कहानी: मुक्ति

कला जोशी

कला जोशी


जय-जयकार का उद्घोष हो रहा है। लोगों का समूह धार्मिक आस्‍था से सराबोर हैं। स्‍वामी श्रद्धा भारती से आशीष लेने की होड़ लगी है। उनके चरणों में फूलों का अंबार लगा है जिसे एक शिष्‍य हटाता जा रहा है। चढ़ाई गई सामग्री दूसरी ओर रखता जा रहा है। प्रदेश के एक मंत्री हाथ जोड़े एक ओर खड़े हैं। आज तो स्‍वामी श्रद्धा भारती ने शब्‍दों की ऐसी गंगा बहाई कि सभी उसमें डूब गये। धन्‍य हो! धन्‍य हो! स्‍वामिनी धन्‍य हो! धर्मप्राण जनता इसी तरह जुटती रहे और आपका यश बढ़ता रहे। हमारा भी जनमत इसी के साथ बढ़ता रहे। मंत्रीजी सपत्‍नीक अपने चेलों-चपाटियों के साथ गदगद हृदय से श्रद्धा भारती को प्रणाम कर रहे हैं। श्रद्धा भारती अपना वरद्हस्‍त उठाए सभी को आशीष दे रही है। लोग लौटने लगे हैं। मंत्री जी श्रद्धा भारती की माँ से कह रहे हैं इस बार भागवत कथा के बाद विशाल भण्‍डारा रखा जाए। इस बार व्‍यवस्‍थाएँ हम संभाल लेंगे। हाँ! आयोजन कर्त्‍ता यानी हमारे नाम का भी प्रचार-प्रसार का जिम्‍मा आपका है। सबके कानों को हमारा नाम-काम सुनने की आदत हो जाए। उन्‍होंने अपने चेलों को आदेश दिया गाड़ी का सामान बहिनजी के आवास में रखवा दो। उनकी पत्‍नी ने नगद रुपयों की थैली बहिनजी को पकड़ा दी। आज थैली अधिक भारी है। श्रद्धा भारती ने सरसरी दृष्टि डाली और आश्रम के अपने कक्ष में चली गई। कक्ष में व्‍याप्‍त शांति ने उसके मन को थाम लिया। उसने अपने भगवा वस्‍त्र बदले और निढाल सी तखत पर लेट गई। आज लगभग डेढ़ घंटे तक वह धारा प्रवाह बोलती रही। भक्‍तों को तन्‍मयता से सुनते देख वह प्रसन्‍न अवश्‍य है किन्‍तु मन में बहती एक अदृश्‍य इच्‍छा उसे इन सबसे अलग ले जा रही है। अतीत उसे बार-बार पीछे खींचता है। उसके सामने एक मासूम बालिका खड़ी है। पढ़ने-लिखने की उम्र में प्रवेश करती वह बालिका माँ से पूछती है - स्‍कूल कब जाना है? माँ स्‍नेह से कहती है बस दो महीने बाद। वे दो महीने कभी आए ही नहीं। उत्‍तर देने वाली माँ ही साथ छोड़ गई। उसे उस समय मालूम नहीं था माँ अब लौटेगी नहीं। वह दया की पात्र बन गई। जो भी रिश्‍तेदार आता। “बिन माँ की बच्‍ची” कहकर स्‍नेह जताता। अब वह और पिताजी थे घर में। तीन साल की श्रद्धा को नौकरी करते हुए संभालना बहुत कठिन था। पिताजी ने श्रद्धा को नानी के घर भेज दिया। नानी ने उसे स्‍कूल में भरती कर दिया। दिन तो स्‍कूल और मामी के बच्‍चों के साथ निकल जाता। शाम आती और वह माँ की यादों में खो जाती। नानी से उसकी यह स्थिति नहीं देखी जाती। नानी उसे बहुत दुलार करती। नए-नए किस्‍से सुनाती। मन तो उसका बहल जाता। नानी की थपकियाँ सुला भी देती किन्‍तु माँ की यादें नन्‍हें मन की प्रतीक्षा बढ़ा देती। कब माँ आयेगी। उसकी गोद में सो पायेगी।

दो साल बाद पिताजी उसे अपने साथ ले गए। घर में यही उसकी माँ है अब उसे समझाया गया। नई माँ आ गई। माँ ने श्रद्धा को बड़े प्रेम से अपनाया। माँ रोज शाम को उसे गीता का एक श्‍लोक पढ़कर सुनाती उसका अर्थ समझाती। उनके समझाने का तरीका इतना सरल और मनारंजक होता की श्रद्धा की रुचि बढ़ने लगी। वह रोज शाम की प्रतीक्षा करती। माँ तो यही चाहती थी। दो साल में श्रद्धा गीता के आत्‍मा, ब्रम्‍ह और जीव के संबंधों को समझने की कोशिश करने लगी। माँ उसे बोलने का अभ्‍यास कराती। पुजारी जी से कहकर उसे मंदिर में बोलने का अवसर दिलाती। सत्‍संग में ले जाती। सत्‍संग में स्‍वामीजी से अनुरोध करती श्रद्धा को भजन या प्रवचन की अनुमति दें। स्‍वामी जी ने श्रद्धा से भजन करवाए। कभी-कभी वे श्रद्धा से प्रसंग को दोहराने को कहते। श्रद्धा को झिझक दूर होती गई। दस साल की उम्र में वह स्‍वतंत्र रूप से प्रवचन के योग्‍य हो गई।

माँ का शहर के एक बड़े नेता से मेलजोल था। उन्‍होंने श्रद्धा की प्रतिभा के बारे में नेताजी को बताया। श्रद्धा को परखने के लिए उन्‍होंने घर में उसका भागवत पाठ रखा। नेताजी के घर चार-पांच सौ लोग पाठ सुनने इकठ्ठे हुए। श्रद्धा के भागवत पाठ ने सभी को मंत्रमुग्‍ध कर दिया। भागवत पाठ तीन दिन चला। इन तीन दिनों में श्रद्धा पूरे शहर में चर्चित हो गई। नेताजी ने समाचार पत्रों में गीता की इस साधिका को प्रमुखता से छपवाया। उन्‍हें लगने लगा यह बच्‍ची उनके लिए भीड़ जुटा सकती है। इस पर धन खर्च करना घाटे का सौदा नहीं है। श्रद्धा उनके बहुत काम आयेगी। धर्मप्राण जनता में उसकी लोकप्रियता बढ़ती गई।

अकेले के दम पर भागवत कथा करने का सामर्थ्‍य उसमें आ गया। माँ ने उसके मन में उतार दिया यही स्‍वर्ग जाने का रास्‍ता है। वहाँ उसकी माँ प्रतीक्षा कर रही होगी। यह जीवन उसी स्‍वर्ग के नियन्‍ता का दिया हुआ है, उसी को सौंप देना ही मुक्ति है। श्रद्धा ने इन शब्‍दों को मन की मुट्ठी में कसकर बांध लिया। पिताजी ने उसे कहा भी अभी केवल पढ़ाई पर ध्‍यान दो किन्‍तु श्रद्धा तो माँ के कहे अनुसार चलती रही। उसने अपने को प्रभु सेवा में लगा लिया। 
माँ का बेटा, श्रद्धा का भाई अब चार साल का हो गया है। वह भी श्रद्धा दीदी के साथ भागवत पाठ सुनता। माँ ने उसके लिए शिक्षिका रख दी। माँ ध्‍यान रखती डिम्‍पी श्रद्धा से दूर रहे। स्‍कूल से आने के बाद शाम को वह शिक्षिका से पढ़ता। वह सोचती श्रद्धा आध्‍यात्‍म के राजपथ पर चलती रहे। उसका ध्‍यान घर की ओर न भटके। इसके लिए वह तरह-तरह के जतन करती। श्रद्धा के पिता टेाकते तो कहती यह तो अच्‍छा काम है। घर के प्रवचन हाल में श्रद्धा भगवत पाठ करती तो बहुत लोग जुटते। आसपास के मोहल्‍ले के लोग भी श्रद्धा को भागवत पाठ करने बुलाते। उसके मुखार बिंद से झरते शब्‍द लोगों को भावों में बहा ले जाते। एक ओर श्रद्धा की ख्‍याति फैल रही है दूसरी ओर वह स्‍कूल में अनुपस्थित रहने लगी। किसी तरह वह पाँचवीं पास कर पाई और स्‍कूल पूरी तरह छूट गया। माँ को उसकी शिक्षा से कोई लेना देना नहीं है।

उसके सपने अब सच होने के लिए तैयार हैं। एक-एक भागवत पाठ में बीस-पच्‍चीस हजार नगद और धनधान्‍य प्रचुरता से मिल जाता है। श्रद्धा के पिता की महीने की कमाई पंद्रह हजार है। उससे तो बहुत अधिक श्रद्धा जुटा लेती है। अब घर के आगे के भाग में प्रवचन हाल, बांके बिहारी का छोटा सा मंदिर और हाल से लगा श्रद्धा का बड़ा सा कमरा बना दिया गया है। श्रद्धा का मन अब बांके बिहारी में रम गया था। भागवत पाठ उसकी पूजा हो गई है। माँ को यही तो चाहिए था। दुधारू गाय की सेवा करना वह भलीभांति जानती है।

पिताजी ने लाख समझाया किन्‍तु श्रद्धा ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। स्‍वामीजी के सान्निध्‍य में वह श्रद्धा से श्रद्धा भारती बन गई। श्रद्धा भारती के आसपास जुटती भीड़ को देखकर राजनीति के चतुरगण भी उसके आसपास जुटने लगे। श्रद्धा भारती तक पहुँचने का रास्‍ता माँ से होकर जाता है। वह हमेशा श्रद्धा के साथ रहती। कभी कोई नेता स्‍वामी श्रद्धा भारती के लिए मेवा-फल लाता तो दूसरा नेता घी के डब्‍बे और अनाज ले आता तीसरे को भनक लगती तो वह माँ को नोटों की थैली सौंप देता। शहर का सबसे बड़े घाघ नेता कैसे चुप बैठता। उसी ने तो श्रद्धा को समाचार पत्रों से प्रसिद्धि दिलवाई है। उसने माँ को धन और बातों की चाशनी में अपने पक्ष में कर लिया। उसने प्रवचन हाल को भव्‍य आश्रम का रूप दे दिया। आश्रम को समाजसेवी संस्‍थाओं से जोड़कर एक ट्रस्‍ट बना दिया। ट्रस्‍ट की संरक्षक तो श्रद्धा की माँ है किन्‍तु उसके कार्यक्रम नेताजी के अनुसार चलते। समझौते के तहत भागवत पाठ में आये धनधान्‍य और नगद रुपयों पर माँ का ही अधिकार है। अब जितने भी कथा प्रकरण, प्रवचन, अनाथों की सेवा कार्यक्रम-यथादान आदि के साथ गरबों का भव्‍य आयोजन, विशाल कावड़ यात्राएँ, भंडारे, धार्मिक आस्‍था के सभी आयोजन नेताजी के बैनर तले होते। धर्मप्राण जनता के बाहुल्‍य से नेताजी अपनी शक्ति का परीक्षण करते-कराते। शीर्ष नेतृत्‍व एवं लोक को लगता यह नेता सचमुच कद्दावर हो गया है। स्‍वामी श्रद्धा भारती उनके लिए एक साधन थी जन-जन में पैठ बढ़ाने के लिए।

श्रद्धा भारती पहले तो ईश-इच्‍छा समझ टालने लगी किन्‍तु धीरे-धीरे आश्रम पर उनका बढ़ता वर्चस्‍व उसे खटकने लगा। वह तो मुक्ति का मार्ग ढूँढने चली थी यहाँ तो चापलूसों की भीड़ इकठ्ठी हो गई। माँ इन्‍ही सब से घिरी है। पिताजी ने अब कुछ कहना छोड़ दिया है।

स्‍कूल छूटे बरसों बीत गए। बीस साल हो गए प्रवचन करते। मुक्ति का मार्ग अब तक नहीं मिला। स्‍वामी श्रद्धा भारती बनकर घर के रास्‍ते उसने खुद ही बंद किए हैं। डिम्‍पी की शादी में उसका क्‍या काम। दूर से ही आशीषती रही। डिम्‍पी की नई नवेली दुल्‍हन ने पूछा-दीदी इतनी निर्लिप्‍त क्‍यों हो गईं घर-संसार से? श्रद्धा चुप रही। नई दुल्‍हन ने देखा श्रद्धा दीदी के चेहरे पर एक मौन चिपका है, जिसने होठों को सी रखा है। श्रद्धा के अंतर में उठ रहे शब्‍दों की ध्‍वनि बाहर नहीं आ पा रही किन्‍तु वह बोल तो रही है, “अब यही जीवन का सच है सुधि। नासमझ बचपन में जिस दिशा में कदम बढ़ा दिए अब उसको छोड़ा तो नहीं जा सकता। माँ ने कितने प्रयास किए हैं यहाँ तक पहुँचाने के लिए।” अपनी आवाज वह तो सुन रही है इसी के साथ सुधि के शब्‍द जुड़ते चले जा रहे हैं, “दीदी अभी आपकी उम्र की क्‍या है मात्र तीस साल ही ना। कितने ही लोग इस उम्र में जीवन शुरू करते हैं। लौट चलो दीदी आपके डिम्‍पी भाई कह रहे थे माँ ने इस रास्‍ते पर आपको धकेला है। स्‍वामी श्रद्धा भारती बनाया है अपने स्‍वार्थ के लिए। डिम्‍पी भाई को आपके पास फटकने भी नहीं दिया। फिर दूर पढ़ने भेज दिया। जहाँ आपकी छाया भी नहीं पढ़े। उसके लिए घर-संसार मखमली कालीन था। इस कालीन के लिए आप सिर्फ पूंजी हो दीदी। लौट आओ अभी भी समय है। डिम्‍पी भी यही चाहता है। जीवन के रिश्‍तों की पुकार सुनो दीदी।”

स्‍वामी श्रद्धा भारती ने सब कुछ सुना। आज जहाँ वह है वहाँ से लौटना मुश्किल है। उसका लौटना कितनों के लिए अहितकारी होगा। माँ क्‍यों उसे लौटने देगी। नेताजी के मंसूबे धरे के धरे रह जायेंगे। डिम्‍पी के शब्‍द फिर उसके कानों से टकराते हैं, “दीदी! माँ ने इस रास्‍ते पर जानबूझकर धकेला है। वे तुम्‍हारी जिम्‍मेदारियाँ और भविष्‍य के रिश्‍तों को निभाने से बच गई। तुम नहीं समझोगी मेरी भोली बहिन। माँ ने मुझे अपने से दूर पढ़ने भेज दिया ताकि तुम्‍हे अपने अनुसार ढाल सके। तुम सोचो दीदी यह मार्ग अच्‍छा था तो मेरे लिए क्‍यों नहीं चुना। तुमने पिताजी की बात भी नहीं सुनी। बिटिया का पाणिग्रहण किए बिना वे स्‍वर्ग चले गए। माँ के रंग में तुम ऐसी रंगी की दुनिया के रंग ही भूल गईं। स्‍वामी भारती ने सिर को झटक दिया अब सोचने से क्‍या लाभ?

माँ ने देखा सुधि का श्रद्धा के पास बैठना कुछ अधिक ही हो रहा है। डिम्‍पी भी श्रद्धा के पास जाता रहता है। इन दिनों श्रद्धा की कलाई पर सुधि की दी हुई घड़ी बंधी है। माँ को खटका होता श्रद्धा को डिम्‍पी और सुधि से घुल मिलकर बातें करते देख। धीरे-धीरे दो साल निकल गए। श्रद्धा का प्रवचन और पूजा पाठ का नियम चल रहा है। अब उसके प्रवचन में अधिक सरलता आ गई है। उनके बीच अ‍ब डिम्‍पी–सुधा का नन्‍हा बेटा भी आ गया है। गोल-मटोल यश सबका मन मोह लेता। सुधि जब-तब उसे श्रद्धा दीदी की गोद में डाल देती। श्रद्धा को उसका सानिध्‍य प्रिय लगता। सुधि कहती, “दीदी यश आपको लौटा लाएगा या उसके लिए तो आपको आना ही होगा।” श्रद्धा की आँखों से दो बूंद ढलकती किन्‍तु वे किसी को दिखाई नहीं देती।

घर में यश के मुण्‍डन की तैयारी चल रही है। सुधि खुश है अब तो बुआ को अपने भतीजे के बाल झेलने चलना पड़ेगा। उसने तैयारी की एक-एक चीज श्रद्धा से साझा की। उसने सोच लिया है यदि श्रद्धा दीदी यश के बाल नहीं झेलती तो वह यश का मुण्‍डन नहीं करवाएँगी। आज भी इसी बात पर अड़ी है।

“सुधि-डिम्‍पी तुम बच्‍चे तो नहीं हो जो जिद कर रहे हो। सांसारिक रिश्‍तों से दूरी में ही मेरी भलाई है।”

- हम जानते हैं किन्‍तु आश्रम और घर अलग-अलग कहाँ हैं? जुडे़ हुए तो हैं जैसे हम और आप। सच बताओ आपका मन नहीं होता। पिताजी के अंतिम दिनों में आप कितना छटपटाई थीं दीदी अब ऐसा मत होने दो। 
“क्‍या कह रहे हैं आप? क्‍या दीदी पिताजी से नहीं मिल पाई।”

“हाँ! सुधि दीदी को घर में आने से सख्‍त मनाही है। पिताजी की बीमारी के दिनों में माँ ने दीदी को दूर रखा। पिताजी भी अपनी बेटी से मिलने के लिए तड़पते रहे किन्‍तु माँ का दिल नहीं पसीजा। मुझे आश्रम के सेवादारों ने बताया। मैं तो बाहर था मुझे भी पिताजी की मृत देह ही मिली। दीदी आश्रम के आंगन में झरझर आंसू बहाती खड़ी थी। जब पिताजी की शवयात्रा निकली मैं ही दीदी का हाथ पकड़कर खीच लाया था। पिताजी के अंतिम दर्शन कर दीदी रोते-रोते होश खो बैठी थी। माँ कहती रही लौकिक पिता के जाने का शोक मत करो श्रद्धा तुम तो पारलौकिक पिता की पुत्री हो। उनकी सेवा ही तुम्‍हारा धर्म है।

- ऐसा कैसा धर्म डिम्‍पी?

- “माँ ने बहुत गलत किया। इसे अब हमें ही ठीक करना होगा।” 

- “शांत रहो तुम दोनों। हमारे-तुम्‍हारे बदलने से कुछ नहीं होता। सबकी अपनी नियति है। अब तो मुझे यह जीवन रास आने लगा है।” 

- “मुझे तो यश के मुण्‍डन में आपकी भागीदारी चाहिए। क्‍या इतनी सी इच्‍छा का मान नहीं रखेंगी आप?” 
स्‍वामी श्रद्धा भारती ने सांसारिक रिश्‍तों से दूरी बना रखी है। माँ ने यही तो सिखाया है। अब सुधि उसके हृदय की कोमल भावनाओं को छेड़ने लगी है। माँ को भी कुछ-कुछ आभास होने लगा है। जबसे उन्‍हें भनक लगी है वे किसी तिकड़म में लगी हैं। आजकल वे नेताजी के घर के चक्‍कर लगा रही हैं। आखिर नेताजी को उन्‍होंने पट्टी पढ़ा ही दी। श्रद्धा स्‍वामी के प्रवचन राजधानी में रखवा दिए गए। मुख्‍यमंत्री स्‍वयं प्रवचन में रहेंगे। दस दिनों के बाद उसके प्रवचनों की एक शृंखला विदेशों में रखी गई। प्रवचन की शुरूआत मुंडन के चार दिन पहले से रखी गई। राजधानी में श्रद्धा भारती के प्रवचन का प्रचार हो रहा है। विशाल पंडाल लग गया है। पांच हजार लोगों की बैठक व्‍यवस्‍था है। भव्‍य मंच पर व्‍यासपीठ पर बैठी श्रद्धा की आकृति माँ की आंखों में बस गई हैं। इस सब प्रयोजन में नेताजी से केवल नगद राशि हाथ में आयेगी बाकी सब कुछ दक्षिणा-चढ़ावा उनका है। वैसे भी आश्रम की चालीस प्रतिशत आय वे व्‍यवस्‍थाओं के बहाने लेते ही हैं। धन बरस रहा है। इसी के बलबूते सब साधन सुलभ हैं। कमाऊ गाय को हाथ से जाने नहीं देना चाहती माँ। चलता रहे इसी तरह जीवन।

राजधानी में स्‍वामी श्रद्धा भारती के प्रवचन चल रहे हैं। अपार भीड़ है। पूरा पंडाल भरा है। अगली पंक्ति में मुख्‍यमंत्री अपनी मंडली के साथ उपस्थित हैं। अगली पंक्ति में ही दाहिने ओर माँ विराजमान है अपने मुंशी के साथ। श्रद्धा की मनमोहक वाणी और सुरमयी शब्‍दों ने श्रोताओं को विभोर कर दिया है। भक्ति और श्रद्धा का ऐसा विशाल जमघट पहले नहीं जुड़ा। माँ निहाल है। कथा का आज तीसरा दिन है। सभी समाचार पत्रों में प्रवचन में उमड़ी जनता और श्रद्धा के बड़े-बड़े चित्रों की सुर्खियाँ हैं। कथा में धर्मप्राण जनता झूमने लगी है। कथा में कोई पैरोडी नहीं हैं। छोटे-छोटे कथानक हैं उन कथानकों के प्रसंगों में भजनों का टेका लगा रहे हैं मंचासीन वाद्ययंत्र एवं गायक वृन्‍द। कथा समाप्ति की ओर है कि बीच में एक सपाट ध्‍वनि गूंजती है कल प्रवचन का विराम है। स्‍वामी श्रद्धा भारती आज शाम से मौन साधना में जा रही हैं। आप सभी से करबद्ध प्रार्थना है उनकी साधना में कोई व्‍यवधान न आये इसकी जबावदारी आपकी है। साधना के बाद फिर स्‍वामीजी प्रवचन के लिए उपस्थित होंगी। माँ हतप्रभ हैं क्‍या हुआ इसको किन्‍तु घोषणा तो हो चुकी है।”

स्‍वामी श्रद्धा ने शाम से ही अपने को विश्राम कक्ष में बंद कर लिया। उनसे मिलने की सख्‍त मनाही है। भोजनादि भी नहीं करेंगी वे। दिन डूब गया। रात भी उतर गई माँ समझ नहीं पाई कौन सा मौनव्रत?

स्‍वामी श्रद्धा भारती का मन अस्थिर है। इधर इन दिनों जो आश्रम में हो रहा है वह गलत है। माँ की लालसाओं ने आश्रम को राजनीति का चरागाह बना दिया। हर छोटा-बड़ा नेता आश्रम में जुटती जनता को अपना चारा बनाने में लगा है। यही धर्मप्राण जनता उनके काम की है। इसी के मन पर वे सब राज करना चाहते हैं। इस सब का माध्‍यम श्रद्धा बन रही है, यह उसे बिलकुल पसंद नहीं। भागवत कथा श्रवण के बहाने नेताओं की छलना उफान पर है। इसका फेनिल प्रवाह सब को बहा ले जाएगा। इसे रोकना ही पड़ेगा। माँ ने इन नेताओं को रूपए उगलने वाली मशीन की तरह इस्‍तेमाल किया है। सुधि और डिम्‍पी सोचते हैं माँ उसे जानबूझ कर इस रास्‍ते पर लाई है ताकि धन की आमद होती रहे। उसे बजा-ठोककर इतना पक्‍का कर दिया है कि वह पीछे मुड़कर न देख सके। सुधि कहती है, “अपनी स्‍वर्गवासी माँ से मिलने की ललक का भरपूर दोहन किया है इस माँ ने। इसके लिए पति से भी भिड़ी थी। श्रद्धा को वंश-परिवार से काटकर अर्थोपार्जन का साधन बनाने की उनकी चाल सफल रही।” श्रद्धा को लगता है माँ ने अच्‍छा ही किया। भगवत मार्ग चलने का रास्‍ता बनाया। उसके जीवन को सफल और सार्थक करने के हर संभव प्रयास किए। यह सब कुछ माँ का योगदान ही तो है इसमें स्‍वर्गवासी माँ का आशीष भी अवश्‍य जुड़ा होगा।

यही उसके जीवन का लक्ष्‍य है। यही मुक्तिमार्ग है। सुधि का सोचना उसकी जगह ठीक हो सकता है। उसे उसका भी मन रखना होगा। अपने आप से युद्ध करती उसके मन की तरिणि का प्रवाह गुरुजी पर आकर रूक गया। उसने गुरुजी का नंबर मिलाया। गुरुजी से मन की सारी बातें कह डाली। गुरुजी ने अपनी शिष्‍या के मन की थाह लेकर उसे धर्मशाला आने का कहा। जहाँ वे इन दिनों प्रकृति के प्रांगण में, हिमालय के आश्रय में साधनारत हैं। श्रद्धा को उनका सुझाव अच्‍छा लगा। लोक के झूठे प्रपंचों से दूर रहने का यही अच्‍छा तरीका है। उसने निर्णय ले लिया। गुरुजी के सानिध्‍य और कृपा से मन के सारे भाव तिरा जाएँ यही तो चाहती है वह। सुधि-डिम्‍पी के बेटे यश के मुंडन में शामिल होने के बाद वह धर्मशाला चली जाएगी। 

नर्मदा के घाट पर पूर्णिमा का स्‍नान-दान करने वालें की भीड़ है। मंत्रोच्‍चार गूंज रहे हैं। उदित होते सूर्य नारायण के साथ ही घंटियों का नाद बढ़ता जा रहा है। माँ नर्मदा की आरती के स्‍वर गूंज रहे हैं। घाट के एक बुर्ज पर सुधि के बेटे का मुंडन चल रहा है। माँ को छोड़कर खास रिश्‍तेदार उपस्थित हैं।

पंडित के मंत्रोच्‍चार गूंज रहे हैं। डिम्‍पी की खुशी उसके चेहरे से झलक रही है। सुधि का मन आनंदित है नन्‍हा यश उसकी गोद में कसमसा रहा है। नाई उस्‍तरे से बाल उताकर आटे के गोले में चिपकाता जा रहा है। इस गोले को अपने हाथों में थामें श्रद्धा स्‍वामी श्रद्धा भारती एकटक नन्‍हे को देखे जा रही है।     
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डॉ. कला जोशी
पता: 320 इन्‍द्रपुरी कॉलोनी इंदौर (मध्‍य प्रदेश)
ईमेल: prof.kalajoshi@gmail.com
चलभाष: 9827593358

 

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