व्यंग्य: हृदय सम्राट अमेरिका में

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

अपने बारे में क्या कहूँ जी, मैं खबरखोजी पत्रकार हूँ। रोज रतजगा करता हूँ। इधर की उधर और उधर की इधर करने के लिए नारदजी तो रहे नहीं, इसलिए अब यह नैतिक दायित्व मेरा ही समझे। लोगों के कैबिनों, बेडरूमों, सैर-सपाटों, पतियों-पत्नियों-प्रेमिकाओं और उनके बैंक बैलेन्स की मुझे पुख्ता जानकारी रखनी पड़ती है। नैतिक कामों की ख़बर तो लोग खुद-ब-खुद दे देते हैं। मैं तो जब कोई अनैतिक काम होता है, भगवान शंकर का तीसरा नेत्र धारण कर अनैतिकता का लेखा-जोखा तैयार करता हूँ। इसे ‘ब्रेकिंग न्यूज’ कहता हूँ, फोन उठाता हूँ और ‘फँसे मुर्गे’ को ‘हिंट’ देने की जुगाड़ भिड़ाता हूँ। उसे या उसके मुँह लगे जी-हुजूरिये को अपना डिस्पैच रोकने का मार्केट भाव बताता हूँ और कहता हूँ बोल तू खरीदता है या सनसनीखेज संपादकों के कारटेल को खरीदवा दूँ। लोग घिघियाते हैं, प्रेम-रहस्य हो तो उनकी पत्नी को न बताने की प्रार्थना करते हैं। यदि यह राजनीतिक रहस्य हो तो सत्तारूढ़िये, विपक्ष के राक्षसों को इसे न बताने के लिये भेंट-पूजा कर देते हैं। यदि यह रिश्वत-रहस्य हो तो खाऊभाई उसका एक टुकड़ा मुझे बिना माँगे सादर दे देते हैं। बस रहस्य को ‘टॉप सीक्रेट’ बनाये रखना ही मेरा धंधा है। यहाँ अपना परिचय समाप्त करता हूँ और अब आज की कहानी कहता हूँ।

सूचना प्रकाशन विभाग के ढोलकियों द्वारा आधे मन से लिखे प्रचार-पर्चे मेरी टेबल पर आ गए थे। सरकारी संस्थानों के जनसम्पर्कियों द्वारा लिखी बॉस-गुणावलियाँ रद्दी की टोकरी में जा रही थीं। खुद को जनता का सच्चा प्रतिनिधि कहने वाले लोगों ने उटपटांग, खरा-खोटा और बेबुनियाद लिखवा भेजा था, वह विचाराधीन रख रहा था। कुछ ने वर्ली-मटके के वलन की तरह माल-मसाला टेलीफोन से उतरवा दिया था। दिन भर की गप्पें-शप्पें दिमागनुमा टेलीविजन के स्क्रीन पर आ-जा रही थीं, टेलीप्रिंटर की टेल छँट चुकी थी। इतने सारे ‘रॉ मटेरियल’ में कोई ‘हॉट’ खबर न मिली। विश्व में विश्व सुंदरी होती है, ताक-झाँक में गच्चा दे जाती है पर उत्साही विशेषज्ञ ढूँढते हैं तो वह मिल जाती है, वैसे ही महानगर में महाखबर होती है। स्थापित कतरन बाज पत्रकार झक मारते रहते हैं और मैदानिये पत्रकार कहीं से महाखबर उठा लाते हैं। मैं भी ऐसी किसी महाखबर की तलाश में था। पत्रकार बहुरुपिया होता है सो मैंने नया अवतार धारण किया, अपना नश्वर शरीर टेबल के सहारे कुर्सी पर टिकाया और आत्मा को बाहर निकाल दिया। उड़न-छू आत्मा ने कुलांचें भरी और वो जाय, वो जाय, खबरों की तलाश में।

नारकोटिक्स वालों की अफ़ीम की और पत्रकारों को खबर की गंध आती है। उड़नशील आत्मा को लगा यहीं-कहीं खबर है, सो वह रुकी और उसने गिद्ध दृष्टि से देखा। यूनिवर्सिटी का होस्टल था। कहीं से पॉप म्यूजिक की तरंगें केम्पस में छा रही थीं। पूरी विंग में अंधेरा घुप्प था। अजाबोगरीब शांति थी। आत्मा को लगा था यहाँ यूनिवर्सिटी बिल्डिंग को यज्ञ-मंडप बनाने की योजना चल रही होगी, एक-दो बसों को स्वाहा-स्वाहा कर क्रांति की बात होगी, या किसी ठिलवे नेता का चुनाव-प्रचार करना होगा। यहाँ ऐसा कुछ न मिला। लड़के इतने अनुशासन प्रिय तो हो नहीं सकते कि वे अभी से सो जाएँ। आत्मा ने द्वार टटोले, वहाँ ताले जड़े थे। बस एक द्वार ताला विहीन था। आत्मा को झटका लगा और वह उस कमरे में घुस गई। उस कमरे में कई लड़के थे, चौड़ी आँखों से जिज्ञासा टपक रही थी। वे ब्लू-फिल्म देख कर ज्ञान पा रहे थे और प्राकृतिक हो रहे थे। मेरी आत्मा एक उफनते युवक की देह में प्रविष्ट हो गई और अनुनादित होने लगी पर क्लाइमेक्स पर फिल्म अटक गयी। अनींदे, अलसाते, कमर-कड़काते, अंगड़ाते लड़के उठे। एक ने कुर्सी को हथेलियों में भींच कर लकड़ी-लकड़ी कर दिया। दूसरे ने बाथरूम के बंद दरवाजे को टाँग मिला कर दी तो पटिये उखाड़ दिये और नल को नदी-सा बहा दिया। तीसरे ने रेलिंग के पाइप को खींच कर बाहर निकाला और उसकी गोल घड़ी कर दी। चौथा लड़का पहलवान था, उसने दो सुकुमार लड़कों को एक साथ पटकनी दे मारी। मेरी आत्मा ने जिस माध्यम में प्रवेश किया था, वह ‘ड्रग एडिक्ट’ निकला। वह सचित्र सद्-साहित्य पढ़ने लगा। ग्लॉसी पृष्ठों पर मुद्रित छबियाँ जानी-पहचानी थीं। पर विश्वविद्यालय कैम्पस से यह कोई नई खबर नहीं थी, जिसे बेचा जा सके। मेरी रसीली रसखोर आत्मा को होस्टल थार का रेगिस्तान लगने लगा था, आत्मा ने उड़ान भरी और नया शिकार फिर तलाशने चल दी। 

दूर एक रेस्ट हाउस नजर आने लगा। अतृप्त आत्मा ने उधर शरण लेने की सोची। उसे उम्मीद थी वहाँ कोई चुलबुलाता- कुलबुलाता सरकारी सांड मिलेगा। पाँच साल की, किन्तु तदर्थ नियुक्ति पर आया होगा। किन्तु थोड़ी ही देर में उम्मीदें हवा हो गयीं, न इम्पाला थी, न पद‌मिनी प्रीमियर। मंत्री जी की कार की बजाय एक जीप खड़ी थी। जीप मतलब मोबाइल सरकार। दुखी एवं विपत्ति ग्रस्त आत्मा वहीं उतरी। निराश आत्मा ने धैर्य नहीं छोड़ा। सोचा सांड न सही, पाड़ा तो है। सरकारी पाड़ा कलेक्टर-कमिश्नर के बराबर होता है। आत्मा ने वहाँ आदमी के चार-छ: बच्चों को मिमियाते देखा। किसी बड़े अफ़सर के वहाँ होने की गंध उसके नथुनों में घुस आई थी। महफिल की गंध पाकर आत्मा की लार टपकने लगी, उसने कमरा नम्बर दो में झाँका। उसकी आँखें चौड़ी होते-होते आलू हो गयीं। आला अफसरान कानून और व्यवस्था को अपने पंजों में दबोच लेना चाहते थे। कानून की संगत पर व्यवस्था कैबरे कर रही थी। बस, कानून धीरे-धीरे अपनी थाप मंद किये जा रहा था। लाला सेठ, ठेकेदार धनराज और कथित समाजसेवी अपनी सारी सील बंद थैलियाँ न्योछावर कर चुके थे और थकी-हारी तार-तार व्यवस्था के अंग-प्रत्यंग रबड़ी की तरह चाट रहे थे। किसी का टेंडर मंजूर हो गया था, किसी का कोटा। किसी की फाइल दबा दिए जाने पर सहमति बनी थी तो किसी के दुश्मन को रगड़ देने की योजना। चमचों के मुँह मक्खन लिपटा था। रात के बारह बजे थे, दफ्तर बंद थे पर प्रशासन चल रहा था, कठिनतम काम सहज ही हो रहे थे। तभी कहीं से एक जीवंत पत्रकार अवतरित हुआ। उसने एक अफसर को इशारा किया। पत्रकार की साक्षात् उपस्थिति से हड़कप मच गया। सहमे-सहमे अधिकारियों ने जबरदस्ती खीसें निपोर दी। उस सतर्क अफसर ने पत्रकार का अभिवादन किया। दूसरे, तीसरे, चौथे, पाँचवे ने त्वरित निर्णय लिया। भूत-प्रेत तक खा-पी कर पीछा छोड़ देते हैं तो वहाँ तो सशरीर पत्रकार था। उसने जी भर कर खाया-पीया, व्यवस्था को सहलाया-दुलराया। उसे कृपावंत अफ़सरों ने विज्ञापनों का लाली-पॉप दिखाया और एक सील बंद थैली भेंट की। थैली मिलते ही पत्रकार की आँखों में दृष्टि-दोष आ गया, उसे गलत चीज़ें सही लगने लगीं। थैली भारी-भरकम थी, पर हल्की-फुल्की लग रही थी। उसे आइन्सटीन का सापेक्षिता सिद्धांत समझ आ रहा था। मेरी पत्रकारी आत्मा के सामने नंग-धड़ंग व्यवस्था थी और उसका आबंटन कर रहे शिकारी अधिकारी, लपलपा रहे थे। सच पूछो तो प्रथम दृष्ट्या यह न्यूज थी। अखबार की हेड लाइन्स भी बनाई जा सकती थी। इस पर गपोड़िये बुद्धिजीवियों की चर्चाएँ हो सकती थीं। दूसरे अफसरों के लिये यह नीति-निदेशक सिद्धांत बन सकती थी। मेरी अतृप्त पत्रकार आत्मा को एकबारगी लगा, वास्तविक खबर तो यही है। मीडिया, अफसरों और दलालों की मिलीभगत पर फ्रंट पेज न्यूज बन जाती। पर इसमें मुझे कुछ नया नहीं लगा, भ्रष्टाचार सर्व-व्यापी और सर्वज्ञात था। पाठकों को ऐसी खबरें अब उद्वेलित नहीं करती थीं। मेरी पत्रकार-आत्मा बेहद चिंतित थी देश के भविष्य के बारे में, छात्रों के बारे में, शिक्षा के स्तर के बारे में, बेरोजगारों के बारे में, सेठों-अफसरों के चरित्र के बारे में। वह सोचते-सोचते थक गयी पर हेड-लाइन्स के योग्य यहाँ कोई न्यूज नहीं मिली। 

उड़ते-उड़ते मेरी आत्मा राजधानी के एक गुप्त स्थान से गुजरी। 'पिन-ड्राप' सायलेन्स था, न कुत्ते थे न सुअर, फिर भी पुलिस वाले गश्त दे रहे थे। आत्मा को अंधेरे में सिक्युरिटी गार्ड नज़र आया जो दाल में काले जैसा लग रहा था। ऊपर से क्षेत्र में प्रवेश निषेध था। इसलिये ख़बर खोजी आत्मा रुकी। सशरीर निषेधाज्ञा तोड़ने में जो आनंद मिलता है, वह उसने बिना शरीर के उठाया। आज्ञा तोड़ी तो आगे एक बंद कमरा मिला। उसमें मद्धिम-सी रेशमी रोशनी थी, ग्यारह व्यक्ति थे, वे भेड़-बकरी से बेहतर थे। वे आदमी तो थे नहीं, विधायक थे। आप तो जानते ही हैं ये वो कौम है जो चाहे जिस मुख्यमंत्री की कुर्सी खींच ले, राज-पाट छिनवा दें, मंत्री के बिस्तर बंधवा दे। आय. जी., डी. आय. जी. की टोप उछलवा दें, सरकारी कर्मचारियों और शिक्षकों पर ट्रांसफर की डी.डी.टी. का छिड़काव करवा दे पर उन्हें कुछ भी न हो। वे विधायक थे और विधायक बने रहने वाले थे। इन ग्यारह लोगों में एक उदास मुख्यमंत्री थे। शहजादा सलीम जैसे ऊपर से रुआँसे लग रहे थे गोया सत्तारूपी नूरजहाँ के विरह में मर रहे हों। वे उचित वक्त की प्रतीक्षा में मन ही मन कातिलाना योजनायें उमड़ा-घुमड़ा रहे थे। बाकी लोगों में एक मंत्री थे और उनके पिछलग्गू विधायक। मंत्री जी का गुट समाजवादी, प्रगतिवादी और धर्म निरपेक्ष था। वे मंत्री मण्डल के दूसरे मंत्री के गुट की तरह पूंजीवादी, नाजीवादी और दंगा-दंगलवादी नहीं थे। वे सिद्धांतों के लिये शहीद हो सकते थे और सिद्धांत उनके लिये शहीद हो सकते थे। सिद्धांत और उनमें ऐसा परस्पर समझौता था। इसलिये जैसे ही वे किसी सिद्धांत को शहीद करते, वे नया सिद्धांत बना देते थे। खैर ऐसी 'न्यूज' कई बार छप चुकी थी। ग्रामोफोन रिकार्ड को उलट-पलट दो तो भी वे बजते हैं, बस बजाने वाला चाहिए। उनके सिद्धांतों के रिकार्ड भी इस तरह हर कोण से विवेचित हो चुके थे। सीधे-सीधे कहूँ तो उनकी मक्कारियों को लम्बा-चौड़ा करके छापा जा चुका था। आत्मा को यहाँ से नयी खबर मिलने की आस बँधी तो उसने दीवारों के कान में अपने कान भी लगा दिये। हरिजन आदिवासियों को पट्टे देने में लपक कर हुई धांधली का बेबाक विवरण दिया गया। यह तथ्य भी सामने आया कि अस्सी प्रतिशत ज़मीन दूसरे गुट के पूंजीवादी लोगों ने हथिया कर अपने लड़के-लड़‌कियों और दामादों के नाम पर चढवा दी थी। थानेदारों की भर्ती में तीन-चौथाई लोग इन दंगा-वादियों के थे। लेक्चरारों की लिस्ट में इनके ही इनके लोग थे पर वे सब भ्रष्ट-संस्कृति में पले-पढ़े थे। तहसीलदारों-पटवारियों की भर्ती में अप्रत्याशित माल ही माल था। इधर-उधर तबादलों में भी इन असामाजिक तत्वों का बोलबोला था। कानून और व्यवस्था को तहस-नहस करने वाले ये नाजी वादी लोग थे, अतः प्रगतिवादी गुट ने मंत्रीमंडल छोड़ने की धमकी दे रखी थी। मुख्यमंत्री को गद्दी हिलती नजर आ रही थी। बिना सिंहासन का नेता बासी अखबार होता है। बासी का भाव दो रुपये किलो का था, सो वे अपनी स्थिति मजबूत बनाना चाहते थे।

इन विधायकों ने अपने नेता भरोसेलालजी के लिए संयुक्त-मुख्यमंत्री पद की माँग रखी। यह तो एक म्यान में दो तलवार जैसा था। मुख्यमंत्री डर गये थे। उनके घर भी संजय, कांति और सुरेश थे, ऊपर से उनका दिल भी गुलकन्दी तबियत का था। वे अपनी कैबिनेट से कम, अपनी कैबिनेट साइज़ की रंगीन फ़ोटो से ज़्यादा घबराते थे। उन्होंने राजनीति की चाल चलते हुए कहा 'भरोसेलालजी और आप लोगों के साथ ज़्यादती हुई है। भरोसेलालजी को उपमुख्यमंत्री पद और फलां राज्य मंत्री को कैबिनेट स्तर दे देने से संतुलन हो जायेगा। उन्होंने उन विधायकों की राय पूछी। प्रगतिवादी विधायक विरोध करते रहे। वे हमेशा, हर बात का विरोध ही करते थे। वे गला फाड़ कर चिल्लाये, ‘हम पद और प्रतिष्ठा के भूखे नहीं हैं। हमें न्याय चाहिये, हर जोर जुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है।‘ मुख्यमंत्री विधायकों को आग्नेय दृष्टि से देखना चाहते थे पर तत्क्षण मुस्करा दिये। मंजे हुए राजनीतिज्ञ  ऐसे ही होते हैं। वे जैसे होना चाहते हैं, उसके उल्टे दिखते हैं। उन्होंने नया टुकड़ा फेंकते हुए कहा -हम मंत्रीमण्डल का विस्तार कर लेते हैं, आपके गुट में से किसी और को भी राज्य मंत्री बना देंगे बिना विभाग का, कहिये? संघर्ष और आक्रोश का गुब्बारा ढीला हो गया। अब कहीं विधायकगण हल्के-से मुस्कुराये और ताजा भर्ती में चल रही धांधलियों को उजागर करने लगे। मुख्यमंत्री निर्विकार सुनते रहे। वे बीच-बीच में हँसते रहें, ताकि अवाम को संदेशा जाए कि उनके हृदय सम्राट सुरक्षित हैं। 

आज सवेरे ही पार्टी के केन्द्रीय कोषाध्यक्ष को लाखों रुपयों का 'गुप्त दान’ पहुँचाया था। पार्टी का वार्षिक अधिवेशन उनकी नाक के नीचे होने वाला था। उन्होंने नए उपमुख्यमंत्री जी को इशारा किया, वे मंत्रणा करते-करते मुख्यमंत्री के साथ कार में बैठ गये। उन्होंने अपनी अलगाववादी आत्मा को जेब से निकाल कर मुँह में रख दिया। उनके विभाग की दो फाइलें मुख्यमंत्री जी के पास रुकी पड़ी थीं। भरोसेलालजी के लिए यह चालीस-पचास लाख रुपयों का दाँव था। उन्होंने फाइलों का जिक्र किया। मुख्यमंत्री स्मित मुस्कुराये और वार्षिक अधिवेशन के लिये गुप्त दान मांगा। द्विपक्षीय मंत्रणा हुई, मामला ‘सेटल’ हो गया। इतना कुछ घटित हो गया था आँखों के सामने, पर मेरी आत्मा इसे भी हेड लाइन न्यूज मानने को तैयार नहीं थी। यह अलग बात है कि पत्रकार की आत्मा ऐसे गोरखधंधे सहन नहीं कर पाती। आत्मा मेरे शरीर में यथास्थान आ बैठी और मैं चैतन्य हो मुख्यमंत्रीजी के सामने अवतरित हो गया। मैंने सरकार के स्थायीत्व पर मुख्यमंत्री की प्रतिक्रिया जानना चाही, तो वे मुस्कुराये और बोले, खबरखोजी, सही समय पर आए। मैं अगली यात्रा पर अमेरिका जा रहा हूँ। मुझे तुम्हारी जरूरत है, मेरे साथ चलना। उनके शब्द शहद घोल रहे थे और मैं उनके हवाले सुर्खियाँ लिख रहा था – हृदय सम्राट अमेरिका में, विश्व बैंक से हजार करोड़ मिलने की आशा।

ईमेल: dharmtoronto@gmail.com फ़ोन: +1 416 225 2415
सम्पर्क: 22 फेरल ऐवेन्यू, टोरंटो, एम2आर 1सी8, कैनेडा

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।