएँ बहुत स्वाभाविक हैं। सभी पात्रों में एक विशेष रचनात्मक कौशल है। कोई कहानी लिखने में रुचि रखता है, कोई कविता लिखने में, कोई चित्रकार, कोई गायक, तो कोई घुमक्कड़ है। इनमें नया सीखने की ललक है। सभी नया काम करने को उत्साही हैं। यहीं से बच्चा रचना में रमना शुरू हो जाता है। इसमें कुछ पात्र स्वभाव से शरारती हैं, कुछ गप्पी और गंभीर भी। यानी पाठकों को अपनी रूचि के पात्र आसानी से मिल जाते हैं। 
‘सपनों का पेड़' भी मनु जी का एक बेहतरीन और बहुचर्चित नाटक है। इसमें मीरा नाम की एक लड़की क्रिसमस ट्री यानी सपनों के पेड़ को विभिन्न प्रकार से सजा रही थी। यह क्रिसमस ट्री सारी दुनिया के लिए  खुशियों का पेड़ ही तो है। मीरा बहुत ही संवेदनशील और भावुक लड़की है। वह अपने क्रिसमस ट्री के माध्यम से पूरी दुनिया को सँवारना और खुश देखना चाहती है। अपनी मित्र मंडली के साथ वह मजदूरों की बस्ती में जाती है और अपने नाटकों द्वारा बस्ती में शिक्षा का अलख जगाती है। वह उन मजदूरों के गरीब बच्चों में छिपी प्रतिभा को पहचानकर उन्हें सही दिशा देती है। फिर एक दिन अचानक उनके दादा जी मीरा की नाटक मंडली का हौसला बढ़ाने के लिए वहाँ आ जाते हैं। वे मीरा के इस कार्य और भावना की बहुत प्रशंसा करते हैं। वे अपने ज्ञान, अनुभव और प्रेरणात्मक बातों द्वारा मंडली के बच्चों को और अधिक अच्छा करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। बातों-बातों में ‘अपना दीपक खुद बनो' या ‘अप्प दीपो भव' का संदेश देते हैं।
मनु जी अपने नाटकों में संवादों के उतार-चढ़ाव, लय, भाषा और शारीरिक भाव-भंगिमाओं का महत्त्व भी प्रतिपादित करते हैं। कहीं-कहीं तो पाठक एकदम हैरान हो जाते हैं। उन्हें लगता है, जैसे नाटक के अंदर एक और नाटक चल रहा है। तभी तो मैं मनु जी के नाटकों को ‘साहित्यिक कार्यशाला या प्रयोगशाला' मानता हूँ। मनु जी बाबा महाश्वेतम के माध्यम से अपने कथा गुरु देवेंद्र सत्यार्थी जी के व्यक्तित्व की झलक और गुण-स्वभाव को बच्चों के सामने बड़े नाटकीय अंदाज में रखते हैं। एक अच्छा नाटक कैसे लिखा जाए? उसके आवश्यक अंग क्या हैं? उसकी तैयारी कैसे की जाए? लाइट-साउंड का प्रभाव, स्क्रिप्ट लिखना, प्रभावी और छोटे संवाद, सहज भाषा, पात्रों के अनुकूल वेशभूषा आदि चीजों के बारे में बच्चों के मुँह से कहलवाकर या स्वयं बच्चों के हाथों से करवाकर उन्हें सिखाते हैं। यह लेखक का एक विशेष कौशल है। अगली पीढ़ी के साहित्यिकों को साहित्य की बारीकियाँ सिखाने का नया प्रयोग भी है। मनु जी के बाल पात्र अच्छी हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी के प्रचलित शब्दों का भी खूब प्रयोग करते हैं। जैसे आइडिया, ड्रेस, रिहर्सल, डायलॉग, क्लब, लाइट साउंड आदि। सच्ची खुशी और जीवन का सार बताने वाला दादा जी का एक संवाद देखिए, जिसमें वे अपने त्योहारों का सामाजिक उद्देश्य बताते हैं, “...ये त्योहार हमें कोई बड़ी सीख देने के लिए आते हैं।...और यह भी कि हमारी सच्ची खुशी यही है कि हम दूसरों के आँसू पोंछ सकें!”
दादा की प्रेम भरी बातें बच्चों के हृदय में उजाला और मन में उत्साह भरती हैं। इसीलिए बच्चे अपने मन से ही कुछ रचनात्मक कार्य करने को तैयार हो जाते हैं। इसी तरह की एक बानगी और देखिए—
“नंदू: मैं भी अविनाश के साथ जाऊँगा। जो जरूरतमंद बच्चे होंगे, उनके लिए कपड़ों, किताबों का इंतजाम करूंगा।
दादा जी: और मीरा क्या करेगी?
मीरा: मैं हर इतवार को नन्हे-मुन्ने बच्चों के बीच बैठकर उन्हें चित्रकला सिखाऊँगी।
लतिका: दादा जी, मैं गाना और संगीत सिखाऊँगी।”
समाज के गरीब और जरूरतमंद बच्चों की सहायता करने की ललक, अपने आसपास के परिवेश को और अधिक बेहतर बनाने के लिए कुछ भी करने को स्वतः तैयार होना बहुत बड़ी बात है। ऐसी शुभ भावनाएँ और अंत:प्रेरणा ही इस नाटक की असली ताकत है। दादा जी का यह कहना कि, “दुख -दर्द चाहे कितना ही बड़ा क्यों नहीं हो, कितनी ही बड़ी लड़ाइयाँ और नफरत क्यों ना हो, मनुष्यता न हारी है न हारेगी।” छोटे-बड़े सभी बच्चों के लिए जीवन का सार, बल्कि सभी को प्रेरित करने वाला एक प्रकाश स्तंभ बन जाता है। यों सपनों का पेड़ वास्तव में बच्चों के सपनों की भावी दुनिया है। मानव जीवन का सार है। कविता के माध्यम से नाटक का अंत बहुत ही शानदार ढंग से हुआ है और नेपथ्य से मनु जी के मन की बात बड़े अनोखे ढंग से उभरकर सामने आती है कि हर बच्चा रोशनी का पेड़ है। और जब वह दूसरों का हमदर्द बनेगा, तभी दुनिया खुशहाल और सुंदर बनेगी।
लेखक की यह संवेदना, सरोकार और उदात्त भावना बहुत सम्माननीय है। असल बात तो यह है कि मनु जी समाज के उपेक्षित, गरीब और परिस्थितियों के मारे बच्चों को समाज के विकास की मुख्यधारा से जोड़कर उन्हें जीवन जीना सिखाते हैं। और दूसरे बच्चे भी उन्हें अपने साथ लेकर चलने को उत्सुक है। परस्पर प्रेम की यह राह ही समाज की उन्नति की राह है। 
चलिए, अब जरा देखते हैं कि नए साल में मनु जी के मन के बच्चे क्या करते हैं! ‘नए साल क्या-क्या लाओगे' नाटक में मनु जी बच्चों के कुछ कर गुजरने के जोश, संकल्प और जुनून को दिखाते हैं। शोभा दीदी और प्रभात दादा की बातचीत से बड़े रुचिकर ढंग से नाटक की शुरुआत होती है। नया साल बच्चों के लिए खास उत्साह भरा होता है। इस अवसर पर बच्चे पिछले साल में की गई भूलों को आगे न दोहराने का निश्चय करते हैं। कुछ अच्छे और नए लक्ष्य सामने रखते हैं। बाल मंडली के लिए यह खुशियाँ बाँटने का अच्छा अवसर है। 
इस अवसर पर प्रभात दादा की प्रेरणा से शोभा, सुजाता, अमित, गोपू आदि सभी बच्चे नववर्ष पर झुग्गी-झोंपड़ियों में शिक्षा से वंचित बच्चों को शिक्षित करने की मुहिम चलाते हैं। वास्तव में ये जागरूक और संवेदनशील बच्चे शिक्षा का महत्त्व समझते हैं और वे स्वस्थ व शिक्षित समाज के निर्माण में अपनी भागीदारी निभाते हैं। ये जानते हैं कि शिक्षा जीवन में उजाला भरकर अभाव, गरीबी और पीड़ा को कम करती है। मन में अच्छे विचार भर देती है। मानो बच्चे यह कहना चाह रहे हों कि सामाजिक उत्थान और प्रगति का रास्ता शिक्षा से होकर गुजरता है। और हम बच्चे यह बात भली भाँति जानते हैं। 
इस नाटक का कथ्य एकदम व्यावहारिक और समसामयिक है। इसके साथ ही बच्चों की लोकजीवन, नृत्य, संगीत आदि के प्रति गहरी रुचि भी स्पष्ट दिखाई देती है। नाटक के बीच में अचानक बच्चों को खाँसते हुए कही गई कुछ रहस्यमयी काव्य पंक्तियाँ सुनाई देती हैं। अरे लीजिए, ये यात्री बाबा हैं, जो बच्चों को बड़े प्यार से ज्ञान-विज्ञान की बातें और प्यारी-प्यारी कहानियाँ सुनाते हैं। वास्तव में मनु जी के बहुतेरे नाटकों में कभी यात्री बाबा, कभी बाबा महाश्वेतम तो कहीं कहानी बाबा बरबस ही बच्चों की प्रतिभा और उनके सृजनात्मक कौशल की ओर खिंचे चले आते हैं। और बच्चे तो बच्चे, बड़े भी उनके धवल शवेत कपड़ों, चाँदी-सी चमकती दाढ़ी और मनभावन बातों के जादुई असर से बच नहीं पाते। 
इस संदर्भ में एक बार जिज्ञासावश मैंने पूछा तो मनु जी का जवाब था, “बेटे अशोक, यह मेरे कथागुरु देवेंद्र सत्यार्थी जी हैं, जो अकसर मेरी बाल रचनाओं में स्वयं चले आ जाते हैं। और साथ ही कहीं-कहीं सांकेतिक रूप में देवेंद्र सत्यार्थी जी के संघर्ष भरे जीवन की झलक भी आ जाती है।” इस नाटक को पढ़ते हुए मनु जी की बात एकदम सही लगती है, और यात्री बाबा के लिए मन में बड़ा आदर का भाव उत्पन्न होता है।
‘जब आया वीर बाँका' नाटक संगीत के मन-मस्तिष्क पर पड़ने वाले व्यापक प्रभाव को दिखाता है। बीच-बीच में हास्य और कौतुकपूर्ण स्थितियाँ भी हैं, जो नाटक में अच्छी खासी रोचकता पैदा करती है। साथ ही एक सच्चे वीर बहादुर को कैसा होना चाहिए, नाटक में यह बखूबी दिखाया है। सच्चा वीर साहसी, दृढ़निश्चयी और जुबान का धनी होता है। वह अन्याय और अत्याचार का डटकर सामना करता है। नाटक का मुख्य पात्र वीर बाँका अपने एक प्यारे दोस्त, ढोल की सहायता से अहंकारी राजा भुल्लन शाह को उसकी गलती का एहसास कराता है। वह दरबार में अपनी बहादुरी और योग्यता को सिद्ध करके, सेनापति का पद हासिल करता है, जिसका वह अधिकारी था। शायद मनु जी संकेत में यह कहना चाहते हैं कि कई बार अपना हक पाने के लिए हमें अपनी योग्यता सिद्ध करनी पड़ती है।
‘टुनटुनिया राज्य का सबसे अक्लमंद आदमी' नाटक भी खासा मजेदार है, जो पुल्लू पुलम्मा के हास्य भरे कारनामों से बच्चों को रिझाता है। पुल्लू पुलम्मा, जो नाटक का मुख्य पात्र है, बड़ा अहंकारी है। वह बिजली के खंभे की तरह लंबा है और यह मानता है कि उसका कद लंबा है तो उसकी बुद्धि भी तो सबसे अधिक होगी। लंबा होने के कारण वह अधिक बुद्धिमान होने का अहंकार पाल लेता है। इसी कारण वह छोटे कद के टूटू टुम्मा को कुछ नहीं समझता। बाद में यही टूटू टुम्मा अपने कौशल से पुलम्मा को जीवन का सबक सिखाता है। वह सिद्ध करता है कि बुद्धि का शारीरिक कद-काठी से कोई संबंध नहीं होता। अपने यहाँ एक देशी कहावत है, ‘अक्ल बड़ी कि भैंस'। वह यहाँ चरितार्थ होती दिखती है। 
मनु जी का नाटक ‘रहमान चाचा’ भी बिल्कुल अलग सा है। मुझे लगता है कि ‘रहमान चाचा' बाल नाटक ‘गोलू भागा घर से' उपन्यास के प्रभाव में लिखा गया है। इसमें शोभित के घर से भागने की मूल कथा तो स्वयं मनु जी के जीवन की ही एक घटना है, जिसे बाद में काल्पनिक पात्रों और घटनाओं के जरिए नाटक का रूप दिया गया है। नाटक की मुख्य कथावस्तु गणित की परीक्षा से डरकर घर से भागे एक बालक शोभित की परिस्थितियों और बाद के प्रसंगों से जुड़ती है। वह अपने पिता की महत्त्वाकांक्षाओं पर पूरा नहीं उतरता। शोभित कुछ और होना चाहता है जबकि पिता उसे कुछ और बनाना चाहते हैं। इस बनने और बनाने की प्रक्रिया में वह इस कदर उलझ जाता है कि इतना बड़ा फैसला ले लेता है। 
शोभित गाड़ी में बैठकर दिल्ली पहुँचता है और वहाँ गलत लोगों के चंगुल में फँस जाता है। यहाँ मनु जी ने गाड़ी में और स्टेशन पर बालक की मन:स्थिति का सहज स्वाभाविक और सूक्ष्म वर्णन किया है। शोभित बहुत कोमल मन का संवेदनशील बालक है। वह सहज ही दूसरों पर विश्वास कर लेता है, जबकि दुनिया इतनी सीधी-सादी नहीं है। यहाँ शोभित को दुनियादारों का एक अलग ही रंग नजर आता है। वह अपने घर से भाग तो आया, पर अब उसे पछतावा भी है। परंतु वह इन्हीं कठिन परिस्थितियों में कुछ अच्छा करने या बनने का दृढ़ निश्चय करता है। बड़ी बात यह है कि वह अपने भीतर की अच्छाई को नहीं छोड़ता तथा सभी काम बहुत सावधानी और सूझ-बूझ से करता है। अगर शोभित के घर से भागने के कारणों की तह में जाएँ तो कई कारण मिलेंगे। यहाँ तक कि माता-पिता की महत्त्वाकांक्षा और मौजुदा शिक्षा व्यवस्था भी कटघरे में खड़ी हो जाएगी। लेकिन यह भी तो जरूरी नहीं कि हर किसी को रहमान चाचा ही मिल जाएँगे।
यहाँ मनु जी ने सूत्रधार के माध्यम से बच्चों की लापरवाहियों का भी संकेत किया है कि बच्चे शिक्षक के पढ़ाते समय ध्यान न देकर, दोस्तों बातों को ज्यादा महत्त्व देते हैं। वे टीवी, वीडियो गेम आदि देखने में अपना समय गँवा देते हैं। फिर उन्हें बाद में पछताना पड़ता है। मनु जी स्पष्ट करते हैं कि सही मार्गदर्शन के अभाव में कई बार पढ़ाई का यही भय बच्चों को आत्महत्या या बड़े अपराधों की ओर गलत दिशा में ले जाता है। यहाँ शोभित अपनी कुशलता और एक अन्य लड़के, अशरफ की सहायता से अपराधियों की पहचान कर लेता है। बूढ़े आदमी के सहयोग से वह खुद बच निकलता है और अपराधियों के गिरोह का भी पर्दाफाश करता है। अंत में रहमान चाचा, जो एक भले पुलिस अधिकारी हैं, शोभित के आत्मविश्वास को मजबूत करते हैं। ठीक वैसे ही, जैसे रामकथा में जामवंत हनुमान जी को उसके अंदर की शक्ति की पहचान कराते हैं। रहमान चाचा शोभित से बहुत सार्थक बात कहते हैं, “हाँ, और सुनो, अब तुम अपने आप को अयोग्य और निकम्मा मानना छोड़ दो। तुम सच्चे हो। ईमानदार हो और बहादुर हो। और सबसे बड़ी बात यह है कि दूसरों के लिए कुछ भी करने का जज्बा है तुम्हारे दिल में। यह बहुत बड़ी बात है।”
मनु जी अपनी रचनाओं के द्वारा बाल पाठकों को योग्यता और स्वाभिमान की पहचान करना सिखाते हैं। उनके कई नाटक देश और समाज के लिए कुछ अच्छा करने की भावना से जुड़े हैं। ऐसे ही मनु जी के कई ऐसे बेहतरीन नाटक हैं, जो शिक्षा का महत्त्व बताने के साथ-साथ बुरी संगत से बचने की सीख देते हैं। साथ ही मुसीबत के समय मुश्किल में पड़े लोगों की सहायता करने के लिए प्रेरित करते हैं। इससे वे बच्चों को अपने दोस्त नाटक लगते हैं।
मनु जी के नाटकों की विविधता भी देखने लायक है। उन्होंने प्रकृति, पर्यावरण, साहित्य, समाज, शिक्षा, राजनीति, प्राचीन गौरव और मानवीय मूल्यों पर केंद्रित नाटक लिखे हैं तो झूठ और पाखंड को खोलने वाले नाटक भी हैं। यहाँ तक कि हास्य और मनोरंजन पर आधारित नाटक भी उनके यहाँ मिल जाएँगे। ऐसे हँसते-हँसाते नाटक, जो बच्चों के मन में बैठ जाते हैं। ऐसे ही ‘घर ले जाओ' नाटक झूठ, पाखंड और लोभ-लालच की पोल खोलता है। यहाँ अहंकार और अक्खड़पन पर विनम्रता, उदारता और सद्व्यवहार की जीत होती है। रामरतन, एक अच्छा कलाकार तो है, परंतु उसकी नीयत अच्छी नहीं है। अधिक धन कमाने के लालच में वह सही-गलत नहीं देख पाता। साथ ही उसके व्यवहार में विनम्रता भी नहीं है। इसी लोभी और अहंकार वृत्ति के कारण उसका सारा कार्य-व्यापार चौपट हो जाता है, जबकि श्यामलाल अपनी विनम्रता और उदारता के कारण सबका प्रिय हो जाता है। देखते ही देखते उसके सारे खिलौने बिक जाते हैं और वह लोगों के दिलों में रहने लगता है। 
दूसरी ओर, रामरतन अपने खिलौने बेचने के लिए झूठ और पाखंड का सहारा लेकर भोली-भाली जनता को ठगता है। पर फिर एक दिन, एक सच्चा और तेजस्वी दरवेश तर्क के आधार पर उसके झूठ का पर्दाफाश करता है। बाबा की बात लोगों की समझ में आ जाती है और सभी शर्मिंदा होकर वापस लौट जाते हैं। यहाँ कहीं मनु जी का इशारा आजकल के झूठे, लोभी बाबाओं, धर्मगुरुओं, तांत्रिक-ओझाओं की तरफ तो नहीं है, जो भोले-भाले लोगों को भावनाओं के जाल में फँसाकर तरह-तरह से लूटते हैं। ऐसे लोग किसी भी दृष्टि से मानव या समाज हितैषी नहीं होते। यहाँ पर भी ‘सच्चे का बोलबाला, झूठे का मुँह काला' वाली उक्ति पूर्ण चरितार्थ होती है।
रामरतन को फटकारते हुए कही गई बूढ़े दरवेश की बातें बड़ी वजनदार हैं। वह कहता है, “तू तो बहुत झूठा और ठग है भाई! अगर तेरी यह बात सच है कि लक्ष्मी की यह मूर्ति घर में रखने पर सोने और रुपयों की बारिश होगी, तो तू ही इसे अपने घर में रखकर धनवान क्यों नहीं हो जाता। क्यों इसे लिए हुए गली में मारा-मारा फिरता है!” बूढ़े दरवेश की बातों में सच्चाई है, इसलिए उसकी बातों का सब पर असर होता है। इसी कारण रामरतन शर्मिंदा होकर स्वीकार करता है, “ओह, लालच ने मेरी आँखें अंधी कर दी थीं। अब मुझे समझ में आया, मुझसे भूल हुई है, बड़ी भारी भूल...! अब फिर वही सीधी-सादी मेहनत की जिंदगी शुरू करूँगा। उसी में आनंद है, जीवन का सच्चा आनंद!”
इसी तरह एक छोटे बच्चे नितिन की सपनीली दुनिया से जुड़ा मनु जी का ‘और मिल गया खजाना' नाटक बड़ी सहजता से सिद्ध करता है कि ‘मेहनत ही सफलता की कुंजी है'। इसी से दुनिया का खजाना और खुशियाँ मिल सकती है। यहाँ नितिन के मन में बड़ा ही स्वाभाविक-सा प्रश्न उठता है कि लोग अमीर कैसे बनते हैं? क्योंकि अपने आसपास के परिवेश में वह अमीरों और गरीबों की जीवन शैली और कार्य का अंतर देखता है। यह उसके मन पर प्रभाव डालता है। और प्रभात अंकल बड़ी कुशलता से उसके सवाल का जवाब देते हैं। परिश्रम से कमाया गया धन ही जीवन में सच्ची खुशी और आनंद देता है। सफलता पाने के लिए परिश्रम ही उसका एकमात्र साधन है। और परिश्रम का कोई विकल्प नहीं होता।
‘विचित्र देश के महा आलसी!' नाटक भी आलसी लोगों की दुनिया की गलतहफमी और झूठे मिथक को दूर करता है। यह नाटक हमें सिखाता है कि जीवन को सुंदर एवं स्वस्थ बनाने के लिए शरीर में आलस्य नहीं होना चाहिए, बल्कि हमें चुस्ते-फुर्तीला और कर्मशील होना चाहिए। कर्मशील व्यक्ति ही सभी कार्य सही समय पर सही ढंग से कर सकता है। साथ ही वह मुसीबत में पड़े लोगों की मदद भी कर सकता है। इस नाटक के जरिए मनु जी यह संदेश देते हैं कि आलसी व्यक्ति न केवल अपने शरीर को, बल्कि अपने भविष्य को भी बिगाड़ लेता है। आलस्य एक शारीरिक और मानसिक अवगुण है। यह बुरी आदत है, जो अपने साथ कई बुराइयों और बीमारियों को लेकर आता है। फिर आलस्य बच्चों का तो सबसे बड़ा शत्रु है। आलसी आदमी कभी कोई काम सुचारु रूप से नहीं कर पाता, न ही उसे कभी सफलता मिलती है। अतः आलस्य को कभी जीवन में प्रवेश नहीं करने देना चाहिए। 
यहाँ बड़े ही हलके-फुलके ढंग से एक बहुत महत्त्वपूर्ण विषय को मनु जी ने अपने नाटक के जरिए उभारा है।
दादी-नानी की कहानियाँ बच्चों को बड़े रोचक ढंग से जीवन के बड़े-बड़े पाठ सिखा देती हैं। इस तरह बच्चों को शिक्षित करने व अच्छे संस्कार देने में उनकी बड़ी भूमिका है। फिर उनकी किस्सागोई का तो कोई जवाब ही नहीं। मनु जी का ऐसा ही एक गजब का पद्यात्मक नाटक है, ‘नानी की कहानी'। इसमें बच्चे कहानी सुनने के लिए उत्सुक होकर नानी के चारों ओर बैठ जाते हैं। नानी का कहानी सुनाने का अंदाज बड़ा ही निराला और उत्सुकता पैदा करने वाला है। उसमें केवल कहानी सुनाना ही नहीं, बल्कि भावों और भाषा में गहरा उतार-चढ़ाव, भाव-भंगिमाएँ और अभिनय भी शामिल है। वास्तव में ‘नानी की कहानी' में कहानी के साथ-साथ कविता और नाटक विधाएँ भी शामिल हैं। कहानी सुनने वाले बच्चों के काव्यात्मक संवाद बहुत ही जीवंत है। पढ़ते-पढ़ते सारा दृश्य आँखों के सामने सजीव हो उठता है। यों मनु जी इस नाटक के जरिए केवल मनोरंजन ही नहीं करते, बल्कि दादी-नानी के कहानी के माध्यम से उन्हें बड़े-बुजुर्गों के संस्कारों, गुणों, अनुभवों, ज्ञान और कौशल से जोड़कर बच्चों को सामाजिक और व्यवहारिक भी बना रहे हैं।
‘जसोदा बाबू की अमर गाथा' बेहद मार्मिक और सीख देने वाला बेहतरीन सामाजिक नाटक है। यह सामाजिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक विमर्शों को नए आलोक में देखने के लिए प्रेरित करता है। नाटक के केंद्र में एक गरीब बच्चे जस्सू की कहानी है, जो पढ़ना तो चाहता है परंतु परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि उसके चाचा उसे पढ़ा नहीं पा रहे। उसे भेड़-बकरियाँ चराने का काम करना पड़ता है। परंतु जैसे ही वह स्कूल के पास से गुजरता है और स्कूल में जाते हुए बच्चों को देखता है, या फिर कक्षा में पढ़ाते अध्यापक की आवाज को सुनता है, तो उसमें भी पढ़ने की ललक पैदा होती है। वह मन ही मन सोचता है कि काश, वह भी स्कूल जा पाता। पर उसकी परिस्थितियाँ कुछ अलग थीं। आखिर अपनी अंतःप्रेरणा और नियमित अभ्यास से वह स्कूल के पीछे बैठकर ही बहुत कुछ सीख गया।
फिर एक दिन स्कूल के अध्यापक ने उसे देखा, तो अचरज से भर उठे। उन्हें मानो धूल में पड़ा कोई हीरा मिल गया हो। वे गरीब जस्सू की पढ़ाई का खर्चा खुद उठाते हैं और उसे स्कूल में दाखिल कर लेते हैं। बस यहीं से जस्सू के जीवन की दिशा बदल गई। इस नाटक के द्वारा मनु जी ने एक आदर्श, पारखी और समर्पित अध्यापक के गुण, स्वभाव और कार्यशैली पर प्रकाश डाला है। वहीं ऐसे बच्चों के अंदर की लगन, उनके निश्चय और साहस की सराहना भी की है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी शिक्षा की राह निकाल लेते हैं। 
यह नाटक बच्चों के साथ-साथ बड़ों में भी संवेदना का विस्तार करता है। यहाँ आदर्श विद्यार्थी वाली कृतज्ञता और समर्पण भी है। जस्सू विदेश में धन कमाने के बजाय, अपने देश व समाज में अपने जैसे जरूरतमंद बच्चों के घर जाकर शिक्षा का अलख जगाना चाहता है। उसके जीवन का आदर्श देखिए। जब मास्टर जी उससे पूछते हैं कि आगे क्या करना चाहते हो जस्सू, तो वह भावुक होकर कहता है, “मास्टर जी, आपने मुझे धूल-मिट्टी से उठाकर बड़ा किया। पर अभी मेरे जैसे बहुत हैं। मैं गाँव-गाँव में शिक्षा का अलख जगाना चाहता हूँ।” मनु जी ने कितना बड़ा आदर्श और लक्ष्य बच्चों के सामने रखा है, यह देखने की बात है। अयोध्यानाथ जैसे संवेदनशील शिक्षक की भूमिका भी प्रशंसनीय है। जस्सू कहता है, “मास्टर जी, इसमें मेरा कुछ नहीं है। सब कुछ आपका ही दिया है। आपने उस दिन जस्सू के सिर पर हाथ फेरकर उसके हृदय में ज्ञान का जो दीपक जलाया था, यह उसी का प्रकाश है। सारी दुनिया जिसे यशोदानंदन के रूप में जानती है, वह असल में तो वही आपका जस्सू ही है।”
वास्तव में आज अयोध्यानाथ जैसे मानव शिल्पी अध्यापकों की आवश्यकता है। ऐसे समर्पित अध्यापक ही जाति, धर्म, अमीरी और गरीबी के भेदभाव से ऊपर उठकर, धूल में मिले जस्सू जैसे रत्नों की पहचान करके उन्हें तराश सकते हैं। उनके भीतर छिपी ज्ञान की ललक को सही दिशा दे सकते हैं। कहा जा सकता है कि प्यार, सहानुभूति और सच्ची प्रेरणा से अबोध बच्चों के व्यक्तित्व को निखारकर कुछ भी बनाया जा सकता है। मनु जी का यह नाटक प्रत्यक्ष रूप में इस बात का प्रमाण है कि “अध्यापक वह दीपक है, जो स्वयं जलकर चारों ओर अपना प्रकाश फैलाता है।”
‘राख में छिपे सुनहले अक्षर' नाटक फ्लैशबैक शैली में चलता हुआ बड़े प्रभावी ढंग से अपनी बात कहता है। इस नाटक की कथावस्तु सुप्रतिष्ठित साहित्यकार, रामदरश मिश्र जी के जीवन पर आधारित है। वही इस नाटक के मुख्य पात्र सरस्वती बाबू हैं, जिन्हें बचपन में सब सरू कहकर बुलाते थे। सरू बुरी तरह डाँट-डपट करने वाले कठोर अध्यापक के डर से पढ़ाई बीच में छोड़कर घर बैठ जाता है। लेकिन माँ तो माँ होती है, वह बच्चे को दुखी कब देख सकती है! उसकी माँ जानती है कि शिक्षा के बिना बच्चे का जीवन अंधकारमय हो जाएगा। वह शिक्षा का महत्त्व जानती है। वह नहीं चाहती कि उसका बेटा पढ़ाई के बगैर गरीबी और अभावों के बीच पले। इसलिए सरु के हार मानने पर भी माँ हार नहीं मानती। वह सरू को घर के आँगन में चूल्हे की राख और मिट्टी पर उँगलियाँ फिरा-फिराकर लिखना-पढ़ना सिखाती है। 
माँ के पढ़ाने का असर यह हुआ कि वह शीघ्र ही क, ख, ग सीख गया। गंगा काका ने पाँच तक पहाड़े सिखाए। यहाँ बड़ी बात बच्चे के मन से जुड़ने और सहजता से उसे सिखाने की है। कई बार तो बड़े-बड़े डिग्रीधारक अध्यापक भी बच्चे के मन तक नहीं पहुँचे पाते। परिणाम वही, बच्चा स्कूल और अध्यापक के नाम से ही डरने लगता है, और आखिर वह स्कूल छोड़ देता है। दूसरी ओर गंगा काका और ममतामयी माँ का स्वाभाविक तरीका उन्हें और अधिक सीखने के लिए प्रेरित करता है। उसके अंदर सीखने की ललक और जिज्ञासा पैदा होती है। माँ बेशक अनपढ़ हो, लेकिन उससे बेहतर कोई गुरु नहीं हो सकता। इस कहानी के माध्यम से मनु जी यह संदेश देते हैं कि बच्चों को करियर और किताबों के अनावश्यक बोझ से दूर रखना चाहिए। शिक्षक को बच्चे पर कुछ भी थोपना नहीं चाहिए। बल्कि सहज रूप में उसके अंदर की शक्तियों को जगाना चाहिए। ऐसे आज़ाद वातावरण में ही बच्चे का शारीरिक और मानसिक विकास खुलकर हो पाता है।
सरस्वती बाबू अपने सम्मान समारोह में व्याख्यान देते समय अपनी कामयाबी का सारा श्रेय माँ को ही देते हैं। वे कहते हैं, “वही माँ मेरी पहली गुरु थीं। आज वे नहीं हैं पर उनका चेहरा याद करके आज भी मेरी आँखें भर आती हैं।” सच पूछिए तो ‘राख में छिपे सनहले अक्षर’ एक माँ के त्याग, समर्पण और लगन को दरशाने वाला बहुत सुंदर नाटक है। मनु जी के ऐसे नाटकों से एक बात यह भी सिखने को मिलती है कि अच्छा प्रबंधन कैसे किया जाए? यानी कम से कम साधनों से या केवल उपलब्ध संसाधनों से ही लक्ष्य कैसे हासिल किया जाए। बाल नाटकों में यह बात ले आना सामान्य बात नहीं है, बल्कि उच्च कोटि का कौशल है। इससे यह भी पता चलता है कि अपने देश, समाज को लेकर मनु जी की चिंताएँ और सरोकार बहुत गहरे हैं।
यही विशेषता ‘जब राजकुमारी ने भूख को जाना' नाटक में भी है। यह एक लोककथा पर आधारित गजब का सामाजिक और राजनीतिक नाटक है, जो बच्चों को कल्पना और सुख-वैभव की दुनिया से निकलकर जीवन की वास्तविकता समझने के लिए प्रेरित करता है। इस तरह यह बच्चों को यथार्थ की जमीन से जोड़ने वाला नाटक है। इस नाटक के जरिए बच्चे यह समझ जाते हैं कि अन्न के बिना जीवन नहीं चल सकता। यह जीवन की पहली आवश्यकता है। भूख के आगे हीरे-मोती-जवाहरात किसी काम के नहीं। शरीर और मन को जिस ऊर्जा की जरूरत है, वह अन्न से ही मिल सकती है, धन-दौलत से नहीं। इसलिए मानव जीवन की सबसे सुंदर और कीमती वस्तु अन्न है। इसके बिना मानव जीवन का अस्तित्व ही संभव नहीं है। 
नाटक की कथावस्तु भी बड़ी रोचक है। राजकुमारी नंदिनी का साम्राज्य विशाल और समृद्ध है। वह स्वयं भी सुंदर और बुद्धिमान है, पर जरा तुनकमिजाज है। उसे अपनी सुंदरता और बुद्धिमता पर अहंकार है। राजकुमारी की शर्त है कि जो आदमी उसे दुनिया की सबसे सुंदर वस्तु लाकर देगा, वह उसी से शादी करेगी। तब जयंत, जो एक अनोखा नाविक है और राजकुमार नंदिनी से प्रेम करता है, उसे विदेशों से बढ़िया गेहूँ के हजारों बोरे लाकर देता है। लेकिन राजकुमारी को यह अपना अपमान लगा। वह गुस्से के मारे चिल्लाने लगती है। उसने कभी भूख को महसूस नहीं किया था, इसलिए वह अन्न के महत्त्व को नहीं जानती थी। उसका पालन-पोषण बड़ी सुख-सुविधाओं में हुआ था। इसलिए गेहूँ के बोरे उसके लिए बहुत मामूली और साधारण चीज थे। कुपित होकर वह गेहूँ के बोरों को समुद्र में फेंकने का आदेश देती है। 
आखिर पूरा राज्य ही अकाल की चपेट में आ जाता है। अब उसे चारों ओर भूख से मरने वालों की चीखें सुनाई देती हैं। राज्य के सभी लोग राजकुमारी नंदिनी को ही इसके लिए जिम्मेदार मानकर, उसे धिक्कारते हैं। सब लोग दाने-दाने को मोहताज हो गए। महल का सारा अनाज खत्म हो गया। सैकड़ों लोग नंदिनी को घेरकर अनाज माँगने लगे। महल में सोने-चाँदी और हीरे-जवाहरात के ढेर थे, लेकिन उन्हें खाया नहीं जा सकता। जब उसने भूख से तड़पती हुई अपनी जनता की हालत देखी तो उसके हृदय में करुणा जागी। वह एक जहाज में बेशकीमती रत्न लेकर अपनी प्रजा के लिए गेहूँ लेने निकल पड़ती है। पर दुर्भाग्य से वह जहाज पानी में डूब जाता है। राजकुमारी किसी तरह बच जाती है। भूख से विकल होकर वह भटक रही है। तब जयंत, जो अब कमालपुर का राजा बन चुका है, उसकी मदद करता है। राजकुमारी नंदिनी को अपनी भूल का अहसास और अपने किए पर पछतावा हो रहा था। अब वह केवल भूख को ही नहीं पहचानती, बल्कि सामान्य आदमी के दुख-दर्द को भी समझने लग जाती है। 
यहाँ मनु जी अनाज के प्रबंध और भंडारण के साथ साथ अन्न के एक एक दाने का महत्त्व सिद्ध करते हैं। कुछ धनाढ्य लोग शादी-ब्याह या तीज-त्योहारों के अवसर पर अन्न का दुरुपयोग करते हैं। वे भूल जाते हैं कि हमारे समाज में बहुत से ऐसे लोग हैं जिन्हेँ एक समय का भी भोजन नहीं मिलता। अत: हमें केवल उतना ही भोजन थाली में लेना चाहिए, जितनी हमें आवश्यकता हैं। इस नाटक के जरिए बच्चों को बड़े सांकेतिक ढंग से छोटी उम्र में ही ये अच्छी आदतें सिखाकर मनु जी अपने सामाजिक दायित्व को निभाते हैं।
फिर मनु जी के नाटकों के पात्र भी बड़े अनूठे और अजीबोगरीब हैं। यहाँ एक गुलाब का पौधा भी आपको पुस्तक पढ़ता नजर आएगा। ‘नन्हा गुलाब पढ़ता नई किताब' बहुत सरस पद्य नाटक है, जिसमें नट और नटी के जीवंत एवं कौतूहल भरे संवाद नाटक को बहुत ही रोचक बना देते हैं। मनु जी ने एक सुर्ख गुलाब पर बाल मनोभावों का निरूपण किया है। एक नन्हा गुलाब हाथों में किताब पकड़े मजे से पाठ पढ़ रहा था, जिसे देखकर सब हैरान हो जाते हैं। इसमें मनु जी ने खिलखिलाते प्राकृतिक सौंदर्य और पुस्तकों के सौंदर्य का बहुत ही मनोरम चित्र प्रस्तुत किया है। संवादों की भाषा और नाटक का एक-एक दृश्य लाजवाब है। जरा संवादों की एक बानगी देखिए—
“मिंकी: जाने कितने रंगों वाली।
छुटकी: जाने कितने चित्रों वाली।
चंदू: प्यारे-प्यारे किस्सों वाली।
सब बच्चे: (मस्ती में भरकर दोहराते हैं)
आहा, नई किताब,
पढ़ता नन्हा एक गुलाब!
नील: उसमें हैं जी मीठे किस्से।
नीना: जाने क्या है उसने देखा?
निक्का: होंठों पर चहकी एक रेखा।
गीत शैली में लिखा गया यह एक मुकम्मल नाटक है। पर बात यहीं पर खत्म नहीं होती। इसलिए कि केवल नाटक को गीतात्मक शैली में लिखना ही मनु जी का उद्देश्य नहीं है। असल में मनु जी यहाँ बड़े अनूठे ढंग से बाल साहित्य की किसी अच्छी पुस्तक की कसौटी गढ़ते हैं। उसकी परिभाषा बताते हैं कि बाल साहित्य की पुस्तक कैसी होनी चाहिए? उसमें क्या-क्या आकर्षण होना चाहिए। वह रंग-बिरंगे चित्रों वाली हो, मीठे-मीठे प्यारे किस्सों वाली हो तथा उसकी भाषा में बड़ी सरलता होनी चाहिए, जिसे देखते ही बच्चों के चेहरों पर प्यारी-सी मुसकान छा जाए। साथ ही जिसे पढ़ते हुए उनका मन मुग्ध हो जाए, बच्चों की किताब ऐसी होनी चाहिए।
‘ताजी-ताजी पूरी-भाजी' मनु जी का बिल्कुल अलग सा नाटक है, जिसमें एक गरीब बच्चे के जीवन के दर्दनाक हालात और असलियत सामने आती है। यह बड़ी कठिन परिस्थितियों में भी हिम्मत रखने वाले परिश्रमी बब्बू की कहानी है। नाटक में बब्बू के मन का द्वंद्व है, उसकी समस्या और समाधान भी। यह नाटक हमें दुखी, असहाय और मेहनती लोगों की सहायता करने और उनसे प्रेम करने की सीख देता है। वास्तव में जिसने दुख और भूख को नजदीक से देखा है, वही इन दोनों का स्वाद जानता है। और फिर वही व्यक्ति दूसरों की सहायता के लिए भी दौड़ता है। बब्बू ऐसा ही सच्चा और संवेदनशील बालक है। वह केवल अपने लाभ या स्वार्थ के लिए परिश्रम नहीं करता, बल्कि अपने जैसे और लोगों के दुखों को कम करने के लिए कम कीमत पर अच्छी ताजी पूरियाँ बेचता है। 
इस नाटक में कुछ खल पात्र भी हैं। जैसे बिना बात गरीबों को सताने वाले पुलिस के लोग और दूसरे मतलबी दुकानदार। ये बब्बू के प्रति ईर्ष्या रखते हैं। मनु जी ने इनके जवाब में सुधाकर जी और पत्रकार सक्सेना जैसे सहृदय पात्रों को रचकर कहानी को और भी रोचक बना देते हैं। कहानी का मुख्य नायक बब्बू जितना संवेदनशील और सहृदय है, उतना ही सूझ-बूझ वाला और धैर्यवान भी है। वह सहयोग लेना भी जानता है और देना भी जानता है। वह समाज के उपेक्षितों और पिछड़ों का प्रतिनिधित्व करता है। और सबसे बड़ी बात यह कि उसके अंदर परिश्रम करके आगे बढ़ने की ललक है। उसमें कामचोरी और बेईमानी की आदत नहीं है। दूसरों द्वारा बाधाएँ पैदा करने पर भी वह डरता और हारता नहीं है। बल्कि दूने उत्साह से उस मुसीबत में कोई न कोई राह निकाल लेता है। वह भूखे और गरीब लोगों को दुखी नहीं देख सकता। यह सामान्य गुण नहीं, बल्कि देवत्व जैसा गुण है, जो उसे दूसरों से ऊँचा उठाता है। यह भावना, ये गुण स्वतः उसके अंदर पनपे हैं। वह अपने काम को पूजा समझकर पूरी निष्ठा से करता है। ग्राहक की संतुष्टि और स्वच्छता उसकी पहली प्राथमिकता है। 
बब्बू को इस काम में अपनी माँ से बड़ा सहारा मिलता है। माँ उसे अकेला नहीं पड़ने देती। बब्बू की आत्मा उजली है। पवित्र है। इसी कारण उसका लक्ष्य भी बहुत बड़ा है। देखिए नाटक का एक प्रभावी अंश, जिससे बब्बू के चरित्र पर प्रकाश पड़ता है—
“सुधाकर जी : (बब्बू का कंधा थपथपाते हुए) लेकिन बब्बू, आज के जमाने में इतनी सस्ती पूरियाँ कैसे बेच पाते हो? अब तो महँगाई भी बढ़ गई है।
बब्बू : बाबू जी, महँगा खाना बेचने वाले तो बहुत हैं, पर मुझे तो अपना खयाल आता था। अपने दुर्दिन याद आते थे। जो मेरे जैसे लोग हैं, दिनभर मेहनत करते हैं, सस्ते में उनका पेट भर जाए, उन्हें साफ-सुथरा और अच्छा खाने को मिले। यह कौन सोच रहा है? रिक्शा वाले, ताँगे वाले, मजदूर सब मेरे यहाँ आते हैं और तृप्त होकर जाते हैं। इनके चेहरों पर तृप्ति देखकर मुझे बहुत खुशी मिलती है।”
रेहड़ी लगाने वाले, चाय के खोखों पर काम करने वाले, कूड़ा बीनने वाले और दिन भर मजदूरी करने वाले गरीब और उपेक्षित लोगों को मनु जी ने बाल साहित्य में प्रतिष्ठित किया है। इन लोगों का संघर्ष बहुत बड़ा और अंतहीन है। ऐसे लोगों को नायक बनाना भी बड़ी बात है। सच तो यह है कि बब्बू दूसरे लोगों को पूरी-सब्जी खिलाकर कोई व्यापार नहीं कर रहा, बल्कि अपने जैसे गरीब-मजदूर लोगों को खुशियाँ बाँट रहा है। उससे जितना बन पा रहा है, उतनी उनकी मदद और सेवा कर रहा है। यह मानवीय भावनाओं और सरोकारों से भरा बहुत सुंदर और रोचक नाटक है।
बच्चों का तन मन जितना कोमल होता है, उनके क्रिया-कलाप भी उतने ही मासूमियत और भोलेपन से भरे होते हैं। उनकी भोली तुतलाती भाषा हर किसी को अपना बना लेती है। उनकी हर बात में अपनापन और जिज्ञासा भरी होती है। अब देखिए न! छोटा-सा पप्पू दादा बन गया। यानी ‘पप्पू बन गया दादा जी' नाटक में एक नटखट बच्चे की शरारतों, मस्ती में किए गए कार्यों, उसकी बेपरवाह जिंदगी और निर्भय-स्वच्छंद वातावरण का बड़ा खूबसूरत चित्रण है। पाठक पढ़ते-पढ़ते इसमें रमता चला जाता है। यहाँ पप्पू दादा जी का चश्मा, छड़ी और अख़बार लेकर दादा जी बनकर घर में हू-ब-हू वैसा ही व्यवहार करता है। उसके हाव-भाव, चाल-ढाल सब कुछ दादा जी जैसा है। उसे इस तरह एक्टिंग करते देख सभी खुश होकर हँसते हैं। 
बच्चे प्राय: बड़ों की ऐसी नकल करते हैं और प्रशंसा भी पाते हैं। यहाँ पप्पू दादा जी का अभिनय ही नहीं करता, बल्कि इस अभिनय में वह मन ही मन दादा जी के जीवन अनुशासन, आदत, हाव-भाव और स्वभाव को भी अपना लेता है। वह इस अनुकरण में वैसा ही इनसान बनने की छवि अपने अंदर समेट लेता है। यह बच्चों को सिखाने और सात्विक मनोरंजन करने का सही तरीका है। बच्चे अनुकरण से बहुत जल्दी सीखते हैं। 
इस संदर्भ में मनु जी लिखते हैं, “नाटक बच्चों की सबसे प्यारी और दोस्त विधा है, जिसमें उनकी कल्पना शक्ति और रचनात्मक ऊर्जा का भरपूर इस्तेमाल होता है। फिर नाटक कोई भी हो—पौराणिक या मनोरम फंतासी लिए हुए, हास्य प्रधान या मीठी सीख देने वाला। अंततः बच्चों का वही नाटक कामयाब माना जाता है, जिसमें पूरी जिंदादिली हो और बच्चे जिसे देखते या पढ़ते समय पूरी तरह लीन हो जाएँ।”
’पप्पू बन गया दादा जी' नाटक में बच्चे की अबोधता और सहज भोलापन देखने लायक है। जब बच्चा अपने दादा जी अभिनय करता है तो वह अचानक कहता है, “अरे वाह! मैं सचमुच दादा जी बन गया!.... क्या बात है। पर भाई, अभी एक कमी है, अखबार! दादा जी तो जब भी देखो, चश्मा लगाए नजर आते हैं। भला बगैर अखबार के मैं दादा जी कैसे लगूँगा?” 
ऐसे नाटकों में बच्चा सूक्ष्म निरीक्षण करना भी सीखता है। फिर यहाँ नाटक की भाषा में अपनापन और संवादों में भोलापन देखने और प्रशंसा करने लायक है।
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प्रकाश मनु जी उन साहित्य सेवियों में हैं, जिनका लेखन बाल मनोविज्ञान की सूक्ष्म समझ से उपजा है। वह जितना विषयों की विविधता लिए हुए है, उतना ही मूल्यवान भी है। मनु जी का बहुआयामी व्यक्तित्व उनकी साहित्यिक कृतियों उपन्यास, नाटक, कहानी और संस्मरणों आदि में मुखर रूप से सामने आता है। बच्चों की भाषा, अभिनय की रुचि, उनके खेलकूद, शरारतें और सीखने का मनोविज्ञान मनु जी के भीतर बैठा बाल रचनाकार खूब जानता है। इसीलिए इन्होंने बच्चों की पसंद-नापसंद, रुचि, प्रवृत्ति, आदत और स्वभाव को ध्यान में रखकर सीधी, सरल बोधगम्य भाषा में बच्चों को रिझाने, गुदगुदाने और तनाव कम करने वाले करीब सौ नाटक लिखे हैं। ये बाल साहित्य की बहुत बड़ी और मूल्यवान उपलब्धि हैं।
मनु जी के नाटक सीधे-सरल होते हुए बहुत कुछ अनकहा कह जाते हैं, जो सूक्ष्म विमर्श की माँग करते हैं। इन नाटकों की बुनावट बहुत ही सीधी, सहज है, फिर भी उनके भीतर...और भीतर उतरने की आवश्यकता है। उनमें जीवन के विविध आयामों, सरोकारों, चिंताओं और संभावनाओं के नित नए द्वार खुलते हैं।
फिर मनु जी के नाटक मनोरंजन करते हुए भी खेल-खेल में सीख देते हैं। जीवन का व्यावहारिक गणित सिखाते हैं। अपने परिवेश में घुलना-मिलना सिखाते हैं। मानव जीवन, पर्यावरण और प्रकृति के बीच सम्यक ढंग से संतुलन साधना सिखाते हैं। इसके साथ ही विकास के लिए आधुनिक तकनीक की उपयोगिता एवं महत्त्व को भी सामने रखते हैं। मनु जी के नाटक बुरे कामों से, बुरे आदमियों से, निठल्लेपन, आलस्य, झूठ, और छल-बल से दूर रहना सिखाते हैं। यह एक प्रकार से पाठकों के मन का विरेचन है। इन नाटकों को पढ़कर बाल पात्र स्वयं बुराइयों और दूसरी विकृतियों से तौबा कर जाते हैं। नाटक का कथ्य और भाषा इतनी असरदार हैं कि पात्र के साथ-साथ पाठक भी कह उठता है कि, “छी! छी! ऐसा घृणित कार्य, मैं तो कभी नहीं करूँगा।” दूसरी ओर यही कथ्य और भाषा पाठक को चारित्रिक दृढ़ता और उत्साह भी देती है कि, “अरे वाह! ऐसा तो मैं भी कर सकता हूँ...या फिर मैं भी ऐसा ही बनूँगा।” यह है मनु जी के नाटकों की असली ताकत!
अपनी रचना-प्रक्रिया के विषय में बताते हुए मनु जी स्वयं स्वीकारते हैं कि, “मैं हर रचना को लिखने के बाद उसे कई बार एक सामान्य पाठक की दृष्टि से पढ़ता हूँ। उस रचना की भाषा कैसी है, उसके पात्र कैसे हैं, उसकी शैली बच्चों के अनुकूल है या नहीं, रचना का कथ्य बच्चों की बच्चों में रुचि पैदा करता है या नहीं। और जब मैं पूर्ण आश्वस्त हो जाता हूँ कि यह रचना उपयुक्त है, तभी उसे आगे भेजता हूँ।” मनु जी यही अंतर्दृष्टि अगली पीढ़ी के रचनाकारों में भी पैदा करना चाहते हैं। यह एक बड़े सर्जक की पहचान है। और ऐसा बिरले, बहुत बिरले सर्जक ही कर पाते हैं। मनु जी के नाटकों को पढ़कर लगता भी है कि ये नाटक कई स्तरों पर मँजते हुए, एक तरह की पूणता के साथ पाठकों तक पहुँचते हैं।
इतना ही नहीं, बल्कि इन रचनाओं में स्वयं प्रकाश मनु जी भी उपस्थित रहते हैं, कभी कोई अबोध बच्चा बनकर, तो कभी किसी सहृदय अभिभावक या उदार हृदय वाले मार्गदर्शक के रूप में। मनु जी के नाटकों की एक और खासियत है कि इनके नाटकों की कथावस्तु कहीं व्यक्तिगत जीवन से ली गई है, तो कहीं किसी बड़े महान साहित्यकार या कलाकार के जीवन की किसी प्रमुख घटना से। उनके संघर्ष और जीवट से प्रेरित होकर तथा उनके बताए रास्तों पर चलकर, बच्चे अपने जीवन की दिशा तय करते हैं। इन महान लोगों का जीवन कदम-कदम पर मानव जीवन को बेहतर बनाने की प्रेरणा देता है। 
मनु जी के कुछ नाटकों को लेकर जिज्ञासावश मैंने प्रश्न किया कि, “गुरु जी, आपके कई नाटक बड़े साहित्यकारों और कलाकारों के जीवन पर आधारित है। इस बारे में कुछ बताइए?” तब मनु जी ने सहृदयता से बताया कि, “प्रिय अशोक बेटे, तुम्हारी बात ठीक है। ‘जसोदा बाबू की अमर गाथा' शैलेश मटियानी जी की जीवन गाथा पर केंद्रित है। ‘राख में छिपे सुनहले अक्षर' में रामदरश मिश्र जी का बचपन है। ‘एक था वसंत' में असमी के दिग्गज साहित्य मनीषी शंकरदेव जी की जीवन कथा है। ‘धरती का कलाकार' में शांतिनिकेतन के एक बड़े कलाकार, रामकिंकर जी की कथा है। इसमें मास्टर मोशाय के रूप में नंदलाल बसु उपस्थित हैं और महान कलाकार बल्कि कलागुरु अवनींद्रनाथ ठाकुर तो इसमें सबसे मुख्य पात्र के रूप में प्रारंभ से अंत तक विद्यमान ही हैं।” 
इस आधार पर हम कह सकते हैं कि मनु जी की नाट्य कथाओं का आधार यथार्थ की भावभूमि से सृजित है, कल्पना तो उसमें रोचकता व जिज्ञासा बढ़ाने के लिए एक साधन के रूप में प्रयोग की गई है। यहाँ मनु जी की प्रशंसा करनी होगी कि इन्होंने इन दोनों तत्वों का संगुम्फन इतने अनोखे ढंग से किया है कि इन्हें अलग करके नहीं देखा जा सकता। ठीक वैसे ही जैसे आटा नमक को इस प्रकार अपने में समा लेता है कि फिर उन्हें अलग नहीं किया जा सकता। और उसका आस्वादन भी पहले से बेहतर एवं स्वास्थ्यवर्धक हो जाता है।
अगर मनु जी के कुछ चर्चित और अत्यंत महत्त्वपूर्ण नाटकों के नाम गिनाने हों तो ’पप्पू बन गया दादा जी', ‘नाचो भालू नाचो,' ‘गुलगुलिया के बाबा,' ‘गंगा दादी जिंदाबाद', ‘जानकीपुर की रामलीला', ‘रहमान चाचा', ‘हरिया देवी', ‘तिशू पू', ‘भुलक्कड़राम,' ‘धमाल पंपाल के जूते', ‘सपनों का पेड़', ‘मुनमुन का छुट्टी क्लब', ‘जसोदा बाबू की अमरगाथा', ‘राख में छिपे सुनहले अक्षर', ‘ताजी-ताजी पूरी भाजी', ‘एक था वसंत', ‘रज्जो की अनोखी सहेली', ‘आखिर जीत गई धन्नू की धुन,' और ‘धरती का कलाकार' आदि ऐसे दर्जनों नाटक है, जो बच्चों के आसपास की दुनिया के दुख-दर्द, संघर्ष, जीवट और आस्थाओं को सहेजे हुए हैं। इनसे दुनिया को जानने के नए-नए और रंग-बिरंगे कपाट खुलते हैं। ये नाटक बच्चों को हिम्मत से जीने, दुख-तकलीफों को हँसकर झेलने और उनका मुकाबला करने का हौसला देते हैं। इन सभी में एक ललक है कि दुनिया को और अधिक सुंदर कैसे बनाया जाए। 
इस तरह मनु जी के बाल नाटक ललित कला, अद्भुत कल्पना, सरस हास्य, सात्विक मनोरंजन और जीवन के कर्म सौंदर्य का बेजोड़ समन्वय हैं। नाटक में कोई भी सीख, घटना, प्रसंग या पात्र बाहर से थोपा हुआ नहीं है, बल्कि सब कुछ आवश्यकता अनुसार स्वाभाविक लय और गति में हैं। वास्तव में जिंदादिली से भरपूर इन अनोखे नाटकों के रूप में मनु जी की अनमोल धरोहर हमारे पास है, जिसके अध्ययन और चिंतन-मनन द्वारा भावी पीढ़ी को सभ्य और आदर्श नागरिक बनाया जा सकता है। 
अंत में मन्नू भंडारी जी की एक उक्ति के साथ मैं अपनी कलम को विराम देना चाहूँगा। यह उक्ति प्रकाश मनु जी के संपूर्ण कृतित्व पर सोलह आने खरी उतरती है। वे लिखती हैं, “लोकप्रियता कभी रचना का आधार नही बन सकती, असली मानक होता है रचनाकार का दायित्वबोध एवं जीवन दृष्टि!” सचमुच मनु जी के नाटकों में यह जीवन-दृष्टि ही है, जो उन्हें औरों से अलग और विशिष्ट बनाती है। फिर एक बड़ी बात यह भी है कि मनु जी की कहानी और कविताओं की तरह उनके नाटक भी बच्चों के सुख-दुख के सच्चे साथी हैं, जो उनके दिल की बात कहते हैं। इसीलिए बच्चे उन्हें इतना पसंद करते हैं। 
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अशोक बैरागी
हिंदी प्राध्यापक, राजकीय कन्या उच्च विद्यालय, हाबड़ी, तहसील - पुंडरी, जिला - कैथल (हरियाणा), पिन-136026, 
चलभाष: +91 9466549394

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