कृष्ण भक्त सूरदास और उनकी रामकथा

प्रो. गीता कपिल

गीता कपिल

कृष्ण लीला को लोक के सन्दर्भ में जिस प्रकार सूर ने अपनी बन्द आँखों से रूपायित किया वह उनकी ही प्रतिभा का कमाल है। ‘सूरसागर’ उनका श्रेष्ठ ग्रंथ है, जो भाव, भक्ति, कला व संगीत की दृष्टि से अन्यतम है तथा सूरदास जी की कृष्ण भक्ति का भी परिचायक है। इसकी रचना भागवतपुराण की पद्धति पर हुई है किन्तु अनेक स्थलों पर सूरदास ने अपनी मौलिक प्रतिभा व सूझबूझ का भी इसमें परिचय दिया है।
यह निर्विवाद है कि सूरदास कृष्ण के अनन्य भक्त हैं, किन्तु उन्होंने परिमाण में कम ही सही, रामकाव्य की भी रचना की है। ‘सूरसागर’ व ‘सारावली’ में जहाँ वे विष्णु के अवतारों की चर्चा करते हैं, वहाँ उन्होंने रामावतार की विशद् चर्चा की है। इसमें संक्षेप में रामकथा का पूर्ण परिपाक मिलता है। सूरदास जी बल्लभाचार्य के शिष्य थे तथा पुष्टिमार्गीय भक्त कवि थे। अतः कृष्ण की लीलाओं का गायन व सृजन उनकी इस प्रवृत्ति के अनुकूल है, किन्तु प्रश्न उठता है कि उन्होंने रामकाव्य की रचना क्यों की? इस सन्दर्भ में डॉ. प्रभुदयाल मीतल का मत है कि, ‘‘पुष्टिमार्गीय भक्ति सिद्धान्त के अनुसार परब्रह्म कृष्ण ‘परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्’ की सिद्धि के लिए अपने आधिदैविक पुरुषोत्तम रूप से विभिन्न युगों में अवतार धारण करते हैं। ऐसे चौबीस प्रमुख अवतार हुए हैं। इसमें पुरुषोत्तम कृष्ण का षोडश कलाधारी पूर्णावतार है, शेष सभी कलावतार एवं अंशावतार हैं। कलावतारों में राम को सर्वोपरि माना गया है। उनके पश्चात् नृसिंह और वामन का महत्त्व है। इन चारों अवतारों की जयंतियों के वर्षोत्सव वल्लभ सम्प्रदायी मंदिरों में मनाये जाते हैं। इनमें कृष्ण जन्मोत्सव के पश्चात् रामजन्मोत्सव ही अधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है और उसे राम नवमी (चैत्र शु. 9) को सम्पन्न किया जाता है। उस अवसर पर भगवान राम की जन्म बधाई सहित उनकी आरम्भिक लीलाओं का गायन द्वारा कीर्तन करने का नियम है। साम्प्रदायिक वर्षोत्सवों में दशहरा (आश्विन शुक्ल 10) को भी भगवान राम से सम्बन्धित माना गया है।उस अवसर पर अधिकतर लंका-दहन, अंगद रावण संवाद और राम-रावण युद्ध से सम्बन्धित पद गाये जाते हैं।’’ 1 
महाकवि सूरदास का वल्लभाचार्य जी व श्रीनाथ मंदिर से घनिष्ट सम्बन्ध रहा। अष्टछापी कवियों में वे प्रमुख थे, जिनका मुख्य कार्य मंदिर में कीर्तन भजन करना था। वल्लभाचार्य जी के पुत्र विट्ठलदास जी ने मंदिर की व्यवस्था को सुनियोजित किया, जहाँ रामनवमी व दशहरा बड़े उत्साहपूर्वक मनाये जाते थे, जिनमें राम-चरित्र का गायन होता था। डॉ. प्रभुदयाल जी ने व्यापक शोध से निष्कर्ष निकाला कि ‘‘सूरदास जी ने सं. 1602 से अपने अन्तिम काल सं. 1640 तक 38 बार रामनवमी और दशहरा के वर्षोत्सवें में राम सम्बन्धी पदों का गायन किया था। यदि उन्होंने उन दोनों उत्सवों पर दो-दो चार-चार पद भी गाये हों, तब भी उनके द्वरा राम-सम्बन्धी पर्याप्त पद रचे जाने का प्रमाण मिलता है।’’2 सूरसागर में नवम स्कन्ध के पद संख्या 15 से पद संख्या 173 तक रामकथा के 158 पद हैं तथा ‘सारावली’ में भी चौबीस अवतारों के प्रसंग में रामकाव्य की चर्चा सूर ने की है, किन्तु ‘सूरसागर’ व ‘सारावली’ दोनों की कथाओं में कतिपय अन्तर भी परिलक्षित होता है।
सूरदास जी का रामकाव्य भावोत्कर्ष की दृष्टि से उत्तम काव्य है। इसमें अनेक मार्मिक प्रसंग हैं, जो सूरदास जी की मौलिक प्रतिभा के परिचायक हैं। यद्यपि तुलसी की रामकथा के समान इसमें वह उत्कर्ष नहीं है, कारण स्पष्ट भी है, सूर कृष्णलीला के गायन में प्रवीण हैं और तुलसी राम लीला में। सत्यजीवन वर्मा इस सन्दर्भ में कहते हैं कि ‘‘सूरदास ने यद्यपि रामचरितगान करने में कम भक्ति नहीं दिखाई है, पर उसमें वह माधुर्य नहीं ला सके जो वे कृष्ण लीला गाने में ला सके हैं। यही हाल तुलसीदास का भी है। उनकी ‘कृष्ण गीतावली’ उतनी भावपूर्ण नहीं हो सकी है, जितनी उनकी ‘रामगीतावली’ हुई है। कारण इसका यह था कि एक बाल कृष्ण की लालाओं से भली-भाँति परिचित था, दूसरा पुरुषोत्तम रामचन्द्र के वीर कृत्यों से। इसी से न सूरदास राम के वीर कृत्यों के विषय में उतना अच्छा लिख सके और न तुलसी कृष्ण की बाल लीलाओं के विषय में।’’ 3 
‘सूरसागर’ के नवम स्कन्ध की रामकथा में अनेक भावपूर्ण स्थल हैं। आरम्भ में ही सूरदास रामावतार का उद्देश्य स्पष्ट करते हैं-
जय अरु विजय पारषददोइ। बिप्र-सराप असुर भए सोइ।
एक बराह रूप धरि भारयौ। इक नरसिंह रूप सहाइयों।
रावन-कुंभकरन सोइ भए। राम जनम तिनकै हित लए।4 
सूरदास की दृष्टि में राम का अवतार आसुरी जीवों के उद्धार और मुक्ति के लिए होता है। यह उनकी मौलिक कल्पना है।
राम जन्म का बहुत सुन्दर और प्रभावोत्पादक वर्णन सूरदास जी करते हैं। पूरी अयोध्या नगरी प्रफुल्लित है। सर्वत्र बधाई बज रही है। पृथ्वी का भार उतारने हेतु भगवान स्वयं पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं। राजा दशरथ पुत्र रत्न पाकर आनन्दमग्न हैं और याचकों को दानादि देकर प्रसन्न करते हैं-
आजु दसरथ कैं आँगन भीर
ये भू-भार उतारन कारन प्रगटे स्याम-सरीर। 5 
देश-देश के राजे-महाराजे अपने सम्राट को पुत्र रत्न की प्राप्ति हेतु बधाई टीका व संदेश भेज रहे हैं-
रघुकुल प्रगटे हैं रघुवीर
देस-देस तैं टीकौ आयौ, रतन कनक मनि होर।। 6 
सूरदास वात्सल्य रस के सम्राट हैं। उन्होंने राम की बाल लीलाओं का वर्णन भी उतनी ही तन्मयता व भावूपर्ण शैली में किया है, जितनी कि कृष्ण लीलाओं का। महाराज दशरथ के रत्न जटित आँगन पर चारों 
करतल सोभित बान धनुहियाँ।
खेलत फिरत कनकमय आँगन, पहिरे लाल पनहियाँ।
दसरथ कौशल्या के आगै, लसत सुमन की छहियाँ।
मानौ चारि हँस सरवर तै बैठे आइ सदेहियाँ। 7 
‘सारावली’ में राम के बाल रूप की सुन्दर झाँकी सूरसागर के बाल कृष्ण का स्मरण कराती है यथा-
घुटुरुवन चलत कनक आँगन में कौसल्या छबि देखत
नील नलिन तनु पीत झंगुलिया घन दामिनी द्युति पेखत।। 8 
सारावली में प्रभु राम के बालरूप का विशद् वर्णन ‘सूरसागर’ के कृष्ण के अनुसरण पर शिख-नख पद्धति पर हुआ है। अतः दोनों वर्णनों में बहुत साम्य भी परिलक्षित होता है यथा, सारावली के राम का सौन्दर्य -
अरुण अधर दमकत दसनावलि चारु चिबुक मुसक्यान
अति अनुराग सुधाकर सींचत दाड़िम बीज समान।9 
सूरसागर में बालकृष्ण के सौन्दर्य -
अरुण अधर कपोल नासा सुभग ईषद हास।
दसन की दुति तड़ित नव ससि भृकुटि मदन बिलास।। 10 
वस्तुतः सूरदास मानव हृदय के पारखी हैं। वन प्रस्थान करते राम को दशरथ वचनबद्धता के कारण रोक नहीं सकते, किन्तु चाहते हैं राम कुछ क्षण उनके साथ रहें। उनकी प्रार्थना में एक पिता की पीड़ा का बड़ा हृदयविदारक वर्णन हुआ है-
रघुनाथ पियारे, आजु रहौ (हो)।
चारि जाम बिस्राम हमारैं, छिन-छिन मीठे बचन कहौ (हो)।
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 आतुर ह्वै अब छाँड़ि अवधपुर, प्रान-जिवन कित चलन कहौ (हो)।
बिछुरत प्रान पयान करैंगे, रहौ आजु पुनि पंथ गहौ (हो)।11 
दशरथ के इन वचनों में कितनी विह्वलता है मानों वे जानते हां कि राम के जाते ही उनके प्राण भी प्रस्थान कर जायेगे। अन्ततः उनकी आशंका सत्य होती है।
वन मार्ग में पुरवासियों और सीता जी के मध्य जो वार्तालाप है, वह भी बड़ा हृदयस्पर्शी है। पुत्रवधुएँ पूछती हैं, ‘इनमैं को पति आहि तिहारै’, तब सीता जी नारी सुलभ संकेतों से ही सब समझा देती हैं कि ‘राजिव नैन मैन की मूरति, सैननि दियौं बताइ।’ जब राम वनगमन पश्चात् भरत अयोध्या लौटते हैं और सारी स्थिति जानकर माँ कैकेयी को भला-बुरा कहते हैं तथा राम को लिवाने चित्रकूट पहुँचते हैं। सूरदास जी ने पाँच पदों में चित्रकूट का बड़ा मार्मिक वर्णन किया है। राम किसी भी स्थिति में पिता के वचनों के विरूद्ध नहीं जा सकते हैं। भरत के अनुनय-विनय के उपरान्त वे उन्हें अत्यन्त सुन्दर उपदेश देकर अयोध्या के लिए रवाना करते हैं-
बंधु, करयौ राज सँभारे।
राजनीति अरु गुरु की सेवा, गाइ विप्र प्रति पारे। 12 
सीता हरण के पश्चात् राम की विरह व्यथा भी सूर की बंद आँखों से छिपी न रह सकी। सीता को न पाकर राम अत्यन्त व्यथित व सन्तप्त होते हैं। वे वन में पशु-पक्षियों, वृक्षों व लताओं से सीता का पता पूछते हैं। यहाँ सूर ने प्रेमी हृदय की अत्यन्त सुन्दर अभिव्यक्ति की है-
फिरत प्रभू पूछत बन-द्रुम बेली।
अहो बंधु, काहूँ अवलोकी इहिं मग बधू अकेली?
अहो बिहंग, अहो पन्नग-नृप या कन्दर के राइ।
अबकैं मेरी बिपत्ति मिटावौ, जानकि देहु बताइ। 13 
लक्ष्मण शक्ति के प्रसंग में भी राम की विह्वलता व वेदना देखते ही बनती है। वे व्याकुल होकर विलाप करते हैं कि उनकी विपत्तियों को बँटाने वाला उनका एकमात्र साथी उनका भाई लक्ष्मण है। अब उनके बिना उन्हें कौन धैर्य धारण कराये -
निरखि मुख राघव धरत न धीर।
भए अति अरुन, बिलास कमल-दल लोचन मोचत नीर।
बारह बरस नींद है साधी तातै विकल सरीर।
बोलत नहीं मौन कहा साध्यौ विपत्ति बँटावन बीर।।14 
सूरदास की राम कथा के चरित्रों में अनेक मौलिक उद्भावनाएँ भी देखी जा सकती हैं। संजीवनी बूटी लाते हुए जब हनुमान अयोध्या में भरत, सुमित्रा व कौशल्या से मिलते हैं और उन्हें राम-रावण युद्ध तथा लक्ष्मण शक्ति का समाचार देते हैं तो सुमित्रा इससे दुःखी नहीं होती वरन् कौशल्या से कहती है-
कौसल्या सौं कहति सुमित्रा, जनि स्वामिनि दुःख पावै
लछिमन जनि हौं भई सपूती, राम काज जो आवै।। 15 
सूरदास जी की कथा में सुमित्रा यहाँ एक वीर क्षत्राणी के रूप में दिखाई देती है, जिसे अपने पुत्र की वीरता पर गर्व है। दूसरी ओर कौशल्या लक्ष्मण शक्ति के समाचार से विचलित हो जाती है और हनुमान के माध्यम से राम के लिए संदेश भेजती है कि -
बिनती कहयौ जाइ पवन सुत, तुम रघुपति के आगे
या पुर जनि आवहु बिनु लछिमन, जननी लाजनि लागे।। 16 
वीर पुत्र की जननी सुमित्रा को कौशल्या का यह कथन अनुचित प्रतीत होता है, अतः वह संदेश इस रूप में भेजती है-
मारुत सुतहिँ संदेश सुमित्रा ऐसैँ कहि समुझावै
सेवक जूझि परै रन भीतर, ठाकुर तउ घर आवै।। 17 
सूरदास ने सुमित्रा के चरित्र को विशेष गरिमा व उत्कर्ष प्रदान किया है। इसके अतिरिक्त मंदोदरी का चित्रण भी एक सती स्त्री की भाँति किया है, जो राम की महिमा व शक्ति से अवगत है, जिसके लिए सीता हरण उसके पति का एक अनुचित कार्य है। अतः वह अपने पति को समझाती है और सीता को ससम्मान राम को लौटा देने की प्रार्थना करती है, किन्तु अभिमानी रावण उसकी एक नहीं सुनता तथा मृत्यु को प्राप्त होता है। तब मन्दोदरी करुण विलाप करती है-
करुना करति मँदोदरि रानी
चौदह सहस सुन्दरी उमहीँ, उठै न कंत महा अभिमानी।
चार-बार बरज्यौ, नहिँ मान्यौ, जनक सुता तैँ कत घर आनी।
ये जगदीश ईस कमलापति, सीता तिय करि तैँ कत जानी।।18 
रावण की अशोक वाटिका में दीन-हीन, अत्यन्त कृश वियोगिनी सीता की छवि भी करुणोत्पादक है। लक्ष्मण सीता को देखकर बहुत दुःखी होते है-
लछिमन सीता देखी जाइ,
अति कृस, दीन, छीन तनु प्रभु बिनु नैननि नीर बहाइ। 19 
श्री ब्रजेश्वर वर्मा लिखते हैं कि सूर के रामकाव्य का ‘‘प्रत्येक पद कवि की गम्भीर हृदयानुभूति का परिचायक है। कवि ने सीता का सुकुमार, व्यथित करुण चित्र सबसे आत्मीयता के साथ उतारा है। मंदोदरी की करुणा तथा कौशल्या के वात्सल्य को भी निकट से परखा गया है। हनुमान के अनन्य भाव के चित्रण में भी तन्मयता है तथा राम के वज्रकठोर और कुसुम कोमल हृदय को भी सूरदास ने टटोला है।’’ 20 
सूर की रामकथा मानवीय व सामाजिक दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है। सीता व ग्रामबधुओं के वार्तालाप में ग्रामीण जीवन की सहजता व सरलता दिखाई देती है। ग्रामवधुएँ बड़ी सहजता से प्रश्न करती हैं, ‘कौने गुन बन चली वधू तुम’ इस पर सीता जी उत्तर देती है, ‘सासु की सौति सुहागिनि सो सखि’ इनका यह कथन लोक मानस की अभिव्यक्ति करता है। इसी प्रकार दशरथ के अन्त्येष्टि प्रसंग व मृत्योपरान्त संस्कारों के माध्यम से कवि ने लोक जीवन में प्रचलित विविध संस्कारों की परख की है।
सूरदास जी की रामकथा के अन्तिम पद का उल्लेख यहाँ अनिवार्य प्रतीत होता है। वे श्रीराम के दरबार में अपनी फरियाद पहुँचाना चाहते हैं, परन्तु समस्या है कि वे किस भाँति और कब प्रभु को अपनी स्थिति से अवगत कराये। वे स्वयं प्रभु से मिलना चाहते हैं परन्तु बड़ी दुविधाजनक स्थिति है कि इतने बड़े लोगों के बीच वे दरबार में कैसे जाये? अतः वे बाहर से ही लौट आते हैं और अन्त में उन्हें एक उपाय झूझता है कि वे पत्रिका लिख कर प्रभु को भेज दें-
विनती किहिं बिधि प्रभुहि सुनाऊँ।
महाराज रघुबीर धीर कौ समय न कबहूँ पाऊँ।
जाम रहत जामिनि के बीते तिहिँ औसर उठि धाऊँ।
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एक उपाय करौ कमलापति कहौ तो कहि समझाऊँ।
पति उधारन सूर नाम प्रभु लिखि कागज पहँचाऊ।। 21 
स्पष्ट है सूर पत्रिका लिखने का उपाय सारे उपाय समाप्त होने के पश्चात् रखते हैं, परन्तु तुलसी की भाँति उनकी पत्रिका प्रभुराम के दरबार में ‘सही’ नहीं की जाती। इसका आशय है सूर पत्रिका लिखते नहीं है मात्र पत्रिका लिखने का उपाय सुझा रहे है। वे पहले स्वयं प्रभु राम से मिलना चाहते हैं। इससे राम के प्रति उनकी अगाध भक्ति और आत्मनिवेदन के भाव का परिचय मिलता है।
 इस प्रकार सूर का रामकाव्य अत्यन्त भावपूर्ण, सहज व मौलिक है। उसमें रसपूर्ण स्थलों की भरमार है। रामकाव्य परम्परा में यह महत्त्वपूर्ण स्थान का अधिकारी है। इसकी प्रेरणा उन्होंने भागवत पुराण से अवश्य ली है, परन्तु ‘‘उन्होंने भागवत की रामकथा को काव्य का रूप भी दिया। सूरदास ने अपनी मौलिकता को भी इसमें समाहित किया।.............. भागवत की रामकथा और सूरदास की रामकथा में कथात्मक दृष्टि से हीं नहीं वरन् वर्णन शैली की दृष्टि से भी अन्तर प्रतीत होता है।’’22 

संदर्भ - 
1. सूर सर्वस्व - डॉ. प्रभुदयाल मीतल, साहित्य संस्थान, मथुरा, सं. 1983, पृ. 479
2. वही , पृ. 479
3. उदृधृत महाकवि सूरदास - जयकिशन प्रसाद खण्डेलवाल, रवीन्द्र प्रकाशन, पृ. 58
4. सूरसागर (नवम स्कन्ध) - काशी नागरी प्रचारिणी सभा, पद 15
5. वही, पद 16
6. वही, पद 18
7. वही, पद 19
8. सूरसारावली - सं. डॉ. मनमोहन गौतम, रीगल बुक डिपो, दिल्ली, सं. 1974, पद 166
9. वही, पद 178
10. सूरसागर, (दशम स्कन्ध), पद 2440
11. सूरसागर (नवम स्कन्ध), पद 33
12. वही, पद 154
13. वही, पद 64
14. वही, पद 145
15. वही, पद 152
16. वही, पद 154
17. वही, पद 154
18. वही, पद 160
19. वही, पद 161
20. महाकवि सूरदास - जयकिशन प्रसाद खण्डेलवाल, पृ. 53-54
21. सूरसागर (नवम स्कन्ध), पद 172
22. मध्यकालीन रामभक्ति साहित्य में सामाजिक चेतना - डॉ. सर्वेश कुमार दुबे, आर्य प्रकाशन मंडल, गांधीनगर, दिल्ली, सं. 1992, पृ. 166
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