कहानी: छोटे भैया रहट वाले...

नमिता सचान सुंदर

5/138 विकासनगर, लखनऊ - 226022
ईमेल: namitasachan9@gmail.com


पैर के सामने आये पत्थर को हमने जोर से दूर तक उछाल दिया। अब और क्या करते? इतना गुस्सा आ रहा था, किसी पर तो निकालना था ना! इन बड़े लोगों को तो समझाने की कोशिश भी बेकार है। इनके लिये तो बच्चों की न कोई इज़्ज़त होती है, न बात की कीमत, जैसे ये सारे भारी भरकम शब्द बस इन बड़े बुजुर्गों के लिये ही बनाये गये हो। कितनी कोशिश की थी अम्मा को समझाने की, बस एक बार वह नयी वाली पेन्सिल स्कूल ले जाने दो, पर नहीं, अच्छी चीज है तो उससे घर पर ही लिखो। अब भला ये क्या बात हुई? जब तक उसे क्लास में सबको दिखाया न जाये, सबकी आँखों में उसे छू लेने की ललक को देखा न जाये, तो नयी तरह की चीज का क्या फ़ायदा!
कल कितने रुआब से सबके बीच में हमने अपनी नयी पेन्सिल का जिक्र किया था। हमारे मामा कानपुर आई.आई.टी में थे। वहाँ बहुत सारे दूसरे देशों के लोग भी थे।  उन्हीं में से एक ने हमें वह पेन्सिल दी थी। तब आज की तरह ग्लोब्लाईजेशन का जमाना तो था नहीं कि दूसरे देश और वहाँ की चीजें, मोहल्ले-पड़ोस की बात हों।  फिर असली मुद्दा यह नहीं था कि पेन्सिल कहाँ से आयी या किसने दी, वह पेन्सिल थी ही इतनी अलग और खूबसूरत, काही रंग की एच.बी. पेन्सिलों और लाल रंग में काली धारियों वाली एक जैसी पेन्सिलों की भीड़ में एकदम अलग चमकती वह पेन्सिल।
मूड बेतरह खराब होने के बाद भी उस पेन्सिल का ध्यान आते ही मेरे मन में खुशी उमगने लगी। चेहरे पर अपने आप ही मुस्कुराहट आ गयी। दोस्तों, सहेलियों द्वारा चिढ़ाए जाने, मजाक उड़ाए जाने की आशंकाओ की धुन्ध छँट गयी और मेरी समूची चेतना पर बस वह पेन्सिल छा गयी। कैसा चमकता सा धानी रंग है और उसकी छुअन भी कैसी रेशमी है। ये अपनी आम पेन्सिलों जैसी नहीं कि ज्यादा लिखो तो उंगलियां कड़ी पड़ जायें। उसके हाथ में आते ही ऐसे लगता है जैसे वह हमें सहला- सहला कर और लिखने के लिये उकसा रही हो। और धानी रंग पर नन्हे-नन्हे बसंती फ़ूल बिल्कुल सरसों के फ़ूले खेत सी, जिसमें दोनों हाथ फ़ैला कर बस हवा के साथ दौड़ते जाने का मन करे।
हम अपने कल्पनालोक में ऐसे खोये थे कि हमें पता ही नहीं चला कि हम कब आधे से ज्यादा रास्ता पार कर चुके थे और स्कूल पास आने वाला था। हम वापस धरातल पर थे । सबके चेहरों पर छाने वाली मुस्कान हमें अभी से डरा रही थी।
कल जब हम अपनी पेन्सिल का वर्णन कर रहे थे तो आधे से ज्यादा को तो विश्वास ही नहीं हो रहा था और अब जब हम उन्हें दिखा नहीं पायेंगे तो सब कहेंगे कि यह तो बस हर चीज की कल्पना कर लेती है इसलिये हमें बेवकूफ़ बना रही थी।  
हमें कोई झूठा कहे तो सच कित्ता गुस्सा आता है पर अब हम कर भी क्या सकते हैं?  मेरा बस चलता तो आज स्कूल नहीं आते, पर फ़िर वही मुश्किल, अम्मा को क्या समझाते कि हम क्यों नहीं जायेंगे। मेरी इतनी बड़ी परेशानी और उनके लिये तो बस हंसने की बात हो जाती। हम तहेदिल से मना रहे थे कि आज कोई करिश्मा हो जाये और सब पेन्सिल के बारे में भूल जाय़ें या तो आज किसी कारणवश जाते ही छुट्टी हो जाये। एक दो दिन बाद तो वैसे भी सब कुछ-कुछ भूल ही जायेंगे और तभी करिश्मा हो गया।
सड़क के उस पार वाले मैदान में हम लोगों के छोटे भैया अपने लावा लश्कर के साथ मौजूद थे। ये छोटे भैया यूँ तो रहट वाले थे,  अरे रहट यानि आज के जाइंट व्हील का पुराना संस्करण, लेकिन हम सब के लिये वे ’मिनी’ के ’काबुलिवाला’ से कम नहीं थे। रहट झूलने से ज्यादा मजा हमें उनके यात्रा संस्मरण सुनने में आता था। उन दिनों वैसे भी बच्चों के लिये घूमने जाने की जगहें निश्चित सी हुआ करती थीं ...छुट्टियों में दादी-नानी के घर। ऐसा नहीं कि हम इन जगहों में जाने के लिये लालायित नहीं रहते थे पर इन जानी समझी जगहों से एकदम अलग होता था छोटे भैया की यात्राओं का संसार।
हर दो तीन महीने में एक बार वे हमारे स्कूल के पास वाले मैदान में अपना रहट गाड़ते थे और जिस दिन वे आते थे हम लोगों के मन जैसे रस्सी तुड़ा कर उनके पास भाग जाने को आतुर रहते थे। कोई और बात हम लोगों के बीच होती ही नहीं थी। रहट के हिंडोले में बैठने से पहले ही हम पूछते ’छोटे भैया, इस बार कहाँ हो आये?’ और फिर हिंडोले की ऊपर नीचे लहराती गति के साथ हमारी आँखो के आगे सजने लगता कभी किसी गांव का मेला, हरी, नीली, गुलाबी चूड़ियों की दुकानें, मिट्टी के खिलौने, कठपुतली का नाच, मुंह में घुलने लगता खोये की मिठाइयों का सोंधा स्वाद या फ़िर गन्ने के खेत, आम का बगीचा, नाचता मोर, कभी आंधी-पानी, कभी काली रात में छोटे भैया की भूत से मुठभेड़, कुश्ती, दंगल, नौटंकी और न जाने क्या-क्या। गरज यह कि हम हर बार छोटे भैया के वंडरलैंड में एलिस होते थे। विषय से अधिक हमें सम्मोहित करता था उनके कहने का अंदाज। कैसी नई नोखी होती थी उनकी शब्दावली और कैसा आवाज का उतार चढाव! हर दृश्य आंखों के सामने चित्र सा सजीव हो उठता था।
लेकिन छोटे भैया और हम लोगों के रिश्तों में इससे भी इतर बहुत कुछ था। स्कूल जाते समय हम लोग कितनी भी जिद करें वे हमें कभी रहट नहीं झुलाते थे।  उनका कहना था कि पढ़ने जाते समय मन बिल्कुल पढ़ाई की तरफ ही होना चाहिये। स्कूल से लौटते समय भी एक राउंड के बाद दूसरा नहीं, अम्मा घर में रस्ता देख रही होंगी। हाँ, शाम को खेलने के समय अम्मा को बता कर आने पर हम उनके पास रुक सकते थे। हिंडोले में बैठने के पैसे तो सीमित होते थे, इसलिए झूलने के बाद हम लोग वही आस-पास ईंट पत्थर पर बैठ उनकी बातें सुनते थे। हाँ, एक बात और बहुत प्यार करते थे वे हम लोगों को। नहीं इसमें कहने सुनने की क्या बात है? बच्चे थे तो क्या हुआ, इतना तो हमें समझ में आता ही था। लेकिन सारे प्यार दुलार के बावजूद वे बिना पैसे के हमें एक चक्कर भी नहीं झुलाते थे। नहीं-नहीं आप बिल्कुल गलत समझे। इसका कोई विशुद्ध व्यावसायिक कारण ही नहीं था मात्र। वे हमारी आदतें नहीं बिगाड़ना चाहते थे। अगर कारण मात्र व्यावसायिक ही होता तो हमारे पास ज्यादा पैसे होने के बावजूद वे हमें सारे पैसे रहट में ही ना खर्च करने की सलाह नहीं दिया करते।
रहट चलाना उनका जीवकोपार्जन का साधन जरूर था पर देखिये न, वे अपने होने को कितना अर्थपूर्ण बनाते चलते थे। उनके हर पड़ाव पर हमारे जैसे कितने ही बच्चे होंगे जिनमें उन्होंने अच्छाई के बीज बोये होंगे । उनके अनुभव सुनते समय हम लोग उनसे अक्सर कहते थे, ‘’छोटे भैया आपके कितने मजे हैं, कभी यहाँ, कभी वहाँ। कितनी नयी-नयी चीजें देखते हैं।” असल में उनका यूं कांधे पर गृहस्थी लादे कभी भी कहीं भी चल देना हमें बड़ा फ़ैसिनेट करता था। कैसा तो एक मुक्त होने का एहसास दिलाने जैसा। पर हमारी बात सुन कर उनके चेहरे पर जो एक अबूझी सी मुस्कान छा जाती थी उसका अर्थ हमें आज समझ में आता है। हमारा तिलिस्म नहीं तोड़ना चाहते थे, इसीलिये शायद कुछ नहीं कहते थे, पर अपनी देहरी से दूर कभी ना खत्म होने वाले रास्तों पर लगातार चलने की मजबूरी का दर्द समझने लायक हम तब कहाँ थे।
हमें याद है एक बार उनके छोटे से तम्बू के बाहर बने ईंटों के चूल्हे को देख हमने उनसे अचानक पूछा था , ’छोटे भैया आपका घर नहीं है कहीं क्या?’
“है ना बिटिया, और घर में आपकी जैसी एक बिटिया भी है। उसी के लिये पैसा कमाने तो हम निकलते है रहट ले कर।”
सच कहें तो उनके चेहरे पर अचानक फैली ढेर सी खुशी और ममता देख हम अन्दर कहीं थोड़ा दुखी हो गये थे। हमें लगा, अरे कोई और है जिसे ये हमसे ज्यादा प्यार करते हैं। लेकिन अगले ही पल हमें उस नन्ही सी बच्ची पर दया आयी कि उसे अपने पिता से कितने-कितने दिन दूर रहना पड़ता है।
लेकिन छोटे भैया ने बताया कि चाहे केवल रात भर के लिये ही क्यों ना हो वे हफ़्ते में एक दिन अपने घर जरूर हो आते हैं। उस दिन के बाद से हम जब भी उनसे मिलते उनकी बिटिया के बारे में जरूर पूछते।
देखिये छोटे भैया दिखाई पड़ गये तो हम बस उन्हीं के बारे बिना रुके बोले चले जा रहे हैं और वह हमारी पेन्सिल तो जाने कहाँ रह गयी। लेकिन यही तो चमत्कार है हमारे छोटे भैया का। हमें पता था उनके आने की खबर सुन कर बस उनकी ही बातें होने वाली हैं।
हम दौड़ कर उनके पास गये, ”कब आये छोटे भैया? देर रात क्या?”
“हाँ बिटिय़ा। जब तक स्कूल से लौटोगी तब तक रहट खड़ा हो जायेगा। अरे आज अकेले कैसे?  तुम्हारे साथी कहाँ है?”
“बस, सब आ ही रहे होंगे।”, हमने खुश हो कर कहा और जल्दी से स्कूल की ओर बढ़ गये । सबको बताना भी था ना कि आज खाने की छुट्टी में कोई भी बाहर खड़े ठेलों से कुछ भी खरीद कर नहीं खाएगा, रहट झूलने के लिये पैसे जो बचाने थे। जैसा हमने सोचा था वैसा ही हुआ, उस दिन पेन्सिल का ध्यान किसी को नहीं रहा, लेकिन मेरे मन में तो उसे दिखाने की चाह थी ना।
आखिर अपने लगातार प्रयासों से हमने एक दो दिन में अम्मा को मना ही लिया और उस दिन पेन्सिल मेरे बैग में थी। हम उस दिन भी स्कूल अकेले जा रहे थे। हमने सोचा कि यदि कालोनी के बच्चों के साथ जायेंगे तो पेन्सिल बैग में है यह बात पचा पाना मेरे लिये जरा मुश्किल होगा और रास्ते मे रुक कर बैग से पेन्सिल निकाल कर दिखाने में वह बात नहीं आयेगी जो क्लास में अचानक उसे सबके सामने लाने में होगी। हम यही सब सोचते चले जा रहे थे कि मैंने दूर से छोटे भैया को अपने दोनों हाथों में सर थामे बैठे देखा।
अरे ऐसे तो वे कभी नहीं रहते। कल शाम ही तो बता रहे थे कि इस बार बस तीन चार दिन ही रुकेंगे। इस बार मेले में कमाई अच्छी हो गयी थी। वे तो इधर आने वाले नहीं थे मगर अबकी बिटिया और उसकी माई को लेकर बिटिया की नानी के यहाँ जाना था। रहट ले कर लम्बे समय तक नहीं आ पायेंगे इसीलिये रास्ते में तीन-चार दिन हम लोगों के पास रुकने आ गये थे। बहुत खुश थे कि बिटिया के लिये इस बार अ-आ की किताब भी खरीदेंगे। आज तो उन्हें सब सामान खरीदना था और रात को चल देना था।
हम धीरे से उनके पास जा खड़े हुए, “छोटे भैया क्या हुआ?”
बहुत बार बुलाने पर उन्होंने धीरे से सिर उठाया। हम धक से रह गये। हमेशा मुस्कुराती रहने वाली उनकी आँखों में पानी था।
“हम लुट गये बिटिया। बर्बाद हो गये। कल रात जाने कौन हमार पैसा वाला बैग चुरा ले गया। अब कौन मुँह ले कर घर जायें! बिटिया और उसकी माई कितने उछाह से रस्ता तकत होंगी। अब हम का ले जा पायेंगे अपनी बिटिया के लिये।” 
छोटे भैया का प्रलाप जारी था। धीरे-धीरे उनके चारों ओर बच्चों का गोल घेरा हो गया था। हम सब दुख और आक्रोश से भरे थे। क्या करें हम अपने छोटे भैया के लिये? 
अचानक हम सबके हाथ अपने-अपने बस्ते में गये और फ़िर छोटे भैया के सामने फैल गये। सबकी हथेली पर पाँच पैसे का सिक्का था और मेरे हाथ में पैसों के साथ पीले फूल वाली धानी पेन्सिल।

7 comments :

  1. ख़ूबसूरत कहानी.....

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    1. हार्दिक आभार, आपका।

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  2. बचपन तो बंद किताब के खुले गए पन्ने से जीवंत हो उठा । बालमन की निश्छलता , उत्कंठा और सौहार्द को कितनी सरलता से कहानी में उतार दिया । लव यू मित्र ।💐

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    1. हार्दिक आभार आपका।

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    2. कहानी ने आपके मन को छुआ, यह जान कर मन प्रसन्न हो गया।

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  3. बालमन की उत्कंठा , सौहार्द को बहुत ही सरलता से कहती कहानी ...बहुत ही सुन्दर मनोवैज्ञानिक दृष्टि 💐💐

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    1. आपकी टिप्पणी ने हमारा उत्साह बढ़ाया। प्रेरित करने के लिए आत्मीय आभार।

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