काव्य: प्रभा मुजुमदार

प्रभा मुजुमदार
1 आग, राख और धुआँ

आग का राख में बदल जाना,
एक पूरी जिंदगी की यात्रा है
और उसका सारांश भी।

यूँ तो राख को देखना
एक अंत,
पराजय, बेबस खामोशी की
स्वीकृति है,
पर उस में ढूंढी जा सकती है
कभी जीती जगती दुनिया,
महसूस की जा सकती है
ऊर्जा, ताप और धड़कन।
पढे जा सकते हैं उसमें
इतिहास के अध्याय,
समृद्धि या बदहाली के अवशेष।

हर आँच अलग होती है
वैसे ही हर राख भी।
समय, समिधा
और हवा की दिशा
निर्धारित करती है
लपटों का वेग
ऊँचाई और फैलाव।
कोई आँच
भड़कती है बड़ी तेजी से,
उसकी लपलपाती लपटें
सब कुछ निगलती सी,
भड़कती है जितनी अधिक,
बुझ भी जाती है
उतनी ही जल्दी,
किसी उद्देश्य को
पूरा करती-सी।

कोई आँच
धीमी धीमी,
अगरबत्ती सी महकती
बुझती है इत्मीनान से।
राख होने के बाद भी
माथे पर लगाई जाती है
श्रद्धा से।

गीली लकड़ी
जो बमुश्किल सुलगती है
उसकी आंच
देती है आँखों को जलन,
घुटन और कसैलापन,
जलने और बुझने के बीच
इम्तहान ले डालती है।
फिर भी
उसका सुलगना,
आश्वस्ति है
किसी की हांडी में
चावल के पकने की।
गर्म राख पर
कुछ भुने सेंके जा सकने की।

अंतस में मौजूद कुंठा, जलन,
प्रतिशोध की आग तो
ठंडी नहीं होती आसानी से।
बरसों, दशकों, सदियों के बाद भी
न मालूम कब
विस्फोटित हो जाती है
बुझते अंगारे से भी।
जितनी बाहर जलती है,
उससे ज्यादा धधकती है भीतर।

बहुत भयावह लगती है
किसी की आँखों में
वहशियत की आग,
प्रतिशोध की चिंगारियाँ।
सच कहूँ तो
बुझी राख सा सर्द चेहरा भी
उतनी ही दहशत भर देता है।

धुआँ
मगर वहीं होता है
जहाँ आग होती है।
वह वर्तमान में होता है।
राख में
केवल इतिहास होता है।
***


2 रंग

कच्चे पक्के
गहरे हल्के
फैले बिखरे हैं पूरी धरती पर
रंग बिरंगी रंग।

हँसी खुशी के
व्यथा, आँसुओं के
इच्छाओं, अभिलाषाओं के
यादों के और ख्वाबों के
उत्साह, उमंगों, रिश्तों के,
प्रेम, समर्पण,
उत्सव के हैं
कितने सारे रंग।

वह मेरा बचपन था
लोरी थप्पी
खेल खिलौने
कपड़ों और किताबों के भी
कितने सुंदर होते थे रंग।
लाड़ दुलार, शिकवे मनुहार,
मित्रों संग धमाचौकड़ी,
असली खुशियों के थे रंग।
बागों के सारे फूलों के,
सारी चिड़ियों के पंखों के,
जाने पहचाने अपने होते थे
धरती पर के सारे रंग।

चाँद सितारों की दुनिया से
सुदूर सुंदर पर्वतमाला से ,
नदियों झरनों,
सागर के भी रंगों से,
फिर मेरी पहचान हुई।

जाना फिर
कैसे हर मौसम में
रंग बदलती है धरती।
आसमान में ढूँढे कितने
नए चमकते और गहराते रंग।

फिर मुझे लुभाने लगा
अचानक से अवतरित होता इंद्रधनुष
आकाश के एक छोर पर,
कभी ठीक बीचों बीच।
उसके दृश्य से अधिक अदृश्य रंग
मेरी सीमाओं और सामर्थ्य को
आह्वान सा देते हुए।
अन्तरिक्ष में उड़ान के लिए
हजारों रंग-बिरंगे पंखों की सामर्थ्य
इन झिलमिलाते
इंद्रधनुषों के ही तो पास थी।

स्वप्नों और संकल्प के आकाश में,
महत्वाकांक्षाओं के फैलाव में,
अनजाने ही जुडते गए
ईर्ष्या और प्रतिस्पर्धा के,
संदेह और स्वार्थ के वीभत्स रंग।
कुछ षड्यंत्रों के
अबूझ रहस्यमयी से रंग।
तेज चौंधियाती रोशनी और
आक्रामक झिलमिल रंगों की गिरफ्त में
कुंठा, बैचेनी, अतृप्ति...

रंगों के विविध
मासूम, सुंदर, निश्छल संसार से,
भड़कीले, आक्रामक, मायावी रंगों के लोक में
गुजरते हुए,
क्या मेरी नियति
किसी ब्लैकहोल में समा जाने की है?
***

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