समीक्षा: भावनाओं से भरी काव्य यात्रा "चाय सा हमसफर"

विजय कुमार तिवारी


समीक्षित कृति: चाय सा हमसफर (कविता संग्रह)
कहानीकार: कुमारी छाया
मूल्य: ₹ 199/-

हर काव्य यात्रा में भावनाएँ, संवेदनाएँ होना स्वाभाविक है, इसके बिना काम चलता नहीं, काव्य सृजन का उद्देश्य मानो अधूरा रह जाता है। काव्य संसार में डूब कर ही कवि अपनी अनुभूतियों को मूर्त करते हैं। यह सहज भी है और जटिल भी। कवि अपने समाज को, अपना व अपने समाज के जीवन को, प्रकृति को, जीव-जन्तुओं को, भीतरी-बाहरी सौन्दर्य और मन की बेचैनी को काव्य के माध्यम से प्रस्तुत करता है। वह अपनी खुशी, अपनी पीड़ा, अपनी व्यथा दुनिया के सामने परोस देता है और इस तरह स्वयं में सहजता की अनुभूति करता है। सहज होना, शांत होना और भीतर की उड़ान को सामने ला देना हर किसी का वांछित उद्देश्य होता है। जिसकी जितनी गहरी अनुभूति, उतना ही गहन चिन्तन और उतना ही व्यापक सृजन। करुणा, संवेदना, प्रेम और मानवता के हित में साहित्य लेखन रचनाकार को गौरवान्वित करता है। कवि अक्सर चौंकाते हैं, जीवन की छोटी से छोटी सामान्य वस्तु से जुड़कर कोई बड़ा परिदृश्य रच देते हैं। हो सकता है, कुछ लोग ऐसे लेखन-सृजन में कोई व्यापक चिन्तन की उपस्थिति न समझें परन्तु कवि की संवेदना से भरी अनुभूति को झुठला नहीं सकते। मेरी धारणा है, हर रचनाकार को उसके लेखन के लिए साहित्य में स्थान मिलना चाहिए। कमतर या श्रेष्ठ जैसे विचार पाठकों पर छोड़ देना चाहिए, वे समझते भी हैं और अपना निर्णय दे देते हैं।

आजकल मेरे सामने कवयित्री कुमारी छाया द्वारा रचित काव्य संग्रह "चाय सा हमसफर" है। कोई चकित हो सकता है कि 'चाय सा हमसफर' जैसा भी काव्य संग्रह हो सकता है? चाय हमारे जीवन में सामान्य वस्तु नहीं रह गई है। हमारे दैनिक जीवन में, आतिथ्य सत्कार में, उब में, खुशी में और राजनीति में भी चाय ही सर्व सहज सहारा है। कुमारी छाया जी को बहुत-बहुत बधाई, उन्होंने चाय को अपने काव्य लेखन का जीवन्त विषय चुना और लिख रही हैं। हमें भी सहजता से उनके मनोभावों के साथ सहयात्रा करनी चाहिए और चाय पर आधारित कविताओं का आनन्द लेना चाहिए।

विजय कुमार तिवारी
'चाय सा हमसफर' के पृष्ठ भाग में प्रकाशक की ओर से लिखा गया है- लेखिका कुमारी छाया झारखंड राज्य के जमशेदपुर शहर से हैं, उन्होंने एम.एस.सी. और बी.एड. की शिक्षा प्राप्त की है। विज्ञान विषय की छात्रा और शिक्षिका होने पर भी हिन्दी से विशेष लगाव रखती हैं। उन्हें चाय पर लिखना बहुत पसंद है और यह लगाव उनकी पहली पुस्तक 'एक प्याली चाय'(2021)से पता चलता है। इस पुस्तक में चाय के साथ प्रकृति पर भी कविताएँ हैं। उनकी दूसरी पुस्तक 'मेरी उम्मीद की ओर' (2022) है। कुमारी छाया जी लगभग तीन साल से कैंसर से लड़ रही हैं, इस क्रम में उन्होंने अपनी तीसरी पुस्तक 'जिन्दगी अभी बाकी है'(2023) कैंसर पर लिखा है। इस पुस्तक में उन्होंने कैंसर के साथ अपने अनुभवों को साझा किया है और बताया है कैंसर के इलाज के साथ कैसे सकारात्मक रहा जा सकता है।

'मेरे विचार' शीर्षक के अन्तर्गत इस संग्रह की भूमिका में उन्होंने विस्तार से चाय के साथ अपने लगाव को साझा किया है- "चाय का नाम सुनते ही एक मीठा सा अहसास जागता है कि हम कितने भी व्यस्त या उद्विग्न क्यों न हों, चाय में कुछ पल का ही सही सुकून अवश्य ही ढू़ँढ लेते हैं। चाय के कप में सिर्फ चाय ही नहीं, हमारी अनेकों परेशानियों का हल भी होता है। वो एक अच्छे हमसफर की तरह हमारा साथ देती है। इसलिए चाय केवल चाय ही नहीं बहुत सारे खूबसूरत पलों की गवाह होती है।" उन्होंने आगे लिखा है- "चाय से मेरा मिलना कविताओं के माध्यम से ही हुआ। मुश्किल से मुश्किल परिस्थिति में भी चाय पर कविता लिखना मुझे सुकून दे जाता है।"

इस सन्दर्भ में एक सुखद प्रसंग याद करना अनुचित नहीं होगा। पटना प्रवास में अक्सर 'जनशक्ति' के कार्यालय में तत्कालीन संपादक कन्हैया जी से मिलना-जुलना होता था, उन्होंने मेरी अनेक कहानियाँ, लेख व कविताएँ अपने रविवारीय अंको में प्रकाशित किया था। किसी शनिवार मैं उनके संपादकीय कक्ष में पहुँचा, चाय आ गई और हमारी साहित्यिक चर्चा शुरु हुई। कहानी लेखन को लेकर उनके सुझाव मेरे लिए लाभकारी तो थे ही, उनकी आत्मीयता मुझे खूब प्रभावित करती थी। कभी-कभी उम्र का फासला मिटा, वे सहज ही रोचक प्रसंग सुना, वातावरण की बोझिल स्थिति को सामान्य कर देते थे। कुछ देर बाद वरिष्ठ आलोचक डा० खगेन्द्र ठाकुर जी का आगमन हुआ और पुनः चाय आई। मैंने संकोच के साथ अनिच्छा दिखाई। कन्हैया जी अपनी स्वाभाविक मुद्रा में आ गए और मुस्कराते हुए कहा-"जानते हैं, चाय में क्या है? इसमें दोशीजा के लबों की तरह गर्मी भी है और मिठास भी। आप चाय को ना कर रहे हैं?" दोनों वरिष्ठ साहित्यकारों ने ठहाका लगाया और मैंने चुपचाप चाय की गर्मी और मिठास का आनंद लेना शुरु कर दिया।

'चाय सा हमसफर' संग्रह में भाव-संवेदनाओं से भरी सहज भाव-बोध से ओत-प्रोत कविताएँ है। इनमें कहीं कोई दुरूहता, जटिलता नहीं है, सहजता के साथ कवयित्री के मन के भाव स्पंदित हैं और चाय बिंबित-प्रतिबिंबित हुई है। यह रोचक है, चौंकाता है और जीवन के साथ जुड़ता-जोड़ता भी है। चाय सा हमसफर जैसा बिंब मिठास और सुकून देने वाला है। सुबह-सुबह चाय अपनी भीनी सुगंध के साथ जगाती है। जीवन में जो भी हो, चाय साथ रहने वाली है, उसका स्वाद सुकून देने वाला है और चेहरे पर मुस्कान लाने वाली है। वह समय को बाँध लेती है, उसकी मोहक खुशबू से लोगों के कदम रुक जाते हैं। चाय के हर घूँट में प्यार का अहसास होता है। चाय से इश्क होने के बाद वही दवा है, वही सुकून है। 'चाय भी साथ हुई' कविता का भाव है-तुमसे मुलाकात हुई/चाय भी मेरे साथ हुई अर्थात कवयित्री का प्रियतम के साथ मिलन में, संवाद में चाय साथ होती है। दोस्त साथ में हो और हाथों में गरम-गरम चाय हो फिर तो वक्त ठहर जाता है। प्यार की मिठास से भरी सुकून वाली चाय की प्याली का संदेश यही है कि पीड़ा के बाद भी जीवन में मिठास कभी कम नहीं होगी। 'मेरे प्रिय सखा' कविता में कवयित्री के पास चाय और किताब दो सखा हैं, जिनके साथ खूबसूरत सा रिश्ता है, उनका सहज भाव देखिए-

चाय की घूँट और शब्दों का साथ
दोनों जब पास हो तो अनुभूति ऐसी
रंगबिरंगे फूलों के बागीचे में बैठी हूँ

कवयित्री की ऐसी उड़ान सहजता के साथ पाठकों को चाय के साथ गहराई से जोड़ देती है।

किसी की व्यक्तिगत पसंद से काव्य समृद्ध हो सकता है, इसका छोटा सा उदाहरण कुमारी छाया का "चाय सा हमसफर" संग्रह है। वैसे प्रत्येक कवि का सृजन उसकी पसंद ही है, बाद में पाठक, चिन्तक, समीक्षक, आलोचक और साहित्य के मर्मज्ञ बड़ा परिदृश्य खड़ा करते हैं। इस संग्रह को लेकर इतना तो कहा ही जायेगा, कवयित्री ने चाय के साथ नाना दृश्यों, स्थितियों, भावनाओं को चित्रित किया है। यह कम तो नहीं है? चाय की महक से जागना होता है और उसकी पत्तियाँ खुशियों की चाभी है। कवयित्री के मिलने की संभावना के दृश्य देखिए-

मैं मिलूँगी तुम्हारे ओठों के मिठास में
या फिर चाय पीते ही चेहरे पर आती ताजगी में
या फिर आँखों की चमक में मिलूंगी

चाय के बिना जीवन कैसा है मानो आकाश में बादल तो हैं परन्तु बरसती एक भी बूंद नहीं है, स्वप्नों से भरी आँख तो है परन्तु नींद नहीं है और खुशियाँ तो हैं परन्तु चेहरे पर मुस्कान नहीं है। ये सारे बिंब कवयित्री की भाव-संवेदनाएँ जगाने वाले हैं। प्रियतम हों और चाय भी हो तो उनका सब कुछ ठहर जाता है, धड़कने रुक जाती हैं और मन सात्विक विचारों से भर जाता है। शाम की चाय के साथ अनकहा सब कुछ कह दिया जाता है। दोनों साथ-साथ हों और चाय की गरमाहट भी हो, कवयित्री को याद आता है-

मैं तुमसे बातें करते-करते
तुम्हारी आँखों में डूब जाया करती थी
और तुम मेरी बालों की वेणी में

चाय के साथ मन की बातें किसी दोस्त की तरह हैं जो कभी नहीं रूठता और सब कुछ अच्छा है, का भाव दे जाता है। चाय किसी गवाह की तरह है दोनों के बीच और वह हर गम को भुला देती है। कवयित्री कविता की याद दिलाती है जो चाय के साथ उसने लिखी थी अपने प्रियतम के लिए। 'जिन्दगी मेरी तरफ देख' गहन भाव की मार्मिक कविता है। जिन्दगी चाय की तलब सी है और कवयित्री आँसुओं को मिलाकर पी जाना चाहती है।

उनका इश्क चाय की तरह है, कभी कम कभी ज्यादा परन्तु हमेशा ही जरुरी। 'प्याली में इंतजार' प्रिय के आने और सजने-सँवरने की मोहक भावनाओं से भरी कविता है। चाय से मिठास लेने की सलाह अद्भुत है, वह कहती हैं-लक्ष्य मीठा ही होगा। चाय की खुमारी कभी नहीं उतरती, शाम हो या रात हर समय बनी रहती है। चाय के साथ उनका संवाद देखिए-सोचो तो सही/बस तुम्हारे होने से ही/सब कितना सुहावना हो जाता है/फिर क्यों कोई रुठ जाए तुमसे/ओ मेरी चाय! 'चाय की तरह' कविता में प्रेयसी की तुलना देखिए-चाय की तरह तुम सुन्दर, साँवली, मीठी, मन को लुभाने वाली, गरमाहट से ठंडक देने वाली और चित्त का हरण करने वाली हो। वह दिसम्बर की सर्द रातों में दोस्तों के साथ मुहब्बत के गीत गुनगुनाते हुए, चाय की प्याली में डूब जाना चाहती हैं। उनके लिए जिन्दगी की खूबसूरती, दोस्ती की खुशी, प्रेम की अनुभूति, अपनेपन का अहसास, रिश्तों की गरमाहट और लफ्जों का सौन्दर्य सब कुछ चाय में ही है। उनका यह संदेश सहज ही स्वीकार करने योग्य है-
चाय हो या जिन्दगी
खुद की बनाई ही अच्छी लगती है।

कुमारी छाया जी की कविताओं में भाव-चिन्तन की पुनरावृत्ति इसलिए है कि वह उस पर जोर देना चाहती हैं-एक चाय की प्याली/कितनी ही उलझनों को/सुलझाने का हौसला रखती है/हम चाय ही नहीं पीते/सारे गमों को भी चाय की घूँट के साथ/हमेशा के लिए खत्म कर देते हैं।

चाय ही है जो हर वक्त साथ देती है, सुकून देती है और दिल को राहत पहुँचाती है। उनका भाव देखिए-देर न किया करो/चाय भी ठंडी हो गयी/एक तुम्हारे इंतजार में। चाय और बिस्कुट/हम और तुम/एक दूसरे के लिए। 'आँच तुम्हारी यादों की', 'चाय सा इश्क मेरा', 'तुम संग चाय' जैसी कविताओं में वह कभी प्रियतमा बनती हैं, कभी प्रियतम और चाय के साथ नाना मधुरतम पलों की कल्पना करती हैं। सहज व मर्यादित तरीके से खुलकर अपनी भावनाओं, संवेदनाओं को व्यक्त करना देखा जा सकता है। 'खुश रहने की आदत' और 'मेरा हाथ थाम लो' जैसी कविताएँ सुन्दर संदेश देती हैं। 'स्वाद चाय का', प्याली में प्यार', 'जिन्दगी कड़वी नहीं है', चाय और तुम' जैसी कविताओं में जीवन की मधुर कल्पनाएँ उमड़ती-घुमड़ती हैं और सुखद जीवन का संदेश देती हैं। 'हसरतें' कविता का गहन भाव देखिए-खुल कर हँसने, बारिश की बूंदों के साथ खेलने, चाँद से बात करने और प्रकृति का सौन्दर्य महसूस करने जैसी ख्वाहिशें चाय के साथ पूरी हो गई हैं। 'एक प्याली चाय हूँ मैं' कवयित्री की चाय के साथ अपनी तुलना का आधार सुबह की तलब, शाम का सुकून, गपशप की शुरुआत और रिश्तों की मिठास ही है। 'तुम्हारी यादों की किताब' कविता में वह स्वीकार करती हैं कि कुछ पन्ने चाय के साथ ही हैं-कुछ खामोशियों पर लिखी गयी हैं, कुछ लिखने से रह गयी हैं, कोई मीठी याद छूट गयी है और बरसात की बूंद सी चाय में गिरी तो और मीठी लगी। वह चाय से गुहार करती हैं कि कभी खफा मत होना क्योंकि तुम मेरे हर दर्द की दवा हो। 'सुबह की शुरुआत' चाय के साथ कवयित्री की पसंद है। 'एक कोशिश तो बनती है" कोशिश करते रहने का सार्थक संदेश देती कविता है। 'जरा सी जिन्दगी' कविता में वह साँवले रंग के कृष्ण से अपना प्रेम जगाती हैं और सब से प्रेम-भाव की कामना करती हैं।

इन कविताओं में हिन्दी-उर्दू के गिनती के शब्द हैं परन्तु उनका आलोक व्यापक है, देखिए-इश्क का पैगाम/चाय के कप में/इलायची की खुशबू/जिन्दगी के कड़वेपन/दूर करती शक्कर/इश्क, इबादत, सुकून/ पत्ती के साँवले रंग में मिलाकर/पैगाम लाती है/अहसास दिलाती है कि/जिन्दगी बहुत खूबसूरत है। 'हम गुनगुनाने लगे', 'बरसात', 'कुछ सपने सजाते हैं' जैसी कविताओं की कल्पनाएँ जीवन को मधुरता प्रदान करती हैं और प्रकृति के साथ सुखद स्मृतियाँ जगाती हैं। चाय जीवन में सुकून घोलती है और किंचित बेफिक्री भी। कवयित्री को बरसात में भीगना और गरम चाय की मिठास में सुकून महसूस करना याद आता है। जीवन के अनेक पहलुओं में चाय को उन्होंने जीया है और इन कविताओं ने चाय को अमर किया है। 'एक खत चाय के नाम' रोचक और मार्मिक कविता है तथा उन्होंने जीवन के नाना प्रसंगों को याद किया है। 'तुमसे कहना है' कविता में भाव वही है कि चाय हमारे जीवन के हर मर्ज की दवा है। कवयित्री की कल्पना है-जिन्दगी चाय जैसी/मीठी होनी चाहिए, सारा कड़वाहट मिट जाता है और जीवन का सूनापन खत्म हो जाता है।

कवयित्री के चिन्तन में चाय सुकून व शांति का पर्याय है। 'छँट जायेंगे गम के बादल' कविता उम्मीद जगाती है, दुख के बादल छँट जायेंगे और जिन्दगी आसान हो जायेगी। 'एक अच्छा दिन' में चाय से शिक्षा मिलती है-परिस्थितियाँ कैसी भी हों/उसमें उम्मीदों के शक्कर को मिला/आशाओं से प्याली को भर लें/सब अच्छा ही होगा। यह भाव कवयित्री का उच्च जीवन-दर्शन दिखाता है और वे सतत उत्साहित हो, आनंद ले रही हैं। चाय उनके लिए हर तकलीफ की दवा है, एकाकीपन में दोस्त और इंतजार में हमसफर की तरह। उनके जीवन में चाय और बारिश का बार-बार उल्लेख है और चाय की प्याली जीवन का दर्शन समझाती है। चाय में उन्हें व्यवस्थित जीवन की झलक मिलती है और वे वैसे ही व्यवस्थित होने का संदेश देती हैं। कवयित्री स्वीकार करती हैं कि उनका जीवन खूबसूरत न होता यदि प्याली में चाय न होती। 'आओ कुछ बातें करे' और 'आँखों में बसे सपने' जैसी कविताएँ चाय को अदब से ग्रहण करने का संदेश देती हैं। 'टूटा रिश्ता' कविता में रिश्तों को सहज करने की सलाह चाय के माध्यम से समझाती हैं-

जिन्दगी को चाय जैसी मीठी हो जाने दें
मुश्किलें उबल-उबल कर खत्म हो जायेंगी
बचा रह जायेगा सिर्फ प्यारा रिश्ता
बिल्कुल चाय जैसा मधुर

संग्रह की अंतिम कविता 'केतली से प्याली तक' में कवयित्री का भाव-दृश्य देखिए-जब मैं खुद से बातें करती हूँ/चाय को पास बुला लेती हूँ/और वो केतली से/प्याली तक का सफर तयकर/धीरे से पास आ जाती है/मेरी किस्सों, कहानियों में/कविताओं में, मेरी प्रसन्नता में—

इस तरह देखा जाए तो कवयित्री ने चाय को जीवन्त किया ही है, जीवन को, प्रेम, संवेदना और अपनी अनुभूतियों को भी जीवन्त किया है। किसी को संशय नहीं रह जायेगा कि चाय हमारे जीवन में कितना महत्वपूर्ण है। इसीलिए उन्होंने चाय को हमसफर स्वीकार किया है। कविताएँ छोटी-छोटी हैं,भाव से भरी हैं और मार्मिक हैं। भाषा सहज सरल है,हिन्दी-उर्दू के शब्द हैं और शैली जीवन से जुड़ने का संदेश देती है। यह रोचकता व सहजता पाठकों को आकर्षित करने वाली और सबके जीवन में प्रेम जगाने वाली है।।

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