राकेश कबीर की कविताओं का सामाजिक मूल्याङ्कन

(विशेष सन्दर्भ: ‘कुँवरवर्ती कैसे बहे’ शीर्षक काव्य-संग्रह)

                     ~ अभिषेक सौरभ, शोधार्थी, जेएनयू, नई दिल्ली

‘कुँवरवर्ती कैसे बहे’ शीर्षक काव्य-संग्रह के रचयिता डॉ. राकेश कबीर एक युवा कवि एवं कहानीकार हैं पेशे से प्रशासकीय उत्तरदायित्वों का निर्वहण करने वाले डॉ. राकेश कबीर मानस-मिजाज़ से आज भी शोधार्थी हैं डॉ. राकेश कबीर की कविताएँ, कहानियाँ और आलेख हिंदी और अंग्रेजी की अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित और चर्चित होते रहे हैं उनकी कविताओं में मानुष, जल, जंगल-जमीन तथा उनसे सम्बद्ध आमजन के सरोकारों के साथ-साथ सामाजिक अन्याय, पाखंड, अमानवीयता और रूढ़िवाद पर तीव्र प्रहार मिलता है ‘इतिहास, समाज और संस्कृति के विभिन्न आयामों में उनकी गहरी दिलचस्पी है, जिसे उनकी कविताओं में साफ़-साफ़ महसूस किया जा सकता है[1] 

तथ्य है कि दुनियाभर के देशों में किसी भी अन्य एक देश में इतनी अधिक सामाजिक-सांस्कृतिक और सभ्यताजनित विविधताएँ देखने को नहीं मिलती हैं, जितनी भारत में दृष्टिगोचर होती हैं इसलिए कहा जाता है कि भारत विविधताओं में एकता का देश है और हमारे देश की यही अमूल्य थाती अतुल्य भारत को निरुपित करती है किन्तु स्थिति तब चिंतनीय हो जाती है जब विविध सामाजिक संरचना के नाम पर मानव-मानव के मध्य इस तरह का विभेद किया जाने लगता है, जो अमानवीयता की कोटि में ही शामिल किया जा सकता है भारतीय उपमहाद्वीप के सामाजिक जीवन के सन्दर्भ में कहीं-न-कहीं जाति-भेद और वर्ण-भेद की सामाजिक स्थिति अमानवीयता के उत्पीड़ित ग्रंथि से ही आ जुड़ती है गौरतलब है, वर्णवादी परम्परागत भारतीय समाज में सदियों से अछूत जातियों को गाँव के बाहर दक्खिनी छोर पर बसाया जाता रहा है अछूत समुदायों को दोयम दर्ज़े का मानव बनाकर वर्णाश्रम-वादियों द्वारा सदियों से उनके उत्पीड़न का खेल खेला जाता रहा है एक ही गाँव के अन्दर ऊँच-नीच का वैषम्य प्रसारित कर वर्णाश्रमवादी जहाँ अपने आप को कुलीन और तथाकथित सभ्य मानव का तमगा दे डालते थे, वहीं निम्न जाति के नाम पर एक बड़े मानव-समूह को मात्र अपनी चाकरी के लिए अघोषित गुलाम बना लेते थे और उन्हें हर मानवीय प्रतिष्ठा सह गरिमा से दूर कर देते थे परम्परागत भारतीय सामाजिक अवसंरचना में उच्च जाति-वर्ण के मानवों द्वारों निम्न जाति-वर्ण के लोगों का पग-पग पर शोषण और अपमान का सदियों पुराना अमानवीयता-युक्त इतिहास रहा है।

राकेश 'कबीर'

यद्यपि, भारतीय समाज में हाशिये पर जीवन बसर करने वाले उत्पीड़ित एवं लांछित जन-समुदायों ने समय-समय पर अपने अमानवीय शोषण एवं सामाजिक अन्याय के ख़िलाफ़ सशक्त प्रतिरोध भी जताया है किन्तु जातिगत आधार पर निम्न जाति के लोगों का शोषण एवं उत्पीड़न आज भी बदस्तूर जारी है उच्चवर्णीय अहंकार के खिलाफ़ निम्न-वर्णीय शौर्य एवं प्रतिरोध की कई सच्ची परिघटनाएँ भारत के औपनिवेशिक इतिहास में दर्ज है जातीय उत्पीड़न एवं भेद-भाव के ख़िलाफ़ अछूतों के शौर्य की एक गाथा महाराष्ट्र के ‘भीमा कोरेगांव’ में भी दर्ज है अंग्रेजी राज़ में लड़े गये इस लड़ाई में यूँ तो प्रत्यक्ष लड़ाई पेशवाओं एवं अंग्रेजी सेना के मध्य थी किन्तु उस युद्ध में पेशवा-राज के खिलाफ़ अंग्रेजी फौज की ओर से महार जाति के सैनिक लड़ रहे थे ध्यातव्य है कि तात्कालिक पेशवा-राज में सामाजिक रूप से महारों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी उस दौर के पेशवा-राज में महार और अन्य अछूत जातियाँ, द्विज पेशवाओं के सामने गले में हांड़ी और कमर में झाड़ू लटका कर चलने को विवश थे ऐसा इसलिए ताकि अछूत जिधर से गुजरें उस सड़क को साफ़ करते चलें और अपना थूक-खखार अपने गले से लटकी हांड़ी में ही फेंकें सहज अनुमन्य है, अंग्रेजी फौज़ के लगभग 500 महार सैनिकों के मानस में पेशवा-सेना के प्रति आक्रोश किस कदर व्याप्त होगी कि इस अपमानजनित आक्रोश के फलीभूत इतने ही महार सैनिकों ने हजारों की संख्या वाले पेशवाओं की सेना को पराजित कर दिया ‘गाँव-गाँव कोरेगांव’ शीर्षक कविता में कवि राकेश कबीर देश के लाखों ऐसे अन्य क्षेत्रों एवं गांवों में जातिजनित उत्पीड़न एवं अमानवीयता के ख़िलाफ़ आकर ले रहे जनमत के प्रतिरोध को स्वर देते हुए लिखते हैं, “गाँव के दक्खिन में / झोपड़ियों के झुंड में / ख़ुदबुदाती हैं कुछ जिंदगियाँ / लाठियों को पिलाती है कड़वा तेल / भीमल और टीमल ने / पहट लिये हैं अपने हँसिये और / इकट्ठा हो गई है पूरी चमरौटी / इमली के पेड़ के नीचे / लड़ा जाना है एक युद्ध / पड़ोसी शोषकों के ख़िलाफ़ / सदियों के अपमान और / अन्याय के ख़िलाफ़...|”[2]

जाहिर है, सदियों का यह संताप, सामाजिक गैर-बराबरी का दंश और अत्याचार-अन्याय की यह विभेदकारी परम्परा मानस के स्तर पर आम भारतीयों के आपसी जुड़ाव व प्रगाढ़ता को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती रही है इस सामाजिक अन्याय और गैर-बराबरीपूर्ण अघोषित परम्पराओं, विचारों पर कई मानवतावादी चिंतकों एवं श्रमशील समाज के सामाजिक कार्यकर्त्ताओं ने समय-समय पर आवश्यक चोटें की हैं और आम भारतीयों को एकरूपता एवं मानवीयता का पाठ पढ़ाया है उत्तर भारत के हिंदी पट्टी में ऐसी ही एक अलख बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में महामना रामस्वरूप वर्मा ने ‘अर्जक संघ’ की स्थापना करके जगाई थी रामस्वरूप वर्मा ने श्रमशील वर्गों को, कामगार-वर्गों को, किसानों-मजदूरों एवं स्त्रियों को ‘अर्जक’ की संज्ञा प्रदान की ‘अर्जक’ अर्थात् ‘अर्जन करने वाला’, ‘श्रमशील व उत्पादक वर्ग’, जिसकी संख्या भारतीय समाज में लगभग 90 प्रतिशत तक है रामस्वरूप वर्मा के चिंतन के आधार पर कहा जाये तो किसान, मजदूर, चर्मकार, कुम्हार, कहार, माली, तेली, तम्बोली, धुनिया, बुनकर, जुलाहा, मेहतर, सफाईकर्मी, स्त्रियां... ये सभी अर्जकों की श्रेणी में आते हैं लगभग पिछले साठ वर्षों से ‘अर्जक संघ’, उत्तर भारत के विशाल हिंदी पट्टी में ‘मानववाद’, ‘तर्कशीलता’ एवं ‘वैज्ञानिकता’ से ओत-प्रोत संस्कृति के प्रसार हेतु अभिन्न रूप से सक्रिय है अपने विचारों एवं मानववादी सामाजिक प्रयासों के मद्देनजर रामस्वरूप वर्मा को उत्तर भारत के ‘आम्बेडकर’ की उपाधि दी गई बाद के दिनों में, रामस्वरूप वर्मा के अभिन्न वैचारिक सहयोगी रहे बाबू जगदेव प्रसाद, चौधरी महाराज सिंह भारती, पेरियार ललई सिंह यादव सरीखे विचारवान, प्रज्ञावान एवं सामाजिक तौर पर सक्रिय अर्जक-योद्धाओं ने अर्जक-विचार के प्रचार-प्रसार एवं अर्जकों के सामाजिक उत्थान में महती योगदान दिया कवि डॉ. राकेश कबीर भी अपने आप को अर्जकों की उसी परम्परा से निसृत मानते हुए प्रतीत होते हैं दुनिया के विशालतम संविधानसम्मत लोकतंत्र भारत में आज भी संविधान-प्रदत्त तमाम सामाजिक-सुरक्षाओं की गारंटी होने के बावजूद अर्जकों के हित आये दिन कुचले जाते हैं वर्णाश्रम-धर्मी मन:स्थितियों वाले कई लघु समूहों में आज भी मनुवादी नीतियां येन-केन-प्रकारेण अर्जकों को लील लेने को आतुर हैं डॉ राकेश कबीर ‘नफ़रत’ शीर्षक कविता में कुछ ऐसी ही चिंतातुर मानवीय भावों को अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं, “नफ़रत ही स्थायी भाव है / इस देश के बाशिंदों का सदियों से / ...ये गाँव, ये शहर / नफ़रतों के पनाहगाह हैं / ऊँची-नीची जातियाँ नफ़रत से भरी / सदियों से आतुर हैं आदतन / लील लेने को सभी अर्जकों को[3]

किसी भी समाज में हाशिये के समूहों की बेहतरी के लिए, अर्जकों या आम श्रमशील जनताओं के हित के लिए सच्चे लोकतंत्र, जन-सुलभ न्यायिक प्रक्रियाओं, प्रकृति प्रदत्त नैसर्गिक परिवेश यथा शुद्ध जल, नदी, लघु जल-तंत्र, खेत, पहाड़ आदि का महत्व अप्रतिम रूप से अत्यंत आवश्यक कोटि का होता है डॉ. राकेश कबीर की रचनात्मक दृष्टि से यह मानवीय तथ्य कभी भी ओझल नहीं होता है इस सन्दर्भ में प्रो. दिनेश कुशवाह लिखते हैं, “कवि डॉ. राकेश कबीर की कविताएँ अपने समय की जटिलताओं से टकराती हैं नदी, लोकतंत्र, चुप्पी और कोलाहल, जिंदगी के सबक बनकर उनकी कविताओं में आते हैं उनकी कविताओं में सघन आत्मविश्वास है, जो उन्हें ‘हम न मरब मरि है संसारा’ वाले कबीर के पास ले जाकर खड़ा करता है[4]

इस कविता-संग्रह ‘कुँवरवर्ती कैसे बहे’ की शीर्षक कविता ‘कुँवरवर्ती’ में कवि डॉ. राकेश कबीर लोकजीवन के एक अनछुए पहलु से पाठकों को रूबरू कराते हैं मानवीय आधार पर हम जिस ‘सती-प्रथा’ को वीभत्सता-क्रूरता की चरम श्रेणी में ही मात्र रख सकते हैं, लोकजीवन के कुछेक अनुषंगी इकाईयों में इसका महिमामंडन भी किया जाता रहा है अनैच्छिक या ऐच्छिक रूप से सती होने वाली स्त्रियों को देवी का दर्जा दिया जाना राजस्थानी लोकजीवन में एकसमय प्रक्रियागत रहा है ठीक इसी तरह, भारतवर्ष के कई अंचलों में कई तरह की लोक-कहानियाँ किम्वदन्तियाँ मिलती रही हैं, जिनमें किसी घटना का अन्यान्य तरीके से महिमामंडन किया जाता रहा है एक दिलचस्प तथ्य यह है कि ख़ास तौर पर इस तरह की कहानियाँ स्त्रियों और विशेषकर कुँवारी लड़कियों के इर्द-गिर्द और ज्यादा गढ़ी जाती रही हैं ; जिसमें उन्हें कभी ‘देवी’ तो कभी ‘भगवती’ और ‘माई’ की उपमा से निरुपित किया जाता रहा है लोकजीवन से सम्बद्ध ऐसी ही एक घटना के दैवीय प्रकाट्य को डॉ. राकेश कबीर ‘कुँवरवर्ती’ शीर्षक कविता में उजागर करते है, “पता नहीं कौन रही होगी / वह कुँवारी लड़की / जिसको देवी बनाने के वास्ते / गढ़ दी गई थी एक अनोखी कहानी / ऐसी ही तमाम कहानियों की तरह / जिन्हें धरती के एक सच को / ढेर सारी कपोल-कल्पित कथाओं और / लीलाओं के रसायन में घोलकर / उड़ा दिया जाता है आसमान में / अनेक शक्तियों से संपन्न कर / फ़िर एक ‘जमीनी सच’ / ‘पारलौकिक सत्य’ बन जाता है / और तालाब में दफ़न हुई ‘कुँवारी लड़की’ / ‘कुँवरवर्ती देवी’ के मिथक में बदल जाती है[5]

डॉ. राकेश कबीर की कविताओं में समकालीन सामाजिक समस्याओं की मुखर अभिव्यक्ति भी स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती है सामाजिक परिप्रेक्ष्य में कवि डॉ. राकेश कबीर अपनी रचनात्मक दृष्टि का विस्तार भारतीय समाज के अभिन्न अंगों, दलितों-वंचितों, अर्जकों, बहुसंख्यकों से होते हुए धार्मिक अल्पसंख्यकों तक भी करते हैं आम तौर पर धार्मिक अल्पसंख्यकों के जीवन में भी कई तरह की सामाजिक समस्याएँ होती हैं किन्तु राजनीति की तरह ही साहित्य में भी बहुधा वे विमर्श के केंद्र में आने से चूक जाती हैं ‘बाय प्रोडक्ट’ शीर्षक कविता में डॉ. राकेश कबीर गरीब मुसलमानों के सरोकार से जुड़ी एक ऐसी ही सामाजिक समस्या, ‘क़ब्रिस्तान’ की अनुपलब्धता की ओर पाठकों का ध्यान खींचते हैं आमतौर पर हम यह मान करके चलते हैं कि किसी गरीब आदमी के जीवन में जो भी समस्याएँ हैं, वे तभी तक हैं जब तक कि उस इंसान का जीवन है जीवन के उपरान्त ‘मृत्यु’ से जुड़े मसलों पर तो हमारा कभी ध्यान भी नहीं जाता है कभी अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह जफ़र ने अंग्रेजों की कैद में, विदेशी सरजमीं पर ही अपने दम तोड़ देने की आशंका को महसूस कर कहा था कि, ‘है कितना बदनसीब जफ़र कि दफ्न के लिए / दो ग़ज जमीन भी ना मिला कुए-यार में’ बहादुर शाह जफ़र, सरज़मीने-हिंदुस्तान के अंतिम मुग़ल बादशाह थे, किन्तु अंग्रेजों की कैद में होने के कारण वो अपनी मृत्यु उपरांत होने वाली दशा को जीते-जी भांप गये ! ठीक यही दशा आज ग़रीबी की कैद में रहने वाले ग़रीब मुसलमानों की है गौरतलब है कि गरीब मुसलमानों को जीते-जी घर बना कर रहने के लिए जमीन का एक उचित टुकड़ा नसीब नहीं हो पाता है ; जैसे-तैसे झोपड़पट्टीयों में उनकी परिवार-सहित जिन्दगी गुज़रती है लिहाज़ा मृत्यु के बाद उनके लिए सार्वजानिक कब्रिस्तानों में ही एक कोना मिल जाये, वही बहुत है किन्तु तेजी से शहरीकृत होती जा रही दुनिया में ‘कब्रिस्तानों’ की जमीन भी ‘रोड-रेज’ वालों के हाथों या बिल्डरों के हाथों अवैध रूप से हथिया ली जा रही हैं, ताकि उन जमीनों पर ‘इन्वेस्टमेंट’ करके आधुनिक औद्योगिक या व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को बसाया जा सके औद्योगिकीकरण और शहरीकरण के इसी उप-उत्पाद को डॉ. राकेश कबीर ‘बाय प्रोडक्ट’ शीर्षक कविता में अभिव्यक्त करते हुए चिन्हित करते हैं, “शहर से सटे गाँव में मर गया है / एक ग़रीब मुसलमान / नहीं है जगह सुपुर्द-ए-ख़ाक होने को / इन्वेस्टमेंट होके बिक गया है कब्रिस्तान / ‘रोड-रेज’ वालों के हाथ / बनेंगे ऊँचे-ऊँचे फ्लैटस उसी जगह पर / बसेंगे इधर भी कुछ बड़े लोग[6]

वास्तव में, इस संग्रह ‘कुँवरवर्ती कैसे बहे’ की अधिकांश कवितायें सामाजिक-सांस्कृतिक एवं मानवीय परिप्रेक्ष्य में डॉ. राकेश कबीर की रचनात्मक दृष्टि के विस्तार की पुष्टि करती हैं इन कविताओं में जहाँ एक ओर जीवन्तता एवं गहन सामाजिक सरोकार के भाव निबद्ध हैं, वहीं दूसरी ओर इस संग्रह की कविताओं में जल-जंगल-जमीन और मानुष के नैसर्गिक भाव पिरोये गये हैं इस सन्दर्भ में कथाकार शिवमूर्ति की टिपण्णी समीचीन प्रतीत होती है बकौल शिवमूर्ति, “डॉ राकेश कबीर में दृष्टि है, सरोकार और साहस भी राकेश अपनी अभिव्यक्ति में सरल हैं, वे जो कहना चाहते हैं और जैसा कहना चाहते हैं, समझ में आता है उनकी कविताओं में गाँव, नदियों, पहाड़ों को देखने की एक सर्वथा नवीन दृष्टि है उनके शब्दों में प्रतिकूल परिस्थितियों के विरुद्ध अड़कर खड़ा होने का साहस भी है[7]



[1] कबीर, डॉ राकेश, कुँवरवर्ती कैसे बहे, प्रभात पेपरबैक्स, नई दिल्ली, 2020
[2] कबीर, डॉ राकेश, कुँवरवर्ती कैसे बहे, गाँव-गाँव कोरेगाँव (कविता), प्रभात पेपरबैक्स, नई दिल्ली, 2020, पृष्ठ सं. 47
[3] कबीर, डॉ राकेश, कुँवरवर्ती कैसे बहे, नफ़रत (कविता), प्रभात पेपरबैक्स, नई दिल्ली, 2020, पृष्ठ सं. 118-119
[4] कबीर, डॉ राकेश, कुँवरवर्ती कैसे बहे, प्रभात पेपरबैक्स, नई दिल्ली, 2020
[5] कबीर, डॉ राकेश, कुँवरवर्ती कैसे बहे, कुँवरवर्ती (कविता), प्रभात पेपरबैक्स, नई दिल्ली, 2020, पृष्ठ सं. 31
[6] कबीर, डॉ राकेश, कुँवरवर्ती कैसे बहे, बाय प्रोडक्ट (कविता), प्रभात पेपरबैक्स, नई दिल्ली, 2020, पृष्ठ सं. 101
[7] कबीर, डॉ राकेश, कुँवरवर्ती कैसे बहे, प्रभात पेपरबैक्स, नई दिल्ली, 2020

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