उपरवास कथात्रयी की मूल संवेदना एवम वृद्धावस्था के सरोकार

नीलम वाधवानी

नीलम वाधवानी

शोधार्थी, हिंदी विभाग, भाषा साहित्य भवन, गुजरात विश्वविद्यालय, अहमदाबाद
ईमेल: vishnukriplani36@gmail.com
चलभाष: +91 840 122 4237
मार्गदर्शक- प्रो. जशाभाई पटेल


प्रसिद्ध साहित्यकार रघुवीर चौधरी का जन्म 5 दिसंबर 1938 को गुजरात के गांधीनगर के पास बापूपुरा गाँव में एक धार्मिक किसान दंपत्ति दलसिंहभाई और जीतीबहन के घर हुआ था। माता पिता दोनों ही भारतीय संस्कारों के वाहक तथा धर्म में विश्वास रखने वाले थे। रघुवीर जी ने 1958 में पारूबहन के साथ अपना दांपत्य जीवन आरंभ किया।  इनसे इन्हें पुत्र रत्न के रूप में संजय चौधरी , पुत्रियों के रूप में दृष्टि, कीर्ति तथा सुरता प्राप्त हुए। 
“उन्होंने गुजरात के मनसा में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा पूरी की । उन्होंने 1960 में बी.ए. और 1962 में गुजरात विश्वविद्यालय से हिंदी भाषा और साहित्य में एम.ए. किया । 1979 में,  उसी विश्वविद्यालय में हिंदी और गुजराती मौखिक जड़ों के तुलनात्मक अध्ययन के लिए पीएचडी भी प्राप्त की।उन्होंने नवनिर्माण आंदोलन में भाग लिया और 1970 के दशक में आपातकाल का विरोध किया। रघुवीर चौधरी 1977 से गुजरात विश्वविद्यालय में भाषा स्कूल में शामिल हुए और 1998 में एक प्रोफेसर और हिंदी विभाग के प्रमुख के रूप में सेवानिवृत्त हुए। उन्होंने 1998 से 2002 तक साहित्य अकादमी की कार्यकारी परिषद के लिए कार्य किया। वे भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य थे 2002 से 2004 तक।  उन्हें 25वें भारतीय फिल्म समारोह का जूरी सदस्य भी नियुक्त किया गया । सेवानिवृत्ति के बाद, वे बापूपुरा लौट आए और कृषि गतिविधियों को शुरू किया। वह 2001 में गुजराती साहित्य परिषद के अध्यक्ष थे और वर्तमान में इसके ट्रस्टी के रूप में कार्यरत है।"1
रघुवीर जी के रचनात्मक पक्ष पर दृष्टि डाली जाए तो इन्हें गुजराती साहित्य का सर्वश्रेष्ठ एवं वरिष्ठ लेखक कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। रघुवीर जी के द्वारा रचित नवल कथाएँ इस प्रकार हैं - ‘पूर्वराग' (1964), ‘परस्पर' (1969), ‘प्रेमअंश' (1982), ‘अमृता' (1965),  ‘आवरण' (1966), ‘एकलव्य', (1967), ‘तेडागर' (1968), ‘सखियों' (1970), ‘वेणु वत्सला' (1972), ‘उपरवास-सहवास-अंतर्वास' (1975), ‘लागड़ी' (1976), ‘श्रावण राते' (1977), ‘रूद्र महालयनी कर्पूर मंजरी' (1978), ‘कंडक्टर' (1980), ‘पंच पुराण' (1981), ‘बाकी जिंदगी' (1982), ‘वचलुं फणियुं', (1983),‘ गोकुल-मथुरा-द्वारका' (1986), 'मनोरथ' (1986), 'इच्छावर' (1987), ‘अंतर' (1988), ‘लावण्य' (1989), ‘श्याम सुहागी’ (1989), ‘जे घर नार सुलक्षणा-सुखे सुवे संसार मा' (1990), ‘साथीसंगाथी' (1990), ‘कल्प लता' (1992) ‘बे् कांठा वच्चे' (1994), ‘काचा सूतरने तांतणे' (1995), ‘सोमतीर्थ' (1996), ‘उत्तर' (1997), ‘एक सांचु आंसु’ (1999), ‘मुद्दल विनानु व्याज' (2003), ‘समज्या विना छूटां पडवुं' (2003), ‘क्यां छे अर्जुन?' (2004), ‘घरमां गाम-शाला संतान' (2004), ‘एक रूपकथा' (2006), ‘एक डग आगड़ बे् डग पाछड़' (2009), ‘विजय बाहुबलि' (2016) । 
रघुवीर जी ने गद्य तथा पद्य दोनों में ही अपनी कलम का जादू दिखाया है। इनके द्वारा रचित लघु कथा संग्रह, नाटक, रेखाचित्र, निबंध, प्रवास, संस्कृति और धर्म चिंतन तथा काव्य संग्रह भी  बहुत प्रसिद्ध हुए हैं।  रघुवीर जी द्वारा साहित्य हेतु किया गया विस्तृत लेखन इनके गंभीर चिंतन तथा रचनात्मक कौशल की उत्कृष्टता को दर्शाते हैं। 

 रघुवीर चौधरी के उपन्यास ‘उपरवास' कथात्रयी का प्रथम प्रकाशन 1975 में हुआ । जिसे साहित्य अकादमी द्वारा भी पुरस्कृत किया गया। सभी पाठकों ने इसे बहुत ही चाव से पढ़ा । इसीलिए महज आठ वर्ष के भीतर ही इसकी दूसरी आवृत्ति भी हुई। इस वृहद उपन्यास की अवधि स्वतंत्रता पूर्व से स्वतंत्रता के बाद पच्चीस वर्ष तक फैली हुई है। यह उपन्यास उत्तरी गुजरात के ग्रामीण जीवन की एक झलक प्रस्तुत करता है। इस उपन्यास में हमें यह भी देखने को मिलता है कि यदि घर में  एक समझदार बुजुर्ग है तो वह घर हमेशा खुशियों से भरा रहता है बशर्ते पुत्र पिता की सलाह का सम्मान करते हों। 

 
उपन्यास के भीतर यदि किसी कथा को खोजा जाए तो कथा किसी नायक विशेष की ना होकर संपूर्ण अंचल की है। कथा का आरंभ पिथू भगत के पोता पोती देव तथा हेती की बाल सुलभ शरारत से होता है । किंतु कथा का विस्तार प्रत्येक नवीन पात्र के आगमन होते ही  उसके चरित्र एवं घटना के साथ जुड़ता चला जाता है।  इसके मुख्य पात्रों को तथा मुख्य घटनाओं को रेखांकित किया जा सकता है। सोमपुरा गाँव के पिथू भगत और करसन मुखी का परिवार उपन्यास के केंद्र में है।पिथू भगत और उनके पुत्र नरसंग भारतीय संस्कारों की महान परंपरा के वाहक हैं। उपन्यास के भीतर सामाजिक संबंधों की बातें, भारतीय संस्कारों तथा रीति-रिवाजों का चित्रण, ग्रामीणों द्वारा पड़ोसी के घर की बारात का भी अपने घर की बारात जैसा स्वागत, सबके साथ मिलकर त्यौहार एवं उत्सवों को मनाने की रीत, घर तथा खेती, एक सामान्य किसान के जीवन में आने वाली परेशानियां, ग्रामीण लोगों का रहन सहन, पंचायती राज आदि करसन तथा भीमा जैसे पात्रों के माध्यम से गाँव के मुखिया द्वारा किया जाने वाला मनमाना व्यवहार, आदि घटनाएँ मिलकर उपन्यास को एक बड़ा फलक देते हैं। लेखक का मुख्य लक्ष्य आरंभ से लेकर अंत तक मानव के चरित्र का गहन चित्रण तथा मानव संबंधों का विस्तार पूर्वक चिंतन रहा है। वहां प्रकृति के प्रति विशेष मोह एवं व्यर्थ शब्द भंडार नहीं दिखाई देता यद्यपि प्रकृति को पूर्णता अनदेखा भी नहीं किया गया है । आवश्यकता के अनुसार संकेत मात्र अथवा अल्प शब्दों में प्रकृति का मानवीकरण एवं प्रकृति का मनमोहक सौंदर्यीकरण देखा जा सकता है और यही गुण उपरवास उपन्यास को अन्य उपन्यासों से  विशिष्ट बनाता है।
यथा उपन्यास का आरंभ ही इन पंक्तियों से होता है-

“ढलती हुई शाम की लालिमा खेतों की हरियाली में उतर कर धरती में समाती जा रही है। चारों ओर फैली नीरव शांति नजर को दक्खिन की ओर खड़ी आम के पेड़ की ओर खींच रही है। आम की डालीयां नीचे की ओर झुकी हुई है । उनकी ऊंचाई मुश्किल से आदमकद है आम की एक डाल पर नन्हे नन्हे पाँवों की एड़ियां दिखाई दे रही है ।” 2
 
यदि पात्र सृष्टि पर विचार किया जाए तो उपन्यास के भीतर हम बहुत से पात्रों को देखते हैं, जो गाँव तथा शहर के निवासी हैं। यह पात्र कथा की आवश्यकता के अनुसार प्रकट हुए हैं । हालांकि सभी के नामों को स्मृति में अंकित कर पाना असहज है, फिर भी मुख्य पात्रों में सोमपुरा के मुखिया अपनी ही पतोहू को बुरी दृष्टि से देखने वाले करसनभा, सर्वस्व ईश्वर को मानने वाले तथा ईश्वर में विशेष आस्था रखने वाले पीथु भगत तथा उनके पुत्र नरसंग,एम के पटलाइन,गोकुलिया के पभा मुखी, बदरी गाँव के त्रिकमजी मुखी, करसन मुखी के तीन बेटे- भीमा, जेठा और लाला, मोती कुम्भार, मनसुख सुथार,पिथूभा के पुत्र नरसंग और इनके पड़ोसी फतो तथा उमो , धमलो माली, लोकसेवक हीरूभाई,  अमीचंद सेठ, विधायक रमनलाल (नरसंग के जमाई), राजनीतिज्ञ पशाभाई  और इन सब की दूसरी पीढ़ी में नरसंग के देव और लवजी, भीमा के रणछोड,  माना का नाराण, फता का गेमर आदि पात्र अपनी पारिवारिक भूमिका में मनुष्य मात्र का अपने परिवार एवं समाज के साथ जो संवेदनशील रिश्ता होता है, उन भावों को प्रकट करते हुए कथा को विस्तार देने में सहायता करते हैं । उपन्यास के महिला पात्रों में सभी महिलाओं की सलाहकार दोलिमाँ, महिलाओं के सभी रूपों को सुशोभित करने वाली नरसंग की पत्नी कंकु, नरसंग तथा कंकु की पुत्री और रमण लाल की पत्नी हैती, घेमर की पत्नी हीरा, देव की पत्नी इजू और लव जी के कॉलेज समय की मित्र जैमिनी, लवजी की पत्नी शांति आदि मुख्य पात्र हैं । 



मुख्य घटनाओं में सोमपुरा के करसन मुखी द्वारा स्वयं की इच्छा मृत्यु की जाहिरात तथा उसमें मिलती निष्फलता,  भीमा द्वारा नरसंग मुखी का पद ग्रहण करने के बाद नरसंग से रिश्वत लेने का प्रलोभन रखना तथा उसमें नाकाम होना,फता की बेटी का बाल लग्न, भीमा के यहां पहुंची बारात का नाराज होकर के  चले जाना तथा पिथू भगत द्वारा उन्हें पुनः भीमा के घर आने के लिए राजी करना, 15 अगस्त को उत्सव मानकर आजादी की खुशियां मनाना, नरसंग द्वारा भजन मंडली की स्थापना एवं संचालन, माता का खप्पर निकालना, कुंवारी कन्या माणेक के हाथ में से कुमकुम निकलना,  करसन मुखी के पुत्र भीमा द्वारा मार  पड़ना, धमला तथा वेली का विवाह, शिक्षक रमण लाल द्वारा विद्यार्थियों को अहमदाबाद में प्रवास उपलब्ध कराना,पिथू को नुकसान पहुंचाने वाले बैल रेल्ला को बेच देना तथा इस कारण से पिथू भगत का स्वास्थ्य गिरना एवं पिथू भगत को सही करने हेतु रेल्ला को पुनः ले आना, पिथू भगत की मृत्यु, रमणलाल को धारासभा में विजय मिलना, तखत और गलबा के संबंध, सजुबा दरबार द्वारा तखत का बलात्कार, देवूभाई द्वारा एस.एस.सी. के पश्चात गाँव में प्रौढ़  शिक्षण वर्गों का संचालन करते हुए लाइब्रेरी तथा सहकारी मंडल की स्थापना करना, आगे अभ्यास करने हेतु लवजी का अहमदाबाद जाना एवं जैमिनी के साथ मित्रता करना, लवजी का अभ्यास पूरा होने के बाद अहमदाबाद तथा सारंग में अध्यापक बनना तथा स्कॉलरशिप के माध्यम से लवजी का अमेरिका जाना, जैमिनी और हेनरी का विवाह तथा कार दुर्घटना में जैमिनी का अवसान होना और उसकी खोज हेतु लवजी का अमेरिका में रुक जाना आदि घटनाओं को देखा जा सकता है।
 यदि नायक का चयन किया जाए तो यहां संपूर्ण ग्रामीण जीवन तथा वहां के सभी लोग मिलकर नायक का स्थान लेते हैं । अर्थात यहां नायक एक ना होकर अंचल विशेष है,ऐसा कहा जा सकता है। 

हालांकि साथ ही साथ अनेक अवांतर कथाएँ भी  दी गई हैं इनमें से कुछ कथाएँ दृष्टांत रूप में दिखाई देती है तथा कुछ मुख्य कथा के विकास का अंग बनती है । इन कथाओं का उपन्यास के भीतर अपना औचित्य है। धार्मिक प्रवृत्ति के साधारण किसान पिथू भगत की कथा उपरवास पूर्वदीप्ति पद्धति में रचित है । जिसमें एक साधारण किसान द्वारा संतान के अभाव में घर छोड़कर साधू सन्यासियों की संगत में रहना तथा धार्मिक प्रवृत्ति से प्रेरित होकर दूसरों के भले में अपना भला विचारना स्वभाव को रेखांकित किया गया है।पिथू भगत के व्यक्तित्व को दर्शाने हेतु साथ-साथ में कई कथाएँ जोड़ दी गई है यथा- “ठाकुर दादा तथा सुरसंग जी की कथा, सुरसंगजी और साहब की कथा, अमीचंद सेठ तथा भगत की कथा हरि तलैया तथा नागा बाबा की कथा इस कथा के अनुसार
 “एक नागा बाबा (साधु) कुछ बीज डालकर गया था और तब से घास खत्म नहीं हुई। मिट्टी के साथ-साथ महात्मा का मंत्र भी मिला हुआ था !" 3

 लोक संस्कृति को दर्शाने हेतु सोमपुरा तथा उसके आसपास की बदरी, टीन्बा, सारंग, ठेगाडियां आदि अंचलों में व्याप्त तत्कालीन अंधविश्वासों, भूत-प्रेतों की घटनाओं का चित्रण हुआ है। इन में सांप का काटना, हाथ से कुमकुम का झरना आदि प्रसंग आए हैं। यथा-
“ माणेक को सब मां कहने लगे थे। थोड़े दिनों से माणेक को  अनाज खाना बंद करवा दिया गया था। इसके बारे में दो खबरें थी कोई कहता था कि माणेक ने स्वयं अनाज छोड़ दिया है, तो कोई कहता था कि किसी ज्योतिषी ने मां को फल और दूध देने के लिए कहा था । अब माणेक को उसके घर वापस नहीं जाने दिया जाएगा वहां मंदिर बनेगा ।" 4
उपरवास उपन्यास के भीतर पीढ़ी गत वैचारिक अंतर को आधुनिकता के प्रभाव में आने के बाद बहुत सुंदर तरीके से स्पष्ट किया गया है।कथात्रयी के मुख्य पात्रों में पिथू भगत तथा नरसंग की विचारधारा में बहुत परिवर्तन है । हालांकि दोनों ही मानव के कल्याण को सर्वोच्च सम्मान देते हैं ।  देव तथा लवजी की विचारधारा पिथू भगत एवं नरसिंह दोनों से कुछ अधिक अलग ना होते हुए भी आधुनिकता से प्रभावित हुई लगती है। 
उपन्यास को किस कोटि में रखा जा सके, इस हेतु विद्वानों में मतभेद है -“चंद्रकांत शेठ इस कथा को रघुवीर की देश काल की आत्मकथा तथा इसका गुण चित्रण धर्मी गिनाते हैं । मणिभाई पटेल इसे हिंदी उपन्यासों की दृष्टि से एक आंचलिक उपन्यास मानते हैं । प्रमोद कुमार पटेल इसे जानपदी नवलकथा कहते हैं। ”5

भाषा शिल्प 

कथा के तीनों खंडों में भाषा में सहज परिवर्तन देखने को मिलता है। देश काल के अनुसार भाषा का यह परिवर्तन उचित भी है । नरसंग  उनके पिता पिथू भगत की भाषा में ज्यादा दूरी नहीं दिखाई देती है किंतु, नरसिंह की तुलना में उनके पुत्र  देव जो कि पढ़े-लिखे युवक है, उनकी भाषा में नगरीपन देखा जा सकता है। लवजी देव से अधिक पढ़े लिखे हैं तथा साथ ही वे अहमदाबाद में रहते हैं इसलिए उनकी भाषा में और भी अधिक बदलाव दिखाई देता है। 

पात्रों की मानसिक स्थिति के अनुसार भाषा में परिवर्तन तथा उतार-चढ़ाव सौंदर्य सहित देखा जा सकता है। पात्रों की भाषा में परिस्थितियों अनुसार तथा भाव अनुसार परिवर्तन देखा जा सकता है। उत्तर गुजरात की प्रादेशिक बोली का प्रयोग उच्चारण की विशेषताओं के साथ  में लिया गया है। लोक भाषा का मुख्य गुण चित्रात्मकता तथा लक्षणा शब्द शक्ति दोनों का ही उपयोग उपरवास उपन्यास में देखा जा सकता है । कहावतों लोकोक्तियों तथा मुहावरों  का भी यदा-कदा किंतु उचित तथा परिस्थिति अनुरूप प्रयोग किया गया है। जो कि पाठक के मन को आकर्षित करता है तथा परिस्थिति को चित्रात्मक रूप से पाठक के सामने उपलब्ध कराता है। यथा- पीथू भगत द्वारा करसन मुखी को धर्म करने के मार्ग पर लगाने हेतु धर्म तथा अधर्म का परिवर्तन समझाने में प्रयोग किया हुआ यह वाक्य देखा जा सकता है, जो इस स्थिति को स्पष्ट करता है कि, करसन मुखी धर्म तो करता है किंतु साथ ही रिश्वतखोरी भी करता है। 
  “ घूस के पैसा लुटाये से धर्म नहीं होता ।" (लांचना पैसा वापरवाथी धर्म ना थाय ।) इसी तरह अन्यत्र लिखा है-
“केहु के चिता पर आपन खिचड़ी पकावे वाला कबौ सुखी नाहीं होत।" 
 (कोईनी  चिता ऊपर पोतानी खिचड़ी पकवनारो कदी सुखी थई शकतो नथी।) 

जिस प्रकार पढ़े लिखे लोगों द्वारा भाषा में कुछ आधुनिकता की झलक को दिखाया गया है उसी प्रकार कम पढ़े लिखे अथवा ग्रामीण लोगों द्वारा भाषा में आधुनिक शब्दों का तद्भव रूप भी दिखाया गया है जो कि तत्कालीन समय परिवर्तन दर्शाने के संदर्भों में उचित है यथा- पावर, आर्डर, हाइट, सीजन वगैरह। लेखक की भाषा पात्रों की भाषा से कहीं भी अलग पड़ी हुई नजर नहीं आती। 
रघुवीर की कृति का कथा चित्र उत्तर गुजरात का मेहसाणा जिले का सोमपुरा एवं उसके आसपास का क्षेत्र है। अतः भाषा में उत्तर गुजरात में प्रयोग होने वाले शब्दों का होना सहज संभाव्य है। कुछ शब्द प्रयोग इस प्रकार हैं-
भले मानुष (भलादमी), (आसिरवाद) आशीर्वाद, (पुंण) पुण्य   (किहिस) क्यांक, (नियाव) न्याय, (अनियाव) अन्याय।
लोक छवि को उतारने हेतु रघुवीर जी के उपन्यास  उपरवास में अश्लील शब्दों का भी प्रयोग हुआ है यथा साला सूअर (साला सुव्वर), कुलच्छीनी (कुलटा) , हिजड़ा आदि उपन्यास में इन  अप शब्दों के प्रयोग से उपन्यास को कहीं कोई हानि नहीं पहुंची है अर्थात ग्रामीण लोक जीवन की सच्चाई को दिखाने हेतु इन शब्दों का होना आवश्यक अंग बनकर उभर आया है। उपन्यास में गद्य तथा पद्य दोनों रूपों का सुंदर समायोजन है। लवजी के माध्यम से कई कविताएँ रघुवीर जी ने लिखी हैं और पाठक के सामने उपस्थित की हैं । यथा “एक स्वदेश जता मित्रने भलामण"6 अर्थात् " स्वदेश  जा रहे मित्र को सलाह" जैसी लंबी कविता इसका एक सुंदर उदाहरण है। इसी प्रकार “आ छिन्न विचारों नथीने रची बेसे उच्छवास"7  अर्थात “यह बिखरे हुए विचार, यदि रच डाले उच्छवास"  इस प्रकार कई छोटी-बड़ी कविताओं के साथ साहित्य के प्रांगण में उपरवास उपन्यास अपना विशिष्ट स्थान बनाता है। अतः कहा जा सकता है कि उपन्यास में काव्यात्मकता का गुण भी मौजूद है।  उपमा तथा उत्प्रेक्षा अलंकार का प्रयोग भी बहुत सुंदर तरीके से किया गया है। ब्रज तथा अवधी भाषा के शब्दों का प्रयोग कबीर दास की कुछ पंक्तियों के लिए तथा राधा कृष्ण के प्रेम कि कुछ पंक्तियों के लिए हुआ है । संस्कृत के श्लोकों का भी उद्धरण के रूप में प्रयोग हुआ है। 
डॉक्टर ममता शर्मा के शब्दों में “रघुवीर ने अपने उपन्यासों का भाषिक रचाव सुंदर रीति से किया है  उन्होंने लोकबोली, कहावतों, मुहावरों, लोकोक्तियों, बिंब एवम प्रतीकों के द्वारा भाषा को सुंदर रूप दिया है। उनकी शैली वर्णनात्मक अधिक है साथ ही संस्कृत अंग्रेजी आदि अन्य भाषाओं के अपने ज्ञान को भी प्रकट किया है।"8
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि   उपरवास उपन्यास लेखक  द्वारा भोगे हुए यथार्थ का चित्रांकन है । यहां लव जी का पात्र रघुवीर जी के जीवन से बहुत अधिक मिलता है यदि वास्तविक धरातल पर देखा जाए तो उपन्यास के पात्र काल्पनिक पात्र ना होकर मानवीय पात्र हैं। जिन्हें हम अपने आसपास में देख सकते हैं। इनमें मानवीय कमजोरियों के गुण होने के बावजूद आदर्श के प्रति जो प्रेरणा है वह वास्तव में सराहनीय है। एक साधारण मनुष्य के मन के भीतर चलने वाले अंतर्द्वंद्व  का स्पष्ट रूप से लेखांकन करने में उपन्यासकार ने सफलता अर्जित की है । इनमें भी प्रथम तथा द्वितीय पीढ़ी के पिथू भगत एवं नरसंग जैसे पात्रों को आज के समय में खोजना कुछ असंभव सा है किंतु मूल्य हीनता के इस युग में हमें आज भी ग्राम जीवन में देव तथा गेमर की पीढ़ी के पात्र अपनी शक्ति तथा सामर्थ्य के साथ निराशा का अनुभव करते हुए संघर्षशील दिखाई देते हैं । आधुनिक संदर्भों में यह कथा भारतीयता की शोध की कथा कही जा सकती है  जिसमें नैतिक मूल्यों हेतु अपना सर्वस्व निछावर करने वाला देव तथा मूल्य हीनता को प्रोत्साहित करने वाला रणछोड़ दोनों ही प्रकार के पात्रों की खोज की जा सकती है। ऐसे में बुजुर्गों द्वारा ने पाया जाने वाला तत्व बहुत अधिक कीमती हो जाता है। निशा माथुर ने सही ही कहा है कि-
“जब ये एहतराम होता है कि
कोई हमारा साथी, रहनुमा भी नहीं,
खुशि‍यों की जिंदगी में तब, फलसफे बन जाते हैं, हमारे बुजुर्ग।
चढ़ता दरिया बनकर और उफान के
गर पाना चाहे मंजिल कोई
देकर मशविरा तहजीब का, एक तजुर्बा बन जाते हैं, हमारे बुजुर्ग।"9
हमारी संस्कृति ही हमारी पहचान है।जब हम इस सत्य से अवगत होंगे तभी भारतीय गाँव का सच्चा चित्र उभर कर सामने आएगा । कहने में तो आज मनुष्य गाँव से निकलकर विश्व गाँव बनाने की ओर जा रहा है। किंतु सत्य तो यह है कि वह अपने गाँव से दूर होने के बाद अपनी संस्कृति से भी दूर होता चला जा रहा है। जहां वह गाँव से बिछड़ कर न शहर का रह पाता है और ना ही वैश्विक गाँव का । शायद इसी पीड़ा को लेकर वरिष्ठ लेखक रघुवीर चौधरी जी ने उपरवास उपन्यास की रचना की है। अतः यह कहने में कोई अतिशयोक्ति न होगी यह उपन्यास अपने सभी पक्षों को मजबूती से हमारे सामने रखते हुए साहित्य के प्रांगण में अपना विशिष्ट स्थान बनाता है। 

संदर्भ:

1. 1- https://en-m-wikipedia-org.translate.goog/wiki/Raghuveer_Chaudhari?_x_tr_sl=en&_x_tr_tl=hi&_x_tr_hl=hi&_x_tr_pto=tc,sc
2. 'उपरवास',रघुवीर चौधरी, पृ.सं.1
https://www.44books.com/upar-vas-kathatrayi-raghuveer-chaudhary.html
3. वही, पृ.सं.87
4. वही, पृष्ठ संख्या 243
5. ‘उपरवास विशे', सं. संजय चौधरी पृ.सं.,143
6. ‘अंतर्वास', रघुवीर चौधरी, पृ.सं.330
https://www.44books.com/upar-vas-kathatrayi-raghuveer-chaudhary.html
7. वही, पृ.सं.327
8. ‘रेणु और रघुवीर चौधरी के आंचलिक उपन्यास: तुलनात्मक अध्ययन', डॉ.ममता शर्मा, पृ.सं.18
9. निशा माथुर https://m--hindi-webdunia-com.cdn.ampproject.org/v/s/m-hindi.webdunia.com/hindi-poems/poem-115082500076_1.html?amp=1&amp_gsa=1&amp_js_v=a9&usqp=mq331AQIUAKwASCAAgM%3D#amp_tf=From%20%251%24s&aoh=16793066696979&referrer=https%3A%2F%2Fwww.google.com


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