मौसमे-फ़रवरी

डॉ. मृदुल कीर्ति को विश्व हिंदी सम्मान
हम होंगे क़ामयाब, हम होंगे क़ामयाब एक दिन
ओ हो मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास
हम होंगे क़ामयाब एक दिन
(अंग्रेज़ी गीत 'वी शैल ओवरकम' का अनुवाद, गिरिजा कुमार माथुर द्वारा)

फ़रवरी का मास अमेरिका में 'अश्वेत इतिहास मास' के रूप में मनाया जाता है। सबको पता है कि कुछ समय पहले तक संसार के कई प्रभुतासम्पन्न राष्ट्रों में मनुष्यों को पशुओं की तरह क्रय-विक्रय करने की अमानवीय प्रथा को नैतिकता, और वैधानिक मान्यता मिली हुई थी। संतोष है कि आज ज़्यादातर लोग ऐसी जाति-आधारित बुराइयों से दूर हैं और लगभग सारे सभ्य देशों के क़ानून ऐसे भेदभाव को प्रतिबंधित करते हैं। अमेरिका में हर साल फ़रवरी में अश्वेत समुदाय के नायक-नायिकाओं की साहसिक गाथाओं को याद किया जाता है और सामाजिक समरसता बढ़ाने के प्रयास किये जाते हैं।

सामान्य समझ है कि पश्चिमी विकास का आधार एक समुदाय द्वारा दूसरे पर, उनके क्षेत्र पर, उनकी संस्कृति पर आधिपत्य जमाये बिना, उपनिवेशवाद को पोषित किये बिना सम्भव नहीं था। लेकिन हम भूल जाते हैं कि श्वेत आधिपत्य, और पश्चिमी शोषण से पहले का अफ़्रीका मध्य-पूर्वी उपनिवेशवाद द्वारा सताया गया था। भारत के इतिहास में ग़ुलाम वंश की बात करने पर हमें अरब-इस्लामिक दासप्रथा की याद आना स्वाभाविक है। भारत पर शासन करने वाले आक्रांता न केवल अफ़्रीकी मनुष्यों को दास बनाकर भारत लाये, उन्होंने भारतीय समाज के लोगों को भी दास बनाकर उनके साथ पशुवत व्यवहार किये। दुर्भाग्य से भारतीय इतिहासकारों ने भारत से दास बनाये गये लोगों की दुर्दशा की घनघोर उपेक्षा की है लेकिन मध्यपूर्व में डोम तथा यूरोप में जिप्सी-रोम समुदायों की बुरी स्थिति उस दुष्काल की गवाही आज भी दे रही है। अपनी मातृभूमि और परम्पराओं से काटकर दूर देशों में नीलाम किये गये मनुष्यों के वंशज आज अपने पूर्वजों द्वारा भोगी गयी क्रूरता से भले मुक्त हों लेकिन वे आज भी समान अवसरों से वंचित रखे गये हैं। इसलिये ब्लैक हिस्ट्री मंथ जैसे अवसर आज भी न केवल प्रासंगिक हैं, बल्कि आवश्यक भी।

पिछले दशकों में रंगभेद के बारे में जागृति बढ़ी है लेकिन समाज का एक वर्ग अभी भी ऐसा है जिसके साथ निरंतर भेदभाव होता रहा है। संसार की आधी आबादी, महिलाओं का एक बड़ा वर्ग आज भी अपने अधिकारों से वंचित है। पाकिस्तानी अदालतों में आज भी महिलाओं की गवाही को वैधानिक रूप से पुरुषों की गवाही का आधा माना जाता है। भारत में भी "यत्र नार्यस्तु पूज्यंते" का उद्घोष करने वाले समाज के एक औसत ग्राम में कितनी वयस्क महिलाएँ साइकिल या कोई अन्य वाहन चला सकती हैं, या आधी रात में स्वतंत्रता से अकेली कहीं आ-जा सकती हैं? महानगरीय शिक्षित परिवारों में भी बड़े निवेश, यहाँ तक कि घर खरीदने-बेचने जैसे निर्णय भी पुरुषों द्वारा लिये जाना सामान्य बात है। मुस्लिम समाज का हाल तो और भी बुरा है जहाँ लैंगिक भेदभाव को धार्मिक मान्यता मिली हुई है।

यहाँ यह उल्लेख भी आवश्यक है कि जिस प्रकार पाकिस्तान में महिलाओं की गवाही पुरुष की आधी है, उसी प्रकार औरंगज़ेब के शासनकाल में संग्रहीत फ़तवा ए आलमगीरी के अनुसार दास की गवाही आधी भी नहीं बल्कि शून्य है।

दास प्रथा की आधिकारिक समाप्ति के बाद भी अंग्रेज़ों ने गिरमिटिया, अंगाजे आदि स्वरूपों में सुदूर देशों में भारतीय श्रमिकों का शोषण जारी रखा। वैस्ट इंडीज़, मॉरिशस, फ़ीजी आदि देशों के भारतवंशी उन्हीं श्रमिकों के वंशज हैं। खुशी इस बात की है कि आज वे सुखी और समृद्ध तो हैं ही, विश्व-बंधुत्व और वैविध्य के आदर जैसी भारतीयता की मूल-भावनाओं से भी हमसे कहीं अधिक अच्छी तरह जुड़े हुए हैं। श्रमिकों के साथ इन देशों में ले जाये गये रामचरित मानस जैसे ग्रंथों ने न केवल उनकी आशा और जिजीविषा को जीवित रखा, उन्हें अपनी जन्मभूमि से जोड़े भी रखा। वे हिंदी से भी जुड़े हैं, इसलिये इन देशों में विश्व हिंदी सम्मेलन जैसे आयोजन स्वाभाविक हैं।

हंसा दीप
फ़ीजी में हुए इस बार के विश्व हिंदी सम्मेलन में सेतु के पाठकों के परिचित नामों जैसे मृदुल कीर्तिशैलजा सक्सेना सहित अनेक हिंदी-सेवियों को विश्व हिंदी सम्मान मिला है। सभी सम्मानितों को सेतु परिवार की ओर से बधाई।

सेतु के पाठकों की परिचित कैनैडा निवासी लेखिका हंसा दीप की कहानी “शून्य के भीतर” को कथा यूके का प्रतिष्ठित पुरवाई कथा सम्मान 2022 मिला है। उन्हें हार्दिक बधाई!

हिंदी के विकास, प्रचार, और प्रसार की इतनी गतिविधियों के बावजूद जब यत्र-तत्र प्रकाशित रचनाओं में र में उ (रु) तथा ऊ (रू) की मात्राओं में समभाव के साथ-साथ अल्पविराम या पूर्णविराम की जगह दो बिंदुओं (..) का भाजी-खाजावाद देखता हूँ, तो टीस तो होती है। न मालूम हिंदी पढ़ने-पढ़ाने में चूक कहाँ हुई है, लेकिन यह है बहुत भारी चूक, जो शायद ही किसी अन्य भाषा में इतनी सहज-स्वीकार्य हो जितनी हिंदी में हो चली है। चंद्रबिंदु की तो बात उठाना ही बेमानी हो चला है।

फ़रवरी में ही दिल्ली का वार्षिक पुस्तक मेला भी सम्पन्न हुआ जो हिंदी के लेखकों व प्रकाशकों के लिये एक बड़ा उत्सव है। आशा है दिल्ली के निकटवर्ती पुस्तकप्रेमियों ने इसका भरपूर लाभ उठाया होगा। 

भाषा की दृष्टि से देखें तो फ़रवरी मास में एक और महत्त्वपूर्ण आयोजन होता है - अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस जो 21 फ़रवरी 1952 को ढाका विश्वविद्यालय में बंगाली भाषा की अस्मिता की रक्षा करने सामने आये छात्रों की पाकिस्तानी प्रशासन द्वारा 'केवल उर्दू' के नाम पर की गयी निर्मम हत्या की स्मृति में मनाया जाता है। दु:खद है कि उर्दू के बहाने भारत को तोड़ने वाले पाकिस्तान ने उर्दू के बहाने ही बांगलादेश को खुद से काट दिया। उससे भी दु:खद बात यह है कि अब पाकिस्तान में उर्दू को भी पग-पग पर अरबी से विस्थापित करने के प्रयास किये जा रहे हैं। वाकई मज़हब के बाद सबसे ज़्यादा घृणा शायद भाषाओं के नाम पर ही फैलायी गयी है।

आगामी पीढ़ियों के हित में हमारा नैतिक कर्तव्य है कि हम एक वैविध्य-पूर्ण, स्वतंत्र समाज बनाने की दिशा में कार्य करें। लेकिन मनुष्यों के हित के साथ-साथ हमें अन्य प्राणियों के हित के बारे में भी सोचना चाहिये। खेती की उन्नत तकनीकों तथा विषैले कीटनाशकों के प्रयोग के साथ-साथ भोज्य पदार्थों की बेहतर पैकिंग के साथ-साथ बढ़ते अपार्टमेंट कल्चर के कारण पशु-पक्षियों का जीवन कठिन होता जा रहा है। राजधानी सहित एक बड़े भारतीय क्षेत्र में आवारा पशुओं के लिये पानी की व्यवस्था का अभाव उनकी तकलीफ़ों को बढ़ा रहा है। इससे जहाँ गौरया, गिद्ध आदि अनेक पक्षी विलुप्ति के कगार पर पहुँचे हैं, वहीं बढ़ते पशु-असंतोष के कारण देश में भूखे कुत्तों या बंदरों द्वारा मानवों पर हमला करने की घटनाएँ भी देखने में आ रही हैं। यह अपने गिरेबान में झाँकने और अब तक की गयी ग़लतियों को ठीक करने का समय है। प्रशासन तो न जाने कब जागे लेकिन अपने-अपने स्तर पर पशु-पीड़ा को कम करने के लिये हम जो कुछ भी कर सकते हैं, कृपया अवश्य कीजिये।

पश्चिमी देशों के आकर्षण के चलते, पिछले दिनों भारत से अमेरिका आने के प्रयास में अनेक नागरिक नृशंस मानव-तस्करों के हत्थे चढ़कर अपनी जान गँवा बैठे हैं, इसलिये इस विषय में जागृति फैलाना भी ज़रूरी सा लगता है कि पैसे देकर, कर-कराकर, या जुगाड़ से विदेश जाने, ले जाने के सभी वायदे न केवल अवैध हैं, वे घातक भी सिद्ध हो सकते हैं। इस वर्ष जनवरी में ऐसे ही किसी गिरोह द्वारा अमेरिका की कैनाडा सीमा पर लाकर छोड़ दिये गये पति-पत्नी और उनके दो बच्चे शून्य से 35 अंश नीचे के तापमान में ग्यारह घंटे फँसे रहने के बाद मृत पाये गये। इससे पहले अमेरिका की मेक्सिको सीमा की मरुभूमि में एक बच्ची की प्यास के कारण हुई मृत्यु का समाचार आया था। सच है कि अपराधियों का जाल अंतरराष्ट्रीय है, और प्रशासनिक सहयोग कम है लेकिन यदि जन-सामान्य खुद भी इन मानव-तस्करों के जाल में न फँसें तो अनेक जानें बचाई जा सकती हैं।         

सेतु के फ़रवरी 2023 अंक पर आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।

शुभाकांक्षी,
सेतु, पिट्सबर्ग
28 फ़रवरी 2023 ✍️


1 comment :

  1. दास प्रथा रंग भेद और प्रभुत्वशाली शासकों द्वारा मनुष्य के साथ जानवरों के समान बर्ताव पर अच्छा सम्पादकीय लिखा है भारत वंशी समाज के कई वर्ग आज़ अपने अस्तित्व को बनाए रखने में कामयाब हुए हैं यह बहुत बड़ी बात है।
    शुभकामनाएं अभिनंदन

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