मास्टरबा: शिक्षा व्यवस्था पर आँख खोलता उपन्यास

समीक्षक: विजय कुमार तिवारी


समीक्षित कृति: मास्टरबा (उपन्यास)
लेखक: कुमार विक्रमादित्य
मूल्य: ₹ 200.00 रुपये
प्रकाशक: अंजुमन प्रकाशन, प्रयागराज 

कहानी हो या उपन्यास, कोई न कोई मूल वस्तु या केन्द्रीय तत्व होता ही है जिसे आधार बनाकर ढांचागत विस्तार दिया गया होता है। भाषा, शैली या शिल्प बाद की बातें हैं, केन्द्रीय तत्व भी तभी उपयोगी या सहायक हो सकता है जब उसके मूल चिन्तन में मानवता व मनुष्य हो। सब कुछ मनुष्य का है, मनुष्य के लिए है और मनुष्य के द्वारा है। समाज या उसके किसी विशेष संवर्ग में कोई संगति-विसंगति उभरती है, अपना प्रभाव छोड़ती है तो प्रबुद्ध मन विचलित हो सक्रिय हो उठता है। चित्रकार चित्र बनाता है, गायक गीत गाता है और लेखक सृजन में संलग्न हो उठता है। विधा कोई भी हो, उस सम्पूर्ण चिन्तन के पीछे मनुष्य का प्रभावित संसार ही होता है। हर सृजन के पीछे कुछ साहित्यिक-सामाजिक कारण होते हैं। विशुद्ध प्रेम में डूबे चरित्रों के चित्रण के पीछे आत्मानन्द के साथ सम्पूर्ण मानवजाति के भीतर उस आलोक को पहुँचाने की उत्कट भावना होती है। विसंगतियो को जन-जन तक पहुँचाना और आगाह करना होता है। हमारी भावनाएं परिस्थितियों के साथ नाना दृश्य उपस्थित करती हैं, नाना खेल खेलती हैं, सम्बन्धों और रिश्तों में नाना अर्थ-अनर्थ भरती हैं। लेखक इन्हीं मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, आर्थिक या नैतिक-राजनैतिक सब में मनुष्य के अस्तित्व, प्रगति या विकास को चित्रित करता है। 

कुमार विक्रमादित्य
हमारे पूर्ववर्ती समीक्षकों, आलोचकों और चिन्तकों ने खूब लिखा और चिन्तन किया है। उपन्यास एक बड़े परिदृश्य को उभारता है, प्रभावित होने वाला समाज व्यापक होता है और बड़े काल खण्ड को समाहित करता है। साथ ही साहित्य की मूल भावना रहती ही है कि उसमें हमारा समाज और समय मुखरित हुआ रहता है। इन्हीं चिन्ताओं और समस्याओं से जूझता, कुमार विक्रमादित्य जी के लिखे उपन्यास 'मास्टरबा' का अध्ययन और पारायण आजकल हो रहा है। अपने प्रकाशन के साथ ही 'मास्टरबा' ने पाठकों को आकर्षित और प्रभावित किया है।'मास्टरबा' उपन्यास  का समर्पण ध्यान देने योग्य है। कुमार विक्रमादित्य जी लिखते हैं, "यह पुस्तक उन सभी शिक्षकों को समर्पित है जो अर्थाभाव में रहकर भी समाज के कोने-कोने तक शिक्षा के अलख को जगाने का प्रयास कर रहे हैं। "उपन्यास की भूमिका 'दो शब्द' में कुमार विक्रमादित्य जी का कथन विचारणीय है, "बीतते वक्त के साथ बदल जाना प्रकृति का नियम है पर अपने मूल पथ से भटक जाना किसी भी समाज के लिए अच्छा नहीं माना जाता है।" शिक्षा, शिक्षण संस्थाओं और शिक्षकों के बदलाव को यहाँ गहन तरीके से रेखांकित किया गया है। पहले 'गुरु' और 'गुरुकुल' की अवधारणा थी, वही अब 'मास्टर' और 'स्कूल' या 'विद्यालय' हो गये हैं। 'मास्टर' शब्द अनादर के भाव से 'मास्टरबा' के रूप में प्रयुक्त होने लगा है, शायद इसे हम भोजपुरी या स्थानीय हिन्दी में 'मास्टरवा' कहते, समझते हैं।

विजय कुमार तिवारी
उपन्यासकार के अनुसार, सरकार ने शिक्षा को अंतिम पायदान पर रखना और नियोजित शिक्षकों की बहाली करना शुरु कर दिया है। निश्चित ही इस तरह शिक्षा और शिक्षकों का विगत पचास वर्षों में संघर्ष और अवमूल्यन इस उपन्यास  के माध्यम से दिखाई देगा। लेखक की पंक्तियाँ देखिए-कैसे एक कर्तव्यनिष्ठ मास्टर को ईमानदारी पूर्वक काम करने में समाज, प्रधान और पदाधिकारी से जूझना पड़ता है। भ्रष्ट आचरण अब समाज के लिए कोई नयी बात नहीं है, समाज ने उसे अब अपना हिस्सा मान लिया है। इस उपन्यास के पात्र कुंदन बाबू ने 'एकला चलो' का मंत्र धारण कर लिया है।

मास्टर या शिक्षक प्रायः हम सब के लिए सुपरिचित शब्द है और एक ऐसे व्यक्ति का चेहरा चिन्तन में उभरता है जिसके साथ बतौर विद्यार्थी हमने क, ख, ग सीखना शुरु किया होगा। कुमार विक्रमादित्य जी ने अपने उपन्यास के शुरु में अपने अनुभव के आधार पर शिक्षक के स्वरूप का किंचित निरीह, किंचित हास्यपूर्ण यथार्थ चित्रण किया है। हमारे जीवन में आया हुआ यह प्रथम शिक्षक जीवनपर्यन्त याद रहता है क्योंकि जाने-अनजाने वह हमें अक्षर और विषय ज्ञान तो देता ही है, सम्पूर्ण जीवन-दर्शन की पृष्ठभूमि तैयार कर देता है, हमारे जीवन में शिक्षा का संस्कार बो देता है, जबकि बाद के शिक्षक केवल विषय ज्ञान देते हैं। वह हमारे गाँव-मुहल्ले का या आसपास का होता है, स्कूल के बाहर भी उससे मिलने, भेंट होने की संभावना बनी होती है फलतः हमारा नैतिक-व्यवहारिक-चारित्रिक शिक्षण चलता रहता है। अति-घनिष्ठता से हमारे जीवन में स्थायी छाप अंकित हो जाती है। 

बहुत से विद्यार्थियों के लिए वह प्रथम शिक्षक जीवन का आदर्श बन जाता है। आनन्द को संस्कृत शिक्षक के पैर छूते ही ज्ञान मिलता है, समय पर विद्यालय आना या पहले विद्या कार्य, फिर अन्य कार्य। आनन्द की लगन देखकर पिता दिग्विजय ने पत्नी से कहा, "विनीता ध्यान रखना, कहीं यह छोरा मास्टर न बन जाये।" मां-पिता की बातचीत ने आनंद को 'मास्टर' शब्द के प्रति चेतन कर दिया। उसने शिक्षकों से पूछा, मार खाया और सहपाठियों के बीच हँसी का पात्र बना। जैसी बाल-प्रतिक्रियाएं होती हैं, आनंद को भी हुई। उसने अपने तरीके से मन में उठे तूफान को संभाला। कुमार विक्रमादित्य जैसा अनुभवी शिक्षक उपन्यासकार बन जाये तो मास्टरवा का चित्रण होगा ही, वह भी बिना किसी लाग-लपेट के और पूरे हास्य-व्यंग्य के साथ। शिक्षक को मास्टर बनाने के पीछे के सारे तर्क और उसकी सामाजिक स्थिति का आकलन सही लगते हैं। लेखन शैली का कमाल देखिए, मास्टर याद भी आते हैं और चिन्ता भी होती है यदि आनंद मास्टर बन जाये।

आनंद को 'नियोजित शिक्षक' के बारे में समझना है। संस्कृत की कक्षा में पूछने का संयोग बना, हेडमास्टर ने बताया, "आनंद! अभी जो पढ़ा रहे हैं, यह शिक्षक हैं और उस दिन जो मुक्कों, थप्पड़ों का स्वरूप तुमने देखा, वह गुण है 'मास्टर' का। धीरे-धीरे विद्यालय में 'मास्टर' शब्द बहस का मुद्दा बन गया और शिक्षकों ने अपने विचार रखे। 'नियमित'  व 'नियोजित' शिक्षक का भेद समझ में आया। साथ ही आरक्षित वर्ग और जाति आधारित शिक्षकों की चर्चा हुई। निजी विद्यालय और कोचिंग संस्थान पर भी बातें हुई। शिक्षकों ने महसूस किया, अब विद्यालय, शिक्षण संस्थान न होकर पैसा बाँटने के केन्द्र हो गये हैं। अधिकांश बच्चे सरकारी योजनाओं का लाभ लेने आते हैं और पढ़ने के लिए बहुत कम बच्चे आते हैं।  

वैसे तो यह उपन्यास बिहार की पृष्ठभूमि पर आधारित है परन्तु शिक्षकों के सन्दर्भ में स्थिति पूरे देश में ऐसी ही है। सत्ता परिवर्तन ने चली आ रही शिक्षण व्यवस्था को पूरी तरह बदल कर रख दिया है। फलस्वरूप सर्वाधिक दयनीय दशा शिक्षकों और शिक्षा की हुई है। कुमार विक्रमादित्य जी ने विस्तार से इस प्रसंग की चर्चा की है। कुंदन बाबू की शिक्षण-पद्धति से विद्यार्थी खुश रहते हैं और आगे बढ़ते हैं। उनका विचार है, "आदमी सौ प्रतिशत ईमानदार नहीं रह सकता, पर एक कोशिश तो कर ही सकता है कि अपने आपको उस श्रेणी में ला सके जिसे समाज ईमानदार कहता है।"

उपन्यास में मुहावरा और स्थानीय शब्दावली  का खूब प्रयोग हुआ है। संवाद-शैली के माध्यम से कहानी आगे बढ़ती है। कई बार संवाद रोचक लगते हैं, विषय वस्तु को स्पष्ट करते हैं, तो कई बार उबाऊ तौर पर जुड़े हुए लगते हैं। शिक्षक दिवस पर आनंद उपहार लेकर बस से विद्यालय जा रहा है। बस में बैठे बड़े-बुजुर्गों की बातचीत स्तरीय और सामयिक नहीं है। वही प्रसंग विद्यालय में बच्चों के बीच उभरा। बच्चों में शिक्षकों के प्रति उपहास का भाव हमारे समाज की देन है। आनंद बच्चों को समझा रहा था, "शिक्षक मान-सम्मान का भूखा होता है और आपका स्नेह उसे असीम ऊर्जा प्रदान करता है।" आनंद ने बताया, बस में आज मैंने जो सुना, उससे लगा, हमारा समाज पूर्वाग्रह से ग्रसित है।"

जीवन का एक सच यह भी है कि सभी अपना भुगता सत्य ढोये जा रहे हैं। शिक्षकों के बीच बतरस चल रहा है। प्रधान शिक्षक शायद ही कभी बच्चों की कक्षाएँ लेते हों, प्रसंग यही था जो झगड़ा का स्वरूप धारण कर लिया और अंत में मारपीट की स्थिति उत्पन्न हो गयी। कुमार विक्रमादित्य जी ने बड़ी रोचक शैली में, वस्तुस्थिति को सामने ला खड़ा किया है। उनके लेखन में आज के विद्यालयों की सच्चाई है, शिक्षकों का ज्ञान, पढ़ाने की क्षमता व रुचि है। प्रधान शिक्षक के ऊपर की कमाई की चर्चा है। कुंदन जी की बातों का निहितार्थ समझते हुए प्रधान जी ने तय किया, वे भी कल से नियमित पढ़ाया करेंगे, परन्तु ऐसा कभी हुआ नहीं। शिक्षक दिवस के कार्यक्रम में बच्चे दो ही शिक्षकों - 'संस्कृत' और 'विज्ञान' का नाम ले रहे थे। शेष सभी शिक्षकों को इससे भी परेशानी थी। हिन्दी शिक्षक ने टोक भी दिया, "विज्ञान और संस्कृत के टीचर, टीचर हैं और हम लोग क्या फटीचर हैं जो केवल उन्हीं का नाम ले रहे हो।" कुमार विक्रमादित्य जी स्वयं शिक्षक हैं, उन्हें राई-रत्ती सब ज्ञात है, ऐसे में हर प्रसंग यथार्थतः चित्रित हुआ है।

प्रधानाध्यापक और कुंदन बाबू के बीच की बातचीत उपन्यास को आगे बढ़ाती है, साथ ही, नैतिकता, व्यवहार कुशलता, रिश्तों की मर्यादा और समाज की विसंगतियों को चित्रित करती चलती है। शिक्षकों में भी कुछ हृदयहीन होते हैं तो कुछ संवेदनाओं से भरे होते हैं। छात्रों पर दोनों तरह के शिक्षकों का प्रभाव पड़ता है। कुंदन बाबू जीवन की मनोवैज्ञानिकता को खूब समझते हैं और हर परिस्थिति में उसका सहारा लेते हैं। सारे बच्चे उनके लिए मरने-मारने पर उतारू रहते हैं परन्तु उन्होंने कभी बच्चों को इस तरह शिक्षित नहीं किया। प्रवीण प्रसंग उन्होंने अपने तरीके से हल किया, बिना डरे हुए। कुंदन बाबू की बातें सुनकर बच्चे भावुक हुए और कुछ के आँसू निकल पड़े। बच्चों ने शिक्षकों के बीच चल रहे षड्यन्त्र की चर्चा की जिसे बहुत सहज तरीके से कुंदन बाबू ने सम्हाल लिया। सरकार की ओर से नये-नये कार्यक्रम तय किये जाते हैं जिससे बच्चों का हर तरह से विकास होता है। कुंदन बाबू ने बताया, "विद्यालय के तरफ से ही सरकार पैसे देती है कि बच्चों को शैक्षणिक भ्रमण कराया जाये।" इस शैक्षणिक भ्रमण के नाम पर मिलने वाली राशि के बंदरबाँट का जो चित्र खींचा गया है, पतन का वीभत्स दृश्य है। ऐसे में कौन सा चरित्र निर्माण और ज्ञान होता है, कहना मुश्किल है। कुंदन बाबू और रघुवंश बाबू ने हाथ जोड़ दिया, एक पैसा नहीं लिया।

कुमार विक्रमादित्य जी ने जिस तरह शिक्षा व्यवस्था में परत-दर-परत भीतर के भ्रष्टाचार को उजागर किया है और शिक्षकों के चरित्र, ज्ञान और योग्यता को सामने लाया है, पूरे तन्त्र पर गंभीर प्रश्न खड़ा होता है। आपसी संवाद में चरित्र निर्माण, थोड़ी नैतिक बातें भी उभरती हैं परन्तु कोई प्रभाव होता नहीं दिख रहा है। प्रधान जी न सुधरने वाले हैं, न बदलने वाले और रघुवंश बाबू, कुंदन बाबू उस दलदल में फंसने वाले नहीं है। शिक्षण में अनेक व्यवधान हैं, अधिकांश शिक्षक पढ़ाना नहीं चाहते, बच्चों के बौद्धिक विकास के लिए कोई योजना नहीं है, सरकार भी शिक्षा को नीचे गिराने में लगी हुई है, बच्चे विद्यालय नहीं आते, परीक्षा के समय नकल की छूट है, पैरवी और पैसा देकर अच्छे अंक लाने की व्यवस्था है, शिक्षकों की नियुक्ति में भी घाल-मेल होता है, जो कहीं सफल नहीं होते, शिक्षक बन जाते हैं, चालाक शिक्षक जिला कार्यालय में प्रति नियुक्ति लेकर नाना तरह की उगाही करते हैं, उत्तर पुस्तिकाएं बिना जाँचे औसत अंक देकर विद्यार्थियों को प्रोन्नत कर दिया जाता है आदि-आदि।

उपन्यास में ऐसे-ऐसे प्रसंग उभरे हैं, पाठक समझ रहे होंगे, हमारा देश प्रगति क्यों नहीं कर रहा है। शिक्षा, स्वास्थ्य के बिना कोई भी देश अपना अस्तित्व नहीं बचा सकता, विकास और प्रगति तो बहुत दूर की बात है। प्रधानाध्यापक अति पर उतर आये हैं, उन्होंने आकस्मिक अवकाश को लेकर आदेश जारी किया जिसका भरपूर विरोध हुआ। विद्यालयों में अक्सर  बड़े पदाधिकारियों का आगमन होता रहता है और वे इस मौके का उपयोग शिक्षकों को नीचा दिखाने में करते हैं। कभी-कभी शिक्षक या प्रधानाचार्य किसी शिक्षक को नीचा दिखाने या परेशान करने के लिए छात्रों का दुरुपयोग करते हैं। ऐसे कार्यों से विद्यालय का माहौल बिगड़ता है और छात्रों पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। कुमार विक्रमादित्य जी ने ऐसे अनेक प्रसंगों का उल्लेख किया है जिसे पढ़कर पतन का अंदाजा लगाया जा सकता है। शिक्षकों द्वारा किसी सुधार की योजना के विरुद्ध प्रधान, अभिभावकों को शामिल कर लेते हैं और जो जैसा है, चलता रहता है। कुमार जी ने सरकारी आदेश के बारे में लिखा है, "आठवीं तक किसी को फेल करना नहीं है, भले ही वह सादा उत्तर-पुस्तिका ही क्यों न जमा कर दे।" इन सम्पूर्ण समस्याओं को देखते हुए कुमार जी ने सुधार के कुछ उपाय सुझाए हैं परन्तु कोई अमल करने वाला नहीं है।

छात्रों के साथ कुंदन बाबू के संवाद में नियोजित शिक्षक के बारे में स्पष्ट हुआ और सरकार द्वारा किया हुआ अन्याय भी। शिक्षा-व्यवस्था में क्षरण का एक बड़ा कारण यह भी है। कुमार जी ने लिखा है, "कोई भी सत्ताधारी यह नहीं चाहता कि यहाँ के लोग सही शिक्षा पायें।" संतोष सर ने कहा, जैसे फर्जी पुलिस, फर्जी मजिस्ट्रेट, फर्जी योजना वैसे ही फर्जी शिक्षक और फर्जी विद्यार्थी भी।" सभी हँस पड़े। चरवाहा मास्टर की कहानी सब जानते ही हैं। कुमार जी ने शिक्षकों का बस द्वारा यात्रा में व्यवहार, कम भाड़ा देने, झगड़ा करने से अलग चरित्र दिखाने की कोशिश की है। संवाद शैली में हास्य और व्यंग्य के साथ कुमार जी ने अपने उपन्यास में रोचकता, जटिलता, पीड़ा, दुख आदि का सुन्दर व यथार्थ वर्णन किया है।

संवाद के माध्यम से उपन्यास की कथा आगे बढ़ती है। यह रोचक संवाद प्रधान जी, शिक्षक संतोष बाबू और बाहर से आये हुए साहब के बीच हो रहा है। संतोष बाबू ने पूरी व्यवस्था के मकड़जाल को खोलकर रख दिया। उनकी बातचीत में सच्चाई है, थोड़ा हास्य और व्यंग्य भी है। कुमार जी के लेखन की भाषा और शैली धारदार है, व्यंग्य और मुहावरों के साथ। जिला कार्यालय से आये हुए पदाधिकारी ने जाँच-पड़ताल की शुरुआत कैशबुक से की। बड़ा बाबू भी शामिल हुए। पदाधिकारी समझ गये। प्रधान जी ने अपनी अधिकांश नाकामियों का ठीकरा शिक्षकों पर फोड़ना शुरु किया। कुमार जी ने नये-नये ऐसे शब्द ढूँढ निकाले हैं जिसे शब्दकोश में भी खोजा नहीं जा सकता। कुंदन बाबू की कक्षा में सभी पहुँच गये। उनकी लगन, तन्मयता और पढ़ाने की कला से पदाधिकारी प्रसन्न हुए। निरीछण से जुड़ा संवाद बेजोड़ रहा। विद्यालय में प्रायोगिक परीक्षा के लिए उगाही का धंधा चलता है और शिक्षकों में बांटा जाता है। पूर्व प्रधान की विदाई के लिए पैसे एकत्र करना और सारी व्यवस्था का यथार्थ और व्यंग्यपूर्ण चित्रण उपन्यासकार की क्षमता दर्शाती है। “आदमी थोड़े थे, वे तो मास्टर लोग थे," किसी प्रसंग में अद्भुत व्यंग्य है। समाज में मास्टर की मर्यादा क्या है? जनगणना, चुनाव, अनाज बाँटना, स्वास्थ्य कार्ड बनवाना, पोषाहार बांटना, बीएलो का कार्य, जनता को जागरूक करना, सरकारी नियुक्ति के लिए फार्म छाँटना, खेल करवाना, आपदा से निपटना, बाढ़ में पन्नी-प्लास्टिक बांटना यानी सब कार्य मास्टरों के जिम्मे।

कुमार जी ने शिक्षकों के संघ की व्यापक चर्चा की है, कम या अधिक देश में फैले हर संघ, संगठन, कर्मचारी या अधिकारी यूनियन सबकी एक ही दशा है। देश की राजनीति की तरह यहाँ भी जाति, क्षेत्र और धर्म का खेल चलता है, शिक्षकों का कल्याण गौण हो जाता है। प्रवीण सर बोले, "हमारा नारा है, समान काम, समान वेतन, और हम लेकर रहेंगे।" प्रधान और शिक्षक प्रवीण सर की बातचीत में तल्खी उभर आयी। नियमित और नियोजित का झगड़ा रुकने वाला नहीं है। मौखिक परीक्षा में बच्चों और शिक्षकों के ज्ञान की खूब धज्जियाँ उड़ाई है कुमार जी ने, शिक्षा की वस्तुस्थिति समझ में आती है। सरकारों को नये सिरे से सोचना होगा वरना देश की दुर्गति निश्चित है। प्रायोगिक परीक्षा में सबके चरित्र उजागर हुए हैं। मैडम जी के कथन को देखिए, "हाँ, मेरे अंदर भी लोभ था, पर आज मैंने कुंदन बाबू से सीखा है कि ईमानदारी में कितनी बड़ी ताकत होती है। एक ईमानदार दुनिया से लड़ सकता है। एक शिक्षक ईमानदार हो जाये तो उसके लिए ब्रह्माण्ड भी छोटा ही पड़ेगा।" इस क्रम में वीक्षक सम्बन्धी काम से जुड़ी बातें भी कम रोचक नहीं हैं जिसका वर्णन कुमार जी ने किया है। विधायक जी के विद्यालय आगमन प्रसंग में सबकी पोल-पट्टी खुल गयी है। वही हाल नामांकन का है।

विधायक प्रसंग चल ही रहा था, तब तक जिला कार्यालय के पदाधिकारी का आगमन हुआ। सारा संवाद उपन्यास को रोचक बनाने के साथ पतन की सारी गाथाएं बयान कर रहा है। यह अद्भुत संयोग ही है, जब भी कोई जाँच-पड़ताल होती है, कुंदन बाबू विद्यालय की प्रतिष्ठा बढ़ा देते हैं। साहब ने प्रधान जी से कहा, "सीखिए, आपसे छोटे हैं तो क्या?नियोजित हैं तो क्या?आपसे चौथाई वेतन मिलता है तो क्या? आपसे अच्छे हैं और मैं दावे के साथ कह सकता हूँ, ऐसे शिक्षक बहुत कम होते हैं।" कुंदन बाबू की पदाधिकारी के साथ अनेक विषयों पर बातचीत हुई, वे बहुत प्रभावित हुए। आरक्षण को लेकर फिर  प्रसंग उभरा जिसके चलते योग्य लोगों का चयन नहीं हो पाता है। कुंदन बाबू ने प्रधान जी से कहा, "सर, मैंने आपको कहा था, नेताजी के न आगे चलिए और न पीछे, पर आपने नहीं माना। क्या मिला आपको? आप ही का खाया और आपको ही सुना कर चले गये।" कुमार जी ने प्रधान जी को हटाने के लिए शिक्षकों द्वारा सामूहिक आवेदन की पूरी गाथा को जिस तरीके से लिखा है, हमारे शिक्षा-तन्त्र की स्थिति का खुलासा हुआ है। शिक्षकों का मामला  सर्वोच्च न्यायालय तक गया। सरकार के पास बजट नहीं है, जो होना है हुआ, सब कुछ वैसे ही चल रहा है। जो काम कोई नहीं करा सकता, वह काम राजनीति करा देती है।

कुमार जी की बातें समझने योग्य है, "अब शिक्षकों की महफिल नहीं सजती। अब वो बात जेहन में नहीं आती कि दूसरे देश में शिक्षकों को सम्मान दिया जाता है, जर्मनी में शिक्षक के वेतन से ज्यादा किसी का वेतन नहीं है तो अमेरिका में प्राथमिक शिक्षक का वेतन इसलिए ज्यादा होता है क्योंकि देश के निर्माण की शुरुआत वहीं से होती है।" इससे अलग कुंदन बाबू बच्चों में रुचि जगाने, शिक्षा से जोड़ने और अच्छा नागरिक बनाने में लगे रहते थे। कुंदन बाबू की पदोन्नति हुई, प्रधान बना कर स्थानान्तरित कर दिये गये। उनकी विदाई हुई। बच्चे द्रवित हुए, महिलाओं ने सोहर गाया, पंडितों ने तिलक लगाया। भरे मन से विदा हुए। उन्हें अपने प्रधान को देखकर सब कुछ पता था, मन संकल्पित था, विद्यालय को ठीक तरीके से चलाना है। गांव वालों से मिलकर अपनी प्रतिबद्धता दुहरायी। लोग प्रसन्न हुए। कुछ विरोध तो हुआ परन्तु सफलता नहीं मिली क्योंकि ईमानदारी से बड़ा हथियार कोई नहीं होता। छात्रों की उपस्थिति 100% होने लगी। नया पेंच फंसा, सरकारी आवंटन 70% का था। कुंदन बाबू ने प्रतिवाद किया। जिला कार्यालय ने जाँच किया, दबाव डाला परन्तु सब कुछ सही पाया। 30% बच्चों के पैसों के लिए मामला कोर्ट में गया। विद्यालय का घेराव हुआ, अभिभावकों ने कहना शुरु किया, "हमको सब पता है, ई मास्टरवा सब का खेला। सब खा गया होगा।" कुंदन बाबू का निलम्बन हो गया। कोई सुनने वाला नहीं था। अंत में प्रिय शिष्य आनंद दिखाई दिया जो गृह सचिव, सामान्य प्रशासन था। सारी परिस्थिति बदल गयी और कुंदन बाबू को ससम्मान पुनः प्रतिष्ठित किया गया। अभिभावकों ने क्षमा मांगी, बच्चे घुल मिल गये।

'मास्टरबा' अपने तरह का आँख खोलने वाला उपन्यास है। इसमें उठाये गये सारे सवाल झकझोरते हैं। कथ्य-कथानक की अत्यधिक समझ होने से लगता है, लेखक सब कुछ जल्दी-जल्दी कह देना चाहता है। ऐसा होता ही है। तनिक धैर्य पूर्वक विस्तार देने से, विशेषतः उपन्यास के अंतिम दौर में, कुछ चीजें प्रवाह के साथ उभरतीं। इस औपन्यासिक साहित्य में सौन्दर्य है, कथ्य-कथानक है, संगतियाँ-विसंगतियाँ हैं, भाषा-शैली है, जीवन के अधिकांश रस खूब उभरे हैं, चरित्र-चित्रण हुआ है, भावनाएं, संवेदनाएं हैं, कुल मिलाकर कहा जा सकता है, लेखक अपने उद्देश्य में सफल है। लेखक का मन विचलित हुआ है शिक्षण व्यवस्था की विसंगतियों से, उसने बेहतर बनाने या सुधारने की कोशिश की है, उसके लिए संघर्ष दिखाया है और सफल भी हुआ है।

***
समीक्षक   विजय कुमार तिवारी
(कवि, लेखक, कहानीकार, उपन्यासकार और समीक्षक)
भुवनेश्वर, उड़ीसा 
चलभाष: 9102939190
ईमेल:  vijsun.tiwari@gmail.com
 

2 comments :

  1. संपादक और समीक्षक आप दोनों को दिल से आभार 🙏🙏

    ReplyDelete
  2. सच्ची और सुंदर समीक्षा 🙏🙏

    ReplyDelete

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।