पाँच कविताएँ: प्रकाश मनु

प्रकाश मनु
(1) एक अजन्मी बेटी का खत
 
मैं तो हूँ पापा तुम्हारे आँगन की चिड़िया
जिसे तुम्हीं ने दर-बदर किया
तुम्हीं ने किया अपनी दुनिया से खारिज
और कसकर अर्गला लगा दी!...
वरना कैसे तुमसे अलग रहती मैं पापा
तुम पुकारते तो मैं दौड़ी-दौड़ी आती
और कुहक-कुहककर पूरे आँगन को गुँजा देती।

तुम पुकारते तो मैं आती
और पूरे घर को ताजा उछाह से भर देती
तुम पुकारते तो मैं आती सुंदर सपनों और रंगों के साथ
और घोर अँधियारों के बीच
तुम्हारे घर के किसी कोने में
एक रोशनी का फूल बनकर खिल जाती!

तुम एक बार पुकारते तो सही पापा...
बिन कारण, बिन अपराध
मुझे घर निकाला देने से पहले!
तुमने एक बार सिर्फ एक बार
प्यार भरी आँखों से मुझे देखा होता
तो मेरी सरल पानीदार मुसकान में
मिल जाते तुम्हें अपनी मुश्किलों और परेशानियों के जवाब।

मैं तुम्हारे दुख बढ़ाने नहीं 
घटाने आती पापा
मैं तुम्हारे पूरे घर को अपने कंधों पर उठाने आती पापा
मैं प्यार के घुँघरुओं की तरह खनकती
और बेला के फूलों-सी महकती।

मैं आती और पापा
तुम्हारे दुख और चिंताओं के दशमलब बिंदु
अपनी कापी पर उतारकर हल करती
तुम्हारी किताबें करीने से रखती
उनकी धूल झाड़ती
मोती जैसे सुलेख में लिख देती तुम्हारी कविताएँ और निबंध
जहाँ तुम अटकते
वहाँ खोज देती कोई अचीन्ही राह
जहाँ तुम भटकते
वहाँ रास्ता दिखाती दीया-बाती बन जाती मैं
और कभी-कभी तो
एक सधी उँगली: बन जाती मैं दिशा-निर्देशक तुम्हारी!

मैं न बहुत खर्च कराती पापा
मैं न बनती भार तुम्हारे कंधों का
मैं तो पापा यों ही, बस यों ही रह लेती
जैसे सुबह के आसमान से उतरी एक नन्ही किरन
चुपके से, दबे पाँव घर में आती
और बस जाती है घर की पुरानी भीतों में!

मैं तो ऐसे ही रह लेती पापा
जैसे फूल में रहती है फूल की सुवास
सुच्चे मोतियों से लिपटी उनकी सुच्ची आबदार हँसी
कि जैसे चाँद की चाँदनी में उसकी शीतलता।
मैं तो ऐसे रह लेती पापा
जैसे पेड़ों-पत्तों में रहती है उनकी हरियाली
जैसे धरती में धरती का धैर्य
जैसे अंबर में अंबर का अथाह नीलापन...

मैंने कब माँगे थे तुमसे पापा कीमती डिजाइनदार कपड़े-गहने
सोफा, डाइनिंग टेबल, कालीन
मैं तो देहरी पर हवा के झोंके के साथ आ पड़े
पीपर पात की तरह रह लेती
मैं तो काँटों में खिले भटकटैया के फूल की तरह ही
साँस लेती और हँसती
हँसती और बातें करती और
तुम्हारी थकान उतारती पापा
तुम थककर दफ्तर से आते तो हँस-बोलकर 
ठुम्मक-ठुम्मक नाच, तुम्हारा जी बहलाती
तुम्हारे माथे के दर्द के लिए बादामरोगन हो जाती!

नन्हे हाथों से थपक-थपक तुम्हारा माथा दबाती
और तुम्हें सुख-चैन देकर पापा 
सुख पाती मुसकराती
मेरे जिस छोटे भाई की प्रतीक्षा में तुमने
मुझे किया दर-बदर—अपनी दुनिया और इतिहास से बाहर...
क्या पता पापा 
मैं उससे बढकर तुम्हारा सुख तुम्हारी खुशी
तुम्हारे हाथों की लाठी हो जाती 
तुम्हें निश्चिंत कर देने की खातिर 
खुशी-खुशी खुद तपती
और कभी न करती किसी कमी की शिकायत!

पर अब तो पापा बेकार हैं ये बातें
जबकि मैं अब एक जिंदा लड़की नहीं
हवा में भटकती एक पागल पुकार हूँ
जो धरती से आसमान तक हर चीज से टक्करें खाती
सिर धुनती और फफकती है
उस धृष्ट कर्म के लिए जिसमें मेरा कोई हाथ नहीं।

यों ही टक्करें खाती रहूँगी मैं कभी यहाँ कभी वहाँ
शायद इसी तरह थोड़ा चैन पड़े
पर यह भी अपनी जगह तय बिल्कुल तय है पापा
कि जब तक हूँ अपनी चीख के साथ
मैं धरती से आकाश तक भटकती टक्करें खाती
तब तक न मिलेगा तुम्हें तिल भर भी चैन पापा
मैं चाहूँ तब भी नहीं!

तुम कितने ही सख्त और कठ-करेज क्यों न हो पापा
नहीं रह पाओंगे शांति से
क्योंकि कोई कितना ही हो बली, क्रूर हमलावर
हर हत्या उसे भीतर से कमजोर करती है!

और तुमने तो एक नहीं कई हत्याएँ की हैं पापा
क्या मैं एक-एक सपने का लहू दिखाऊँ तुम्हें
कहाँ-कहाँ दोगे हिसाब पापा?
तुम्हें कहाँ से मिलेगा सुख-चैन
जब तक मैं यों ही चीखती-पुकारती रहूँगी पापा
धरती और आकाश के बीच!

और मैं न चीखूँ तो रहूँ कैसे पापा
कैसे भूलूँ कि मैं न मारी गई होती
तो होती मैं धरती पर सुंदरता से थिरकती 
लाखों खिलखिलाती लड़कियों सी
एक सुंदर लड़की, रंगदार तितली
आँगन की कुहकती चिड़िया
पंख खोलकर उड़ती और तुम्हें चकित करती!

अफसोस!
तुमने पंख नोचे और मुझे दर-ब-दर किया
और बिना बात बिन कसूर कुचला गया वजूद मेरा
मारी गई मैं बेदर्दी से...!

उफ, पापा...
मेरी आवाज अब रुँध रही है
रुँध रहा है गला
कलम अब साथ नहीं देती...

तो यह चिट्ठी यहीं खत्म करती हूँ पापा
पर आँखों में दो आँसू भरकर इसे पढ़ना जरूर
ताकि तुम्हें रोकर
कम से कम दो घड़ी तो चैन आ ही जाए!
*


(2) बेटी जो गई है काम पर 

बेटी गई है बाहर काम पर...
ओ हवाओ, उसे रास्ता देना
दूर तक फैली काली लकीर-सी वहशी सड़को,
तनिक अपनी कालिख समेटकर
उसे दुर्घटना से बचाना।

भीड़ भरी बसो,
तनिक उस पर ममता वारना
उसे इस या उस या उसके वाहियात स्पर्शों
और जंगली छेड़छाड़ से बचाना।

बेटी गई है बाहर काम पर
दिशाओ, चुपके से उसके साथ हो लेना
और शाम ढले जब तलक
वह लौटकर आती नहीं है घर,
खुद को उजला और पारदर्शी बनाए रखना।

दिल्ली शहर के शोर, धुएँ
और पागल कोलाहल,
थोड़ी देर को थम जाना
ताकि बेटी जो गई है बाहर काम पर
शाम को
ठीक-ठाक, उत्फुल्ल मन घर लौटे।

न हो मलिनता,
न चिड़चिड़ेपन का बोझ
उसकी कोमल आत्मा के गीले कैनवास पर...

तनिक ध्यान रखना हवाओ,
दूर तक फैली सड़को
और दिल्ली शहर के अंतहीन कोलाहल,
थोड़ी देर के लिए अपने भब्भड़ को समेटकर
उसे रास्ता देना...

ताकि बेटी जो गई है बाहर
लौटे तो उसकी चाल में
लाचार बासीपन का बोझ नहीं,
चलने और बस चलते चले जाने की उमंग हो।

अलबत्ता अभी तो बेटी घर से बाहर
गई है काम पर
और दिल बुरी तरह धक-धक कर रहा है।
*


(3) घर की मल्लिका

तीन दिनों के लिए गई है
इस घर की मल्लिका
और ये तीन दिन कर्फ्यू के दिन हैं।

इन तीन दिनों में कोई न आना
उसके पीछे...
कि इन तीन दिनों में यह घर
फर्श पर फैले मैले, मुचड़े कपड़ों
जूठे, गंधाते बरतनों उतरे चेहरों
और रुकी और थकी-थकी बासी हवाओं
में गुम हो चुका है।

सब कुछ है यहाँ मौजूद
पर सब पर तारी उदासी की एक सतर
जो होंठों से उतरती ही नहीं।

अलबत्ता इस सारी टूटन और उदासियों में
आर-पार गुजरता एक ही सुख
जो टहल रहा है
किसी राहत वैन की तरह यहाँ से वहाँ...

कि तीन दिन बीतते ही वह लौटेगी
वह जो इस घर की रानी है महारानी
और उसके एक दृष्टिपात से
यह रुका-रुका, थका घर
अपने पहियों में लगी जंग और जकड़न छुड़ाकर
फिर चल पड़ेगा अपनी सदाबहार लय-चाल में...
उदासियों की गाढ़ी सतर को तिर्यक् काटते हुए।
*


(4) नदी सपने में रो रही थी माँ

रात नदी सपने में रो रही थी माँ
फटा-पुराना पैरहन पहने
चिंदी और तार-तार
उदास थी नदी, मैली और बदरंग
अपनी छाया से भी डरी-डरी सी
रो रही थी बेआवाज...

पता नहीं किसे वह पुकारती थी
किसे सुना रही थी अपना दुख
कल रात नदी सपने में रो रही थी।

पास ही मरी पड़ी थीं असंख्य मछलियाँ दुर्गंधाती
कातर बतखें, 
निरीह कच्छप और घड़ियाल
उलट गई थीं उनकी आँखें

रात नदी सपने में रो रही थी माँ
रो रही थी बेआवाज...
उससे भीग रहा था हवा का आँचल
मौन आँखों से चुप-चुप बिसूरता था आकाश
बज रहा था एक खाली-खाली सा सन्नाटा
धरती के इस छोर से उस छोर तक...

बंजर थे मैदान
बंजर खेत
बंजर आदमी
बंजर सृष्टि की सब नियामतें...
रात नदी सपने में रो रही थी माँ!
*


(5) नाट्यकर्मी गुरुशरण सिंह के न रहने पर

मुझे याद आता है वह समाँ वह दिन
मुझे याद आता है तूताँ वाला खू
मुझे याद आते हैं आप गुरुशरण भ्रा जी।

वे दिन भी क्या दिन थे
जब मैं पंजाब के एक कालेज में पढ़ाया करता था 
पर दोस्ती विद्यार्थियों से थी
कुछ सिरफिरे बच्चे जो कविताएँ लिखते थे नाटक करते थे
डिबेट और सिंपोजियम की जोशीली तैयारी
और आधी-आधी रात तक 
मेरे कमरे में बिजलियाँ चमकती रहती थीं।

उस रात भी बिजलियाँ कौंध रही थीं
अंदर से बाहर... बाहर से अंदर
तब एक बिजली के साथ ही उतरा था यह नाम मेरे सामने
मेरे एक विद्यार्थी ने कहा—
डाक्टर साब, आपने गुरुशरण सिंह के नाटक नहीं देखे
तो आपने कुछ नहीं देखा
आपने अँगड़ाई ले के जागता पंजाब नहीं देखा
आपने पंजाब की जिंदा रूह नहीं देखी

बिजली मेरे अंदर खिंच गई थी
जैसे आपके अपने दो टुकड़े हो जाएँ
फिर तो पंजाब डिपो की बस का लंबा सफर पिंड-दर-पिंड
और दिल में गुरुशरण सिंह... गुरुशरण सिंह भ्रा जी!

गुरुशरण भ्रा जी, मैं बस में बैठा-बैठा उड़ रहा था
और उड़ते-उड़ते पहुँचा उस जगह
जहाँ रात दे अँधेरे में 
अँधेरे के खिलाफ
खेला जा रहा था तूताँ आला खू
और बहुत-से और भी नाटक

पहली बार देखा कि गुरुशरण क्या शै है
कैसे चलता है उसका नाटक मुक्त हवा की चाल के साथ
गाँवों के धुर गँवार अनपढ़ लोगों के बीच
कि हर दर्शक गुरुशरण भ्रा जी की शांति-सेना का
एक बाँका सिपाही हो जाता है
और गुरुशरण भ्रा जी नाटक खेलते-खेलते
खुद जादूगर सरकार हो जाते हैं

यह स्टूल समझो राजा का सिंहासन है—
वे कह रहे हैं—
यह खाट समझो किसान का घरबार
यह बेंच समझो थाना कोतवाल
और गुरुशरण भ्रा जी मैं कुछ समझ पाता
उससे पहले ही
मैं नाटक में था या नाटक मुझमें...
मैं तो सब कुछ भूल ही गया।

कितने तूताँ आले खू आ गए
पर मेरे अंदर जागता रहता था गुरुशरण सिंह
चलते-चलते सिर्फ दस-पंद्रह मिनट की ही बातचीत
थोड़ा एक-दूसरे के अंदर उतरने की कोशिश...

पर मेरे अंदर लिखा गया था पंजाब का जिंदा इतिहास
जिसमें हर बार कोई नया भगतसिंह पैदा होता था
कभी वह पाश बन जाता था
कभी सुरजीत पातर और कभी गुरुशरण बन जाता था

फिर मैं पंजाब छोड़कर चला आया राजधानी में
पर मिलती रहती थीं खबरें...
गुरुशरण सिंह को मिल रही हैं भिंडराँवाले की धमकियाँ
वे आतंकवादियों की हिटलिस्ट में हैं
पर जारी है नाटक...जारी है इन्कलाब,
जनता उसके साथ है
उसका नहीं कर सकता बाल बाँका कोई भिंडराँ वाला

गरुशरण भ्रा जी, आप बस्ती-बस्ती गाँव-गाँव
उकेर रहे थे
क्रांतिकारियाँ की नई परंपरा
आपके भीतर उतर आए थे भगतसिंह सुखदेव राजगुरु
पंजाब में कत्लेआम था 
पर उस कत्लेआम में भी
पंजाब की रूह को बचा रहा था एक गुरुशरण सिंह
जनता उसके साथ थी
उसके साथ थी नौजवानों की नई पीढ़ी

नदी में पानी बहता गया
और लंबा वक्त गुजर गया
मैं खुद नौजवान से अधेड़ हुआ
पर नहीं भूले आप गुरुशरण भ्रा जी
नहीं भुला तूताँ वाला खू
जिसमें तैरती थी अन्याय के खिलाफ खड़ी होती
नए पंजाब की तसवीर

आप तो लिखकर चले गए एक नया इतिहास
पर आपकी याद आती है
गुजरे वक्तों में बहुत कुछ है जो अंदर-अंदर मरता
और बड़ी बदबू पैदा करता है
पर कुछ है जो उस मरते हुए निढाल जिस्म में
नई जान फूँक देता है
वो आप हैं गुरुशरण भ्रा जी

गुरुशरण भ्रा जी, मुझे आपकी याद आती है
मुझे याद आता है तूताँ आला खू
और उस शहतूत वाले कुएँ में हर पल हर घड़ी डूबता
और उतराता रहता है बहुत कुछ
जो हमारी पीढ़ी की आँखों की रोशनी है
और जिससे लिखा जाएगा
आते हुए कल का इतिहास

गुरुशरण भ्रा जी, मुझे आपकी याद आती है
बहुत याद आती है
गुरुशरण भ्रा जी...
गुरुशरण भ्रा जी!
*

प्रकाश मनु
545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008
चलभाष: + 91 981 060 2327 
ईमेल: prakashmanu333@gmail.com

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