यात्रा संस्मरण: मैसूर और मूँछ अंकल

- गोविन्द सेन


वसंत ऋतु थी। मौसम सुहावना था। 26 फरवरी, 2022 की सुबह सवा छह बजे हम कार में बैठ गए थे। बेंगलुरु से मैसूर के लिए रवाना हो गए। हम पाँच थे-पौने तीन वर्ष का पौत्र अवि, अंकिता, विनय, सुलभा और ख़ाकसार यानी मैं। सोसायटी के गेट से बाहर होते ही कटे हुए पेड़ देख कर पीड़ा हुई। अंकिता बोल उठी कि इन कटे हुए पेड़ों को देख अच्छा नहीं लग रहा है। सड़क चौड़ी हो रही थी, लेकिन परोपकारी पेड़ इसका खामियाजा चुका रहे थे। पेड़ इंसानों की सुविधा के लिए अपनी बलि दे रहे थे। बहुत दुख हो रहा था। क्या विकास का यही रास्ता है!

विनय ने पेट्रोल पंप से पेट्रोल भरवाया। टैंक फुल करवाया। महँगाई और बढ़ेगी। रूस और यूक्रेन के बीच जंग छिड़ चुकी थी। पेट्रोल भविष्य में और महँगा होगा। आवागमन महँगा होगा। चीजें और महँगी होंगी। कई भारतीय छात्र यूक्रेन में फँस गए थे। क्या हम सभ्यता के मुहाने पर खड़े हैं!

कार शहर के भीतर आगे बढ़ती जा रही थी। अवि अंकिता की गोद में था। वह गोद में खड़ा होकर कार के फैन, एसी आदि को कम-ज्यादा कर रहा था। बरजने के बावजूद वह कुछ न कुछ करता ही जा रहा था। विंडो से जगह-जगह बहुमंजिला गगनचुम्बी इमारतें नजर आ रही थीं। निर्माणाधीन इमारतों के पास टावरनुमा क्रेनें दिखाई दे रही थीं। इन क्रेनों से इमारतों में मजदूर-कारीगर के साथ जरूरी निर्माण सामग्री ऊपर पहुँचाई जाती है। क्रेनों का कद इमारतों से ऊँचा था। क्रेनों की भुजाएँ ऐसी नजर आ रही थीं मानो इमारतों को दीर्घायु होने का आशीर्वाद दे रही हों। 
केआरपुरम में सब्जी-फलों के ठेलों-दुकानों पर भारी भीड़ थी। लोग खरीददारी में मशगूल थे। सहसा अवि ऐसे बोल उठा जैसे उसने कोई नई चीज देख ली हो-‘मूँछ अंकल’। यकायक हमारा ध्यान अवि की तर्जनी की तरफ गया। एक घुड़सवार का स्टेच्यू था। शायद इधर के कोई पुराना राजा रहे होंगे। वह पीले रंग की बड़ी-सी मूर्ति थी। सिर पर साफा बंधा था। चेहरे पर झबरी मूँछें थीं। इन्हीं मूँछों ने अवि को आकर्षित किया था। जब तक हम मूर्ति को ठीक से देख पाते, कार आगे निकल चुकी थी।

‘जिस दिन निकलना होता है उस रात नींद नहीं आती।’ ड्राइविंग करते हुए विनय बता रहा था। यह रूटीन नहीं था। रोज करीब आठ बजे उठना होता था। चूँकि सुबह छह बजे मैसूर का कार्यक्रम तय था। इसलिए जल्दी उठने का दबाव था। इस चक्कर में नींद ही नहीं आई थी। यह संयोग ही था कि कार में उस समय एक गीत गूँज रहा था जिसकी एक पंक्ति मेरा ध्यान बार-बार खींच रही थी-‘...बेसुवादी बेसुवादी तेरी रतियाँ...’ जब नींद न आए तो रात बेस्वाद ही तो हो जाती है। मेरे साथ भी ऐसा ही होता है। जब सुबह कहीं जाना होता है तो ठीक से नींद नहीं आती। 
हम लालबाग़ पार कर चुके थे। बेंगलुरु के दक्षिणी हिस्से में हमारी कार आगे बढ़ रही थी। सड़क के दोनों ओर हरे छायादार पेड़ों की दूर तक जाती हुई एक सुन्दर शृंखला थी। दोनों ओर के पेड़ मिलकर सड़क पर सायबान की तरह छाया कर रहे थे। इन छतनार पेड़ों के बीच से कार का गुजरना सुखद लग रहा था। यह शहर का एक पाश इलाका जयनगर था।

कार ने आगे एक मोड़ लिया। दाहिने हाथ की ओर सफाईकर्मी महिलाओं का एक झुण्ड जा रहा था। उन्होंने एक जैसी ड्रेस पहन रखी थी। शायद यह उनकी यूनिफार्म थी। किसी के हाथ में, तो किसी की बगल में झाड़ू दबी हुई थी। वे सभी केसरिया किनारी की हरी साड़ियाँ पहने हुए थीं जिस पर उन्होंने आधी बाँह का मोटे कपड़े का लम्बा कोटनुमा शर्ट पहन रखा था। शर्ट का ऊपरी एक तिहाई हिस्सा और बाँहें केसरिया रंग की थी। एक जैसे लिबास में काम पर जाती हुईं वे महिलाएँ बहुत भली लग रही थीं। एक-दो महिलाओं की चोटी पर कनकाम्बरा फूलों की वेणी भी लगी थी। मैंने इन नारंगी रंग के फूलों को यहाँ खूब देखा है। पूजा में भी इस फूल का उपयोग होता है। यह फूल सामान्य तौर से चार से पाँच सौ रूपए प्रति किलोग्राम बिकता है। लेकिन त्योहारों के मौसम में माँग बढ़ जाने से यह और महँगा हो जाता है। इसकी कीमत हजार से दो हजार प्रति किलोग्राम तक चली जाती है।

बेंगलुरु से बाहर होने में हमें करीब डेढ़ घंटे लग गए। नारियल के ऊँचे पेड़ के झुरमुट, आम, चीकू, केले, गन्ने आदि के बगीचे मेरा ध्यान खींच रहे थे। कई गाँव और कस्बे पीछे छूटते जा रहे थे। हरे पेड़ों के बीच दूर मुझे केसरिया फूलों से भरा एक पेड़ दिखाई दिया। शायद पलाश हो। मैं मध्यप्रदेश के धार जिले की मनावर तहसील का रहवासी हूँ। इस मौसम में हमारे इलाके में पलाश के पेड़ केसरिया फूलों से भर जाते हैं। हरे पेड़ों के बीच केसरिया रंग बहुत आकर्षक लग रहा था। यहाँ प्राकृतिक सौन्दर्य भरपूर है। हरे छायादार पेड़ों की कमी नजर नहीं आती। ताज्जुब था कि मुझे इधर नीम और बबूल का कोई पेड़ नजर नहीं आया। जबकि मैं जिस इलाके में रहता हूँ, वहाँ नीम के पेड़ खूब हैं। कहा जाता है कि नीमों की बहुतायत के कारण ही इस भूभाग का नाम निमाड़ पड़ा है। मनावर तहसील इसी निमाड़ में स्थित है।

हर गाँव के आगे-पीछे एक न एक छोटा-मोटा तालाब या झील भी नजर आ रही थी। कनकपुर नामक गाँव के आगे झील में एक रथ बना हुआ था। रथ पर शायद अर्जुन सवार थे और श्रीकृष्ण सारथी बने हुए थे। चावल के खेत भी नजर आ रहे थे। मेरे इलाके में चावल नहीं बोए जाते। कहीं-कहीं पहाड़ों के झुण्ड दिखाई दे रहे थे। कोई पहाड़ बड़े से हाथी जैसा नजर आ रहा था तो कोई पहाड़ बड़े-बड़े पत्थरों का ढेर लग रहा था। किसी पहाड़ की ऊँट की तरह कुबढ़ निकली हुई थी। आगे-पीछे उठे हुए पहाड़ ऐसे लग रहे थे जैसे ये पहाड़ नहीं अपने परिवार के साथ टहलने निकले हाथियों का झुण्ड हो जिसमें वयस्क हाथी के साथ-साथ उनके बच्चे भी शामिल हों। यह सब देखना बहुत सुखद लग रहा था।

कार में नागराज मंजुले की नवागत फिल्म ‘झुण्ड’ का गीत गूँज रहा था-‘खानेकु पिनेकु/ साबुन से धोनेकु/बिंदास आया ये झुण्ड है।’ यह गीत पहली बार सुना था। संगीत में ढोल, ड्रमों और थालियों जैसे वाद्य यंत्रों को पीटे जाने की झटकेदार आवाजों का जोशीला मिश्रण था। आगे इसी फिल्म के एक गीत की दो पंक्तियाँ मुझे बहुत प्रेरक लगीं-‘क्यों रहती है तू धूप के मौसम को कोसती/ बेहतर है कर ले ज़िंदगी बादल से दोस्ती।’ यह धीमी रफ़्तार का गीत था। बाद में पता चला कि यह गीत अमिताभ भट्टाचार्य का लिखा है। बहरहाल उन पलों में सफ़र एकदम सुहावना लग रहा था।

अब ब्रेक लेना जरूरी था। तीन घंटे की सतत ड्राइविंग हो चुकी थी। करीब सवा नौ बज चुके थे। हमें ब्रेकफ़ास्ट लेना था। एक होटल पर रुके जिसका नाम ‘विनायक होटल’ था। साइन बोर्ड के अनुसार यह स्थान मंड्या जिले की मालावल्ली तहसील का हडली सर्कल था। नाश्ते में थट्टा इडली, सांभर, बड़ा पाव और नारियल की चटनी थी। 
कार फिर आगे बढ़ने लगी। अब मैसूर साठ किलोमीटर की दूरी पर था। इधर सड़क बेहतर थी। गन्ने, केले और चावल की फसलें खेतों में झूम रही थी। दूर तक नारियल के पेड़ों के झुण्ड नजर आते ही जा रहे थे। आगे सड़क पर कुछ ट्रेक्टर भी मिले जिनकी ट्रालियों में करीने से जमे-सटे और कटे हुए गन्ने लदे थे। कुछ ईंट भट्टे भी दिखाई दिए। दो-तीन ट्रक रास्ते में मिले जो लाल ईटों से लदे थे। रास्ते में एक्का-दुक्का ही बैलगाड़ियाँ दिखाई दीं। बैलों के सींग अपेक्षाकृत बड़े और नुकीले थे।

कार मैसूर शहर में प्रवेश कर चुकी थी। मैसूर कर्नाटक का दूसरा बड़ा और साफ-सुथरा शहर है। शहर के भीतर यह अहसास हो रहा था। यह प्रदेश की राजधानी बेंगलुरु से करीब डेढ़ सौ किलोमीटर दूर है। विनय ने मैसूर भ्रमण के लिए ज़ू और मैसूर पेलेस को चुना था। आखिरकार हमारी कार ‘श्री चामराजेन्द्र जूलोजिकल गार्डन’ यानी ज़ू के प्रवेश द्वार के सामने थी। अभी हम पार्किंग खोज ही रहे थे कि हमारी समस्या भाँपकर एक ऑटो वाला कार के पास आया। कहने लगा-‘चलो सर, पार्किंग की जगह बताता हूँ।’ मुझे उसकी यह मदद करने की पहल अच्छी लगी। वह करीब एक किलोमीटर दूर ले गया। उसने पार्किंग का स्थान बता दिया। साथ ही वापस ज़ू तक ऑटो में ले जाने का प्रस्ताव रख दिया। कहा-‘केवल तीस रूपए में ले चलूँगा सर।’ लगा जैसे मदद के बहाने वह अपनी कमाई ढूँढ रहा था।

विनय ने इंकार कर दिया। पहले होटल में जाएँगे फिर वापस कार से आएँगे। तब कार पार्किंग की जाएगी। हम सवा ग्यारह बजे वहाँ स्थित रॉयल आर्चिड शृंखला के होटल ‘मेट्रोपोल’ पहुँच गए। इस होटल में पहले से ही कमरे बुक किए जा चुके थे। बेंगलुरु से यहाँ पहुँचने में हमें पाँच घंटे लगे थे। एक विन्रम दरबान ने हमारा स्वागत किया। उसने सफ़ेद रंग के पैंट पर ग्रे रंग का कोट पहन रखा था। कमर पर बेल्ट और सिर पर साफा बंधा था। वह किसी बेंड-बाजे वाले जैसा लग रहा था। होटल द्वारा यह ड्रेस उसके लिए निर्धारित रही होगी। उसके चेहरे पर एक अतिरंजित मुस्कान चिपकी थी। लगता था कि सोने के बाद भी यह मुस्कान उसके चेहरे पर चिपकी रहती होगी अपनी ड्यूटी की अनिवार्यता की तरह। उसने अपना नाम नागराज बताया था जो उसकी विनम्रता और चेहरे पर फैली मुस्कान से मेल नहीं खा रहा था। उसमें ‘अतिथि देवो भवो’ की तर्ज पर हमारी मदद करने की आतुरता दिख रही थी। उसका चेहरा क्लीन सेव्ड-मूँछ विहीन था। खयाल आया कि यदि इसकी मूँछें होतीं तो शायद अवि उसे भी ‘मूँछ अंकल’ कहता। हमने होटल में अपना लगेज रखवाया। चेक इन की औपचारिकता पूरी करने के बाद फिर ज़ू के लिए निकल गए।

अब हम ‘श्री चामराजेन्द्र जूलोजिकल गार्डन’ के भीतर थे। महाराजा चामराज वोडेयार ने 1892 में इसकी स्थापना की थी। यहाँ प्रतिवर्ष 30 लाख से अधिक पर्यटक आते हैं। इसकी वार्षिक आय 7 करोड़ रूपए से अधिक है। शायद भारत का यह पहला चिड़ियाघर है जो सरकारी ग्रांट पर निर्भर नहीं है। यहाँ जानवर को गोद भी ले सकते हैं। हमने एकाधिक स्थानों पर ‘एनिमल अडॉप्ट स्कीम’ की जानकारी देने वाले साइन बोर्ड लगे देखे थे।

पर्यटकों की सुविधा के लिए शुरुआत में ही ज़ू का पूरा चित्रमयी रंगीन नक्शा था। इसे देखने पर पता चल जाता था कि कहाँ-कहाँ, कौन-कौन से स्तनपायी, पक्षी और सरीसृप हैं। यह चिड़ियाघर 157 एकड़ में फैला हुआ है। यह भारत के सबसे पुराने और प्रसिद्ध चिड़ियाघरों में से एक है। यहाँ विविध प्रजातियों के 1450 प्राणी हैं।

पहली पंक्ति पक्षियों की थी। हम उसी ओर मुड़ गए। पक्षियों के सीखचों के आगे उनके नाम, स्वभाव और कहाँ पाए जाते हैं आदि की जानकारी लिखी थी। सबसे पहले मेरी नजर ‘ग्रेट इंडियन हार्नबिल’ पर पड़ी। वह जाली के नीचे की ओर नामालूम-सा खड़ा था। यह बहुत सुन्दर पक्षी है। इसके शरीर पर पीले और काले रंग की अधिकता होती है। इसकी मुड़ी हुई बड़ी चोंच जो बीच में झोली की सी थी। सिर पर छप्परनुमा आकृति इसे अन्य पक्षियों से अलग करती है।

इसी लाइन में जालियों के पीछे कई पक्षी थे। जालियों के पिंजरों ने उनके आसमान को बहुत छोटा कर दिया था। सभी पक्षी रंग-बिरंगे और मोहक थे। कोई रंगों से प्रभावित कर रहा था, कोई अपने आकार से तो कोई अपनी आवाज से। इस क्षेत्र में इन पक्षियों का सम्मिलित कलरव गूँज रहा था। आगे ‘बुडगेरिगर स्नो’ देखा। यह तोते जैसा पक्षी लग रहा था। इसका चेहरा पीला और गर्दन पर काले धब्बे थे। पंख काले थे, बाकी शरीर का रंग हल्का हरा था। थोड़ा आगे उल्लुओं का डेरा था। वे इधर-उधर अपने-आप में लीन लगभग खामोश मुद्रा में बैठे थे। पास में ही तीतर थे। तीतर देखते ही ‘तीतर के दो आगे तीतर के दो पीछे तीतर’ गाना याद आ गया। एक जाली के पीछे सारस घूम रहे थे। सारस संसार का सबसे ऊँचा उड़ने वाला और भारत का सबसे बड़ा पक्षी है। लंबी और लचीली गर्दन और लाल रंग की लंबी-पतली टाँगों वाले ये सारस बहुत आकर्षक लग रहे थे। इनका सिर और गले का कुछ हिस्सा लाल था। बाकी शरीर सफ़ेद-स्लेटी था। इन्हें देखकर बच्चों को दो सारस और एक कछुए कहानी याद आती होगी। कहानी में सारस चोंच में एक लकड़ी दबाकर कछुए को दूसरे तालाब में उड़कर ले जाते हैं। लेकिन रास्ते के बीच में ही वाचाल कछुए के मुँह खोलने के कारण वह लकड़ी से छूटकर जमीन पर आ गिरता है। उसके प्राण-पखेरू उड़ जाते हैं। बिना सोचे बोलने का यही परिणाम होता है।

इस बर्ड सेक्शन में विभिन्न प्रजातियों के छोटे-बड़े, खूंखार-मासूम, शाकाहारी, रंगबिरंगे, सर्वभक्षी और माँसाहारी पक्षी थे। कई प्रकार के तोते थे। सन कैनूर तोते लाल-पीले रंग में सुन्दर दिख रहे थे। बाज, चील और गिद्ध भी इस चिड़ियाघर की शोभा बढ़ा रहे थे। ब्राह्मणी चील की तेज-सजग आँखों और सुघड़, पीली-नुकीली चोंच को मैं अभी भी नहीं भूल पाया हूँ। इधर लाल कलगी वाले मुर्गे और सुन्दर पंखों के स्वामी मोर भी थे।

देखने वालों की भीड़ उमड़ रही थी। उड़ने वाले पंछी एक सीमित दायरे में कैद थे। हमने उनका खुला आकाश छीन लिया था। उनके प्राकृतिक आवास से दूर कर दिया। एक कृत्रिम वातावरण में उन्हें रखा जा रहा था। पंछी कलरव करके हम पर गुस्सा जाहिर कर रहे थे। शायद पूछ रहे थे कि हमारा गुनाह तो बताओ मनुष्यों! हमें यहाँ क्यों कैद कर रखा है। हमें खुले आकाश में उड़ने क्यों नहीं देते! पर हम उनकी भाषा कहाँ समझते हैं! यूँ तो बहुत संवेदनशील बनते हैं।

आगे लायन सेक्शन था। यहाँ बड़ी बिल्लियाँ थीं। इसमें एक सुरक्षित आवास में तेंदुए थे। ये मांसाहारी जीव हैं। ज़ू में इन्हें मांस खिलाया जाता है। सभी पशु-पक्षियों के लिए उनके प्राकृतिक आवास और भोजन के मुताबिक व्यवस्था की गई थी। यहाँ एक बड़ा तेंदुआ ऊपर बने आवास में सुस्ता रहा था। एक छोटा तेंदुआ बेचैनी से चहलकदमी कर रहा था। पास ही टाइगर (बाघ) का आवास था। यही हाल शेरों का भी था। वे भी कहीं सुस्ता रहे थे। शायद यह उनके आराम का समय हो। कुल मिलाकर इन बड़ी बिल्लियों ने दर्शन तो दिए किन्तु हम संतुष्ट न हो सके। शेर को देखने पर बच्चों को शेर और चूहे की कहानी याद आती होगी। कहानी में चूहा शिकारी का जाल काटकर शेर की जान बचाने में मदद करता है। शेर से जुड़ी कई बाल कहानियाँ हैं।

अब हमारे सामने कई प्रकार के बन्दर थे। इनमें चिंपाजी और गोरिल्ला भी थे। दिलचस्प है कि हम बंदरों के ही वंशज हैं। चिंपाजी से मनुष्य के 98 % और गोरिल्ला से 98.3 % जेनेटिक कोड मिलते हैं। इनके सिर, हाथ, पाँव आदि मनुष्य से मिलते-जुलते हैं। कह सकते हैं कि ये हमारे निकटतम पूर्वज हैं। साठ लाख वर्ष पहले मनुष्यों और इनके पूर्वज एक ही थे। किन्तु हम अभिमानी हैं और वहीं से अपने वंश को मानते हैं जहाँ से हमारी विरुदावली शुरू होती है।

दो हजार इक्कीस में निर्मित ‘ओरांगुटान हाउस’ शानदार था। यह हाउस ऊँची हरे रंग की चाहरदीवारी से बना था। वहाँ आरंगुटान के लटकने और झुलने के बेहतर इंतजाम थे। रस्से बंधे थे जिस पर वह झुलने का लुत्फ़ उठा सकता था। जिस समय हम देख रहे थे उस समय वह रस्से पर झुलते हुए पेड़ पर चढ़ रहा था। दूसरा ओरंगुटान ऊँचे मचान पर लेटा कुछ खा-चबा रहा था।

आगे हमने हिरण, बारहसिंगा, चीतल आदि के झुण्ड देखे। वहीं हमने सेल्फियाँ लीं और एक सीमेंट की बेंच पर बैठकर फोटो खींची। अवि ने हमें मनमुताबिक पोज नहीं दिए। वह अपनी मर्जी का मालिक है। न तो उसे स्ट्रोलर पर बैठना मंजूर था और न पैदल चलना। उसने गोदी लेने की जिद पकड़ ली।

हम भेड़िए, हुवा-हुवा करने वाले सियार आदि देख चुके थे। रीछ को देखने के लिए हम आगे बढ़े। रीछ के केवल कुछ काले बाल ही दिख रहे थे। वह खजूर जैसे किसी पेड़ पर चढ़ा हुआ था। पेड़ के पत्तों में ही वह डूबा हुआ था। हम उसे समूचा नहीं देख पा रहे थे। शायद कुछ खाने का जुगाड़ बिठा रहा था। पहले पेट पूजा फिर काम दूजा। हमें दर्शन देने की उसे फुर्सत नहीं थी और न कोई इच्छा।

जब हम हाथियों को देखने लगे तो विनय ने अवि को कन्धों पर बिठा लिया ताकि वह भीड़ में दूर विचरते हाथियों को देख सके। कन्धों पर बैठकर अवि खुश था। एक बड़े से बाड़े में हमें कुछ हाथी दिखाई दे रहे थे।

इस चिड़ियाघर में 2004 और 2005 में कई जानवरों रहस्यमय तरीके से मौत हुई थी। इस दौरान 6 हाथियों की मृत्यु हुई थी जिनमें गणेश, रूपा, कोमला, रोहन और अंशुल हाथी थे। इन्हें जहर दिया गया था। एक मकाक, एक इमु और एक बाघ की मृत्यु भी हो गई थी। तब एक महीने के लिए चिड़ियाघर को बंद कर दिया गया था। बताया जाता है कि उनकी मृत्यु जहर से हुई थी। उनको जहर यहीं के कर्मचारियों ने दिया था। वैसे भी प्राचीन काल से ही आदमी बेगुनाह जानवरों का शिकार करता आ रहा है। मुझे आनंद बक्षी का लिखा फिल्म ‘हाथी मेरे साथी का’ वह गीत याद आ गया-‘जब जानवर कोई इंसान को मारे/कहते हैं दुनिया में वहशी उसे सारे/ एक जानवर की जान आज इंसान ने ली है/चुप क्यों है संसार।’

बच्चों की अनेक कहानियाँ के पात्र पशु-पक्षियों से जुड़े होते हैं। देखने वालों में कई बच्चे अपने माता-पिता के साथ थे। निश्चित ही ज़ू में विभिन्न पशु-पक्षियों और सरीसृपों को प्रत्यक्ष देखकर बच्चों को बहुत आनन्द आता होगा। उन्हें उनसे जुड़ी कहानियाँ भी याद आती होगी। इससे उनकी कल्पना शक्ति में विस्तार होगा। ज़ू में काले-सफ़ेद पट्टों वाले जेब्राओं को देखकर भी बच्चे खिल उठे होंगे। अल्फाबेट के आखिरी लेटर जेड से जेब्रा बनता है। कई बच्चों ने जेब्रा को अब तक केवल चित्र या टीवी में ही देखा होगा।

लम्बे-पतले बेलनाकार शरीर के ऊदबिलाव को देखकर अचरज हुआ। उसका छोटा-सा मुँह चूहे जैसा था। वह पानी से निकल कर पंजों के बल गिलहरी की तरह खड़ा हो गया। मानो चौकन्ना होकर आसपास का जायजा ले रहा हो। शरीर के हिसाब से उसकी आवाज में दम नहीं था। इतनी आवाज तो एक मामूली सा तोता भी कर लेता है। बताया जाता है कि ऊदबिलाव पानी में आठ मिनट तक साँस रोक सकता है।

हाथियों के बाद हमने कीचड़ जैसे पानी में शांत भाव से डूबे हिप्पोपोटेमस (दरियाई घोड़ा) को देखा। उसका सिर और पीठ ही दिखाई दे रहे थे, बाकी शरीर पानी में डूबा था। हिप्पो के विशाल डील-डौल, बड़े सिर और छोटी आँखों को देख चकित रह गया। मैंने पहली बार हिप्पो को रूबरू देखा था। प्रत्यक्ष देखने का अनुभव अलग और सम्पूर्ण होता है। परदे या फोटो पर देखने से हम उसके आकार-प्रकार का केवल अनुमान ही लगा पाते हैं। प्रत्यक्ष देखने का कोई विकल्प नहीं। उसी सेक्शन में आगे भारतीय गेंडा (इंडियन राइनो) भी एक खुले शेड में खड़ा अपने खाने में मशगूल था। पहली बार जब नजर पड़ी तो उसकी केवल पीठ ही दिख रही थी। आगे जाकर देखने पर उसका सिर भी दिखाई दिया। उसके भारी-भरकम शरीर और मोटी-सख्त खाल देखकर मैं चकित रह गया। वह अपनी धुन में अपने आहार पर जुटा था। उसे हमसे कोई सरोकार नहीं था। उसकी खाल बहुत मजबूत और तहदार थी। गेंडा अपनी मोटी खाल के लिए प्रसिद्ध है। उसके सिर पर एक सींग था। सुना है कि इसी सींग के कारण ही इनका शिकार किया जाता रहा है। अब ये विलुप्ति के कगार पर हैं। इस रायनो का नाम बबली है। इसे मैसूर के श्री रघुलाल राघवन नामक महाशय ने एक वर्ष के लिए अडॉप्ट कर रखा था। ‘एनिमल एडॉप्शन योजना’ की सफलता दिखाई दे रही थी। ज़ू में ऐसे कई जानवर हैं जिन्हें लोगों या संस्थाओं ने अडॉप्ट किया हुआ था।

साँपों की लाइन में भारी भीड़ थी। हमने वह लाइन छोड़ दी। इंसान जैसा जहरीला जानवर दूसरा कौन होगा! रूस-युक्रेन की जंग में कई इंसान मारे जा रहे थे। जीते-जागते इंसान मौत के आंकड़ों में बदलते जा रहे थे। याद कीजिए अज्ञेय की कविता-‘साँप! /तुम सभ्य तो नहीं हुए/शहरों में बसना भी नहीं आया/ एक बात पूछूँ ?/उत्तर दोगे/ डसना कहाँ सीखा/ विष कहाँ पाया।’

उसी परिक्षेत्र में विभिन्न किस्म के छोटे-बड़े कई कछुए थे। वे अपने छोटे-छोटे ताल में तैर रहे थे। कुछ बैठे हुए आराम फरमा रहे थे। यदि वे कुछ हिले-डुले नहीं तो लगेगा कि वहाँ छोटे-बड़े चपटे पत्थर पड़े हुए हों। एक-दो कछुओं की पीठ तो तगारी जितनी बड़ी थीं। कहानी में इसी कछुआ का कोई पुरखा रहा होगा जिसे सारस एक लकड़ी के सहारे उड़ाकर ले जा रहे थे। खैर! वह पंचतंत्र की एक कहानी है जो बच्चों को सन्देश देने के लिए गढ़ी गई थी।

अन्त में हमने जिराफ देखे। एक बड़े कम्पाउंड में तीन-चार जिराफ़ शांतिपूर्वक अपनी लंबी टाँगें और लंबी गर्दनें लिए हिचकोले खाते घूम रहे थे। वे अपनी लंबी गर्दनों से पेड़ों की पत्तियाँ खा रहे थे। उनके लिए ऊँचे खम्भों पर टहनी सहित पत्तियाँ बंधी थीं ताकि उन्हें झुकना न पड़े। उन्हें झुकने में असुविधा होती होगी। कम्पाउंड में पत्तेदार ऊँचे पेड़ भी थे। जिराफ़ जमीन पर पाए जाने वाला सबसे ऊँचा जीव है। इसकी ऊँचाई 18 फुट तक हो सकती है। उनके शरीर पर भूरे चकत्ते बहुत आकर्षक लग रहे थे। ये चकत्ते मनुष्य के फिंगर प्रिंट की तरह सभी जिराफों के अलग-अलग होते हैं।

हमें चिड़ियाघर में घूमते हुए दो घंटे हो चुके थे। अब हमें चिड़ियाघर के सभी प्राणियों से विदा लेनी थी। हम चिड़ियाघर से बाहर फिर से मनुष्यों की दुनिया में आ गए थे। भूख पेट पर दस्तक देने लगी थी। सवा दो बजे हम अन्नपूर्णा रेस्टोरेंट में थे। थाली में रोटी-सब्जी और रायता था। सेंव और आलू की सब्जी स्वादिष्ट थी। रायते ने मुझे तृप्त कर दिया। भोजन के बाद वापस अपने होटल में मेट्रोपोल जाकर कुछ देर आराम किया।

मैसूर पैलेस : सुनहरा महल

शाम के तीन बजे हम शानदार मैसूर पैलेस के शानदार परिसर में प्रवेश कर चुके थे। यह महल अम्बा विलास भी कहलाता है। चहारदीवारी के भीतर घुसते ही महल की भव्यता और सुन्दरता ने सम्मोहित कर लिया था। हमारी निगाहें ऊपर थी। हम महल की ओर बढ़ते जा रहे थे। यूँ तो रास्ता बढ़िया था। लेकिन एक जगह फर्श कुछ दबा हुआ था। एक छोटा सा गड्ढा वहाँ बन गया था। उसी गड्ढे में चलते-चलते बेखयाली में सुलभा का पाँव चला गया। पाँव जैसे ही गड्ढे से निकाला तो चप्पल की बद्दी भी निकल गई। विनय ने बद्दी को यथास्थान बिठा दिया। गनीमत रही कि बद्दी टूटी नहीं थी।

पैलेस के भीतर प्रवेश के पहले जूते-चप्पलों को जूता स्टैंड पर रख दिया गया। यहाँ भारी भीड़ थी। भीतर जाते ही हल्की सी सुखद ठंडक महसूस हुई। जबकि बाहर गर्मी थी। यह ऐतिहासिक राजमहल है। यह वाडियार वंश का आधिकारिक निवास था। मैसूर का शाब्दिक अर्थ ‘गढ़’ होता है। यदुराया ने 14 वीं सदी में पुराने किले के अन्दर पहला महल बनवाया था। यह चन्दन की लकड़ी से बनाया गया था। 1896 में एक विवाह कार्यक्रम के दौरान यह जलकर राख हो गया था। मैसूर के तब के महाराजा कृष्णराजा वाडयार चतुर्थ और उनकी माँ ने नया महल बनवाने के लिए ब्रिटिश वास्तुकार इरविन को नियुक्त किया था। वर्तमान महल का निर्माण ईंट, पत्थर और लकड़ी से किया गया। पुराने किले के जल जाने के बाद वर्तमान संरचना का निर्माण 1897 से 1912 के बीच किया गया था। इस महल का विस्तार 1940 तक होता रहा।

बाहर से यह महल हल्के पीले और सफेद रंग का दिखता है जो अपनी भव्यता का आभास कराते हुए आँखों को सुकून देता है। महल के गुम्बदों की स्थापत्य शैली को इंडो-सरसेनिक माना जाता है। इसमें हिन्दू, मुग़ल, राजपूत और गोथिक शैलियों का मिश्रण होता है। महल की भीतरी संरचना, सजावट, सुरुचिपूर्ण रंग-संयोजन, सुन्दर वास्तुशिल्प और महीन-सुन्दर कारीगरी मन मोह लेती है। फर्श, छतें, गुम्बद, खम्भे, दीवारें सभी इतनी आकर्षक और इतनी सुन्दर हैं कि हम तय नहीं कर पाते कि क्या देखें और क्या छोड़ें। मैंने इतना आकर्षक, व्यवस्थित रखरखाव वाला कोई अन्य ऐतिहासिक महल या किला पहले नहीं देखा था। इसका मुख्य परिसर 245 फीट और 156 फीट चौड़ा है। महल में तीन प्रवेश द्वार हैं। इसके गहरे गुलाबी संगमरमर के गुम्बद दूर से ही नजर आते हैं। इस तीन मंजिला इमारत में कई विशाल मेहराब हैं। महल में दो दरबार हॉल हैं।

पैलेस के भीतर प्रवेश करते ही काले रंग की तोपगाड़ियों की एक कतार ने ध्यान खींचा। इन तोपों को हर साल दशहरा के प्रारंभ और समापन के मौके पर दागा जाता है। महल के मध्य में पहुँचने के लिए गजद्वार से होकर गुजरना पड़ता है। वहाँ कल्याण मंडप अर्थात् विवाह मंडप है। उसकी छत रंगीन शीशे से बनी है। फर्श पर चमकदार पत्थर के टुकड़े लगे हैं। यहाँ अन्य महलों की तरह राजाओं के लिए दीवान-ए-खास और आम लोगों के लिए दीवान-ए-आम है। यहाँ बहुत से कमरे हैं जिनमें चित्र और राजसी हथियार रखे हुए हैं। दीवारों पर क्रम से चित्र लगे हैं। हर चित्र पर विवरण लिखा है। इन चित्रों में कृष्णराजा वाडियार के परिवार, विभिन्न जुलूसों के चित्र और सेना के चित्र हैं। लगभग सभी चित्र रवि वर्मा ने तैयार किए हैं।

बारीक नक्काशी वाले बड़े-बड़े दरवाजे और छतों में लगे झाड़-फानूस महल की शोभा को द्विगुणित कर रहे थे। कोई भी दरवाजा या छत ऐसी नहीं थी जो बिलकुल सादा हो। सब कुछ कलात्मक था। हर दरवाजा, खम्भा, गलियारा, चित्र और छत देखने के लिए आमंत्रित कर रहे थे, किन्तु उतना ठहरकर देखना संभव नहीं था। उन्हें फिर कभी देखने के लिए छोड़ते जा रहे थे। एक कमरे में कुर्सी पर विराजित कृष्णराजा वाडियार चतुर्थ का प्लास्टर ऑफ़ पेरिस का सजीव स्टेच्यू बना था। हर आदमी अमर होना चाहता है। शायद इसी इच्छा के वशीभूत होकर अपनी मूर्तियाँ बनवाई गई होगी। वैसे कलाकार की कला अमर होती है, भले ही उसका नाम अमर न हो, उसे कोई जानता न हो। स्टेच्यू की मूँछों पर अवि का ध्यान नहीं गया था, नहीं तो वह फिर बोलता-‘मूँछ अंकल।’ इस कमरे में चाँदी से बनी कुर्सियाँ रखी हुई हैं। कुर्सियों की आर्मरेस्ट पर बाघ के मुखौटे बने हैं। कुर्सियों के पाए बाघों के पंजों जैसे बने हैं। सोने से बने सिंहासन को दशहरा के अवसर पर प्रदर्शित किया जाता है। विशेष अवसरों पर इस महल को करीब एक लाख बल्बों से जगमगाया जाता है। लेकिन हम ऐसे किसी खास अवसर पर वहाँ नहीं पहुँचे थे। अत: उस सुन्दर दृश्य को देखने से वंचित रहे। ऐसे किसी अवसर पर जगमगाता हुआ यह महल एकदम सुनहरा हो जाता होगा जैसे सोने का महल हो।

यह सब देखकर उन महान शिल्पकारों की सराहना करने का मन कर रहा था जिन्होंने इस महल को ऐसा नयनाभिराम स्वरूप दिया था। ताज्जुब नहीं होता कि भारत में ताजमहल के बाद मैसूर पैलेस सबसे अधिक देखा जाने वाला पर्यटन स्थल है। प्रतिवर्ष इसे देखने के लिए 60 लाख से अधिक पर्यटक आते हैं।

शाम 6 बजे हम होटल के रेस्टारेंट में पहुँचे। दो चाय, दो कॉफ़ी और अवि के लिए दूध-ब्रेड का आर्डर दिया। हम इंतज़ार कर रहे थे। अवि बरजने के बावजूद चम्मच से चीनी की प्लेट को बजा रहा था। चीजों को इधर-उधर कर रहा था। हम बात कर ही रहे थे कि अवि को गहरी नींद आ गई। हमें पता भी न चला। उसका सिर और दोनों हाथ कुर्सी की बैठक पर थे। एक पाँव टेबल के पाए पर अटका था और दूसरा पैर फर्श पर टिका था। वह कुर्सी पर चढ़ने की कोशिश करते-करते ही सो गया था। वह कार में ठीक से सो नहीं पाया था। सुबह उसे जल्दी उठा भी लिया गया था। हम उसके सोने के इस ढंग को देखते ही रह गए। उसके लिए दिया गया आर्डर कैंसल करना पड़ा।

करीब आठ बजे हम रात्रि भोजन के लिए ‘द ओल्ड हॉउस’ रेस्टोरेंट गए। यहाँ हमने डिनर में ब्रुसेटा, गार्लिक ब्रेड, सूप, लजानिया आदि का लुत्फ़ लिया। किसी व्यंजन के हिज्जे में कोई गलती हो गई हो तो क्षमा कीजिएगा। यह रेस्टोरेंट इटालियन फ़ूड के लिए जाना जाता है। रात करीब साढ़े नौ बजे हम वापस अपने होटल लौट आए। हम जिस होटल ‘रॉयल आर्किड मेट्रोपोल’ में ठहरे थे वह भी किसी दर्शनीय स्थल से कम नहीं था। उसका भवन आधुनिक सुविधा संपन्न होने के बावजूद अपने प्राचीन वैभव का आभास करा रहा था।

सत्रह फ़रवरी की सुबह मेरी नींद जल्दी खुल गई। फिर नहीं आई। रूम में उपलब्ध केतली पर मैंने चाय बना ली। इसमें चाय बनाना बहुत आसान था। केतली में बहुत जल्दी पानी गर्म हो गया। मैंने बस गर्म पानी में दूध का मिनी पैकेट खोलकर डाल दिया। इन छोटे-छोटे पैकेटों में शुगर के अलावा शुगर फ्री के पैकेट भी थे और यह मेरे लिए मनचाही मुराद थी। मैंने इसे भी पानी में घोल लिया। अब चाय का मिनी जालीदार पैकेट पानी में डुबो दिया। इस तरह चाय तैयार हो गई थी।

होटल का परिसर खूब लम्बा-चौड़ा था। यह पुराने ढब की दो ढाल की छत वाला समस्त आधुनिक सुविधा से युक्त दुमंजिला भवन था। बीच में खुला परिसर था जिसमें बड़े-बड़े पेड़ थे। कमरे के पीछे गैलरी थी। गैलरी में बैठने के लिए दो आरामदायक कुर्सियाँ लगी थीं। मैं वहीं एक कुर्सी पर बैठ गया।

सामने के कमरों की गैलरियों में कबूतर गुटरगूँ करते हुए चहल-कदमी कर रहे थे। बड़े-बड़े छायादार पेड़ भवन की दोनों मंजिलों से ऊपर चले गए थे। पेड़ों के घने पत्तों से छनकर धूप आ रही थी। लग रहा था धूप की चाय को पत्तों की छलनी में छाना जा रहा हो। इन्हीं पेड़ों का प्रयोग कंदीलों को लटकाने के लिए भी किया गया था। वैसे वहाँ हर जगह बल्ब कंदीलों में कैद थे। रात में बल्ब कंदीलों से रोशनी फैला रहे थे। बल्ब बिजली से जल रहे थे न कि केरोसिन से। इनके जरिए होटल को रॉयल लुक दिया गया था। मैसूर पैलेस की तरह होटल की दीवारें भी हल्के पीले और खम्भे सफ़ेद रंग से पुते हुए थे। होटल की साज-सज्जा में एक नफासत और कुलीनता झलक रही थी। 
परिसर में खड़े हरे पेड़ मोटे तने वाले थे। उनकी टहनियाँ बहुत मोटी लग रही थीं। एक बड़े पेड़ पर एक बड़े-बड़े पत्तों वाली बेल आपादमस्तक लिपटी हुई थी। बेल के पत्ते पेड़ के पत्तों से भी बड़े थे। अफ़सोस कि कई पेड़ों के साथ हम उस पेड़ का नाम भी नहीं जानते। यदि पेड़ बोल पाते तो मैं उनसे जरूर पूछता-‘भाई आपका नाम क्या है ?’ लेकिन पेड़ बोलते नहीं। यदि वे बोलते होते तो हम जैसे हो जाते जो मौन के महत्व को नहीं जानते। वे अपने में ही मस्त थे। मौन होकर जैसे कह रहे हों-‘नाम से क्या मतलब भाई साहब, हमें तो अपने काम से मतलब है। हम पेड़ों को नाम की जरुरत नहीं होती। नाम तो मनुष्यों की जरुरत है। नाम को लेकर हम झगड़ते नहीं। हम मजे से जी रहे हैं भाई साहब। आपका क्या है आज हो, कल चले जाओगे। हमें तो यहीं जीना है और यहीं मरना है। जीना यहाँ मरना यहाँ इसके सिवा जाना कहाँ।’ बहरहाल वे सारे पेड़ और लताएँ होटल के उस परिसर में अपनी भरपूर उपस्थिति दर्ज करा रहे थे। साथ ही मनुष्य को उसके टुच्चेपन का बोध करा रहे थे। हम कितने स्वार्थी हैं जो उनका सिर्फ इस्तेमाल करते हैं।

अब मैसूर को अलविदा कहने का समय आ गया था। हमें यहाँ से कुर्ग की ओर रवाना होना था। हम कार से रवाना हो गए। बीच में चर्चा चली तो विनय ने बताया कि यहाँ ‘मालगुडी डेज’ के सुप्रसिद्ध लेखक आर. के. नारायण यहीं रहते थे। उनका हॉउस मैसूर में ही है जिसे अब म्युजियम में बदल दिया गया है। मुझे बहुत अफ़सोस हुआ कि हम उनका हॉउस देखे बगैर ही मैसूर से रुखसत हो रहे थे। उन्होंने 29 उपन्यास लिखे थे। उनके उपन्यास ‘गाइड’ पर फिल्म भी बनी है जो बहुत चर्चित रही। इसी उपन्यास पर 1960 में उन्हें साहित्य अकादमी सम्मान भी मिला था। इसके अतिरिक्त उनका कहानी संग्रह ‘मालगुडी डेज’ है जिस पर इसी नाम से टीवी सीरियल भी बना है। यह सीरियल भी काफी लोकप्रिय हुआ था। मैसूर के इस हॉउस में उन्होंने 40 बरस गुजारे थे। हमें उस घर को देखना ही था। बाद में पता नहीं यह कब संभव हो। एक बड़ी चूक हो चुकी थी। सबक सीखा कि अब जिस स्थान पर भी जाना हो तो यदि उस स्थान या आसपास किसी लेखक या कवि का स्मारक या उसकी स्मृति से जुड़ी कोई भी जगह हो तो उसे अवश्य देखा जाना चाहिए। 
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193 राधारमण कॉलोनी, मनावर-454446, (धार) मध्य प्रदेश
चलभाष: 9893010439, ईमेल: govindsen2011@gamil.com 

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