काव्य: नरेश अग्रवाल

नरेश अग्रवाल
अतिरिक्त

सभी के पास सीमित होता है
माँ के पास हमेशा कुछ न कुछ अतिरिक्त
ढकने के लिए बड़ी चादर
कभी न थकने वाले चुंबन
अतुलनीय स्वाद भरने वाली अंगुलियाँ
वह खड़ी रह सकती है घंटों
सूरज की रोशनी में भी अधिक देर तक
उसके पास
सृष्टिकर्ता से भी अधिक रुचि
बच्चों को गढ़ने और निखारने की
एक वेग है उसमें
सभी चीजों को आसानी से सँवारने वाला
उसके लिए कोई पड़ाव नहीं
न ह्रास ऊर्जा का
वह एक मातृत्व का ग्रह है
अपने में सभी को समाए हुए
सीमा पास दिखते हुए भी निस्सीम
विस्तार लेते हुए हमेशा अतिरिक्त
***


क्यों

दुकानों में बच्चों के माप का
सेफ्टी हेलमेट क्यों?
सेफ्टी बूट क्यों?
ऐसे ही उनकी माप के
दूसरे सामान क्यों?
कहीं लोगों का दिमाग
खराब तो नहीं हो गया
उनकी सोच तो नहीं मर गयी
वे बच्चों से खदानों में काम कराने लगे
संकरे रास्तों में भेजने लगे
कम तनख्वाह देने के लोभ में
इनकी ओर हाथ बढ़ाने लगे
क्या यही सब कारण तो नहीं
इन लटकते सामानों के पीछे
जो बेचे जा रहे हैं खुलेआम
अभी-अभी एक बच्चे ने इसे पहना है
दूसरे कई पहन रहे
सभी हो रहे तैयार
हेडलाइट भी लगा ली है
सामने खड़ी है बस
स्कूल नहीं
कहीं ओर ले जाने को
***


कोशिश जानने की

अचानक मुझे बुरा बना दिया
इतना बुरा कि
आदमी से धातु में बदल गया
अब यही है मेरी काया

उन्हें हृदय नहीं चाहिए
न ही प्रेम
केवल हाथ चाहिए
हर वक्त काम करने वाले
पाँव निरंतर चलने वाले

एक रोबोट की तरह बना कर
सारा खून चूस लिया मेरा
थोड़ा सा ही बचा पाया
किसी तरह से आंखों में
उसी से तुम्हें देखता हूँ
आँखों में आँखें डाल कर
कोशिश करता हूँ जानने की
तुम में भी यह प्रेम बचा है या नहीं?
***


पहाड़

हाँ पहाड़ भी मरते हैं
थोड़ा-थोड़ा करके हर दिन
चोटी से नहीं, आधार से
खोदे जाते हैं चूहों की तरह
बिल बनाने नहीं
इसकी देह मिटाने के लिए
हर दिन भेदा जाता
इनके पत्थरों को, मिट्टी को
गायब किया जाता अवशेषों को
ट्रक के ट्रक आते
फिर कहाँ जाते
यह किसी को नहीं मालूम
हर दिन पहाड़ की
ऊँचाई थोड़ी नीची
दूसरे दिन और नीची
एक दिन बौना सा दिखता है
फिर बौना भी धँसा हुआ
अब उसे कोई नहीं छूता
यह बँट चुका होता है
टुकड़ों में
***


लूटने का तरीका

जिसने मेरा काम छीना था
मन में आता है
उसे घूँसा मारकर मौत ही दे दॅूं

मुझे तो उस वक्त मामूली कपड़े ही मिले थे
उसे तो सूट और टाई भी
मैं तो अपनी चाय खुद लाता था
उसे तो देने वाले कई लोग

मुझे तो हमेशा डाँट मिली
उसके पास दूसरों को डाँटने का अधिकार था

सारी बातों को यदि याद करूँ तो
वर्षों तक हुआ था मेरा तिरस्कार
मुझे केवल मिट्टी समझा गया
और कंपनी के लिए भार

हर एक नौकरी में ऐसा ही हुआ
एक ही बात का दोषारोपण था मुझ पर
मैं पुराने ढंग से काम करता हूँ

जबकि बाजार बदल चुका है
इसे लूटने का तरीका मुझे नहीं आता!
***


स्वर्ग नहीं उतरता यहाँ

हर झोंपड़ी में लालटेन जल रही
हर झोंपड़ी में चूल्हा जल रहा
हर झोंपड़ी से धुआँ निकल रहा
थोड़ी-थोड़ी रोशनी घर के बाहर
धीमी-धीमी बातचीत हर द्वार पर
गलीनुमा रास्ता चारों ओर
कहीं बिल्ली तो कहीं कुत्ते बैठे हुए
बचाखुचा पाने की आस में
अंधेरा ढके हुए सभी की छत को
अनेक खाना खा रहे हैं
अनेक बैठे पकने के इंतजार में
छोटी-सी जगह यह, छोटा-सा समूह
श्रमिक-ही-श्रमिक चारों ओर
सुगंध-ही-सुगंध रोटियों की
थकान-ही-थकान हर शरीर में
मालूम नहीं फिर भी क्यों
कभी स्वर्ग नहीं उतरता यहाँ
***


माँ की जिम्मेदारी

माँ भले सोचती होगी
इस धरती में वह मेहमान
कभी भी छोड़नी पड़ सकती है दुनिया
लेकिन हम बच्चों को समझती है
अपना मेहमान
हर पल हिफाजत में रखती
हर पल हमारा पसीना पोंछती
हर पल झाड़ती शरीर से धूल
सबसे शुद्ध घी से पकवान बनाती
दूध पिए बिना सोने नहीं देती
कभी नहीं कहती अपनी बीमारी के बारे में
न ही बहाती आँसू
केवल हमारे पोंछती
हमेशा उसकी छाया में रहने वाले
हम बच्चों को नहीं पता
उसके जाने के बाद
हम भी हो जाएँगे मेहमान
इस धरती के
फिर निभानी होगी जिम्मेदारी
माँ जैसी ही अपने बच्चों के लिए!
***


सहारा

घर की दीवारों को
जब देखता हूँ
खुश हो जाता हूँ
जैसे माँ इनके सहारे बैठी हो

उसकी आदत ही
हमेशा दीवारों के सहारे बैठे रहने की
बैठे-बैठे कुछ न कुछ करने की
बैठे-बैठे ही मुझे गोद में खिलाया
पाला भी इसी तरह
अब बातें भी करती है इसी तरह

मालूम नहीं
दीवारों के साथ वह कैसे जुड़ी हुई
दीवारों में वह क्यों दिख जाती
कहीं ये दीवारें पृथ्वी तो नहीं
बरगद का तना तो नहीं
विशाल स्तंभ तो नहीं

इन सब से मिलता है मुझे भी सहारा
माँ अक्सर दिख जाती है
अकेला होता हूँ जब मैं चिंता में
ढूंढ रहा होता हूँ कोई सहारा
***


माँ सोचती है

बच्चे की आँखें देखकर माँ सोचती है
यह खगोल शास्त्री बनेगा
जो हमेशा दूर की चीजें देख लेता
कभी सोचती वह मीठा बोलता है
शायद लोगों की सेवा करने के लिए बना है

कान उसके बहुत तेज
मरते आदमी की धड़कन सुन लेते हैं
जरूर वह हृदय का डॉक्टर बनेगा
नहीं वह बहुत तेज दौड़ता है
शायद धावक बनेगा
स्वर्ण पदक दिलाएगा देश को
इतना ही नहीं
हाथों में उसके बहुत बल है
उसका सीना भी बहुत चौड़ा है
किसी सैनिक की तरह
उतना ही चौकन्ना है
कभी दुर्घटनाओं को पास नहीं आने देता
क्या पता सेफ्टी-ऑफिसर बनेगा
तरह-तरह के सपने देखती है माँ
बच्चा तो हमेशा फूल की तरह
कभी कांटे नहीं उग सकते उसमें
हमेशा खुशी से प्रफुल्लित
हाँ होते हैं उसमें बीज बहुत सारे
शायद माँ उन्हीं के बारे में सोचती है
***


मृत्यु

जब अपना घर हो तो
अस्पताल में मृत्यु क्यों भला?
यही तो उसकी इच्छा थी
लेकिन डाक्टरों ने कभी जवाब नहीं दिया
हर दिन कहा स्वस्थ होकर लौटेगी

उसकी अथाह देखभाल
के बाद भी
नतीजा अंततः शून्य

मालूम था उसे कि मृत्यु होकर रहेगी
मालूम था उसे
वह कभी घर न जा सकेगी

जिस कमरे में बच्चों को जन्म दिया था
उसमें मरने की इच्छा
अधूरी ही रही
जन्म देने वाली जगह
न दे पायी मृत्यु को आश्रय
***


माँ याद आई 

मैंने जब ओस की बूंदें देखीं
घास की नोंक पर
माँ याद आई

पौधों को फूलों से लदे देखा तो
माँ याद आई

एक बच्चे को सजे-धजे
स्कूल जाते देखा तो माँ याद आई

हर सुंदरता में दिखा उसका रूप
जैसे उसका प्यारा चेहरा
मुझे ही देख रहा हो

कहीं भी उससे छुटकारा नहीं
आकाश में भी दिख जाती है
नदी के बहते पानी में
पिघलती हुई बर्फ में भी

सोचता हूँ
हकीकत में मेरी माँ बूढ़ी है
बूढ़ी और झुर्रीदार
लेकिन उसकी झुर्रियाँ भी
कितनी खूबसूरत
बरगद से फूटती जटाओं की तरह
अपनी मजबूती का
हर पल आभास देती हुई
***

कविताओं पर 11 पुस्तकें तथा अन्य विषयों पर 8 पुस्तकें प्रकाशित।
निवास: जमशेदपुर  
दूरभाष: 9334825981, 7979843694
ईमेल: nareshagarwal7799@gmail.com

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