अनोखे स्वतंत्रता सेनानी, साहित्यकार और पत्रकार: श्री विजय सिंह पथिक

दिनेश पाठक ‘शशि’

दिनेश पाठक ‘शशि’


कोई साहित्यकार हो, पत्रकार हो, किसान हो या साधारण सा इंसान, जिसके हृदय में भी अपने देश के प्रति कर्त्तव्यबोध है वह अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए सब कुछ न्यौछावर कर सकता है। कहा गया है कि-
जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं
वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। 

अपने देश पर सब कुछ न्यौछावर करने वाला ऐसा ही एक इंसान जो कवि, कथाकार, प्रखर पत्रकार और समाज सेवी, प्रगतिशील विचारक, कुशल संगठन कर्ता, ओजस्वी वक्ता, सामाजिक बुराइयों का कट्टर विरोधी और न जाने कितनी-कितनी उपाधियों से विभूषित किए जाने वाला था, जब अपनी मातृभूमि की सेवा की बात आई तो वह महान स्वतंत्रता सेनानी भी बन गया। अनेक उपाधियों से विभूषित उस व्यक्ति का नाम था- श्री विजय सिंह पथिक। विजय सिंह पथिक नाम तो उसका बाद में पड़ा जब उसे अपनी पहचान छुपाने के लिए अपना भेष बदलना पड़ा था। असली नाम था- श्री भूपसिंह राठी।

विजय सिंह पथिक
(27 फरवरी 1882 - 28 मई 1954)

उत्तर प्रदेश के जनपद बुलन्दशहर के एक गाँँव गुठावली अख्त्यारपुर में एक देशभक्त गुर्जर किसान श्री हम्मीर सिंह गुर्जर और माता कवल कुँँवर के पुत्र के रूप में 27 फरवरी 1882 को एक बच्चे ने जन्म लिया। माता-पिता ने उसका नाम भूप सिंह राठी रखा।

भूपसिंह राठी का बचपन से ही अद्भुत व्यक्तित्व था। समाज को आन्दोलित करने की भूपसिंह राठी में अद्भुत क्षमता थी। वह सामाजिक कुरीतियों और रूढ़ियों का विरोध करने में कभी चूकते न थे।

उनकी राष्ट्रीय भावना का दिग्दर्शन उनके साहित्य में बिखरा पड़ा है। उनकी राष्ट्रीयता केवल विचारों की राष्ट्रीयता नहीं थी अपितु उन्होंने जैसा सोचा, कहा वैसा ही स्वयं के जीवन में उतारा भी। वे सदैव सामाजिक रूढ़ियों के विरोधी रहे। उन्होंने सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ते हुए 48 वर्ष की उम्र में एक बाल विधवा अध्यापिका श्रीमती जानकी देवी से 24 फरवरी 1930 ई को विवाह किया।

उनका जन्म तो हुआ था जनपद बुलन्दशहर के गाँँव अख्त्यारपुर में और उन्होंने युवावस्था के कई वर्ष बिताये मथुरा में। मथुरा में वह अपनी पत्नी श्रीमती जानकी देवी के साथ रहे जहाँ उनके दो सन्तान पुत्रियाँँ भी उत्पन्न हुईं जिनकी अल्पायु में ही मृत्यु हो गई और फिर पथिक जी ताउम्र निःसंतान ही रहे। पत्रकार के रूप् में पथिक जी ने अनेक सामाजिक और राजनैतिक समस्याओं को बड़ी गम्भीरता से उठाया। 1938-39 में पथिक जी राजस्थान से आगरा आ गये जहाँ उन्होंने ‘नव संदेश’ नामक समाचार पत्र निकाला।

मथुरा प्रवास के दौरान तथा सत्याग्रहों एवं आन्दोलनों के कारण समय-समय पर विभिन्न जेलों में कैदी होने पर उन्होंने हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं कहानी, कविता, निबन्ध, नाटक, उपन्यास आदि में प्रचुर मात्रा में साहित्य रचा। यद्यपि उनकी पुस्तकों में से प्रकाशन केवल सात पुस्तकों का ही हो सका शेष लगभग 20 पुस्तकें आज भी प्रकाशन की प्रतीक्षा में पाण्डुलिपि के रूप में राजस्थान राज्य अभिलेखागार, बीकानेर में अनुरक्षित हैं।

मथुरा में उनकी पत्नी जहाँ पर रहीं उस जानकी निवास में उन्होंने अपने पति के नाम से विजय सिंह पथिक पुस्तकालय की स्थापना की थी जो जनरैलगंज मथुरा में जानकी निवास में आज भी है। यद्यपि अपनी मृत्यु सन् 2012 ई तक उस पुस्तकालय का संचालन पथिक जी के एक रिश्तेदार श्री नरेन्द्र चौहान के हाथ में रहा जो अपने परिवार सहित पथिक जी की पत्नी के साथ ही जानकी निवास में रहते थे। नरेन्द्र चौहान, उनकी पत्नी तथा जानकी देवी की मृत्यु के बाद से वर्तमान में वह पुस्तकालय बन्द पड़ा हुआ है।

विजयसिंह पथिक जी के साहित्य पर कई शोध भी हुए जिनमें डॉ. लारी आजाद (रीडर व अध्यक्ष, इतिहास विभाग, एन.आर.ई.सी. कालेज, खुर्जा)के निर्देशन में डॉ. हरेन्द्र सिंह ने डाक्टरेट की तथा हापुड़ के डॉ. शीश किरण गुप्ता ने भी विजय पथिक जी पर अपना शोध कार्य किया था।

भूपसिंह राठी मथुरा से अजमेर चले गये थे। वहाँ क्रान्तिकारियों के साथ जुड़ने पर अपना नाम बदलकर विजयसिंह पथिक बन गये। समय-समय पर कभी साधु वेश तो कभी अन्य छद्म वेश धारण करना पड़ा। बिजौलिया के किसान आंदोलन एवं अन्य आंदोलनों से सक्रिय रूप से जुड़े तो राजस्थान केसरी का खिताब मिला। और इस प्रकार भूपसिंह राठी, विजय सिंह पथिक के नाम से एक महान क्रान्तिकारी के रूप में विख्यात हुए। सन् 1908 ई में बंगाल के गवर्नर फ्रेजर की स्पेशल रेलगाड़ी पर बम फैंकने की कार्यवाही में भूपसिंह राठी उर्फ विजयसिंह पथिक की प्रमुख भूमिका थी।

मुजफफरपुर के जिलाधीश किग्सफोर्ड की हत्या के संदर्भ में जिन 36 क्रान्तिकारियों की गिरफतारी हुई थी उनमें एक पथिक जी भी थे। पथिक जी के क्रान्तिकारी स्वरूप को उद्घाटित करते हुए सुप्रसिद्ध लेखक श्री शंकर सहाय सक्सेना ( भूतपूर्व निदेशक, कॉलेज शिक्षा राजस्थान) ने वर्ष 1963 ई में मुक्तवाणी प्रकाशन, बीकानेर से प्रकाशित ‘पथिक’ नामक पुस्तक में लिखा है-
"ऐसा जान पड़ता है कि प्रसिद्ध क्रान्तिकारी रासबिहारी बोस ने युवक भूपसिंह को बहुत उपयुक्त समझकर शिक्षा-दीक्षा का भी प्रबन्ध किया। वहाँ रहकर भूपसिंह ने बम बनाने की शिक्षा और क्रान्ति के सैद्धान्तिक पक्ष व व्यावहारिक पक्ष की शिक्षा प्राप्त की। उसके बाद भूपसिंह को भी राजनैतिक डाकों और हत्याओं के लिए भेजा जाने लगा।"

23 दिसम्बर 1912 को लार्ड हार्डिंग के दल पर रासबिहारी एवं सहयोगियों के साथ भूपसिंह बम फैंककर जब पुलिस एवं सेना की आँखों में धूल झौंककर साफ निकल गये तो पंजाब केसरी लाला लाजपतराय ने कहा कि-
"जिस आदमी ने 1912 में दिल्ली दरवार के मौके पर लार्ड हार्डिंग पर बम फैंका, उसने एक याद रखने लायक काम किया। इस आदमी की दिलेरी व बहादुरी अपना सानी नहीं रखती। इससे भी अधिक हौसला बढ़ाने वाली बात यह भी कि एक शक्तिशाली शानदार साम्राज्य के सभी साधन और शक्ति उस वीर का पता लगाने में आज तक असमर्थ साबित हुए हैं।"

21 फरवरी 1915 ई को की जाने वाली सशस्त्र क्रान्ति के बारे में अंग्रेज सरकार को पता चल गया। पथिक जी को गिरफतार कर इनका नाम लाहौर षड़यंत्र केस से जोड़कर लाहौर भेजने का आदेश हुआ। सूचना मिलते ही पथिक जी साधु के वेश में पहरेदारों से बचकर मेवाड़ पहुँँच गये।

अनेक आन्दोलनकारी गतिविधियों में संलिप्त रहने के कारण पथिक जी के जीवन का बहुत समय जेलों में बीता किन्तु अन्तिम समय तक देश के लिए लड़ने वाले उस साहित्यकार, पत्रकार, समाजसुधारक और स्वतंत्रता सेनानी ने 28 मई 1954 को आखिर इस संसार से विदा ले ली। उनको शत-शत नमन।

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