प्रकाश मनु से पहली भेंट यानी कुक्कू के घर की तीर्थ-यात्रा

अशोक बैरागी

संस्मरण: अशोक बैरागी

साहित्यकार समाज का एक अति आवश्यक अंग हैं और वह अनुभूति के स्तर पर अन्य सामाजिकों से अधिक सजग होता है। साहित्यकारों से मिलकर बातें करना और जीवनानुभवों को साझा करना मुझे अलौकिक आनंद की अनुभूति कराता है। पर बहुत कम लेखक ऐसे हैं जो पहली बार में ही दिलो-दिमाग में छा जाते हैं। छा ही नहीं जाते, बल्कि हमेशा-हमेशा के लिए हृदय में बस जाते हैं। और मैं उनके साथ बहने लगता हूँ। यह बहना आज तक जारी है। सच तो यह है कि यह मेरे बस में ही नहीं है। उनका साथ सावन की पहली बारिश-सा सुखद आनंदित करने वाला अहसास देता है। उनका साथ पाकर मन गौरवान्वित महसूस करता है। ऐसे ही मेरे साहित्यिक आदर्श हैं, वरिष्ठ बाल साहित्यकार डॉ. प्रकाश मनु जी।
मैं आपको प्रकाश मनु जी के साथ कुक्कू के घर की यात्रा भी कराऊँगा। बस आपको मेरे साथ चलना होगा! तो चलिए, बात शुरू करें।...हुआ यों कि मैं ‘साहित्य अमृत’ में आदरणीय मनु जी का ही आलेख पढ़ रहा था। तभी पास आकर मेरे छोटे बेटे यश ने कहा, “पापा, ये प्रकाश मनु जी बलदेव वंशी के भाई हैं?” मैंने कहा, “नहीं, क्यों...?” “ये भी फरीदाबाद में रहते हैं।” बेटे ने कहा। “हाँ, फरीदाबाद में तो रहते हैं, पर उनके भाई नहीं हैं।” इस पर बेटे ने अगला प्रश्न तुरंत मेरी ओर फेंका, “आप इनसे क्यों नहीं मिले?”
अब मैं क्या कहूँ? मैंने थोड़ा रुककर उसे समझाया कि, “इनसे मेरी जान-पहचान नहीं है, न कभी बताचीत हुई।”

प्रकाश मनु
यश तुरंत उठा और अपने थैले से अपनी पहली कक्षा की हिंदी की पाठ्य पुस्तक निकाल लाया। उसमें छपी ‘चिट्ठी’ कविता मुझे सुनाई। फिर कहा, “जानते हो पापा, यह भी प्रकाश मनु की कविता है।” मैंने देखा, वास्तव में वह प्रकाश मनु जी की ही लिखी कविता थी। 
बेटे से फिर जिज्ञासा से पूछा, “ये एक ही प्रकाश मनु हैं?” मैंने कहा, “हाँ, बिल्कुल।” तब उसने बड़ी आत्मीयता से कहा, “पापा, आप इनसे भी मिलो और मुझे भी मिलवाना, ठीक है?” मैने कहा, “ठीक है...देखते है, कब सौभाग्य मिलता है?” 
उन्हीं दिनों ‘हिंदी शीराजा’ पत्रिका का बाल विशेषांक (सितंबर 2015) डाक से मिला, जिसमें हमें मनु जी बहुत ही सुंदर कविताएँ, ‘अपना घर भी है गुड़ियाघर’, ‘एक मटर का दाना’, और ‘पेड़ नीम का’ पढ़ने को मिली। मैंने ये कविताएँ बच्चों को भी पढ़वाईं। इसी अंक में डॉ. बलदेव वंशी के काव्य-संग्रह पर ‘बचपन से दरकता रिश्ता’ और ‘बच्चे की दुनिया’ पर मेरा समीक्षात्मक आलेख भी छपा था। पर प्रकाश मनु जी की इन कविताओं को पढ़कर उनसे मिलने की उत्कंठा तीव्र हो गई। फिर एक दिन मैंने कुछ संकोच में ही मनु जी को फोन मिला लिया। मैंने उन्हें अपना परिचय दिया और मिलने के आशय से एक दिन का समय माँगा। उन्होंने सहर्ष स्वीकृति दे दी और आने का कारण पूछा। मैंने बताया कि, “मैं उन बड़े साहित्यकारों के साक्षात्कार और विचार संकलित रहा हूँ, जिन्होंने हिंदी भाषा और साहित्य को समृद्ध किया है। इस कड़ी में अच्युतानंद मिश्र, डॉ. बलदेव वंशी, प्रभाकर श्रोत्रिय, श्याम सखा ‘श्याम’, डॉ. रामकुमार आत्रेय और श्यामरुद्र पाठक आदि से साक्षात्कार कर चुका हूँ।” 
मनु जी ने कहा, “किसी दिन फोन करके आ जाओ, बेटा!” बस फिर क्या था, मन में चढ़ गया चाव मिलने का। मैंने एक प्रश्नावली तैयार की और उनसे अनुमति लेकर घर से निकल पड़ा, सुबह पाँच बजे वाली गाड़ी से। पानीपत से सीधा फरीदाबाद। 29 दिसंबर 2015 की सुबह मेरे लिए खास उत्साही थी। मौसम की दो बड़ी संतानों गरमी और सरदी में ऊहापोह मची थी। कहीं बाल रवि की मुख कलिका खिल जाती, तो कहीं सरदी अपना सफेद चाँदी-सा कुछ उदासी भरा आवरण डाल देती। हालाँकि ये दोनों ही मौसम मनुष्यों के लिए अनिवार्य हैं। विशेषकर ग्रामीण परिवेश में रहने वाले हम किसानों के लिए। खैर, धीरे-धीरे रविसेना ने सरदी के मायावी आवरण को तोड़कर खिलखिलाती धूप का जनतंत्र स्थापित किया। सर्दी का साम्राज्य खत्म हुआ...गुनगुनाती, महकती-सी धूप खिलखिला उठी। जैसे-जैसे मैं आगे बढ़ रहा था। मन में अजीब सी हलचल हो रही थी। पर उत्साह भी कम नहीं था। बार-बार कुछ प्रश्न मस्तिष्क में कौंध रहे थे कि मनु जी कैसे होंगे? कैसे बात करेंगे? मेरे प्रश्न उन्हें रुचिकर लगेंगे या नहीं? कहीं मुझसे ही कोई ऐसी बात न पूछ लें जिसे मैं न बता पाऊँ? आदि-आदि। 
करीब-करीब ग्यारह बजे मैंने मकान नं. 545 की ‘डोर बैल’ बजाई। तभी सामने दरवाजा खोलने के लिए कुछ शांत, सौम्य गंभीर-सी और मँझले से कद वाली महिला उपस्थित हुई। मैंने प्रणाम किया और चरण स्पर्श करके कहा, “जी, मैं अशोक...प्रकाश मनु जी से मिलने आया हूँ।” 
“हाँ...हाँ अंदर आइए। वे अंदर बैठे हैं।” 
उनके इस स्वागत-कथन में बहुत ही मिठास और अपनापन घुला हुआ था। मैं उसी क्षण समझ गया कि ये हों न हों, मनु जी की पत्नी हैं। पर मैं इनका नाम नहीं जानता था। पहली बार जो मिल रहा था। अंदर चौखट पर आत्मीय हँसी लिए आदरणीय मनु जी खड़े थे। मैंने चरण स्पर्श करते हुए आशीर्वाद लिया। कंधे पर हाथ रखते हुए धीरे-से बोले, “अशोक कुमार जी, आप आ गए!...और सब ठीक हैं न।” 
मैंने कहा, “जी, सब ठीक हैं आपका आशीर्वाद है।” 
“आप सब कैसे हैं?” मैने पूछा। 
“हाँ...हाँ मैं ठीक हूँ।” उन्होंने सहजता से कहा। फिर पत्नी की ओर इशारा करते हुए कहा, “ये मेरी पत्नी सुनीता जी हैं।” फिर सुनीता जी को कहा, “अभी कुछ देर पहले इन्हीं का फोन आया था, यही मिलने आने वाले थे।”
अंदर सोफे पर बैठते ही मनु जी ने अपना कंबल मेरे पैरों पर ढक दिया और थोड़ा-सा अपने पैरों पर रख लिया। कहने लगे, “बेटा, मुझे सर्दी ज्यादा लगती है और तुम तो वैसे भी बाहर सरदी से आए हो। पैर इसमें छुपाए रखो। आने में कोई तकलीफ तो नहीं हुई? घर से कितने बजे चले थे? ट्रेन से आए या बस से? कहाँ-कहाँ से होते हुए आए?” 
मैंने मन ही मन सोचा, मैं खामखाह परेशान हो रहा था, मनु जी इतने सरल, स्नेही होंगे मैने सोचा ही नहीं था। जो शख्स मेरी इस छोटी-सी यात्रा को लेकर इतना चिंतित है, उससे भला क्या डरना? सुनीता जी, जिन्हें मैं ‘माता जी’ कहकर संबोधित करने लगा था, थोड़ी ही देर में चाय बनाने अंदर चली गईं। मनु जी उठे और अंदर से गरम पानी लेकर लाए। मैंने कहा, “सर, आप बैठिए ना प्लीज! मेरे पास पानी है, आप क्यों परेशान हो रहे हैं?” मनु जी ने बड़ी आत्मीयता से कहा, “नहीं बेटा, इसमें परेशानी क्या है? तुम पहली बार आए हो।” और फिर से अंदर चले गए। 
मेरे चंचल मन ने उसी वक्त उनका एक शाब्दिक रेखा-चित्र गढ़ लिया। लालिमा युक्त गोरा रंग, सुगठित बदन, मझोला कद, उन्नत चौड़ा भाल, सफेद मूँछें (बड़ी या नोकदार नहीं), चेहरे पर हँसी और उसमें घुली आत्मीयता, आँखों पर बड़े फ्रेम वाला चश्मा। सिर के आगे के बाल पलायन कर चुके हैं, लेकिन पीछे चाँदी वाले बाल अभी भी अपना साथ निभा रहे थे। गले में काला मफरल, कुरता-पायजामा और स्वेटर पहने मनु जी बड़े ही सौम्य और सादगी से परिपूर्ण दिख रहे थे। 
प्रकाश मनु जी और सुनीता जी चाय-बिस्कुट, नमकीन और एक कटोरी में अलग से चीनी ले आए। हम सब बैठ गए। मैं समझ नही पा रहा था कि बात कैसे शुरू करूँ? सुनीता जी अचानक बोल उठी, “बेटा, चाय पियो, चीनी और डाल लेना। हम जरा कम मीठी पीते हैं। गाँव की चाय अकसर ज्यादा मीठी होती है।” 
बस, फिर बातों-बातों में बातचीत का सिलसिला चल पड़ा। चल क्या, दौड़ पड़ा। मुझे लगने लगा कि मैं किन्ही साहित्यिक धुरंधरों के बीच नहीं, बल्कि अपनों के बीच बैठा हूँ। परिवार में कौन-कौन है? मम्मी-पापा, पत्नी, बच्चे, मेरी, शिक्षा, व्यवसाय और ग्रामीण परिवेश को लेकर तमाम तरह की बातें हम सब ने साझा कीं। बात-बात में पता चला कि सुनीता जी का जन्म हरियाणा के ही एक गाँव सालवन (जिला करनाल) में हुआ है। और उनके मन में गाँव की एक आदर्श छवि बनी हुई है, जो साठ-सत्तर के दशक की है। उन्होंने अपने-अपने गाँवों के अनुभव सुनाए। मैंने उन्हें बताया कि, “आज गाँवों के लोगों का स्वभाव, रुचि, शिक्षा-व्यवस्था, खेल-खलिहान आदि सब कुछ बदल चुका है। गाँव विशुद्ध भारतीय गाँव न रहकर ग्लोबल गाँव में तब्दील हो रहे हैं।” सुनीता जी ने उस बदलते परिवेश पर लिखने के लिए मुझे बहुत उत्साहित किया और समझाया, “तुम जो भी लिखोगे, वह बहुत संजीदा और तथ्यात्मक होगा। क्योंकि तुमने उसे पास से देखा है, बल्कि उसे जिया है। और तुम चाहो तो अपने लिखे को हमें दिखा सकते हो, हम उसमें आवश्यक सुधार या सुझाव तुम्हें देंगे।” 
“और अगर वहाँ के सबल लोगों की नाराजगी का डर हो, तो छद्म नाम से भी लिख सकते हो। जैसे गणपत आदि नाम से। लेकिन आज गाँवों की वास्तविकता जो भी है, वह सामने आनी चाहिए।” मनु जी ने सुझाव दिया। 
मैं चाय के साथ बिस्कुट भी खा रहा था। अचानक ध्यान में आया कि मनु जी मुझे बिस्कुट उठा-उठाकर दे रहे हैं और मैं खाए जा रहा हूँ। मुझे संकोच हुआ, फिर मैंने मना किया। उन्होंने इतनी गर्मजोशी, उत्साह, और अपनेपन से मेरा स्वागत किया कि मैं भाव-विभोर हो गया। जल्दी ही इतना आत्मीय और पारिवारिक वातावरण बन गया, जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी। ऐसे उदाहरण कम ही मिलते हैं कि जब पति-पत्नी दोनों एक ही साधना में समभाव और पूर्ण मनोयोग से लगे हों। 
मनु जी बाल साहित्य को श्वास-श्वास जी रहे हैं। हिंदी बाल साहित्य का इतिहास, आलोचना, विमर्श, समीक्षा और सृजन को लेकर जो कार्य मनु जी कर रहे हैं, वह अविस्मरणीय है। जो कार्य ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ लिखकर आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी ने किया था, वही कार्य मेरी दृष्टि से आदरणीय मनु जी ने किया है। अगर उन्हें ‘हिंदी बाल साहित्य का आचार्य शुक्ल’ कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। मनु जी ने आज के कितने ही जरूरी काम हों, सब स्थगित करके, अपनी सभी व्यस्तताओं को भूलाकर अपना पूरा दिन मुझे समर्पित कर दिया। वे बेहिचक मुझसे अपने बचपन और बच्चों के बचपन को साझा करते रहे। और बराबर मुझे भी खँगालते रहे। मैंने अनुभव किया कि वे केवल अपनी ही नहीं कह रहे हैं, बल्कि सामने वाले के बारे में जानने की जिज्ञासा और उसकी बातें तबीयत से सुनना इस स्नेही युगल की अतिरिक्त विशेषता है। 
प्रंसगवश उन्होंने पूछा, “अशोक! और किन-किन लोगों से मिले हो?” मैंने बताया कि, “सबसे अधिक संवाद और संपर्क बलदेव वंशी जी से ही है। इनके अलावा अच्युतानंद मिश्र, श्याम सखा ‘श्याम’, प्रभाकर श्रोत्रिय, श्यामरुद्र पाठक और पुष्पेंद्र चौहान से साक्षात्कार कर चुका हूँ। बालकवि बैरागी, चक्रधर नलिन और राजकिशन नैन से अच्छा संपर्क है। उनसे पत्रों और फोन के जरिए बात होती रही है, पर मिला नहीं हूँ। हाँ, अभी तीन दिन पहले ही हरियाणा के प्रतिष्ठित लघुकथाकार रामकुमार आत्रेय जी से मिलकर आया हूँ। हाँ, और आत्रेय जी ने मुझे एक नया नाम दिया है, अशोक बैरागी। आत्रेय जी ने मुझसे कहा कि अशोक, तुम साहित्य लेखन इसी नाम से किया करो। यही नाम तुम्हारी पहचान बनेगा और मैं तुम्हें इसी नाम से पुकारूँगा। 
मनु जी सहजता से पूछा, “बेटा! बैरागी क्या होता है?” मैंने कहा, “सर, यह एक जाति विशेष है, जैसे ब्राह्मण, बनिया आदि।” 
“वैसे बैरागी लिखने से तुम्हारे नाम में वजन आ जाता है और एक अलग-सी पहचान भी बन जाती है। कितना सुंदर शब्द है ‘बैरागी’, ओैर यह तुम्हारी डॉक्टरेट की उपाधि से भी बड़ा और अच्छा शब्द है। तो मेरा भी यही खयाल है कि तुम ‘अशोक बैरागी’ ही लिखा करो। मुझे भी अच्छा लगा।” कहकर सुनीता जी ने भी अपना भरपूर स्नेह समर्थन दिया। 
थोड़ा रुककर मनु जी बोले, “बालकवि जी भी तो बैरागी लिखते हैं। वे बैरागी थोड़े ही हैं।” 
मैंने कहा, “नहीं सर, वे तो जाति से ही बैरागी हैं।” फिर मैने अपने थैले से आदरणीय बैरागी जी का वह पत्र दिखाया, जिसमें उन्होंने मेरे एक प्रश्न के उत्तर में लिखा था कि “हाँ भइया, मैं जन्म और जाति से बैरागी हूँ।” 
मनु जी ने फिर कहा, “तो भी क्या बात है? अच्छा है, आज से तुम हमारे लिए भी ‘अशोक बैरागी’ हो गए।” 
फिर राजकिशन नैन की बात चली तो कोई तीस साल पुरानी बात को याद करके मनु जी कहने लगे, “नैन जी वही हैं न, जिन्हें आँखो से बिल्कुल कम दिखता है? जब मैं 1986 में ‘नंदन’ में आया, तब उनके बच्चों और प्रकृति को लेकर बड़े ही सुंदर, भावपूर्ण चित्र आते थे। ये चित्र इतने कलात्मक होते थे कि इन्हें छापने पर ‘नंदन’ पत्रिका खिल उठती थी।” 
मैंने बातों-बातों में कहा, “सर, आपने बच्चों के लिए इतना लिखा है। तो आप अपने बचपन की कुछ मधुर स्मृतियों के बारे में भी बताइए।” 
मनु जी कुछ क्षण रुके, फिर बताने लगे, “भई अशोक, मैं बचपन में बहुत ही अलग तरह का, शांत और अपने में ही लीन रहने वाला बुद्धू-सा बच्चा था। एक बार मैं माँ के साथ तालाब पर गया था। कपड़ों का एक बड़ा-सा गट्ठर माँ ने उठा रखा था और छोटी-सी पोटली मैंने पकड़ रखी थी। तालाब बड़ा था। वहाँ आसपास प्रकृति का खुला विस्तार, दूर-दूर तक पीले-पीले फूलों वाले सरसों के खेत और झाड़ियाँ थीं। उनमें बेशर्म के फूल खिले हुए थे...” 
मनु जी अपनी रौ में बोलते-बोलते बचपन के महासागर में डुबकियाँ लगाते जा रहे थे। अचानक ‘बेशर्म के फूलों’ पर मेरा शब्दकोश सठिया गया। मैंने बीच में ही पूछा, “सर, बेशर्म के फुल...?” तब सुनीता जी ने समझाया कि, “आम तौर पर जिसे हम गुलबाँसा कहते हैं उन्हें ये बेशर्म के फूल कहते हैं।” मनु जी फिर अपनी लय में आए, “हाँ, तो वहाँ मैंने देखा कि प्रकृति कितनी सुंदर और विस्तृत है। दूर-दूर तक फैली हरियाली का विस्तार...यहाँ एक शिशु ने पहली बार प्रकृति की सुंदरता और अनंतता का अनुभव किया। तब मैं कविता का क, ख, ग भी नहीं जानता था। पर लगता था, मैंने शायद पहली बार कविता की-सी अनुभूति की, जिसमें मैंने जीवन की मुक्त लय और असीमता का अनुभव हुआ। 
फिर मनु जी बचपन में सुनी कहानियों की दुनिया में पहुँच गए। बोले, “इसी तरह उन दिनों माँ या नानी से कहानी सुनना भी बड़ा अच्छा लगता था। एक चाव होता था मन में! माँ मुझे अधकू की कहानी सुनाती थी। अधकू माने आधा-सा! जिसका एक हाथ, एक पैर एक आँख, नाक, कान यानी पूरा शरीर ही आधा था। अधकू के सात भाई थे, जो लूटपाट करते थें और अधकू उनके किसी काम का नहीं था। वे चाहते थे कि यह मरे तो छुट्टी हो, पर अधकू की माँ उसे बहुत प्यार करती थी। एक रात सातों भाई उसे मारने के लिए छुर्रियाँ तेज कर रहे थे तो माँ उसे चेताती है कि अधकू आज की रात सोना मत, तेरे भाई तुझे मारने चाहते हैं। तब आँख मींचे-मींचे अधकू धीरे-से बोलता रहा कि, ‘छुरियाँ ना चमका, कि अधकू जागदा!’ उसके भाइयों ने देखा कि अरे, यह सोया नहीं है तो उन्हें गुस्सा आया और कहा, ‘मरे अधकू की माँ कि अधकू जागदा...!’ फिर अधकू के सातों भाई राजा के यहाँ चोरी करते पकड़े जाते हैं, क्योंकि अधकू ने अपना पीं-पीं-पीं बाजा बजाकर राजा को जगा दिया था। अब राजा ने खुश होकर अधकू को अपना मंत्री बना लिया। खैर, बाद में अधकू ने अपने सभी भाइयों को छुड़वाकर वहीं राजदरबार में रख लिया। यह कहानी मुझे बहुत अच्छी लगती थी और मैं उसे बार-बार सुनता था।” 
मैंने कहा, “सर, मुझे ऐसा लगता है कि आपको बचपन में सुनी कहानियों ने बच्चों के लिए लिखने की प्रेरणा दी है...?” सुनकर मनु जी कहने लगे, “हाँ, तुमने ठीक कहा। शायद माँ और नानी से सुनी कहानियाँ ही मुझे जाने-अनजाने में लेखक बना रही थी। माँ मुझे बहुत प्यार करती थी। माँ से सुनी अधकू की कहानी मुझे अपनी कहानी लगती थी। मैं भी बचपन में एक हड्डी का और कमजोर-सा था। मेरे भी सात भाई थे। माँ ने तो कभी भूल से भी नहीं मारा। पिता जी कभी गुस्से में होते तो पता चल जाता था। “कुक्कू...यह तुमने क्या किया?” गुस्से या ऊँची आवाज में वे कहते। इतना ही हमारे लिए काफी था। बड़े भाई कभी-कभी जरूर डाँट देते थे। कमलेश दीदी मुझसे दो वर्ष बड़ी थी। केवल छोटा भाई सत्ते ही मुझे छोटा था।” 
“कुक्कू...?” मेरी आँखों में शायद कोई प्रश्नवाचक चिह्न उभरा। इस पर उन्होंने मुसकराते हुए बताया कि, “मेरे बचपन का नाम कुक्कू था।” 
मुझे सुनने में बड़ा आनंद आ रहा था। मेरी जिज्ञासा कुक्कू के बचपन में और गहरे गोते लगाने की हो रही थी। मैनें फिर कहा, “सर, कुक्कू से जुड़ी कोई और घटना बताइए ना, प्लीज!” 
मनु जी फिर भावातिरेक में कहने लगे कि “एक बार हमारा मकान बन रहा था। मैं छज्जे पर खड़ा था और छज्जे पर मुँडेर अभी बनी नहीं थी। तभी तेज आँधी के साथ बरसात शुरू हो गई। ऐसे में नहाने का अपना मजा होता है। मैंने कुरता उतारा और नीचे फेंका, ताकि मजे में नहा सकूँ, पर यह क्या...? कुरते के साथ-साथ मैं खुद भी धडॉ...म नीचे फर्श पर जा गिरा और पता नहीं कैसे आलती-पलाथी मारकर बैठ गया। मुझे चोट-वोट तो खैर ज्यादा नहीं लगी, पर सारे घर में बड़ा हो-हल्ला बल्कि हड़कंप मच गया, “हाय, कूक्कू छत से गिर गया!” फौरन हमारे पारिवारक डॉक्टर भटनागर जी को बुलाया गया। कुछ गुमचोट लगी थी और डॉक्टर दवाई देकर चला गया। अब सब बार-बार यही पूछें, कि अरे! कूक्कू, तू गिरा कैसे? मुझे सबका खूब प्यार-दुलार मिल रहा था, मैं जैसे कोई बड़ा वी.आई.पी. हो गया हूँ। कई दिनों तक मेरी खूब सेवा हुई। हल्दी वाला दूध पिलाया गया। कमलेश दीदी स्कूल से लौटकर आती तो पूछती, ‘कुक्कू, कुछ चाहिए तुम्हें...?’ एक दिन मैंने कहा, तुम एक कहानी लिखो कि कुक्कू छत पर नहा रहा था और वह छत से गिर पड़ा...मैं इसके बदले तुम्हें एक पैसा दूँगा। दीदी ने कहानी तो क्या लिखनी थी, एक कागज पर चार टेढ़ी-मेढ़ी लाइनें लिखीं और मैंने उन्हें एक पैसा दे दिया। कागज का यह टुकड़ा जिस पर कुक्कू की कहानी लिखी थी, मेरे लिए अनमोल खजाने जैसा था और मैंने इसे अपने तकिए के नीचे रख लिया। शायद उस छोटी उम्र में ही मेरे चेतन या अवचेतन में यह भाव था कि साहित्य या लिखी हुई रचना अनमोल होती है।” 
मनु जी के बचपन की घटनाएँ मुझे खूब हँसा रही थीं, गुदगुदा रही थीं और बाल मन की कोमल भावनाएँ भी जैसे फिर से सृजित हो रही थीं। मनु जी जीवनधर्मी और खुले मन की मौज के लेखक हैं। मुझसे इतना घुल-मिल और खुलकर बातें कर रहे थे, जिसकी मैंने कल्पना भी न की थी। मुझे उनके लेखन और जीवन में गजब की साम्यता दिखी। वे पहले अपनी रचना को रोम-रोम रमा लेते है। अनुभव को श्वास-श्वास जीते हैं, और तब उसे कागज पर उकेरते हैं। उनके जीवन और लेखन में दो फाँक नहीं है। जो आदर्श लेखन का है, वही आदर्श जीवन का भी है।
बातों-बातों में मैंने फिर चुटकी ली कि, “सर, कुक्कू का यह प्रसंग किसी रचना में आया कि नहीं...? क्योंकि बाल साहित्य का कुछ अंश बाल साहित्यकारों के जीवन से ही जुड़ा होता है।” 
मनु जी कहने लगे, “हाँ, अशोक जी, अकसर ऐसा होता है। साहित्य में लेखक के निजी जीवन के बिंब, घटनाएँ और अनुभव आते ही हैं। मैंने अपने जीवन की बहुत-सी तकलीफों, त्रासद अनुभवों और विडंबनाओं को ‘यह जो दिल्ली है’ और ‘कथा सर्कस’ उपन्यासों में किसी न किसी रूप में लिखा है। आप समय मिले तो उन्हें कभी पढ़िए।...हाँ, बचपन में कुक्कू के साथ घटी यह घटना सीधे-सीधे तो किसी कहानी में नहीं आई। पर सोचता हूँ कि आनी चाहिए। वैसे अपनी आत्मकथा में मैंने इस घटना को विस्तार से लिखा है। और कुक्कू का कई कहानियों में रूपांतरण है, जैसे ‘चश्मे वाले मास्टर जी’। अभी कुछ समय पहले ही मेरी बहुत ही रसपूर्ण, रोचक और वास्तविक जीवन से जुड़ी कहानियों की किताब आई है, जिसमें ‘चश्मे वाले मास्टर’ जी और ‘मेवालाल की मिठाई’ आदि मेरे जीवन की घटनाओं पर आधारित है।” 
फिर मनु जी ने ये दोनों किस्से भी सुनाए कि कैसे स्कूल में दाखिले के समय चश्मे वाले मास्टर जी ने नटखट तरीके से कुक्कू की चुटकी ली थी और कैसे उन्होंने बचपन की नादानी में घर के जरूरी कागजों (बही) के बदले मेवालाल से मिठाई खाने के मजे लिए थे, और बाद में इस पर मीठी-सी डाँट भी पड़ी थी। सुनकर हम हँसी से लोट-पोट हुए जा रहे थे। एक तो ये घटनाएँ ही ऐसी मजेदार थी। दूसरा, उनके कहने का अंदाज बड़ा निराला था। सच बताऊँ, बाहर कहीं किसी के घर जाकर मैं पहली बार इतना हँसा था। मन में खुशी के फुव्वारे फूट रहे थे। 
फिर मनु जी ने अपने जीवन से जुड़े कुछ और भी प्रसंग बड़े रोचक ढ़ंग से सुनाए। हाँ, मनु जी बतरस में भी माहिर हैं। जब बोलने लगते है तो अपनी रौ और लय में बोलते चलते हैं। धाराप्रवाह हिंदी में सरस आंचलिक शब्दों का भरपूर प्रयोग करते हैं। 
बेशक सिद्धांतों और आदर्शों को लेकर भी यह आदमी जीता होगा...! पर मैंने मनु जी और सुनीता जी के अंदर कोमलता को अधिक महसूस किया। समवेदना जैसे उनका स्वभाव है। वे दूसरों की तकलीफों को अपना मानकर, इस कदर तरल और सरल हो जाते हैं कि खुद सामने वाला ही हैरान हो जाता है। सुख-दुखात्मक अनुभूतियों को सँभालना उनके लिए मुश्किल-सा हो जाता है। वे सामने वाले से आत्मीय गहराई से जुड़ने वाले उच्च कोटि के आदर्श गृहस्थ हैं। उनमें आगंतुकों के प्रति असीम स्नेह और आत्मीयता है। मनु जी कहते हैं, “बच्चों के लिए लिखना मेरे लिए ईश्वरीय कार्य है। बच्चों के लिए लिखने का आनंद ही कुछ और है। बड़ों के लिए लिखते समय तो जीवन की एक से एक बड़ी विडंबना, विसंगतियाँ, क्रोध और घात-प्रतिघात सामने आते हैं, जिनसे बड़ी तकलीफ होती है और आप खुद को एक तनाव की गिरफ्त में पाते हैं। जबकि बच्चों के लिए लिखते समय मुझे शक्ति मिलती है। लगता है, जैसे हमारी आत्मा निर्मल हो गई है। मन को भी बड़ा सुकून मिलता है।” 
कहकर मनु जी कुछ चुप से हो जाते हैं, पर मैं अभी बहुत कुछ जानना और सीखना चाहता था। मैंने फिर पूछा, “सर, आपने देवेंद्र सत्यार्थी और शैलेश मटियानी जी पर बहुत ही गहनता और आत्मीयता से लिखा है। इनके अलावा आपके साहित्यिक आदर्श कौन-कौन रहे हैं या जो आपको बहुत प्रिय रहे हों?” मनु जी फिर अपनी लय पकड़ते हैं कि, “शुरू में मुझे प्रेमचंद, निराला, मैथिलीशरण गुप्त, दिनकर बहुत अच्छे लगते थे। हिंदी में हमारी एक सहायक पुस्तक थी ‘भाषा-भास्कर’, जो छठी कक्षा से शुरू होती थी। वह मुझे इतनी पसंद थी कि मैं रोज सुबह उठकर उसके उद्धरण जोर-जोर से बोलकर याद किया करता था। मुझे आज भी याद है कि दिनकर और बालकृष्ण शर्मा नवीन की कविताओं के ओजपूर्ण उद्धरण पढ़कर मेरी मुट्ठियाँ तन जाती थी। मन में उत्साह और जोश भर जाता था। नवीन जी की कविता देखिए, “लपक चाटते जूठे पत्ते जिस दिन देखा मैंने नर को/उस दिन सोचा क्यों न लगा दूँ आग इस दुनिया भर को/यह भी सोचा, क्यों न टेंटुआ घोंटा जाए स्वयं जगपति का/जिसने अपने ही स्वरूप को रूप दिया इस घृणित विकृति का...!” 
कहते हुए मनु जी जरा-सा रुके। उनकी भव्य मुखाकृति देखने योग्य थी। उनका चेहरा तमतमा-सा गया, नसें फड़क उठीं और आवाज में गर्जना करने जैसा स्वर था। उन्होंने पानी दिया और फिर से बताने लगे, “उसके बाद मैं कुछ बड़ा हुआ तो मुझे छायावादी कवि अच्छे लगने लगे। पंत, प्रसाद, निराला और महादेवी की रागात्मक कविताएँ मुझे मोहती थीं। उस दौर में मैंने भी बहुत से गीत लिखे, जो ‘मुक्ता’ और ‘सरिता’ में छपे। धर्मवीर भारती, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, धूमिल और मुक्तिबोध को पढ़ा तो बिल्कुल एक नई दुनिया सामने आई। यह वही दौर था जब मैंने महसूस किया कि प्रगतिशील साहित्य कर्म-सौंदर्य और जीवन-संघर्ष का साहित्य है। अब छायावादी सौंदर्य पीछे छूट गया। कुरुक्षेत्र से मैं दिल्ली आया और लोक साहित्य के फकीर देवेंद्र सत्यार्थी से निकटता बढ़ी। उनके काम और जीवन ने मुझे बहुत प्रभावित किया। सत्यार्थी जी कहा करते, ‘मनु, तुम्हारे आसपास चारों ओर कहानियाँ ही कहानियाँ बिखरी पड़ी हैं। यहाँ तक कि एक मिट्टी का ढेला या पत्थर का टुकड़ा भी खुद में एक अनोखी कहानी छिपाए हुए है। सवाल यह है कि तुम उसे देखते कैसे हो और लिखते कैसे हो?’ सत्यार्थी जी से मैंने चीजों को देखना ही नहीं, उनमें आनंद लेना भी सीखा।” 
बोलते-बोलते प्रकाश मनु जी अचानक कुछ भावविभोर और गंभीर से हो गए, मानो कोई पुरानी पीड़ा उभर आई हो। लरजती और तरल-सी आवाज में कहने लगे, “अशोक जी, शैलेश मटियानी जी हिंदी के बड़े कथाकार थे। उनका बचपन घोर गरीबी और अभावों में गुजरा। पर बचपन में सुनी कहानियाँ इस हालात में भी उन्हें चुपके-चुपके लेखक बनाने के राह पर ले जा रही थीं। उन्हें पढ़़कर साफ समझ में आता है कि वे कौन से प्रभाव, कल्पनाएँ, दबाव और अंतःप्रेरणाएँ थीं जो उन्हें बड़ा लेखक बना रही थीं। शैलेश मटियानी कहानीकार के रूप में मेरे आदर्श रहे हैं और विष्णु खरे की कविताएँ मुझे बहुत प्रिय हैं।” 
एक गहरी साँस लेकर मनु जी देर तक रुके। अचानक सुनीता जी बोल पड़ीं, “बातें तो चलती रहेंगी, यह बच्चा दूर से आया है, एक बार खाना खा लें।” मैंने सकुचाते हुए कहा, “हाँ...हाँ आप खाना लीजिए। बातें तो बहुत हो गईं, और फिर कर लेंगे।” मैं सोफे से उठने लगा तो मनु जी ने हाथ पकड़कर वहीं बैठा लिया। दोनों जोर देकर कहने लगे, “अरे! तुम क्यों नहीं...? तुम भी खाओगे। हम तो तुम्हारा ही इंतजार कर रहे थे कि अशोक आएगा और सब एक साथ ही खाएँगे।” 
फिर सुनीता जी के हाथों बने खाने का हम सबने भरपूर आनंद लिया। आलू-मटर मिलाकर बनाए गए चावल और सेवइयों में स्नेह और अपनेपन का गजब स्वाद था। 
मेरा मन तृप्त और हृदय गदगद हो रहा था। उस समय के सुख और आनंद का वर्णन कर पाना मेरे लिए कठिन है। मुझे लग रहा था, जैसे किसी अदने से याचक को नारायण और नारायणी के हाथों दिव्य प्रसाद मिल गया हो। उन दोनों का पवित्र स्नेह और निःस्वार्थ सहयोग पाकर स्वयं को सौभाग्यशाली मानता हूँ। खाना लेने के बाद मुझे लग रहा था, जैसे मनु जी के भीतर अभी कुछ तच-पक रहा है, जो शायद बाहर आना चाह रहा था। अचानक वे कहने लगे, “अशोक जानते हो, बच्चा दुनिया का सबसे सरल प्राणी है। उसे दुनिया में सच्चाई, अच्छाई और ऐसी ही दूसरी बातें अच्छी लगती हैं। उसे खराब-चालाक और बेईमान लोग अच्छे नहीं लगते। इस लिहाज से उनके लिए लिखा जाने वाला साहित्य भी वैसा ही होना चाहिए, जो उनमें लीक से अलग हटकर कुछ करने का जोश और उत्साह पैदा करे, जो उसमें एक बेहतर मनुष्य होने की जिद पैदा करे। ऐसा साहित्य बच्चों को प्रिय होगा। उसी के साथ वे जुड़ाव महसूस करेंगे...इसी तरह बच्चों में यह गहरी अन्तःप्रेरणा होती है कि वे फौरन झूठ पकड़ लेते हैं और सीधी-सीधी सच्ची बात कहेंगे। छोटे बच्चे एकदम सरल और निर्मल होते हैं। पर बड़े होकर हम औरों की तरह बात को दाएँ-बाएँ घुमाने की कला या चालाकी सीख लेते हैं। फिर हम बड़े लोग खुद को समझा लेते हैं कि कोई बात नही, अगर ऐसा कर भी लिया तो, या कि चलो, उसे थोड़ी-बहुत चालाकी कर भी ली तो कोई बात नहीं। लेकिन बच्चे तुरंत कहते हैं कि, नहीं...नहीं, यह तो गलत बात है। क्यों, उसने ऐसा गलत काम क्यों किया! वे सीधे सच कहते हैं कि पापा, वह आदमी गंदा है, आप उससे मत मिलना! क्योंकि बच्चा फौरन सच जान लेता है और उसे बेहिचक कहता भी है। बड़ा होने पर हमीं उसे किंतु-परंतु या ऐसा-वैसा सिखाते हैं। तो बच्चे को झूठा उपदेश देने के बजाय हमें उसे समझने की कोशिश करनी चाहिए।” 
मनु जी कि इन बातों ने मुझे बहुत गहराई से प्रभावित किया। मुझे उनकी ये सब बातें बहुत भा रही थी, क्योंकि अध्यापक होने के कारण मेरा अधिकतर समय छोटे बच्चों में ही गुजरता था और दैनिक जीवन में स्वयं मैं भी बहुत बार इस ‘किंतु-परंतु’ का व्यवहार करता था। अब मेरे अंदर एक अलग ही तरह की रोशनी फैल रही थी और मैंने मुखर रूप में न सही, पर मन ही मन संकल्प लिया कि अब से बच्चों को हमेशा सच बोलने के लिए प्रेरित करूँगा। साथ ही उनके सच को भी समझूँगा। मनु जी ने पूछा, “अशोक, तुम हाईस्कूल में अध्यापक हो या प्राथमिक कक्षाओं में?” मैंने कहा, “सर, मैं प्राथमिक विभाग में हूँ।” 
“अच्छा, स्कूल में लाइब्रेरी है?” उन्होंने बड़ी उत्सुकता से पूछा। मैंने बताया, “हाँ, है जी।” फिर पूछा, “उसमें बच्चे भी जाकर पढ़ते है क्या...?” मैंने कहा, “अकसर शनिवार के दिन या किसी विशेष अवसर पर।” फिर वे कुछ विषयांतर-सा करते हुए कहने लगे, “जानते हो, बच्चों के लिए कैसा साहित्य होना चाहिए?” मैंने कहा, “नहीं, सर।” तब मनु जी ने बहुत सहज भाषा और स्नेह से समझाया कि, “सुनो, पहली चीज तो आपका मन और भावना है। आप बच्चे को देखते कैसे हैं? और उसके बारे में आपकी सोच कैसी है? यह चीज कहीं अधिक जरूरी है। जैसे छोटे बच्चों को अगर कोई अध्यापक पढ़ा रहा है, तो मेरी नजर में अच्छा अध्यापक वह होगा, जो बच्चों का दोस्त बनकर उन्हें पढ़ाएगा। बच्चों पर रोब डालने वाला और डाँटने-फटकारने वाला अध्यापक मेरी नजरों में सबसे घटिया होगा। यहाँ तक कि अगर आप सोचते हैं कि बच्चे अज्ञानी हैं और आप उन्हें ज्ञान सिखाने के लिए आए हैं, तो आप भी अच्छे अध्यापक नहीं हो सकते। अच्छा अध्यापक होने के लिए आपको अपने और बच्चे के बीच विद्ववान, बड़ा या अध्यापक होने की दीवारों को तोड़ना पड़ेगा।” 
मनु जी की ये बातें मुझे आत्म-मूल्यांकन के लिए प्रेरित कर रही थी। और एक अच्छे आदर्श प्राथमिक अध्यापक की छवि मेरे मानस-पटल पर अंकित हो रही थी। वास्तव में आजकल विद्यालयों और समाज का माहौल ही ऐसा हो रहा है कि हर व्यक्ति अपनी वास्तविक शक्ति और स्वरूप भूलता जा रहा है। मनु जी की ये बातें मुझे मेरे ही स्वरूप का स्मरण करा रही थीं और मैं एकाग्रचित्त हो, उनकी बातें सुनकर हृदय में सँजो रहा था। मनु जी लगातार सहज भाव बोलते जा रहे थे कि, “ऐसे ही बच्चों के लिए लिखना है, तो आपको पहले एक अबोध बच्चा बनना पड़ेगा। आप अपने बचपन में पहुँच जाइए और अपने ज्ञान का सारा बोझ किसी गहरे गड्डे में डाल दीजिए और फिर बच्चा बनने पर आप जैसा अनुभव करते हैं, उस अहसास के साथ लिखिए। वही एक आदर्श बाल कहानी या कविता होगी। अगर आप यह सोचेंगे कि इस अनुपात में यथार्थ डालें और उस अनुपात में कल्पना, तो कुछ नहीं बनेगा। यह तो एक बेमेल और बेस्वाद खिचड़ी बन जाएगी। इसके बजाय अगर बच्चे को कहानी में अपना बचपन और परिवेश दिखेगा तो उसे बहुत आनंद आएगा। मुझे कन्हैयालाल मत्त की एक बात याद आती है। जब मैंने उनसे पूछा था कि आपके ख्याल से अच्छी बाल कविता कैसी होनी चाहिए? इस पर उनके जवाब को मैं कभी नहीं भूलता। उन्होंने कहा था, ‘मनु जी, मेरी नजरों में अच्छी बाल कविता तो वही हो सकती है, जिसे पढ़कर बच्चे के मन की कली खिल जाए।’ और मेरे ख्याल से यह बात पूरे बाल साहित्य के लिए कही जा सकती है। बच्चे को सीधे-सीधे उपदेश देने की कोशिश हमें कभी नहीं करनी चाहिए। बच्चा खेल-खेल में सीखे और खुद अच्छी चीजें ग्रहण करे। बच्चों को ऐसा करना चाहिए, वैसा नहीं करना चाहिए। ये चीजें ऐसी हैं, जिनसे बच्चा दूर भागता है। ‘चाहिए’ शब्द तो साहित्य में आना ही नहीं चाहिए। ऐसे उपदेशात्मक बाल साहित्य को मैं सबसे घटिया मानता हूँ।” 
मनु जी की ऐसी प्रेरक और गहरी बातें सुनकर बाल साहित्य की पूर्व निर्मित छवि एकदम धुल गई। कोई न कोई शिक्षा देने वाली उपदेशात्मक रचनाओं को ही मैं अब तक श्रेष्ठ मानता था। लेकिन अब धुँधलका साफ हो गया था। श्रेष्ठ बाल साहित्य की कसौटी अब धीरे-धीरे मुझे स्पष्ट होने लगी थी। बच्चा कविता या कहानी को पढ़कर वैसा ही स्वयं करे या बनने के लिए प्रेरित हो, यही अच्छे बाल साहित्य की कसौटी है। किसी बाहरी डर या दबाव में अगर वह वैसा बनने का प्रयास करेगा, तो उससे बहुत जल्दी ऊब जाएगा और दूर भागने लगेगा। अच्छे बाल साहित्य के विषय में यह जानकारी मेरे लिए एकदम नवीन और महत्त्वपूर्ण थी।
सुनीता जी काफी देर से और बड़ी तन्मयता से हमारी बातों का रसास्वादन कर रही थीं। और बीच-बीच में गर्दन हिलाकर अपना सहमति भी दे रही थीं। एकाएक वे बोली कि, “अच्छा हो कि बाल साहित्य लिखते समय कोई दस-ग्यारह साल का बच्चा आपकी आँखों के सामने हो और कहानी या कविता सीधे-सीधे शब्दों में लिखी जाए, बगैर किसी उलझाव के। उसमें ऐसी चीजें या शब्द नहीं होने चाहिए कि बच्चे को समझने के लिए किसी व्याकरण या शब्दकोश की जरूरत पड़े।” 
सुनीता जी ने जैसे ही अपनी बात पूरी की, मनु जी फिर से बात को आगे बढ़ाने लगे कि, “कहानी के जरिए पाठक के दिल में ऐसे धागे जुड़ जाने चाहिए कि बच्चा यह कहे, अरे! भगत सिंह इतने महान थे, तो भला मैं भगत सिंह क्यों नहीं बन सकता? चाहे कितनी ही परेशानियाँ क्यों न आ जाएँ, हम नहीं डिगेंगे। सब कुछ सहकर भी वैसा ही बनेंगे। यानी आदर्श नायक की कहानी पढ़ते समय बच्चा अपने अंदर वैसा ही बनने की जिद, एक तड़प महसूस करे और वैसा बने बगैर रह ही न पाए, जैसा सपना या तस्वीर उसके दिल में हैं। 
मैंने कहा, “आपका मतलब है, लेखक को ऐसा परिवेश, कथानक और चरित्र लेने चाहिए जिनसे बच्चा अपनापन या जुड़ाव महसूस करे। यानी उसका अपना परिवेश कहानी में दिखाई देना चाहिए। उसे नायक के दुख, तकलीफें और हँसी-खुशी अपनी लगनी चाहिए, ताकि उनसे वह अंतःप्रेरणा ग्रहण करे, और शिक्षा या उपदेश सीधे-सीधे न देकर कहानी के पात्रों के व्यवहार में ही स्पष्ट होने चाहिए। मनु जी ने प्रशंसा करते हुए कहा, “हाँ, शबाश! बिल्कुल, ऐसा ही होना चाहिए।”
इसी बीच मैंने देखा, सुनीता जी किन्ही विचारों में खोई-सी हैं। मानो कुछ याद करने की कोशिश कर रही हों। मैंने थोड़ा कुरेदा, आप शायद कुछ कहना चाह रही हैं? इस पर सुनीता जी बोलीं, “देखो, मैं तुम्हें एक और छोटी-सी घटना सुनाती हूँ। हमारी बड़ी बेटी ऋचा कोई ढ़ाई-तीन साल की थी, तब हम दिल्ली में रहते थे, शास्त्री नगर में। अकसर शाम के समय हम पार्क में घूमने जाते थे। वहाँ के फूल उसे बहुत सुंदर लगते थे। वह उन्हें बड़ी ललक के साथ छूते हुए चलती तो मैं कहती थी, बेटे फूल नहीं तोड़ना। ऐसे ही दूर से अच्छे लगते हैं ना!...तोड़ना नहीं। वह रोज मेरे मुँह से यह बात सुनती थी। इसका नतीजा यह हुआ कि फिर वह हमारे साथ चलते हुए खुद ही फूलों को हाथ लगाकर कहने लगी, ‘मम्मी, फूल नई तोड़ना, ऐसे ही दूर से अच्छा लगता है ना। और हम जोर से हँस पड़ते।’” 
और अब मैं भी हँस ही रहा था, तो मनु जी मानो अपनी अधूरी-सी बात को पूरी करना चाह रहे हों। वे बोले, “यहाँ बच्चे में एक द्वद्ंव शुरु हुआ कि फूल अच्छा तो है, पर उसे तोड़ना नहीं है। भले ही उसके भीतर फूल तोड़ने की इच्छा भी रही होगी। लेकिन माँ की बात सुनकर उसके मन में यह बात बैठ गई कि फूल तोड़ना गलत बात है तो यह एक बच्चे का नन्हा विवेक है। उसे पता लग गया कि फूल न तोड़ने पर मम्मी उसकी सराहना करेगी या शाबाशी देगी। यही उसे अच्छा भी लगता है और फूल तोड़ने पर माँ को बुरा लगेगा, कहीं न कहीं उसमें यह समझ आ गई। बाल साहित्य भी मोटे तौर पर बच्चे में यही समझ पैदा करता है।”
मनु जी को सामने बैठकर सुनने में मुझे बहुत खुशी हो रही थी। ऊपर से उनकी भाषा इतनी सीधी कि प्रत्येक शब्द, वाक्य और प्रसंग हृदय को छूकर और गहरे में उतर रहे थे। उनकी गढ़ी हुई उक्तियों जैसे वाक्य बड़े ही रोचक और सुंदर लग रहे थे। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि, “अपनी इच्छाओं और महत्वाकांक्षाओं को बच्चों पर थोपना बहुत बड़ी हिंसा है, जिसका पाप हमें लगेगा। बच्चा ईश्वर की श्रेष्ठ रचना है। उसे खुलकर जीने का अवसर देना चाहिए। तभी वह एक पुष्प की तरह विकसित होकर चहुँ ओर अपनी उज्ज्वल सुगंध फैलाएगा। अन्यथा वह समय से पूर्व ही मुरझा जाएगा।” 
बातों-बातों में कितना समय बीत गया, पता ही नहीं चला। वहाँ से चलने का मन तो नहीं था, पर गृहस्थी की जिम्मेदारी से जुड़ा होने के कारण ऐसा करना पड़ा। मैंने चलने के लिए आज्ञा माँगी तो मनु और सुनीता जी ने बहुत सारी पुस्तकें मेरे हाथों में उपहार स्वरूप थमा दी। जिनमें बाल साहित्य की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘बालवाटिका’ के सात अत्यंत महत्त्वपूर्ण विशेषांक थे। इनमें ‘पर्यावरण संरक्षण चेतना’, ‘बाल साहित्य की पुरोधा शकुंतला सिरोठिया’, ‘स्वातंत्र्य चेतना अंक’, ‘बाल साहित्य के पुरोधा डॉ. कृष्णचंद्र तिवारी राष्ट्रबंधु’, बाल साहित्य के पुरोधा श्रीप्रसाद, ‘जयप्रकाश भारती विशेषांक’ और ‘राजभाषा विशेषांक’ थे। इनके साथ ही मनु जी ने अपनी और सुनीता जी की कुछ पुस्तकें भी दीं। इनमें मनु जी की ‘नटखट कुप्पू के अजब-अनोखे कारनामे’, ‘गंगा दादी जिंदाबाद’, ‘भुलक्कड़ पापा’ थीं, तो सुनीता जी की ‘रंग-बिरंगी कहानियाँ’ और ‘साकरा गाँव की रामलीला’ भी। ये पुस्तकें सप्रेम व आशीर्वाद सहित भेंट करते हुए मनु जी ने कहा, “बेटा! इन्हें पढ़ना और कुछ लिखकर हमें भेजना। हम देखेंगे, तुम्हारी कलम कैसी चलती है?” 
मैंने सब सामान समेटकर चलने की तैयारी की तो सुनीता जी ने मुझे रोककर ऐसी बात समझाई जिसे मैं जिंदगी भर नहीं भूलूँगा। उन्होंने बड़े प्यार से समझाया, “अपनी पत्नी का सम्मान करो, उसका ख्याल रखो। बेशक वह तुमसे कम पढ़ी-लिखी है, फिर भी तुम्हारे घर-परिवार की धुरी है। उसके प्रति ईमानदार रहो। उसको उसके असली नाम से पुकारो और उसे कभी कम न आँकना।” 
यहाँ मुझे उनमें नारी विमर्शकारों जैसी सजग और संवेदनशील छवि दिखाई दी। वे नारी के अधिकारों और सम्मान की प्रबल समर्थक हैं, ऐसा अनुभव हुआ। खैर...
अब तक चार बज चुके थे। मैंने दोनों के चरण स्पर्श करके विदा ली। उन्होंने सिर पुचकारते हुए कहा, “खुश रहो। ध्यान से जाना और घर जाते ही फोन करना।” 
मेरा मन-मयूर मन में उमड़-घुमड़ रहे भावों में मगन होकर नाच रहा था। मुझे अपने अंदर नव ऊर्जा और स्फूर्ति का संचार महसूस हो रहा था। हो भी क्यों न, आखिर मेरे जीवन की एक साध जो पूरी हुई थी और मैं कुक्कू के घर की तीर्थ-यात्रा करके लौट रहा था।
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डा. अशोक बैरागी, हिंदी प्राध्यापक, राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, पुंडरी, जिला कैथल (हरियाणा), पिन-136026, 
चलभाष: 09466549394


1 comment :

  1. आदरणीय मनु जी से पहली मुलाकात की मिठास इन शब्दों से कहीं अधिक थी। कितना स्नेह और अपनापन था, मनु जी और माता सुनीता जी के स्वभाव में। शायद मैं इतने अच्छे ढंग से अभिव्यक्त नहीं कर पाया। आज सात आठ वर्ष बाद भी उस पहली मुलाकात को याद करता हूँ, तो मन में एक उत्साह, उमंग और अजीब सी खुमारी छा जाती है। वास्तव में ये दोनों इंसान दैवीय गुणों से भरपूर हैं। मेरी यह पहली मुलाकात किसी तीर्थ यात्रा से काम नहीं थी। सेतु की पूरी संपादकीय टीम और संपादक महोदय का हृदय से आभार।

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