‘रेत समाधि’ उपन्यास में समकालीन विमर्श

नीलम वाधवानी

शोधार्थी, हिंदी विभाग, भाषा साहित्य भवन, गुजरात विश्वविद्यालय, अहमदाबाद
ईमेल: vishnukriplani36@gmail.com
चलभाष: +91 840 122 4237


कृति:’रेत  समाधि’ (उपन्यास)
लेखिका: गीतांजलि श्री
संस्करण: जून 2022
प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन 
मूल्य: ₹450
पृष्ठ संख्या: 376

नीलम वाधवानी
गीतांजलि श्री द्वारा लिखित उपन्यास ‘रेत समाधि’ अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार से पुरस्कृत है। यह उपन्यास आधुनिक  जीवन में व्याप्त विसंगतियों  को माला के मोतियों की तरह पाठक के समक्ष एक साथ प्रस्तुत करता है। हर मोती का रंग अलग है चमक अलग है अथवा तो यूँ कहें जहाँ हमें एक ऐसा बगीचा प्राप्त होता है जिसमें हर फूल की अपनी खुशबू है । 376 पृष्ठ में रचित  यह उपन्यास अपने आप में आज के समय का  जीता जागता दस्तावेज है । आधुनिक समय में व्याप्त लगभग सभी प्रश्न चाहे वह वृद्धावस्था से संबंधित हो, लिंग व्यवस्था से संबंधित हो, संप्रदाय से संबंधित हो, राष्ट्र की सीमाओं से संबंधित हों, अथवा युवाओं के  नवीन विचारों की प्रकृति से संबंधित हो, सब कुछ एक साथ इस उपन्यास में हम देख पाते हैं । एक तरफ यह बुजुर्ग अम्मा चंद्रप्रभा के मन में उठने और चलने वाले विचारों को शब्द दे रहा है दूसरी तरफ अम्मा से प्रभावित होने वाले तथा उससे जुड़े रिश्तो की प्रतिक्रिया को शब्द देता है । उपन्यास में किस्सों के रूप में इतनी कहानियाँ आती जाती हैं कि किसी एक कहानी की बात करना संपूर्ण उपन्यास के साथ अन्याय जैसा लगता है। फिर भी यह कहना आवश्यक है कि यह उपन्यास आरंभ होता है एक 80 वर्ष की बुजुर्ग औरत से। जिसने जिंदगी के सामने घुटने टेक दिए हैं, जो अपने पलंग से उठना ही नहीं चाहती। अपने पति की मृत्यु के बाद मानो उसने स्वयं को मृत घोषित कर दिया हो। दूसरी तरफ परिवार  है जो उसे उठाने की जिद्द पकड़े बैठा है । प्रश्न उठता है क्या परिवार उसे उठा पाएगा? पाठक तल्लीन होकर उपन्यास पढ़ता रहता है। अचानक वह वृद्धा खड़ी होती है। न सिर्फ खड़ी होती है;  जीवन के लिए कोई नया कलेवर धारण करने का प्रयास करती है। अपनी  पुत्री के घर जाती है, जो पुत्री  लिव-इन  रिलेशनशिप में केके के साथ रह रही है ।  यही 80 वर्ष की चंद्रप्रभा नाम की बुजुर्ग महिला रोज़ी बुआ से मिलती है । रोजी बुआ जो कि थर्ड जेंडर है, अम्मा का उनसे एक अपरिभाषित का संबंध स्थापित होता है। बुआ से मिलने के बाद वह दिन-ब-दिन जवान होती प्रतीत होती है तथा उसकी पुत्री जिसके घर अम्मा रह रही है, वह अम्मा के आचरण को देखकर मानो जवानी में ही बुजुर्ग होने लगती है। गीतांजलि श्री ने यहाँ एक अद्भुत प्रयोग किया है वह यह कि हर बार उपन्यास में यह दिखाया जाता है कि बुजुर्ग बच्चों को टोक रहे हैं और उन्हें संस्कारों की शिक्षा दे रहे हैं। किंतु यहाँ बात कुछ और ही है । यहाँ अम्मा बुजुर्ग होकर भी बुजुर्ग नहीं है और उसकी पुत्री जो युवा है जो स्वयं बिना विवाह किए किसी पुरुष के साथ रह सकती है जो भारतीय संस्कारों के अनुसार अनुचित है। वह अचानक ही  अपनी अम्मा को वह संस्कार सिखाती है। कहानी में नया मोड़ तब आता है जब, रोज़ी की मृत्यु हो जाती है ।  अम्मा पाकिस्तान जाने की ज़िद पकड़ती है। वहाँ उनकी अपने पहले पति से मुलाकात होती है। बेटी को भी वहीं जाकर पता चलता है कि, आखिर माजरा क्या है? क्यों अम्मा ने पाकिस्तान आने की ज़िद करी थी। न जाने कितने कथानक एक साथ इस उपन्यास में दिखाई देते हैं।

 कहीं-कहीं भाषा बहुत अधिक प्रतीकात्मक  भी लगती है तो, कहीं बहुत सहज । कौवे, तीतर, चीटियाँ आदि भी सहज रूप से कथानक में स्थान पाते रहते हैं। यही नहीं प्रतिष्ठित लेखकों के बारे में भी उपन्यास के भीतर चर्चा मिलती है। भाषा की काव्यात्मकता  सहज ही पाठक को आकृष्ट करती है। सब कुछ बिखरा हुआ किंतु, एक ऐसा स्थान जहाँ सब कुछ जोड़ने का प्रयास हो रहा है। बिखरी हुई कहानियाँ, बिखरी हुई स्मृतियाँ, बिखरे हुए चरित्र…। किंतु जो बिखरा हुआ नहीं है वह है सार्थक  प्रयास। सब कुछ को एक साथ दिखाने का प्रयास, आधुनिक जीवन का ऐसा चित्र जो यदि प्रस्तुत किया जाए  तो इसी तरह आ सकता है । एक साधारण परिवार का वातावरण अल्प भाषी अफसर बेटा, स्वच्छंद बेटी, चिंता करने वाली किंतु थकी सी बहू, दो पोते …। हर चीज का एक दम सही तालमेल इस उपन्यास में देखने को मिलता है। यहाँ पर बुढ़ापे की स्मृतियाँ जीवन समाप्त करने की ना होकर नवीन जीवन का आकार ग्रहण करने की है। यह सच है कि अध्यात्म सबके बस का नहीं है । उनके बस का तो बिल्कुल भी नहीं जो उसका अर्थ नहीं जानते, उसे बोझ समझते हो। किंतु जिन्होंने इंसान में ही भगवान को ढूंढना शुरू कर दिया उन्हें इस दुनिया में भी अपना प्रेम मिल जाता है। जो शरीर के भाव से परे है जो शरीर तो मानता है, किंतु पवित्र है, निष्काम है, जहाँ सिर्फ अपनापन है । यह उपन्यास उन युवाओं के लिए एक प्रश्न मौजूद करता है जो युवा शरीर के बल पर अपना जीवन साथी खोजते हैं।  जीवन भर साथ निभाने के वादों से एक दूसरे पर एहसान जताते हैं । चंदा उर्फ चंद्रप्रभा उनसे प्रश्न कहती है की बताइए हमने 80 साल में हमारे पहले पति को खोजने का विचार करके शारीरिक प्रेम को आत्मिक प्रेम में बदल दिया है इस उम्र में स्पर्श कैसा? शर्त कैसी?  विश्वास क्या? विश्वासघात कैसा? यह निबंधात्मक शैली में लिखित एक पश्चिमी उपन्यास है, जो आधुनिक उपन्यासों के प्रारूप को तोड़ता हुआ उपन्यास शैली की नई परिभाषाएं निर्मित करता है । पात्रों को नए रूप में नए परिवेश में पाठक के सम्मुख रखता है । हर बार जहाँ माता-पिता अपनी इच्छाओं को मार देते हैं संतानों की इच्छाओं को जीवन देने के लिए । वहाँ यह उपन्यास बताता है कि किस प्रकार एक पुत्री ने अपनी इच्छाओं को समाप्त करा अपनी माँ की जागृत इच्छाओं को पूरा करने के लिए । इसे आज की विडंबना कही जाए? उपन्यासकार कि  कल्पना कही जाए?अथवा प्रश्न? देखने, सोचने और सुनने सब का नजरिया अपना अपना होगा पर प्रश्न वहीं हैं। यह उपन्यास घटनाओं और संवादों का मोहताज नहीं है। सभी कुछ एक प्रवाह में चलता है किंतु यह किसी मंजिल को प्राप्त नहीं करता। अंततः रोज़ी, माँ और बेटी तीनों समाप्त हो जाते हैं, छोड़ जाते हैं सिर्फ प्रश्न, प्रश्न, और प्रश्न…।

1 comment :

  1. विशिष्ट लेखिका गीतांजलि श्री द्वारा सृजित बहु चर्चित उपन्यास 'रेत समाधि' पर संक्षिप्त दृष्टि सार्थक बन पड़ी है।

    ReplyDelete

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।