सुमित्रानन्दन पंत के साहित्य में चेतना के विविध आयाम: साहित्यिक परिचय के विशेष सन्दर्भ में

एम एस सरस्वती दुबे

एम.ए., किरोड़ीमल महाविद्यालय, हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय
•नेट परीक्षा उत्तीर्ण
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        सुमित्रानंदन पंत का समग्र लेखन हिन्दी साहित्य की आधुनिक चेतना का प्रतीक है। उन्होंने युगधर्म के भौतिक, सामाजिक और नैतिक प्रश्नों के साथ-साथ आध्यात्मिक चेतना के सूत्रों को भी अपनी काव्य-सर्जना में आत्मसात् किया है। आत्मपरक दृष्टिकोण, वैचारिक भावबोध तथा जीवन जगत की जटिलताओं को मानवीय संवेदना और कवि-करुणा से अभिषिक्त किया है। महात्मा गाँधी, कार्ल मार्क्स, श्री अरविन्द और अनेक विकासवादी-आशावादी दार्शनिकों से समय-समय पर प्रभावित प्रेरित पंत एक 'सर्व समन्वयवादी' लोकपक्षधर दृष्टि रखते थे। अपने समकालीन कवियों की तुलना में वे अधिक पंथ निरपेक्ष थे और रूढ़िगत मध्यकालीनतावाद के विरुद्ध एक तर्कयुक्त सोच रखते थे । प्रकृति, जीवन और मनुष्य का जैसा यथार्थ रिश्ता पंत के काव्य में मिलता है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। पंत के काव्य में एक ओर भारतीय संस्कृति की विवेक परंपरा का तेज है तो दूसरी ओर विश्व चेतना से संपन्न ज्ञान-विज्ञान को पाने की ललक। पंत की काव्य-चेतना मानवीय संवेदनाओं के अनुरूप विकासोन्मुखी रही है जो सन् 1916 से 1977 तक विस्तार से फैली हुई है।  सन् 1936 तक पंत पूरी तरह छायावादी सौन्दर्य के कवि रहे। 1936 से 1940 ई. तक उनपर मार्क्सवाद का प्रभाव दिखाई देता है। इसके परिणामस्वरूप उनके काव्य में भौतिक यथार्थ का चित्रण हुआ है। इसके पश्चात् सन् 1940 से 1965 तक उनपर अरविन्द दर्शन का प्रभाव दिखाई देता है। इसके आगे सन् 1965 से 1977 तक का उनका काव्य, विकासात्मक अभिनव चेतना का सृजनकाल रहा।

बीसवीं शताब्दी के भारतीय अंतस् और मानस को समझने के लिए महाकवि पंत के वृहद रचनाकाश को जानना बहुत आवश्यक है। पंत प्रबंध-काव्य के रचयिता, प्रगीत प्रतिभा के पुरोगामी सर्जक तथा कला-विदग्ध कवि के रूप में, व्यापक पाठक वर्ग में समादृत रहे हैं, यद्यपि उन्होंने नाटक, एकांकी, रेडियो- रूपक, उपन्यास, कहानी आदि विधाओं में भी रचनाएँ प्रस्तुत की हैं। कवि पंत का रचना संसार निम्न रूप में है-
हार (उपन्यास) 1916-17 (पंत की पहली कृति) 1960 में प्रकाशित, वीणा (1927), ग्रंथि (1929), पल्लव (1926), गुंजन (1932), ज्योत्सना (नाटिका 1934) , युगांत (1936), पाँच कहानियाँ (1936) युगवाणी (1939), ग्राम्या (1940), पल्लविनी (1940), आधुनिक कवि (1941), स्वर्ण किरण (1947), स्वर्णा धूल (1947), युगपथ (1949), उत्तरा (1949), रजत शिखर (1952), अतिमा (1955), सौवर्ण (1956), वाणी (1958), रश्मि बंधन (1958), चिदम्बरा (भारतीय ज्ञानपीठ से सम्मानित, 1958), कला और बूढ़ा चांद (साहित्य अकादमी से सम्मानित, 1959), साठ वर्ष: एक रेखांकन (1960), शिल्प और दर्शन (1961), लोकायतन (1964), छायावाद:पुनर्मूल्यांकन 1965 , कला और संस्कृति (1965), किरण वीणा (1967), पौ फटने से पहले (1967), स्वर्णिम रथ चक्र (1968), पतझर: एक भाव-क्रांति (1969), गीतहंस (1969), शंखध्वनि (1971), शशि की तरी (1973) , गंध वीथी (1973), साठ वर्ष और अन्य निबंध (1973) आस्था (1973) सत्यकाम (1975) गीत-अगीत (1976), संक्रांति (1977), मुक्ताभ (1977) इसके अतिरिक्त सुमित्रानंदन पंत जी की अन्य कृतियाँ थी जिसमें समाधिता, अभिषेकिता, संयोजिता, चित्रांगदा (रूपात्मक-चित्रात्मक रचनाओं का संकलन) मधुज्वाल ( उमर खय्याम की रुबाईयों का हिंदी रूपांतर), उच्छवास (इलाचंद्र जोशी के अनुसार किशोर कवि की सर्वप्रथम प्रकाशित रचना) युग-पुरुष, तारापथ, छाया, हरि बांसुरी सुनहरी टेर, शिल्पी, गद्य-पथ, लोकायतन (संछिप्त), सुमित्रानंदन पंत ग्रंथावली (शांति जोशी द्वारा संपादित) रूपाभ (पत्रिका का संपादन, 1938 ई.)

पंत जी की समस्त रचनाएँ भारतीय जीवन की समृद्ध सांस्कृतिक चेतना से गहन साक्षात्कार कराती हैं। उन्होंने खड़ी बोली की प्रकृति और उसके पुरुषार्थ, शक्ति और सामर्थ्य की पहचान का अभियान ही नहीं चलाया, उसे अभिनंदित भी किया। उनके प्रकृति-वर्णन में हृदयस्पर्शी तन्मयता, उर्मिल लयात्मकता और प्रकृत प्रसन्नता का विपुल भाव है।

व्यक्ति के परिवेश का उसके जीवन एवं रचना संसार पर निश्चित रूप से प्रभाव पड़ता है। कवि की गतिशीलता (mobility), जो कवि की रचना, रचना- दृष्टि और सोच को प्रभावित करती है, छायावादी कवियों के बीच पंत में सर्वाधिक मिलती है। किसी कवि के काव्य का सम्यक् रसास्वादन एवं विवेचन करने से पूर्व उसके जीवन तथा व्यक्तित्व का अध्ययन नितांत आवश्यक है, क्योंकि कवि के व्यक्तित्व की गहरी छाप उसके सम्पूर्ण काव्य पर निर्भर होती है। कवि अपनी कविता को व्यक्तितिगत रुचि, भाव, विचार एवं राग-द्वेषों आदि से अलग नहीं रख सकता। इलियट की भांति '’काव्य को व्यक्तित्व से पलायन नहीं कहा जा सकता बल्कि इसके विपरीत काव्य में कवि का सम्पूर्ण व्यक्तित्व अभिव्यक्त होता है।“1 कवि पंत के लिए तो बच्चनजी ने लिखा है, जो उनकी कविता है वही उनका जीवन है और जो उनका जीवन है वही उनकी कविता है। पंत जी के विषय में तो यह बात बिल्कुल ठीक है कि बिना उनके व्यक्तित्व को समझे उनकी रचनाएं नहीं समझी जा सकती ।"2 स्वयं पंत ने भी 'ज्योत्स्ना' में कुमार के मुख से इसी प्रकार के विचार व्यक्त कराये हैं, ‘'कवि का सबसे बड़ा काव्य स्वयं कवि है।"3 वास्तव में देखा जाए तो पंत का जीवन स्वयं कविता है और इनकी कविता है इनके जीवन की परछाई।

अपने जन्म- स्थान कौसानी (अल्मोड़ा) से बाहर पंत जी बनारस, इलाहाबाद, कालाकाँकर, दिल्ली, मद्रास, पांडिचेरी (सन् 1944 ईस्वी) इत्यादि कई स्थानों से जुड़े थे। सन् 1961 ईस्वी में पंत जी ने 24-25 दिनों के लिए विदेश यात्रा भी की थी, जिसके दरमियान इन्हें ताशकंद, मॉस्को, लेनिनग्राड, फ्रांकफुर्त, पेरिस और लंदन जाने का अवसर मिला था। इनकी यह विदेश यात्रा, मुख्यतः सोवियत भारतीय सांस्कृतिक मैत्री संघ के निमंत्रण पर रूस के लिये आयोजित थी। इस विदेश यात्रा से इनके अनेक भ्रम टूटे थे, इनकी दृष्टि का विस्तार हुआ था, इनकी विदेश-भीति (ज़ीनोफोबिया) घटी थी, स्वदेश-गौरव का आत्मशंसी उत्साहाधिक्य 4 संतुलित हुआ था और इन्हें पाश्चात्य संस्कृति के उज्ज्वल पक्ष को, उसकी सीमाओं के साथ, समझने का अवसर मिला था। इन्होंने स्वयं स्वीकार किया है कि इस "विदेश भ्रमण से मेरा ज्ञान-संवर्धन हुआ। आधुनिक सभ्यता के प्रति मेरे जो विचार थे, उन्हें दुहराने का अवसर मुझे इस यात्रा में मिल सका।"5 पंत जी को साफ-सुथरा रहना व स्वच्छ वस्त्र पहनना पसंद था। घुँघराले केश रखने की प्रेरणा इन्हें नेपोलियन के एक चित्र से मिली थी। इस प्रेरणा में किसी 'सुकेशिनी' का योगदान नहीं था। गाँव से शहर जाने के बाद यह भावना और बलवती हो गई यहाँ रहकर पंत जी का दृष्टिकोण व्यापक होने लगा। वे नगरीय जीवन के क्रियाकलापों में सहर्ष भाग लेने लगे और उन्हें अपनी ग्राम्य जीवन की सीमाओं तथा मनोविन्यास की कमियों का आभास हुआ। यहां रहते हैं हुए पंत जी पर सबसे अधिक प्रभाव स्वामी सत्य देव जी के भाषणों का पड़ा जो देश-प्रेम व भाषा-प्रेम से ओत-प्रोत है दूसरा विशिष्ट प्रभाव स्वामी जी के काव्य पाठ का पड़ा जो उनके काव्य में दिखाई पड़ता है फलस्वरुप उनके मन में यह धारणा दृढ़ हो गई कि कविता गेय होनी चाहिए। स्वामी जी के प्रयत्न से प्रत्येक शहर में 'शुद्ध साहित्य समिति' नामक एक सार्वजनिक पुस्तकालय खुल गया। प्रतिभा को उचित वातावरण प्राप्त होने पर  पंत जी का सहज ही साहित्यिक मन अंकुरित होने लगा इस समय वे आठवीं कक्षा में पढ़ रहे थे तब उनका परिचय श्री गोविंद बल्लभ पंत और उनके भतीजे श्यामाचरण तथा इलाचंद्र जोशी आदि साहित्यकारों से हुआ।

छायावाद की बृहदत्रयी में प्रसाद, निराला और पंत की गणना की जाती है। बच्चन सिंह लिखते हैं “काव्य के विकास में आरोह-अवरोह के आधार पर देखा जाए तो वीणा' से 'युगांत' तक पंत का विकास आरोहात्मक है और 'युगवाणी' से 'लोकायतन' तक अवरोहात्मक । यदि परवर्ती काव्य-संग्रहों से चुनी हुई कविताओं का अलग संग्रह प्रकाशित किया जाय तो उनमें भी विशिष्ट चमक दिखाई पड़ेगी। पंत की शिकायत है कि आलोचक उनके पूर्ववर्ती काव्य को सहानुभूतिपूर्ण ढंग से देखते हैं तो परवर्ती काव्य को उपेक्षा की दृष्टि से ।“ 

दिनकर, अन्य आलोचकों की प्रतिक्रिया में, पंत के विचार काव्य की अतिरेकवादी प्रशंसा करते हैं। पंत की शिकायत में सच्चाई है। लेकिन इसका कोई कारण भी होना चाहिए। परवर्ती काव्य में न रागतत्त्व है न बौद्धिक विश्लेषण-संश्लेषण और न समीक्षा। वह सिद्धान्तों का पद्यानुवाद है। पर पंत ने वहाँ भी कल्पना का पल्ला नहीं छोड़ा है। अन्तर यह है कि पूर्ववर्ती काव्य की कल्पना सर्जनात्मक है तो परवर्ती काव्य की कल्पना यूटोपियायी ।
पंत जी ने 'हार' उपन्यास को अपनी जन्मभूमि कौशानी में लिखा था। यह उपन्यास एकादश पुष्पों में विभाजित है। पंत जी 'मेरी सर्व-प्रथम रचना' शीर्षक में लिखते हैं "रचना उसे कहते हैं जिसमें किसी प्रकार का विधान, संयमन अथवा तारतम्य हो। इस दृष्टि में मेरी पहली रचना कविता ना होकर उपन्यास ही थी।"

जिस प्रकार विलियम वर्ड्सवर्थ के लिरिकल बैलेड्स को अंग्रेजी साहित्य के स्वच्छन्दतावादी युग का घोषणापत्र कहा जाता है, उसी प्रकार पंत की काव्य-कृति पल्लव की भूमिका (प्रवेश) को हिन्दी साहित्य के छायावाद युग का घोषणापत्र कहा जाता है। आचार्य शुक्ल जी के अनुसार “पंत जी की पहली प्रौढ़ रचना 'पल्लव' है जिसमें प्रतिभा के उत्साह या साहस का तथा पुरानी काव्यपद्धति के विरुद्ध प्रतिक्रिया का बहुत चढ़ा-बढ़ा प्रदर्शन है। इसमें चित्रमयी भाषा, लाक्षणिक वैचित्र्य, अप्रस्तुत विधान इत्यादि की विशेषताएँ प्रचुर परिमाण में भरी सी पाई जाती है।" इसमें पंत ने कविता के कुछ कुछ पक्षों का विवेचन-विश्लेषण किया है। ये विषय निम्न हैं-
(i) आधुनिक हिन्दी काव्य की माध्यम भाषा, ब्रजभाषा बनाम खड़ी बोली के विवाद में खड़ी बोली का समर्थन।
(ii) काव्य-भाषा का स्वरूपः पर्याय शब्दों का चमत्कार, लिंग-निर्णय, समास आदि पर विचार।
(iii) अलंकारों को सिर्फ सजावट के साधन की बजाय भावों की अभिव्यक्ति के विशेष द्वारों के रूप में स्थापित करना। 
(iv) खड़ी बोली के संगीत और छन्द विधान की संभावनाओं को टटोलना ।
इन सभी पक्षों को लेकर पंत ने अपनी रीतिवाद विरोधी धारणाएँ प्रकट की।

पल्लव की इस भूमिका का महत्व यह है कि कविता के कला-पक्ष का सूक्ष्म विवेचन सर्वप्रथम इसी भूमिका में किया गया जिसका प्रभाव बाद की काव्य-आलोचना पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

'वीणा' की कविताओं में 'गीतांजलि' का प्रभाव कुछ अवश्य लक्षित होता है। उनकी जो एक बड़ी विशेषता है प्रकृति के सुंदर रूपों की आह्लादमयी अनुभूति, वह 'वीणा' में कई जगह पाई जाती है। सौंदर्य का आह्लाद उनकी कल्पना को उत्तेजित करके ऐसे अप्रस्तुत रूपों की योजना में प्रवृत्त करता है जिनके प्रस्तुत रूपों की सौंदर्यानुभूति के प्रसार के लिये अनेक मार्ग से खुल जाते हैं।"

यह 'ग्रंथि' है असफल प्रेम की है। इसमें एक छोटे-से प्रेमप्रसंग का आधार लेकर युवक कवि ने प्रेम की आनंदभूमि में प्रवेश, फिर चिरविषाद के गर्त में पतन दिखाया है। किंतु इसमें प्रसंग की कोई नयी उद्भावना नहीं है। ‘पल्लव' के अंत में पंत जी जगत के विषम 'परिवर्तन' के नाना दृश्य सामने लाए हैं। इसकी प्रेरणा शायद उनके व्यक्तिगत जीवन की किसी विषम स्थिति ने की है। जगत की परिवर्तनशीलता मनुष्य जाति को चिरकाल से क्षुब्ध करती आ रही है। परिवर्तन संसार का नियम है। यह बात स्वतः सिद्ध होने पर भी सदस्यों और कवियों का मर्म स्पर्श करती रही है, और करती रहेगी, क्योंकि इसका संबंध जीवन के नित्य स्वरूप से है। "

जीवन के व्यापक क्षेत्र में प्रवेश के कारण कवि कल्पना को कोमल कठोर, मधुर, कटु, करुण, भयंकर कई प्रकार की भूमियों पर बहुत दूर तक एक संबद्ध धारा के रूप में चलना पड़ा है। काव्य में चित्रमयी भाषा सर्वत्र अनिवार्य नहीं; सृष्टि के गूढ़, अगूढ़, मार्मिक तथ्यों के चयन द्वारा भी किसी भावना को मर्मस्पर्शी स्वरूप प्राप्त होता है, इसका अनुभव शायद पंतजी को इस एक धारा में चलने वाली लंबी कविता के भीतर हुआ है।"

'गुंजन' में हम कवि का जीवन क्षेत्र के भीतर प्रवेश ही नहीं, उसकी काव्यशैली को भी अधिक संयत और व्यवस्थित पाते हैं।

"युगांत' में हम देश के वर्तमान जीवन में उठे हुए स्वरों की मीठी प्रतिध्वनि जगह-जगह पाते हैं। कहीं परिवर्तन की प्रबल आकांक्षा है, कहीं श्रमजीवियों की दशा की झलक है, कहीं तर्क-वितर्क छोड़ श्रद्धा-विश्वासपूर्वक जीवनपथ पर साहस के साथ बढ़ते चलने की ललकार है- तो कहीं 'बापू के प्रति श्रद्धांजलि है।"

"युगांत' में कवि को हम केवल रूपरंग, चमक-दमक, सुख-सौरभ वाले सौंदर्य से आगे बढ़कर जीवन के सौंदर्य की सत्याश्रित कल्पना में प्रवृत्त पाते हैं।" ‘युगांत' में कवि की वाणी में लोकमंगल की आशा और आकांक्षा के साथ घोर 'परिवर्तनवाद' का स्वर भी रहा है। साथ ही 'वाद' की लपेट से अपनी वाणी को कवि ने एक प्रकार से मुक्त कर लिया है। चित्रभाषा और लाक्षणिक वैचित्र्य के अनावश्यक प्रदर्शन की वह प्रवृत्ति अब नहीं है जो भाषा और अर्थ की स्वाभाविक गति में बाधक हो

'युगान्त' के साथ ही पंत के काव्य-विकास का एक काल-खंड समाप्त जाता है। पर इस काल-खंड में भी 'पल्लव' के समापन के साथ एक परिवर्तन आता है। 'वीणा' की रचनाओं के तार पूरी तरह झंकृत नहीं हुए थे। ‘ग्रंथि’ पुरानी परिपाटी की एक प्रेमकथा है; किन्तु 'पल्लव' में उसका कवि-मराल मुखर हो उठता है । 'पल्लव' की आखिरी कविता 'छायाकाल' है। इसमें स्वयं उन्होंने अपने तत्कालीन काव्य की समीक्षा कर दी है।

"युगवाणी' में तो वर्तमान जगत में सामाजिक व्यवस्था के संबंध में प्रायः जितने वाद, जितने आंदोलन उठे हैं, सबका समावेश किया गया है। इन वादों को लेकर चले हुए आंदोलन में कवि को मानवता के नूतन विकास का आभास दिखाई पड़ता है। वर्तमान पाश्चात्य साहित्यक्षेत्र की एक रूढ़ि (वर्शिप ऑफ द फ्यूचर) के मेल में है। "

आचार्य शुक्ल जी अंत में लिखते हैं- "छायावाद' के बधें घेरे से निकलकर पंतजी ने जगत की विस्तृत अर्थभूमि पर स्वाभाविक स्वच्छंदता के साथ विचरने का साहस दिखाया है।... पंतजी को 'छायावाद' और 'रहस्यवाद' से निकलकर स्वाभाविक स्वच्छंदता (ट्रू रोमांटिसिज्म) की ओर बढ़ते देख हमें अवश्य संतोष होता है।"

प्रकृति स्वयं काव्य है और कोई कवि बन जाय सहज संभाव्य है। प्रकृति के प्रति उसकी आसक्ति इस सीमा तक है कि वह कहता है-
“छोड़ द्रुमों की मृदु छाया
तोड़ प्रकृति से भी माया
बाले तेरे बाल- जाल में
कैसे उलझा दूँ लोचन।“  6

इसका मतलब यह नहीं है कि नारी के बाल जाल में उनकी आँखें उलझी ही नहीं हैं। सच तो यह है कि आँखों का यह उलझना कभी बन्द नहीं हुआ। अरविन्द दर्शन से संबद्ध कविताओं में नारी-शरीर के प्रतीक भरे पड़े हैं।

        रामचंद्र शुक्ल ने पंतजी के बारे में लिखा कि "आरंभ में उनकी प्रवृत्ति इस जग-जीवन से अपने लिए सौंदर्य का चयन करने की थी, आगे चलकर उनकी कविताओं में इस सौंदर्य को संपूर्ण मानव जाति तक व्याप्ति की आकांक्षा प्रकट होने लगी। प्रकृति, प्रेम, लोक और समाज-विषय कोई भी हो, पंत की दृष्टि हर जगह उस सौंदर्य का उद्घाटन करना चाहती है, जो प्रायः जीवन से बहिष्कृत रहती है। वह उतने तक स्वयं को सीमित नहीं करती, उस सौंदर्य को एक मूल्य के रूप में अर्जित करने का यत्न करती है।"

       अज्ञेय ने पन्त की हिन्दी प्रकृति काव्य का प्रख्यात संचयन 'रूपाम्बरा' संपादित प्रकाशित कर उन्हें भेंट किया था। उन्हीं दिनों नरेश मेहता और श्रीकान्त वर्मा द्वारा संपादित पत्रिका 'कृति' ने गजानन माधव मुक्तिबोध और नामवर सिंह के निबंध विशेष रूप से प्रकाशित कर उन्हें एक और तरह की आलोचनात्मक प्रगति दी थी। हिन्दी में आधुनिकता का इतिहास बिना पन्त के अवदान के लिखना सम्भव नहीं है। जब भी हिन्दी आधुनिकता के जातीय आधारों को पहचाना जाएगा, उस पहचान में पन्त की भूमिका को कृतज्ञता से याद किया जाएगा। आज अगर हिन्दी की जातीय चेतना उदार और बहुमुखी है, उसमें परम्परा और परिवर्तन का द्वन्द्व नहीं समाहार है, उसमें खुलापन है और जड़ों के प्रति आग्रह भी तो जिन लेखकों के कारण यह उत्तराधिकार अबाध होकर हमें मिल पाया है उनमें पन्त का नाम और काम बहुत आगे है। सच्चाई तो यह है कि प्रसाद, निराला और पन्त की बृहत्त्रयी के बिना आधुनिक हिन्दी कविता सम्भव नहीं थी, न ही हिन्दी आधुनिकता ही इन तीनों ने न सिर्फ़ ऐसी कविता लिखी जो आगे तक टिकनेवाली है, उन्होंने बाद की कविता का मार्ग भी प्रशस्त किया। असल में तो मुक्ति के बजाय स्वाधीनता, आत्म के बजाय व्यक्ति और लोक के बजाय समाज जैसी अवधारणाएं, जो आज हमें सुप्रतिष्ठित लगती हैं, हमारे परिवेश में छायावाद से ही आना शुरू हुई थीं। जैसे आधुनिकता बिना परम्परा के सम्भव नहीं, वैसे ही यह साफ़ देखा जा सकता है कि नयी कविता बिना छायावाद के सम्भव नहीं थी और छायावाद, उसके प्रथम सिद्धान्तकार पन्त के बिना सम्भव नहीं था।

        कवि श्री सुमित्रानंदन पंत को प्रगतिवाद के अग्रणी कवियों में से माना जाता है। प्रगतिवाद के विषय में एक सामान्य धारणा है कि दर्शन में जो मार्क्सवाद है और राजनीति में जिसे साम्यवाद कहा गया है उसी को हिंदी साहित्य में 'प्रगतिवाद' की संज्ञा दी गई है।  प्रथम विश्वयुद्ध के बाद विश्व भर में परिवर्तन चक्र तेज हो गया था जिसने कवियों की रोमानीवृत्ति, व्यक्तिवादिता, अतींद्रिय सूक्ष्मता, छायालोक की अंधेरी कंदराओं में भटकन, काल्पनिक रंगीनी आदि को यथार्थ के कठोर धरातल पर ला खड़ा किया। सूक्ष्म के प्रति स्थूल के विद्रोह ने नयी काव्य चेतना को जन्म दिया जिसे प्रगतिवाद का नाम दिया गया। चौरी-चौरा आंदोलन और क्रांतिकारियों के क्रियाकलापों का विरोध आदि नाना कारणों से गांधीवाद अपना प्रभाव खोने लगा था जिससे हिंदी साहित्यकार भी अछूते नहीं रह सके पंत जी ने लिखा है "अनेक कवि तथा कलाकारों की सृजन कल्पना इस प्रकार के मानसिक समाधानों से विरक्त होकर अधिक वास्तविक और भौतिक धरातल पर उतर आई वे मार्क्स के द्वंद्वात्मक भौतिकवाद से प्रभावित होकर प्रगतिवाद के नाम से एक नवीन काव्य चेतना को जन्म देने में संलग्न हो गए।" 7
 
कवि पंत ने 'युगांत' की कविताओं का सृजन कर मानों पुरातन युग और रीति-रूढ़ि-संस्कारों के अंत का शंखनाद कर दिया। अपनी पहली ही कविता में उन्होंने लिखा-
 
"निष्प्राण विगत युग! मृत विहंग।
जग नीड़ शब्द औ; श्वासहीन, 
च्युत अस्त-व्यस्त पंखों से तुम
झर- झर अनंत में हो विलीन।"8
 
'युगांत' की 'ताज' शीर्षक कविता में पंत जी ने माना है कि हमें श्रमिक, कृषक आदि दलित-शोषित वर्ग की चिंता करनी चाहिए, न कि मृतकों की उपासना करनी चाहिए; क्योंकि- 'मृतकों के हैं मृतक जीवितों के हैं ईश्वर' । 'बापू के प्रति' में कवि गांधी जी के प्रति इसीलिए श्रद्धानत है, क्योंकि उन्होंने-
"एकता इष्ट निर्देश किया, जब !
खोज रहा था जग समता ।
अंतर शासन चिर रामराज्य, 
औ बाह्य आत्महन् अक्षमता।"9

'युगांत' में पंत की छायावादी सौन्दर्य चेतना और कल्पनाप्रियता बहुत कुछ अवशिष्ट मिलती है, उसकी रचना 'अल्मोड़ा' की सुरम्य देवभूमि में की गई थी, पर 'युगवाणी' और 'ग्राम्या' कालाकाँकर प्रवास की देन है। कवि को यहाँ नवदृष्टि प्राप्त होती है। वह कहता है-
“खुल बए छन्द के बंध, प्रास के रज पाश ।
अब गीत मुक्त औ युगवाणी बहती अयास। "7
 
नयी संस्कृति और सभ्यता का पूर्णोदय नारी मुक्ति से ही संभव है, अतः कवि आवाहन करता है-
"मुक्त करो नारी को मानव, 
चिर वंदिनी नारी को "9
 
'ग्राम्या' पूर्णतः ग्रामीण समाज को समर्पित है। इसकी अनेक कविताओं के शीर्षक ‘गाँव' बोधक है, जैसे- भारत ग्राम, ग्रामदेवता, ग्राम श्री, ग्राम चित्रण, ग्राम युवती, ग्राम नारी, ग्राम कवि, ग्राम दृष्टि, ग्रामवधू, गाँव के लड़के आदि। वह मानता है कि सारा देश वस्तुतः गाँवों में ही तो बसता है-
"सारा भारत है आज एक रे महाग्राम ।
वे परम्परा प्रेमी परिवर्तन से विभीत
ईश्वर परोक्ष से ग्रस्त, भाग्य के दासक्रीत, 
कुल जाति कीर्ति प्रिय उन्हें, नहीं मनुजत्व प्रीत, " #10
 
मार्क्सवाद मानता है कि दुनिया की सारी बुराइयों की जड़ पूंजीवाद साम्राज्यवाद है उपनिवेशवाद का मूल यही साम्राज्यवादी शक्तियाँ हैं। पंत जी ने सन 1936 में ही 'साम्राज्यवाद' शीर्षक कविता में लिखा था-
"विश्व क्षितिज में घिरे पराभव के हैं मेघ भयंकर ।
नव युग का निश्चय सूचक है यह तांडव प्रलयंकर ।"11
 
नए समाज के सृजन के संबंध में मार्क्सवाद वर्ग संघर्ष को आवश्यक मानता है पंत जी 'क्रांति' शीर्षक कविता में लिखते हैं- 
“तुम चिर विनाश, नव सृजन गोद में लातीं
चिर प्राकृत, नव संस्कृति के ज्वार, उठातीं।
तुम रूद्र, प्रलय तांडव में ही सुख पातीं।
जीवन वसंत तुम, पतझड़ बन नित आती! 12

पंत ने भी 'ग्राम्या' में अनेक चित्र खींचकर मानव के भीतर मानवता को प्रतिष्ठित किया है। उन्होंने एक 'स्वप्न पट बुना है- 
''जाति वर्ग की श्रेणी वर्ग की, 
युग युग के बन्दीगृह से
तोड़ भित्तियाँ दुर्धर।
मानवता निकली बाहर ।
नाच रहे रवि शशि, 
दिगंत में नाच रहे ग्रह उड़गण
नाच रहा भूगोल
नाचते नर नारी हर्षित मन।" 13
 
पंत श्री अरविन्द की भावुकता से प्रभावित है। उत्तरा की प्रस्तावना में वे लिखते हैं- “श्री अरविन्द को मैं इस युग की अत्यन्त महान तथा अतुलनीय विभूति मानता हूँ। उनके जीवन-दर्शन से मुझे पूर्ण परितोष प्राप्त हुआ। उनसे अधिक व्यापक, ऊर्ध्व तथा अतलस्पर्शी व्यक्तित्व, जिनके जीवन-दर्शन में आध्यात्मिकता सूक्ष्म, वृद्धि, आग्राहय सत्य नवीन ऐश्वर्य तथा महिमा से मण्डित हो उठा है, मुझे दूसरा कहीं देखने को नहीं मिलता। विश्व कल्याण के लिए मैं श्री अरविन्द की देन को इतिहास की सबसे बड़ी देन मानता हूँ ।"14

किन्तु पंत की मानववादी चेतना पर अरविन्द दर्शन के साथ अद्वैतवादी दर्शनों का भी प्रभाव है। डॉ० प्रेमशंकर लिखते है- पंत जिस आध्यात्मिक चेतना की बात करते है वह सामंजस्य अथवा समन्वयवाद पर आधारित है। उन्होंने मार्क्स और गांधी में भी समन्वय की बात की थी। आज वे व्यक्ति और समाज, जड़-चेतन, ज्ञान-विज्ञान आदि के मिलन का आग्रह करते है। जो आध्यात्मिक लोक पंत की कल्पना के अनुसार, धरती पर अवतरित होगा उसमें मनुष्य का जीवन एक आन्तरिक परितोष से सम्पन्न होगा। पंत की नवीन आध्यात्मिक चेतना अरविन्द दर्शन से प्रभावित तो है, पर उसमें प्राचीन भारतीय मनीषा वेद, उपनिषद, विभिन्न अद्वैतवादी दर्शनों का भी योग है।
शिल्पी, रजत शिखर और सौवर्ण पंत जी के गीतिनाट्यों के संकलन है। इनमें क्रमशः तीन, छह और तीन गीतिनाट्य संगृहीत है जो अंशतः आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रो से प्रसारित हो चुके है। पंत जी के इन गीतिनाट्यों में उनका कल्पना सौन्दर्य और चिन्तन परक रूप देखने को मिलता है।

      समग्रतः कहा जा सकता है पन्त जी की रचना सम्पदा विपुल है छायावादी कवियों में उन्होंने सबसे अधिक और सबसे लम्बे समय तक कविताएँ लिखी हैं। कविता कहीं न कहीं लिपि में स्मृति-पुनस्संयोजन और शब्द की सम्भावनाओं का अप्रत्याशित विस्तार है। वर्तमान समय कई अर्थों में स्मृतिक्षीण और शब्द दारिद्र्य का समय है। ऐसे समय में पन्त मानक की तरह उभरते हैं। उनकी कविता में हमारी लम्बी भारतीय कविता और सौन्दर्यबोध की अंनत अनुगूंजें शामिल हैं जिनमें एक साधारण जीवनक्रिया भी अदम्य शास्त्रीय अर्थ से भर जाती है। पन्त ने सैकड़ों नये शब्द सृजित किए और उनमें से अनेक का साहित्य में प्रवेश पहली बार हुआ है। शब्द से कविता गढ़ना और कविता के लिए उपयुक्त और नये शब्द खोजना- गढ़ना अत्यंत आवश्यक होता है। साहित्य में शब्द के प्रयोग पूर्व उसके शील का ध्यान रखना चाहिए। वही कवि बड़ा हो पाता है जो अपनी दृष्टि और शैली का अतिक्रमण करने की दुःसाहस कर सके। पन्त में यह साहस था।
 
कविवर सुमित्रानन्दन पन्त ने हिन्दी भाषा और कविता को अपना जातीय छन्द प्रदान किया है अतः सम्पूर्ण हिंदी साहित्य समाज आपके इस योगदान को चिरस्मरणीय रखेगा और कृतज्ञ बना रहेगा। संभव है कि मेरे इस छोटे प्रयास में कुछ रचनाएँ छूट गयी हों या जिन पर ध्यान न गया हो किंतु हमें विश्वास है हिन्दी के इस महाकवि को उसके ऊर्जस्वित रचना-संसार के लिए पूरी कृतज्ञता से बारम्बार याद किया जाएगा। पंत जी अगले जन्म में ‘कवि’ के बदले ‘कर्मी’ बनना चाहते थे। इन्होंने आपने जीवन की सांध्य वेला में रचित एक कविता में लिखा है-
“भगवन्, जब मैं
पुनर्जन्म लूँ इस पृथ्वी पर
'कवि' के बदले मैं
'कर्मी' बन सकूँ जगत में।"

कवि पंत के इस विराट रचना संसार के लिए उन्हें परवर्ती पीढ़ी सदैव चिरस्मरणीय रखेगी। साहित्य में रुचि रखने वाला व्यक्ति पंत जी के साहित्य से अपने को अछूता नहीं रख सकता।

सन्दर्भ ग्रन्थ-
1. "Poetry..... is not expression of personality but an escape from Personality.” (Sacred Wood) T.S. Eliot. Tradition and Individual Talent, quoted from "The Modern Trends of Poetry, Bullogh, Page 153. Ist Edition. FIVERFISI
2. हरिवंशराय 'बच्चन': 'कवियों में सौम्य संत, सुमित्रानन्दन पंत, पृ० १६, प्रथम संस्करण
3. सुमित्रानंदन पंत: 'ज्योत्स्ना', पृ०27
4. Self-cherishing faddism
5. कला और संस्कृति, पंत, किताब महल, इलाहाबाद, 1965, पृष्ठ 91
6. तारापथ, लोक भारती प्रकाशन, 2002
7.  कविवर सुमित्रानंदन पंत, प्रकाशक उत्तर प्रदेश, हिंदी संस्थान-लखनऊ डॉक्टर सुरेश चंद्रगुप्त, प्रथम संस्करण-2006, पृष्ठ 105. 
8. वही, पृष्ठ 116.
9. वही, पृष्ठ 117.
10. वही, पृष्ठ 117.
11. वही, पृष्ठ 118.
12. वही, पृष्ठ 119.
13. वही, पृष्ठ 169.
14. वही, पृष्ठ 179.


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