चार कविताएँ: प्रकाश मनु

प्रकाश मनु
(1) मैंने निंदर को देखा है
(प्रसिद्ध कवि नरेंद्र मोहन को याद करते हुए)

मैंने निंदर को देखा है
मैंने निंदर से बातें की हैं

मैंने उसे देखा है 
कभी लाहौर कभी अंबाला की गलियों में 
अकेले घूमते हुए उदास
मैंने उसे देखा है
चायघर के कोने की बेंच पर
अकेले चाय और आँसू पीते हुए
बुदबुदाते खुद से

मैंने देखा है उसे दोस्तों के बीच कभी वाचाल
कभी एकदम चुप्पी के खोल में दुबके
कहीं कुछ तलाशते हुए
जो एकाएक फिसल गया है जिंदगी से

मैंने उसके चेहरे पर अचानक घिर आए
दुख और उदासियों के काले बादल देखे हैं
जो कहीं बरसना चाहते थे
तो शब्दों की दुनिया में चले आए

मैंने निंदर को देखा है
तक्सीम की तकलीफ भरी यादों को गुहराते हुए
मंटो के टोबा टेकसिंह में फिर-फिर तलाशते हुए
इतिहास का वह दर्द भरा नाटक
जिसने पूरे देश को कँपा दिया
मैंने देखा है उसे चुपके से आँसू पोंछते
मैंने उसकी उदासियों से बातें की हैं

उसने रोते-रोते अपने बचपन के दोस्त आरिफ
और हिसाब सिखाने वाले मास्टर 
यूसुफ मियाँ के बारे में बताया
तो मैं अपने आँसुओं को नहीं रोक पाया

मैं समझ गया
वे कौन सी अफाट बेचैनियाँ थीं जो उसे कविता की ओर 
खींच रही थीं
और कई-कई दिनों तक वह सहज नहीं हो पाता था

बहुत कुछ था जो कि उसे करना था
क्योंकि दुनियादारी के तकाजे थे
मगर सब कुछ से पहले
और बाद में भी
उसका खुद से मिलना जरूरी था
क्योंकि जब-जब वह खुद से मिलता था धधाकर
जनमती थी एक नई कविता
जिसकी आँच को सहार पाना मुश्किल था

अपना खुद का आकाश लिए उसकी अपनी
बिल्कुल अपनी कविता
जो कविता भी थी और नाटक भी
क्योंकि उसमें जिंदगी टूटकर आती थी
और खूब थपेड़े देती थी

शायद इसीलिए कविता लगातार
लंबी कविता होती गई
और लंबी कविता जिंदगी का महा आख्यान

कविता निंदर के लिए क्या थी—
कहना मुश्किल था
मगर मैंने निंदर को कविता के लिए बैचैनियों से भरकर
रात-रात भर शब्दों का पीछा करते देखा है

मैंने देखा है निंदर की कविताओं का फैलता हुआ आयतन
जिसमें से कभी कहै कबीर सुनो भई साधो जैसा 
नाटक निकल पड़ता है
तो कभी लंबी कविताओं का पूरा एक शास्त्रविधान
कभी आत्मकथा संस्मरण और आलोचना की डगर पर
बहुत कुछ जो औरों के लिए अजाना था

मगर सब कुछ के बावजूद
कविता है कि कभी खत्म नहीं होती
कि वह हर साँस हर बड़बड़ाहट हर बुदबुदाहट में है उसकी

हाँ, मैंने देखी है उसकी खदबदाहट  
और भीतर का वह कबाड़ भरा अँधेरा कारखाना भी
जहाँ हर वक्त चलती है खुट-खुट-खुट
जैसे हमारी सृष्टि का कोई आदिपुरुष 
अपनी सर्वोत्तम रचना में जुटा हो

और फिर शब्दों के उस कबाड़ में से 
एकाएक निकलकर आती है
एक दमकती हुई पुरजोर कविता
जिसमें समय की आँधियों की गूँजें और आर्तनाद है
बेसब्र चुनौतियाँ भी
अन्याय के खिलाफ खौलता हुआ गुस्सा
और किसी कमजोर के कंधे पर रखा हुआ 
आश्वस्ति भरा हाथ

मन और इरादों की गरमाहट से भरा वह हाथ 
जो कुछ नहीं कहता
पर भीतर की चुप्पियाँ कह देता हैं
कि हाँ, मेरे दोस्त, मेरे प्यारे भाई, 
मेरी हर कविता तो तुम्हारे ही लिए है
मेरे हर शब्द की पुकार तुम्हारे, सिर्फ तुम्हारे लिए
लड़ाई का जयघोष!

और अगले पल फिर वह चुपचाप 
अंबाला की उदास सड़कों पर टहलने निकल पड़ता है
जहाँ उसने हवा से बातें करते हुए
कसमें खाई थीं कविता के साथ पूरी उम्र गुजारने की

उसकी मीठी जुबान से प्यार बरसता था
और यह प्यार उसने सबको बाँटा
शब्दों की दुनिया के किसी नौसिखिए से लेकर उन सबको भी
जो कबीर की तरह लिए लुकाठी हाथ निकले थे...
जिन्होंने अपना सब कुछ जलाया था 
एक खूबसूरत दुनिया की नींव बनने के लिए

सबके लिए बरसता था उसकी मीठी जुबान का प्यार
पर सबसे ज्यादा कविता के लिए
जिससे उसे इश्क था बेपनाह
और जिसके साथ उसने ताउम्र 
जिंदगी गुजारने का फैसला किया था

मैं जब-जब उसे पढ़ता था
मैं जब-जब उससे मिलता था
मैं जब-जब उससे बातें करता था
फोन पर सुनाई देती थी जब भी उसकी शहद घुली 
दोस्ताना आवाज
मैं उसका हाथ पकड़े 
लाहौर और अंबाला की उदास सड़कों पर 
भटकने निकल पड़ता था

वहाँ उसके कच्चे किशोर कदमों की शिनाख्त के साथ ही
मुझे मिल जाता था करवटें लेता एक सपना
और एक जुनून भी, जो उम्र भर उसके साथ रहा
शब्दहीन बेचैनियों की शक्ल में

कल रात जब लिखने बैठा उस पर 
चंद सतरें कुछ आड़ी-तिरछी सी
मेरे कदम फिर अंबाला की सड़कों पर निकल गए

वहाँ एक कालेज के सामने चायघर में वह बैठा था
हाथ में एक किताब लिए
किताब खुली थी
पर आँखें उसकी चायघर की दीवारों के पार
किसी अंतहीन आकाश को टटोल रही थीं

मुझे देखकर वह उठा
मिलाया हाथ...
और जब चलने लगा तो उसने मेरी आँखों में देखा
बड़े विश्वास से

अभी तो बहुत कुछ लिखना है दोस्त
अभी बहुत कुछ है अधूरा
जिसे पूरा करना ही चाहता हूँ जाने से पहले—
उसने कहा।

हाँ, होगा, वह जरूर होगा पूरा निंदर
मैंने उसके कंधे पर रखा हाथ यकीन से
उसने अपने हाथों में मेरा हाथ लिया
और हम विदा हुए...

रात सोने से पहले मैं फिर से सोच रहा था
निंदर से अपनी ताजा मुलाकात के बारे में
कि तभी भाई नरेंद्र मोहन का फोन
मनु जी कैसे हैं,
शब्दों में जैसे झर रही हो मिठास

अच्छा हूँ, अभी-अभी निंदर से मिलकर लौटा हूँ
कहा मैंने तो हँसे—खूब हँसे नरेंद्र मोहन
इतनी जोर की हँसी कि उसका प्रकंप
मेरे मोबाइल को भी थरथरा रहा था

हँसते रहे वे
हँसता रहा मैं भी देर तक
हँसी का एक समुद्र था वह
जिसमें खो गए थे वे, मैं भी
खो गईं दिशाएँ तलक...

बच रहा था बस निंदर
उसी तरह लाहौर, दिल्ली और अंबाले की सड़कों पर घूमता हुआ
उदास

उसे पूरी करनी थीं अभी कई अधूरी पड़ी कविताएँ
और मंटो के टोबा टेकसिंह पर कोई ऐसा 
दर्द भरा आख्यान
जिसे चाहकर भी अब तक वह लिख नहीं पाया था
लेकिन जाने से पहले उसे जरूर पूरा कर जाना चाहता था।
**


(2) आप मेरे हीरो हैं बल्लभ जी
(सुप्रसिद्ध कथाकार बल्लभ सिद्धार्थ की स्मृति में लिखी गई कविता)

हाँ, सच्ची कहता हूँ बल्लभ जी
आप मेरे हीरो हैं, मेरी अतृप्त आकांक्षाओं 
का आकाश
मेरा अधूरा सपना भी...!

एक लंबा सिलसिला है, कहाँ से शुरू करूँ
समझना मुश्किल
मगर जिंदगी भर आपको हिम्मती कदमों से आगे बढ़ते देख
पीछे-पीछे चलता रहा हूँ मैं यों ही कदम-दर-कदम
कूच-दर-कूच-दर-कूच अपार उत्सुकता से रोके साँस
जाने कितनी अनाम पगडडियों, रास्तों पर
चलता आया हूँ एक पागल उत्साह में

पार किए जाने कितने झाड़-झंखाड़, हाड़ कँपाते जंगल 
शहर आलीशान ऊँची नाक वाले 
विचित्र रहस्यों में लिपटे वे कस्बे और छोलदारियाँ
जिनसे आपने कहानियाँ बटोरीं
और यों ही चलते-चलाते बरस-दर-बरस
कब हुआ बूढ़ा कुछ पता ही नहीं

यों पार कर लिए मैंने अपने जिंदगी के पूरे तिहत्तर बरस
फाँद लीं तिहत्तर सीढ़ियाँ
जलती आग और लपटों में झुलसते हुए

और अब आप मेरे सामने खड़े हैं बल्लभ जी
उतने ही ऊँचे उतने ही विकट और दुष्प्राप्य 
जैसे कि तब थे
जब पहली बार मैंने देखा था आपको
आज से कोई पचास बरस पहले कुरुक्षेत्र जूनावस्टी के
रिसर्च स्कॉलरों वाले टैगोर हॉस्टल में 
जहाँ मैं था अपनी अज्ञात लड़ाइयाँ लड़ता हुआ
एक आविष्ट ब्रहमराक्षस मुक्तिबोध का-सा
छाती में प्रकंप हर घड़ी हर दिन एक इतिहास
और एक जिद कभी किसी भी क्षण फाँसी पर झूल जाने की 
इंकलाबी भगतसिंह की तरह

और फिर मिले आप
कि जैसे मिलता है कोई बल्लभ सिद्धार्थ
किसी बल्लभ सिद्धार्थ से
नाम उसका प्रकाश मनु हो या बल्लभ फर्क क्या पड़ता है

न भूल सका मैं कभी बल्लभ जी, वो मिलना आपसे
धधाकर छाती
और न पानदार हँसी आपकी कुछ रहस्यमय कुहरीली सी
और न पहली भेंट का वह जादू
जिसने खोल दिए मेरे अंतस के बंध सारे, भीतर की
अनाम गुहाओं के द्वार और कड़ियाँ
टूटती गईं हथकड़ियाँ सारी और देखा मैंने
एक नई रोशनी में नहाया सा खुद को

और चिल्लाया खुशी में ऊभ-चूभ होकर
चिल्लाया मैं
खुली हवाओं में दौड़ता नंगा आर्किमिडीज
कि हाँ-हाँ-हाँ मैं लेखक हूँ 
जीना है मुझे लेखक की तरह मरना लेखक की मौत
कि जैसे मेरे सामने बैठे हैं ये बल्लभ सिदार्थ
ब्रजेश भाई के बड़े भाई हैं तो मेरे भी तो कुछ हुए न!

तब से आप मेरे बड़के भाई हुए बल्लभ जी, मेरे गुरु मेरे गाइड
और मैं छोटा भाई जरा उद्धत जरा अधीर 
भटकता किसी अतृप्त आत्मा सा इस धरती पर
और यों जेठा भाई और छोटा भाई का यह किस्सा चलते-चलाते 
हो गए कोई पचास बरस
पुरानी हुई समय की किताब पन्ने पीले बदरंग 
मगर अब भी इसमें बड़ी जान है...!

और आप भी अकेले कहाँ थे बल्लभ जी,
आपमें शामिल थी आपकी महापुरुषों की वापसी
आपमें खदबदाता तकलीफों भरा ब्लैक आउट इमरजेंसी का
आपके वे लंबे बीहड़ साहित्यिक पत्र वे डायरियाँ
जलती हुईं अंदर के ताप से
लिखी गईं आपके छोटे से टाइपराइटर पर 
और दुनिया के महानतम लेखकों की जीवन गाथाएँ
अनुवाद लाजवाब विश्व साहित्य के
जिनमें अपने आपको भी अंदर तक पिरो दिया था आपने

गरज यह कि आप और आप और आप और बस आप
कि आपका सब कुछ धँसा पड़ा है मेरे अंतस में बल्लभ जी
किसी अधटूटे तीर की तरह,
और पहली बार...पहली ही मुलाकात में मेरे सामने बैठा था 
शानदार शख्सियत वाला मेरा हीरो
जिसे मैं न जाने कहाँ-कहाँ ढूँढ़ा किया 
न जाने किस-किस गली-कूचे प्रांतर में हर घड़ी हर पहर
दौड़-दौड़कर भागता रहा यहाँ से वहाँ और वहाँ और वहाँ
किसी पगलाए कबीर किसी सुकरात की तरह

बस, मुझे यही बनना है, यही—यही...बिल्कुल यही
मैंने कसम खाई थी उस दिन माँ सरस्वती के आगे झुकाए सिर
कँपकँपाते होंठों से

कि आप थे हर हाल में मुझसे ऊँचे और बड़े और विशाल
किसी छतनार दरख्त की तरह
जिनसे मैं सीखता था, और बहसता पागलों की तरह 
फिर भी झोली भर-भरकर पाता था बहुत कुछ
और आपके जाते ही इंतजार शुरू हो जाता था मेरा बेकली से 
कि अब कब आएँगे बल्लभ जी
फिर से कुरुक्षेत्र जनावस्टी में मिलने मुझसे और ब्रजेश भाई से
और न आते तो एकांत में आपसे लड़ता-भिड़ता, झगड़ता बदहवास
कहीं बल्लभ जी को मैंने नाराज तो नहीं कर दिया

कैसे कहूँ कि मेरी पूरी कथा
आपसे लड़ने भिड़ने और आपसे पेम करने के बीच 
कहीं अटकी फँसी है बल्लभ जी

बहुत बार अकेले में ही आपसे लड़ते गुत्थम-गुत्था हुआ हूँ
कि जैसे किसी आदमकद शेर से गुत्थमगुत्था हुआ कोई नया उत्साही 
छोकरा कसबे का
मेरा टॉलस्टाय मेरा गोर्की मेरा दोस्तोवस्की मेरा पुश्किन सब आप ही थे
आपके जरिए जहाँ-जहाँ पहुँचा वहाँ खुलते गए द्वार

कल भी मेरे हीरो मेरा अधूरा स्वप्न मेरी अतृप्त लालसा के शिखर 
आप ही थे बल्लभ जी, और आज भी...
रहेंगे तब तलक जब तक मुझमें जान है और जारी रहता है 
यह जानलेवा सफर

जानता हूँ, कि जैसे आज नहीं हैं बल्लभ जी आप 
इस दुनिया में
न रहूँगा मैं भी कल किसी मोड़ पर
निकलेगी आखिरी साँस और मैं जाऊँगा अचानक तोड़कर सारी डोरें

मगर तब भी चलते रहेंगे तसव्वुरात में आप 
आगे-आगे और आगे
उमगते कदमों से मुठभेड़ करते अपने समय और समय के
अदीबों और नुकीले सवालों से

चलता रहूँगा पीछे-पीछे मैं भी किताबों से भरा अपना भारी 
झोला उठाए
सिर पर रखे चिंताओँ का पहाड़
कदम-दर-कदम-दर-कदम
कूच-दर-कूच-दर-कूच
नई-नई मंजिलों की तलाश में
और सफर यह जारी रहेगा

चाहता हूँ कि जिस दिन भी हो अंत इस सफर का 
आप मेरे सामने हों बल्लभ जी
मेरे हीरो, मेरे अधूरे स्वप्न मेरी अतृप्त लालसा की प्रतिमा सरीखे
मेरे नायक दुष्प्राप्य 
और मैं आँखें मूँद लूँ तसल्ली से
कि मेरा चुनाव गलत न था...
मेरा हीरो इतना ही बडा और सचमुच बड़ा था
जितना बड़ा किसी प्रकाश मनु का हीरो होना ही चाहिए था
इस हर्फों की दिक्काल व्यापी दुनिया में!
**


(3) दिविक का घर
(दिविक रमेश की कविताएँ पढ़ते हुए)

वहाँ चक्की पीसती माँ की पिराई देह
का दर्द है
दर्द उस स्त्री का जो हर बार हालात की मार खाकर
अपने बच्चों को छाती से चिपकाए रोती और गाती 
 एक साथ है
कि बच्चे होने के साथ ही उसके पंख कट गए हैं
और वह नहीं जानती कि सपने कैसे देखे जाते हैं
और कैसे उतरता है बसंत जिंदगियों में

वहाँ सिर झुकाए काम में लगे बेबस पिता
की थकी लड़ाइयाँ और लाचारी है
जिनके रास्ते खो गए हैं
और वे जानते हैं कि हल में बैलों की जगह खुद को जोत दें
तो भी नहीं जीता जा सकता यह जिंदगी का समर

वहाँ हारा-थका रामसिंह है नशे में धुत्त बड़बड़ाता सा
जिसे रात के सन्नाटे में अकसर अपना खेत बुलाता है
बार-बार दौड़कर पगलाया सा खेत की परिचित उँगलियों और
माथे और चौड़ी छाती को टोहने की कोशिश करता है रामसिंह
और लड़खड़ाकर दूर जा गिरता है
और समझ नहीं पाता कि जिस खेत को उसने लहू और पसीने 
से सींचा था बरसोंबरस
जलाई थीं हड्डियाँ
अब वह एकाएक सभ्य सलीकेदार शहर हो गया है
और किसी गँवई रामसिंह से उसका कोई मेल नहीं रहा

दर्द और दर्द 
और दर्द का घर है वह घर
जो दिविक की कविताओं का घर है 

दर्द अकेले आदमी के और-और अकेले होते जाने 
की विवशता का
दर्द सारी राहें खो जाने पर फिर-फिर
नई राह खोजने की यंत्रणा का 
दर्द बेबस थके-हारे पिता, कलपती माँ
और मनुष्य से एक दर्जा नीचे जीने की 
बहुतों की नियति का
जिनमें बहुत थी इनसानियत
पर जिन्हें गलत बाटों से तोला गया

2
दिविक का घर है
दर्द और दर्द और दर्द का घर
उस घर में टीस है गहरी गाँव में रहती बीमार 
और अशक्त माँ की
जो कभी-कभी शहर में आती भी है तो कोई टेर फिर-फिर
बुला लेती हो बूढ़े थके पैरों को वापस उसी गाँव में
जिससे नाता है पुराना स्मृतियों का
जिन्होंने अब एक जाला सा बुन लिया है मकड़ी सा
और माँ उससे छूट नहीं पाती

दिविक का घर है उनका उनका और उन सबका घर
जिन्हें जिंदगी भर हड्डियाँ घिसने के बाद भी
मिला नहीं घर
और फटी-फटी आँखों से देखते हैं जो मुड़कर
अपनी जिंदगी का महाभारत
 
वह घर उनका उनका और उन सबका घर है
जिनके दिल खुले हैं
और जो दीवारों के पार जाना चाहते हैं

वहाँ अन्याय से भिड़ने का जोखिम है
और उनसे भी जो शातिर हथकंडों से
अकेले मंच पर कब्जा जमाए बैठे हैं
बाकी सब को भीड़ में बदलते हुए

वहाँ सवाल हैं
और सवाल उनसे भी हैं
जो कल तक सवालों से ऊपर समझते रहे खुद को
भारी गद्दों पर थपाथप करते
हँसते हुए बेहियाई हँसी

वह एक घर जैसा घर है
जिसमें मनुष्य रहते हैं दिलों में थोड़ी सी आर्द्रता लिए
और आँखें हिकारत से नहीं देखतीं किसी को
कि तू क्या है
 
वहाँ यह खुशी नहीं कि पानी है इस घर में
बेचैनी इस बात की है कि जहाँ पानी नहीं है
वहाँ क्यों पानी नहीं है
कि उनके हिस्से का पानी कौन लील जाता है
और उसे महसूस क्यों नहीं कर पाते वे
जिनके घरों में पानी है पानी
की बरबादी तक

उस घर में घर का सुख है
पर उन-उन की पीड़ा भी अंदर तक कसकती हुई
जिन्हें रातोंरात खदेड़ा गया अपने घरों से 
और अब हवा में काँपते थरथराते तंबू ही
उनकी पहचान हैं वजूद भी

3
दिविक का घर है
और घरों से कुछ अलग एक घर
जो गाने लगता है अकसर ऊँचे सुर में
गुलाम देश के मजदूरों का गीत
जो रात को इसलिए फिर से अपने-अपने दड़बों में आते हैं
ताकि कल फिर से हाथ बाँधे हाजिर हो सकें वहाँ
जहाँ दिन भर खटने की मिलती है उन्हें आधी रोटी
और एक तंग अँधेरी जिंदगी

वहाँ समंदर है एक नीला अंतहीन 
जो भी देखता है उसकी आँखों में नील बनकर उतर आता है वह
बन जाता है ताजिंदगी कभी न खत्म होने वाला
युद्ध गहरी बेचैनी और तकलीफों भरा

यहाँ तक कि आदमी के सपनों में 
उतर आता है समंदर
और उसकी लड़ाइयाँ फिर कभी खत्म नहीं होतीं 
कभी खुद से कभी उन-उन से
जिनके कब्जे में है बहुतों का भविष्य
और वे जब चाहे कल की गर्दन मरोड़ सकते हैं
 
4
दिविक का घर है कुछ-कुछ मेरा तुम्हारा
और हम सबका भी घर
उस घर में ढँढ़ो तो नजर आ जाता है
फटे आसमानों में अस्तित्व ढूँढ़ता एक आदमी
जो शायद दिविक हैं
पर शायद कुछ मैं भी हूँ

उसी घर में मेरी मुलाकात हुई चेहरे पर मीठी सलवटें लिए
शमशेर और त्रिलोचन
और नाजिम हिकमत के उस मासूम बच्चे से भी
जो था दुनिया का सब से खूबसूरत बच्चा
जिसे बड़े होकर बदलनी थी यह सारी दुनिया
और जीतनी थीं सब हारी हुई लड़ाइयाँ

उसी घर में एक रोज देखा मैंने
बूढ़े मल्लाह को किनारे बैठने को कह
खुद नाव खेता आदमी समंदर की तड़पती लहरों में
जो देखना चाहता था शायद लहरों का जोर दर्प और तड़पन भी
और टकराना चाहता था सबसे
अपनी भयमुक्त यात्रा में

कुछ और करीब जाकर पढ़नी चाहीं मैंने
उस नाव खेते आदमी की आँखों की कोर में छुपी पीड़ा
और चेहरे की बनती-मिटती लकीरें
पहचाना मैंने, यह शायद दिविक हैं
पर कुछ मैं भी हूँ 

दिविक का घर है दिविक की कविताई का घर
दिविक का घर कुछ मेरा घर भी है
रोज वहाँ जाकर दिन में एक बार तो जरूर ही
थप-थप करना मुझे अच्छा लगता है

दिविक के घर जाना सुकून देता है मुझे
आज के बुरे वक्तों में कुछ और कुछ और
मनुष्य हो पाने का सुकून
और इससे बड़ा सुकून तो शायद कुछ होता नहीं है

इसीलिए दिविक का घर है कुछ मेरा भी घर
जहाँ रोज जाना मुझे अच्छा लगता है
**


(4) जे.पी. को याद करते हुए

कितना कुछ बदल गया है...
यों वही भुतहा जंगल है वही आदमखोर झाड़ियाँ
जिंदगी और मौत के बीच किसी सलीब
पर लटके ठंडे लोग
वही रात, वही तूफान, वही बेसब्री

लेकिन कायर चुप्पी के खिलाफ दहाड़ता
वह बूढ़ा शेर नहीं 
रात में हर सिर पर लटके खंजर के बावजूद
भीतर का हरापन टटोलने वाली
दो आर्द्र आँखें नहीं हैं

इसके बजाय वक्त है—
जंगल में काली शिला की तरह उगी हुई
इस बेहद सख्त ऊब को वक्त अगर कहा जाए,
और कटा और छिला यह वक्त
लहू उगलता है मुँह से हर साँस के साथ

देखते ही देखते चीजें किसी गोल चक्करदार
घेरे में घूमने लगती हैं
लगातार चलते हुए भी शव की तरह
बेजान लगती है सड़क
गलियाँ चौरस्ते पस्त, हताश
पगडंडियाँ बलात्कृत लड़कियों सी

लाउडस्पीकरों पर प्रवचन करते
निजी सुख में औंघने लगती है आस्था
और कागज के रंगीन पुलिंदे फेंके जाते हैं 
भूख पर—भूखे आदमी की बेबसी पर
ठठाकर हँसते हुए निश्चिंत

कहाँ है उस बूढ़े शेर की
खतरों में सिर देकर जूझती जवान आस्था
दर्द को दर्द से राह देकर एक और सूरज उगाने 
की चिंता—
नहीं, कहीं नहीं बची अब
नंगी छाती पर सबका सब झेलने और टूटने की ताकत

यहाँ तो हर तरफ चरित्र को कुरसी में
और आदमी को एक ढक्कनदार खोल में
बदलने की साजिश है
इस सबके बीच एक रसीला सुविधाजीवी नाटक है
प्रजातंत्रीय महाभोज का

लगातार चलता रहता है यह महानाटक
और इतनी चतुराई से परोसा जाता है भाषण
कि रोज किसी जिंदा आदमी की बलि पर
आदमी बजा देते हैं तालियाँ

नाटक का असली दृश्य वह है जहाँ पसीना गिराते 
कंधे हैं झुके हुए
कंधों पर कुछ और कंधे हैं छिले हुए
कंधों पर कुर्सियाँ हैं 
कुर्सियों पर सिंहासन
सिंहासन के आगे खीसें बाए सफेदपोश केंकड़े
खड़ताल बजाने की मुदा में हैं

किसी खास इशारे पर झूठे वक्तव्यों का फेन
उगलने लगती है राजनीति,
हें-हे-हें से शुरू होकर खत्म होती है बहस
हाँ-हाँ-हाँ पर

कोई मदमस्त उल्लू कलामुंडियाँ खाता है अपने कोटर में
और हर दर्द मजाक बन जाता है...
कि जैसे एक घिसा हुआ चुटकुला बन गई है जनता
अपने देश में...!

उधर खेतों फसलों झोंपड़ियों और मवेशियों को चौपट करता
कमर तक आ गया है दर्द
साँप की तरह फन पटकते पानी में
सिरों पर बड़ी-बड़ी पोटलियाँ उठाए
किसी अज्ञात दिशा में भाग रहे हैं लोग
भागते-भागते लपलपाते वक्त की जीभ में घुलकर
जाने कब खत्म हो जाते हैं...

मगर लोगों का मरना
केवल कुछ संख्याओं का गुम हो जाना है मेरे देश में
कभी किसी चेहरे पर कोई दर्द कोई पछतावा नहीं
अपने ही भाइयों बेटों की मौत
बेटियों के इस कदर रौंदे जाने पर

कितना बदल गया है वक्त का चेहरा
कितनी काली पड़ गई हैं उसके माथे की लकीरें

यों वही झाड़ियाँ हैं वही जंगल वही लोग
उजड़े हुए किसानों का फटा दर्द
जली हुई झोंपड़ियों का हाहाकार
मगर नंगी तलवारों के खिलाफ यहाँ से वहाँ तक मोरचा सँभाले
दहाड़ता
बूढ़ा शेर नहीं है

क्रांति के नक्शे की ओर इशारा करती
बाघ की जलती हुई दो हरी आँखें नहीं हैं
और सचमुच कुछ नहीं है
कहीं कुछ नहीं है!
**

545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008,
चलभाष: 09810602327,
ईमेल: prakashmanu333@gmail.com

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