कहानी: सेतु

विजय कुमार संदेश

विजय कुमार संदेश

प्राध्यापक, पी.जी. हिन्दी विभाग, मार्खम कॉलेज, हजारीबाग, झारखंड,भारत
दूरभाष: +91-943 019 3804
ईमेल: sandesh.vijay@gmail.com

सेतु उर्फ कुमारी सिमरनजीत वर्मा की उम्र बमुश्किल अभी बाईस वर्ष की होगी। पिछले महीने ही उसने अपना इक्कीसवाँ सालगिरह हॉस्टल के मित्रों के साथ सीधे-सादे ढंग से मनाया था। अभी-अभी उसकी पढ़ाई पूरी हुई थी। दिल्ली विश्वविद्यालय के एक नामचीन कॉलेज से उसने स्नातकोत्तर की अपनी शिक्षा पूरी की थी। स्नातक के बाद स्नातकोत्तर की पढ़ाई जारी रखते हुए उसने केन्द्रीय लोक सेवा आयोग के परीक्षा की तैयारी भी शुरु कर दी थी तथा यह संयोग रहा कि अपने पहले ही प्रयास में वह सफल हुई और भारतीय पुलिस सेवा (IPS) में उसका चयन हुआ। इस सेवा की गिनती भारत की प्रमुख पुलिस सेवा में होती है और यह भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) तथा भारतीय वन सेवा (IFoS) के साथ-साथ भारत सरकार की अखिल भारतीय सेवा के समतुल्य है। हैदराबाद स्थित आयोग के प्रशिक्षण केंद्र में प्रशिक्षण लेने से पूर्व अपनी इस खुशी को शेयर करने के लिए वह अपने घर धनबाद, झारखंड आ रही थी।

सेतु ने पहाड़गंज की ओर से नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन में प्रवेश किया। स्टेशन में भारी भीड़ थी। जन-सैलाब उमड़ आया था। लोग एक-दूसरे को ठेल-धकेल कर आगे बढ़ रहे थे। एक-दो सप्ताह बाद ही दीपावली, छठ और ईद जैसे महत्वपूर्ण त्योहार थे। दिल्ली और उसके आस-पास रहनेवाले बिहार, झारखंड, बंगाल, उड़ीसा और असम के प्रवासियों को अपने-अपने घर जाने की जल्दी थी। टिकट से अधिक बेटिकट यात्रियों की भीड़ थी। अतः जिनके पास रिजर्वेशन टिकट थे, उन्हें अपनी सीट तक पहुँचने की जल्दी थी। सेतु की ट्रेन प्लेटफार्म संख्या 14 में लग चुकी थी, जिसे डिजीटल सूचना पट्ट पर बार-बार दिखाया जा रहा था और ध्वनि-विस्तारक से भी इसकी घोषणा हो रही थी। प्रवेशद्वार पर सारी औपचारिकताएँ पूरी करके वह जल्द से जल्द अपनी बोगी तक पहुँच जाना चाहती थी। इस कारण उसने तेजी से अपने कदम बढ़ाने शुरु कर दिये थे। अपने बर्थ पर बैठने के बाद सेतु जब आश्वस्त हुई तो उसने बाहर झांक कर देखा तो अवाक रह गयी। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि इतनी बड़ी भीड़ लांघकर वह यहाँ तक आयी है। टिड्डी दल की तरह लोग एक-दूसरे से गुँथे भागे जा रहे थे। किसी भी प्लेटफार्म पर पैर रखने के लिए तिल भर जगह नहीं थी। सीढ़ियों पर भी लोग कब्जा जमाये बैठे थे। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए रेलवे सुरक्षा बल के जवान पूरी कोशिश कर रहे थे। ध्वनि-विस्तारक पर यात्रियों की सुरक्षा  संबंधी घोषणाएँ बार-बार की जा रही थी। यह संयोग था कि सेतु की ट्रेन अपने नियत समय पर चल पड़ी और रात भर की यात्रा के बाद वह दूसरे दिन प्रातः ही अपने गंतव्य पर पहुँच गयी।

सेतु को महीनों बाद अपने करीब पाकर माँ माधवी की आँखों में खुशी के आँसू छलक पड़े थे। उसकी इस सफलता पर पूरा परिवार गौरवान्वित था। परिवार में माँ, नानी, मामा और मौसी थी। सेतु का जन्म ननिहाल में ही हुआ था। जब वह तीन माह के गर्भ में थी, तभी उसके पिता ने माँ माधवी से दूरी बना ली थी। जन्म के बाद सेतु का लालन-पालन, शिक्षा-दीक्षा सबकुछ ननिहाल में हुआ। पिता की जगह मामा का और दादा-दादी की जगह नाना-नानी का प्यार मिला। जन्म के साथ ही नानी ने नाम रख दिया सिमरन, माँ ने सेतु, मौसियों ने कहा जीत और नाना ने अपना सरनेम दिया वर्मा। इस प्रकार वह सिमरनजीत सेतु वर्मा हो गयी तथा निकनेम हो गया सेतु। आज वही सिमरनजीत सेतु आई॰पी॰एस॰ बनकर अपने शहर आयी है। ट्रेन से उतरते ही स्थानीय प्रशासन ने फूल-माला पहनाकर गाजे-बाजे के साथ स्वागत किया और मीडियावालों ने चैनलों और अखबारों में प्रशंसा के कसीदे गढ़े।

सेतु को पिता, दादा-दादी का प्यार कभी नहीं मिला। उस कमी की पूर्ति नाना-नानी, मामा-मौसी आदि से हुई। सेतु की माँ माधवी इतनी सीधी-सरल स्वभाव की थी कि ससुराल में चंद दिनों में ही मिली प्रताड़ना का भी वह प्रतिरोध नहीं कर सकी थी। माधवी की इस प्रताड़ना के केन्द्र में उसकी दो ननदें मालिनी और कांति थीं। असल में सेतु के दादा ब्रजनंदन प्रसाद ने दो शादियाँ की थी। पहली शादी से दो बेटियों के जन्म के बाद पत्नी का निधन हो गया था। चार-पाँच वर्षों तक ब्रजनंदन प्रसाद ने बच्चियों को एक दाई के सहारे पोसा-पाला। किंतु, जब दाई ने भी काम छोड़ दिया तो दूसरी शादी कर ली जिससे एक बेटा राजकिरण हुआ। ब्रजनंदन प्रसाद का यह दुर्योग था कि राजकिरण के पाँच वर्ष होते-होते दूसरी पत्नी का भी अकस्मात् लंबी बिमारी से निधन हो गया।

ब्रजनंदन प्रसाद ने जमशेदपुर के आदित्यपुर में रहते हुए आदित्यपुर-सरायकेला  मुख्यपथ से सटे लगभग एक बीघा जमीन खरीदी थी और छोटा पर खूबसूरत घर बनवाया था। ब्रजनंदन प्रसाद की दोनों बेटियाँ बड़ी हुईं तो लॉ किया और जमशेदपुर के कोर्ट में प्रैक्टिस करने लगीं। बहुत कम समय में दोनों ने कानून के क्षेत्र में अच्छा नाम कमाया और शहर में दीवानी तथा क्रिमिनल के नामी विधिवेत्ताओं में उनकी गिनती होने लगी। राजकिरण जब स्नातक हुआ तो अपने पिताजी की फैक्ट्री में ही काम में लग गया।

आदित्यपुर में जिस जमीन को ब्रजनंदन प्रसाद ने कभी कूड़े के भाव में खरीदा था। उसके आस-पास जब छोटी-छोटी फैक्ट्रियाँ खुलने लगीं तो उसी जमीन की कीमत चंद वर्षों में सोने के भाव की हो गयी। जमीन की कीमत बढ़ जाने के बाद मालिनी और कांति दोनों बहनों के मन में पाप आ गया। उन्हें लगा कि ये सारी संपत्ति तो राजकिरण की हो जायेगी। इसलिए दोनों बहनों के शातिराना दिमाग ने एक खेल शुरु किया। वे राजकिरण को धीमी जहर के रूप में थोड़ा-थोड़ा अफीम भोजन में मिलाकर देने लगीं। आम आदमी की निगाह में अफीम सफेद जहर है। जो इसका आदी हो गया, उसका शरीर खोखला हो जाता है। राजकिरण बहनों की इस शातिराना खेल से एकदम अनजान था। वह सोच भी नहीं सकता था कि उसकी बहनें उसके साथ ऐसा शातिराना खेल भी कर सकती हैं। लंबे समय तक अफीम के सेवन से उसकी ज्ञानेन्द्रियाँ निर्बल होने लगी थीं और स्मरण-शक्ति पर भी असर होने लगा था। यद्यपि, अफीम में औषधीय गुण होते है पर उसके अधिक सेवन से राजकिरण का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा था। स्नायु और ज्ञान-तंतु के रोग लग गए थे। किसी भी काम में अब मन नहीं लगता था। हाथ-पाँव बेजान हो गए थे। अनजाने में राजकिरण धीरे-धीरे इसका आदी हो गया।

यह संयोग था कि राजकिरण के अफीमची होने के पूर्व उसकी शादी माधवी से हो चुकी थी। अब दोनों बहनों के मार्ग में राजकिरण के साथ-साथ माधवी भी राह का रोड़ा थी। शादी के बाद भी माधवी को मालूम नहीं हो सका कि उसके पति को अफीम के रूप में धीमी गतिवाला सफेद जहर दिया जा रहा है। पर, कभी-कभी उसे लगता था कि भोजन के बाद राजकिरण थोड़ी देर के लिए सुस्त हो जाता है। अभी माधवी के विवाह का एक महीना भी नहीं बीता था कि मालिनी और कांति ने मिलकर माधवी संग प्रताड़ना का एक नया खेल शुरु किया। तीन महीने के छोटे से समय में दोनों बहनों के द्वारा उसे इतना प्रताड़ित किया गया कि एक महीने के लिए वह जब अपने मायके आयी तो फिर कभी नहीं गयी।

माधवी के मायके आने के बाद राजकिरण का अफीम का डोज बढ़ा दिया गया और चंद दिनों के बाद ही उसकी तबीयत खराब रहने लगी। उसका शरीर सूखकर काँटा हो गया। बूढ़े ब्रजनंदन प्रसाद को समझ में ही नहीं आया कि उसके बेटे को क्या हो गया है ? वह स्वयं भी अशक्त हो गए थे और कुछ करने की स्थिति में नहीं थे। अफीम के दुष्प्रभाव से राजकिरण धीरे-धीरे नशेड़ी हो गया। उसकी दोस्ती अब गांजा-भांग पीनेवालों से हो गयी। वह दिनभर नशे में डूबा रहता और रात को बिना खाये-पीये सो जाता। कुछ महीनों के बाद ब्रजनंदन प्रसाद भी बेटे की स्थिति देखकर अवसाद में चले गए। अंततः अवसाद से उनकी मृत्यु हो गयी। अब पूरी संपत्ति पर दोनों बहनों का कब्जा हो गया।

दिल्ली से लौटने के उपरांत सेतु सप्ताह भर बाद प्रशिक्षण के लिए हैदराबाद चली गयी। सरदार बल्लभ भाई पटेल राष्ट्रीय पुलिस अकादमी में उसका प्रशिक्षण था। यह प्रशिक्षण केन्द्र हैदराबाद की हरी-भरी पहाड़ियों के बीच स्थित है। यहाँ रहकर आई॰पी॰एस॰ अधिकारियों के लिए बुनियादी प्रशिक्षण को सेतु ने कुशलता पूर्वक पूरा किया और कई इंडक्शन कार्यक्रमों में उसकी सक्रिय भागीदारी भी रही। प्रशिक्षण के अंतिम दिन विदाई कार्यक्रम के अवसर पर सभी प्रशिक्षुओं ने अपने-अपने विचार रखे। सेतु से जब पूछा गया कि वह अपने आई॰पी॰एस॰ की सफलता का श्रेय किसे देना चाहेगी ? तो, उसने बिना हिचक इसका श्रेय अपनी माँ और नाना-नानी को दिया। उसने बताया कि उसके नाना जी अब इस संसार में नहीं हैं पर उनके सपने मेरे भीतर अब भी जीवित हैं। यह कहते-कहते वह अतीत में खो गयी और अतीत के पृष्ठों को खोलते हुए उसने उपस्थित अधिकारियों और प्रशिक्षु साथियों को बताया कि उसकी माँ ही उसका रोल मॉडल है। यह कहते हुए सेतु अतीत के पृष्ठों में उलझती चली गयी। और, तब अतीत के अनगिनत दृश्यों का ऐसा रेला आया कि उसके मुख से अनकही कहानी इन शब्दों में फूट पड़ी- ‘जीवन में कुछ करने की, कुछ अच्छा करने की प्रेरणा मुझे माँ से मिली। पिता को मैंने नहीं देखा पर नाना जी की सोच मेरे सामने थे। जब मैं चार-पाँच साल की थी, कुछ-कुछ बोलना सीख गयी थी, तभी से मेरे नानाजी अक्सर कहा करते थे कि सेतु तो आई॰पी॰एस॰ बनेगी। राष्ट्र-समाज की सेवा करेगी। उन्होंने हँसी में ही सही मुझे एक लक्ष्य दे दिया था। नाना-नानी और माँ ने मेरी हमेशा हौसला आफजाई की। मेरी स्थिति और नियति देखकर पास-पड़ोस वाले अक्सर व्यंग्य में कहा करते थे कि बड़ा अफसर बनेगी ? ठीक से बी॰ए॰ पास कर ले यही बहुत है। माँ को भी मुहल्ले की महिलाएँ ताना देती हुई कहती थीं कि बिटिया को ज्यादा मत पढ़ाओ। ज्यादा पढ़कर क्या करेगी? आखिर में तो चूल्हा ही फूंकना है। असल में वे मेरे बहाने मेरी माँ की परिस्थितियों को ताना देती थीं। पर, मेरी माँ ने किसी की नहीं सुनी। मैं पढ़ती चली गयी और आज आप सब के सामने हूँ।’ इतना कहते-कहते सेतु की आँखें नम हो गयीं। गला भर आया। हॉल में बैठे अधिकारी और सह-प्रशिक्षु-मित्रों की भी आँखें नम हो गयीं।

सेतु ने आगे कहा कि उसने बचपन में ही संकल्प कर लिया था कि वह माँ और नाना जी के सपनों को पूरा करेगी। मेरे दिलो-दिमाग में यह बात गहरे तक बैठ गयी थी। इसलिए मैंने अपने लक्ष्य को गंभीरता से लिया। हजारों दिक्कतों और अवरोधों को मैंने चुटकी में लिया और गरल को अमृत समझ कर पी गयी। जिन हालातों में अच्छे-अच्छे घरों के बच्चों को पसीने छूट जाते हैं, उन हालातों को मैंने हल्के में लिया। मैंने कई बार देखा है कि बिमारी की अवस्था में भी मेरी माँ ने काम पर जाना नहीं छोड़ा और मेरे लिए मजबूत स्तम्भ बनकर खड़ी रही। मैं भी माँ के दुःखों का अनुभव करती थी। शायद इसीलिए मैंने भी कष्टों या अवरोधों से कभी समझौता नहीं किया। सदा ही योजनाबद्ध तरीके से अपने लक्ष्य की तैयारी में जुटी रही। माँ के कहे गए ये शब्द कि दृढ़-संकल्प और संघर्ष कामयाबी प्राप्त करने के दो रास्ते हैं मेरे रोम-रोम में समा गया था।

हैदराबाद में प्रशिक्षण समाप्त होने के बाद सेतु की पहली पोस्टिंग प्रोबेशन अवधि के लिए झारखंड के चतरा में हुई। चतरा के बारे में सेतु ने सुन रखा था कि यह अपराधियों का गढ़ है। चारो ओर घने जंगलों से घिरा यह वन-क्षेत्र अँधेरा घिरते ही ठहर जाता है। गाँव की गलियाँ और रास्ते सुनसान हो जाते हैं। सेतु के लिए यह अंचल एक चुनौती जैसा हो गया था। चतरा आकर उसने अपनी ड्यूटी ज्वाईन का ली। इस प्रोबेशन अवधि के दौरान उसे खुद को साबित करना था। इसलिए आते ही अनुशासन के निमित उसने कुछ कड़े और कठोर रुख अपनाये। उसे जो पहला शिकायती पत्र मिला था, उसमें जिक्र किया गया था कि शाम होते ही इस इलाके में जो सरकारी-गैर सरकारी वाहन चलते हैं, उसमें नब्बे फीसदी यात्री बेटिकट होते हैं। अतः चार-पाँच दिनों के बाद उसने सच्चाई जानने के लिए कुछ सिपाहियों के साथ एक भीड़ भरे मार्ग में शाम होते ही मोर्चा सम्हाल लिया। ठसाठस भरी गाड़ियाँ आती गयीं। एक-एक कर उसमें यात्री-टिकट चेक किये गये। जिनके पास टिकट थे, उन्हें पुनः गाड़ी में बिठा दिया गया। बेटिकट यात्री एक किनारे लाईन में खड़े किये गये। बेटिकट यात्रियों को सेतु ने दो विकल्प दिये वह यह कि या तो वे पाँच बेंत खायें या दस मिनट मुर्गे की तरह उकडूँ बैठकर सजा पायें। बेटिकट यात्रियों में अधिकांश छात्र थे, सो बेमन सबने मुर्गा बनकर अपनी सजा पूरी कर ली। बेटिकट यात्रियों के अंत में एक साठ वर्षीय सज्जन और संभ्रांत व्यक्ति भी थे। खादी की धोती और सिल्क का कुर्ता पहने हुए थे। अपनी बारी आते ही सेतु के कुछ पूछने से पहले बोल पड़े- बिटिया! हम पहली बार बस में बेटिकट ही। आज तक कोई मेहरारू से हम न मार खइनी हऽ और ना ही कोई सजा पइनी हऽ। हमरा के छोड़ देऊँ। हमर पीछे खड़ा आदमी हमार नौकर बा। एहो भी हमरा संगे कभी बेटिकट बस पर न बैठनी हऽ और अपने कुर्ते की जेब से कई दिनों का टिकट निकाल कर उन्होंने दिखा दिया। संयोग से उनके पास बस के कुछ पुराने टिकट अभी जेब में ही थे। सेतु ने उनकी उम्र देखी और उनकी साफगोई भी। उसने कहा- बाबा! आप चिंता मत कीजिए। आपको कोई कुछ नहीं कहेगा। फिर, अपने एक सिपाही को बुलाकर कहा- इन्हें सम्मानपूर्वक बस में सीट पर बिठाकर आइये। ये हमारे बाबा (दादा) जैसे हैं। फिर, बस के उपचालक को बुलाकर हिदायत देते हुए कहा- इन्हें किसी प्रकार का कष्ट नहीं होना चाहिए। सीट खाली न हो तो सीट खाली करवा कर इन्हें बिठाइये। उपचालक ने ठसाठस भरी हुई बस में उन्हें रिजर्व सीट पर बिठाया। बाबा सेतु के इस स्वभाव से गदगद हो गए। महीनों तक गाँव में उसकी प्रशंसा के गीत गाते रहे। इस घटना के बाद सेतु पूरे इलाके में बेंतवाली अफसर के रूप में लोकप्रिय हो गयी थी। यद्यपि, बेंत चलाने की नौबत अभी तक नहीं आयी थी। जबतक वह इस इलाके में रही, इलाका हर दृष्टि से शांत रहा।

प्रोबेशन अवधि पूरी होने का बाद सेतु का तबादला झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले के मुख्यालय जमशेदपुर में हुआ। चारों ओर जंगलों-पहाड़ों से घिरा जमशेदपुर देश और दुनिया में स्टील उत्पादन के लिए मशहूर है। इसे टाटा नगर या इस्पात नगरी के नाम से भी जाना जाता है। सीधी और साफ-सुथरी सड़कें, असाधारण बुनियादी ढाँचे और अविश्वसनीय प्राकृतिक सुंदरता के लिए भी यह ख्यात है। झिलमिलाती नदियाँ, रोलिंग पहाड़ियाँ, हरियाली से आच्छादित वन और खूबसूरत झरनों के साथ करीने से सजा टाउनशिप जमशेदपुर की खास विशेषता है। इसी जमशेदपुर में एक शाम जब वह पास के शहर सरायकेला से मीटिंग करके अपने पुलिस-बल के साथ लौट रही थी तो रास्ते के किनारे पेट के बल औंधे पड़े एक आदमी को देखकर रुक गयी। साथ चल रहा पुलिस-बल का काफिला भी रुक गया। उसने अपने अधीनस्थ एक पुलिस अधिकारी को देखने के लिए भेजा कि माजरा क्या है? पुलिस अधिकारी ने आकर बताया कि एक नशेड़ी नशापान करके औंधा पड़ा है। जाड़े की शाम थी। शाम के सात बज रहे थे। जाड़े के दिनों में दिन छोटा और रात बड़ी होती है। इसलिए अँधेरा घिर आया था। औंधे पड़े व्यक्ति के तन पर नाममात्र के वस्त्र थे। बाल बेतरतीब बढ़े हुए थे। कई दिनों से उसने दाढ़ी भी नहीं बनायी थी। इसलिए दाढ़ी बढ़ी हुई थी। पचास के आस-पास उसकी उम्र रही होगी। धुप्प अँधेरे में वह डरावना लग रहा था। सेतु को उस पर दया आ गयी। अपना कर्त्तव्य निभाते हुए उसने पुलिसकर्मियों से कहा कि इसे सरकारी-अस्पताल छोड़ आओ और वह अपनी कोठी में चली आयी। देर रात तक उस नशेड़ी के बारे में ही सोचती रही, फिर कब सो गयी पता नहीं चला। उगते सूरज के साथ उठी तो फिर वही अपरिचित चेहरा सामने में आ गया। ध्यान भटकाने के लिए उसने एक फाइल खोल उस पर अपनी नजरें टिका दी।

एक सप्ताह के बाद सेतु ने उस अपरिचित चेहरे को बुलावा भेजा तो वह दूसरे दिन हाजिर हो गया। आज वह पूरी तरह चंचल लग रहा था। बेतरतीब बाल कटवा लिये थे और दाढ़ी भी बना ली थी। दो-एक दिन पहले का धुला हुआ कपड़ा पहनकर आया था। सेतु ने उसका नाम पूछा। उसने अपना नाम राजकिरण बताया। सेतु ने उसकी इस स्थिति के बारे में जानना चाहा तो उसने बताया कि उसकी दो सौतेली बहने हैं। दोनों शहर की नामी वकील हैं। संपत्ति के लोभ में दोनों पिता के गुजरने के बाद मेरे भोजन में थोड़ा-थोड़ा कोई नशा मिलाकर देने लगीं। धीरे-धीरे मैं नशेबाज बन गया। घर-जमीन पर मेरी बहनों ने कब्जा कर लिया और मुझे घर से जबरन निकाल दिया। तबसे न मेरा घर है और ना ही कोई ठिकाना है। नशा करके आवारा बादल की तरह घूमता रहता हूँ। यही मेरी नियति है। मेरी शादी भी हुई थी। मेरी बहनों ने उसे इतना प्रताड़ित किया कि वह एक बार जो मायके गयीं सो लौटकर नहीं आयीं। मैं नशे में इतना डूब चुका था कि उसके लिए कुछ नहीं कर सका। इस अपरिचित की आपबीती सुनकर सेतु को उसके प्रति थोड़ी-थोड़ी सहानुभूति होने लगी थी।

सेतु ने अपने पिता को कभी देखा नहीं था और ना ही उनके बारे में कुछ जानती थी। एक बार माँ से इस बारे में पूछा भी था, पर माँ ने जवाब देने के बजाय उसे डाँट दिया था। कई बार अपने पिता की छवि को वह अपने अवचेतन में बनाने की कोशिश करती थी पर, हर बार असफल हो जाती थी। स्कूल के शिक्षक-अभिभावक मीटिंग में माँ अकेली ही जाती थी। कभी-कभी नाना जी साथ होते थे। वर्ग-शिक्षक ने माँ से उसके पिता के बारे में पूछा था तो माँ ने कुछ घुमा-फिराकर जवाब दिया था और बात टाल दी थी। तब घर जाते हुए मैंने माँ से फिर एकबार वही प्रश्न किया था। प्रश्न सुनते ही माँ का चेहरा तमतमा गया था। माँ के चेहरे से उठते-गिरते भावों को देखकर फिर कभी कुछ पूछने का साहस मुझे नहीं हुआ। कभी-कभी नाना जी हँसी-ठिठोली में मेरे पिताजी के बारे में कुछ कहते थे तो मैं एक छवि बनाने की कोशिश करती थी, उसके बावजूद कोई स्पष्ट छवि बनाने में कभी सफल नहीं हुई। आज जब पहली बार राजकिरण से भेंट हुई तो उसे लगा कि वह राजकिरण की ओर अनचाहे निकटतर होती जा रही है। प्रकृति ने अपना काम कर दिया था। पिता-पुत्री का रक्त-संबंध एक-दूसरे को अपनी ओर आकर्षित व खींचने लगा था।

सेतु के जमशेदपुर आने के पहले से ही जमशेदपुर अशांत था और अपराधियों का अड्डा बन चुका था। सेतु के आने से अपराध में कमी जरूर हुई थी, पूरी तरह उस पर लगाम नहीं लग पाया था। अपराधियों पर अंकुश के लिए उसने दो-एक रोड-मैप भी तैयार किये थे, जिससे लक्ष्य को अंजाम दिया जा सके। उस पर अमल जारी था। इसी क्रम में एक शाम वह नाके से लौट रही थी। उसके वाहन को आम राहगीर का वाहन समझकर अपराधियों ने रोक लिया। वाहन में किसी तरह का कोई सरकारी सूचक संकेत नहीं था और ना ही नीली-पीली बत्ती थी। सेतु के बिछाये रोड-मैप की जाल में अपराधी फँस गए। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस की गिरफ्त में आये अपराधियों को बचाने के लिए मालिनी और कांति वकील की हैसियत से आगे आयीं। सेतु से संपर्क किया। सेतु ने मालिनी और कांति के जीवन का सारा कच्चा चिट्ठा व इतिहास पहले ही इकट्ठा कर लिया था। वह जान गयी थी कि ये दोनों राजकिरण की सौतेली बहनें हैं। अपने रोड-मैप की कार्य-सूची के अनुसार उसने मालिनी और कांति को अपने कार्यालय में बुलाया और अपराधियों के साथ गंठजोड़ का प्रमाण सहित काला चिट्ठा उनके सामने रख दिया। साथ ही, राजकिरण के साथ किये गए दुर्व्यवहार व संपत्ति-हड़प को भी उससे जोड़ दिया। अपने बुरे कर्म और सेतु के बिछाये जाल में खुद को फँसता देख मालिनी और कांति की घिग्घी बंध गयी। वे अपराधियों के मकड़जाल से बाहर निकलने व निकालने के लिए सेतु से प्रार्थना करने लगीं। सेतु ने उन्हें एक माह का समय दिया और कहा कि वे गैरकानूनी काम छोड़ दें अन्यथा परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहें। एक माह की अवधि में ही दोनों बहनें तनाव से टूट गयीं और सेतु से अपने किये के लिए क्षमा मांगने लगीं। सेतु ने कहा- आपको क्षमा तो सिर्फ न्यायालय देगा। मैं दुआ करूंगी कि सजा कम से कम मिले।

राजकिरण अब पूरी तरह स्वस्थ हो गया था और सभी नशीले चीजों से दूरी बना ली थी। सामान्य जीवन व्यतीत करने लगा था। जमशेदपुर में रहते हुए सेतु ने अपनी माँ को बुला लिया था। अपने निजी स्रोत से पता लगाकर वह पूरी तरह कन्फर्म हो गयी थी कि राजकिरण ही उसके पिता हैं। इसलिए उसने एक दिन राजकिरण को बुलावा भेजा। राजकिरण दूसरे दिन उससे मिलने आवासीय-कार्यालय में आ गया। सेतु ने राजकिरण को आदर के साथ सामने की कुर्सी पर बिठाकर वह अंदर गयी और माँ को साथ ले आयी। राजकिरण को देखकर माधवी चौंक उठी। सेतु ने माधवी को अपनी कुर्सी के बगल में बिठाते हुए पूछा- माँ, तुम इन्हें पहचानती हो। माधवी ने स्वीकारोक्ति में सिर हिलाया और कहा- हाँ, ये तुम्हारे पापा जी हैं और सुबकने लगी। देर तक सुबकती रही। दूसरी ओर राजकिरण भी आश्चर्यचकित था। सहसा उसे विश्वास नहीं हुआ कि सामने कुर्सी पर बैठी अधिकारी उसकी बेटी है। राजकिरण की आँखों से आश्चर्यमिश्रित खुशी के आँसू छलक पड़े।

सेतु ने नदी के दो पाटों की तरह माधवी और राजकिरण के बीच पुल का काम किया था। अबतक दोनों के जीवन की ढेर सारी खुशियाँ बहते नदी के पानी की तरह बह चुकी थी। सेतु दोनों की शेष खुशियों को बहने नहीं देना चाहती थी। उसने पहले ही माँ-पिताजी के लिए एक तीन कमरों का फ्लैट खरीद रखा था। फ्लैट की चाबी देते हुए बस इतना कह पायी माँ-पापाजी मैं आप दोनों को खुश देखना चाहती हूँ। इसके बाद उसने देखा कि उसकी हथेली पर आँसू के दो बूँद गिरे हैं। आँसू के ये दोनों बूँद उसके माता-पिता के थे। उन दोनों बूंदों को सेतु ने अपने आँचल में बांध लिया ताकि ये फिर से जमीन पर न गिरें।

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