कहानी: उदास-सूना घर

विजय कुमार संदेश

विजय कुमार संदेश

प्राध्यापक, पी.जी. हिन्दी विभाग, मार्खम कॉलेज, हजारीबाग, झारखंड,भारत
दूरभाष: +91-943 019 3804
ईमेल: sandesh.vijay@gmail.com


खंडहर में तब्दील होते इस उदास-सूने घर को देखकर विश्वजीत की आँखों में आँसू आ गए। इसे देखकर किसी के लिए भी यह अनुमान लगाना शायद कठिन नहीं था कि अपने जमाने में यह कितना खूबसूरत रहा होगा। दो एकड़ के परिसर में चार हजार वर्गफुट का यह एकमात्र लगभग सौ वर्ष पुराना तीन मंजिलों वाला घर था। देख-रेख के अभाव में चारों ओर कंटीली झाड़ियां उग आयी थीं। लगता था जैसे वर्षों से इसकी रंगाई-पुताई नहीं हुई है। फिर भी, सुर्खी-चूना के मेल से बनी दीवारें अपनी मजबूती की कहानी कह रही थी। यह अवश्य है कि एकाध जगहों पर प्लास्टर उखड़ने की स्थिति में था, पर दीवारें अभी भी पूरी तरह मजबूत थीं। देख-भाल की कमी और गृह-स्वामियों के उत्तराधिकारियों की उदासीनता के कारण ही अच्छा-भला घर आज खंडहर की तरह दिखने लगा है। विश्वजीत ने पहली नजर में ही देख लिया कि घर के कोने-कोने में मकड़ियों ने जाल बुनकर कब्जा कर रखा है और जहाँ भी जगह मिली है छोटे चमगादड़ों और पक्षियों ने अपना बसेरा बना लिया है। 
विश्वजीत करीब तीस वर्ष पहले यहाँ आया था। उन दिनों संभवतः पूरे इलाके में शायद ही किसी का इतना खूबसूरत, मजबूत और आकर्षक घर था। विश्वजीत दूर के रिश्ते में इस घर के गृहस्वामियों का पाहुन हुआ करता था। फूलों की क्यारियों और फलदार पेड़ों के मंजरों से पूरा परिसर बारहों महीने महमह करता रहता था। सही अर्थों में तब यह घर था, मकान नहीं। मकान तो यह अब भी नहीं है। निरंतर क्षरित होते हुए खंडहर का रूप लेता जा रहा है। विश्वजीत जानता है कि घर बसाया जाता है और मकान बनाया जाता है। यानी, घर वह है जहाँ एक परिवार बसता है, जिसमें सदस्यों के बीच आत्मीयता होती है। जहाँ आत्मीयता नहीं वह मकान हो सकता है, भवन हो सकता है, पर घर नहीं। मकान में भी यदि वर्षों से आदमी नहीं तो वह मकान भी नहीं, मकान के रूप में मकड़ियों, घुग्घुओं और चमगादड़ों का बसेरा हो जाता है। अभी आदमी के नाम पर इस घर में केवल शिवेश बाबू रहते थे, जिनकी उम्र भी अस्सी से ऊपर हो गयी थी। इतने दिनों बाद यहाँ पहुँचने पर विश्वजीत ने आवाज लगायी तो लाठी टेकते हुए शिवेश बाबू आये। उन्होंने विश्वजीत को पहचाना नहीं। विश्वजीत ने ही अपना परिचय दिया तो बोले आइये, बैठिये पाहुन बाबू। उन्होंने फाइवर की एक पुरानी कुर्सी सरका दी और स्वयं दरी बिछी एक चौकी पर बैठ गए। आज बरसों बाद शिवेश बाबू और विश्वजीत में भेंट हुई तो बातों का सिलसिला चल पड़ा। विश्वजीत ने हाल-चाल जानने के ख्याल से पूछा- कैसे हैं बाबूजी ?
शिवेश बाबू ने अपनी मातृबोली में कहा- वैसे तो सभे ठीक हय। घर के लोगन के जेतना प्रगति भइल हय, ओतने घरवा बिखर गैल हय बाबू। और, चुप हो गये।
विश्वजीत ने कहा - सब बच्चन (बच्चे) तो नौकरी-पेशा में लगल हथिन। ई तो बेस बात हय।
शिवेश बाबू ने कहा - हाँ, बेस बात तो हय। पर, घर-परिवार के भी एक नजर देखला के चाहीं। 
फिर आगे कहा – हमनी सब से एक गलती भेलय। ज्ञान देवै के पूरा कोशिश भेलय। पर संस्कार देवै के कोशिश कहीं पीछे छूट गेलय और ओकरा में कुछ कमी रह गेलय।  
शिवेश बाबू के मर्मांतक भाव को विश्वजीत समझ गया। वर्तमान स्थिति तो वह देख ही रहा था।
शिवेश बाबू की दयनीय स्थिति और अकेलापन देखकर विश्वजीत की आँखें एक बार फिर नम हो गयीं। विश्वजीत को यह जानकर भी दुःख हुआ कि उनकी पत्नी दस वर्ष पहले गुजर गयीं और तब से वह अकेले इस स्थिति में जी रहे हैं। ऐसा नहीं है कि शिवेश बाबू का कोई नहीं हैं। बहुतेरे हैं, पर साथ कोई नहीं है।
विश्वजीत की आँखों में तीस वर्ष पहले की घटनाएँ तैरने लगी हैं। इलाके के नामी किसान बाबू माधव प्रसाद सिंह का यह घर था। नहरी क्षेत्र में पचास बीघे की काश्तकारी थी। तीन गाँवों में खेती और मालिकाना हक था। विश्वजीत ने बाबू माधव प्रसाद सिंह को उनके आखिरी समय में देखा था। बड़ी-बड़ी आँखें और तलवार-कट मूँछें थीं उनकी। उन मूँछों में देसी घी चुपड़कर वे ताव दिया करते थे। गर्दन छोटी पर मुख-मंडल गोल और आभा लिए हुए था। किसान थे, इसलिए सुबह चार-पाँच के बीच उठ जाते। दालान में जाकर स्वयं गाय-बैलों को सानी-पानी देते। एक घंटे से अधिक व्यायाम करते। पौ फटते ही मजदूरों को हाँक लगाते और दिन भर के कामों की फेहरिश्त थमा देते। आठ बजते-बजते छाँछ के साथ भरपेट नाश्ता करते। बाबू माधव प्रसाद सिंह की आदत कहें या खूबी नीम, बबूल या करंज की दातुन से दांत साफ करने के साथ ही उन्हें भरपेट नाश्ता चाहिए था। नाश्ते में छाँछ-रोटी हो, चना-चबेना हो या हो दही-चूड़ा - छक कर खाते थे। इस कारण शरीर में तंदुरुस्ती थी। आलस्य तो जैसे उनसे कोसों दूर था। किसान थे, श्रम का महत्व जानते थे। इसलिए हमेशा पुरखों से सुने हुए इस श्लोक को गुनगुनाते रहते थे- ‘आलस्यं कि मनुष्याणां शरीरस्थो महान रिपुः।’ इस श्लोक के साथ ही लोगों को समझाते कि मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन आलस्य होता है। मनुष्य का परिश्रम ही उसका सच्चा मित्र होता है। बाबू माधव प्रसाद सिंह ने इस श्लेाक को पाठ की तरह जिया था। जबतक उनके शरीर में श्रम करने लायक शक्ति रही, आलस्य को अपने पास फटकने नहीं दिया। उनके चार बेटे थे- शिवकृत सिंह, शिवचंद्र सिंह, शिवदेव सिंह और शिवेश सिंह। शिवभक्त थे इसलिए बेटों का नाम उन्होंने भगवान शिव से जोड़ कर रखा था।
बाबू माधव प्रसाद सिंह को समय की सूझ थी। समय के साथ भविष्य में क्या बदलाव  होनेवाला है, इसका अनुमान सहज ही कर लेते थे। शिक्षा के महत्व को भी जानते थे। यद्यपि उनकी स्कूली शिक्षा कम ही हुई थी। अंग्रेजी राज था, कामचलाऊ अंग्रेजी बोल लेते थे। अपने बेटों को अपने खेत-खलिहान और कार्य-व्यापार से सदा दूर ही रखा। नये दौर के साथ नयी जागृति आने लगी थी। जागरण का ऐसा आलम था कि पढ़ा-बेपढ़ा आदमी भी अपने बच्चों को स्कूल भेजने और दो अक्षर सीख लेने की चाहत रखता था। बाबू माधव प्रसाद सिंह के गाँव के आस-पास कोई स्कूल तो था नहीं, सो उन्होंने अपने बेटों को पढ़ने के लिए नजदीक के कस्बाई शहर में भेज दिया। उनके गाँव से उस शहर की दूरी कोई बीस किलोमीटर के करीब रही होगी। उन दिनों मोटरगाड़ी, टैक्सी, ऑटो आदि तो आज की तरह थे नहीं। इस कारण गाँव से शहर जाने के लिए साधनों की कमी थी। उनके पास कहीं आने-जाने के लिए एक घोड़ी और एक जोड़ी बैलगाड़ी थी। बनिये-व्यापारी फेर-व्यापार के लिए प्रायः बैलगाड़ियों का ही प्रयोग करते थे और हर हाट-बाजार में उनकी दुकानें लगती थी। कोलतार की सड़कें नहीं के बराबर थी। बैलगाड़ी के पहियों और बैलों के खुरों से टेढ़े-मेढ़े रास्ते बन जाया करते थे। गर्मियों में धूल-धूसर तथा बरसात के दिनों में ये रास्ते कीचड़युक्त और मुश्किल भरे होते थे। ठीक से पाँव रखना भी दूभर हो जाता था। इतनी कठिनाईयों के बावजूद एक अच्छी बात यह थी कि चारों ओर हरियाली थी। खेतों में प्रायः धान, गेहूँ, चना, मक्का, खेसारी के पौधे लहलहा रहे होते थे। सर्र-सर्र की आवाज के साथ हवा बहती रहती थी। पगडंडीनुमा रास्ते के दोनों ओर बबूल के काँटेदार वन इतने सघन थे कि काँटों के बीच से पार होना कभी-कभी मुश्किल भरा होता था। पर्यावरण शुद्ध था और आदमी प्रकृति के सान्निध्य में जीता था। बबूल के ये घने वन गर्मी के दिनों में आदमी-जन के लिए छाँह और रात में पक्षियों के लिए रैन-बसेरा का काम करते थे। लोगों का रहन-सहन, खान-पान सबकुछ प्राकृतिक था। साँझ होते ही पक्षियों की चहचहाहट से सारा वातावरण गूँज उठता था और रात बीतते-बीतते सूर्य-किरणों के आने से पहले उषाकाल में पक्षियों के कलरव या कहें जागरण-मंत्र से लोग जाग जाते थे। पेड़-पौधों, झाड़ियों की अधिकता थी, इस कारण बारिश भी समय से और खूब होती थी। बाबू माधव प्रसाद सिंह बताते थे कि सावन-भादो के महीने में बारिश की झड़ी शनिवार से शुरु होकर मंगलवार को ही खत्म होती थी। मौसम का अनुमान लोग घाघ-भडुरी के गीतों से कर लिया करते थे। शाम के चौपाल में, अकबर-बीरबल, सिंहासन बतीसी, शीत-वसंत प्रभृति लोक-कथाओं के साथ घाघ-भडुरी के गीत खूब गाये जाते थे। बड़े किसानों से लेकर छोटे कामगारों तक को घाघ-भडुरी के ये गीत कंठस्थ थे-
सावन पछिया, भादो पूरबा, आसिन बहे ईसान।
कहे किसान सुन भद्रि, कहां रखोगी धान ?
और, जब कभी दुर्भिक्ष या अकाल का अनुमान होता था तो वे लोगों को आगाह करते थे कि खराब समय आने वाला है, सावधान रहो-
दिन में गरमी, रात में ओस,
कहे घाघ बरसा सौ कोस।
बाबू माधव प्रसाद सिंह दूरदर्शी भी थे। बदलते समय और बदलते मौसम की पहचान उन्हें खूब थी। उन्हें यह आभास हो गया था कि आनेवाले कल में खेती-किसानी शायद पिछड़े समाज का प्रतीक हो जाये और लोक-प्रचलित यह विश्वास झूठा पड़ जाये- ‘उत्तम खेती मध्यम बान, अधम चाकरी भीख निदान।’ इसी अंदेशे के कारण उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ने के लिए शहर भेज दिया था।

समय के अंतराल में बाबू माधव प्रसाद सिंह के बड़े बेटे शिवकृत सिंह ने केंद्र सरकार के अधीन सांख्यिकी विभाग में ऑडिटर की नौकरी पा ली थी। वे खुश रहनेवाले और व्यंग्य-विनोद के कुशल प्रस्तोता थे। मित्रों और हमउम्र साथियों से विनोद तो करते ही थे, छोटों को भी नहीं छोड़ते थे। इस कारण वे पूरे समाज में विनोद-प्रिय और मनमौजी स्वभाव के व्यक्ति माने जाते थे। उनके व्यंग्य में हास्य का पुट मिला रहता था तथा समय-समय पर वे हास्य-व्यंग्य के फूल खिलाते रहते थे। कहें तो कह सकते हैं कि वे चलते-फिरते आशु व्यंग्यकार थे। जीवन के प्रति एक हास्य नजरिया उनके पास था। शिवकृत सिंह के विपरीत थे शिवचंद्र सिंह। शिवचंद्र सिंह की रुचि अध्ययन-मनन में कम और स्थानीय राजनीति व सामाजिक कार्यों में अधिक थी। बीच में ही पढ़ाई छोड़कर सामाजिक कार्यों की ओर मुड़ गए थे। अपनी रुचि के अनुकूल लगभग चार दशकों तक ग्राम-प्रधान रहे। रिश्ते-नाते, हित-कुटुम्ब की सामाजिक जिम्मेदारियाँ भी उन्होंने ले ली थीं। निजी जीवन में समाज-सेवा को वे मानव-धर्म की तरह आवश्यक मानते थे तथा वंचित या कमजोर व्यक्ति की सहायता अपनी जेब खाली करके भी करते थे। उनका यह कहना था कि समाज के लिए कुछ अच्छा करने का जज्बा हर किसी में होना चाहिए। साधु-प्रकृति के आदमी थे, इसलिए कहते थे कि जीवन के साथ रुपया-पैसा कुछ नहीं जाता। आदमी का नेक-कर्म ही साथ जाता है। समाज हो या घर-परिवार वे सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे। तेजी से बदलती हुई दुनिया में वे समाज और परिवार को शिक्षित तथा सरल, सुखद बनाने के हिमायती थे। वे अनुभव कर रहे थे कि आधुनिक समाज और परिवार दोनों ही परिवर्तन के दौर में हैं। अपने कुछ इन्हीं मानवीय-गुणों के कारण पूरा इलाका उन्हें जानता है। देश में पंचायती-राज की स्थापना के साथ ही वे ग्राम-प्रधान बने थे और लगभग चालीस वर्षों तक लगातार निर्विरोध ग्राम-प्रधान रहे। यह अवसर उन्हें उनकी बड़ी हस्ती के कारण नहीं बल्कि उनके आदर्शों, सेवा-भावना और समाज के प्रति त्याग-भाव के कारण मिला था। हर आपदा-विपदा में वे लोगों के साथ हिल-मिलकर हाथ बंटाते थे और जरूरतमंदों का सहयोग करते रहते थे। वे हमेशा इस कोशिश में रहे कि निजी और सरकारी स्तर पर भी जरूरतमंदों को उनकी जरूरत की चीजें यथासमय मिले। वर्ष 1966-67 के अकाल के समय सरकार से मिलनेवाली राशन सहायता के साथ-साथ उन्होंने अपने घर का दरवाजा भी गरीबों के लिए खोल दिया था। विश्वजीत को एक समय उन्होंने बतलाया था कि गरीबों और जरूरतमंदों की सहायता करने से उन्हें सुख व सुकून मिलता है। सुख और सुकून की यह अनुभूति उन्हें अमृत-तुल्य प्रतीत होती है। अपने सामाजिक कार्यों की सूची में सेवा, सहयोग के साथ-साथ अंधविश्वास, दहेज-प्रथा, जाति-प्रथा जैसी सामाजिक बुराइयों को दूर करने का भी प्रयास उन्होंने किया था। इन प्रयासों में उन्हें अद्भुत सफलता मिली थी। इस कारण समाज में उनकी एक ईमानदार ग्राम-प्रधान और समाज-सेवी की छवि बन गयी थी।
बाबू माधव प्रसाद सिंह ने अपनी देख-रेख और मातहती में चारों बेटों के बीच कार्य का बँटवारा कर दिया था। बड़े बेटे शिवकृत सिंह को घर से बाहर की समस्याओं को देखने, सुनने और सुलझाने का जिम्मा मिला था, जिसे वह बखूबी निभा रहे थे। जमीनी समस्याओं और केस-मुकदमा का काम भी वही देखते थे। इसी तरह शिवचंद्र सिंह के जिम्मे ग्राम-प्रधान होने के कारण आंतरिक शासन था। गाँव-घर के लड़ाई-झगड़ों के निपटान से लेकर पारिवारिक झंझटों का समाधान भी बिना किसी हील-हुज्जत के शिवचंद्र सिंह कर देते थे। अपने फील्ड के वे कुशल खिलाड़ी थे। तीसरे बेटे शिवदेव सिंह अपने दोनों बड़े भाईयों से इतर स्वभाव के थे। उनकी रुचि अन्य कामों की अपेक्षा शिक्षा की ओर अधिक थी। इलाके भर में मेधावी छात्र के रूप में उनकी गिनती होती थी। सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई उन्होंने की थी और पिता बाबू माधव प्रसाद सिंह के आदेश पर घर-परिवार के लिए शिक्षा का क्षेत्र उन्होंने चुन लिया था। रांची में केंद्र सरकार के अधीन एक उपक्रम में इंजीनियर के रूप में उन्होंने काम शुरु किया और बच्चों की शिक्षा-दीक्षा की जबावदेही के कारण रांची में ही बस गए। पैतृक गाँव में बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते गए, एक-एक कर पढ़ने रांची आते गए। शिवदेव सिंह जीवन में अनुशासन को विशेष महत्व देते थे। बात मीठी हो या तीखी, बिना लाग-लपेट के कहने के आदि थे। वे विज्ञान के विद्यार्थी थे। इसलिए परंपराओं-रूढ़ियों की अपेक्षा वैज्ञानिक दृष्टिकोण को जीवन में ऊँचाईयों को छूने के लिए महत्वपूर्ण मानते थे। गणित और भौतिकी उनका प्रिय विषय था। वे न केवल प्रतिभाशाली थे बल्कि इंजीनियर होने के बावजूद जिज्ञासु छात्र की तरह कुछ न कुछ नया करने की सोचते रहते थे। इस कारण अपने कार्य-क्षेत्र में उनकी काफी प्रतिष्ठा थी। उनकी चिंतन-प्रणाली और कार्य-शैली दूसरे इंजीनियरों से भिन्न थी। लक्ष्य के प्रति समर्पित-भाव ने उन्हें जिज्ञासु बना दिया था। इस अर्थ में उनकी सर्जनशीलता अद्भुत थी। वे अपने बच्चों से अक्सर कहते थे कि शिक्षा से न केवल घर-परिवार सुदृढ़ होता है बल्कि राष्ट्र-समाज भी समृद्ध होता है।
बीसवीं सदी के सातवें दशक का रांची शहर आज के आधुनिक रांची-सा नहीं था। उन दिनों रांची के संबंध में एक कहावत अति प्रचलित थी- ‘पीठ पर छउआ, माथे पर खांची। जब देखो तो समझो रांची।’ संयुक्त बिहार का पिछड़ा इलाका कहलाता था तब रांची शहर। शहर के सड़कों की किनारी पर तथा गली-मुहल्लों में जहाँ-तहाँ महिलाएँ पीठ पर छोटे बच्चे को बांधकर और माथे पर बांस से बनी खांची (टोकरी) में शाक-भाजी लेकर बेचती थीं। किंतु, वर्ष 2000 में झारखंड राज्य के गठन और रांची के राजधानी बन जाने के बाद शहर का रंग-रूप बदलता गया और बदलती हुई रांची में बड़े-बड़े मॉल, रेस्तरां, होटल, बिग बाजार आदि खुल गए। इन सबके बावजूद रांची की प्राकृतिक सुंदरता में कोई कमी नहीं आयी, पुरानी सुंदरता बनी रही। आज भी रांची को उसके असीमित प्राकृतिक सौंदर्य के कारण पूरी दुनिया में जाना जाता है। रांची शहर से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर पेड़ों से आच्छादित हरी-भरी घाटियाँ, जंगल, पहाड़, झरने आदि मिल जाते हैं। बरसात के मौसम में तो पूरी वादी-घाटी ही हरियाली की चादर से लिपट जाती है। इन्हीं विशेषताओं के कारण इसे ‘हेल्थ रिज़ॉर्ट’ भी कहा जाता है। विश्वजीत जब रांची विश्वविद्यालय का छात्र था तब रांची शहर की चौहद्दी मात्र दस से पन्द्रह किलोमीटर तक ही सिमटी हुई थी। शहर की किनारी पर स्थित मोराबादी मैदान और टैगोर हिल तब रांची शहर की शान थे। अब तो यह मैदान भी सिमट-सिकुड़ गया है और आज भी टैगोर हिल विश्वकवि रवीन्द्रनाथ की याद दिलाता है। अपने प्रवास के दिनों में रवीन्द्रनाथ ने यहां काफी समय व्यतीत किया था और कुछ कालजयी रचनाओं की रचना भी की थी। विश्वजीत अपने अध्ययन काल में अक्सर यहां आया करता था। उसके अनन्य मित्र संतोष सत्यार्थी टैगोर हिल पर स्थित टैगोर भवन में रहते थे। अवकाश के क्षणों में विश्वजीत इस हिल की चोटी से उगते और ढ़लते सूरज की रम्य दृश्यों को देखा करता था। इसी पुरानी रांची में बाबू शिवदेव सिंह की छत्रछाया में बाबू माधव प्रसाद सिंह के सभी पोते-पोतियों ने अपनी-अपनी पढ़ाई पूरी की और अपने-अपने पेशे से बंध गए।
बाबू माधव प्रसाद सिंह के बड़े बेटे शिवकृत सिंह के दो बेटे प्रदीप और आमोद हुए। दोनों ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की और कम्पनी के जॉब में चले गए। शिवचंद्र सिंह के तीन बेटे अधिराज, रूद्र और उद्भव हुए। तीनों ही पुलिस विभाग के अधिकारी-पदाधिकारी बने। अधिराज और रूद्र दोनों ही संयुक्त बिहार के उत्तरी और दक्षिणी कोनों पर थे। अधिराज की पहचान सख्त पुलिस ऑफिसर के रूप में थी तो रुद्र सीधे और सरल पुलिस अधिकारी के रूप में जाने जाते थे। दोनों में एक बात साम्य थी- वह थी उन दोनों की ईमानदारी। उनकी ईमानदारी का खौफ इस कदर था कि राजनीतिज्ञ हो या शहर का गुंडा-लबार उनके नजदीक आने से कतराते थे। बेईमानों के लिए तो खौफ थे दोनों भाई। जिन क्षेत्रों में भी वे रहे, शांति और सद्भाव का माहौल रहा। उद्भव सिपाही थे, पर अपने काम के प्रति सदैव ईमानदार रहे। बाबू शिवचंद्र सिंह को अपने इन बेटों पर सदैव गर्व रहा। संयुक्त परिवार के अपने सभी आठ भाईयों में यही तीनों थे, जिन्हें घर-परिवार की चिंता थी। पर, पुलिस विभाग की नौकरी में उनके हाथ बंधे हुए थे। जब भी छुट्टी मिलती- अपने अभिभावकों से मिलने आ जाते। शिवदेव सिंह के एकमात्र पुत्र शिखर थे। शिखर ने पिता के पेशे को अपनाया और रेलवे में सहायक अभियंता हो गये। बचपन में शिखर अपेक्षाकृत शांत स्वभाव के थे। अन्य भाईयों की अपेक्षा उनकी दिनचर्या अलग थी। संयम, सदाचार और जिंदादिली उनके विशिष्ट गुण थे। पढ़ाई के प्रति समर्पित शिखर पूरी तैयारी के साथ विद्यालय जाते थे। बाबू माधव प्रसाद सिंह के सबसे छोटे बेटे थे- शिवेश। शिवेश के दो पुत्र थे शिवपाल और रामपाल। यों तो शिवपाल अपने सभी आठ भाईयों में बड़े थे। उन्हें गीत-गजल लिखने का शौक था और मुंबई की सिने-दुनिया में गीतकार बनना चाहते थे। एम॰ए॰ करने के बाद अभिभावकों से जिद करके उन्होंने मुंबई का रुख कर लिया। शिवपाल के मन-मस्तिष्क में फिल्मी गीतकार बनने का भूत इस कदर सवार था कि स्वप्न में भी वे अपने लिखे गीतों को फिल्मी अंदाज में गुनगुनाने लगते थे। रात-दिन गीत, गीत बस गीत। इससे अलग वह कुछ भी सोच पाने में असमर्थ थे। उन दिनों बॉलीवुड में आनंद बक्षी के गीतों की धूम थी। शिवपाल को यह भ्रम हो गया था कि वह भावी आनंद बक्षी हैं। मुंबई के संघर्ष का शायद उन्हें अनुमान नहीं था। कोलकाता-हावड़ा गीतांजली ट्रेन से छत्रपति शिवाजी टर्मिनस में उतरते ही उनका संघर्ष शुरू हो गया। तब की बंबई नगरी में अपना तो कोई था नहीं, इस कारण कई रातों को उन्हें स्टेशन पर या समुद्र किनारे बेंच पर सोना पड़ा। बाद में, एक छोटे से चाल में सोने भर की जगह मिली। दिन में वे फिल्म निर्माताओं-निर्देशकों का चक्कर लगाते और रात पाव-भाजी खाकर सो जाते। महीनों यह क्रम चला। आश्वासन मिला पर काम नहीं। अपने मिशन में असफल होते देख शिवपाल को थोड़ी हताशा और निराशा होने लगी। निर्माताओं-निर्देशकों से मिल लेने के बाद अपनी हताशा और निराशा को कम करने के लिए वे समुद्र किनारे, कभी जुहू, कभी चौपाटी तो कभी वर्सोवा चले जाते। वैसे मुंबई के समुद्र-तट काफी शांत और सुकून देने वाले हैं। कवि स्वभाव होने के कारण अरब सागर की शांत लहरें, सूर्योदय और सूर्यास्त की अनुपम छटा से शिवपाल को थोड़ी शांति मिलती थी। नारियल पेड़ों से घिरे मुंबई का जुहू हो, चौपाटी हो या हो वर्सोवा- ये सभी शांत और खूबसूरत हैं। जुहू  और चौपाटी की अपेक्षा शिवपाल वर्सोवा जाना अधिक पसंद करते थे क्योंकि वर्सोवा में जुहू और चौपाटी के मुकाबले भीड़ कम मिलती थी। शांत क्षणों में कभी-कभी रात के समय वह मरीन ड्राइव का चक्कर भी लगा लेते थे। मरीन ड्राइव अरब सागर के किनारे-किनारे नरीमन प्वाइंट से मालाबार हिल तक लगभग साढ़े सात किलोमीटर फैला हुआ है। मरीन ड्राइव की जगमगाती स्ट्रीट लाइट की रोशनी में उन्होंने कई गीत भी लिखे थे, जिसे आज भी वे बड़े चाव से गुनगुनाते हैं। इन गीतों में अरब सागर की उठती-गिरती लहरों की आकर्षक प्रस्तुति है। यह शिवपाल का दुर्भाग्य था कि अच्छी गीतों और नज़्मों के बावजूद उन्हें कोई ब्रेक नहीं मिला। थक-हार कर लौट आये। शिवपाल से छोटे थे रामपाल। रामपाल पढ़ाई में ठीक-ठाक थे। पर, किन्हीं कारणों से किसी प्रतियोगी परीक्षा में सफल नहीं हुए तो घर-परिवार से दूर एक शहर में जाकर कोचिंग खोल लिया और शहर में ही शिफ्ट हो गए।
कभी जिस घर में दिन-रात काम ही काम था। मजदूरों को साँस लेने की भी फुर्सत नहीं मिलती थी। मजदूर अनाज की कोठियों में दिन-रात अन्न भरा करते थे। गाय-बैलों की हाँक से पूरा परिसर गूँजता रहता था। जहाँ एक ही परिवार में बूढ़े, वयस्क, स्त्रियां, बच्चे सभी होते थे, वही आज उपेक्षित और उदास है। सबकी अलग-अलग दुनिया हो गयी है। जबतक चारों भाईयों की पत्नियाँ जीवित थी, घर की दीवारें सोने-चांदी की तरह दमकती थीं। किंतु, अब संयुक्त परिवार बिखर गया है, दीवारों से चमक गायब है और उसे पुराना कहकर खारिज किया जा चुका है। परिवार के वे सदस्य जो कभी घर के मुखिया कहलाते थे, आज उपेक्षित जीवन जीने के लिए विवश हैं। गाँववाले इस घर में अब शिवेश बाबू के अतिरिक्त कोई और नहीं रहता। शिवेश बाबू की मजबूरी है कि वे घर में अकेले हैं। कहने को दो बेटे और बहुएँ हैं फिर भी अकेलापन है क्योंकि, बेटे-बहू गाँव से करीब पाँच किलोमीटर दूर अलग किराए के मकान में रहते हैं। वृद्ध पिता के साथ कोई नहीं रहना चाहता। शिवेश बाबू के खाने-पीने की कोई उचित व्यवस्था नहीं है। कुछ कुछ यही स्थिति शिवचंद्र बाबू और शिवदेव बाबू की भी है। वे भी अलग-अलग गाँवों में जहाँ उनकी खेती-किसानी रही है, अकेले रह रहे हैं। शिवेश बाबू किसान हैं, जीवट आदमी हैं। चना-चबेना से ही जीवन बीत रहा है। विश्वजीत के सामने इस उदास घर का अतीत भी है और वर्तमान भी। कभी खुशहाल था ये घर। आज उदास है। अपने ही उत्तराधिकारियों की उपेक्षा और संस्कारहीनता का दंश झेल रहा है। गृहस्वामी और उदास-सूना घर दोनों ही जर्जर-खंडहर होने की दहलीज पर खड़े हैं। चारों ओर एक मौन उदासी है, जो रह-रहकर विश्वजीत को बेध रही है।

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