संस्मरण: सचमुच दुर्जेय थे विष्णु खरे

प्रकाश मनु
(आलेख व चित्र: प्रकाश मनु)


विष्णु खरे अब नहीं हैं। उन्हें गुजरे पूरे पाँच बरस हो गए। लेकिन मैं आज तक यकीन नहीं कर पाया कि वे अब नहीं हैं। जब थे, तो मैं दौड़-दौड़कर उनके पास जाता था। या उनके फोन आ जाते थे। विदेश में हों, तो वहाँ से भी। न वे रह पाते थे, न मैं। उनसे बात करके भीतर कुछ जाग सा जाता था, और मन एक नए उत्साह से भर जाता था। बल्कि उत्साह हलका शब्द है। वे इतने आविष्ट व्यक्ति थे कि उनसे बातें करते हुए, भीतर बिजलियाँ सी दौड़ती थी। और बातें करते हुए न उन्हें समय का कुछ होश रहता था, न मुझे। एक अजब सी दीवानगी थी वह।

कहना न होगा कि ‘एक दुर्जेय मेधा’ के रूप में विष्णु खरे मेरे मन, मस्तिष्क और भाव-जगत पर पिछले कोई अड़तालीस बरसों से छाए हुए हैं। एक लड़ाका कवि के रूप में वे मुझे युवाकाल से ही मोहते रहे, और लगभग समकालीन कविता का पर्याय ही बन गए। वे अब नहीं हैं। पर कैसे कहूँ कि वे अब नहीं है, जबकि मेरा तो उनसे अब भी वैसा ही मिलना होता है। बस, फर्क यह है कि अब मैं उनकी कविताओं के जरिए उन तक पहुँचता हूँ, और एक बार वहाँ पहुँचा, तो फिर लौटना याद नहीं रहता।

विष्णु खरे
बस, विष्णु खरे याद रहते हैं, और उऩकी बातें। और कविताई, जिसकी कोई मिसाल आज भी हिंदी में नहीं है। विष्णु खरे, विष्णु खरे हैं और उन जैसा दूसरा कवि हिंदी में हुआ नहीं। जैसे मुक्तिबोध, मुक्तिबोध हैं। मुक्तिबोध की अगर किसी से तुलना की जा सकती है, तो बस मुक्तिबोध से।

घड़ी टिक-टिक, टिक-टिक करती हर क्षण आगे, और आगे चलती जाती है। समय अपनी चाल से चलता जाता है, और किसी के लिए नहीं रुकता। लेकिन मैं क्या करूँ? मैं किससे कहूँ और कैसे कहूँ कि विष्णु खरे के बगैर जिया गया जीवन मुझे जीवन नहीं लगता। भीतर कोई सन्नाटा लगातार बजता है, और अंदर से रह-रहकर आती आवाज, “विष्णु खरे आज होते तो...! काश, विष्णु खरे आज होते तो...!”

मैं एक बार उनके सम्मोहन की लपेट में आया तो फिर कभी नहीं निकल पाया। वे ऐसे ही थे। उनका प्रभाव विकट था। ऊपर से बहुत खुरदरे लगते हुए भी वे भीतर से कितने कोमल, संवेदनशील और भावार्द्र थे, उन्हें कोई बहुत निकट का आदमी ही जान सकता था।...और मैंने उनकी आँखों में आँसू देखे हैं। मैंने उन्हें चुपचाप आँसू पोंछते और रोते देखा है।

विष्णु खरे
ऐसे क्षण जब शब्द साथ छोड़ देते हैं, और देर तक बस चुप्पी से ही आप संवाद करते हैं।...

भला कौन यकीन करेगा कि ऊपर से बड़ा कठिन-कठोर और चटियल सा नजर आने वाला यह हिमालय पिघलता था, तो किस कदर पानी-पानी हो जाता है।

आज जब यह संस्मरण लिख रहा हूँ, सब कुछ एक साथ याद आ रहा है, और मेरी आँखें नम हैं।

सारे बीते पल एक साथ याद आ रहे हैं। और मैं रो रहा हूँ। किसे बताऊँ कि विष्णु खरे के जाने के साथ ही मैंने क्या कुछ खो दिया।

विष्णु खरे
यादों की एक पूरी फिल्म है। अंतहीन। जिसमें कहीं ‘द ऐंड’ नहीं।

पिछले दो दशकों से तो हालत यह थी कि वे देश में हों या विदेश में, कोई पंद्रह-बीस दिनों में उनका फोन जरूर आ जाता था। बड़े भाई सरीखी करुणा और पारिवारिक भावना के साथ वे मेरा हालचाल पता करते थे और जिस मनःस्थिति में वे जी रहे होते थे, उसे भी कुछ-कुछ बयाँ कर जाते थे। या फिर मेल से पत्राचार करके वे इस दूरी को पाटते थे।...और मझे इंतजार रहता था, अब विष्णु जी का फोन आएगा, या मेल से कोई संदेश। और वह आता था।

पर अब विष्णु खरे नहीं है। और कुछ नहीं है।...

कोई पाँच बरस पहले 12 सितंबर की रात को अचानक हुए मस्तिष्काघात के बाद मृत्यु से एक लंबी लड़ाई लड़ते हुए, 19 सितंबर 2018 को आखिर वे हमें छोड़ गए।...पर विष्णु खरे जैसा हर तरह के अन्याय और कपट चालों के आगे डट जाने वाला, दिलेर, हिम्मती और दुर्जेय योद्धा कवि जा कैसे सकता है? उनकी कविता सार्वकालिक है, और वह हर दिल में अपना घर बना लेती है। यही उनकी शक्ति भी है। इसीलिए वे जाकर भी जाने वाले कवियों में नहीं हैं।

विष्णु खरे
शायद कइयों को पता न हो कि महाभारत विष्णु खरे का सर्वप्रिय ग्रंथ था, जिसके कई प्रसंग उनकी कविता का विषय बने। हालाँकि विष्णु खरे कई बार कथानक को इस कदर आकस्मिक ढंग से उलट देते थे, कि एक खास नजरिए से चीजों को देखने वाले लोग चौंकते थे, अरे, यह क्या...! पर यही विष्णु खरे का ढंग था, उनकी कविता का भी। एक ही बने-बनाए तरीके से चीजों को देखने की अभ्यस्त दृष्टि और रूढ़ता पर वे चोट करते थे। और वहाँ भी सवाल खड़े कर देते थे, जहाँ हम घोर श्रद्धा से भरकर गद्गद हो रहे होते थे।

मुझे कई बार लगता है, विष्णु खरे हमारे दौर के कर्ण थे। वक्त का काम केवल अर्जुन से नहीं चलता, उसे कर्ण भी चाहिए। हर युग में एक कर्ण चाहिए, जिसके बेचैनी भरे सवाल हजारों कानों में गूँजते रहें, और बार-बार जवाब माँगें। सही जवाब माँगें। और हमारे दौर में यह काम विष्णु खरे ने किया, जिन्होंने केवल कविताएँ ही नहीं लिखीं। हर कविता में बेचैन कर देने वाले वे सवाल भी गूँथ दिए, जिनके जवाब खोजे बिना हमें चैन नहीं पड़ सकता। इस अर्थ में विष्णु खरे की कविता कोई आनंद देने वाली कविता नहीं है, बल्कि वह बेचैन कर दने वाली कविता है, जो हमें भी अपने साथ शामिल कर लेती है, और हर अन्याय से लड़ने के लिए उकसाती है।

यों विष्णु खरे केवल कवि नहीं थे। कवि होने के साथ-साथ वे सुविख्यात आलोचक, अनुवादक और बड़े ही मौलिक किस्म के चिंतक भी थे। आप कह सकते हैं, एक भीषण दुःसाहसी चिंतक, जो हर तरह का खतरा उठाकर भी अपनी बात कहते थे। और जैसे कहनी होती थी, जिस जोर और बलाघात के साथ, वैसे वे कहते थे। और इससे दूर-दूर तक एक गूँज पैदा होती थी। बहुत से लोग बिदकते थे। कई बार तो बिल्कुल उनके आजू-बाजू के लोग भी नाराज हो जाते थे। निकटतम मित्र भी।

कबीर को लेकर उनसे एक लंबा इंटरव्यू मैंने किया। कोई साठ-सत्तर पन्ने का वह नदी की तरंगों की तरह बहता हुआ बहु-आयामी, व्यापक इंटरव्यू है। उसमें कबीर के बहाने जो खरी और बेलौस बातें उन्होंने कहीं, वे ऐसी ही थीं, जो मौजूदा दौर के बहुत से अवसरवादी साहित्यिकों पर मर्म प्रहार करती थीं। एकदम तिलमिला देने वाली। कबीर पर बोलते हुए वे सचमुच आज के कबीर लग रहे थे, और उनसे बातचीत करते हुए, मैं भीतर एक थरथराहट सी महसूस कर रहा था।

चित्रकार हुसैन के मामले में लिखी गई उनकी बेबाक टिप्पणी पर भी ऐसा ही हुआ। अच्छे-अच्छे खाँ सनाका खा गए। यहाँ तक कि बड़े लज्जास्पद ढंग से उन्हें छद्म हिंदूवादी कहकर लांछित करने की भी कोशिश की गई। जिन्हें प्रगतिशीलता का क, ख, ग भी नहीं पता, वे विष्णु खरे की प्रगतिशीलता पर शंका करने लगे। पर उन्हें परवाह न थी। सच के आगे वे किसी की परवाह नहीं करते थे, और जो कहना होता था, हर तरह का खतरा उठाकर भी कहते थे। डंके की चोट कहते थे। और असल में तो जिस सच के लिए खतरा न उठाना पड़े, उसे वे सच ही नहीं मानते थे। सत्य पर लिखी गई अपनी एक बहुचर्चित कविता में उन्होंने बड़े बेलौस ढंग से यह बात कही भी है।

और इसके साथ ही, विष्णु खरे पत्रकारिता जगत के एक गौरवशाली स्तंभ थे। एक बड़े और सतेज संपादक। सही मायने में एक तेजस्वी संपादक, जो जब चाहे वक्त में टंकार पैदा कर देते थे। ‘नवभारत टाइम्स’ में उनके दौर की पत्रकारिता पर चर्चा के बगैर समकालीन पत्रकारिता पर बात की ही नहीं जा सकती। ...हालाँकि सच तो यह है कि उनके इन सभी रूपों पर उनके कुछ-कुछ खुरदरे और जुझारू कवि-व्यक्तित्व की छाया थी। मानो ये सभी उनके विलक्षण कवि-व्यक्तित्व के ही आनुषांगिक रूप हों।


[2]
याद है कि सन् 1975 में, जब कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में मैं शोध कर रहा था, तब अपने एक अनन्य मित्र ब्रजेश भाई से लेकर उनका पहला कविता-संग्रह पढ़ा था। अशोक वाजपेयी के द्वारा संपादित ‘पहचान’ सीरीज की कुल सोलह पृष्ठों की एक छोटी सी पुस्तिका, ‘विष्णु खरे की कविताएँ’। और वे कविताएँ पढ़ते हुए मैं अंदर-बाहर से बदल गया था। ताज्जुब हुआ था कि अरे, कविताएँ इतनी खुली, इतनी बेबाक और मर्मभेदी भी हो सकती हैं, जो आपको भीतर तक थरथरा दें...और आपको नए सिरे से सोचने ही नहीं, नए सिरे से जीने की भी चुनौती दें। ऐसी कविताएँ मैंने पहले कभी पढ़ी न थीं। कविताएँ ऐसी हो भी सकती हैं, सच पूछिए तो मैंने कभी इससे पहले कल्पना ही न की थी। वह मेरा, एक अर्थ में, पुनर्जन्म था। एक लेखक, एक कवि, एक साहित्यिक और एक मनुष्य के रूप में पुनर्जन्म। विष्णु खरे को पढ़ने के बाद मैं वह नहीं रहा था, जो पहले था।...

मुझे अब भी याद है, ब्रजेश भाई ने उसी छोटी सी पुस्तिका से विष्णु खरे की कविता ‘दोस्त’ पढ़कर सुनाई थी, जो एक पुलिस अधिकारी पर लिखी गई थी। ब्रजेश भाई की सुती हुई आवाज के साथ ही कविता की लगभग गद्य सरीखी लंबी सतरें हॉस्टल के उस कमरे में मानो हवा और दीवारों पर भी दर्ज होती जा रही थीं। एक अजब सी लय के साथ। ब्रजेश भाई की आवाज में एक टंकार है, पर उस कविता में क्या कम टंकार थी, जिसे सुनते हुए मैं एक और ही दुनिया में पहुँच गया था। कविता की वह ऐसी दुनिया थी, जिसमें शब्द वक्त की छाती पर दर्ज होकर अपनी बात कहते हैं, और यथार्थ में अंदर तक धँसकर जीवन की किसी विरल सच्चाई को ठीक हमारी आँखों के आगे लाकर रख देते हैं।...

मेरे कथागुरु और लोक साहित्य के मर्मज्ञ देवेंद्र सत्यार्थी कहा करते थे कि कोई आलोचक यह तो बता सकता है कि अच्छी कहानी क्या होती है। पर अच्छी कहानी क्या हो सकती है, इसे तो कोई कहानीकार ही जानता है और अपनी कहानियों में उसे संभव कर दिखाता है। इसी तर्ज पर कहें तो कोई आलोचक यह तो बता सकता है कि अच्छी कविता क्या होती है, पर अच्छी कविता क्या हो सकती है, इसे तो कोई निराला, कोई मुक्तिबोध, कोई रघुवीर सहाय या विष्णु खरे सरीखा बड़े विजन वाला बड़ा और शक्तिशाली कवि ही बता सकता है और स्वयं वैसी कविताएँ लिखकर उसे साबित करता है। 

इस तरह देखें तो निराला ने जो कविताएँ लिखीं, वे हिंदी कविता में एक नया और चकित करने वाला प्रारंभ थीं और उससे पहले हिंदी कविता में कभी कल्पना तक न की गई थी कि कविता यह भी हो सकती है। मुक्त छंद होते हुए भी इतनी तेजस्विनी, विराट। कुछ-कुछ यही बात मुक्तिबोध अपनी लंबी, ऊबड़-खाबड़ शिल्प वाली लेकिन सच में शक्तिशाली और आवेगपूर्ण कविताओं द्वारा संभव करते हैं और रघुवीर सहाय सपाट बयानी में बड़ा सच कहने की कूवत से कर दिखते हैं। विष्णु खरे भी इसी अर्थ में अतुलनीय थे। एक विलक्षण कवि, जिन्होंने कविता को गद्य के इतना निकट लाकर भी इतना पुरअसर और जीवंत बना दिया कि कविता मानो विष्णु खरे के निकट आकर फिर से पुनर्नवा होती है। 

याद आता है, नवें दशक में जब मैं हिंदुस्तान टाइम्स की पत्रिका ‘नंदन’ में आया, तो नवभारत टाइम्स में विष्णु जी से मिलने गया। और जब मैंने ‘पहचान’ सीरीज की उनकी कविताओं और मन पर पड़े प्रभाव की चर्चा की, तो वे किंचित अवाक् और विस्मित से हुए थे। बहुत देर तक बात चली, कोई डेढ़-दो घंटे। ऐसी तन्मयतापूर्ण बातचीत, जिसमें आपको समय का कुछ होश नहीं रहता। और फिर उन्होंने बड़ी सहृदयता से एस.पी. सिंह, मधुसूदन आनंद समेत अपने कई संपादकीय सहकर्मियों से मुझे मिलवाया था।

वह एक विरल और हमेशा याद रहने वाली आत्मीय मुलाकात थी। मैं उन्हें सत्यार्थी जी पर एक संस्मरणात्मक लेख देकर आया था, जिसे उन्होंने नवभारत टाइम्स में बड़े प्रमुख रूप में छापा था। फिर ऐसी ही तीन-चार और खुली, अंतरंग मुलाकातें, जिनकी सुवास अब भी मन में है।

कुछ समय बाद विष्णु खरे ‘नवभारत टाइम्स’ के कार्यकारी संपादक नियुक्त हुए और उन्होंने अखबार को अपने व्यक्तित्व के अनुरूप साहसी कलेवर और एक नई चमक दी। इस दौर में उनसे मिलना तो नहीं हुआ पर मैं बड़ी रुचि से अखबार देखता था, जिसके हर पन्ने पर विष्णु जी के सुरुचिपूर्ण संपादन की छाप थी और यह मुझे अच्छा लगता था।

कुछ समय बाद विद्यानिवास मिश्र ‘नवभारत टाइम्स’ के संपादक नियुक्त हुए, तो बहुत कुछ एक साथ बदला। पता चला, विष्णु खरे ‘नवभारत टाइम्स’ के जयपुर संस्करण के स्थानीय संपादक होकर, वहाँ चले गए हैं। फिर कुछ दिनों बाद पता चला कि परिस्थितियाँ इतनी जटिल होती गईं कि अपने वैचारिक मतभेदों के चलते विष्णु जी को ‘नवभारत टाइम्स’ छोड़कर बाहर आना पड़ा। हा, हंत...! मेरे मुँह से निकला। एक कराह की तरह।

उन्हीं दिनों पत्रकारिता की दुनिया पर लिखा गया मेरा उपन्यास ‘यह जो दिल्ली है’ आया था, जिसका नायक सत्यकाम तमाम उम्र लड़ाइयाँ ही लड़ता रहा। इससे, उससे और किस-किस से नहीं। वह टूट भले ही गया हो, पर झुका नहीं। विष्णु जी के बारे में पढ़ा, सुना तो लगा, वे भी तो एक सत्यकाम ही हैं। मैं उन्हें ‘यह जो दिल्ली है’ उपन्यास भेंट करने पहुँचा और उनसे देर तक मैं पत्रकारिता जगत की उन विस्थितियों की कथा सुनता रहा, जो विष्णु खरे सरीखे बड़े लेखक, कवि, चिंतक और संपादक को भी बर्दाश्त नहीं कर पाती।

विष्णु जी ने ‘यह जो दिल्ली है’ पढ़ा और फिर उनका बेहद उत्साह भरा फोन आया कि पत्रकारिता जगत की तकलीफों और अंदरूनी हालात पर लिखा गया ऐसा कोई दूसरा उपन्यास उन्होंने पढ़ा नहीं है। आगे मुझे एकदम रोमांचित सा करते हुए उन्होंने कहा, “प्रकाश जी, आपके उपन्यास ने मेरे भीतर यह इच्छा जगा दी है कि मैं भी पत्रकारिता जगत के अपने अनुभवों को उपन्यास की शक्ल में सामने लाऊँ।...वह कब हो पाता है, कह नहीं सकता!”

कहना न होगा कि ‘यह जो दिल्ली है’ की साहित्य जगत में जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई थी। उस पर दर्जनों समीक्षात्मक लेख लिखे गए। बड़े से बड़े साहित्यकारों ने  उसे सराहा, और पाठकों की अनवरत प्रतिक्रियाएँ तो थमने का नाम नहीं लेती थीं। और ऐसे पत्रकारों की संख्या भी कम न थी, जिनके लिए ‘यह जो दिल्ली है’ उपन्यास कम, पत्रकारों और पत्रकारिता के लिए किसी ‘लाइट हाउस’ की तरह था, या फिर ‘अ हैंडबुक ऑफ जर्नलिज्म’।...पर वे सब एक तरफ, और विष्णु खरे की वह उत्साह से छल-छल करती हुई प्रतिक्रिया दूसरी तरफ। मेरे लिए पलड़ा विष्णु खरे की प्रतिक्रिया का ही भारी था। यानी उन्होंने पास कर दिया तो पास। मेरे वे आदर्श नायक जो ठहरे। उन्होंने अगर सिर्फ एक शब्द कहा होता, तो भी मैं अपने हृदय के सबसे पवित्र कोठार में उसे रखकर, जिदगी भर के लिए सहेज लेता। क्योंकि मैं जानता था, मेरे लिए इससे बड़ा प्राप्य इस जीवन में कुछ और नहीं। ठीक वैसे ही, जैसे विष्णु खरे से बड़ा नायक मेरी दुनिया में कोई और न था।

अलबत्ता, उसी दिन विष्णु खरे से एक लंबी और खुली बातचीत का खयाल मन में आया, जिसमें उनके जीवन के संघर्षों और उनकी विकट चुनौतियों से भरी रचना-यात्रा दोनों को एक साथ रखकर मैं बात करना चाहता था। विष्णु जी से मैंने कहा, तो उन्होंने सहज स्वीकृति दे दी। उन्होंने कविता संग्रह ‘खुद अपनी आँख से’ तथा आलोचनात्मक लेखों की पुस्तक ‘आलोचना की पहली किताब’ समेत अपनी कुछ पुस्तकें मुझे भेंट कीं। ‘यह चाकू समय’ (अत्तिला योझेफ) और ‘हम सपने देखते हैं’ (मिक्लोश राद्नोती) सरीखे अनुवाद भी। 

मेरे लिए ये पुस्तकें किसी दुर्लभ उपहार से कम न थीं, और विष्णु जी को फिर से और नए सिरे से जानने की उत्सुकता मन में जाग गई थी।


[3]
मैं उन दिनों साहित्य की दुनिया के भीतरी चक्रव्यूहों और एक सच्चे लेखक की टूटन और द्वंद्व पर एक अलग शिल्प का उपन्यास ‘कथा सर्कस’ लिखने में जुटा था। उपन्यास पूरा होते ही विष्णु खरे को समग्रता से पढ़ने का सिलसिला शुरू हुआ। और कुछ रोज बाद मैंने उन्हें फोन किया कि मैं बातचीत के लिए आना चाहता हूँ। विष्णु जी खुशी-खुशी तैयार हो गए।

फिर उनसे एक लंबा इंटरव्यू, जो सुबह नौ बजे से शाम को साढ़े सात बजे तक अविरल चलता रहा। एक खुला इंटरव्यू, जिसमें कोई सवाल-जवाब नहीं थे। एकदम खुली बातचीत, जिसमें उनके जीवन के तमाम उतार-चढ़ाव थे, अंतहीन लड़ाइयाँ थीं, उनकी कविता, उनकी आलोचना, उनकी पत्रकारिता...उनके तमाम मूड्स, उनकी चिंताएँ, भीतरी व्याकुलता और आगे भी बहुत कुछ कर गुजरने का संकल्प—सब कुछ  समाता चला जा रहा था।

शाम को करीब चार बजे विष्णु जी विष्णु जी जिस तख्त पर बैठे मेरे सवालों के जवाब दे रहे थे, उस पर सीधे लेट गए। मैंने कहा, “विष्णु जी, आप थक गए हैं। मैं बातचीत यहीं रोक देता हूँ।” 
इस पर उनका क्षीण सा स्वर—“आपके सवाल खत्म हो गए...?” 
मैंने कहा—“नहीं विष्णु जी, सवाल तो अभी हैं।”
“तो फिर पूछिए...!”—वही क्षीण सी आवाज। 

कोई साढ़े सात बजे तक चला इंटरव्यू...और फिर कोई महीने, डेढ़ महीने में वह लिखा गया। भाई ज्ञानरंजन जी ने ‘पहल’ में उसे अविकल रूप में छापा, तो मेरे पास उन पर आने वाली चिट्ठियों और प्रतिक्रियाओं का अंबार लग गया। वही हालत विष्णु जी की थी। कई नामचीन साहित्यकारों ने पत्र लिखकर या फिर फोन पर मुझे बधाई दी कि मनु जी, ऐसा इंटरव्यू हमने तो अपने जीवन में पहले कभी पढ़ा नहीं! ऐसे ही फोन और पत्र विष्णु जी के पास भी आ रहे थे, बल्कि बरस रहे थे। बहुत से लेखकों ने उन्हें बताया कि ‘पहल’ वाला इंटरव्यू उन्होंने फोटोस्टेट करवा के अपने कई दूर-दराज के मित्रों को दिया, क्योंकि वे हर हाल में यह इंटरव्यू पढ़ना चाहते थे। खुद विष्णु जी कुछ अभिभूत से थे। एक दिन विनोद में बोले—“प्रकाश जी, इतनी प्रतिक्रियाएँ तो मेरी रचनाओं पर भी नहीं आतीं। मैं तो सोचता हूँ, सब कुछ छोड़कर बस इंटरव्यू देना शुरू कर दूँ।....”


[4]
फिर तो मुलाकातें, मुलाकातें और निरंतर मुलाकातें। हर मुलाकात एक नई, अद्भुत और यादगार मुलाकात।...जब-जब उनसे मिलकर आता, मैं घर आकर चुपके से उसके बारे में लिख डालता। ये सब मेरे लिए बेशकीमती दस्तावेज थे। उनकी कविताओं पर भी लंबा लेख लिखा गया। उनके द्वारा अनूदित बृहत् फिनी राष्ट्रकाव्य ‘कालेवाला’ पर भी। इन सबको समाहित करती हुई वाणी प्रकाशन से मेरी पुस्तक आई—‘एक दुर्जेय मेधा : विष्णु खरे’। एक बृहत् पुस्तक, जिस पर खूब सराहना मुझे मिली।

हाँ, किताब पढ़कर परेशान होने वाले लोग भी कम न थे। इसलिए कि विष्णु जी अपनी बात बेबाकी से कहते थे, और इस पुस्तक में उनसे लिए गए चार इंटरव्यू शामिल थे। इनमें कबीर पर लिया गया एक लंबा इंटरव्यू भी है, जो कबीर से शुरू होकर आज के समाज के भीतरी द्वंद्वों, विकट समस्याओं और लड़ाइयों तक चला आता है। इसलिए कि मेरा एक सवाल यह भी था कि कबीर आज होते, तो कैसी परिस्थितियाँ उनके सामने होतीं और किस तरह की लड़ाइयाँ उन्हें लड़नी पड़तीं। सवाल विष्णु जी को अच्छा लगा, और उसका जवाब देते हुए चर्चा का फलक विस्तृत होता चला गया, और काफी विस्तार उसने ले लिया।

फिर विष्णु जी दिल्ली से चले गए तो भीतर बहुत कुछ टूटता सा लगा। पर मुंबई से भी वे बराबर खबर लेते। “कैसे हैं प्रकाश जी...?” हमेशा यहीं से बात शुरू होती...और फिर वह कहाँ जाएगी, किस-किस प्रसंग को खुद में लपेटती हुई सी कितनी देर तक चलेगी, कुछ पता नहीं चलता था। समय जैसे थम जाता था।...

अभी पीछे शायद तीन-चारेक महीने पहले फोन आया था, “प्रकाश जी, आपकी वह पुस्तक कई लोगों ने पढ़ी है। पढ़कर सब हैरान हैं। उनके फोन कई बार आ जाते हैं कि विष्णु जी, ऐसी पुस्तक तो हिंदी में कोई और है नहीं। ...सच तो यह है प्रकाश जी, कि अगर कोई मुझ पर काम करना चाहता है, तो अकेली आपकी यह पुस्तक ही है, जिसके बिना उसका काम नहीं चल सकता। इसे तो उसे पढ़ना ही होगा।...”

मैं क्या कहता? सिर्फ इतना कहा, “विष्णु जी, लिखी तो वह किताब पूरे मन से थी। अपनी समूची शक्तियों के साथ।...जब लिखी गई तो लोगों ने उसका महत्त्व नहीं समझा। अब लोग समझ रहे हैं। मेरा सौभाग्य...!”

फिर विष्णु जी हिंदी अकादेमी के उपाध्यक्ष बनकर दिल्ली आए, तब भी फोन—निरंतर फोन उनके आते रहे। आखिरी फोन 11 सितंबर को रात दस बजे आया, “कैसे हैं प्रकाश जी?”

मैंने उन्हें बताया कि त्रिवेणी सभागार वाली काव्य-गोष्ठी में मैं गया था। मेरे जीवन का बड़ा अद्भुत...बड़ा आश्चर्यजनक अनुभव था वह। पूरा त्रिवेणी सभागार भरा हुआ था। उसमें ज्यादातर नौजवान पीढ़ी के लोग थे, और वे इतनी तल्लीनता से कविताएँ सुन और सराह रहे थे कि मैं सचमुच अचरज में पड़ गया कि वे कौन लोग हैं, जो कहते हैं कि आज की कविता संप्रेषित नहीं होती! मैंने तीस या चालीस लोगों की गोष्ठी में तो देखा है कि कोई कविता पढ़  रहा है और सब उसी लय में बह रहे हैं। एक वातावरण सा निर्मित हो रहा है।...पर इतने बड़े सभागार में कविता का ऐसा कार्यक्रम...! मेरे जीवन का यह एक विरल और यादगार अनुभव है। 

इस पर विष्णु जी प्रसन्न होकर बोले, “हाँ प्रकाश जी, एकदम पिन ड्रॉप साइलेंस था।...”

फिर विष्णु खरे द्वारा ‘इंद्रप्रस्थ भारती’ के कहानी विशेषांक की चर्चा चली। मैंने कहा, “विष्णु जी, इसमें कछ कहानियाँ तो जबरदस्त हैं। फिर एक ताजगी, एक नयापन तो है ही इसमें। बार-बार सुने हुए जो नाम हैं, उनसे अलग नाम हैं। कई तो एकदम अनसुने से।...पर कहानियाँ इतनी जबरदस्त कि एक बार पढ़ने के बाद आप उन्हें भूल ही नहीं सकते।” 
ऐसे ही एक अल्पज्ञात लेखक की कहानी ‘आजाद बकरियाँ’ की चर्चा चली और वे बोले, “हाँ, प्रकाश जी, वह कहानी एकदम अलग है।” 
मैंने कहा, “विष्णु जी, मैं इस विशेषांक पर एक लंबा पत्र लिखूँगा आपको।”
उन्होंने उत्साहित स्वर में कहा, “हाँ लिखिएगा प्रकाश जी।…”

बस, यही आखिरी संवाद...और फिर सारे तार झनझनाकर टूट गए...!

रात करीब दस बजे उनका फोन आया था, जो शायद सवा दस बजे तक चला। और फिर उसी रात कुछ ही घंटों बाद दुख की वह काली घटा छा गई, जो धीरे-धीरे उन्हें अपने भीतर समेटती गई।...विष्णु जी को मस्तिष्काघात!!
उन्हें चाहने वाले बहुत थे। सबके वे अपने थे। उन सबके साथ-साथ मैं भी प्रार्थना करता रहा...प्रार्थना। निरंतर प्रार्थना।....पर हा हंत, वही हुआ जो नहीं होना चाहिए था। पूरे हिंदी जगत को शोकमग्न करके विष्णु खरे चले गए।


[5]
हालाँकि विष्णु खऱे अपने पूरे जोम पर थे, जब गए। कविता और साहित्य के लिए दीवानगी, जो उनके रोम-राम में समाई हुई थी। आखिरी दिनों में वे उसके और भी निकट आ गए।

रघुवीर सहाय जी ने कवि के जीवन और आदर्श के लिए एक ऐसी बात कही थी, जिसे मैं आजीवन नहीं भूल सकता। उनका कहना था कि एक व्यक्ति के रूप में मैं कई मोरचों पर लड़ना चाहूँगा। पर अंततः लड़ते-लड़ते मरूँगा तो अपनी कविता के मोरचे पर ही। 

शब्द हो सकता है, कुछ अलग हों, पर भाव यही।...जब विष्णु जी के बारे में मैं सोचता हूँ तो लगता है कि उनकी मृत्यु भी तो आखिरकार कविता के मोरचे पर ही हुई। वे पत्रकारिता में बड़े पदों पर रहे। फिल्मों पर बहुत विपुल और उत्कृष्ट लेखन उन्होंने किया। पर आखिरी दिनों में वे कविता और साहित्य के कुछ और पास आ गए थे। वही उनका ओढ़ना, वही बिछौना था। कविता उनकी साँस-साँस में बसी थी। और जितने विलक्षण कवि वे थे, उतने ही बारीक निगहबानी वाले अच्छे और गंभीर कविता-प्रेमी भी, जिन्हें अपने मन की कविताएँ पढ़ने को मिल जातीं तो उनकी प्रसन्नता और उल्लास का ठिकाना न रहता।

समकालीन कविता में विष्णु खरे की कविता का मिजाज सबसे जुदा था। मुक्तिबोध की तरह ही उनकी कविताओं की बिल्कुल अलग काट है। सच पूछिए तो विष्णु खरे की लगभग सारी कविताएँ कविता को नेगेट करके ही कविता बनती हैं...या कि कविता बनना चाहती हैं। वे कविताई के ढंग पर चलकर कविता नहीं होना चाहतीं। बल्कि उनकी जिद है—बड़ी सख्त और अपूर्व जिद कि वे कविता के अभी तक बने-बनाए रास्ते के एकदम उलट चलकर ही खुद को कविता साबित करेंगी। आप अंदाजा लगा सकते हैं—यह कितनी कठिन और खतरनाक जिद है?

शायद इसीलिए विष्णु खरे की कविताओं से जो आपको मिलता है, उसे कविताई का आनंद नहीं कह सकते, यह अकविताई का आनंद है। यह कितना पीड़ामिश्रित, कितना उदात्त है...और कविता के सामान्य आनंद से कितना ऊपर उठा हुआ आनंद है, हम केवल उसका अनुमान भर लगा सकते हैं या उसके थोड़े आस-पास ही जा सकते हैं। उसे ठीक-ठीक पाना बहुत मुश्किल है, क्योंकि वह तो केवल विष्णु खरे के हिस्से की ही चीज है।...यानी कि विष्णु खरे और उनकी कविताओं को सराहने के लिए भी आपको एक और विष्णु खरे होना पड़ता है।

तो क्या इसी तर्ज पर विष्णु खरे की कविता को एंटी-पोएट्री कहें—यानी अकविता? यह तो सच में बड़ा अजीब लगेगा। इसलिए कि हिंदी में अकविता के जो तमाम आंदोलन चले, उनसे विष्णु खरे की कविता एकदम अलग है। बल्कि कहें कि दूसरे छोर पर है। दूर-दूर तक उनसे विष्णु खरे का कोई रिश्ता नहीं बनता। यों भी एक राजकमल चौधरी को छोड़ दें तो अकविता में सचमुच खतरे उठाने वाले कितने थे, जबकि विष्णु खरे इस मानी में भी मुझे एंटी-पोएट या अकवि लगते हैं कि वे बड़ी से बड़ी सत्ता या राजनीतिक, सांप्रदायिक, फासिस्ट ताकतों के खिलाफ खतरनाक ढंग से कविताएँ लिखने वाले खतरनाक कवि हैं।

अकवि का अर्थ मेरी निगाह में यही है—यानी रूखा और बीहड़ कवि। अपने सौंदर्य-बोध के भीतर बहुत-सी अरूपताओं का आनंद लिए हुए एक बड़ा और कुछ-कुछ बेडौल कवि। बड़ी से बड़ी ताकतों को चुनौती देता हुआ शक्तिशाली और बेखौफ कवि। कुल मिलाकर रूखा, ऊबड़-खाबड़ और बीहड़ होते हुए भी बड़ा कवि, जिसकी कविताओं के शब्दों में और पंक्तियों के बीच कुछ-कुछ चट्टानी-सा कवि-व्यक्तित्व झाँक जाता है। तो यह होगा मेरी निगाहों में अकवि।...मगर क्या वह प्रेम से, करुणा से, स्निग्धता से दूर होगा? सच तो यह है कि ऊपर से रूखा, ऊबड़-खाबड़, जटिल और बीहड़ होते हुए भी, अकवि के भीतर प्रेम और करुणा की जो तीव्रतर धारा बहती देखी जा सकती है, वह दर्जनों कवियाए हुए कवियों के भी बस की बात नहीं।

तो मुझे लगता है, अकविता की अगर सही और व्यापक परिभाषा की जाए तो हिंदी में विष्णु खरे और मुक्तिबोध दो ही ऐसे कवि हैं जो सचमुच अकवि कहलाने के हकदार हैं। असंख्य कविनुमा कवियों की मुलायम, कटी-तराशी कविताओं के बरक्स एक तरह की रुक्ष और चटियल कविता। ऊपर से बहुत सख्त, लेकिन भीतर से बहुत-बहुत आर्द्र और संवेदना से लबालब। विष्णु खरे हों या मुक्तिबोध, कुल मिलाकर दोनों की कविताओं की तासीर यही है। 
मुक्तिबोध सिर्फ एक कवि ही नहीं हैं। वे सही अर्थ में कवियों के कवि हैं। भला हमारे समय का कौन-सा कवि है जो रोशनी पाने के लिए उनके पास नहीं गया और जिसने उनसे कुछ न कुछ ग्रहण न किया हो! इसी तरह विष्णु खरे सिर्फ एक कवि नहीं, उनसे रोशनी लेने वाले या कहें कि रोशनी पाने की आकांक्षा में उनकी ओर एक बड़ी आस्था के साथ देखने वाले कवि, लेखक, समाजकर्मी बहुतेरे हैं। आश्चर्य, विष्णु खरे के सर्वाधिक चर्चित संग्रह ‘काल और अवधि के दरमियान’ में उनका यह लड़ाका रूप, जिसमें वे अन्यायी शक्तियों के खिलाफ एक बेचैन योद्धा की तरह मोर्चा ले रहे हैं—कहीं ज्यादा उभरकर आया है...और इन दिनों कभी-कभी तो मुझे भ्रम होता है कि कहीं मुक्तिबोध ही तो हमारे समय में आकर विष्णु खरे में नहीं बदल गए!

मुक्तिबोध और विष्णु खरे दोनों ही कवियों की एक खासियत यह है कि उनके यहाँ बीहड़ता या रुक्षता का सौंदर्य है। हालाँकि इस बीहड़ता या रुक्षता के भीतर बहुत गौर से देखें तो बहुत कोमलता भी छिपी नजर आ सकती है। मुक्तिबोध की कविताओं में प्रेम और सौंदर्य का बहुत खुला वर्णन नहीं है। लेकिन जहाँ-जहाँ भी वह आया है, भले ही सांकेतिक रूप में, दो-चार पंक्तियों में, तो उससे पूरी कविता मानो प्रकाशमान हो उठती है। मसलन याद करें, उनकी वह कविता जिसमें बहसों और वैचारिक लड़ाइयों में खोया कवि जब देर रात को घर लौटता है, तो दरवाजा खटखटाने पर भीतर से ‘आई...’ की आवाज सुनाई देती है और इसी से गृहस्थी के सौंदर्य का मानो एक आलोकित चित्र आँखों के खिंच जाता है।

ऐसे ही मुक्तिबोध की एक और कविता में ‘ऐसी यह बुद्धिमती मेरे घर आई है’ सिर्फ इस एक पंक्ति में स्त्री की सुंदरता की जो छवि है जिसमें मानो उसकी बुद्धिमत्ता ही सुंदरता बनकर दिपदिपाती है—सचमुच अनुपम है। इसी तरह विष्णु खरे की कई कविताओं में पत्नी और गृहस्थी के सौंदर्य की छवियाँ हैं। ‘हमारी पत्नियाँ’ जैसी उनकी कविताएँ तो बेजोड़ हैं। ‘काल और अवधि के दरमियान’ संग्रह में भी ‘अनकहा’ शीर्षक से पत्नी के लिए एक सुंदर कविता है। हालाँकि यहाँ प्रेम और सुंदरता का बहुत खुला चित्रण नहीं है, पर संकेतों में...कहना चाहिए कि कुछ लकीरों में ही एक बड़ी बात कह दी गई है।

आश्चर्य की बात यह है कि जो प्रेम और ऐंद्रिक अनुभवों में ही खोए रहने वाले कवि हैं, उनकी कविताओं में प्रेम बासी और पिटा हुआ लगता है, जबकि मुक्तिबोध या विष्णु खरे सरीखे रूखे समझे जाने वाले कवियों की कविताओं में जीवन-समर के बीच प्रेम और सुंदरता की ये जो सादा छवियाँ हैं, वे कभी नहीं भूलतीं और मन पर उनका कहीं ज्यादा गहरा असर पड़ता है।


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यह भी कम चकित करने वाली बात नहीं कि विष्णु जी की कविताओं में जिस ढंग से प्रकृति आती है और वह जिस तरह से आत्मीयतापूर्वक हस्तक्षेप करती है, वैसा बहुत कम समकालीन कवियों के यहाँ हो पाता है। हाँ, यह दीगर बात है कि विष्णु खरे का सौंदर्य-बोध दूसरे समकालीन कवियों से इस मानी में अलग है कि वहाँ तथाकथित सुंदर मान ली गई चीजों की सुंदरता ही नहीं है, बल्कि अपने तईं सुंदर को खोजने या ईजाद करने की बेचैनी भी है। यही वजह है कि विष्णु खरे के सौंदर्य-बोध की परिधि में दाखिल होकर गिद्ध, चमगादड़ और उल्लू भी कुरूप नहीं रह जाते। बल्कि वे एक भिन्न तरह की सुंदरता ओढ़ लेते हैं और फिर पेड़ों, वनस्पतियों, जंगलों, पहाड़ों, नदियों, झरनों तथा जंगली जीवों की सुंदरता का तो कहना ही क्या!

विष्णु जी की एक और बेजोड़ कविता ‘शाप’ में पेड़ों को जब काटा जाता है, तो वे मनुष्यों को शाप देते हें। पेड़ पर बसेरा करने वाले पंछी पेड़ छोड़कर कोई दूसरा आसरा ढूँढ़ लेते हैं, मगर वे भी पेड़ छोड़कर कहीं और जाते वक्त मनुष्यों को शाप देते हैं। और फिर कभी सूखे और बाढ़ में आई आपदाओं से जो लोग असमय मरते हैं, उनकी मानो फटी हुई आँखें भी उन सभ्य मनुष्यों को शाप दे रही होती हैं जो विकास की अंधी दौड़ में जंगलों और वनस्पतियों को बर्बाद करते जा रहे हैं। विष्णु खरे की इस कविता में प्रकृति सीधे-सीधे भले ही न हो, लेकिन प्रकृति को लेकर जितनी तीखी तड़प उनकी इस कविता में दिखाई पड़ती है, वैसी इधर की कितनी कविताओं में नजर आती है?
मुझे लगता है, समकालीन कविता की सबसे बड़ी दुर्घटनाओं में से एक यह भी है कि वह प्रकृति से बहुत दूर आ गई है। लेकिन विष्णु खरे की कविताओं में प्रकृति फिर से लौटती है—हालाँकि शायद बड़े बेढब रूप में, जिसमें थोड़ी करुणा भी घुली-मिली है। और शायद एक किस्म का पछतावा भी कि आदमी ने प्रकृति के साथ क्या कर दिया है! विष्णु खरे की कविताओं में चिड़ियों की सुंदरता का छायावादी गायन तो नहीं है, लेकिन कभी उनकी आवाजों तो कभी उनकी स्मृतियों के ऐसे बिंब हैं जो मन में गहरे गड़ जाते हैं। उनके यहाँ ऐसे पक्षियों का वर्णन है जो अर्ध-रात्रि के सन्नाटे में या फिर सुबह-सुबह अपनी अजब-सी सुरीली बोली बोलकर आदमी के वहाँ पहुँचने से पहले ही उड़ जाते हैं और फिर कभी दिखाई नहीं देते। हाँ, उनकी वह सुनी गई अजब सुरीली आवाज स्मृतियों में लगातार पीछा करती है।

चिड़ियों से विष्णु खरे के रिश्ते इतने अजब और आत्मीय हैं कि आखिर चिड़ियाँ मरने के लिए कहाँ जाती होंगी—जैसे एकदम अलग सवाल हैं, जो हिंदी कविता की चौहद्दी में सिर्फ विष्णु खरे ही उठा पाते हैं।

और तो और गिद्ध, उल्लू और चमगादड़ों का विष्णु खरे की कविता में इस कदर पसारा है कि वह ऊपर से देखने में कुछ-कुछ सुरुचिभंजक लगने लगती है। या फिर आप कह सकते हैं, उन्हें सराहने के लिए एक बृहत्तर और उदात्त सौंदर्य-बोध या कि एक बहुत बड़ा दिल चाहिए। यह एक किस्म से, अरसे से कुरूपता के पाले में डाल दी गई चीजों की सुंदरता है। विष्णु खरे की कविताएँ इन्हें बिलकुल अलग ढंग से देखती-बरतती हैं और उनके भीतर के जीवन, जीवनी शक्ति, स्फूर्ति और एक अलग ही ढंग की जीवन-लय को जब वे देख लेते हैं तो उन्हें ठीक-ठीक उसी रूप में कविता में लाने के लिए बेसब्र हो उठते हैं।

अलबत्ता विष्णु खरे की ये कविताएँ पढ़कर समझ में आता है कि अगर आदमी का विजन बदल जाए या कि देखने वाली आँख बदल जाए, तो आदमी के भीतर-बाहर का बहुत-सा संसार बदल जाता है। मुझे याद पड़ता है, एक लंबे इंटरव्यू में विष्णु जी ने गिद्ध, चील और चमगादड़ों से जुड़ी अपनी कुछ पुरानी स्मृतियों को तो ताजा किया ही था—साथ ही इनमें उल्लू से तो रात-रात भर जागकर लिखने और स्मृतियों का पसारा करने वाले लेखक-कवि की ऐसी अपूर्व तुलना उन्होंने की थी, जिसे मैं आज तक भूल नहीं पाया।


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विष्णु खरे का व्यक्तित्व और उनकी कविता कुछ ऐसे समझ ली गई है—और सच मानिए तो वह ऊपर से कुछ-कुछ ऐसी दिखती भी है—कि वह भावुकता से बहुत दूर निकल आई है...या कि वह और चाहे कुछ भी हो, पर भावुक तो हो ही नहीं सकती। पर मेरा यह कहना शायद बहुतों को बड़ा अजीब लगेगा कि विष्णु खरे के व्यक्तित्व को अगर आप नजदीक से जानें-परखें, तो पता चलेगा कि वे खासे भावुक व्यक्ति थे। और उनकी कविता को नजदीक से देखें तो उसकी भावुकता से रू-ब-रू हुए बगैर हम नहीं रह पाते। बल्कि लगता है, बाकी कवि जीवन के जिन दृश्यों और स्थितियों को रूटीन मानकर नजरंदाज करने के आदी हैं, विष्णु खरे उनकी अंतर्हित करुणा तक जा पहुँचते हैं, और हम पाते हैं कि वे जाने-अनजाने हमारे भाव-संसार और संवेदना का विस्तार कर रहे हैं।

मुझे याद है, विष्णु जी से हुई एक लंबी अनौपचारिक बातचीत में उन्होंने रघुवीर सहाय और राजेंद्र माथुर का इतने भावुक होकर जिक्र किया था कि मैं प्रश्न पूछना भूलकर अवाक् उन्हें देखता रह गया था। राजेंद्र माथुर के अंतिम दिनों का स्मरण करते हुए उनकी आँखें आर्द्र और स्वर गीला-गीला-सा हो आया था। इसी तरह रघुवीर सहाय के एक प्रसंग का वे जिक्र करते हैं। 

हुआ यह था कि विष्णु जी ने रघुवीर सहाय की कविताओं का एक संग्रह लिखते समय कहीं यह टिप्पणी की कि ये कविताएँ सौ में से पंचानबे अंकों की हकदार हैं। बाद में रघुवीर सहाय विष्णु जी से साहित्य अकादेमी में मिले तो उन्होंने पूछा—आपने मेरे पाँच अंक क्यों काट लिए...?

विष्णु जी इस प्रसंग का जिक्र कर रहे थे तो उनकी आँखें आँसुओं से लबालब थीं और उनके लिए आगे बोल पाना मुश्किल हो गया था।

जैसे विष्णु खरे के व्यक्तित्व में, वैसे ही उनकी कविता में भी ये बेहद भावुक, आर्द्र क्षण आते हैं और बीच-बीच में हमें भिगो जाते हैं। हाँ, उसकी ऊपरी रुक्षता के भीतर संवेदना के इन आर्द्र क्षणों को डिस्कवर करना पड़ता है। इसलिए कि विष्णु जी की तरह ही उनकी कविता भी भावुक जरूर है, पर उस भावुकता का प्रदर्शन करना भद्दी चीज मानती है और खुद को सायास उससे दूर रखती है।

विष्णु जी के शुरुआती संग्रह ‘खुद अपनी आँख से’ की कई कविताएँ ऐसी हैं जिनमें कवि की रुक्षता के भीतर छिपी बेतरह भावुकता से मिलने के मौके आते हैं। विष्णु जी की ऐसी कविताओं में ‘अकेला आदमी’ तो ऐसी कविता है जिसे कभी भूला ही नहीं जा सकता। ऊपर से खासे खुरदरे दिखाई देने वाले इस आदमी की अकेली और वीरान-सी जिंदगी के भीतर एक अंतर्धारा भी है—प्रेम और भावुकता की अंतर्धारा, जो इन रूखे, रसहीन दिनों में भी उसे जिलाए रखती हैं। यहाँ पत्नी और नन्ही बेटी की यादें हैं। पत्नी के पुराने खत और फोटो हैं और एक सपना है कि वह उन्हें अपने साथ रेलगाड़ी में बिठाकर वापस आ रहा है। इससे वर्तमान का उजाड़ थोड़ा कम रूखा और सहनीय हो जाता है। इसमें पत्नी और बेटी की यादों और इस खुरदरे आदमी के स्नेह से डब-डब करते जो अक्स हैं, उन्हें आप चाहेंगे भी तो भूल नहीं पाएँगे।

इसी तरह ‘सबकी आवाज के पर्दे में’ संग्रह की ‘चौथे भाई के बारे में’, ‘दिल्ली में अपना फ्लैट बनवा लेने के बाद एक आदमी सोचता है’, ‘लालटेन जलाना’, ‘बेटी’, ‘मिट्टी, ‘जो टेंपो में घर बदलते हैं’ कविताएँ ऐसी हैं जो मानवीय और पारिवारिक रिश्तों की ऊष्मा में सीझी हुई हैं। ‘चौथे भाई के बारे में कविता’ का जिक्र आने पर तो विष्णु जी ने एक दफा खुद बताया था कि इस कविता को वे पिछले कोई बीस सालों से लिखना चाह रहे थे। वह उनके भीतर ही अटकी हुई थी, पर बन नहीं पा रही थी। कोई बीस साल बाद उसने ठीक-ठीक वही शक्ल ली, जिस रूप में विष्णु खरे इसे लिखना चाहते थे, तो वह उनके संग्रह में आ सकी। और यह कविता सचमुच गुजरे चौथे भाई की स्मृतियों से डब-डब करती कविता है।

ऐसे ही ‘दिल्ली में अपना फ्लैट बनवा लेने के बाद एक आदमी सोचता है’ कविता में घोर आर्थिक तकलीफों में घर-परिवार के जो लोग गुजर गए, उन्हें स्मृतियों के साथ-साथ एक छोटे-से फ्लैट में बसाने की बड़ी मार्मिक कोशिश है। इधर की कविताओं में पारिवारिकता की इतनी विकल कर देने वाली उपस्थिति आपको और कहाँ मिलेगी? ‘बेटी’ कविता में दफ्तर में नौकरी पाने के लिए आई महानगर की एक गरीब लड़की की पीड़ा है। ‘मिट्टी’ में छिंदवाड़ा की मिट्टी और चीजों की चप्पे-चप्पे में बसी यादें हैं...बल्कि कहना चाहिए कि यादों की ऐसी बारिश है कि उससे न भीगना नामुमकिन है।

‘जो टेंपो में घर बदलते हैं’ कविता में बगैर किसी दिखावटी सहानुभूति के एक मध्यवर्गीय आदमी की डाँवाडोल जिंदगी की समूची तसवीर उकेर दी गई है। यह बगैर भावुक हुए संभव नहीं था। हालाँकि यह दीगर बात है कि कविता का उद्देश्य अनावश्यक रूप से भावुकता का प्रदर्शन किए बगैर, पाठक को कहीं अधिक सहानुभूतिशील इनसान बनाना है।


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विष्णु खरे शायद हिंदी के उन विरले कवियों में से हैं जिनकी कविताओं में सबसे ज्यादा आत्मकथा है। हो सकता है, कविता में इतनी आत्मकथा लिख पाने वाला कोई दूसरा कवि हमारे यहाँ हो ही नहीं। इसका जिक्र करना इसलिए जरूरी लगा कि कहानी में आत्मकथा लिखना तो आसान है। इसकी तुलना में कविता में आत्मकथा लिखना कठिन है—एक बहुत दुष्कर काम। पर विष्णु खरे बगैर कोई दावा किए—और यहाँ तक कि बगैर कोई दिखावा किए यह काम करते हैं।

याद कीजिए, विष्णु खरे के ‘खुद अपनी आँख से’ संग्रह का वह बच्चा जो कई शील्ड लेकर निस्तब्ध रात के सन्नाटे में घर लौट रहा है और एक शील्ड के अचानक गिर जाने पर पैदा हुई आवाज और रात गश्त लगाते सिपाही के सवालों से वह किस कदर अचकचा गया था। फिर किस असामान्य आत्मविश्वास से वह सिपाही के सवालों का जवाब देने के बाद घर जाता है। इस संग्रह की ‘अव्यक्त’, ‘गरमियों की शाम’, ‘प्रारंभ’ और ‘दोस्त’ जैसी कविताओं में विष्णु खरे के बचपन, किशोरावस्था और तरुणाई के कुछ न भूलने वाले अक्स हैं। यहाँ तक कि इन कविताओं को पढ़ना विष्णु जी के बचपन, किशोर काल और तरुणाई के चेहरे को देख लेने की मानिंद है।

ऐसे ही ‘सबकी आवाज के पर्दे में’ संग्रह की ‘दिल्ली में अपना फ्लैट बनवा लेने के बाद एक आदमी सोचता है’, ‘चौथे भाई के बारे में’, ‘अपने आप’, ‘मंसूबा’, ‘स्कोर बुक’, ‘खामख्याल’ सरीखी कविताएँ। यह कविताओं में लिखी गई सीधी-सीधी आत्मकथा है और इनके साथ जुड़े पारिवारिक प्रसंगों, पात्रों और घटनाओं का दर्द या विडंबना इतनी गहरी है कि वह कविताओं को भी कहीं अधिक मार्मिकता दे देती है। इसी तरह ऐसी बहुतेरी कविताएँ हैं जिनमें विष्णु जी की माँ और पिता को लेकर स्मृतियों के कभी न भूलने वाले अक्स हैं। इनमें ‘1991 का एक दिन’ तो एकदम असाधारण कविता है। इसमें न सिर्फ माँ और पिता के गुजरने की तारीखें और ब्योरे हैं, बल्कि इस चीज को लेकर विष्णु जी का एक अजीब-सा अपराध-बोध सामने आता है कि उनकी उम्र माँ और पिता से अधिक हो गई है। यानी माँ जब गुजरी थीं, तब उनकी जो उम्र थी, उसे वे बरसों पीछे छोड़ आए हैं। इसी तरह पिता के गुजरने के समय उनकी जो उम्र थी, वह भी अब पीछे निकल गई है और कम से कम उम्र में वे अपने माँ और पिता से बड़े हैं।
पर क्या वे सचमुच माँ और पिता से बड़े हैं? यह सवाल आते ही विष्णु जी के भीतर जिस तरह का भावनात्मक उद्वेलन शुरू होता है और माँ, पिता की स्मृतियों का जैसा अंधड़ उठता है, वह विचलित कर देने वाला है। लगता है, माँ-पिता को याद करते ही, फिर से वे अपने बचपन और किशोरावस्था में लौट गए हैं और उनकी उम्र घटकर कोई चार-पाँच वर्ष के शिशु या फिर बारह वर्ष के किशोर की-सी हो गई है।

इसी तरह एक कविता में विष्णु जी बचपन में ग्रामोफोन के अपने शौक का जिक्र करते हैं जिसमें रिकार्ड घूमने का रोमांच उन्हें मुग्ध करता था। विष्णु जी की कविताओं में इन प्रसंगों को पढ़ना मानो पाठक के लिए अपनी-अपनी आत्मकथाओं के बंद द्वार खोल देता है और उनका अपना बचपन या किशोरावस्था भी कहीं साथ ही साथ दस्तक देने लगती है। इसी से समझा जा सकता है कि विष्णु जी अपनी कोशिश में कितने सफल हुए हैं या कि कविता में आई उनके आत्म की अनुभूतियाँ—दूसरे शब्दों में आत्मकथा के ये पन्ने कितने मार्मिक हैं।


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विष्णु खरे की कविताएँ अपने स्वभाव में रूखी, खुरदरी और चटियल कविताएँ हैं। वे अपनी कविताओं को वैसा बनाते नहीं है, पर उनका जो कविता को जीने और देखने का नजरिया है, उसमें कविताएँ स्वभावत: इसी रूप में उनके निकट आती हैं।

‘काल और अवधि के दरमियान’ संग्रह में एक कविता है ‘वाक्यपदीयम्’, जिससे विष्णु जी की कविता लिखने की ख्वाहिश और लक्ष्य का बहुत कुछ पता चल जाता है। यों तो इसमें एक वाक्य—एक प्रभावशाली और उथल-पुथल कर देने वाला वाक्य लिखने की इच्छा का बयान है, जिसकी गूँजें-अनुगूँजें सारे ब्रह्मांड में भर जाएँ। पर गौर से देखें तो कैसी कविता वे बनाना चाहते हैं—या अपनी कविता के जरिए क्या काम वे करना चाहते हैं, इसकी भी पूरी झलक यहाँ मिल जाती है।

रघुवीर सहाय की एक कविता है जिसमें अपनी कविता के बारे में वे कहते हैं कि सन्नाटा-सा खिंच जाए तब मैं अपनी कविता पढ़कर उठूँ। विष्णु खरे का कविता लिखने और पढ़ने का ढंग भी कुछ-कुछ वही है।
यों विष्णु खरे की कविता का विन्यास कुछ ऐसा है कि पूरे हिंदी कविता-संसार में किसी और कवि से उनकी तुलना नहीं की जा सकती। रघुवीर सहाय से भी नहीं। यह बात तब अधिक गौरतलब है जबकि ज्यादातर कविताएँ इधर ऐसी देखने में आती हैं, जैसे एक ही कवि ये सारी कविताएँ लिख रहा हो। और इनमें बहुत-सी समसामयिक कविताएँ तो ऐसी हैं कि उन्हें आराम से एक-दूसरे की कार्बन कॉपी कहा जा सकता है।

ऐसे में विष्णु खरे अपने जवाब खुद हैं।...यानी विष्णु खरे जैसा कोई और नहीं है, विष्णु खरे खुद विष्णु खरे जैसे हैं—यह बात कोई कम अचरज की नहीं है। हालाँकि विष्णु खरे से अगर किसी की तुलना करनी हो, तो वे मुक्तिबोध ही हो सकते हैं। पिछले हजार साल की हिंदी कविता को उलट-पुलट डालिए, तब भी अकेले मुक्तिबोध ही ऐसे मिलेंगे, जिनसे विष्णु खरे की तुलना संभव है। 

खास बात यह है कि ये दोनों ही बहुत गहरे द्वंद्वों से गुजरे सख्त, खुरदरे कवि हैं और भिन्न तरह से अपनी कविताओं में भारतीय समाज और समाजशास्त्र लिख रहे जान पड़ते हैं। दोनों की ज्यादातर कविताएँ ऊपर से देखने पर बिना कटी-तराशी, अनगढ़ कविताएँ लगती हैं। फिर भी वे समकालीन कविता के सर्वोच्च प्रतिमान हैं। हाँ, एक बात जरूर है कि मुक्तिबोध में बीच-बीच में जिस तरह के सिद्धांत-कथन आते हैं, विष्णु खरे में वैसे नहीं हैं। इसके बजाय वहाँ कविता में कहानी कहने और कहानी के निष्कर्षों, अलग-अलग मोड़ और चरित्रों द्वारा इशारों में बहुत कुछ कहने की कोशिश है।

मुक्तिबोध के यहाँ खूब चक्करदार लपेटवाँ लय वाली तीव्र आवेगात्मक कविताओं के बीच “ओ मेरे सिद्धांतवादी मन/ओ मेरे आदर्शवादी मन/अब तक क्या किया!/जीवन क्या जिया...?” जैसी जो एकदम साफ लयात्मक पंक्तियाँ आती हैं, विष्णु खरे के यहाँ इतनी सुथरी पंक्तियाँ मिलनी मुश्किल हैं। यहाँ इसके बजाय वाक्यों में वाक्य फँसे हुए हैं जो इन कविताओं को गद्य के ज्यादा नजदीक ले आते हैं। तो भी मुक्तिबोध का असर सीधे या परोक्ष रूप में कहीं न कहीं विष्णु खरे पर नजर आ ही जाता है। इसीलिए मुक्तिबोध के ‘ओ मेरे सिद्धांतवादी मन’ के बरक्स उनके यहाँ ‘अमीन’ जैसी कविता है—यानी एक नकचढ़ा अमीन जो हमेशा उनसे उनके रोजाना के किए-धरे का हिसाब माँगता रहता है।


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कवियों के लिए कविताएँ लिखने वाले हिंदी में बहुतेरे कवि हैं, पर इनमें विष्णु खरे नहीं हैं। हाँ, पर इस ढंग की उनकी दो ऐसी कविताएँ हैं जिन्हें मैं भूल नहीं सकता। एक तो वह कविता जिसमें उन्होंने खुद को निराला, मुक्तिबोध आदि कवियों के चरणों में बैठा कूकर बताया है। और दूसरी रघुवीर सहाय पर लिखी गई वही दुख से सीझी कविता है जिसके पीछे जिक्र हो चुका है। इस कविता में रघुवीर सहाय और अज्ञेय की एक मुलाकात का जिक्र है। अज्ञेय के बारे में रघुवीर सहाय की एक बातचीत विष्णु नागर द्वारा संपादित पुस्तक ‘रघुवीर सहाय’ में है। इस कविता का संदर्भ वही है। ‘दिनमान’ के संपादक पद से हटाए जाने या कहिए कि पदावनति के बाद ‘नवभारत टाइम्स’ में भेजे जाने पर रघुवीर सहाय उद्विग्न हैं और अपना वही दुख अज्ञेय को बताने वे उनके निवास पर गए हैं।

विष्णु खरे ने इस कविता में रघुवीर सहाय की तब की मन:स्थिति का इतना सच्चा, इतना मार्मिक चित्र खींचा है, मानो वे खुद सूक्ष्म रूप में वहाँ मौजूद हों और सब कुछ देख-सुन रहे हों। अज्ञेय और रघुवीर सहाय के अलग-अलग व्यक्तित्व, मूड्स और स्थितियाँ यहाँ काबिलेगौर हैं तो रघुवीर सहाय की वह विवशता भी है, जो उन्हें अपने साथ हुए अपमान को खून के घूँट की तरह पी लेने को विवश करती है। और यह दुख, क्रोध और अपमान और बेबसी एक साथ उनके पूरे व्यक्तित्व में फैलकर छा जाती है।

कुल मिलाकर हमारे समाज में एक बड़े कवि की स्थिति या उसके साथ घटित हुई क्रूर विडंबना का भीतर तक स्तब्ध कर देने वाला चित्र इस कविता में है। एक बड़े सरोकारों से जुड़ा बड़ा कवि, जो सबके दुख सबके साथ ही हो रहे अत्याचारों पर लिखता है, खुद अपने दुख, निराशा में वह कितना अकेला हो जाता है—यह इस कविता को पढ़कर जाना जा सकता है।...

फिर एक और बात। मुझे जाने क्यों लगता है, इस कविता में रघुवीर सहाय के दुख और बेबसी के साथ-साथ कहीं न कहीं विष्णु खरे का अपना दुख भी शामिल है। या उसकी एक मद्धिम छाया जरूर है, जिसने इस कविता को इतना अधिक करुण और स्मरणीय बना दिया है।


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विष्णु जी ने प्रचुर अनुवाद कार्य किया है, और इस काम में उनकी दक्षता, कौशल और समर्पण चकित करने वाला है। उन्होंने विदेशी कविता से हिंदी तथा हिंदी से अंग्रेजी में सर्वाधिक अनुवाद कार्य किया है। केवल बीस वर्ष की अवस्था में विष्णु खरे द्वारा किया गया टी.एस. एलियट की कविताओं का अनुवाद ‘मरुप्रदेश तथा अन्य कविताएँ’ छप चुका था।

विष्णु जी के अनुवाद-कार्यों में फिनलैंड के राष्ट्रीय महाकाव्य ‘कालेवाला’ का अनुवाद बेहद महत्त्वपूर्ण है। महाभारत सरीखे इस बृहत महाकाव्य के केंद्र में वैनामोयनिन का बड़ा अद्भुत और करिश्माई चरित्र है। वह वीर और साहसी है, बुद्धिमान है और बड़ी से बड़ी मुसीबतों से हार नहीं मानता, तो साथ ही गीत-संगीत की महान संपदा उसके पास है। नीति, नैतिकता और सांस्कृतिक परंपरा की उसे गहरी समझ है। वह सृष्टि के विकास का महानायक है, जो बहुत सारी नई-नई हैरतअंगेज चीजें खोजता है, लोगों की भलाई और मदद के लिए बहुत से कठिन और साहसी काम करता है। 

इस मानी में वैनामोयनिन तो एक महान चरित्र है ही, ‘कालेवाला’ भी जीवन की एक संपूर्ण कल्पना और बड़े व्यापक विजन, व्यापक फलसफे के कारण हर किसी को आकर्षित करने और साथ बहा ले जाने वाला महाकाव्य है। जीवन का हर पक्ष, हर पहलू वहाँ बड़ी भव्यता और धज के साथ देखने को मिलता है। विष्णु खरे ने वर्षों के अथक श्रम से फिनलैंड के इस लोक महाकाव्य का हिंदी में काव्यानुवाद किया। 

मुझे याद पड़ता है, इस बारे में कोई दो दशक पहले दूरदर्शन के लिए उनसे बातचीत हुई थी। इसमें एक महाकाव्य के रूप में ‘कालेवाला’ के दुर्वह आकर्षण, खुलेपन, विस्तार और बहुत सारी विशेषताओं की चर्चा हुई, तो संदर्भवश भारतीय महाकाव्यों ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ तथा लोककाव्य पर भी बड़ी रसपूर्ण बातचीत हुई, जो आज भी खासी मौजूँ है। 

इसी तरह विष्णु खरे खूब पढ़ने और खुद को अद्यतन रखने वाले और बड़ी हिम्मत और निर्भीकता से अपनी बात कहने वाले खरे आलोचक थे। दूसरों की राय और प्रभामंडल से आतंकित होने वालों में वे न थे। इसलिए बड़े से बड़े कवियों पर बिल्कुल अलग सोच के साथ निर्भीकता से उन्होंने लिखा, और जमकर लिखा। उनके आलोचनात्मक लेखों की पुस्तक ‘आलोचना की पहली किताब’ इस मामले में हिंदी आलोचना में अन्यतम स्थान रखती है। रघुवीर सहाय, मुक्तिबोध और शमशेर पर उन्होंने एकदम लीक से हटकर और बड़ी तन्मयता से लिखा है। उसे पढ़ते हुए अच्छी कविता क्या होती है, यह आपको समझ में आता है।

मुझे लगता है कि विष्णु खरे के बहुत सारे आलोचना-कर्म को तो खाली गद्य की मार्मिक सुंदरता और उठान देखने के लिए भी पढ़ा जा सकता है।


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विष्णु खरे जितने बड़े कवि थे, उससे कहीं बड़े इनसान। एक खरे इनसान। ऊपर से तनिक रूखे लगते, पर भीतर प्यार और करुणा से लबालब। खासकर युवा कवियों को प्यार करने और उन्हें आगे लाने वाला उन सरीखा कोई कवि तो कई और था ही नहीं। और सच ही उन्हें आज की कविता और नए कवियों से बहुत उम्मीदें थीं। वे उन्हें बेतरह प्रोत्साहित करते और बराबर खोज-खबर लेते रहते। उनकी अच्छी चीजों को खोज-खोजकर पढ़ते, सही सलाह देते और जो कविताएँ उन्हें जँच जातीं, उनकी जी भरकर सराहना करते।

सच पूछिए तो विष्णु जी के पास इतना बड़ा दिल था—और ऐसा कबीरी ठाट वाला व्यक्तित्व उनका था कि वे सभी के थे। सभी के कुछ न कुछ थे।...और मेरे तो वे एक प्यारे और निराले दोस्त, गाइड और संरक्षक सब थे। मैं आज तक नहीं समझ पाया कि मुझे वे इस कदर प्यार क्यों करते थे। मेरे अंदर ऐसा क्या देख लिया था उन्होंने, जो मैं खुद आज तक नहीं देख सका।

एक बार मैं काफी लंबे समय तक बीमारी की लपेट में आ गया तो वे दिल्ली से हमारे घर तक आए देखने। खाली फोन पर बात करके उन्हें चैन नहीं पड़ रहा था। बात करते तो घर के एक-एक सदस्य का हाल-चाल पूछते। संबंधों को खाली साहित्य-चर्चा तक सीमित रखने वाले इनसान वे न थे। और सच ही बहुत प्यार दिया उन्होंने, बहुत प्यारे लुटाया...! अपने बाद वाली पीढ़ी को इतना प्यार करने और उन पर इस कदर भरोसा करने वाले लेखक कम, बहुत कम हैं।

विष्णु खरे इस मामले में निराले थे। विलक्षण। उनके जाने से साहित्य की दुनिया में एक ऐसा अभागा सन्नाटा और खालीपन है, जो कभी भरा नहीं जा सकेगा। और मेरे भीतर का तो एक हिस्सा जैसे उजाड़ हो गया हो।... पर उजाड़ सही, उसमें विष्णु जी की यादें बसी हैं। अपनी बेशुमार यादों, यादों और यादों के साथ विष्णु खरे वहाँ हैं, और हमेशा बने रहेंगे!
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प्रकाश मनु
545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008,
चलभाष: 09810602327,
ईमेल: prakashmanu333@gmail.com

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