कहानी: लावनी की आँखें

प्रकाश मनु

प्रकाश मनु


उसका नाम था लावनी। छोटी, बहुत छोटी थी लावनी। होगी कोई सात-आठ बरस की। पर कभी-कभी उसे लगता, भगवान ने उससे सारी खुशियाँ छीन ली हैं। और यह सोचते ही उसका चेहरा उदास हो जाता।...
पर फिर अगले ही पल उसे अम्माँ के लाड़-प्यार की याद आती तो वह धीरे से कहती, “अरे, मैं भी कैसी बुद्धू हूँ।...अम्माँ हैं न! मुझे इतना लाड़ करने वाली अम्माँ। एक पल भी वे मेरे बिना नहीं रह पातीं। तो फिर भला मुझे किस चीज की कमी है?”
फिर वह झटपट अम्माँ के पास जाकर बतियाने लगती। कहती, “अम्माँ, आपने मेरा नाम लावनी क्यों रखा? ऐसा नाम तो मैंने किसी का नहीं सुना। सच्ची, किसी का भी नहीं...!”
“अरे बिटिया, लावनी तो उसे कहते हैं न, जो सुंदर हो।...भला तेरे जैसा सुंदर कोई और है? तो फिर लावनी नाम किसी और का कैसे होता!” अम्माँ हँसकर कहतीं और उसे अपने आँचल में समेट लेतीं।
लावनी का दिल भीतर-भीतर उमगने लगता। कहती, “सचमुच अम्माँ, मैं ऐसी ही हूँ? बहुत सुंदर! पर...पर सहेलियाँ तो...?” और वाक्य पूरा करने से पहले ही उसकी आँखों से टप-टप आँसुओं की बारिश शुरू हो जाती।
*

अम्माँ जानती थीं उसका दुख। उसे प्यार से गोद में बैठाकर सिर पर प्यार से हाथ फेरने लगतीं। फिर धीरे से कहतीं—
“पगली, रोती है? तेरे पास भला क्या नहीं है। बस आँखें ही तो नहीं हैं न! पर इससे क्या होता है? तेरे पास मन की आँखें जो हैं। कैसी उज्ज्वल आँखें, मोती जैसी। दीए जैसी। उनमें सारी दुनिया के लिए प्यार है।...इतनी सुंदर आँखें भगवान ने तुझे दी हैं तो फिर रोती क्यों है? और फिर कितना सुंदर तू गाती है, ‘रामचंद्र, कृपालु भज मन... !’ भला कोई गा सकता है और...?”
फिर एक पल रुककर उसका माथा चुमकारते हुए कहतीं, “उस दिन मुरली बाबा कितनी तारीफ कर रहे थे तेरी, कि लावनी, तू गाती है तो लगता है, भगवान रामचंद्र जी सीता मैया और लछमन जी के साथ सामने आ खड़े हुए हैं, हाथ में धनुष-बाण लिए। एकदम साकार दिखाई देने लगते हैं।...कितनी सच्ची बात! सच, मुझे भी ऐसा ही लगता है लावनी। तू गाती है तो...समझो, बिल्कुल समाधि लग जाती है।”
अम्माँ की बातों से लावनी को कुछ तसल्ली मिलती तो वह कहती, “अम्माँ, आपने उस दिन आधी कहानी ही सुनाई थी न, कि कैसे सीता जी के खो जाने पर वन में भटकते हुए राम और लक्ष्मण जी को हनुमान जी मिल गए और वे सुग्रीव के पास पहुँचे। आज आगे की कथा सुनाओ न कि कैसे वानर सेना के साथ लंका पर चढ़ाई...! और हाँ अम्माँ, समुद्र पर बाँध कैसे बनाया उन्होंने? समुद्र तो बहुत बड़ा होता है न, बहुत बड़ा...! क्यों अम्माँ?”
सुनकर अम्माँ भाव-विह्वल हो जातीं, “सुनाऊँगी बेटी, जरूर सुनाऊँगी रामचंद्र जी और सीता मैया की कहानी। क्यों न सुनाऊँगी?...पर पहले रसोई का थोड़ा काम निबटा लूँ, फिर आती हूँ। दीवाली आ रही है, तो घर में एकाध मीठा पकवान तो बनना चाहिए न। तेरे लिए खोए के लड्डू बना लेती हूँ। तब तक तू एकाध मीरा का पद गा न!...मैं वहीं रसोई में बैठी-बैठी सुनती रहूँगी।”
और माँ के जाते ही लावनी गुन-सुन करके धीरे-धीरे गाने लगती, “पायो री, मैंने राम रतन धन पायो री...!”
गाते-गाते स्वर बँध जाता, और लावनी किसी और ही दुनिया में पहुँच जाती, जहाँ वह अकेली थी। एकदम अकेली, और चारों ओर प्रकाश ही प्रकाश...! किसी दिव्य आलोक का लहराता हुआ पूरा एक समंदर...!! और धीरे-धीरे वह किसी पहाड़ के ऊँचे शिखरों पर चढ़ती जा रही थी, चढ़ती ही जा रही थी—
वस्तु अमोलिक, दी मेरे सतगुरु, किरपा करि अपनायो,
जनम जनम की पूँजी पाई, जग में सभी खोवायो।
खरच न खूटै जाको चोर न लूटै, दिन-दिन बढ़त सवायो,
सत की नाव...खेवटिया सतगुरु...
सत की नाव...खेवटिया सतगुरु...
सत की नाव...सत की नाव...सत की नाव...!
यहाँ तक आते-आते लावनी के भीतर-बाहर ऐसा आनंद उमगने लगता कि उसके होंठों पर नाचते शब्द किसी अछोर समंदर पर तिरती नाव बन, जोर-जोर से हिचकाले खाने लगते। मानो और आगे वह बढ़ना ही नहीं चाहती।...किसी ने आशा और प्रेम के मोटे-मोटे रस्सों ने उसकी नाव को बाँध लिया है...
रसोई में मीठे पकवान बनाती अम्माँ का दिल कभी खुशी से उमगता तो कभी अचानक डूबने लगता, ‘हे राम, कितनी लंबी जिंदगी है। भला कैसे काटेगी लावनी? जिनके पास आँखें हैं, वे भला क्या समझेंगे कि आँखों के बगैर जिंदगी कितनी अँधेरी है, कितनी स्याह...!’
उधर लावनी अपनी ही दुनिया में खोई हुई थी। अँधेरे, अँधेरे और बस अँधेरे के भीतर एक छोटा सा उजाले का टापू वहाँ उभर आया था। और सतगुरु की दी हुई नाव भी, जो कभी समंदर को चीरती तो कभी सीधा पहाड़ पर चढ़ जाती—
सत की नाव, खेवटिया सतगुरु...
सत की नाव, खेवटिया सतगुरु...
सत की नाव, खेवटिया सतगुरु, भवसागर तर आयो।...
अम्माँ का मन भी लावनी के सुरों के साथ नाच रहा था। कभी खुशी से उमगने लगता, तो अगले ही पल दुख से भीगता...और आँखें आँसुओं से भर जातीं।
ओह, लावनी की सहेलियाँ किस तरह बातों-बातों में उसका मजाक उड़ाती हैं, यह तो खुद उन्होंने भी देखा-सुना है। बेचारी छोटी-सी लावनी कैसे यह सब सह पाती होगी? सोचकर उनकी आँखें फिर से गीली हो गईं। पर उन्होंने चुपके से पोंछ लिया और ध्यान से सुनने लगीं लावनी के सुरीले बोल...
मीरा के प्रभु...मीरा के प्रभु...
मीरा के प्रभु गिरिधर नागर, हरष-हरष जस गायो...
पायो री, मैंने राम रतन धन पायो...
पायो री मैंने...!
“अहा, गला कितना मीठा है लावनी का!...मुरली बाबा यों ही कोई प्रशंसा थोड़े ही करते हैं। बेलापुर कसबे के सबसे पुराने और नामी गायक हैं मुरली बाबा। अभी कल ही उन्होंने किस कदर तारीफ की थी कि लावनी का गाना दो मिनट भी सुन लो तो लगता है, सचमुच प्रभु जी से दिल का सुर मिल गया।” सोचते हुए अम्माँ बेटी पर जैसे रीझ-सी गईं।
*

पर लावनी को तो जरा भी चैन नहीं।...
अम्माँ जानती थीं, कि उसके भीतर रात-दिन कौन-सा दर्द, कौन-सी ज्वाला जलती है। कुछ बरस पहले चेचक के कारण लावनी की दोनों आँखें चली गई थीं। और लावनी की जिंदगी में अँधेरा, एकदम अँधेरा हो गया था।
पड़ोस के रामेसुर काका समेत बहुत लोग कहते हैं, अगर सही इलाज होता और समय पर होता, तो उसकी आँखें बच सकती थीं। पर भला कहाँ से इतने पैसे लातीं गायत्री अम्माँ...?
आँखें चली जाने से लावनी पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा। पर इससे भी ज्यादा दुख उसे इस बात का था कि उसकी पढ़ाई अधबीच ही खत्म हो गई थी। आँखों के चले जाने से लावनी उतनी नहीं रोई, जितना उसे यह सोच-सोचकर रोना आ रहा था कि अब वह नहीं पढ़ पाएगी। यानी सारी जिंदगी भर के लिए अनपढ़, गँवार...!
वह बहुत रोई, बहुत।...
अम्माँ ने लावनी की हालत देखी तो भीतर ही भीतर उनकी भी रुलाई छूट गई। फिर किसी तरह खुद को सँभालकर बोलीं, “रोती क्यों है बेटी, मैं पढ़ाऊँगी न!”
अम्माँ कक्षा छह तक पढ़ी थीं, लेकिन घर पर किताबें पढ़-पढ़कर उन्होंने काफी अध्ययन किया था। हिंदी, अंग्रेजी, गणित, सामाजिक विज्ञान सभी कुछ। यहाँ तक कि थोड़ी-सी संस्कृत भी। पर मुश्किल यह थी कि भला वे लावनी को पढ़ाएँ कैसे?
बहुत छोटा-सा कसबा था बेलापुर, वहाँ कोई स्कूल नहीं था। पर अम्माँ ने कोशिश करके उसे पढ़ाने का नया तरीका खोज लिया। वे लावनी को सूर, कबीर, तुलसी और मीरा के सुंदर-सुंदर पद, गीत और चौपाइयाँ सुनातीं। कुछ अच्छे भजन भी उन्होंने याद करा दिए थे।
लावनी उन्हें गाती, तो उसके स्वरों का कंपन हवाओं में भर जाता।
अम्माँ को लगता, जो कुछ उन्होंने बेटी को सिखाया था, सारी दिशाएँ उसे याद कर-कर के लौटा रही हैं।
हर्ष से उनकी छाती फूलने लगती।
वे लावनी को रामायण और महाभारत की कथाएँ सुनातीं, कविताएँ याद करातीं। उसे बातों-बातों में जमाने भर के बारे में बतातीं।
सुनकर लावनी उत्साह से भर जाती। सोचती, ‘मैं भी पढ़-लिखकर कुछ बनूँगी। मैं भी खूब पढ़-लिखकर नाम कमाऊँगी और...!’
फिर थोड़ी देर बाद उसे उदासी घेर लेती, ‘इससे फायदा...? इससे तो मैं दिन में दो पैसे भी नहीं कमा सकूँगी। तो फिर...?’
असल में जब से पिता गुजरे हैं, लावनी के भीतर रह-रहकर एक ही बात घुमड़ती है कि काश, मैं माँ का सहारा बन पाती। उन्होंने जिंदगी भर बहुत मेहनत की है। अब अगर उन्हें आराम मिल पाता, तो कितना अच्छा था। पर यह हो कैसे...? मैं क्या करूँ, क्या? ऐसा कौन-सा काम, जिससे माँ को थोड़ा आराम मिले...?
फिर एक दिन लावनी को मुरली बाबा ने आकर बताया कि बेलापुर में संगीत की दुनिया के महान गुरु राघवाचार्य जी आ रहे हैं।
“वे कुछ दिन यहीं बेलापुर में रहेंगे बेटी, और बच्चों को संगीत की सिच्छा देंगे। इसके लिए जमींदार साहब ने अपनी हवेली खाली कर दी है। और...और अब वहाँ रोज संगीत के सुर उठेंगे। मेरा तो मन है, बेटी, तू भी एक बार वहाँ जरूर हो आ। चल, मैं भी साथ चलता हूँ। शायद...शायद तेरा सोया भाग जाग जाए...!” मुरली बाबा अपनी धुन में कहते जा रहे थे।
सुनकर उसे लगा कि उसके भीतर कोई है, जो पुकार-पुकारकर कह रहा है कि लावनी, अब तेरे दुख कटेंगे, जल्दी...!
*

राघवाचार्य जी कोई मामूली आदमी नहीं थे। उन्हें बेलापुर और आसपास के लोग ‘दूसरा गाँधी’ कहकर पुकारते थे। दूर-दूर तक उनका नाम छाया हुआ था। उनका संगीत धरती का संगीत था, जो लोगों के दिलों में कुछ करने की प्रेरणा जगा देता। इसी कारण लाखों लोग उन्हें गायकाचार्य राघव के नाम से भी याद करते थे।
लावनी को मालूम पड़ा कि राघवाचार्य जी के स्वागत में बेलापुर में कार्यक्रम होना है। सब ओर उसकी तैयारियाँ हो रही हैं। पूरे बेलापुर में उत्साह की एक लहर दौड़ गई थी।
उसी रात अम्माँ ने लावनी को राघवाचार्य जी की पूरी जीवन-कथा सुनाई। उन्होंने बताया कि बिटिया, स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने के कारण राघवाचार्य जी ने बहुत कष्ट झेले हैं। गाँधी जी के साथ रहकर उन्होंने देश की स्वाधीनता के लिए अलख जगाया।...
“अच्छी-खासी आराम की सरकारी नौकरी थी, ऊँचे अफसर थे। बड़ी सी कोठी, खूब नौकर-चाकर। क्या नहीं था उनके पास...? कहीं कोई मुश्किल नहीं। पर गाँधी जी के आह्वान पर उसे लात मारकर अब दर-दर भटक रहे हैं। और मन में जरा भी मलाल, जरा भी पछतावा नहीं। ऐसे होते हैं बेटी, सच्चे लोग...!”
आगे अम्माँ ने बताया कि “अभी कुछ ही रोज पहले ही राघवाचार्य जी ने पूना में बच्चों को संगीत सिखाने का स्कूल खोला और अपना पूरा जीवन इसी के लिए समर्पित कर दिया। बड़ा अनोखा स्कूल है, जिसमें बच्चे संगीत के साथ-साथ देशभक्ति का पाठ पढ़ते हैं। उसमें देश भर से बच्चे पढ़ने आते हैं। और अब तो सुनते हैं, यहाँ भी वैसा ही एक संगीत विद्यालय...!”
“तब तो अम्माँ, वे मुझे भी संगीत सिखा सकते हैं। वे सिखाएँगे न अम्माँ, मुझे भी?” लावनी ने माँ का हाथ पकड़कर झिंझोड़ दिया।
“यह...मैं क्या जानूँ, बेटी? पर आएँगे तो मैं कहूँगी!” अम्माँ ने कुछ टालने के लिहाज से कहा।
असल में लावनी इतनी व्यग्र हो रही थी कि उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि वे क्या कहें, जिससे उसके मन को तसल्ली हो।
फिर कुछ सोचकर अम्माँ बोलीं, “बेटी, अगर मैंने कहा और वे मान भी गए, तो क्या फायदा? अच्छा तो यह है कि तू खुद कह। सुना है कि वे बच्चों को खूब प्यार करते हैं और उनकी कोई बात नहीं टालते। अच्छा तो तब है कि तू उनके पास जाए, तो वे खुद-खुद तेरे संगीत पर रीझ जाएँ और...!”
लावनी ने सुना तो जैसे उसकी आत्मा के भीतर कोई प्रकाश-सा हुआ। उसे लगा कि अगर जीवन में कुछ करना, कुछ बनना है, तो उसके लिए यही सही समय है।
और सचमुच अगले दिन मुरली बाबा के साथ लावनी राघवाचार्य जी के पास जा पहुँची। एकदम डरते-डरते!...गई और पास जाकर खड़ी हो गई। चुपचाप उनकी ओर देखने लगी।
बिना आँखों के वह देखना था। पर कितना गहरा...
लावनी देखती रही, देखती रही।...उसके मुँह से कुछ बोल निकले ही नहीं।
जैसे राघवाचार्य जी की एक मूर्ति उसके मन में बन रही हो, और वह अँधेरे में उँगलियाँ टटोलते हुए, धीरे-धीरे उन्हें पहचान पा रही हो...
राघवाचार्य जी ने बड़े कौतुक से लावनी को देखा, फिर बोले, “मुझे लग रहा है बेटी, तुझमें कुछ खास बात है।...क्या? यह तो मैं नहीं कह सकता, पर...कुछ है जरूर। तेरा माथा प्रकाशित है, एक अलग-सी जोत...बिल्कुल अलग सी जोत है तेरे माथे पर...! मैं भूल नहीं कर सकता बेटी, मैंने पहचान लिया है तुझे...पहचान लिया...!”
कुछ देर बाद राघवाचार्य जी बोले, “तू अच्छा गाती है न! मेरा मन कहता है, तू जरूर गाती होगी। सुना, अपनी पसंद का कोई गीत सुना दे।”
लावनी को एक गीत आता था, ‘श्रीरामचंद्र कृपालु भज मन...!’ उसने धीरे से उसी की तान छेड़ दी—

श्री रामचंद्र कृपालु भजु मन, हरण भवभय दारुणम्,
नवकंज-लोचन, कंज-मुख, कर कंज, पद कंजारुणम्।
कंदर्प अगणित अमित छबि, नवनील-नीरद सुंदरम्,
पट पीत मानहु तड़ित रुचि शुचि नौमि जनक-सुतावरम्।...
श्री रामचंद्र कृपालु भजु मन,
रामचंद्र कृपालु...
सुनकर राघवाचार्य की आँखें मुँद गईं, मुँदती चली गईं।...अहा, कैसा दिव्यत्व है लावनी के सुरों में...!
उधर लावनी के अंतर्मन में कुछ प्रकाश सा हुआ...
उसे महसूस हो रहा था, कि राघवाचार्य जी की आँखें बंद हैं, और सिर किसी अलौकिक आनंद के झकोरों से हिल रहा है। जैसे वे इस धरती पर नहीं, कहीं और हैं।
उसे यह अच्छा लगा, बहुत अच्छा लगा।...वह और डूब गई, और फिर डूबती ही चली गई।
अब यह लावनी नहीं, कोई और ही लावनी थी, जो गा रही थी। गा रही थी, और अंदर से उमग रही थी।
देह की कोई सुध-बुध उसे नहीं रह गई थी। वह तो बस गा रही थी। भीतर से उमग-उमगकर गा रही थी—
भजु दीनबंधु दिनेश दानव-दैत्य-वंश-निकंदनम्,
रघुनंद आनँदकंद कोसलचंद दशरथ-नंदनम्।
सिर मुकुट कुंडल, तिलक चारु, उदारु अंग विभूषणम्,
आजानुभुज शर-चाप-धर, संग्राम-जित-खर-दूषणम्।...
और अब आखिरी मोड़ पर थी वह, जहाँ से शिखर आना था, और लावनी थी कि पूरी तरह रामचंद्रमय हो गई थी। उसके सुर अब दिशा-दिशा में उमगने लगे थे। जैसे वे फैलकर दसों दिशाओं में छा जाएँगे--
इति वदति तुलसीदास, शंकर-शेष-मुनि-मन रंजनम्,
मम् हृदय-कंज-निवास कुरु...
मम् हृदय-कंज-निवास कुरु...
मम् हृदय-कंज...
मम् हृदय-कंज...
मम् हृदय-कंज-निवास कुरु...
कामादि खल-दल-गंजनम्।...
मम् हृदय-कंज-निवास कुरु, कामादि खल-दल-गंजनम्।...
गाते-गाते लावनी सम पर आई, तो उसे अपने सब ओर आनंद ही आनंद उमगता नजर आया। आनंद का एक अपरंपार समंदर। और राघवाचार्य जी...? वे अब कहाँ थे? वे भी तो इसी आनंद में गुम हो गए थे।
कुछ देर बाद उनकी समाधि टूटी, तो वे लावनी के सिर पर हाथ फेरने लगे। हाथ फेरते जाते और कहते जाते कि “देख, मैंने कहा था न, कहा था न!”
लावनी हैरान, यह क्या हुआ राघवाचार्य जी को? उसे कुछ भी ठीक-ठीक समझ में नहीं आ रहा था।
*

और उस दिन से लावनी की पढ़ाई शुरू हुई। राघवाचार्य जी के स्कूल में मिलने वाली संगीत शिक्षा ने उसके स्वर को निखारा।
राघवाचार्य जी एक साथ ही बड़े मृदुल और कठोर शिक्षक थे। उन्होंने बार-बार गाने का अभ्यास कराकर, उसके सुरों को माँजा और अधिक पूर्णता दी। स्वर में समुद्र की सी गहराई और विस्तार कैसे लाते हैं, उन्होंने समझाया। साथ ही किसी पद को गाते हुए अनायास स्वर को चढ़ाना और उतारना कैसे है, फिर कैसे सम पर लाना है, यह भी सिखाया। उसके दोष और कमियों को बताकर सतर्क किया, तो अच्छा गाने पर पीठ भी थपथपाई।
इसके साथ ही उन्होंने लावनी को प्राचीन राग-रागिनियों की शिक्षा दी। हर राग, रागिनी की बारीकियों से तो परिचित कराया ही, बीच-बीच में साथ गाकर उन्होंने गाग-रागिनियों के शुद्ध गायन के लिए भी प्रेरित किया।
गाने के साथ-साथ राघवाचार्य जी ने लावनी को वाद्ययंत्रों का भी अभ्यास कराया। होते-होते सारंगी और तानपूरे में तो वह बहुत ही निपुण हो गई। रावणहत्था और जलतरंग भी उसने सीख लिया।
रोज सुबह चार बजे उठकर, वह उनके अभ्यास में जुट जाती, और फिर समय का उसे कुछ होश न रहता।
समय देवता भी जैसे हाथ जोड़े उस कमरे के द्वार पर बैठा रहता, जहाँ लावनी अभ्यास कर रही होती। ताकि लावनी के सुर विश्राम लें, तो वह आगे बढ़े।
राघवाचार्य जी अद्भुत गायक थे और उतने ही बड़े संगीताचार्य भी। जीवन में पहली बार उन्हें कोई ऐसा शिष्य मिला था, जिसके भीतर सीखने की अनंत उत्कंठा थी, जो कहीं रुकना ही नहीं चाहती थी। राघवाचार्य जी जो भी एक बार सिखा देते, वह लावनी के भीतर उतर जाता। और फिर जब वह उसका अभ्यास करती तो लगता, जैसे उसकी समाधि लग गई हो। उसके भीतर-बाहर आनंद की बरखा होने लगी। 
धीरे-धीरे वह इतना अच्छा गाने लगी कि दूर-दूर तक मशहूर हो गई। लोग कहते, “एक अंधी गायिका है। बड़ा ही अनोखा गाती है। स्वर ऐसा मधुर, जैसे कहीं मुरली बज रही हो।...जब वह गाती है, तो पत्थर भी पिघलने लगते हैं!”
रोज पौ फटते ही आसपास के गली-मुहल्लों में अकसर उसके गानों की आवाज आती। उसके स्वर में दर्द था...! ऐसा दर्द, मानो आसमान पिघल रहा हो। पर साथ ही ताजे बने गुड़ जैसी मिठास भी, जो दिल को सुकून देती थी। आत्मा उससे तृप्त होती।
पूरे बेलापुर में उसके गाने की गूँजें-अनगूँजें फैलने लगतीं। लोग एक-दूसरे से कहते, “देखो-देखो, लावनी गा रही है। सुनते हो उसके गीतों की आवाज...? ऐसा भला और कौन गा सकता है?”
धीरे-धीरे लावनी इतनी मशहूर हो गई कि दूर-दूर से लोग उसका गायन सुनने के लिए आते। लावनी की तारीफ सुनकर राघवाचार्य जी का मन भी पुलकित हो उठता। मन ही मन कहते, ‘मेरी यह शिष्या मुझसे भी आगे निकल जाए तो मुझे सच्ची खुशी होगी।...’
एक दिन राघवाचार्य जी ने लावनी को बुलाया और कहा, “आज तेरी परीक्षा है। बस, तुझे गाना है, गाते जाना है। जो तेरा सर्वश्रेष्ठ है, मैं सुनना चाहता हूँ।”
लावनी के सामने अब तक लोगों के सामने गाने के तो मौके आए थे, पर अब तो उसे गुरु के आगे गाना था। ऐसे गुरु के आगे, जिनके पोर-पोर में संगीत बसा था। तभी तो उन्होंने राह में पड़े मिट्टी के एक ढेले को उठाकर, उसे हीरे सा चमका दिया था।
वे उसके लिए भगवान से कम न थे।...
लावनी सोच नहीं पा रही थी कि वह क्या गाए? वह कुछ ऐसा गाना चाहती थी, जिसमें उसके भीतर का परिपूर्ण और कृतज्ञ संगीतकार निकलकर सामने आ जाए। और वह विनत और श्रद्धाभिभूत होकर, गुरु चरणों के आगे निवेदित हो।
वह असमंजस में थी। पर तभी, जैसे कुहासा फटता है, अचानक उसके भीतर से एक प्रेमपगा सा, गहरा-गहरा फूट पड़ा— 
प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी...!
जैसे अंग-अंग बास समानी,
प्रभु जी...
और बस, फिर उसे कुछ होश न रहा। जैसे वह धरती से ऊपर उठ गई हो, और निरंतर ऊपर ही उठती जा रही हो।
होते-होते वह वहाँ पहुँच गई, जहाँ चारों ओर से प्रकाश वलयों ने उसे घेरा हुआ था, और उसकी अंधी आँखों से एकाएक अनंत प्रकाश फूट पड़ा था—
“तुम चंदन हम पानी...! तुम चंदन हम पानी....!! तुम चंदन...तुम चंदन...तुम चंदन...तुम चंदन...तुम चंदन हम पानी, जाके अंग-अंग बास समानी...प्रभु, जी, तुम चंदन, हम पानी...!”
वह गा रही थी, गा रही थी, और बस गा रही थी।...गाते-गाते वह मानो पूरी तरह सुध-बुध भूल गई।...और उसे यह भी याद नहीं रहा कि वह गा रही है...
उसे तो बस इतना याद था कि वह सीढ़ी-दर-सीढ़ी ऊपर चढ़ रही है और चढ़ते-चढ़ते वहाँ आ गई है, जहाँ आगे कोई सीढ़ी नहीं थी...एक शिखर, बस, एक ऊँचा-ऊँचा सा आलोकित शिखर सामने था...!
राममय शिखर...! कृष्णमय शिखर...!
शिवत्वमय शिखर...
प्रेममय शिखर...सौंदर्यमय शिखर...सृष्टिमय शिखर...!!
और वहाँ पहुँचकर वह भूल गई थी कि वह लावनी ही है, या कोई और ही संगीतमय आत्मा।...
यही हालत राघवाचार्य जी की भी थी। उन्हें लगा, वे लावनी का गायन नहीं सुन रहे, बल्कि ईश्वर से उनकी सीधी लौ लग गई है। वे जान गए, लावनी अब समय के सर्वश्रेष्ठ गायकों में से है। उसमें कोई कोर-कसर नहीं है।
मगन होकर राघवाचार्य जी ने कहा, “लावनी बिटिया, अब तू हो गई अपने में पूर्ण गायिका। भीतर-बाहर से पूर्ण...! कोई तेरे गायन पर कहीं उँगली नहीं रख सकता। अब किसी भी बड़ी से बड़ी सभा में तू निडर होकर गा सकती है। तू जहाँ भी गाएगी, वहीं संगीत का झरना बह उठेगा।...”
*

और कुछ दिनों बाद ही ऐसा अवसर भी आ गया।
सारे देश में आजादी का अलख जगाते घूम रहे महात्मा गाँधी बेलापुर में भी आए। बापू के सम्मान में गुरु राघवाचार्य जी ने एक बड़े सम्मेलन का आयोजन किया था।
दूर-दूर से लोग वहाँ आए। हजारों लोगों की भीड़। उनमें गाँव के अनपढ़ देहाती थे तो शहर के पढ़े-लिखे वकील, अध्यापक और दूसरे लोग भी। हर कोई बापू की एक झलक देख लेना चाहता था।
मंच पर बापू के साथ-साथ राघवाचार्य भी मौजूद थे। लोग प्रतीक्षा में थे, भला गाँधी जी क्या कहते हैं? देशवासियों का कैसा उदात्त आह्वान...!
राघवाचार्य जी ने जब गाँधी जी से कुछ शब्द कहने का अनुरोध किया, तो उन्होंने हँसते हुए कहा, “मैं भाषण तब दूँगा, जब आप...‘वैष्णव जन तो तेणे कहिए रे, जे पीर पराई जाणे रे’ वाला गीत मुझे सुनाएँगे।”
राघवाचार्य जी विनम्रता से बोले, “वैष्णव जन वाला गीत तो आप सुनेंगे बापू, पर वह मैं नहीं, मेरी शिष्या लावनी सुनाएगी। और यकीन मानिए, वह मुझसे ज्यादा अच्छा गाती है।”
“अच्छा...!” बापू चकित, “कहाँ है आपकी शिष्या...?”
“वह यहीं है बापू!” राघवाचार्य जी ने मुसकराते हुए कहा। फिर लावनी को गीत सुनाने का संकेत दिया उन्होंने!
सभा में हजारों लोगों की भीड़ थी।...लावनी सिर्फ दूर-दूर से आते स्वर और आवाजों से ही अंदाजा लगा पा रही थी कि कितनी विशाल सभा है।...क्या सच ही इस सभा में वह गाएगी...? गा पाएगी...?
उसने डरते-डरते गाना शुरू किया नरसी मेहता का अमर गीत, जो गाँधी जी के साथ-साथ अब लाखों दिलों में बसता था, ‘वैष्णव जन तो तेणे कहिए रे, जे पीर पराई जाणे रे...!’
पर गाना शुरू करते ही उसे लगा, उसके अंदर कोई अनोखी शक्ति आ गई है, जो कह रही है, ‘लावनी, तुझे डरना-झिझकना नहीं है। मुरली बाबा का आशीर्वाद तेरे साथ है। गुरु राघवाचार्य जी ने कितनी आशा से तुझे गाने के लिए भेजा है।...देख, हिम्मत मत हारना। आज तुझे अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना है।’
और लावनी ने गाना शुरू किया, तो लगा उसके स्वरों का जादू देखते ही देखते फैलकर हजारों लोगों के मन-प्राणों को भिगो रहा है। पूरी सभा जैसे आनंद-विभोर थी। सचमुच संगीत का झरना बह उठा था—
वैष्णव जन तो तेणे कहिए, जे पीड पराई जाणे रे,
पर दु:खे उपकार करे, तोये मन अभिमान न आणे रे।
सकल लोकमाँ सहुने वंदे, निंदा न करे केनी रे,
वाच काछ मन निश्चल राखे, धन-धन जननी तेनी रे।
धन-धन जननी...धन-धन जननी...
धन-धन जननी तेनी रे...!
वैष्णव जन तो तेणे कहिए...
जितनी देर लावनी गाती रही, लग रहा था, सब पर किसी ने मंत्र से जादू कर दिया है। किसी के हिलने और साँस लेने की भी आवाज नहीं आ रही थी। एक छोटी सी बच्ची ने सबको मुग्ध कर दिया था।
सभा में उपस्थित हजारों लोग इस तरह सुन रहे थे, जैसे लावनी के सुरों में सबको अपने दिल का संगीत सुनाई दे रहा हो।
जब लावनी पूरा गीत गाकर रुकी, तो गुरु जी ने इशारा किया और अब लावनी गा रही थी, ‘श्रीरामचंद्र कृपालु भज मन...’ और उसके फौरन बाद, ‘वंदे मातरम्....!’
*

पूरी सभा जैसे लावनी के गीत के सुरों पर बह रही थी। बस, बहती जा रही थी, बिना यह जाने कि कितना समय बीत गया।
और मंच के बीच में बापू। जैसे एकदम समाधि लग गई हो। बीच-बीच में आनंदमग्न होकर धीरे-धीरे सिर हिलाने लगते। लग रहा था, बापू आज बोलने नहीं, बस सुनने ही आए हैं।
वंदेमातरम के बाद राघवाचार्य जी ने फिर बापू से कुछ बोलने का आग्रह किया। कहा, “बापू, यहाँ दूर-दूर से लोग आपको सुनने आए हैं। पता नहीं, कब से इंतजार था कि बापू आएँगे...बापू आएँगे...आकर देश की स्वाधीनता के लिए काम करने का मंत्र देंगे। उम्मीद है, हम सबकी भावनाएँ आप तक पहुँच गई होंगी।...अब आप आइए, और हम सबको काम करने की सही राह सुझाइए...!”
सुनकर बापू उठे। फिर धीरे से बोलना शुरू किया, “सभा में आए भाई-बहनो, मैं तो कुछ और ही सोचकर आया था। पर इस छोटी सी बच्ची के गायन ने वह सब भुला ही दिया।...”
कहते-कहते बापू कुछ देर के लिए रुके। जैसे उनके भीतर कोई गहरी हलचल मच गई हो, जिसे वे सँभाल न पा रहे हों। फिर अपनी भावनाओं पर काबू पाकर उन्होंने कहा—
“सच बताऊँ तो मुझे लग रहा था, मानो मेरे सामने साक्षात सरस्वती ही बैठी हुई गा रही है।...वैष्णव जन में सबके लिए प्यार और हमदर्दी की भावना है तो ‘श्रीरामचंद्र कृपालु भज मन’ सुनकर मन उन रामचंद्र जी की शरण में चला जाता है, जो हर किसी को हिम्मत और हौसला देते हैं। और जब वंदे मातरम् गा रही थी यह बच्ची तो मुझे लग रहा था, हमारी मातृभूमि भी तो जगजननी सीता ही है, जो आज कष्टों में है।...सीता का उद्धार हुए बिना भला हमारे दिलों को चैन कहाँ पड़ेगा?...
“कितना कमाल है कि भक्ति, परोपकार और देशप्रेम ये तीनों सुर इस छोटी-सी बच्ची लावनी के संगीत में ढलकर एक हो गए। बच्ची तो छोटी सी है पर इसके सुर बड़े हैं, अगाध समुद्र की तरह, जिसकी हम सब मिलकर भी थाह नहीं ले सकते।...मेरा आशीर्वाद है कि लावनी बड़ी होकर अपने गुरु राघवाचार्य जी की तरह ही बड़ी संगीतकार बने। देश के लिए गाए और हजारों लाखों दिलों को प्रकाशित करे।...”
और लावनी...! बापू जब बोल रहे थे, तो उसे लगा कि उसके दिल में सचमुच राम-सीता आकर बस गए हैं और उनके चारों ओर अनगिनत दीए झिलमल-झिलमिल करते हुए प्रकाश बिखेर रहे हैं।
‘अरे, मैं तो देख ही नहीं सकती, फिर...यह कैसा जादू हो गया?’ उसने हैरान होकर अपने आप से कहा।
“उठो बेटी, देखो बापू तुम्हें आशीर्वाद दे रहे हैं।” गुरु राघवाचार्य की आवाज सुनकर लावनी उठ खड़ी हुई। बापू पास खड़े उसी से कह रहे थे, “आँखें नहीं हैं, तो दुखी मत होना बेटी। दो आँखें नहीं हैं तो क्या हुआ? तुम्हारे भीतर झिलमल-झिलमल करते इतने सारे दीए तुम्हारी हजारों आँखें ही तो हैं, जो तुम्हें रास्ता दिखाएँगी और कभी भटकने नहीं देंगी।”
लावनी के दोनों हाथ जुड़ गए, और सिर बापू के आगे झुका, तो पता नहीं, कब उसकी आँखों से दो आँसू टपके और बापू के पैरों पर आ गिरे।
*

थोड़ी देर बाद लावनी की माँ भी वहाँ आईं तो बापू ने कहा, “तुम्हारी बेटी बड़ी सुंदर है, बहुत सुंदर। तुमने लावनी नाम इसका बिल्कुल ठीक रखा। यह सचमुच लावण्यवती है। जिसका मन सुंदर हो, वही इतना सुंदर गा सकती है कि सबके दिलों में झिलमिल दीए जल जाएँ।”
कुछ देर बाद लावनी अम्माँ के साथ वापस लौट रही थी, तो उसके भीतर खुशी समा नहीं रही थी। बोली, “अम्माँ, अब तो बापू का आशीर्वाद मिल गया। अब तो लगता है, मैं जरूर अच्छी गायिका बन जाऊँगी। बड़ी होकर मैं बहुत गाऊँगी अम्माँ, बहुत...!”
“हाँ बेटी गाना, जरूर गाना।” बेटी को खुश देखकर अम्माँ की खुशी का भी कोई ओर-छोर नहीं था।
“और अम्माँ, तुम कह रही थी, दीवाली आने वाली है। दीवाली कब है माँ?”
“दीवाली तो तीन दिन बाद है बेटी। पर मेरी दीवाली तो आज ही है बेटी, जब तुझे इतना खुश देखा है। मैं तो आज ही दीए जलाऊँगी।” अम्मा बेटी पर निहाल हो रही थीं।
लावनी खुश होकर बोली, “जलाना माँ, और मैं उन्हें देख लूँगी। मुझे लगता है, मैं उन्हें अपने अंदर देख लूँगी और लगेगा, मैं भी दीवाली मना रही हूँ।”
लावनी जब यह कह रही थी, अम्माँ ने मन ही मन उसकी बलैयाँ लेते हुए कहा, “ऐसी बेटी तो भगवान सबको दे, जिसकी बातों से दीए जलते हैं।”
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प्रकाश मनु, 545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008,
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