पाँच कविताएँ: प्रकाश मनु

प्रकाश मनु
(1) एक कवि की दुनिया

तुम्हारी दुनिया में एक छोटा आदमी हूँ मैं
पर छोटे आदमी की भी एक दुनिया होती है
एक दुनिया बसाई है मैंने
भले ही तुम्हारी दुनिया के भीतर
एक दुनिया है मेरी जागती दिन-रात।

उस दुनिया में बड़े-बड़े विकराल मगरों जैसे
धन-पशुओं का आना मना है,
उस दुनिया में कलफदार घमंडी लोग सिर झुकाकर आते हैं
और चलती है ऐसी हवा 
कि सीधे-सादे सरल लोगों के दिल की कली खिल जाती है।

उस दुनिया में किसी तख्तनशीं का राज नहीं चलता
उस दुनिया में कोई ऊपर कोई नीचे
कोई अधीनस्थ नहीं
उस दुनिया में धाराओं-उपधाराओं उप-उपधाराओं 
वाला सरकारी कानून नहीं
वहाँ दिल की बातें और दिल से दिल के रस्ते और पगडंडियाँ हैं।

इसलिए तुम्हारी दुनिया के थके-हारे आजिज आ चुके लोग
वहाँ सुकून पाते हैं
पिटे हुए लोग अकसर हो जाते है ताकतवर
और ताकतवर लोग अकसर बिना बात पीपर पात सरिस
काँपते देखे गए हैं।

उस दुनिया में चलतीं हैं बहसें
निरंतर बहसें
जो हजारों वर्ष पहले से लेकर हजारों वर्ष बाद तक के
समय में आती-जाती हैं
उस दुनिया में सभी को है अपनी बात जोर-शोर 
और बुलंदी से कहने का हक
और एक बच्चा भी काट सकता है 
अपनी किलकारी से
पड़-पुरखों और जड़ विद्वानों की राय!

उस दुनिया में नहीं कंकरीट न कोई
ईंट-पत्थर
उस दुनिया में नहीं कोई मजबूत सीमेंट मसाला टीवी पर विज्ञापित
फूल से भी हलकी है वह दुनिया
मगर फौलाद से भी सख्त।

कला और साहित्य की दुनिया के ताकतवर बाहुबलियो
और परम आचार्यो!
मेरी वह सीधी-सरल फूलों से महकती दुनिया कमजोर है
मगर इतनी कमजोर भी नहीं
कि तुम्हारे जैसे महाबलियों के घमंडी गुस्से फूत्कार और षड्यंत्र से 
तड़क जाए!

कल तुमने अपने पैरों से रौंदा था जो घोंसला
नन्ही चिड़िया का
सुनो, जरा सुनो—
कि आज फिर उसकी गुंजार सुनाई देती है
सुनाई देती रहेगी
कल-परसों...युगांतर बाद भी!                                                                 ** 


(2) बारिशों की हवा में पेड़ 

अभी-अभी तो शांत खड़ा था
यह सामने का गुलमोहर 
पुरानी यादों की जुगाली करता
खुद में खोया-सा, गुमसुम

पर चलीं जिद्दी हवाएँ बारिश की
झकझोरती देह की डाली-डाली, अंग-अंग 
आईं मीठी फुहारें 
तो देखते ही देखते दीवानावार नाचने लगा वह 
एक नहीं, सौ-सौ हाथ-पैरों से
नचाता एक साथ सैकड़ों सिर हवा में
जो अभी-अभी प्रकटे हैं पावसी हवाओं में

एक साथ सौ सिर झूमते-नाचते हवाओं में 
ता-थैया, ता-ता थैया
नाच, नाच मयूरा नाच...!
पेड़ नाच रहा है मोर-नाच
हवाओं में एक सुर एक राग— 
नाच...!
पोर-पोर में भर के बाँसुरी का उन्माद,
चाँदनी रात का नशा
नाच!
हाँ-हाँ नाच, बस, नाच।

और अब नाच रहा है पेड़ 
ऐसी गजब उत्तान लय में
कि एक साथ सौ-सौ झूमते-झामते सिरों से
सौ-सौ हाथ-पैरों में बनाए लय 
और एक मस्ती का सुरूर
एक साथ...एक साथ...एक साथ!

यों ही नाचा पेड़ 
झूमता-झुमाता धरती-आसमान
नाचता रहा न जाने कब तलक।

साथ-साथ शायद नाचा किया मैं भी
खोकर होश
खोकर समय और बोध और दिशाएँ सारी
दिगंतों के पार
 
आया होश जब थम गई थीं आँधियाँ, 
थमी बरखा
और पेड़ देख रहा था मेरी ओर
आँखों में शांत बिजलियाँ लिए
प्यार भरी दोस्ताना नजरों से।

क्या कहूँ, मुझे वह कितना दिलकश
और प्यारा लगा,
जैसे सारी कायनात उसमें समा गई हो!
**
 

(3) पेड़ हरा हो रहा है 

हौले-हौले बरस रही हैं रस-बूँदें
हौले-हौले
पेड़ हरा हो रहा है।

हरा और गोल-छतनार और भीतर तक रस से भरा
हरा और आह्लादित
डालें थिरकतीं पत्ते नाचते अंग-अंग थिरकता
चहकती चिड़ियाँ
गूँजती हवाएँ—
पेड़ हरा हो रहा है, पेड़ हरा हो रहा हैं...!!

सुनो-सुनो...गूँजती दिशाओं का शोर
पेड़ हरा हो रहा है, पेड़ हरा हो रहा हैं...
पेड़ हरा...!!

बहुत दिनों की इकट्ठी हुई थकान
जिस्म और रूह की
बह रही है
बह रहा है ताप
बह रही है ढेर सारी गर्द स्मृतियों पर पड़ी
दुख-अवसाद की छाया मटमैली
दाह-तपन मन की
सब बह रही है और पेड़ हरा हो रहा है
हरा और रस से भरा
नया-नया सुकुमार, आह्लादित।

अभी-अभी मैंने उसकी खटमिट्ठी बेरियों-सी 
हँसी सुनी
अभी-अभी मैंने उसे बाँह उठाए
कहीं कुछ गुपचुप इशारा-सा करते देखा
और मैं जानता हूँ पेड़ अब रुका नहीं रहेगा
वह चलेगा और तेज-तेज कदमों से
सारी दुनिया में टहलकर आएगा
ताकि दुनिया कुछ और सुंदर हो
कुछ और हरी-भरी, प्यार से लबालब और आत्मीय

और जब लंबी यात्रा से लौटकर वह आएगा
उसके माथे से, बालों की लटों और अंग-अंग से
झर रही होंगी बूँदें

सुख की भीतरी उजास और थरथराहट लिए
रजत बूँदें गीली चमकीली
और उन्मुक्त हरा-भरा उल्लास
हमारे भीतर उतर जाएगा कहीं दूर जड़ों तक...
अँधेरों और अँधेरों और अँधेरों के सात खरब तहखानों के पार।

फिर-फिर होगी बरखा
फिर-फिर होगा पेड़ हरा
स्नेह से झुका-झुका
तरल और छतनार...
फिर-फिर हमारे भीतर से निकलेगा
किसी नशीले जादू की तरह
ठुमरी का-सा उनींदा स्वर
कि भैरवी की-सी लय-ताल...
कि पेड़ हरा हो रहा है
पेड़ सचमुच हरा हो रहा है।
**


(4) मोगरे के फूल

मैंने उगाए कुछ मोगरे के फूल
आए उमगकर मेरे गमलों में 
पूरे घर भर को महमहाते
दूधिया उम्मीदों के 
ढेर-ढेर मोगरे के फूल

हम हैं खिल-खिल 
खिलर-खिलर फूल
खिलखिलाहटों से भर देंगे घर-आँगन
बिलकुल नटखट बच्चों की तरह...
बोले नन्ही-नन्ही दँतुलियों से हँसते
मोगरे के फूल

आज सुबह
दो दँतियाँ दिखाई पड़ गईं
एक नन्हे नटखट शिशु मोगरे की
कि जो था ढेर सारे पौधों के पीछे छिपा
जैसे कोई चुलबुला शरीर बच्चा
लुका-छिपी खेल रहा हो
 
और खेलते-खेलते अचानक भीड़ के पीछे से 
पुकार उठे
कि यह मैं हूँ—मैं यहाँ हूँ पापा,
और मार तमाम लोगों की अपरंपार भीड़ के बीच
जिसकी दंतुल हँसी
दूर से नजर आती हो!

और उस नन्हे मोगरे की दंतुल हँसी
के चमकते ही
हँसे सारे मोगरे के फूल 
एक साथ...एक साथ,
जैसे यों ही वे पूर्ण होते हों।
**


(5) खाली कुर्सी का गीत

अब सिर्फ खाली कुर्सी पड़ी है
सन्नाटे में
बिसूरती आने-जाने वालों को।

आदमी जो इस पर बैठता था चला गया
और अब खाली कुर्सी बिसूरती है आने-जाने वालों को
कभी-कभी टुकुर-टुकुर देखती है हर आगत को
और फिर हबसकर रोने लगती है।

आदमी था तो सब था
लोग भी बातें भी हँसी-खुशी और हँसने-गाने के साज भी
बातें भी चर्चाएँ भी
किस्से और कहानियाँ भी
गुजरे और आने वाले कल की तमाम हलचलें भी...

वह आदमी था तो सब था
भरी रहती थी बैठक
लोगों की रौनक और अंतहीन बातों के कोलाहल से। 

आदमी
जो इस कुर्सी पर बैठता था
खुशमिजाज था
और उसके इर्द-गिर्द हमेशा एक महफिल सी रहती थी
वह बोलता था तो गुजरे हुए समय की दास्तान
सुनाई पड़ती थी उसकी बातों में
समय की घंटियाँ बजती थीं 
और खिलखिलाहटों में बदल जाती थीं...

आदमी था तो बहुत से वादे थे 
नए-पुराने
बहुत सी लंबी-चौड़ी बहसें और योजनाएँ...
किताबें थीं और किताबों की पूरी एक दुनिया।

इस कुर्सी के इर्द-गिर्द हँसते थे ठहाके
गाता था प्रेम
नाचती थीं किताबें
और हवा में थरथराते थे शब्द
बहुत कुछ था जो जिंदा था और जिंदादिली से भरा।

और तब कुर्सी भी इन गरमजोश बातों और बहसों 
और मीठे ठहाकों में 
जिंदा हो जाती थी
किसी जिंदा आदमी की तरह
और जाने कब आदमी की तरह खुलकर बतियाने लगती थी।

आज उस पर बैठने वाला आदमी 
नहीं है
तो नहीं हैं गरजजोश बातें न बहसें न वादे न योजनाएँ...
और हवा में दूर-दूर तक उड़ते ठहाके भी नहीं

अब महज एक कुर्सी है
खाली-खाली चुप्पी में सिमटी
बिसूरती हर आने-जाने वाले को।

इस पर बैठने वाला आदमी चला गया तो
जैसे सब चला गया...
और बच गया बस कुर्सी का एक खाली-खाली गीत।
**

प्रकाश मनु, 545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008,
चलभाष: 09810602327,
ईमेल: prakashmanu333@gmail.com


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