कहानी: बदलते रिश्ते

श्यामल बिहारी महतो

- श्यामल बिहारी महतो

देश के इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा था जब कोई थाना परिसर-पंचायत में तब्दील हो गया था। और ऐतिहासिक बनने जा रही इस महा पंचायत में जनता के चुने हुए जन-प्रतिनिधि की जगह न्याय की कुर्सी पर कानून का दारोगा थानेदार समीर मलिक पंच परमेश्वर का अलगू चौधरी के रूप में विराजमान थे। पूरा थाना परिसर शादी की मंडप की तरह सजा हुआ था और जमीन पर घास के ऊपर दरी बिछा दी गई थी। कौतूहल-कोलाहल से थाना परिसर गुंजायमान था। देखने-जानने वालों की भीड़ उमड़ पड़ी थी। सोशल मीडिया पर लाइव टेलीकास्ट होने की बात ने मामले को रोचक और गंभीर बना दिया था। दूर से ही थाना परिसर मेला सा लग रहा था। देखना था वक्त किसके साथ खड़ा होता है और कौन ठिसुआ कर जाता है। वक्त ने बहुत बड़ा खेल रचा था। इसके साथ ही कई जिंदगियों का भविष्य दाँव पर लग गया था।
प्रेम की कोख से जन्मे इस अनोखे और ऐतिहासिक फैसले का गवाह, गाँव से लेकर शहर तक के लोग होने जा रहे थे। किसी थाने में इस तरह की पंचायत होते आज से पहले न किसी ने देखा और न सुना था। लोगों की उत्सुकता अपने चरम पर थी। हर कोई फैसले को लेकर उत्सुक थे। 
इन सबसे रूबरू होता शेखर राजन अपने दोनों मासूम बच्चों के साथ थाने के बड़ा बाबू के ठीक सामने दरी पर कुछ सोचता कुछ याद करता बैठा हुआ था। वहीं उसके बांयी तरफ शेखर की बूढ़ी माँ तारा देवी जाने किस दुविधा में डूबी नजर आ रही थी। 
उससे चार कदम दूरी पर बैठी रेणु राजन तनाव की चादर ओढ़े आत्ममंथन में डूबी हुई नजर आ रही थी। 
 रेणु जब से आई थी एक बार भी शेखर और बच्चों की तरफ नजरें उठा कर नहीं देखी थी। बच्चों ने भी जैसे माँ को भूला दिया था। अभी तक एक बार भी उन्होंने माँ की ओर हुलका-हुलकी नहीं किए थे। कल तक एक घर में और एक छत के नीचे रहते थे। आज सभी एक दूसरे के लिए अजनबी बने हुए थे। घटनाक्रम ने सबको चक्कर में डाल दिया था।
शेखर की बांहों में दोनों बच्चे दूबके से बैठे थे और खुद शेखर जीवन के सात सालों को याद करने बैठ गया था जो उसने रेणु के साथ बिताए। एक सप्तरंगी जीवन! जिसमें जीने का जुनून सवार था! ढेरों सपने थे। एक दम सिनेमाई जैसा ...! वो पल और वो मुलाकात! जिसे मरते दम तक भुलाया नहीं जा सकता। ऐसा जान पड़ता जैसे सब कुछ कल की ही बात हो...!
कपड़ों की खरीदारी के बीच, अचानक से मॉल में रेणु और राजन का टकराना, फिर दोनों का एक दूसरे को " सॉरी " बोलना, मुलाकात का सिलसिला शुरू.होना .! फोन नंबरों का आदान-प्रदान! फिर देर रात तक फोन पर बातें करना! कॉफी शॉप में शाम को दोनों का चाय पीना.फिर " कल मिलते है " कह अपने अपने घर जाना और फिर एक दिन " चलो कहीं बाहर घूमने चलते हैं " शेखर राजन का प्रस्ताव आना
" कहाँ . चलोगे..?" रेणु साहू का जिज्ञासा भरा सवाल उठना 
" जहाँ तुम्हें पसंद हो, पार्क.. हॉल फॉल..!"
" एक एक दिन सभी जगह चल..!" और रेणु खिलखिला उठी थी।
और अगली रविवारीय छुट्टी में बिरसा जैविक उद्यान ओरमांझी पार्क पहुँच जाना! घंटों बाहों में बाहें डाल दोनों का पार्क में मस्ती करना। हिरणों सी रेणु का कुलांचे भरना कितना रोमांचक और कितना हसीन पल था। लौटने पर-
" अच्छा तो हम चलते हैं!"
" फिर कब मिलोगे...!"
अगली वीकेंड में " हुंडरू फॉल " की घोषणा कर शाम होने के पूर्व अपने अपने घर पहुँच जाना! सब कुछ पवित्र और मिठास से भर जाना।
हुंडरू फॉल! प्रकृति का अद्भुत नजारा! मचलते जवां दिलों को जहाँ मिलता है सहारा! वीडियो ग्राफी! फोटो ग्राफी कर युवक-युवतियां अपनी भावनाओं को कैद कर लौटते हैं। एक यादगार पल लिए।
 " हम शादी कब करेंगे-अब रहा नहीं जाता है यार...!" हुंडरू फॉल से निकलने के पूर्व युवाओं की भीड़ में ही रेणु साहू शेखर की गर्दन पर बाहें डाल झूल गई थी
" जब तुम कहोगी ..!" शेखर ने रेणु को ऊपर उठा लिया था
" हिप! हिप! हुर्रे!" उपस्थित भीड़ ने नारे बुलंद की थीं।
" आज ..! अभी ..! यहीं! "
" और तुम्हारे माता-पिता! भाई बहन! 
" जब मै राजी तो क्या करे माँ - पिता जी!" 
" कर लो यार ..! गोल्डन चांस मिस मत करो..!" भीड़ ने फिर आवाज दी
" पर किसी को तो साक्षी होना चाहिए..!"
" ऊपर देखो..!"रेणु सीढीयों की ओर देखते हुए कहा
" शिव मंदिर....!"
" शिव बाबा को साक्षी मानकर कहता हूँ।जब तक मेरी सांसे चलेगी। कभी एक पल भी तुम्हें अपने से दूर नहीं रखूंगा। कभी निराश होने नहीं दूंगा...!"और शेखर राजन ने रेणु साहू के गले माला डाल दिया
" बाबा भोलेनाथ हमें माफ करें, माता पिता के अनुमति बिना हम दोनों शादी बंधन में बंध रहें हैं। भगवान के बिना भक्त रह सकते हैं लेकिन मोबाइल के बिना आदमी आज एक पल भी नहीं रह सकता है आज मैं इसी मोबाइल की कसम खाकर कहती हूँ। तुम्हारे बिना मैं जी नहीं सकूंगी...!" और रेणु ने दूसरी माला शेखर के गले में डाल। खुद उससे लिपट गई!
शिव मंदिर से बाहर दोनों ने कदम रखे तो रेणु की मांग सिन्दूर की लालिमा से जगमगा रही थी..!
" अब ...!" शेखर ने पूछा
" सीधे माँ की चरणों में...!"
शेखर ने सीधे माँ को फोन कर,सारी बातें बता दी। माँ ने इसकी सूचना बगल गाँव में बिहायी बेटी को दे दी थी।
शाम को माँ बेटी ने शेखर रेणु का स्वागत बड़ी सादगी और सलीके से किया। रेणु को लगा नहीं कि वह ससुराल आई है। लगा मॉल से काम कर घर आई है।
तारा देवी ने तब कही थी-" इसकी हर तरह की हरकतें आज तक मैंने सहा अब तुम आ गयी, मुझे छुट्टी दो!"और तारा देवी उन दोनों के सर सहलाने लगी थी। रेणु तारा देवी की चरणों में झुक गई-" आप जैसी माँ पाकर मैं धन्य हो गई!"
" भाभी मैं बगल के गाँव में ही हूँ। भूल न जाना ...!" कह बबीता रेणु से लिपट गई थी।
रविवार को शेखर ने मित्र भोज का आयोजन रखा। सगे रिश्तेदारों के अलावे हार्डवेयर कंपनी में शेखर के साथ काम करने वाले और मॉल में रेणु के साथ काम करने वाली उनकी कई सहेलियां शामिल हुए। सभी ने एक स्वर में नव प्रेमी जोड़े को ढेरों शुभकामनाएं दी और खुशी खुशी चलते बने। रेणु के माता-पिता अनुपस्थित रहे! पर रेणु मायूस नहीं हुई।
 सप्ताह दिन बाद दोनों ने काम ज्वाइन कर लिए। दोनों एक ही शहर में जॉब कर रहे थे।सो आने जाने का भी कोई प्रोब्लम नहीं! शेखर रेणु को सुबह मॉल में छोड़ जाता और शाम को लौटते समय पिकअप कर लेता। दोनों की जिंदगी चल पड़ी। दोनों खुश! दोनों मस्त! साल बाद एक प्यारा सा बेटा हुआ। नाम रखा दीपक! घर में उजियारा छा गया। तारा देवी को एक खिलौना मिल गया। दिन भर दीपक को लौरी सुनाती रहती थी। चलती का नाम गाड़ी। दौड़ती का नाम जिंदगी! आज के युवाओं का फिलिंग्स! शादी के चौथे साल में रेणु ने एक बेटी को जन्म दी। नाम " रूपा " रखा गया। उधर रेणु का प्रमोशन हो गया। सेल्स गर्ल से " सेल्स " मैनेजर बन गई थी। उस दिन घर में एक पार्टी रखी गई थी। खाने-पीने की चीजें मौजूद थीं। दोस्तों ने खूब लुत्फ उठाये। और चलते बने। देर रात शेखर ने रेणु से कहा-" रेणु तुम मुझे न मिलती तो पता नहीं मेरे जीवन का ठौर ठिकाना कैसा रहता। मेरी जिंदगी का रंग रूप किस हालत में होती! तुमने मेरे घर को स्वर्ग बना दिया है! आई एम वेरी हैप्पी रेणु ...!"
" तुमसे मिलकर ही मैंने जीना सीखा शेखर! आई लव यू .शेखू .!"
और फिर अनचाहे गर्भ की तरह वो मनहूस घड़ी आई। जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की होगी! जिसने मानव जीवन में एक जलजला सा ला दिया। मानव निर्मित उस विपदा के आगे बड़े बड़े भगवान बौने साबित हुए और अपने अपने घरों में छिप गए या फिर छिपा दिए गए- दरवाजे में ताले डाल दिए गए थे। परीक्षे की इस घड़ी में हताशा में डूबे मानुष्यों ने हिम्मत से अपने अपने कुनबे को बचाने वास्ते हाथ पैर मारना शुरू कर दिया था। कई मानव-महामानव के रूप में भी नजर आए।
किसी ने सोचा न था कि अचानक से दुनिया में ऐसी आफत आ जाएगी। देखते देखते करोना का एक छोटा सा वायरस पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लेगी। लेकिन करोना ने विश्व में हाहाकार मचा दिया था। इससे भारत भी अछूता न रहा और जब भारत अछूता न रह सका तो पटेल नगर का भेडमुका चौक कैसे अछूता रह पाता। 
करोना की बढ़ती लहर देख केन्द्रीय सरकार ने आनन-फानन में " लाक डाउन " की घोषणा कर दी। जो जहाँ थे वहीं फंस गए। कल कारखानों में ताले डाल दिए गए और मजदूर कर्मचारियों को सड़क पर छोड़ दिया। हॉल मॉल फॉल! सब बंद। कारखाने बंद और मजदूर सड़क पर। नौकरियां गयी और पाबंदियां बढ़ गई। सड़क के मजदूर पैदल घर की ओर निकल पड़े। बस में जगह न मिले तो बस की छत पर चढ़ने लगे। रेल बंद तो लोग रेल की पटरियों पर चलने लगे-कुचले जाने लगे जैसे कीड़े मकोड़े केंचुए कुचले जाते हैं।। बेकार लोग घर में बैठे बैठे बीमार पड़ने लगे। पति-पत्नी में तकरार बढ़ गया। हर घर के राशन दाल में कंकड़ बढ़ गया और चूल्हे हिलने लगे थे।
शेखर राजन का नौकरी गया और रेणु का मॉल बंद हो गया। घर में तनाव-घुटन का माहौल! खिझ की शुरुआत! सब घरों की एक ही हालात! सब एक दूसरे को बोझ समझने लगे थे। शेखर के घर में भी छिन भिन्न शुरू हो गया था। प्यार सिसकने लगा था - दुरियां बढ़ने लगी थी और बच्चे दुलार को तरसने लगे थे। 
छः माह में ही मन में छः हजार छेदें हो चुकी थीं। भात पेट की भूख मिटा देता पर तन का भूख! वो स्रोत वो तालाब ही जैसे सूख गया था जो कभी दोनों के लिए समंदर हुआ करता था। दिन महीने बीते। जीवन पटरी पर लौटी। फिर लोग रोटी रोजगार में निकल पड़े।
सरकार खुल गई! दुकान मॉल खुल गया परंतु शेखर को नौकरी वापस न मिली। सुबह शेखर रेणु को मॉल तक छोड़ जाता और खुद जॉब की तलाश में निकल जाता पर बंद के छः माह में ही बहुत कुछ छिन भिन्न हो चुका था। जॉब मिलना आसान न था। प्राइवेट जॉब कभी टिकाऊ नहीं होते। शाम को घर लौटता तो चेहरे पर थकान और हताशा का सीमेंट-गारा का लेप चढ़ा सा होता। कभी खाता कभी बिना खाए चुपचाप सो जाता! 
इसी बीच, सुहागिनों का पर्व आ गया। कहा जाता है कि इसे करने से पतियों के प्राण आयु लम्बी हो जाती है - पति सत्यवान बन जाता है! अरे वही सावित्री वट वृक्ष पूजा!
शादी के बाद हर साल इस दिन शेखर रेणु को साड़ी लाकर देता था। इस वर्ष रेणु साड़ी खुद लेती आई थी। दूसरे दिन शाम को रेणु पूजा कर लौटी तो शेखर घर में नहीं था। जॉब को लेकर वह किसी दोस्त से मिलने चला गया था। देर रात को घर लौटा तो दरवाजे पर माँ खड़ी थी। रेणु सो चुकी थी।
और अगले ही दिन शेखर के जीवन में विस्फोट हो गया था। बहुत शातिर दिमाग की घटना घटी थी। जिस कारण थाना परिसर आज महापंचायत में बदल गयी थी।
शेखर सुबह रेणु को छोड़ने मॉल गया था। तभी रेणु बोली-" मैं आधार कार्ड लाना भूल गयी। उसकी जरूरत है! प्लीज़ ला दो...!"
शेखर वापस घर लौटा। परन्तु उसे ओरिजिनल आधार कार्ड घर में नहीं मिला। जिरोक्स लेकर जब वह दूबारा मॉल पहुँचा तो रेणु मॉल में नहीं मिली।पूछ ताछ से भी कुछ पता नहीं चला। उसे किसी अनहोनी की आशंका सताने लगी थी। किडनैपिंग, बलात्कार और हत्याएं! आज कल हर अखबार भरा रहता है। नजदीकी थाने में मामला दर्ज करा दिया गया। मॉल के सारे सीसीटीवी कैमरों को खंगाल कर पुलिस चली गई। रेणु कहाँ गयी, किसके साथ गयी किसी को कुछ पता नहीं। सप्ताह दिन तक पुलिस को कोई सुराग हाथ नहीं लगा। रामायण-गीता की कसमें खाकर लोग झूठ बोलते हैं। रेणु शिव बूढ़ा बाबा की मंदिर में मोबाइल की कसम खाकर शेखर को पति स्वीकार की थी। एक दिन उसी मोबाइल ने पुलिस को सुराग दे दिया। उस दिन रात को दस बजे शेखर के मोबाइल पर रेणु का मैसेज आया "मुझे ढूंढने की कोशिश मत करना। मैं तुम्हारे साथ खुश नहीं थी। इसी लिए साथ छोड़ा। बच्चों का ख्याल रखना...!"
शेखर ने तत्काल इसकी सूचना पुलिस को दे दी।

भोर मुहूर्त में "मन मयूर होटल" में छापा मारा गया और रेणु एक युवक के साथ पकड़ ली गई। जब उन दोनों को पुलिस जीप में डाला जा रहा था तो रेणु ने कहा था, “सर! चाहें तो आप मुझे सीधे जेल भेज दीजिए या फिर थाने ले चलिए। लेकिन भगवान के लिए मुझे उस घर में मत भेजिए जिसे मैं छोड़ आई हूँ।" 
पुलिस उन दोनों को सीधे थाने ले आई ‌‌‌‌और शेखर को भी थाने में आने को कह दिया गया। सूचना अखबार-मीडिया को भी दे दी गई थी। इस वक्त मीडिया वाले लाइव टेलीकास्ट करने की तैयारी में था
आज के इस महापंचायत का मुखिया कानून का दारोगा थानेदार समीर मलिक ने एक बार थाने के चारों ओर नजरें दौड़ाई फिर सामने की भीड़ से मुखातिब होते हुए कहा-" आज थाना परिसर में इस तरह की पंचायत क्यों बैठी है यह सब आप सभी को मालूम हो चुका होगा! रेणु राजन जो शेखर राजन की पत्नी है, सप्ताह दिन पहले शेखर को छोड़कर फरार हो गयी थी। ऐसा उसने क्यों किया सुनिएगा उसी के मुँह से। तो हम सीधे चलते है रेणु के पास..।" समीर मलिक खड़े हो गये थे, “आपका नाम?" रेणु से पूछा गया
"रेणु राजन।"
"विवाह-पूर्व नाम?'
"रेणु साहू!"
"आपने तो शेखर राजन के साथ प्रेम विवाह किया था फिर साथ क्यों छोड़ दिया आपने?"
"मैं उसके साथ खुश नहीं थी..."
"क्यों? उसमें अब क्या खराबी आ गई? क्या शराब पीने लगा है? मार पीट करने लगा है या फिर..."
"ऐसी कोई ऐब नहीं है उनमें। बस मेरे लिए उनके पास समय नहीं था।"
"मतलब, ... छह साल के प्यार भरे दाम्पत्य जीवन को ठोकर मार चल दीं? दोनों मासूम बच्चों पर इसका क्या दुष्प्रभाव पड़ेगा, यह भी नहीं सोचा? कैसी माँ है आप?" चुभती नजरों से देखा रेणु राजन को और आगे कहा, “अभी आप क्या चाहती है? शेखर के साथ रहेगी या नये दोस्त रोहित शर्मा के साथ जायेंगी?”
रेणु का मुँह न खुल सका!
"बोलिए। आज का यह पंचायत आप पर कोई जोर जबरदस्ती नहीं करेगा। आप अपनी राय दीजिए आज का यह महापंचायत आपको आगे अपनी जिंदगी चुनने का पूरा हक देती है!"
रेणु रोहित शर्मा की ओर देखने लगी थी। समीर मलिक ने इस बार सीधा हमला कर दिया, "उसे मत देखिए। वो आपके लिए नया पसंद हो सकता है लेकिन वो आपके जीवन के लिए एक सुन्दर धोखा है। आप इस शख्स के बारे में क्या जानती है? दो माह पूर्व ही इसकी पुरानी गर्लफ्रेंड इसे लात मारकर चली गई। यह अकेला छटपटाने लगा था और तब आपके पीछे पड़ गया। और आपने बहुत जल्द उसे अपने करीब आने का मौका दे दिया कॉफी हाउस में! रेणु जी आपने इसकी जॉब की पूरी जानकारी कर लेने के बाद ही इससे मित्रता बढ़ाई होगी। पर मेरी भी एक बात सुन लीजिए आप जिसे रोहित शर्मा का प्यार समझ रही है वह प्यार नहीं, सिर्फ टाइम पास है। हाँ रोहित शर्मा बैंक कर्मचारी है – यह सही है और अच्छी बात है, पर घर में इसकी शादी की बात चल रही है पता है आपको?"
"सर आप मुझे बदनाम कर रहे है..." रोहित शर्मा ने एतराज जताया।
"चुप रहो वरना सीधे अंदर डाल दूंगा। मैं थोड़ा दूजे किस्म का थानेदार हूँ। इसके पहले जहाँ था वहाँ भी मैंने दो पंचैती की थीं!"
"हाँ तो मुहतरमा, आप कुछ कहना चाहेंगी या अब भी इसके साथ जाना पसंद करेंगी? फैसला आपके हाथ में है!”
"हाँ, तो शेखर राजन! यही नाम है न आपका?"
"जी हाँ सर!" शेखर उठ कर खड़ा हो गया।
"आपकी पत्नी आपसे खुश नहीं हैं। आप पहले की भांति पत्नी को समय और सुख नहीं दे पा रहे थे। इसी लिए आपको छोड़कर चली गई। इस पर आपका क्या कहना है?"
"सर, मै जैसा पहले था आज भी वैसा ही हूँ। करोना की वजह मेरा जॉब चला गया। इस कारण मैं थोड़ा अपसेट रहा। भाग दौड़ में लगा रहा। परिवार को पूरा समय नहीं दे पा रहा था यह सच है! रेणु को मैंने कभी अपने से अलग नहीं समझा। अब जब वह मुझसे खुश नहीं है कि बात कही है तो यह जहाँ, जिसके साथ जाना चाहे, जा सकती है। सदा खुश रहे, यही कामना करता हूँ।" और शेखर शांत हो गया था, जैसे दौड़ता हुआ घोड़ा सहसा बैठ जाता है!
रेणु अंतर्द्वंद्व में घिर चुकी थी। उसका मन दो हिस्सों में बंट चुका था। एक छोर से आवाज आ रही थी, "रेणु मैदान साफ हो चुका है, लपक ले रोहित शर्मा को, जैसे कभी शेखर मिला था। बैंक की नौकरी है, लाखों डिपॉजिट होगा। रूपए पैसों की तंगी न होगी कभी। आगे बढ़ आगे और कह दे जमाने से कि रोहित शर्मा आज से मेरा पति है। यही मेरा वर्तमान है। बाकी गुजरा हुआ जमाना है।"
लेकिन मन के दूसरे हिस्से ने लताड़ा, "तुम कैसी माँ हो, एक बार भी बच्चों के वर्तमान और भविष्य के बारे नहीं सोचा। शेखर से तुम्हें शिकायत हो सकती है लेकिन बच्चों के प्रति कैसे निष्ठुर हो गई तू। जिसे तुमने अपनी कोख में रखा, जन्म दिया, दूध पिलाया और आज एक दम से पराई हो गई हो! केवल अपनी शरीर की भूख को मिटाने के खातिर ही न यह सब किया। सुना नहीं, समीर साहब ने क्या कहा- दो महीने पहले तक रोहित शर्मा किसी ओर की बाँहों में समाता था! घर में शादी किसी ओर के साथ करने की बात हो रही है, ऐसे लोगों से तुम प्यार की उम्मीद लगाए बैठी हो - इससे तो अच्छा शेखर है जिसका अतीत भी तुम हो और भविष्य भी तुम ही रहोगी! शेखर हीरा है तो रोहित काँच है काँच! संभल जाओ, अपने पैर में कुल्हाड़ी मत मार लो!"
तभी रेणु राजन चिहुंक उठी थी!
"मैं रेणु के साथ अभी, यहीं शादी करने को तैयार हूँ!" रोहित शर्मा अचानक से उठ खड़ा हो गया था। उसने रेणु की ओर देखते हुए कहा, "मेरे घर में मेरी शादी की सिर्फ बात चल रही है, शादी हुई नहीं है मेरी!" रोहित शर्मा ने जैसे सफाई दी थी। थोड़ी देर तक शोरगुल हुआ, “दो मर्दों के बीच एक औरत को जलील किया जा रहा है!" भीड़ में कहीं से आवाज आई। इससे पहले कि समीर साहब इस पर कुछ बोलते, शेखर राजन उठ खड़ा हो गया था! नजर भर सभी ओर देखा फिर छोटी बेटी को गोद में उठाया, बेटे की बाँयी हाथ पकड़ा और माँ तारा देवी से कहा, "चलो माँ, अब हमारा यहाँ कोई काम नहीं रह गया। दीपू-रूपू को भूख लगी होगी - चलता हूँ थानेदार साहब! आपका बहुत बहुत धन्यवाद! रेणु को नये पति के साथ विदा कर दीजिए!" और शेखर चल पड़ा।
रेणु को लगा। सीना चीर उसके जिगर-कलेजों को एक आदमी लिए जा रहा है और दूसरा उसके शरीर को खींचने में लगा हुआ है। और वह चीख रही है पर उसकी आवाज कोई नहीं सुन पा रहा है।
मन का सोया हिस्सा पुनः जाग उठा, "रेणु रोहित के साथ निकल जाओ। गोल्डेन चांस है! शेखर ने तुम्हें आजाद कर दिया।"
"मूर्ख औरत! क्षण भंगुर खुशियों के लिए, सम्पूर्ण खुशियों के खजाने को लुटाने की सोच रही है। शेखर राजन जैसा पति बहुत कम को नसीब होता है..." अंतरात्मा ने धिक्कारा था। सोये से जैसे जाग उठी थी रेणु! खड़े-खड़े जोर से चिल्लाई, “शेखर, शेखर, शेखर!" इसके साथ ही वह मूर्छित होकर वहीं गिर पड़ी थी। लोग उसकी ओर लपके। समीर साहब ने सबको बरज दिया, “रूक जाओ! कोई उसके करीब नहीं जायेगा!"
समीर साहब ने सिपाही से पानी लाने को कहा। चेहरे पर पानी के छींटें पड़ते ही रेणु हड़बड़ा कर उठ खड़ी हो गई। उसने सीधे सामने की ओर देखा। नाक की सीध में शेखर जो अपनी स्कूटी स्टार्ट कर रहा था, आवाज सुनकर रुक गया था।
और रेणु दौड़ पड़ी थी...
सीधे शेखर के पास जाकर रुकी। अब केवल उसकी साँसें दौड़ रही थी। हाँफते हुए कहा था उसने, "शेखर, मुझे माफ़ कर दो! मर जाऊंगी पर अब तुम्हें छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी।"
“रख लो यार! ठोकर खा चुकी है!” किसी ने कहा
"हाँ हाँ रख लो, घर ले जाकर गंगा जल छिड़क देना! शुद्ध हो जाएगी!" भीड़ ने आवाज लगाई।
उधर थाना परिसर गूंज उठा, "समीर साहब जिंदाबाद!"
"महापंचायत जिंदाबाद!"
***

परिचय: श्यामल बिहारी महतो
जन्म: 15 फरवरी 1969, मुंगो ग्राम में बोकारो जिला झारखंड में
शिक्षा: स्नातक
प्रकाशन: बहेलियों के बीच कहानी संग्रह भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित तथा अन्य दो कहानी संग्रह बिजनेस और लतखोर प्रकाशित और कोयला का फूल उपन्यास प्रकाशित और पाँचवीं पुस्तक उबटन प्रेस में
संप्रति: तारमी कोलियरी सीसीएल कार्मिक विभाग में वरीय लिपिक स्पेशल ग्रेड पद पर कार्यरत और मजदूर यूनियन में सक्रिय।
ईमेल-shyamalwriter@gmail.com

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।