हिन्दी दलित आत्मकथाओं के प्रश्न

आँचल यादव

शोधार्थी (पीएच.डी), हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय


दलित साहित्य का आविर्भाव बुनियादी तौर पर बौद्ध और संत साहित्य से माना जाता है। आधुनिक हिन्दी दलित साहित्य का विधिवत विकास अस्सी के दशक से आरंभ हुआ। दलित साहित्य की वैचारिकी में संत रैदास, कबीर, महात्मा ज्योतिबा फुले, स्वामी अच्युतानंद तथा डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के जीवन दर्शन को देखा जा सकता हैं। सभी विश्वविद्यालयों, साहित्य सम्मेलनों, पुस्तकीय समीक्षा, कविता, कहानी, आत्मकथा तथा आलोचना आदि के क्षेत्र में दलित साहित्य ने नये आयाम स्थापित किये हैं। 

दलित साहित्य के अवशेष साहित्य में प्राचीन हैं। दलित साहित्य को मुखर अभिव्यक्ति आत्मकथाओं से मिली।डॉक्टर अंबेडकर ने अपनी आत्मकथा 'मी कसा झाला'(मैं कैसे बना) शीर्षक से लिखी। डॉ अंबेडकर के शब्दों में "मेरा विकास किसी अद्भुत शक्ति के कारण नहीं हुआ बल्कि मेरे जीवन निर्माण में परिश्रम और संघर्ष मुख्य बिंदु रहे हैं"।1

आज दलित साहित्य में सभी विधाओं पर गंभीर लेखन हो रहा हैं। हिंदी में दलित आत्मकथाओं की शुरुआत नौवें दशक में 'पत्रकार राजकिशोर' द्वारा संपादित पत्रिका 'हरिजन से दलित' में प्रकाशित दलित लेखक 'ओमप्रकाश वाल्मीकि' के 'आत्मकथ्यांश' से मानी जा सकती हैं।2 लेकिन पहली आत्मकथा मोहनदास नैमिशराय की 'अपने-अपने पिंजरे' मानी जाती हैं।

जयप्रकाश कदम के विचार में "आत्मकथा लिखना निसंदेह हिम्मत और जोखिम का काम है; बल्कि यूँ कहें कि तलवार की धार पर नंगे पैर चलना है। यदि लेखक सच्चाई पर टिका रहेगा तो लहूलुहान होना लगभग निश्चित है; क्योंकि आत्मकथा नंगी सच्चाई की मांग करती हैं। और इतना साहस बहुत कम लोगों में होता है जो सामाजिक यथार्थ के साथ-साथ अपने जीवन के नंगे यथार्थ का सार्वजनिक प्रदर्शन कर सकें"।3

दलित आत्मकथाओं में मोहनदास नैमिशराय की 'अपने-अपने पिंजरे', ओमप्रकाश वाल्मीकि की 'जूठन', माता प्रसाद की 'झोपड़ी से राजभवन तक', भगवानदास की 'मैं भंगी हूँ', शयोराज सिंह बेचैन की 'मेरा बचपन मेरे कंधों पर', रूपनारायण सोनकर की 'नागफनी', डॉ तुलसीराम की मुर्दहिया (भाग-1) एवं मणिकर्णिका (भाग-2), सूरजपाल चौहान की तिरस्कृत (भाग-1), संतृप्त (भाग-2) आदि प्रकाशित हो चुकी हैं। 

वही स्त्री लेखिकाओं में कौशल्या बैसत्री-दोहरा अभिशाप, सुशीला टाकभौरे-शिकंजे का दर्द, रजनी तिलक-अपनी जमीं अपना आसमां, अनिता भारती -छूटे पन्नों की उड़ान, कावेरी-टुकड़ा टुकड़ा जीवन आदि आत्मकथाएं आ चुकी हैं। वही पंजाबी आत्मकथाओं में बलबीर माधोपुरी की 'छांग्या रूख' तथा मराठी आत्मकथाओं में दया पवार की 'अछूत', शरण कुमार लिंबाले की 'अक्करमाशी', बेबी ताई काम्बले की 'जीवन हमारा' आदि ने आत्मकथा साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया हैं। 

हिंदी दलित आत्मकथाओं के प्रश्न भारतीय समाज और साहित्य से छुपे नहीं हैं। समय- समय पर कविता, कहानी तथा आत्मकथाओं आदि के माध्यम से उजागर होते रहे हैं। भारतीय समाज जातीय उत्पीड़न को धर्म, परंपरा, रीति रिवाजों या वेद पुराणों आदि का हवाला देकर सही ठहराता रहा हैं। इसी जाति रूपी नागफनी के चलते एक दलित बच्चा शिक्षा के अधिकार से वंचित रह जाता हैं तो दूसरी ओर शिक्षा संस्थानो में दलित छात्रों को जानवरों की भाँति मार खानी पड़ती हैं, तो कहीं शिक्षकों व सवर्ण छात्रों द्वारा भेदभाव का शिकार होना पड़ता हैं।

'जूठन', 'ओमप्रकाश वाल्मीकि' की आत्मकथा हैं जिसमें लेखक ने भारतीय समाज, संस्कृति, धर्म और इतिहास में पवित्र तथा उचित समझे जाने वाले प्रतीकों जैसे शिक्षण संस्थान, शिक्षक एवं प्रेम पर सामाजिक प्रतिक्रियाओं को दिखाया हैं। दलित व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व निर्माण और सामाजिक विकास की प्रक्रिया में इन तीनों प्रतीकों की नकारात्मक भूमिकाओं का सामना करना पड़ता हैं।'जूठन' के नायक मुंशीजी शिक्षण संस्थानों में मार खाते हुए इसलिए पढ़ाई जारी रखते हैं कि पढ़ लिखकर जाति सुधारनी हैं। लेकिन सिर्फ पढ़ने लिखने मात्र से जाति सुधर सकती हैं? पढ़ लिखकर और नौकरी प्राप्त कर जीवन में पद और धन मिल सकता हैं।वहीं समाज में मान-सम्मान और प्रतिष्ठा भी आवश्यक हैं।

"दलित चेतना का सवाल सही है कि इस जन्मना जाति व्यवस्था में जब तक दलितों के साथ दलितों की पहचान जुड़ी हैं। उन्हें सामाजिक श्रेष्ठता में शामिल नहीं किया जा सकता। समाज चाहे उन्हें और जिस रूप में पहचान दे, विवाह और स्त्री-पुरुष के संबंधों में उनके साथ समानता का व्यवहार करना मुश्किल हैं। 'जूठन' में कुलकर्णी जैसे लोग कितने प्रगतिशील क्यों न हो जाए, जब भी प्रेम अथवा विवाह का प्रसंग आएगा, जाति नामक यह ताकतवर दीवार इनके बीच आकर खड़ी हो जाएगी।"4

सुशीला टाकभौरे हिंदी दलित साहित्य की महत्वपूर्ण हस्ताक्षर रही हैं। इनकी आत्मकथा 'शिकंजी का दर्द' सन् 2011 में प्रकाशित हुई। इसमें लेखिका ने बचपन से युवावस्था के तमाम शिकंजों की बुनावट को पेश किया हैं।

प्रस्तुत हैं आत्मकथा का एक गद्यांश जिसमें लेखिका ने मैला ढोने का नारकीय काम करती अपनी नानी के माध्यम से वस्तुस्थिति का वर्णन किया हैं-

"ऐसे ही बरसात का मौसम और सफाई का काम याद करते ही मन किचबिचा जाता। गीला, सड़ा, गिजगिजा, बदबूदार कचरा, गोबर, मैला देखकर ही मितली आ जाती। बजबजाती गंदगी पर मुट्ठी भर राख डालकर वह अपनी किस्मत को कोसती थी।ऐसे समय उसे गाँव बस्ती के लोग शैतान नजर आते। नानी गुस्से में भगवान को कोसते हुए कहती थी- "यह सब तेरी ही करतूत हैं भगवान। मुँह पेट बनायो तो बनायो, जात-पात क्यों बनाई? हम ही क्यों करें नरक सफाई का काम? जिसने रीत बनाई हैं, कभी वे भी करके देखें, तब पता चलेगो।"5

दलित आत्मकथाओं को दलित जीवन का दस्तावेज कहा जाए तो अतिशयोक्ति न होगी। दलित आत्मकथाओं में आर्थिक अभाव, भुखमरी और खान-पान की समस्याएं उभर कर आई हैं। दो वक्त की रोटी के लिए जूठन बटोरने से लेकर, खेत में काम करने, आटा पीसने से लेकर मैला ढोने, मरे जानवर को ढोना और शहर में बेचना इनकी विवशता हैं। इतना सब काम करने के बावजूद भी दो वक्त की रोटी मुहैया नहीं हो पाती थी। जूठन चटखारे लेकर खाई जाती थी। जूठन में मिली सूखी पूड़ियो को कई दिनों तक सुखाकर खाया जाता। तो कभी सुखी रोटी पानी के साथ नहीं करनी पड़ती है।

सुशीला टाकभौरे की आत्मकथा से लिया गया दूसरा गद्यांश जिसमें लेखिका ने अपनी नानी के माध्यम से दलित समाज के जातिगत दंश और आर्थिक अभाव से उत्पन्न कष्टपूर्ण जीवन का वर्णन किया हैं।

"नानी को गाँव का काम पैतृक दाय के रूप में मिला था। दिन भर कड़ी मेहनत करने के बाद रुखा, सुखा, झूठा पाना ही उसका प्राप्य था। नानी अपने काम से, अपनी स्थिति से और मजबूरी से दुखी थी। मगर न तो उसके पास जीवनयापन का कोई दूसरा विकल्प था और न ही कोई नई राह, नई दिशा की जानकारी देने वाला ही मिला जो उसे इस नरक सफाई के काम को छोड़ने की बात कहता। जाति समुदाय के सभी लोगों का यही हाल था।धीरे-धीरे मौसम बदलते, मगर उनका काम नहीं बदलता"।6

दलित आत्मकथाओं में आर्थिक अभाव के कारण वस्त्र न खरीद पाने की समस्या दिखाई गई हैं। गरीबी तथा दो वक्त की रोटी के लिए कड़ा परिश्रम करना पड़े तो वस्त्र खरीदना की बहुत बड़ी बात हैं। दोहरा अभिशाप में कौशल्या बैसंत्री अपने परिवार की आर्थिक स्थितियों के विषय में लिखती हैं-
"बाबा (पिता) को मिल में मशीन साफ करने के लिए कपड़ों की पट्टियाँ मिलती थी। बाबा उनसे अच्छी लंबी पट्टियाँ अलग कर अपनी धोती के नीचे लंगोट की तरफ बांधकर लाते थे। कभी किसी को शक नहीं हुआ। उनमें से कुछ सफेद पट्टियों को अलग करके हम पेटीकोट और चड्डी हाथ से सीते थे। कभी पापा भी बैठकर सी देते थे। बड़ी बहन जनाबाई कपड़े काट देती थी। बहुत दिनों तक हम उन पट्टियों को जोड़कर बनाए गए पेटीकोट-ब्लाउज पहनते रहे। कभी बाबा सुंदर प्रिंट की पटिया लाते थे। उसी से हमने गुजारा किया था।7

सभी आत्मकथाओं की मुख्य समस्या -जातिवाद तथा अस्पृश्यता हैं। जाति के पौधे पर अस्पृश्यता के फूल उगाये जाते हैं। इस दोयम दर्जे से दलित समाज आज भी पीड़ित हैं। इन आत्मकथाओं में जातीय शोषण के अनेकों प्रसंग दर्ज हैं।

मोहनदास नैमिशराय की आत्मकथा 'अपने अपने पिंजरे' में नैमिशराय अपने बड़े भाई के साथ बचपन में बहन के यहाँ जाते हैं। गर्मी के मौसम में रास्ते में प्यास लगती हैं। भाई ने पड़ोस के गाँव एक घर से पानी माँगा। जाति का पता चलने पर जानवरों की भाँति भगा दिया। फिर मजबूरन गंदे जोहड़ का पानी पीना पड़ा।

वही दलित लेखक सूरजपाल चौहान की आत्मकथा के दो भाग तिरस्कृत और संतृप्त सन् 2006 में प्रकाशित हुए। इस आत्मकथा में लेखक ने जातीयता तथा अस्पृश्यता से लेकर जीवन के तमाम अनुभवों का बेबाकी के साथ करुणार्द्र वर्णन किया हैं। इनकी आत्मकथा से प्रस्तुत हैं एक गद्यांश जिसमें उन्होंने जातीयता और अस्पृश्यता के अनुभवों को बताया हैं-
 'तिरस्कृत' में ठाकुर प्रताप जैसे व्यक्तित्व अपने बच्चे को बचपन से ही जातीयता और अस्पृश्यता सिखाते हैं। एक बार हमउम्र बच्चों में लेखक कंचे खेलता हैं।जिसमें लोधे का बनवरिया, काछी का श्यामू और ठाकुर का वीरू भी शामिल हैं। ठाकुर प्रताप बड़ा परेशान था कि उसका वीरू भरी दोपहर में कहाँचला गया? सब के सब बच्चे खेलने में मग्न थे। अचानक ठाकुर प्रताप ने अपने बेटे को नीम के पेड़ के पास देखा। एक संटी तोड़कर चार पांच संटी अपने बेटे को जमा दी। वीरू को पीटते हुए देख बनवारी और श्यामू भाग खड़े हुए। उन दोनों को देख जैसे मैं भागने लगा, तुरंत ठाकुर ने मुझे आगे से आकर धर दबोचा। सटाक-सटाक संटियों की बरसात कर दी इसने मेरे ऊपर।

मेरा कान ऐंठते हुए ठाकुर ने कहा, "साले भंगिया के, मेरे छोरे के संग खोलतू हैं….ठौर मार दूंगों..."
ठाकुर ने अपने बेटे वीरू को घसीटते हुए कुएँ की ओर ले गया। मैं दीवार के सहारे टिका डबडबाई आँखों से सब देख रहा था। ठाकुर ने कुएँ से एक बाल्टी पानी खींचा और नीम की टहनी पानी में डुबोकर वीरू को छींटे देने लगा। वीरू रोते-रोते कह रहा था, "मो पै पानी क्यों डारि रहे हो?"8

दलित स्त्री आत्मकथनों में अभिव्यक्त हुए दलित जीवन के अनुभवों के संदर्भ, परिवेश, समस्याएं और संघर्ष का स्वरूप अनेक रूपों में प्रकट हुआ हैं। दलित स्त्री के जीवन में शिक्षा के लिए संघर्ष, जातिगत पहचान के कारण हर स्तर पर कठिनाई, आर्थिक सबलीकरण, भुख से लड़ाई, स्त्री होने के कारण घर और बाहर होने वाला अपमान, शोषण की तिहरी मार की घटनाओं का चित्रण लेखिकाओं ने किया हैं। 

लगभग सभी आत्मकथाओं में पितृसत्तात्मक सत्ता के दर्शन होते हैं। दलित समाज में भी पितृसत्ता का कड़ा स्वरूप देखने को मिलता हैं। दलित पुरुष द्वारा स्त्री का शोषण, उसके अस्तित्व को नकारना, अस्मिता को दबाना जारी रहता हैं। इन प्रवृत्तियों के विरोध में यदि स्त्री संघर्ष करे तो उसे उखाड़ फेंकने का प्रयास बराबर किया जाता रहा हैं।

दलित साहित्यकार और कवयित्री अनीता भारती की आत्मकथा सन् 2018 में 'छूटे पन्नों की उड़ान' प्रकाशित हुई। लेखिका ने अपने जीवन के तमाम अनुभव को पेश करते हुए दलित स्त्री के जीवन के संघर्ष को प्रस्तुत किया है। समाज की मनुष्यता को भी उजागर किया हैं। लेखिका ने अपने मित्र के माध्यम से पितृसत्ता की बखिया को उखाड़ा हैं। लेखिका दलित छात्र संगठन मुक्ति में शामिल हुई। मुक्ति संगठन में दलित छात्र-छात्राएँ मिलकर सभी छात्रों की समस्याओं के लिए आवाज़ उठाते थे। लेखिका का मित्र 'महेन्द्र' पुरुषों की ओर से प्रतिनिधित्व करता था। एक दिन वह अन्य छात्रों के संग विश्वविद्यालय प्रांगण में पढ़ रही थी। तभी महेंद्र आये और लेखिका से अकेले में बात करने का प्रस्ताव रखा। लेखिका के मित्र 'महेंद्र' ने कहा कि-
"मैं इन लड़को को जानता हूँ। घृणा से मुझे देखते हुए बोला-रंडी! रंडी कहते हैं तुम्हारी जैसी लडकियों को लोग। वह यह शब्द बोलकर तेजी से चला गया। मुझे लगा जैसे मेरे गाल पर किसी ने झन्नाटेदार थप्पड़ मार दिया हो! मैं स्तब्ध खड़ी रह गयी। मेरे कान में उसके शब्द गूंज रहे थे। मैं सोच रही थी कि विश्वविद्यालय में पढ़ने वाली लड़कियाँ यदि अन्य सहपाठी लड़कों के साथ मिल बैठकर बातें कर लें, चर्चा कर लें, तो उन्हें यों कुत्सित उपाधि से विभूषित करने वाली यह कौन सी मानसिकता हैं? मुझे उसकी संकीर्णता का कुछ कुछ तो आभास था।पर इतनी भयंकर संकीर्णता। आखिर मेरा उससे संबंध ही क्या था।केवल बातें करना, एक दूसरे से हँसी-मज़ाक कर लेना, मोर्चों पर एक साथ नारे लगाना या कभी-कभी एक दूसरे का हाल-चाल पूछ लेना और इससे अधिक क्या? क्या इन छोटी-छोटी बातों में स्त्री को उसकी हैसियत दिखा दी जाती हैं। यह महेंद्र नहीं उसके रूप में आदिपुरुष ही बोल रहा था। अपने संगठन के साथियों से चर्चा करो-विमर्श करो तो कोई हर्ज नहीं, क्योंकि उसमें हम भी शामिल हैं, दूसरे संगठन के लोगों से चर्चा विमर्श करो तो चरित्रहीन, क्योंकि वहाँहमारी मर्जी नहीं हैं। यह है छात्र संगठनों में छायी पुरुष मानसिकता। स्त्री अधिकारों की बात करने वाले ये विभिन्न छात्र संगठन के कार्यकर्ता व उनके ठेकेदार अपनी सहयोगी लड़कियों को अपनी पूंजी की तरह समझते हैं। पितृसत्ता और ब्राह्मणवाद की जड़े इनके अंदर इतनी पैठ बना चुकी हैं कि वह नीले, पीले, लाल, हरे रंग में रंगी हो, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता"।9

प्रस्तुत है सुशीला टाकभौरे की आत्मकथा 'शिकंजें का दर्द' से लिया गया एक उदाहरण जिसमें पितृसत्ता का स्वरूप देखा जा सकता हैं। इसमें न केवल दलित समाज का सच बल्कि भारतीय पुरुष की मनोदशा का भी पता चलता हैं-

"जब कभी खाना परोसने में देरी होने पर या किसी बात से नाराज होने पर वे खाना नहीं खाते थे, तब उन्हें घंटों मनाना पड़ता था। कभी-कभी वे स्पष्ट शब्दों में कहते थे- मेरे पैरों पर अपना सर रखकर माफी मांग, तब तेरी बात मानूँगा।"10

महाविद्यालय में प्राध्यापिका का दायित्व क्षमता से निभाने वाली सक्षम सुशीला समाज में जिन्दा हैं जो हमारे देश में पतियों के इन बोल वचनों को सुनने की आदि हो चुकी हैं।

रजनी तिलक की आत्मकथा 'अपनी जमीं अपना आसमां' में विस्थापन की समस्या दिखाई गई हैं। लेखिका के दादा 'दुर्जन सिंह' दलित होने के कारण अनूप शहर के ठाकुर परिवार की चालाकियों से गाँव को छोड़ पूरे परिवार सहित दिल्ली का रु ख कर लेते हैं। पीछे भरा-पूरा खेत-खलिहान, मवेशी आदि छोड़कर पूरे परिवार का पलायन करना और किसान से मजदूर बन जाना त्रासदीपूर्ण हैं।

दलित लेखकों और लेखिकाओं की आत्मकथाओं में स्व की अपेक्षा समाज का चित्रण अधिक मिलता हैं।दलित आत्मकथाओं में लैंगिक शोषण की घटनाओं को दिखाया गया हैं। मोहनदास नैमिशराय की आत्मकथा 'अपने-अपने पिंजरे' के एक गद्यांश से बात स्पष्ट होती हैं-

"उनके घर में पुरुष दारू पीते, सम्टा खेलते।औरतें काम पर जातीं।सारा समाज अशिक्षा में डूबा था।सुबह -सुबह औरतें गोबर पाथने, घास लेने, जंगल से लकड़िया लाकर बेचने जातीं। जहाँपर भी जातीं वहाँ उन जमीदार, काश्तकारों की हवस का शिकार बनतीं या उनका बिस्तर बनतीं। औरतें जंगल जाती हैं। एक टोकरी गोबर पर बिक जाती हैं। उनके पाँव दबाती हैं। उनका बिस्तर बनती हैं।"11 

समस्त आत्मकथाओं में रीति रिवाजों, प्रथाओं और आडंबरों का भी वर्णन हुआ हैं। शराब पीना, मरे हुए मवेशियों की खाल उतारना और उनका मांस खाना और देवी देवताओं के नाम पर सूअर आदि की बलि देना ऐसी ही बुराइयाँ थी। वहीं कुछ अपमानजनक रीति रिवाज जैसे सलाम की प्रथा थी।

संक्षेप में दलित आत्मकथाओं के प्रश्न सामान्यतः किसी एक व्यक्ति के न होकर पूरे समाज के हैं। इसी कारण सभी आत्मकथाओं में अनुभव किसी एक व्यक्ति विशेष के न होकर पूरे समाज के दर्द के दस्तावेज माने जा सकते हैं। हिंदी दलित आत्मकथा में मुख्यतः जातीयता, अस्पृश्यता, शैक्षिक समस्याओं, आर्थिक तंगी, लैंगिक शोषण, पितृसत्तात्मक ढांचे के प्रति विरोध और संघर्षरत महिलाओं के जीवन को दिखाने का प्रयास किया गया हैं। सभी आत्मकथाओं में अपने अपने तरीके से दलित समाज के सच्चाई को सभी के समक्ष प्रस्तुत किया हैं। आत्मकथा लिखना नंगे पैर धारदार तलवार पर चलने के समान हैं। अपने जीवन को सार्वजनिक करना आसान नहीं है।

 वही इन समस्त आत्मकथाओं में रीति रिवाजों, धार्मिक आडम्बरों, प्रथाओं को उदाहरण सहित दिखाया गया हैं।

संदर्भ ग्रन्थ सूची

1. नैमिशराय, मोहनदास, 2018, हिंदी दलित साहित्य, साहित्य अकादमी, दिल्ली, पृष्ठ 172
2. अरुणा, डी, 2018, हाशिए पर, नई दिल्ली, मई अगस्त अंक, पृष्ठ 69
3. ठाकुर, डॉक्टर हरिनारायण, 2018, दलित साहित्य का समाजशास्त्र, भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली, पृष्ठ 449
4. टाकभौरे, डॉक्टर सुशीला, 2011, शिकंजे का दर्द, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ 26
5. टाकभौरे, डॉक्टर सुशीला, 2011, शिकंजे का दर्द, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ 24
6. यादव, डॉ वीरेंद्रसिंह, 2012, समय से मुठभेड़ करती दलित आत्मकथाएं, पेसिफिक  पब्लिकेशन, दिल्ली, पृष्ठ 129
7. भारती, अनीता, 2018, छुट्टी पन्नों की उड़ान, स्वराज प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ 64
8. टाकभौरे, डॉक्टर सुशीला, 2011, शिकंजे का दर्द, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ 144
9. नैमिशराय, मोहनदास, 1995, अपने-अपने पिंजरे, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ 83

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