पाँच कविताएँ: प्रकाश मनु

प्रकाश मनु
सुबहे बनारस

यह सुबहे बनारस है
गंगा के पानियों पर बहते ताजा सुरों के साथ
गुनगुनाती हुई भोर
कुछ आत्म-विस्मृत सी
डूबी-डूबी सपने में

बरस रहे हैं सुर
गंगा तट पर
बरस रही है सुबह बनारस में 
सितारा देवी के नृत्य की मोहक लय-ताल
और अल्ला रक्खा खाँ के तबले की थाप की तरह

हम चार हैं यहाँ गंगा घाट पर 
मैं, सूर्य भाई, ब्रजेंद्र त्रिपाठी और सुरेश्वर
चार मित्र मिले जो बहुत दिनों बाद
सुबहे बनारस के रस में भीगते हुए भीतर तक
चुप-चुप निर्वाक

संगीत बस, संगीत बरस रहा है यहाँ चतुर्दिक
हवाओं में बहते संगीत की गैरिक लय-तान 
तृप्त करती है हमें भीतर—बहुत भीतर तक
गंगा की लहरों की कल-कल, कुल-कुल की तरह 
और हम चुप-चुप बह रहे हैं
किसी अनहद नाद में
जो शब्दों से परे है, अछोर

अभी कुछ अँधेरा है
पर बनारस जाग गया है नींद का लिहाफ
उतारकर
गंगा के घाट, गंगा की रेती और पानियों पर
उतर रही है सुबह 
और दूर तक सुनाई देती है उस्ताद विस्मिल्लाह खाँ 
की शहनाई

शहनाई के बोल
गंगा की लहरों पर काँपते हैं
हवा में लरजते हैं
और दूर क्षितिजों के पार उतरने लगते हैं

केवल बनारस नहीं
बनारस की गंगा और व्याकुल घाट नहीं
गंगा के फूल-पात पत्थर और शैवाल नहीं—
अखिल ब्रह्मांड सुन रहा है
उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई के बोल
जो गंगा घाट पर उतरते हैं
तो समय थम जाता है
और हर चीज कालातीत 
शिव के शांत, मृदुल हास्य की तरह

देखिए गंगा के घाट अब कितने साफ हो गए हैं
पहले बुरा था हाल—
उल्लसित सुरेश्वर का स्वर,
हाँ-हाँ-हाँ, भाई सुरेश्वर, हाँ!
मैं जवाब देता हूँ
पर कान तो उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई 
की तरफ लगे हैं
जिसके स्वर न जाने कब के हवा में बह रहे हैं
बहते रहेंगे अभी सदियों तक 

गंगा के संग-संग बहती नौका में हम चारों मित्र
केवट भी
बहे जा रहे हैं आह्लादित उर
कि अचानक किसी बात पर हँसते हैं साथ-साथ
तो हँसती है गंगा मैया भी 
उमगकर
देती है असीसें शीतल मन से
कि बेटे आए हैं आज बहुत दिनों बाद
जिएँ
जीते रहें खूब आनंद मनाएँ

लौटते हुए फिर आँखों में भरता हूँ मैं
गंगा का अनंत विस्तार
उसकी शीतल छुअन
उसकी असीसों पर असीसें
सिर और माथे पर उसकी उँगलियों की कँपकँपाहट

लौटते हुए फिर-फिर देखता हूँ
पीछे मुड़कर
मैं विह्वल सा
कि गंगा बह रही है
अपनी उमगती लहरों के साथ बड़ी अद्भुत
आनंद लीला सी रचाए
एक गंगा मुझमें एक बाहर बह रही हैँ

गंगा के साथ-साथ बह रहा है पूरा बनारस भी
अनादि लय में
कि सुबह हो रही है
बनारस में सुबह।
***


हिंदी के लिए एक कविता

हिंदी दिलों की भाषा है आत्मा की सनातन बानी
हिंदी है हमारे पुरखों का कोठार
हिंदी हृदय है इस महादेश का जिसमें बसते हैं सवा सौ करोड़ जन 
और उनके हँसने-रोने, गाने और गुनगुनाने का जादुई अरथ भी

हिंदी धुरी है जिंदगी की कठिनतम लड़ाइयों की
हिंदी रोज-रोज के दुख-दरद, उच्छ्वास और फटे हुए 
आँसुओं की भट्ठी
जो रोज अपनी आँच में तचाकर हमें कर देती है 
बज्र से अधिक मजबूत
हिंदी है रात-दिन निरंतर दौड़ रहे एक विशालकाय रथ 
के पहिए की गुंजार
हिंदी एक विराट स्वप्न और इच्छाओं का आकाश
जिसका ओर-छोर कोई आज तक नाप पाया ही नहीं

हिंदी चिड़ियों की चह-चह है हिंदी पत्तों की मर-मर
हिंदी गरीब की रोटी और रोजी है हाजीपुर के अवधू रिक्शे वाले
की फटी बनियान से चमकता पसीना
हिंदी रामू पुताई वाले के चूने सने हाथों और सादा सी कूँची 
से उपजी दीवारों की सफेदी है 
दीवाली के दीयों की झलर-मलर हँसी
होली का धूल सना अबीरी हुल्लड़ और टेसू की महकती शाम

हिंदी हमारी और हम सबकी प्यारी भारत माँ 
के दुक्खों की बोली है 
जिसमें आँसू भी हैं दुख कराह सिसकियाँ और सुच्चे
मोतियों सी हँसी भी
हिंदी रोली है बहना का प्यार, चंदन और अबीर दोस्ती का 
हिंदी जिंदगानी है खेत-खलिहानों की जिंदादिल भाषा 
जिसकी धूल भी गाती-गुनगुनाती है

हिंदी कबीर का करघा मीरा के पदों की अनवरत पुकार है
हिंदी सुराज की तकली और चरखा है खादी और खुद्दारी है
हिंदी लोकगीतों का पलना है लोककथाओं की मीठी 
शहदीली उड़ान वाली सप्तरंगी पाँखी
वह अटकती, कहीं भटकती भी हो अगर, तो उस पर हँसना
खुद अपनी माँ की मैली, फटी हुई साड़ी उधड़ी चोली की शर्म
पर निरलज्ज होकर हँसना है 

हिंदी तुलसी की मर्यादा है सूर के रसभीने पदों की बोली-बानी
हिंदी जनता के फटेहाल महाकवि निराला की खुद्दारी 
की भाषा है जिसकी पूरी जिंदगी लड़ते हुए बीती
हिंदी प्रेमचंद के किरमिच के फटे जूतों से झाँकती
मैली उँगली है पैर की
जिस पर नजर आ जाता है हिंदी लेखक की 
अनाम पीड़ाओं का इतिहास
कि इस महादेश के सवा सौ करोड़ परानियों के जीने मरने हँसने और 
रोने की भाषा है हिंदी
हिंदी उनके होने का आईना उनकी जिंदगी का पर्याय है

हिंदी बिना दीवारों वाला घर है
जिसमें रहते हैं अनगिनत मेहनतकश लोग अपने दुख-दर्द 
माथे पर चुहचुहाते पसीने और बेअंत परेशानियों के साथ
हिंदी मिट्टी में साँस लेती लुहार की धौंकनी है कुम्हार का चाक
हिंदी है गोमुख जिससे निकलकर महा समुद्र की लहरों सरीखे 
उच्छल ऊर्जित करोड़ों लोग
बढ़ा देते हैं रोज एक कदम और आगे पूरी आश्वस्ति से
और समय का महाभारत लिखता है रोज एक नया मन्वंतर

हिंदी है इक्कीसवीं सदी का नया अर्थ जो इस महादेश 
की नाभि से निकला है
प्रभात सूर्य की किरणों में नहाए नीलोत्पल सरीखा
हिंदी है झोंपड़पट्टी के सात बरस के बिरजू की झिझकती कलम
जिससे नए युग की रामायण और नया समय रचा जाना है...
हिंदी है पाँच बरस की एक छोटी सी बच्ची रजिया के हाथ का ब्रश
जिससे अभी-अभी लिखा गया है स्वागतम्
और धूप में चमकते हैं उसके गीले सतरंगी आखर

हिंदी को एक दिन गाजे-बाजे से मनाने की दरकार नहीं दोस्तो
हिंदी तो रोज-रोज है हर दिन हर पल हर साँस 
 की लय और बेखुदी में
हिंदी हर पल धड़कती है हममें
हिंदी माँ है हमारे होने का मतलब...
हिंदी जिंदगी है और जिंदगियों के पार 
की जिंदगी भी
जिसे मानी देते हैं करोड़ों करोड़ लोग अपने गुट्ठिल हाथों से
***


नन्ही किट्टू के लिए एक पभाती

उठो मेरी प्यारी किट्टू, उठो और जरा आखें खोलो
देखो तो बाहर कितना उजला सा सबेरा है
द्वार पर झन-झन करती किरणें सूरज की दस्तक दे रही हैं
चिड़ियाँ किट्टू-किट्टू कहकर प्यार से पुकारती हैं तुम्हारा नाम
हवा तुम्हारे माथे पर बिखरे बालों से खेलती 
अचानक खिलखिलाकर हँस पड़ी है

लो, अभी-अभी फिर किसी ने पुकारा तुम्हारा नाम
लो, अभी-अभी फिर किसी ने आवाज दी है
किट्टू, किट्टू, मेरी प्यारी किट्टू—हवा में गूँजता है तुम्हारा नाम
शायद एक नन्ही सी चंचल गौरैया आई है तुम्हें उठाने
उठो प्यारी किट्टू, उठो और जरा आँखें खोलो

सूरज काका तुम्हें बाँहों के झूले पर झुलाने के लिए आ गए
पापा एक मखमली ऊँटनी लाए हैं तुम्हें घुमाने के लिए
उठो और जरा बैठकर उस पर एक चक्कर लगाओ तो प्यारी छुटकू
मम्मी ने गोटे वाली ओढ़नी बनाई है खुद अपने हाथों से
पहनो और जरा नदी के पानियों में देखो तो अपनी परछाहीं

जरा देखो तो, द्वार पर खड़ा घोड़ा हिन-हिन करके स्वागत गान
गा रहा है भला किसके लिए
भूरी कुतिया पूँछ उठाकर पूछती है बार-बार—क्या जागी नहीं किट्टू,
कब आएगी वह मेरे साथ खेलने?
चंचल गौरैया पूछती है, किट्टू मेरे साथ तो जरूर खेलेगी ना?
उठो और खेलो लाडली किट्टू, रोज-रोज के अपने प्यारे दोस्तों से

उठो सब तुम्हारे लिए द्वार पर बैठे हैं
उठो और खेलो
उनके साथ दौड़ो, उछलो-कूदो और यों ही गुलगपाड़ा मचाते हुए
अचानक छुपमछुपाई वाले किसी परदे में छिप जाओ
और वहीं से आवाज लगाओ कि जरा ढूँढ़ो तो मुझे, मैं यहाँ...! 

उठो मेरी प्यारी किट्टू, उठो और जरा आखें खोलो तो सही

देखो ये सबके सब तुम्हारे लिए आकुल हैं
देखो तो जरा किस-किस को प्रतीक्षा है तुम्हारी
किस-किस ने आतुर होकर पुकारा तुम्हारा नाम
आओ जरा देखो तो बाहर कौन-कौन हैं तुम्हारे इंतजार में

आओ और देखो तो जरा कि यह भोर का नरम-नरम सा 
मखमली उजाला, 
यह ओस धुली फूलों की हँसी
यह कोयल की कूक और तितली की बाँक भरी मुसकान
तुम्हारे, बस तुम्हारे लिए है
चिड़ियाँ बस तुम्हारे लिए गा रही हैं सुरीली भोर के गान
फूल खिले हैं बगिया में तुम्हारे, बस तुम्हारे लिए...

उठो, उठो, मेरी प्यारी बच्ची, जरा आँखें खोलो,
कि एक नई सुबह सज-धजकर और गुलाबी फ्रॉक पहनकर
आई है तुम्हारे लिए, 
उठो...और मुसकराकर उसका स्वागत करो...
उठो और हँसो और हँसो
और हँसी खुशी से भर दो झोली
कि दुनिया की सब खुशियाँ तुम्हारे, बस, तुम्हारे लिए हैं
मेरी नन्ही प्यारी किट्टू।

जरा उठो और आँखें खोला प्यारी किटू,
कि बाहर कितना खिला-खिला सा उजला सवेरा 
तुम्हारा इंतजार कर रहा है
बुला रही हैं तुम्हें चिड़ियाँ—
नन्ही शैतान तुम्हारी दोस्त सहेलियाँ
बुला रही भूरी कुतिया
बुला रहे लान में उगे हँस-हँस पड़ते गेंदे और गुलाब...
उठो मेरी प्यारी किट्टू
उठो और आँखें खोलकर देखो तो जरा
सुबह का यह अलमस्त नजारा।
***


अपने शहर की उस छोटी सी नदी को याद करते हुए

कहाँ गई वह नदी जो बहती थी अलमस्त 
छलाँगें लगाती
और जीवन हरियाता था दूर-दूर तक
हरी दूब और हवा की उन्मुक्त ठिठोली की तरह

रंगों का आसमान ओढ़े बहती थी जो
दिल में दिल की आस की तरह
उतर आती थी सपनों में शोख परिंदों सी चहचहाती
पेड़ पत्थर मिट्टी के ढूहों से टकराकर कभी-कभी
हँसती थी खिक्क से
और पलटकर देखती थी अचानक तीखी चितवन से
तो भीतर एक कमल वन उग आता था
ठुमरी के बोलों के साथ नाचता

कहाँ गई वह नदी
जो शहर का गहना थी मोतियों जड़े गलहार सी
जिसके इर्द-गिर्द चहचहाता था पूरा शहर 
जाड़ों की मुलायम धूप में एक मीठी गुन-गुन के साथ
और कुछ का कुछ और हो जाता था

कहाँ गई वह नदी जिसमें डुबकी लगाकर सूरज चाँद की किरणें 
और चह-चह टोलियाँ 
तारों की
खुशदिल बच्चों की तरह चहकतीं
छुआछाई खेलते हरियल तोते, मैना और गौरैयाँ
किनारों पर
तो सुरीली हो जाती थीं हवाएँ दूर तलक
पेड़-पत्तों और जिंदगी में रस टपकाती

कहाँ गई वह नदी जो बरसोंबरस चटकीली धूप में 
पूरे शहर को ढोती रही पीठ पर
दिनोंदिन दुबली और दुबली होती जाती थी वह
लंबे अरसे से
कुछ थकी-थकी सी निष्प्रभ मुसकान
मगर थी और भीतर तक उजलाती थी
हमारे दिल और आत्मा को
 
कहाँ गई वह नदी जो किनारे के हरे-भरे आम के दरख्तों 
घास पत्थर और चिड़ियों से बतियाती
कभी-कभी अचानक खिलखिला पड़ती थी जोर से
तो चौंकते थे खेत-खलिहान आसपास के
राह चलते मानुस बोझा ढोती मजदूरिनें
और धूल में लिपटी पगडंडियाँ तक

कभी-कभी अचानक स्टेशन रोड के व्यस्त ट्रैफिक तक 
पहुँच जाती
उसकी खिलंदड़ी हँसी
किसी मिठबोली साँवली सलोतरी बहन सी
तो रस्ता चलते लोगों के कदम ठिठक जाते थे

जब भी उसके करीब जाओ
वह बेझिझक उतर आती थी दिल में
आत्मा के गुनगुने संगीत की तरह
और भीतर ठंडे पानियों के सोते फूट पड़ते थे

वह नदी जो सबका जीवन थी
जीवन की सबसे मीठी और पवित्र गुहार
गुजरी सदियों से
वह जो शीतल हवाओं वाला घर था हमारा
आसमानों से बरसती आग और लपलपाती लूओँ 
की मार से सुरक्षित... 

वह जो सावन गीतों के हिंडोलों मंगल गानों
और हल्दी-चावल की थाप की तरह
शामिल थी हमारी जिंदगी की हर खुशी में
कहाँ चली गई अचानक
देखते ही देखते
किसने लील लिया पूरी एक नदी को...

आओ चलो, दोस्तो,
उसे कहीं से ढूँढ़कर लाएँ
एक दुनिया जो खो गई है, उसे फिर से बसाएँ
***


बूट पालिश के जॉन चाचा को याद करते हुए

उस क्षण सच कहूँ डेविड, कि तुम खुदा लगे मुझे 
इस धरती के
जब देखा मैंने तुम्हें पहली बार
अपनी बैसाखी के साथ नाचते बूटपालिश में

बहुत कुछ था जो हो रहा था तुम्हारे इर्द-गिर्द
तुम जो कि एक मैली दुनिया के मामूली इनसान थे
अँधेरी जिंदगी की कथरियों में लिपटे बेहाल
पर आत्मा उजली थी तुम्हारी सोने सी
और आँखों में धरती के किसी नए मसीहा जैसा 
झर-झर झरता प्यार और करुणा देखी थी मैंने 
जगमगाती मोतियों सी, जो पहले कभी देखी नहीं कहीं

शायद इसलिए कि प्यार की पूँजी थी तुम्हारे पास अमोल
दिल बड़ा बहुत बड़ा था तुम्हारा जिसमें समा जाती
पूरी की पूरी कायनात अनकहे दुख-दर्द आनंद और रहस्यों भरी
आँखें तुम्हारी अँधेरों के पार देख लेती थीं...
और हर मैले मजबूर बच्चे में सो रहे कल के 
एक खूबसूरत इनसान को भी

बच्चे हर वक्त तुम्हें घेरे रहते थे डेविड
कि जो लाचार और बदहाल उठकर आए थे उस गंधाते नरक से
जहाँ नहीं पहुँचती कोई उम्मीद या रोशनी जमाने की 
ये रोते पिटते साँस लेते थे उस दुनिया में
जिसे जिंदगी की तलछट कहा जाता है अकसर छिः-छिः करते हुए
मैली झुग्गियों की बेचारगी में रहते थे उनके माँ-बाप
कुछ ऐसी जकड़न और दीनता में कि वे बच्चों को क्या पालते 
बच्चे अनाम गलियों सड़कों चौरस्तों पर भटकते हुए
पल रहे थे खुद ही
कभी भीख माँगते तो कभी मजबूरन करते कोई छोटा-मोटा अपराध भी

मगर इस बेहाल दुनिया में कोई एक था जो उनका था 
उनका अपना जो करता था उन्हें प्यार
उनकी मार खाई दुनिया को फूलों की खुशबू और उजालों
से भरने के सपने देखता था
उनके फटे कपड़ों के अंदर चमकती बेदाग आत्मा से 
मिलकर खुश होता बेइंतिहा
और वो तुम थे डेविड, तुम जो कि उन फटेहालों की जिंदगी में 
जॉन चाचा बनकर आए थे, जिनका कोई न था
और जिनकी कहीं जगह न थी, न वर्तमान और न भविष्य में
तुम उनके अँधेरों को चाँद-तारों से रोशन करना चाहते थे

खुद मैली जिंदगी के गर्त में धँसे कंधों तक 
तुम खोज रहे थे उनके लिए खुशहाली का सबेरा
जो अपनी अँधेरी जिंदगी में कुनमुना रहे थे मजबूर और लाचार
तुम्हारी आँखें जान लेती थीं एक-एक बच्चे के दिल का हाल
और अपनी बैसाखी ठकठकाते हर बच्चे तक पहुँच जाते थे तुम 
बच्चे भी किसी न किसी तरह तुम तक 
और इस दुनिया के भीतर बस जाती थी एक ऐसी खुशनुमा दुनिया 
जो पहले कभी देखी न थी मैंने 
और होगी कभी, यह सोचा भी न था
पर वह थी और तुम थे बच्चों के पास—बहुत पास
अपनी तसल्ली भरी बातों से लगाते उनके घावों पर मल्हम...

कौन हो तुम, क्या नए जमाने के ईसा चढ़ते सलीब पर फिर-फिर 
अपनी प्यारी संतानों के लिए
मैं पूछना चाहता हूँ अचकचाकर कि एकाएक 
बदलता है परिदृश्य
अब तुम हो और तुम्हारे चारों ओर बच्चे बेशुमार
कुछ दुखी उदास कुछ उत्साह भरे
जो घेरकर तुम्हें गा रहे हैं—
जॉन चाचा, तुम कितने अच्छे, तुम्हे प्यार करते सब बच्चे... 

बीच-बीच में पूछते सवाल भी कि चाचा, हमको काम नहीं, 
क्यों काम नहीं,
कोई ऐसा काम बताओ, जिसमें हों बदनाम नहीं
बदनाम नहीं...
सवालों पर सवाल जो चीखते तिलमिलाते अंदर तक
रुलाते जार-जार कि जॉन चाचा, हम क्या करें, कैसे कि कुछ बदले
जिएँ किस तरह कि हमारी जिंदगी में भी पैदा हों मानी

और फिर एकाएक किसी पल तुम्हारे सँवलाए चेहरे तुम्हारे होंठों 
पर आता है नजर
वह नूर जो कभी किसी गौतम किसी ईसा के चेहरे पर चमका था 
बीती शताब्दियों में 
और होंठों पर सुरों का एक झरना सा फूटता हुआ—
वो रात गई, फिर दिन आता है
इसी तरह आते-जाते ही यह सारा जीवन जाता है...!

बच्चे तुम्हारे इर्द-गिर्द हैं नाचते-गाते और आनंद मनाते हुए
दोस्ती के खूबसूरत छत्ते की तरह
और तुम अपनी बैसाखी के सहारे दौड़ते आगे-आगे
बुलाते समय के महा कापालिक को
एकाएक नाचने से लगते हो उत्साह से

आह, वह एक ऐसा क्षण था अनंत रोशनियों भरा कि मैं बेकाबू सा
दौड़कर चूम लेना चाहता हूँ तुम्हारा हाथ
लगाना चाहता हूँ उसे आँखों और माथे और छाती पर
कुछ पगलाया सा... 
पर तुम फिल्म में थे डेविड मैं फिल्म से बाहर यह मजबूरी थी
और फिर आखिर बदलती है जिंदगी बदलती समय की धार भी
मैली गलियों से निकाल लाते हो तुम जॉन चाचा उन्हें—उन सबको
कि कूड़े की बू-बास और अँधियारे में भटक रहा था बचपन जिनका 
सचमुच नए जमाने के किसी फरिश्ते की तरह...

मेरी आँखें गीली हैं दिल भीगा हुआ सा
कि मैं खुद धीरे से बुदबुदा उठता हूँ—
जॉन चाचा, तुम कितने अच्छे, तुम्हे प्यार करते सब बच्चे...

मैं बहुत शुक्रगुजार हूँ डेविड कि मेरे बच्चों—मेरी दुनिया के असंख्य बच्चों
को प्यार करने वाला कोई है तुम सरीखा
जिसके पैर धरती से छह अंगुल ऊँचे हैं
कि मैं उनके लिए ताउम्र लिखता रहा कविता, कहानियाँ 
नाटक और उपन्यास भी
मगर जॉन चाचा तो नहीं बन पाया था न!

काश, कि मैं बन पाऊँ कुछ-कुछ तुम्हारे सरीखा ही 
और जब तक नहीं बन पाता
मैं भी उन बच्चों में शामिल हो जाना चाहता हूँ प्यारे डेविड
जो भूलकर सारे जमाने के दुख-दर्द, चिंताएँ
इस वक्त गा रहे हैं तुम्हारे चारों ओर घूम-घूम, झूम-झूमकर 
कि जॉन चाचा तुम कितने अच्छे...जॉन चाचा...जॉन चाचा...!

हाँ-हाँ, जॉन चाचा...!
मेरी आँखें गीली हैं इस वक्त होंठ कँपकँपाते हुए
एक बेकाबू जज्बे से 
कि तुम्हीं हो एक अकेली आवाज हमारे वक्तों की
जो आज भी घुमड़ती है मेरे दिल में तो मच जाती है हलचल 

और मेरे मन और आत्मा से निकलती हैं 
हजारों-हजार दुआएँ
जो जॉन चाचा तुम्हारी और दुनिया के हर जॉन चाचा की 
सलामती की दुआएँ माँगती हैं
आज के और भी बुरे हो चुके वक्त में
**

545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008,
चलभाष: 09810602327
ईमेल: prakashmanu333@gmail.com

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