व्यंग्य: साहब, बीवी और पठान

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

फिल्म पठान की बहुत चर्चा थी। एक हजार करोड़ रुपये का कारोबार करने वाली पहली हिंदी फिल्म थी। विदेश में भी हमारे पल्ले देसी साहब पड़े थे। उनकी पत्नी, हमारी साहिबा स्टॉफ वेलफेअर की प्रेसिडेंट थीं। बॉक्स एरिया बुक कराया और सब सपरिवार फिल्म देखने पहुँच गए। फिल्म थी वयस्क, पर बच्चों को मजा आ रहा था, भरपूर एक्शन था। साहब राष्ट्रवादी थे। देशभक्तों ने फिल्म का विरोध किया था तब वे कहने लगे थे, ‘पठान भी कोई फिल्म है! कोई मुफ्त में भी दिखाये तो नहीं देखूँ।’ बस इसी चक्कर में सबको मुफ्त-दर्शन का लाभ मिल गया। साहब खुद को हीरो और विलेन को यूनियन का नेता समझते थे। फिल्म में हीरो को लहूलुहान और विलेन को हँसता देखना साहब को नागवार गुजरा। उन्होंने साहिबा को समझाया असल जिंदगी में साहब मारता है और विलेन मार खाता है। साहिबा उनकी हकीकत जानती थीं। साहब को डाँटने-मारने-पीटने का सर्वाधिकार केवल उनके पास था। वे मुस्कराईं तो थियेटर के अंधेरे में भी चाँदनी छा गई। 

फिल्म पठान का नायक हिंदुस्तानी और खलनायक पाकिस्तानी था। बुद्धू से बुद्धू दर्शक फिल्म की कहानी का पक्का अनुमान लगा सकते थे। नायक और खलनायक दोनों अपने-अपने देश की महानता का बैंड बजा रहे थे और गा रहे थे - प्राण जाए तो जाए, देश सलामत रहना चाहिए। साहब इस मामले में प्रैक्टिकल थे। वे मानते थे अपन सुरक्षित रहो, देश का क्या है, उसे तो कोई भी बचा लेगा। फिल्म में नवीनतम मशीनगनें और रिवाल्वर देखने मिले। अन्यथा फौजों के पास वही पुराना वाला अमेरिकी असला रहता था। कभी इधर का पटाखा फुस्स होता, तो यहाँ विपक्षी दल लामबंद हो जाते और जहाँ जो भी खाने मिलता खा जाते। जब उधर का पठाखा फुस्स होता तो लखनऊ की जिला जेल में बंद सजायाफ्ता कैदियों में से दो-चार का इनकाउंटर हो जाता। जनता जानती थी कि एक्सीडेंट कहीं भी और कभी भी हो सकता है। बस, जब तक पठान का मन है विलेन सुरक्षित है।

साहब निशानेबाजी का आनंद उठा रहे थे। वे पेपर-निशानेबाजी के चैम्पियन थे। नायक-खलनायक को दो-तीन गुलाटी खाते-खाते भी निशाना लगाते देख कर उन्होंने कहा, सारे डिप्टियों को साष्टांग करने के अलावा गुलाटी खानी भी आनी चाहिए। गुलाटी ऐसी परफेक्ट हो कि कभी गुलाटी का वर्ल्ड ओलंपिक हो तो भारतीयों को स्वर्णपदक मिल जाए। साहब का खुद का निशाना पके राजनीतिज्ञों की तरह था। जनता को लगता था कि साहब का निशाना एकदम ठीक लगा, पर दूसरे ही क्षण दिखता था कि रिश्वतखोर कर्मचारी तो हटे ही नहीं। जनता जो समझती थी वह भ्रम होता था। नायक-खलनायक ऐसे ही निशाना लगा रहे थे, उन दोनों को ढाई घंटे तक मरना ही नहीं था। राणा सांगा कि तरह उनके सारे शरीर में छेद-छेद हो गए थे। खून रिस रहा था पर बच्चे तक समझ रहे थे कि सब नौटंकी था, असल में किसी को खरोंच तक नहीं आई थी। बस पठान की फैन अधेड़ उम्र की महिलाएँ, साहिबा के साथ रुदालियों की तरह सिसक रही थीं। 


साहब बोर होने लगे। कहने लगे सुदेश कहाँ ले आए। कुछ तो है नहीं फिल्म में सिवाय हिंसा के। बेशरम रंग को सेंसर ने काट दिया क्या? ‘सर, थोड़ा वेट करें’, सुदेश ने कहा। जब हीरोइन की एंट्री होगी सब वसूल हो जाएगा। एक हजार करोड़ रुपये का बिजनेस यूँ ही थोड़े किया है, फिल्म हॉटम्-हॉट है। साहब को मुफ्त में हॉट चीजें मिल जाएँ तो उनके साहबपने की ठसक सार्थक हो जाती है। 

बाहर बर्फ गिर रही थी। तेज ठंडी हवा चल रही थी, पेड़ मचल रहे थे। यहाँ थिएटर में पिनड्रॉप सायलेंस था। हीरोइन कभी भी अवतरित हो सकती थी। बेशरम रंग वाला ट्रेलर देख कर दर्शकों ने टिकट खरीदा था। आदतन, साहब दिन भर प्रश्न पूछते थे, तो यहाँ कैसे मौन रहते, सुदेश से पूछ बैठे - बेशरम रंग कैसा होता है। वह बोला सब्र का फल मीठा होता है। मुझे लगा सुदेश असंगत उत्तर दे रहा है, तो मैं बीच में बोल उठा- बेशरम रंग पहले वाले साहब जैसा होता है। साहब बहुत खुश हुए।

हीरोइन की एंट्री हो गई थी। दुश्मन देश की हीरोइन। क्या क्लाइमेक्स! अपना हीरो और उनकी हीरोइन।  साहब को अच्छा नहीं लगा कि हीरोइन पड़ोसी देश की थी। उनके अनुसार हमारे देश में एक से एक हूर हीरोइनें थीं। सुदेश को फिर समझाना पड़ा कि दीपिका भारतीय ही है, बस रोल पाकिस्तानी का कर रही है।  कोई भरोसा नहीं बाद में अंडरकवर एजेंट निकल आए। साहिबा बोल पड़ीं, जब तक साहब को साफ-साफ न समझाओ...। उन्होंने वाक्य पूरा नहीं किया, सब समझदारों को इशारा काफी था। अपना हीरो सीधा-सादा पर होशियार, उनकी हीरोइन चंट, सुंदर पर खतरनाक, राम मिलाई जोड़ी। दोनों प्यार का नाटक करने लगे। किसी भी दर्शक ने इसे सीरियस‌ली नहीं लिया। सबको मालूम था नायक-नायिका एक दूसरे को गच्चा दे रहे थे। वे रोमांस देखने आए भी नहीं थे। पॉपकॉर्न और कोक खतम हो चुका था। इतनी देर तक नायिका डांस नहीं करे तो फिल्म का फ्लॉप होना तय था। पर साहब को मालूम था कि फिल्म सुपर हिट है, इसलिए वे जमे रहे। उनका सेक्रेट्री सुदेश पूरी पक्की जानकारी निकाल कर ही काम करता था।

तभी स्विमिंग पूल आ गया। स्विमिंग पूल में तैरने का एक ड्रेस कोड होता है। हीरोइन कम से कम कपड़े भी पहने तो पैसाऐंठू सेना के भद्र‌जन भी आपत्ति नहीं कर सकते। सुदेश ने साहब को बताया, सर बिकनी पहनना सीन की डिमांड है। यह सुन कर सोते हुए साहब जाग गए। डायरेक्टर ने अपनी सारी अकल इस आइटम सांग में लगा दी थी। कास्ट्‌यूम डिजाइ‌नर का सारा कौशल बिकनी को हॉट से हॉट बनाने में लगा था। नायिका ने अपना सारा कैरियर और पूरी देह इस गाने को हॉट बनाने में लगा दी थी। एक सीटी बजी, फिर सीटियाँ ही सीटियाँ। दर्शकों ने साँस लेना बंद कर दी थी। वे जो देखने आए थे, साहब के साथ मशगूल हो कर देख रहे थे। हमें चिंता इस बात की थी कि साहब को फिल्म कैसी लगी, हॉट लगी तो ठीक, पर फ्लॉप लगी तो सुदेश गया काम से।

'आइटम सांग’ छोटा था। बेशरम रंग खतम हुआ तो फिल्म वापस बच्चों की फिल्म बन गई। हेलीकॉप्टर से लटके नायक, खलनायक, नायिका सब हैरतअंगेज करतब दिखाने लगे। साहब झपकी ले रहे थे। बच्चे फिल्म देख रहे थे, बुजुर्ग निश्चिंत हो सो रहे थे। तभी दुनिया के सबसे सुरक्षित वॉल्ट से रक्तबीज चुराने के मकसद का पता चला। साहब खास-खास फिल्म देख कर प्रसन्न हो आँखें बंद कर विचार-मग्न हो गए थे। साहिबा ने कोहनी मारते हुए कहा चौधरी जी, यह ऑफिस नहीं है, उठिए और बताइए ये रक्तबीज क्या है? हम सब चुपचाप बैठे हैं। आपको जानकारी हो तो मुझे बताइ‌गा, साहब कल की मीटिंग में यह पूछेंगे जरूर।

ईमेल: dharmtoronto@gmail.com फ़ोन: +1 416 225 2415
सम्पर्क: 22 फेरल ऐवेन्यू, टोरंटो, एम2आर 1सी8, कैनेडा

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