कहानी: छपाक, छपाक, छपाक

विजय कुमार संदेश

प्राध्यापक, पी.जी. हिन्दी विभाग, मार्खम कॉलेज, हजारीबाग, झारखंड,भारत
दूरभाष: +91-943 019 3804
ईमेल: sandesh.vijay@gmail.com

एक श्रावणी सुबह। आकाश में बादल दो-एक दिनों से इधर से उधर हवा के संग-साथ दौड़ रहे थे। दस-पंद्रह दिनों से बारिश नहीं हुई थी। इस कारण वातावरण में उमस बढ़ गयी थी। उमस के कारण प्रियव्रत को रात में ठीक से नींद भी नहीं आयी। चिड़ियों की चीं-चीं के साथ अहले सुबह प्रियव्रत की नींद खुली तो अलसायी आँखों को मलते हुए उसने टीवी का रिमोट पकड़ा और अन्यमनस्क भाव से एक चैनल का बटन दबा दिया। उस चैनल पर अभी समाचार चल रहा था। चैनल पर चल रहे समाचार को जैसे ही प्रियव्रत ने देखा, सुना उसके होश उड़ गए। शरीर में यकायक पसीना छलक आया। समाचारवाचक लगातार कह रहा था कि आज सुबह-सुबह मंत्री जी रमाशंकर सहित एक प्रशासनिक अधिकारी विधुशेखर और एक अधीक्षण अभियंता उत्पल के कई ठिकानों पर एक साथ आय से अधिक मामले में छापामार दस्ते के अधिकारियों ने छापा मारा। छापे में मंत्री जी और इन अधिकारियों के ठिकानों से करोड़ों रुपये नकद, करोड़ों के फिक्स डिपोजिट के कागजात, सैकड़ों एकड़ खरीदी गयी भूमि के दस्तावेज सहित कई फर्जी डाक्यूमेंट्स मिले। रुपये गिनने के लिए बैंक से मशीन मंगवानी पड़ी। प्रियव्रत भौंचक-सा कभी इस चैनल तो कभी उस चैनल के लिए बटन दबाता रहा। उसने कई बार तीनों को समझाया था कि बुरे कर्म का नतीजा अंततः बुरा होता है। पर, वे नहीं माने। उल्टे प्रियव्रत को ही सिद्धांतवादी कहकर अक्सर वे उसका मजाक उड़ाते। प्रियव्रत चुप ही रहता।
अभी पिछले सप्ताह ही तो वे सभी उज्बेकिस्तान की राजधानी ताशकंद की यात्रा से लौटे थे। संयोग से प्रियव्रत भी साथ था। साहित्य को पढ़ते-पढ़ाते हुए उज्बेकी-हिन्दी रचनाकारों से प्रियव्रत को विशेष लगाव हो गया था। अतः वह भी उनके साथ हो लिया था। उज्बेकिस्तान में घूमते हुए सबने खूब मटरगश्ती की। प्रियव्रत वहाँ भारतीय संस्कृति की झलक ढूँढ़ता रहा तो रमाशंकर, विधुशेखर और उत्पल बार-गृहों में मस्ती करते रहे। सबकी अपनी-अपनी दृष्टि थी। अपने-अपने लक्ष्य थे। प्रियव्रत ने लौटकर अपने छात्रों को बताया था कि ग्लोबल होती हुई दुनिया में भारतीय संस्कृति अपने बहुआयामी स्वरूप में विश्व के कोने-कोने में पहुँच गयी है। भारतीय संस्कृति, कला और साहित्य का विश्व-समुदाय में मान-सम्मान बढ़ा है। प्रियव्रत ने यह भी बताया कि भारत और मध्य एशिया के कई देशों के साथ सामाजिक-सांस्कृतिक और व्यापारिक संबंध लगभग दो हजार वर्ष पूर्व से ही रहे हैं। इधर के वर्षों में यह संबंध और गाढ़ा हुआ है। उन दिनों भारतीय चिंतक-विचारक और व्यापारी पश्चिम एशिया का रुख करते थे तो मध्य और पश्चिम एशिया के चिंतक-विचारक-व्यापारी भी भारत आते थे। भारत की सांस्कृतिक समृद्धि, भाषा-साहित्य, कला, पर्यटन, पर्यावरण आदि उन्हें अपनी ओर खींचता था तो यहाँ के लोग भी उस क्षेत्र की सांस्कृतिक समृद्धि से परिचय का लोभ संवरण नहीं कर पाते थे। वर्तमान दौर में भी परस्पर विचार-विनिमय से सांस्कृतिक संबंधों को नया आयाम मिला है। उज्बेकिस्तान में बड़े और पुरखों का आदर व सम्मान भारतीय संस्कृति की तरह ही होता है। उनसे ऊँची आवाज में बात करना गलत माना जाता है। इसी तरह अतिथि देवो भवः भी वहाँ पुरखों के सम्मान की तरह ही है, जो भारतीय संस्कृति का अटूट हिस्सा है। प्रियव्रत ने यह सब देखा, सुना तो खुश हुआ और अपने छात्रों को भी वहाँ की भाषा और संस्कृति के बारे में बताया। उज्बेकी संस्कृति की एक नयी दृष्टि लेकर वह स्वदेश लौटा।
प्रियव्रत का बचपन से युवाकाल तक इन तीनों का साथ रहा है। वे प्रियव्रत के सहपाठी रहे हैं। तीनों यानी मंत्री रमाशंकर, प्रशासनिक अधिकारी विधुशेखर और अभियंता उत्पल की नीयत और सोच से वह पूरी तरह परिचित है। प्रियव्रत उनके साथ खेला-कूदा और बचपन की शरारतें भी की हैं। किंतु, काॅलेज में प्रवेश के साथ ही चारों के रास्ते अलग-अलग हो गए। रमाशंकर की पढ़ाई में रुचि कम और राजनीति में अधिक थी। अतः मैट्रिक में गांधी डिवीजन से पास करने के तत्काल बाद ही वह राजनीति के मैदान में कूद पड़ा। स्थानीय बोल चाल की भाषा में उन दिनों तृतीय श्रेणी को गांधी डिवीजन ही कहा जाता था। प्रियव्रत के साथ विधुशेखर और उत्पल ने अपनी आगे की पढ़ाई जारी रखी। समय के अंतराल में विधुशेखर प्रशासनिक अधिकारी और उत्पल अभियंता बने। प्रियव्रत को भी एक नामचीन विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर की नौकरी मिल गयी। 
इस समाचार के साथ ही प्रियव्रत की आँखों के सामने चालीस वर्ष पुराने कई चित्र आगे-पीछे होने लगे हैं और कई घटनाएँ छन-छनकर आने लगी है। उसे याद है कि स्कूल के दिनों में उसकी मित्र-चतुष्ट्य की यह टोली स्कूल की छुट्टी के बाद घर के लिए प्रायः ही मुख्य रास्ते से न आकर थोड़ा घूमकर जंगल के रास्ते आती थी। स्कूल से उसके गाँव की दूरी कोई ढाई किलोमीटर के आस-पास थी। वे प्रायः ही मुख्य पथ से लगभग एक किलोमीटर दक्षिण दो पहाड़ियों के बीच पगडंडियों से होते हुए जंगल के बीचों-बीच एक बड़े जलाशय तक पहुँचते थे, जिसे स्थानीय लोग बांध कहते थे। पैदल चलने वालों ने यह रास्ता बना दिया था। जंगल में पाँच सौ मीटर भीतर सदाबह नाला था। इसी नाले को बांधकर दामोदर घाटी निगम के द्वारा एक एकड़ की परिधि में बांध बना दिया गया था, जिसमें गर्मियों में पशु-पक्षी पानी पीते थे। आम आदमी के स्नान के लिए भी झाड़ियों को साफ कर दो घाट बनाये गए थे। शनिवार का दिन था। उस दिन स्कूल से जल्दी छुट्टी हुई तो वे चारों सीधे बांध पर आ गए थे। बांध की भींड़ पर जंगली बेर खूब फले हुए थे। भींड़ के एक छोर से लेकर दूसरे छोर तक बेर की ऊँची-ऊँची कंटीली झाड़ियाँ फैली हुई थीं। झाड़ियां इतनी सधन थीं कि झाड़ के उस पार बमुश्किल दिखाई देता था। बांध की भींड़ से हटकर थोड़ी दूरी पर इन कंटीली बेर की झाड़ियों के अतिरिक्त साखू के सौ साल पुराने बड़े-बड़े पेड़ थे। इन साखू के पेड़ों के संबंध में ग्रामीण बड़े-बूढ़ों से प्रियव्रत ने सुन रखा था कि एक साखू का पेड़ दो सौ साल खड़ा, दो सौ साल पड़ा और दो सौ साल गड़ा यानी एक साखू का पेड़ दो सौ साल जिंदा रह सकता है। कटने के बाद दो सौ साल पड़ा और दो सौ साल गड़ा रह सकता है। उसके सूखे और पके काष्ठ चार सौ साल खराब नहीं होते। 
मई का अंतिम सप्ताह था। स्कूलों में गर्मी की छुट्टियाँ शुरू हो गयी थीं। इस कारण वे सीधे बांध पर आ गए थे। प्रियव्रत को छोड़कर छपाक, छपाक, छपाक के साथ रमाशंकर, विधुशेखर और उत्पल तीनों जलाशय में कूद पड़े। छपाक के साथ ही बांध में इस कोने से उस कोने तक लहरें दौड़ पड़ीं और एक मिनट के अंतराल पर तीनों ही तीन कोनों में निकले। अक्सर मई-जून के महीने में वे लू से निजात पाने के लिए बांध में डुबकी लगाकर अपनी तपिश थोड़ी कम करते थे व जंगली फलों का खट्टा-मीठा स्वाद चटकारे लेकर लेते थे। बांध के आस-पास ही बेर के अतिरिक्त कई जंगली फलों के झाड़ और आम, जामुन, तिरिल जैसे फलदार पेड़ थे। गर्मियों में लू से बचने के लिए ये झाड़ और पेड़ जंगली पशुओं के आश्रय-स्थल भी थे। बांध की भींड़ पर उगी बेर की झाड़ियों और बांध के पानी के बीच अक्सर तेंदुआ, लकड़बग्गा, लोमड़ी, सियार जैसे पशु भी भरी दोपहरी में ठंढक पाने के लिए बैठ जाया करते थे। मई महीने बेर, तिरिल, कन्नौद जैसे फलों के पक जाने पर मनुष्य से लेकर बंदर, लोमड़ी, शृगाल, कौआ, मैना, तोता जैसे पशु-पक्षी उन फलों को खाने के लिए बांध के आस-पास मंडराया करते थे। आम और तिरिल जहाँ चिड़ियों और कौओं के मनपसंद फल थे, तो दूसरी ओर बंदर जैसे पशुओं के लिए बेर-कन्नौद प्रिय फल थे और वे पूरी ताकत से जोर लगाकर उस पर टूट पड़ते थे। और, आदमी का क्या कहना? इन सारे फलों पर जैसे उनका एकाधिकार ही था।
प्रियव्रत उस दृश्य को आज तक नहीं भूल सका है, जब एक माह की गर्मी छुट्टी घोषित होने पर वे स्कूल से सीधे बांध पर आ गए थे। बांध के पके-अधपके बेर वे उचक-उचक कर तोड़-तोड़ कर खा रहे थे। मई का अंतिम सप्ताह था। गर्मी अपने प्रचंडतम रूप में थी। बेर की ऊँची-ऊँची झाड़ियाँ होने के कारण प्रियव्रत उसकी छाँव में बैठ गया था। झाड़ियों के ठीक नीचे दो-एक फीट की दूरी छोड़कर बांध का पानी था। मंद-मंद हवा बह रही थी। इस कारण प्रचंड गर्मी होने के बावजूद उसे गर्मी का अहसास कम हो रहा था। वैसे भी, किशोरवय लड़कों को न ठंढ लगती है और ना ही लू से भय लगता है। बेर की झाड़ियों के बीच से अचानक ही प्रियव्रत ने देखा कि एक युवा रॉयल बंगाल टाइगर झाड़ी और पानी के बीच बैठा छाँव और ठंढ का आनंद ले रहा है। मुँह से बाहर लपलपाती जीभ और सांसों की गति से बेफिक्र युवा बाघ कभी आँखें बंद करता है तो कभी खोलता है। तभी अचानक प्रियव्रत ने बाघ को देखा और उसके मुँह से निकल पड़ा बाघ रे! इतना कहते ही उसकी धिग्धी बंध गयी। प्रियव्रत के साथ ही तीनों की भी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गयी। प्राण गले में अटक गए। बाघ अपनी जगह से उठा। भींड की किनारी पर उसने लंबी अंगड़ाई ली और दूसरी ओर कूद कर घने पेड़ों के पीछे गुम हो गया। चारों के अटके प्राण लौट आये और वे भाग खड़े हुए।
इस तरह की कई घटनाएँ प्रियव्रत को आज भी याद हैं। प्रियव्रत को छोड़कर रमाशंकर, विधुशेखर और उत्पल की गाँव के चौपाल में चुहलबाजी और खिलंदड़पन की चर्चा-ए-आम थी। वे तीनों एक साथ किसी खिलंदड़पन को अंजाम देते थे। खेत में खड़े मक्के को तोड़कर एक साथ लकड़ी के कोयले से पकाकर खाने की बात हो या गन्ने के खेत में हाथ की सफाई से गन्ने को चाकू से काटकर खाने की कला, वे निपुण थे। एक दिन वे गन्ने के खेत में घुसे ही थे कि गाँव में एक बुजुर्ग ने उन्हें रंगे हाथों पकड़ लिया। शाम को गाँव में जब पंचायत बैठी तो तीनों को हाजिर किया गया। रमाशंकर चारों मित्रों में कुछ अधिक बातूनी था। और, अपनी झूठी बात को भी सच साबित करने की कला में वह महारत हासिल किये हुए था। वह झूठ इस अंदाज में बोलता था कि सच भी शरमा जाये। झूठ को सच साबित करके ही दम लेता था। रमाशंकर ने अपने साथियों को समझाया कि पंचायत में तुम लोग कुछ नहीं बोलोगे। जो भी जवाब देना होगा, मैं दूंगा। तुम लोग केवल मेरी हाँ में हाँ मिलाना। रमाशंकर ने पंचायत में जवाब देने की तैयारी कर ली और तय कर लिया कि उसे क्या और कैसे ‘डील’ करना है। शाम को जब पंचायत बैठी तो चारों को बुलाया गया। उस बुजुर्ग ने पंचायत में अपनी बात रखी और कहा कि जब मैं अपने खेत से उधर गुजर रहा था तो मैंने देखा कि ये तीनों गन्ने के खेत में बैठकर गन्ना चूस रहे हैं। उन दिनों उस गाँव के सैकड़ों एकड़ जमीन में गन्ने की खेती होती थी। गन्ने की खेती के लिए यह गाँव दूर-दूर तक मशहूर था और तैयार गुड़ की कीमत भी अधिक होती थी। एक तरह से गन्ने का जंगल ही यहाँ था। ग्राम प्रधान ने जब तीनों से कैफियत लेनी शुरू की और पूछा कि तुम लोगों ने चोरों की तरह ये गलत काम क्यों किया? रमाशंकर ने ग्राम प्रधान के प्रश्नों का उत्तर देते हुए भयरहित होकर कहा- हाँ, यह सच है कि हम लोग उधर गए थे। पर, गन्ना चूसने नहीं बल्कि सांझ के समय घूमने निकले थे। 
लेकिन?
लेकिन क्या? ग्राम प्रधान ने पुनः प्रश्न किया। 
शांत और संयत स्वर में रमाशंकर ने कहा- हमने उधर घूमते हुए देखा कि ये काका खेत में घुसकर गन्ना चूस रहे हैं। इनके हाथ में एक हँसिया भी थी, जिससे इन्होंने गन्ना काटा था।
फिर, रमाशंकर ने विधुशेखर और उत्पल की ओर मुड़कर कहा - क्यों विधु और उत्पल सच है न?
विधुशेखर और उत्पल ने रमाशंकर के हाँ में हाँ मिलायी और चुप हो गए। तभी एक ग्रामीण ने उठकर कहा - बच्चे भगवान का रूप होते हैं। ये झूठ नहीं बोल सकते।
दूसरे ग्रामीण ने पहले ग्रामीण से सहमति व्यक्त की और फिर पूरी पंचायत बच्चों के समर्थन में खड़ी हो गयी। सारा दोष उसी बुजुर्ग के मत्थे मढ़ दिया गया और बच्चों का बाइज्जत बरी कर दिया गया। रमाशंकर ने अपनी झूठ बोलने के फन से आरोप लगाने वाले को ही दोषी सिद्ध करवा दिया। 
इसी तरह की एक और घटना प्रियव्रत की आँखों के सामने घूमने लगी है। बारिश के दिन थे। किंतु, बारिश अभी कई दिनों से नहीं हुई थी। इस कारण दिन में उमस बढ़ गयी थी। अगस्त माह बस बीतने ही वाला था। खेतों में मकई की फसल तैयार थी। रमाशंकर और उसके साथियों की इच्छा हुई कि भुट्टा लकड़ी के कोयले की आग में सेंक कर खाना चाहिए। उन्हें आग में सेंके गये भुट्टे नमक-मिर्च-नींबू के साथ बड़ा स्वादिष्ट लगता था। बचपन से भुट्टे को वे इसी तरह सेंक कर खाते रहे हैं। आनन-फानन में तैयारी हुई। काष्ठ कोयले की जुगाड़ की गयी। अब प्रश्न था भुट्टा किसके खेत से लाया जाये। तभी रमाशंकर की नजर नरेश पर गयी। नरेश थोड़ा मंद-बुद्धि था और हकलाकर बोलता था। विधुशेखर ने नरेश को आवाज देकर बुलाया ओर उसे समझाया कि तुम अपने खेत से भुट्टे की बाली लेकर आओ हम, तुम सभी मिलकर सेंक कर खायेंगे। विधुशेखर के दिमाग में यह नायाब तरीका अचानक ही आया था कि भुट्टा भी खा लेंगे और चोरी का आरोप भी नहीं लगेगा। सुबह-सुबह नरेश की माँ ने देखा कि उसके खेत से भुट्टे की चोरी हुई है तो वह गाली देने लगी। चोरों को हाथ गल जाये। ओबा माई उठा ले जाये। आदि-आदि। गाली सुनने पर नरेश ने अपनी तोतली बोली में कहा- माँ-माँ ये चोली (चोरी) मैंने की है। विधुशेखर और उत्पल भैया ने कहा था। नरेश की माँ यह सुनकर चुप हो गयी। आखिर गाली दे तो किसको दे। अंततः अपने ही बेटे पर गाली पड़ेगी। रमाशंकर, विधुशेखर और उत्पल के ऐसे सैकड़ों किस्से हैं जो प्रियव्रत को मुँहजुबानी याद हैं। 
समय बीता। रमाशंकर को पढ़ाई में कम और राजनीति में अधिक रुचि थी। उसने राजनीति को ही अपना पेशा बनाना चाहा। शुरू में नेताओं के आगे-पीछे वह घूमता था। छोटे-मोटे ठेके लेता था और उसी में जीने की राह तलाशता था। चुनाव के दिन आने पर रमाशंकर जैसे छुटभैये नेताओं की मांग बढ़ जाती थी क्योंकि ये छुटभैये नेता ही जयकारे में अपनी विशेष भूमिका अदा करते थे। समय-समय पर बिचौलिये या मध्यस्थ की प्रभावी जिम्मेदारी भी इन्हीं छुटभैये नेताओं के जिम्मे रहता था। रमाशंकर अपनी कद-काठी और डील-डौल में दबंग जैसा दिखता था। इसलिए कुसमय में दबंगई की भूमिका भी वही निभाता था। नेता जी के आगे-पीछे के सभी दायित्व उसी के पास थे। यही कारण है कि नेताजी (विधायक जी) के पास काम करवाने के लिए लोगों को उसी के पास पहले आना पड़ता था। इसके लिए बिचौलिए के रूप में वह लेन-देन भी तय करता था। रमाशंकर के इस करिश्माई अंदाज से आस-पास और क्षेत्र के लोग चकित थे। मंत्रियों और पदाधिकारियों को क्षेत्र परिभ्रमण भी वही करवाता था। इसी से लोगों के बीच यह धारणा घर कर गयी थी कि शासन-प्रशासन में रमाशंकर जैसे छुटभैये नेता बड़े काम की चीज होते हैं। जैसे ही लोकतंत्र का महापर्व आता है, इनके पांवों में पंख लग जाते हैं। अपनी कार्य-शैली और अनुभवों से रमाशंकर इस खेल का माहिर खिलाड़ी हो गया था। समय और मौसम के अनुकूल अपना मूड और अपनी मुद्रा बदल लेने में अबतक वह पूरी तरह दक्ष हो गया था। 
राजनीति में कब किसका भाग्य साथ दे दे, कोई नहीं जानता। बिचौलिये का काम करते-करते रमाशंकर आम आदमी के बीच इतना लोकप्रिय हो गया था कि आगामी विधान सभा के चुनाव हेतु टिकट की दावेदारी में उसकी भी चर्चा होने लगी थी। छुटभैये नेताओं का वह लीडर हो गया था। अंततः जब प्रत्याशी रूप में उसकी घोषणा नहीं हुई तो उसने पार्टी बदल ली और विपक्ष के नेताओं से साठ-गांठ कर अपने कद को और बढ़ा लिया। वैसे भी, छुटभैये नेताओं में सिद्धांत या विचारधारा तो होती नहीं, थाली के बैगन की तरह जिधर मौका मिला उधर लुढ़क गए। उसके बाद अपनी सफाई में, सभाओं में कहते फिरते हैं कि जनहित में ही उन्होंने पार्टी बदली है। रमाशंकर इस मामले में होशियार था। चुनाव के ठीक ऐन वक्त उसने पार्टी बदली। विपक्षी पार्टी का टिकट मिला तो कभी जिसके पक्ष में वह जोर-जोर से नारे लगाता था, जयकारा गाता था, उसी के विरुद्ध टिकट मिला और चुनावी-रण में कूद गया। रमाशंकर जानता है कि कट्टर विचारधारा से जुड़े राजनेताओं को कोई पूछता नहीं है। जबकि दूसरी ओर जो आज इस पार्टी और कल उस पार्टी में थे, उनकी पूरी चांदी है। पार्टी में जो बड़े नेता हैं, वे बड़े नेता हैं। नर मधुमक्खियों का गुण उनमें होता है। वे कोई काम नहीं करते। निट्ठले बैठे रहते हैं। बस, छुटभैये नेताओं को आदेश देना उनका काम है। और, छुटभैये नेता तथा अंतिम पायदान पर खड़ा कार्यकर्ता? आदेश मानते हुए उन्हें ऐसा लगता है जैसे पार्टी का सारा भार उन्हीं के कंधों पर है। पार्टी उन्हीं के दम पर चल रही है। रमाशंकर को लगता है कि देश का लोकतंत्र ऐसे ही चलता है। छुटभैये नेताओं के बल पर ही बड़े नेताओं की चौपाल लगती है। नेताओं को लंबी पारी खेलने के लिए छुटभैये नेताओं की जरूरत पड़ती है। जिस नेता के पास जितने छुटभैये नेता होते हैं, वह उतना बड़ा नेता माना जाता है। रमाशंकर अब छुटभैया नेता नहीं है। विधायक का टिकट मिल जाने से उसकी हैसियत बढ़ गयी है। जो रमाशंकर कभी पंचायत का मुखिया या सरपंच बनने को लालायित रहता था, उसे जब विपक्षी पार्टी से विधायक का टिकट मिला, तो मानो बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा। यह उसके लिए अप्रत्याशित और अकल्पनीय था। उसे अपनी मुराद पूरी होते हुए दिखी। रात-दिन की मेहनत और कार्यकर्ताओं के जोर से उसने अपने ही गुरु यानी पूर्व विधायक को पटकनी दे दी और चुनाव जीत गया। उसकी पार्टी भी इस बार बहुमत में आ गयी। संयोग से उसे मालदार मंत्री-पद मिला। कल का छुटभैया रमाशंकर अब बड़ा नेता हो गया। पाँच वर्ष के कार्यकाल में उसने खूब पैसा कमाया। खूब घोटाले किये। गाँव क्या पूरे शहर के धनाढ्यों में उसकी गिनती होने लगी। 
उधर विधुशेखर ने दिल्ली के नामचीन कॉलेज में एडमिशन ले लिया था और पढ़ाई जारी रखी थी। स्नातकोत्तर के उपरांत उसने कमीशन की तैयारी की, जिसमें तीसरे प्रयास में सफल होकर प्रशासनिक अधिकारी हो गया। शुरू के चार-पाँच वर्ष तो उसने खूब ईमानदारी दिखाई बाद में उतने ही भ्रष्ट अधिकारी के रूप में उसकी गिनती होने लगी। विधुशेखर भी अंततः रमाशंकर के रास्ते पर चल पड़ा। विकास के सारे कार्य धरातल से गायब और विकास मात्र कागज पर होने लगे। उसने भी खूब धन बटोरा। देश के बड़े-बड़े शहरों में उसने कई अपार्टमेंट, भूमिखंड, रॉस-रॉयल्स गाड़ियाँ खरीदी और सोना तो उसने ऐसे जमा किया जैसे वह पक्की मिट्टी की ईंट हो। जब भी गाँव आता अपनी रईसी और अफसरी दिखाता। गाँव के लोग उसके वाह्य आडम्बर से चिढ़ने लगे थे। किसी शराबी को जैसे शराब का रोग लग जाता है, वह शराब के बिना नहीं रह सकता। उसकी आत्मा शराब के लिए छटपटाने लगती है। उसी तरह विधुशेखर पर भी भ्रष्टाचार रूपी नशे की लत लग गयी थी। सुबह-सुबह जबतक उसके पास कम से कम एक असामी नहीं आ जाता वह मुँह नहीं धोता था। किसी असामी को देखकर उसे वही खुशी होती थी जो किसी निरीह पशु को देखकर भूखे भेड़िये की होती है, जिसका वह शिकार करता है। अपने असामियों पर वह जरा भी मुरव्वत नहीं करता था। उदारता जैसे शब्द तो उसके शब्दकोश में थे ही नहीं। भ्रष्टाचार करने के उसके पास कई तरीके थे। शुकराना हो या नजराना या हो खुशनामा, उसे लेना वह अपना मौलिक अधिकार समझता था। मानों ये शब्द उसके भ्रष्टाचार के पर्यायवाची बन गए थे। भ्रष्टाचार के लिए उसने कई गुर्गे पाल रखे थे, जो उसके लिए ढाल का काम करते थे। अपने अधीनस्थ कर्मचारियों से वह सीधे मुँह बात भी नहीं करता था। हर सरकारी फाईल को निपटाने के लिए उसनें सुविधा शुल्क निर्धारित कर रखा था। वेतन, ऊपरी कमाई के अतिरिक्त कई व्यापारिक प्रतिष्ठानों का भागीदार भी था वह। लेन-देन के लिए उसने अपना गुप्त कार्यालय भी बना रखा था। उस कार्यालय की देख-रेख का जिम्मा उसका सबसे विश्वस्त सी॰ए॰ करता था। चंद वर्षों में ही वह फर्श से अर्श पर पहुँच गया था। उसका रसूख कई गुना बढ़ गया था। इलाके में वह चर्चा का विषय बना हुआ था। यह चर्चा उसकी मेधा या दरियादिली या उच्च अधिकारी के कारण नहीं बल्कि उसके भ्रष्ट-आचरण के कारण थी।
विधुशेखर से कम नहीं था उत्पल। भले ही पढ़ाई में उत्पल सामान्य था और डोनेशन से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर चोर दरवाजे से सरकारी सहायक अभियंता भी बन गया था। सहायक अभियंता से प्रोन्नति पाते-पाते अबतक वह अधीक्षण अभियंता भी बन गया था। जोड़-तोड़ में इतना माहिर था कि मंत्रियों के दरबार तक में उसकी पहुँच हो गयी थी। अपने लंबे कार्यकाल में कई विभागों में उसने अपनी सेवायें दी और अकूत धन शोधन किया। एक बार की घटना प्रियव्रत को याद है। तब वह उसके साथ था। किसी निर्माणाधीन भवन के निरीक्षण में उत्पल गया हुआ था। भवन की मजबूत गुणवत्ता देखकर उत्पल बौखला गया था। संवेदक को डांटते हुए उसने कहा था- इतने गुणवत्तापूर्ण भवन बनाओगे तो फिर काम और पैसा कहाँ से आयेगा? भवन ऐसा बनाओ कि दस-पंद्रह वर्ष तक ही चले। पाँच-सात वर्ष के बाद रिपेयरिंग वर्क उसमें चलता रहे। इस तरह हमें और तुम्हें दोनों को रोजगार मिलता रहेगा। उत्पल ऊपरी या अवैध कमाई को रोजगार कहता था। उत्पल की बात सुनकर प्रियव्रत ने अपना सिर पीट लिया था।
रमाशंकर के मंत्री बनते ही विधुशेखर और उत्पल का तबादला रमाशंकर के ही मंत्रालय में हो गया था। तीनों ने एक ही कैंपस में अपना बंगला भी बनवाया। दो एकड़ में फैला कैंपस स्विमिंग पुल से लेकर कई आधुनिक सुविधाओं से लैश था। चतुर्दिक दस-बारह फीट की चाहरदीवारी थी। एक तरह से अभेद्य कैंपस था यह, जिसमें कोई परिंदा भी पर नहीं मार सकता था। स्विमिंग पुल के पास ही गंदे पानी के निकास के लिए एक ‘चोर दरवाजा’ भी था। उसकी बनावट ऐसी थी कि दरवाजे और दीवार में अंतर करना मुश्किल था। इस चोर दरवाजा से केवल रमाशंकर, विधुशेखर और उत्पल ही वाकिफ थे।
उस दिन सुबह-सुबह जब छापामार दस्ते ने मुख्य दरवाजा खुलवाना चाहा तो वे असफल रहे। अंततः दीवार फांद कर कैंपस के भीतर दस्ते के दो-एक लोगों ने प्रवेश किया और मुख्य दरवाजा खोल दिया। छापामार दस्ते ने जब पूरे कैंपस को कब्जे में ले लिया तो रमाशंकर, विधुशेखर और उत्पल ने फोन पर कुछ बातचीत की और बताया कि हम घिर चुके हैं। छापामार दस्ते ने पूरे कैंपस पर दबिश दे दी है। अतः चोर दरवाजे से ही निकला जा सकता है। वे पीछे के दरवाजे से निकले। स्विमिंग पुल में धीमे कदमों से प्रवेश किया क्योंकि चोर दरवाजा का रास्ता वहीं से था। तीनों को स्विमिंग पुल में देखकर दस्ते के दो-एक सदस्यों ने छलांग लगायी। छपाक, छपाक, छपाक के साथ एक-एक कर तीनों को दबोच लिया गया। हथकड़ी लग गयी। प्रियव्रत की आँखों के सामने ये सारे दृश्य पलभर में ही कौंध गए। बुरे कर्म का कर्मफल अब उसके सामने था। वह पसीने से तर-बतर पसीना पोंछता रहा।

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