डॉक्टर स्मरजीत जैना: एक चिकित्सा-विज्ञानी ऐसा भी

प्रेमपाल शर्मा


  देश-समाज के कुछ ऐसे नर-रत्न असमय ही कोरोना महामारी की भेंट चढ़ गए, जिनसे पैदा हुई रिक्तता को कभी भरा नहीं जा सकता। उन्हीं में से एक थे—भारत में यौनकर्मियों के अधिकार आंदोलन के प्रणेता और महामारी विशेषज्ञ, वैज्ञानिक चिकित्सक डॉक्टर स्मरजीत जैना। मेरे मित्र अंगद शर्मा के वे गुरु थे, फोन पर कभी-कभी मेरी भी उनसे बात हो जाया करती थी। डॉ. जैना हमेशा आग्रह किया करते थे कि शर्माजी के साथ कभी कोलकाता आइए। सो कोरोना की धीमी होती रफ्तार के बाद 23 फरवरी, 2021 को कोलकाता में उनसे भेंट का सुयोग बना। पूरे एक सप्ताह उनके साथ रहकर किए एक साक्षात्कार में मैंने उनकी जीवन-कहानी को विस्तार से सुना और फिर उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर मेरा एक पुस्तक लिखने का विचार बना था। जुलाई में हमें उनसे दोबारा मिलना था, पर कोरोना की दूसरी लहर ने 8 मई, 2021 को उन्हें हमेशा के लिए हमसे छीन लिया। उस दिन जब मेरे मित्र ने सुबकते हुए फोन पर मुझे बताया कि भाई, डॉ. जैना नहीं रहे तो मैं सन्न रह गया। हाय विधाता! मजदूर, उपेक्षित, दीन-दुखियों के मसीहा को छीनकर उन पर ऐसा वज्रपात क्यों किया?

एक ख्यातिप्राप्त एपिडेमियोलॉजिस्ट एवं सोशल कम्युनिटी मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ. स्मरजीत जैना ने जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी, मिशिगन यूनिवर्सिटी, वाशिंगटन यूनिवर्सिटी तथा अन्य कई विदेशी यूनिवर्सिटीज के साथ अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर लंबे समय तक कार्य किया। वे भारत में एचआईवी/एड्स नियंत्रण परियोजना के निदेशक, कलकत्ता के सोनागाछी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्‍थान में वैज्ञानिक चिकित्सक के रूप में कार्य करते हुए भारत में यौनकर्मियों के अधिकार आंदोलन के प्रणेता बने। उन्होंने कलकत्ता की बदनाम बस्तियों में यौनकर्मियों के बीच रहकर सबसे सफल एचआईवी/एड्स नियंत्रण कार्यक्रम विकसित किया।

अपनी योग्यता और क्षमता के बल पर डॉ. जैना सन् 2012 में कोलकाता में आयोजित 19वें अंतरराष्ट्रीय एड्स सम्मेलन के अध्यक्ष बने। उन्होंने बिल गेट्स एवं मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के भारतीय चैप्टर के सदस्य के रूप में काम किया। डॉ. जैना यूएन एड्स और यूएन एफपीए के तहत क्षेत्रीय भागीदारी फोरम के कार्यकारी सदस्य भी रहे। उन्होंने ‘आल इंडिया नेटवर्क ऑफ सेक्स वर्कर्स’ के गठन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारतीय ही नहीं, एशिया की यौनकर्मियों के सबसे बड़े संगठन ‘दुर्बार महिला समन्वय समिति’ (DMSC) की उन्होंने स्‍थापना करवाई और जीवनपर्यंत इसके मुख्य सलाहकार रहे। उन्होंने महिला, विशेष रूप से यौनकर्मियों के सशक्तीकरण के लिए ‘उषा’ मल्टीपर्पज कोऑपरेटिव लि. की स्‍थापना करवाई। सहकारिता के क्षेत्र में यह एकमात्र ऐसा आंदोलन है, जो यौनकर्मियों द्वारा चलाया जा रहा है। डॉ. जैना के मार्गदर्शन में यह आंदोलन श्रमिकों के सहकारिता के इतिहास में मील का पत्थर बन गया। आज पैंसठ हजार से ज्यादा यौनकर्मियाँ इसकी सदस्य हैं और इसका सालाना कारोबार पच्चीस करोड़ से ऊपर है। डॉ. जैना की उपलब्धियाँ अनगिनत हैं।

पीड़ित-शोषित, अभावग्रस्त की सेवा को ही ईश्वर-सेवा माननेवाले डॉ. स्मरजीत जैना का जन्म 21 जुलाई, 1952 को मिदनापुर जिले (प. बंगाल) के बौहुल्या गाँव में एक अत्यंत साधारण परिवार में हुआ। दादी के लाड़-प्यार के चलते उनकी स्कूली शिक्षा देर से शुरू हो पाई। उनके पिता सरकारी सेवा, यानी शिक्षा विभाग में थे, सो पिता के स्‍थानांतरण के चलते उनके स्कूल भी बदलते रहे। आलम यह रहा कि डॉ. जैना ने पाँचवीं कक्षा में ही स्कूल का मुँह देखा। शुरू से ही डॉ. जैना कैमिस्ट्री के प्रोफेसर बनना चाहते थे, पर गाँव में अच्छे डॉक्टर के अभाव में डिप्‍थीरिया से छोटी बहन की मौत हो जाने के कारण पिता के आग्रह पर डॉक्टरी की पढ़ाई करके वे एम.बी.बी.एस., एम.डी. डॉक्टर बने।

जब मैं पहली बार डॉ. जैना से मिला तो वे अपने कार्यालय की तीसरी मंजिल पर अपने कैबिन में कंप्यूटर पर काम कर रहे थे। पैंट के ऊपर सादा शर्ट, बिना कंघी किए सिर के छितरे बाल, तेज से देदीप्यमान चौड़ा ललाट, सामान्य मूँछें, सहज स्वभाव, पैरों में स्पोर्ट शूज, फीते खुले हुए, अपने प्रति लापरवाह से, अधेड़ावस्‍था को पार कर चुके इस नामचीन वैज्ञानिक डॉक्टर की सादगी ने मुझे अचंभे में डाल‌ दिया। अभिवादन के बाद हमें कुरसियों पर बैठाते हुए उन्होंने पूछा, यात्रा में कोई परेशानी तो नहीं हुई? फिर उन्होंने ब्लैक टी मँगवाई, डॉ. जैना ब्लैक टी ही पिया करते थे। चाय-पान के बाद बोले कि आज आप लोग थोड़ा घूम-फिर लो, कल से मैं आपको पूरा समय दूँगा और अपनी जीवन-यात्रा विस्तार से बताऊँगा। फिर पूछा कि खाने का कैसे रहेगा, इधर चपाती तो मिलता नहीं है। कार्यालय की कैंटीन में 20-25 लोगों का भोजन बनता है, आप चाहें तो दुपहर में यहीं भोजन कर लिया करें, पर ये लोग भी चपाती नहीं बनाता है; नहीं तो आप जैसा चाहें, कहीं भी भोजन कर लिया करें, हम उसका भुगतान कर देगा। फिर अपने ड्राइवर कन्हाई को फोन पर आदेश किया कि शर्माजी को आज बेलूड़ आदि घुमा लाओ। इतना ही नहीं, 67 वर्षीय डॉ. जैना तीसरे माले से पैदल सीढ़ियाँ चलकर हमें नीचे तक छोड़ने आए। अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त व्यक्तित्व इतना सहज-सरल भी हो सकता है, सहसा विश्वास नहीं होता, पर प्रसिद्धि से दूर रहने वाले डॉ. जैना ऐसे ही थे।

डॉ. जैना स्वभाव से ही परोपकारी जीव थे। जब वे कलकत्ता मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहे थे, तब बाढ़, तूफान, अकाल आदि प्राकृतिक आपदाओं के समय अपने सहपाठियों के साथ पीड़ितों की सहायता के लिए वहाँ जाकर राहत कैंप लगाया करते, जरूरत की चीजें, दवाइयाँ आदि राहत-सामग्री वितरित करते और करवाते थे। उन दिनों पुरुलिया जिला में पानी की कमी से भारी सूखा पड़ा तो जमीन ऊजड़ हो गई, अकाल के कारण चारों ओर भुखमरी फैल गई, तब डॉ. जैना ने अकाल पीड़ितों की मदद के लिए अपने सहपाठियों का एक ग्रुप बनाया, दो सप्ताह तक गाना-बजाना करके रुपया इकट्ठा किया और उन रुपयों से सूखा पीड़ितों की मदद की।
ऐसे ही आंध्र प्रदेश में ‘भोला’ नामक समुद्री तूफान ने भारी तबाही मचाई, तब डॉ. जैना अपनी टीम के साथ वहाँ जाकर राहत-कार्यों में जुट गए, खुद एक-एक ब्रेड पीस खाकर राहत-कार्यों में लगे रहे। बंगाल में कई इलाकों में बाढ़ आई, तब भी डॉ. जैना राहत-कार्यों में सबसे आगे रहे। सन् 1975 में देश में इमरजेंसी लगी तो मेडिकल कॉलेज की कैंटीन का ठेकेदार काम छोड़कर भाग गया, उस समय भी डॉ. जैना ने अपने सहपाठियों के साथ कैंटीन का काम सँभाला, यहाँ तक कि कभी बाजार न जाने वाले डॉ. जैना सब्जी मंडी जाकर सब्जियाँ खरीदकर लाते, मछली बाजार जाते, राशन की व्यवस्‍था करते; पचास-साठ विद्यार्थियों का खाना खुद बनाते, उन्होंने कॉलेज के हॉस्टल में रहने वाले विद्यार्थियों को कोई परेशानी नहीं होने दी। नेतृत्व का गुण उनमें जन्मजात था। अपने शिक्षा काल में उन्होंने हर प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं में आगे बढ़कर राहत शिविर लगाए, आम लोगों की परेशानियों को जाना-समझा।

दो टूक बात करने वाले डॉ. जैना को ठकुरसुहाती बिल्कुल नहीं सुहाती थी। यही कारण था कि उन्होंने कलकत्ता मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसरों की ज्यादतियों के खिलाफ छात्र-आंदोलन को नेतृत्व किया। वे किसी छात्र-संगठन में शामिल नहीं हुए, बल्कि ‘स्टूडेंट्स एसोसिएशन’ नाम से अपना स्वतंत्र छात्र-संगठन बनाया। ये सारे अनुभव आगे के जीवन में उनके बड़े काम आए। डॉ. जैना का मस्तिष्क बड़ा ही उर्वर था, वे चिंतन किया करते कि हम जिन डेडबॉडीज पर परीक्षण किया करते हैं, आखिर ये डेडबॉडीज आती कहाँ से हैं? ज्यादातर ये गरीब, असहाय, लावारिस अभागे लोगों की ही होती हैं।

अपने स्टूडेंट लाइफ में ही डॉ. जैना अपनी बातें तथा होने वाले अनुभवों को लोगों तक पहुँचाने के लिए अखबारों और पत्रिकाओं में लिखा करते थे। इतना ही नहीं, लोगों को जागरूक करने तथा अपने चिकित्सीय अनुभवों से परिचित कराने के लिए उन्होंने ‘हेल्‍थ ऐंड सोसाइटी’ नामक पत्रिका भी निकाली, दूसरे जर्नल्स में भी बराबर लिखते रहे। डॉ. जैना का मानना था कि मेडिकल की पढ़ाई कर रहे छात्रों के लिए मेडिकल कैंप जरूर लगाए जाने चाहिए, इनसे उन्हें वास्तविक ज्ञान प्राप्त होता है। ‘स्वास्‍थ्य के लिए क्या खाना चाहिए, क्या नहीं’ इस पर भी उन्होंने छोटी-छोटी पुस्तकें प्रकाशित कराईं, जो लोकल ट्रेनों में खूब बिका करती थीं। चूँकि डॉ. जैना कोविड-19 टास्क फोर्स के सदस्‍य थे, उन दिनों कोरोना रोकथाम पर उनका लिखा आर्टिकल बड़ा प्रसिद्ध हुआ था। समय-समय पर डॉ. जैना ने कई पुस्तकें भी लिखीं। कंपनियाँ अपने उत्पादों के झूठे या बढ़ा-चढ़ाकर कही बातों के विज्ञापनों के माध्यम से ग्राहकों को कैसे लूटती हैं, इनके खिलाफ लिखकर वे जन-जागरण किया करते थे। डॉ. जैना ने बहुत सारे देशों में काम किया, दुनिया के विभिन्न विश्वविद्यालयों में सेमिनार-चर्चा, गोष्ठी, बैठकों में भाग लिया, इन यात्राओं एवं अनुभवों को भी उन्होंने प्रकाशित कराया। विडंबना यह है, डॉ. जैना का सारा साहित्य या तो बांग्ला में है या अंग्रेजी में।
अपने छात्र-जीवन से ही डॉ. जैना को मजदूरों, मेहनतकश लोगों के प्रति बड़ी हमदर्दी थी। जब वे एम.डी. कर रहे थे, तब की बात है, उन दिनों सारे काम मजदूर ही किया करते थे, आज की तरह मशीनें नहीं थीं, उन दिनों कलकत्ता मेट्रो का काम चल रहा था, तब बड़ी तादात में मजदूर घायल-चोटिल होते थे, वे इलाज के लिए उनके मेडिकल कॉलेज में आया करते। जिन मजदूरों के इलाज में खर्चा लगता, वैसे मजदूरों को ठेकेदार लोग अस्पताल में छोड़कर भाग जाते थे; यहाँ फ्रैक्चर वाले मरीज भी भरती नहीं किए जाते थे, सीनियर डॉक्टर जिन मरीजों के परचे पर ‘E’ यानी Emergency लिख दिया करते, उन्हीं को अस्पताल में भरती किया जाता, अन्यथा मरहमपट्टी कर दवाइयाँ देकर भेज दिया जाता था। ऐसी स्थिति में डॉ. जैना मजदूरों के दुःख-तकलीफों से द्रवित हो ज्यादातर मरीजों के परचे पर ‘E’ लिख दिया करते, इस तरह वे बहुत सारे घायल-पीड़ित मरीजों को भरती करवा दिया करते थे। वहाँ रहते हुए डॉ. जैना ने देखा कि मजदूरों के साथ कैसी ज्यादती और अनदेखी की जाती थी, दिनोदिन उनके प्रति डॉ. जैना की संवेदना बढ़ती गई।

डॉ. जैना ने दिल को झकझोर देनेवाला एक वाकया सुनाया था। उन दिनों अस्पताल में महिलाओं के आग से जलने के केस बहुत आते थे, यहाँ तक कि एक महीने में 25-30 भी। डॉक्टर के नाते जब वे उस महिला से पूछताछ करते कि कैसे जल गया, तो वे यही कहा करतीं कि साब, स्टोव फट गया। वे पूछते, स्टोव सामने था तो पीठ कैसे जला? डॉ. जैना ने बताया, मैं जानता था कि महिलाओं का बड़े स्तर पर उत्पीड़न हो रहा है। मर्द उन्हें जलाकर मारने की कोशिश करते थे और वे भोली-अभागी मरते-मरते भी अपने घरवालों को बचाती थीं। कैसा समर्पण था उनका। एक उनके मर्द थे कि उन्हें मिटा रहे थे।

डॉ. जैना गलत चीज कभी बर्दाश्त नहीं करते थे। एम.डी. करते हुए डॉ. जैना ने अपने साथी डॉक्टरों के साथ ‘ड्रग मेडिसिन फोरम’ बनाया और इसके माध्यम से आवाज उठाई कि जो दवाइयाँ मानव शरीर के लिए हानिकारक हैं, उन्हें बंद कर दिया जाए। उन दिनों इतनी अंधेरगर्दी थी कि बाहर के देशों में जो दवाइयाँ ड्रग कंट्रोलर द्वारा ‘वेन’ कर दी गई थीं, वे हमारे देश में धड़ल्ले से बेची और खाई जा रही थीं। इस विषय में जनता को जागरूक करने के लिए डॉ. जैना ने छोटी-छोटी पुस्तिकाएँ प्रकाशित कर बँटवाईं, इसके खिलाफ अखबारों में लिखा। बाद में डॉ. जैना के प्रयास से यह एक आंदोलन ही बन गया। इस आंदोलन का ऐसा असर हुआ कि भारत के ड्रग कंट्रोलर ने ऐसी 28 दवाइयों को प्रतिबंधित कर इनकी बिक्री पर पाबंदी लगा दी।

ईमानदारी, काम के प्रति समर्पण और निडरता जैसे गुण डॉ. जैना में कूट-कूट कर भरे थे। वे मरीज का परफेक्ट इलाज होने के हिमायती थे। एक डॉक्टर के रूप में डॉ. जैना की पहली नियुक्ति नादिया जिला के श्यामनगर मेडिकल सेंटर में हुई। यहाँ का आलम ऐसा था कि वर्षों से यहाँ के सेंटर पर कोई डॉक्टर नहीं था; कोई आना ही नहीं चाहता था। यहाँ का कंपाउंडर ही इसे सँभाल रहा था और वही आने वाले मरीजों को जैसे-तैसे दवाई वितरित कर दिया करता था। डॉ. जैना जब यहाँ पहुँचे तो लोगों ने उनका बड़ा स्वागत किया। लेकिन कुछ दिनों में ही यहाँ के जमींदार और दबंग लोग अपनी दबंगई दिखाने लगे। डॉ. जैना सब लोगों को लाइन में लगकर डॉक्टर को दिखाने को कहते थे, परंतु ये दबंग लोग कहते कि डॉक्टर, यदि हम लोग मजदूरों के साथ लाइन में लगेंगे तो हमारी क्या इज्जत रह जाएगी; हमें तो बिना लाइन के सबसे पहले देखना होगा। पर डॉ. जैना ने साफ कह दिया, आपको मेरे यहाँ दिखाना है तो लाइन में लगना ही पड़ेगा, मेरे यहाँ कोई छोटा-बड़ा नहीं है। इस पर वे लोग कहने लगे कि हमें अपने घर पर अलग से देख लिया करो। डॉ. जैना ने साफ-साफ कह दिया, मैं घर पर मरीज नहीं देखता। तब उन लोगों ने डॉ. जैना को तरह-तरह से डराया, धमकी दी, इतना ही नहीं, वीडीओ से शिकायत कर दी। पर डॉ. जैना को न डरना था, सो न डरे, और बाद में विवश होकर वे लोग भी लाइन में लगकर अपना इलाज कराने लगे।
यहीं का और एक वाकया है, जो डॉक्टरी पेशेवालों के लिए अनुकरणीय है। डॉ. जैना ने बताया कि उन दिनों मेडिकल सेंटर में पेंसिलिन इंजेक्‍शन लगाए जाते थे। मैं कंपाउंडर को समझाता कि पेंसिलिन की दूसरी डोज छह घंटे बाद मरीज को मिल जानी चाहिए, तभी वह असरदार होती है, लेकिन कंपाउंडर प्रातः दस बजे मरीज को इंजेक्‍शन लगाता तो गाँव-देहात के मरीज अगले दिन ही आते थे, तब उन्हें दूसरी डोज लगाता, दोनों डोज के बीच काफी लंबा समय हो जाने से मरीज को अपेक्षित फायदा नहीं होता था। डॉ. जैना कहते कि जिन मरीज को पेंसिलिन लगाया है, उन्हें दूसरी डोज के लिए सायं तक रोक लिया करो। एक तो अब मरीज इतनी संख्या में आने लगे थे कि उन्हें देखते-निबटाते अपराह्न‍ के 2-3 वैसे ही बज जाया करते। डॉ. जैना समय का वास्ता देकर कभी किसी मरीज को लौटाते नहीं थे। इससे कंपाउंडर चिढ़ गया, उसने दूसरे कर्मचारियों को भी भड़का दिया और हड़ताल कर दी, इतना ही नहीं, यूनियन में शिकायत भी कर दी कि डॉ. जैना हम लोगों से समय से ज्यादा काम लेते हैं, अपने स्टाफ को तंग करते हैं।

पर डॉ. जैना तो किसी तरह मरीजों का भला ही चाहते थे, उन्हें तो काम करने से मतलब था, सो वे खुद ही सब मरीजों को देखते, इंजेक्‍शन लगाते और फिर दवाई भी देते। क्या डॉ. जैना जैसा समर्पण और सेवा-भाव अपने मरीजों के प्रति सब डॉक्टर रखते हैं? डॉ. जैना ने मेडिकल सेंटर का कोई काम रुकने नहीं दिया। वे अकेले ही वह सेंटर चलाते रहे। सप्ताह भर में ही शर्मिंदा होकर पूरा स्टाफ काम पर लौट आया और यूनियन लीडर ने भी डॉक्टर साहब से समझौता करने में अपनी भलाई समझी। ऐसे बहुत सारे बाकये डॉ. जैना के डॉक्टरी पेशे में आए, पर वे सदैव अपने कर्तव्य-पथ पर अडिग रहे।

कुछ समय तक डॉ. जैना हावड़ा स्थित उलूबेरिया के ईएसआई अस्पताल में भी रहे। उनका कहना था कि ईएसआई के बहुत सारे फायदे हैं, जिनकी कर्मचारियों को जानकारी ही नहीं होती है। ईएसआई में चार सुविधाएँ मुख्य रूप से मिलती हैं—हेल्‍थ इंश्योरेंस, आउटडोर ट्रीटमेंट, अनलिमिटेड ट्रीटमेंट और पूरी फैमिली को चिकित्सा-सुविधा। इसके अलावा दवाइयाँ बाहर से नहीं खरीदनी पड़तीं, मेडिकल लीव्स की सुविधा, यानी घायल या फ्रैक्चर होने पर दो-तिहाई वेतन मिलता रहेगा। जब डॉक्टर जैना मेडिकल इंस्पेक्टर बने तो पैनल के प्राइवेट अस्पताल तथा क्लीनिकों में फालतू तथा महँगी दवाइयाँ लिखवाकर उन्हें फिर से मेडिकल स्टोरों पर बेच देने के रैकेटों का भंडाफोड़ किया। यहाँ तक कि दवा माफियाओं द्वारा उन्हें जान से मारने की धमकी तक मिली, पर कोई उन्हें डरा नहीं सका। डॉ. जैना कहा करते थे कि संसाधनों का देश की तरक्की में उपयोग होना चाहिए।

इसके बाद तो डॉ. जैना नई दिल्ली के एम्स में ऑक्यूपेशनल हेल्‍थ में असिस्टेंट प्रोफेसर हो गए। डॉ. जैना एक अच्छे शिक्षक के नाते ऑक्यूपेशनल हेल्‍थ की पढ़ाई कर रहे अपने स्टूडेंट्स को भूमिगत कोयला खदानों पर लेकर जाते, वहाँ उन्हें वे प्रत्यक्ष दिखाते कि मजदूर भीषण गरमी और घुप्प अँधेरे में खदान में किन हालात में काम करते हैं। डॉ. जैना अन्यान्य ऑक्यूपेशनल साइटों पर अपने स्टूडेंट्स को ले जाकर उन्हें वास्तविकता का अनुभव कराते थे। उन दिनों आपदा प्रबंधन जैसा कोई विभाग नहीं था, यहीं रहते डॉ. जैना ने अपने अधिकारियों के साथ विचार-विमर्श के दौरान एनडीआरएफ की सिफारिश की, जो सहज ही मान ली गई और देश में पहले-पहल आपदाओं से लड़ने के लिए एनडीआरएफ विभाग बना।

जब डॉ. जैना एम्स में एपेडेमिलॉजी पढ़ा रहे थे, तब वे भारत सरकार की ओर से विभिन्न विजिट्स पर जाया करते थे। उन्होंने मुझे दिल्ली के स्वतंत्र भारत मिल में विजिट का बड़ा ही मजेदार वाकया सुनाया। बोले कि मैं पूरी मिल का मुआयना कर आया, पर मुझे यहाँ के होने वाले प्रदूषण का जरा भी पता नहीं चला, जबकि कई एजेंसियों ने यहाँ की बहुत शिकायतें सरकार को भेजी थीं। मैं खुद अचंभे में था कि ऐसा कैसे हो सकता है। पर जब मैं मुआयना कर बाहर गेट पर आया तो वहाँ का गार्ड बोला कि सर, लाओ, मैं आपके कपड़े फींच दूँ। मैंने सोचा, यह मेरे कपड़े क्यों खींचना चाहता है। आखिर उसने मुझे सीधा खड़ा कर स्टीम रोलर से मेरा कोट-पैंट साफ किया। मैंने देखा, मेरा नीला कोट-पैंट धूल और रोओं से एकदम सफेद हो गया था। अब मैं समझा, जब मेरे अंदर जाकर बाहर आने में ही नीला कोट सफेद हो गया, तो जो कर्मचारी पूरे आठ घंटे अंदर काम करते हैं, उनके फेफड़ों में कितना गर्द-रेशा भर जाता होगा। दरअसल यहाँ के कर्मचारी अधेड़ावस्‍था में ही टी.बी., दमा जैसे भयंकर रोगों के शिकार हो जाते थे।
इस तरह डॉ. जैना ने अनेक बार कपड़ा मिलों, कोयला खदानों, स्टोनक्रैशरों, सीमेंट फैक्टरियों, परमाणु बिजलीघरों इत्यादि का दौरा किया। वहाँ मजदूरों के जीवन से हो रही खिलवाड़, वहाँ के जानलेवा वातावरण के खिलाफ सख्त रिपोर्ट सरकार को पेश की, परिणामस्वरूप पुराने जमाने की ज्यादातर कपड़ा मिलें बंद कर देनी पड़ीं। कारखानों-मिलों में काम करने वाले कामगारों को अच्छा माहौल, सभी जरूरी सुविधाएँ मिलें, ऐसे सख्त कानून बने। मजदूरों को ग्लब्ज, मास्क, जूता, हैट आदि पहनना अनिवार्य कर दिया गया। आज मजदूरों को जो सुविधाएँ मिल रही हैं, वे डॉ. जैना के प्रयासों का ही सुफल हैं। उद्योगपतियों के अनेक लालच दिए जाने पर भी उन्होंने अपने जमीर को कभी मैला नहीं होने दिया।

डॉ. जैना ने एक बड़ा ही चौंकाने वाला सनसनीखेज तथ्य बताया कि सीमेंट फैक्टरी में काम करने वाले मजदूर 35 वर्ष की अवस्‍था में ही कार्य के लिए अक्षम हो जाते थे। उनके फेफडों में इतनी डस्ट भर जाती थी कि वे असमय ही मौत के मुँह में चले जाते थे, और मजे की बात यह कि इन सब खतरों से कर्मचारी बिल्कुल अनजान थे। विडंबना देखिए कि धूल से बचाने के लिए यहाँ मजदूरों को सायं को गुड़ खाने को दिया जाता था। उनका तर्क था कि गुड़ खाने से धूल-गर्द पेट में चली जाती है। इस तर्क ने तो मानव विज्ञान को भी फेल कर दिया। श्वास से ली जानेवाली धूल-गर्द पेट में कैसे जा सकती है, वह तो सीधे फेफड़ों में ही जाएगी। तो ऐसा-ऐसा खिलवाड़ मजदूरों की जिंदगी से हो रहा था।

भोपाल गैस कांड की जाँच का जिम्मा भी डॉ. जैना और उनकी टीम को सौंपा गया था। इस जाँच का उनका अनुभव बड़ा दुखद रहा। सरकार ने जानबूझकर यूनियन कार्बाइड के मालिक एंडर्सन को भाग जाने दिया। सेवा-सहायता के नाम पर वहाँ अनेक संगठन अस्तित्व में आ गए, जिन्होंने खूब पैसा बनाया। जब सरकार ही कंपनी के मालिक को बचा रही थी तो कोई क्या कर सकता था। उनकी टीम द्वारा इकट्ठा किए गए सबूत तथा आँकड़े भी मध्य प्रदेश पुलिस ने उनसे छीन लिये; होटल में आकर पुलिस ने टीम के साथ बदसलूकी की, डॉक्टरों को मारा-पीटा।

डॉ. जैना महामारी विशेषज्ञ थे। 1991 में जब सूरत शहर में प्लेग फैला, तब डॉ. जैना एम्स में ही थे। उनके नेतृत्व में डॉक्टरों की एक टीम सूरत के प्लेग प्रभावित इलाकों में हालात का अध्ययन कर रिपोर्ट तैयार करने के लिए भेजी। इसी तरह मणिपुर में प्लेग फैलने के समाचार आने पर सरकार ने वहाँ भी इन्वेस्टीगेशन के लिए डॉ. जैना के नेतृत्व में टीम भेजी। यहाँ के अनुभव बड़े ही हास्यास्पद और मजेदार थे। इसके करीब एक साल बाद ही देश-दुनिया में एचआईवी/एड्स का सनसनीखेज बोलबाला हुआ। भारत सरकार ने निश्चय किया कि इसे देश में फैलने से पहले ही रोकना चाहिए, सो तुरत-फुरत ‘नेशनल एड्स कंट्रोलर बोर्ड’ का गठन किया गया। आईएमसीआर के डायरेक्टर ने सुझाव दिया कि एचआईवी पर अलग से विभाग बनाया जाना चाहिए। विश्व स्वास्‍थ्य संगठन (WHO) और रेडक्राॅस सोसाइटी ने श्रीमान आर.आर. दास के नेतृत्व में इस पर एक ऑफिस शुरू किया। डब्‍ल्यूएचओ ने अपना सुझाव दिया कि कुछ भी करने से पहले यह सुनिश्चित करो कि भारत में एचआईवी/एड्स है भी या नहीं? इस पर होने वाली रिसर्च पर डब्‍ल्यूएचओ धन उपलब्‍ध कराएगा।

फिर क्या था, देश के चार महानगरों—दिल्ली, कलकत्ता, चेन्नई, मुंबई—में एचआईवी/एड्स पर अध्ययन के लिए पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया। डब्‍ल्यूएचओ ने दो कंसल्टेंट भी हायर किए, सबको साथ मिलकर काम करना था। रेडलाइट एरिया में जाकर यौनकर्मियों (सेक्स वर्कर्स) से जानकारी जुटानी थी, उनकी चिकित्सा जाँच करानी थी। इस तरह अन्य शहरों के लिए तो रिसर्चर डॉक्टर सुनिश्चित हो चुके थे, पर कलकत्ता आने को कोई तैयार न था। आखिर डिपार्टमेंट ने इस रिसर्च के लिए डॉ. जैना को कलकत्ता भेजा। तब डॉ. जैना आल इंडिया इंस्टीट्यूशन ऑफ हाइजीन ऐंड पब्लिक हेल्‍थ, कोलकाता में पब्लिक हेल्‍थ साइंटिस्ट के नाते एड्स पर रिसर्च करने लगे। उन्होंने सोनागाछी और दूसरे रेड लाइट एरिया में दौरे किए।

कुल मिलाकर मजा यह कि तीन महानगरों में जिन डॉक्टरों के नेतृत्व में यह पायलट प्रोजेक्ट शुरू हुआ, वह फेल हो गया, वे रिसर्च का सब रुपया चट कर गए, बाद में उन्हें जेल जाना पड़ा। केवल डॉ. जैना के नेतृत्व में अध्ययन सफल रहा। इससे डॉ. जैना बहुत प्रसिद्ध हो गए। तब डॉ. जैना के नेतृत्व में एचआईवी/एड्स कंट्रोल का प्रोग्राम पूरे देश में लागू हुआ। डॉ. जैना के मार्गदर्शन में पहले सब रेड लाइट एरिया में छोटे-छोटे ग्रुप बनाए, फिर इनका एक बड़ा संगठन बनाया गया। सन् 1995 में सेक्सवर्कर्स ऑर्गेनाइजेशन पूरे बंगाल में काम करने लगा। डॉ. जैना ने सोचा कि एचआईवी/एड्स नियंत्रण कार्यक्रम को हम अपने हाथ में क्यों रखें, हमें इसकी लीडरशिप यौनकर्मियों को ही देनी चाहिए, उन्हें समर्थ बनाना चाहिए। पर डॉ. जैना जिस इंस्टीट्यूट में कार्यरत थे, उसका डायरेक्टर कहने लगा कि इस कार्यक्रम को हम चलाएँगे, लेकिन डॉ. जैना का मानना था कि इसका नेतृत्व यौनकर्मियों को ही करना चाहिए, अतः डॉ. जैना के मार्गदर्शन में यौनकर्मियों के सबसे बड़े संगठन DMSC, यानी ‘दुर्बार महिला समन्वय समिति’ का गठन हुआ।

इस बात से इंस्टीट्यूट का डायरेक्टर नाराज हो गया और डॉ. जैना को बुरा-भला, यहाँ तक कि मीरजाफर कहकर बेइज्जत करने लगा। इससे क्षुब्‍ध होकर डॉ. जैना ने यह प्रतिष्ठित नौकरी छोड़ दी, जबकि वे स्वयं कुछ महीने बाद ही इस इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर बनने वाले थे। डॉ. जैना के मार्गदर्शन में ‘दुर्बार’ यौनकर्मियों का एशिया का सबसे बड़ा संगठन बना। मेरे पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि ‘दुर्बार’ बांग्ला भाषा का शब्द है, इसका अर्थ है—‘रुकना नहीं, चलते जाना।’

हर समस्या का जड़-मूल से समाधान करना डॉ. जैना की आदत थी। डॉ. जैना अब दुर्बार के सलाहकार के नाते इसे बहुआयामी बना रहे थे तो वहीं दुनिया के विभिन्न संगठनों के साथ अलग-अलग मुद्दों पर भी काम कर रहे थे। उन्होंने अमेरिका की संस्‍था care जॉइन कर ली थी; बाद में NACO में काम करने लगे। बैंकॉक, फ्रांस, यूएसए, बांग्लादेश सहित कुल मिलाकर ४१ देशों में एचआईवी तथा अन्य मुद्दों पर काम किया। आज दुर्बार यानी DMSC में 65 हजार यौनकर्मियाँ रजिस्टर्ड हैं और कोलकाता महानगर में ही दुर्बार के अपने तीन बड़ी-बड़ी इमारतों में कार्यालय हैं, जिनमें सैकड़ों यौनकर्मियाँ बतौर कर्मचारी काम करती हैं।

दुर्बार के साथ-साथ यौनकर्मियों के सशक्तीकरण में ‘उषा’ मल्टीपर्पज कोऑपरेटिव सोसाइटी लि. एक और मील का पत्थर बना, यौनकर्मियों का अपना बैंक, डॉ. जैना ने इसके माध्यम से सहकारिता आंदोलन को नई धार दी। ‘उषा’ ने यौनकर्मियों को आर्थिक संबल दिया। हालाँकि यौनकर्मियों को सूदखोरों के चंगुल से बाहर निकालने और ‘उषा’ को खड़ा करने में डॉ. जैना को अपनी जान पर खेलना पड़ा। यौनकर्मियों के बीच काम करते हुए जैसे-जैसे नई समस्याएँ आती गईं, डॉ. जैना भी उनके समाधान में एक-एक नया संगठन खड़ा करते गए। यौनकर्मियों के बच्चों की शिक्षा-दीक्षा के लिए कोलकाता के बरईपुर में ‘राहुल विद्या निकेतन’, यानी चिल्ड्रन होम खड़ा किया, यहाँ उनका रहना-खाना बिल्कुल निशुल्क रखा, बच्चों के उत्तम स्वास्‍थ्य के लिए इसी के परिसर में दुग्‍ध के लिए गाय-बकरी पालन, मत्स्य पालन के लिए दो तालाब, चावल-सब्जी के लिए खेती की व्यवस्‍था की, जिससे यहाँ रहने वाले बच्चों को ताजा-पौष्टिक भोजन मिलता रहे।

यौनकर्मियों के जो बच्चे पढ़ने में रुचि नहीं रखते थे, पर जिनमें सांस्कृतिक प्रतिभा थी, उनके लिए ‘कोमल गांधार’ नामक सांस्कृतिक एकेडमी बनाई, आज इसके कलाकार नृत्य-गान में राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। बंगाल में फुटबाॅल बेहद लोकप्रिय है, अतः खेल में रुचि रखने वाले यौनकर्मियों के बच्चों के लिए ‘दुर्बार स्पोर्टस एकेडमी’ ही नहीं बनाई, बल्कि होम परिसर में प्रैक्टिस के लिए शानदार फुटबाॅल प्लेग्राउंड भी बनवाया, परिणाम यह हुआ कि बदनाम गलियों में अपराध की ओर भटक जाने वाले ये नौजवान आज भारत ही नहीं, दुनिया की बड़ी-बड़ी फुटबॉल टीमों में खेल रहे हैं। इसी तरह नेशनल नेटवर्क ऑफ सेक्सवर्कर्स, सेल्फ रेगुलेटरी बोर्ड, यौनकर्मी गेस्टहाउस, यौनकर्मी ओल्ड एज होम, फुटबॉल प्लेयर स्टे होम, अमरा पदाति, श्रमजीवी महिला संघ, बलराम डे स्ट्रीट आनंदम्, ममता नेटवर्क ऑफ पॉजिटिव वूमेन, सोसाइटी फॉर हुमा डवलपमेंट ऐंड सोशल एक्‍शन, विनोदिनी श्रमिक यूनियन, दुर्बार दिशा, महिला गृहश्रमिक समन्वय संगठन, दुर्जोय दुर्बार, दुर्बार प्राकशिनी, सोनागाछी रिसर्च ऐंड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट, मानभूूम लोक संघर्ष कृति व नचिनी उन्नयन समिति, अमलासोल बिरसा मुंडा ग्राम उन्नयन कमेटी, लागाडोरी ग्राम कल्याण समिति आदि न जाने कितने संगठन खड़े किए। डॉ. जैना एक व्यक्ति नहीं, बल्कि संस्‍थाओं की शृंखला थे। जिन बदनाम बस्तियों की ओर दिन के उजाले में लोग जाना भी पसंद नहीं करते, शोषण और उत्पीड़न के दलदल में फँसी इन यौनकर्मियों के उत्थान में डॉ. जैना ने अपना पूरा जीवन लगा दिया।

डॉ. जैना ने यौनकर्मियों के लिए ही नहीं, घरों में काम करने वाले डोमेस्टिक वर्कर्स के अधिकारों के लिए भी काम किया। भले एचआईवी/एड्स नियंत्रण कार्यक्रम के लिए उन्हें ‘नेशनल पब्लिक सर्विस एक्सीलेंस अवार्ड’, मानवता की सेवा के लिए ‘चिकित्सा ज्योति अवार्ड’ मिले, पर ऐसा कोई अवार्ड नहीं, जिससे उनकी सेवाओं को आँका जा सके। डॉ. जैना बड़े ही परदुःखकातर थे। जब कोरोना महामारी में लॉकडाउन के चलते यौनकर्मियों का धंधा ही चौपट हो गया था। दो गज की दूरी के चलते ग्राहक उनके पास आ ही नहीं सकते थे, ऐसी स्थिति में यौनकर्मियाँ भुखमरी के कगार पर पहुँच गईं। उनकी फ्रिक करते डॉ. जैना एक दिन भी अपने घर पर नहीं बैठे, रोजाना अपने कार्यालय आते रहे। कोलकाता हाईकोर्ट में अर्जी लगवाकर बंगाल सरकार से यौनकर्मियों के लिए सूखे राशन की व्यवस्‍था कराई, डोर टू डोर राशन उनके घरों पर पहुँचवाया। गरीब लोगों का इलाज भी अपने घर पर करते रहे, उसी दौरान वे कोरोना की पकड़ में आ गए। कोरोना की भयावहता को वे जानते थे, आईसीएमआर द्वारा कोविड पर गठित नेशनल टास्क फोर्स के वे सदस्य भी थे, पर अपनी जिंदगी की परवाह न करते हुए यौनकर्मियों की हर प्रकार से मदद में लगे रहे, और दूसरों की मदद करते-करते अपने आप को ही मिटा बैठे।

चिल्ड्रिन होम परिसर में टहलते हुए बातचीत में उन्होंने मुझसे कहा था—शर्माजी, अब मैं एनवायरनमेंट पर भी काम करना चाहता हूँ। आज का और भविष्य का यह सबसे संवेदनशील मुद्दा है। आप जुलाई में दुबारा आ ही रहे हैं, तब इस पर डिसकस करेंगे; पर नियति को यह मंजूर न था और आठ मई को ही वे दूसरे मिशन पर निकल गए। पर जिन यौनकर्मियों के लिए उन्होंने अपना कॅरियर तथा जीवन, दोनों निछावर कर दिए, उन यौनकर्मियों ने डॉ. जैना के अवदान को जल्दी ही भुला दिया। डॉ. जैना द्वारा ‘उषा’ बैंक में जमा कराए गए रुपयों को प्राप्त करने के लिए उनके परिवार को कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। डॉ. जैना ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि ऐसा भी हो सकता है, पर डॉ. जैना महामानव थे; महापुरुषों के लिए कोई अपना या पराया नहीं होता। डॉ. जैना जैसे लोग कभी नहीं मर सकते, वे अपने कामों में, सोच में, विचारधारा में हमेशा जिंदा रहते हैं। मैं पहला ऐसा व्यक्ति हूँ, जिसे डॉ. जैना ने अपनी पूरी जीवन-कहानी सुनाई थी। उनकी प्रथम पुण्यतिथि पर मैं पूरी श्रद्धा और हृदय की गहराई से उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।
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साहित्य अमृत, 4/19 आसफ अली रोड, नई दिल्ली-110002
दूरभाष: 9868525741

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