सूचियों की सूचिका के शूल

अनुराग शर्मा
खज़ाना-ए-ज़र-ओ-गौहर पे ख़ाक डाल के रख
हम अहल-ए-मेहर-ओ-मोहब्बत हैं दिल निकाल के रख

हमें तो अपने समुंदर की रेत काफ़ी है
तू अपने चश्मा-ए-बे-फ़ैज़ को सँभाल के रख
इफ़्तिख़ार आरिफ़

पिछले दिनों विश्व प्रसन्नता सूची (world happiness report 2023) चर्चा में थी, जिसमें प्रथम 10 देशों में भारत का नाम नहीं दिखा। दूसरी ओर, उसी सूची के अंतिम 10 देशों में बदहाली के चरम पर पड़कर कराह रहे पाकिस्तान का नाम नहीं था। श्रीलंका का दीवाला पिटने से ठीक पहले ऐसी ही एक सूची में भारत को श्रीलंका से कहीं अधिक बुरे हाल में दर्शाया गया था। इससे पहले किसी सूची में भारतीय स्त्रियों की दशा को सीरिया की स्त्रियों की दशा से खराब बताया गया था। कुछ संदिग्ध संस्थान ऐसी सूचियाँ जारी करते रहे हैं जिन पर एक सरसरी नज़र डालने भर से उनके निहित स्वार्थ और राजनैतिक उद्देश्य स्पष्ट होकर उनकी विश्वसनीयता छिन्न-भिन्न हो जाती है। अमेरिका जैसे देशों में इन संदिग्ध सूचियों की कभी कोई चर्चा होती नहीं देखी लेकिन दुर्भाग्य से भारतीय मीडिया और अनेक भोले-भाले भारतीय मित्र आज भी गौरांग-प्रभुसत्ता के हर वाक्य को ब्रह्मवाक्य मानने के चक्कर में स्पष्ट दिखते सत्य को भी नकार देते हैं। सीरिया, सऊदी अरब या अफ़ग़ानिस्तान जैसे देश तो दूर, कभी भारत का अंग रहे पाकिस्तान तक में स्त्रियों की स्थिति की तुलना भारतीय नारियों से नहीं की जा सकती है, यह समझने के लिये आइंसटाइन का दिमाग़ नहीं चाहिये। समय आ गया है जब हमें हीनभावना से मुक्त होकर संसार को (और खुद को भी) निष्पक्ष दृष्टि से देखना सीखना चाहिये। हीनभावना जितनी बुरी है, आत्मश्लाघा और अहंकार भी उतने ही बुरे हैं। तथ्य और सत्य ही हमारे निर्देशक होने चाहिये। वस्तुस्थिति को समझे बिना न हम अपना भला कर सकते हैं, न अपने समाज और राष्ट्र का और न संसार का।

शुभाकांक्षी,
सेतु, पिट्सबर्ग
31 मार्च 2023 ✍️

2 comments :

  1. वाह, सुंदर! आपके तेजस्विता भरे शब्दों ने जी खुश कर दिया अनुराग जी। यह ललकार जरूरी है। कामना करता हूँ कि यह बनी रहे, ताकि हिंदुस्तानियों को हीनता के चक्रव्यूह में कैद करने की गौरांग प्रभुओं की चाल कामयाब न हो।

    आपने न सिर्फ चालाक आवरण वाले झूठ की परतें खोली हैं, बल्कि अपने सीधे-सच्चे, खुद्दार लहजे से लाखों दिलों में आत्मविश्वास भी पैदा किया है। यह जरूरी है, क्योंकि आत्महीनता कहीं न कहीं हमें हताशा, पतन और आत्मघात की ओर ले जाती है।

    आपकी यह बात बिल्कुल सही है भाई अनुराग जी कि आत्मश्लाघा बुरी है, पर आत्महीनता तो उससे भी बुरी है, जिसका दूसरा अर्थ सर्वनाश ही है।

    वैसे भी 'सेतु' आशा और उम्मीद की पत्रिका है, जो हर बार कुछ नई संभावनाओं के द्वार खोलती जान पड़ती है। उसके पीछे आपका यही अदम्य आत्मविश्वास है, इसे पहचानने में मुझसे भूल नहीं हो सकती।

    मेरी स्नेह भरी शुभकामनाएँ,
    प्रकाश मनु

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  2. सादर नमन आदरणीय प्रकाश मनु जी। आपके सम्पादन और प्रोत्साहन ने मेरी पीढ़ी के अनेक भारतीयों का मार्गदर्शन किया है। सेतु से जुड़ने का एक बड़ा प्रसाद मुझे आप जैसे सीधे-सच्चे साहित्यकारों को निकट दर्शन के रूप में मिला है। आपकी सक्रियता बनी रहे।आप हमारे आदर्श हैं। 🙏

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