हम इन साहित्यकारों से इतना प्रकाश ले सकते हैं कि हमारी आत्माएँ जगमगा उठेंगी

समीक्षा: अभिषेक मिश्र


पुस्तक: साहित्य मनीषियों की अद्भुत दास्तानें
लेखक: प्रकाश मनु
प्रकाशक: डायमंड बुक्स, नई दिल्ली
संस्करण: 2023
पृष्ठ संख्या: 446
मूल्य: ₹ 495 रुपए

हिंदी के सुविख्यात कवि-कथाकार और संपादक प्रकाश मनु जी के निराले संस्मरणों की पुस्तक ‘साहित्य मनीषियों की अद्भुत दास्तानें’ डायमंड बुक्स से हाल ही में प्रकाशित हुई है। हिंदी अकादमी के साहित्यकार सम्मान और साहित्य अकादेमी के प्रथम बाल साहित्य पुरस्कार से सम्मानित, अपने ढंग के विलक्षण धुनी लेखक प्रकाश मनु जी की यह पुस्तक सभी को पढ़नी चाहिए। इसलिए कि इसमें हिंदी के दिग्गज साहित्यकारों के ऐसे गहगहे, अंतरंग संस्मरण हैं, जिनका कोई जोड़ नहीं। 

प्रकाश मनु जी का पूरा जीवन हिंदी के बड़े साहित्यकारों की संगत में गुजरा है। लोक यायावर देवेंद्र सत्यार्थी, शीर्ष आलोचक रामविलास शर्मा, बाबा नागार्जुन, त्रिलोचन, रामदरश मिश्र, शैलेश मटियानी, विष्णु खरे, डा. माहेश्वर, हरिपाल त्यागी, शेरजंग गर्ग और बल्लभ सिद्धार्थ समेत कितने ही सिरमौर साहित्यकार हैं, जिनका आत्मीय सान्निध्य उन्हें मिला। इसीलिए वे बड़े गर्व के साथ कहते हैं कि “मेरे जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य यह है कि मुझे हिंदी के बड़े साहित्यकारों के चरणों में बैठकर सीखने को मिला। मेरे जीवन की सबसे बड़ी दौलत भी यही है, दुनिया का बड़े से बड़ा खजाना या बड़े से बड़ा पुरस्कार भी जिसका मुकाबला नहीं कर सकता!”

अभिषेक मिश्र
अन्य लेखकों की तरह मनु जी से भी यह प्रश्न बहुत बार पूछा जाता है कि वे लेखक ही क्यों हुए, कुछ और क्यों नहीं। यह पुस्तक जाने-अनजाने इसका जवाब भी है। ‘साहित्य मनीषियों की अद्भुत दास्तानें’ पुस्तक पढ़ते हुए आपको कदम-कदम पर इसका जवाब मिलेगा। साथ ही प्रकाश मनु जी के लेखक बनने का क्रम आपको समझ में आएगा कि कैसे बड़े साहित्यकारों के सान्निध्य में हुई मुलाकातों से जो कुछ मिला, उससे एक वेगवाही झरने की सी क्षिप्रता और आंतरिक आह्लाद से विकल होकर उन्होंने अपनी झोली भर ली। 

मनु जी का साहित्य उतना ही सीधा, सरल और भावनात्मक है, जितना उनका अपना व्यक्तित्व। वे एक छोटे से बच्चे की तरह सीधे-सरल और प्रेममय हैं। निस्संदेह, जो व्यक्ति अथाह स्नेह से भरा हुआ हो, वही ऐसी भावमग्न कर देने वाली कहानियाँ लिख सकता है, जिनमें प्रेमचंद जैसी सादगी, सहजता और गहराई है। और फिर कहानियाँ ही क्यों? उनकी लिखी कविता हो, या उपन्यास, संस्मरण, रेखाचित्र, या फिर समीक्षा और आलोचनात्मक लेख ही क्यों न हों, सब आपको अपने साथ बहा ले जाते हैं। यही कारण है कि प्रकाश मनु अपने समकालीन अन्य लेखकों से इतने अलग हैं और उन्हें प्यार करने वाले पाठकों की बहुत बड़ी संख्या है। ऐसे पाठक और प्रशंसक, जो उनके लिखे साहित्य को ढूँढू-ढूँढ़कर पढ़ते हैं। सच ही उन्होंने हिंदी के बड़े और दिग्गज साहित्यकारों के सान्निध्य में जो कुछ सीखा और पाया, वही आज उनकी कलम की शक्ति और दुर्वह आकर्षण भी है।

यही कारण है कि ‘साहित्य मनीषियों की अद्भुत दास्तानें’ पुस्तक पढ़कर आपको मनु जी के लेखक बनने की पूरी कहानी का पता चलेगा, कि कैसे साहित्यकारों के आस-पास रहकर उन्होंने अपनी लिखने की उर्वरा ज़मीन को मजबूत किया है, और उसे विस्तार भी दिया है। फिर पुस्तक की एक बड़ी खासियत यह भी है कि पढ़ते हुए एक आम पाठक को यह कहीं भी बोझिल नहीं लगती, और इसमें कुछ ऐसी किस्सागोई है कि नदी की धारा की भाँति बहती चली जाती है। शब्दों का चयन और वाक्यों का विन्यास भी बिल्कुल सटीक है तथा करीब साढ़े चार सौ पृष्ठों की इस पुस्तक की रोचकता अंत तक बरकरार रहती है।

प्रकाश मनु
मनु जी के इन संस्मरण और साक्षात्कारों का ‘पहल’, ‘वागर्थ’, ‘नया ज्ञानोदय’, ‘वीणा’, ‘अक्षरा’, ‘साहित्य अमृत’, ‘साहित्य आजतक’ तथा ‘सेतु’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपना भी इनकी गुणवत्ता को दिखाता है। कहना न होगा कि इन सभी पत्रिकाओं की साहित्य जगत में ऊँची जगह है, और ये पर्याप्त चर्चा में रही हैं। इसके अलावा विस्तृत आकार-प्रकार के इक्कीस संस्मरणों को एक बृहत् पुस्तक के कलेवर में संगृहीत करने के पीछे लेखक का मूल भाव यही रहा होगा कि हमें अपने पुरखों को कभी नहीं भूलना चाहिए, जिन्होंने सचमुच हमें गढ़ा है।

उन बड़े और दिग्गज साहित्यकारों को एक बार फिर से स्मृतियों में लाना ही लेखक का उद्देशय है। और जिन बड़े साहित्यकारों ने साहित्य-सृजन के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया, उन्हें इतनी जल्दी भुला दिए जाने के दुख और अथाह पीड़ा ने ही लेखक से यह पुस्तक लिखवा दी, जिसमें साहित्य जगत की इक्कीस सर्वाधिक उज्ज्वल मणियों को माँ सरस्वती के एक सुंदर गलहार के रूप में पिरोया गया है। कहना न होगा कि हिंदी के बड़े साहित्यकारों के प्रति मनु जी के असीम आदर और सम्मान की भावना के कारण ही, अपने ढंग की यह विशिष्ट और अद्वितीय कृति आपके समक्ष उपस्थित है।

जैसा कि पहले भी कहा गया है, इस बृहत् ग्रंथ में मनु जी ने तीन पीढ़ियों के कुल 21 बड़े साहित्यकारों की संस्मरणात्मक जीवनियों को शामिल किया है। ये स्वनामधन्य साहित्यकार हैं—लोकसाधक देवेंद्र सत्यार्थी, विष्णु प्रभाकर, रामविलास शर्मा, बाबा नागार्जुन, त्रिलोचन, भीष्म साहनी, रामदरश मिश्र, नामवर सिंह, विद्यानिवास मिश्र, श्यामाचरण दुबे, धर्मवीर भारती, रघुवीर सहाय, शैलेश मटियानी, कन्हैयालाल नंदन, विश्वनाथप्रसाद तिवारी, लाखनसिंह भदौरिया सौमित्र, डॉ. शेरजंग गर्ग, बालस्वरूप राही, हरिपाल त्यागी, विष्णु खरे और बल्लभ सिद्धार्थ

यह सूची ही काफी हद तक बता देती है कि मनु जी के मन का आयतन कितना बड़ा है और कितनी विविधताओं भरे लेखकों के साथ वे इतना आत्मीय संवाद साध सके। निश्चय ही यह कोई आसान काम नहीं रहा होगा। पर जैसा कि मैंने पहले भी कहा है, मनु जी का दिल बहुत बड़ा है और उसमें विविध शख्सियतों वाले हमारे बड़े लेखकों के रह पाने के लिए काफी जगह है। फिर मनु जी के भीतर विचारों का एक लोकतंत्र भी है, जिससे वे अपने से भिन्न, यहाँ तक कि विरोधी विचारों का भी सम्मान कर सकते हैं। यह एक बड़ा ही दुर्लभ गुण है, जो मनु जी को हमारे समय के बहुत सारे लेखकों की भीड़ से अलगाता भी है।

यों यह पुस्तक हमारे दौर की बहुत सी असहिष्णुताओं का जवाब भी है, और यह काम प्रकाश मनु जी ने कैसे कर दिखाया है, यह जानने के लिए ‘साहित्य मनीषियों की अद्भुत दास्तानें’ पुस्तक का हर शब्द बड़े ध्यान से पढ़ना होगा।
*

पुस्तक में पहला संस्मरण देवेंद्र सत्यार्थी जी पर है, जिन्हें मनु जी अपना कथागुरु मानते हैं। उनके पास बैठकर प्रकाश मनु जी ने सीखा कि लिखना क्या होता है। सिर्फ लिखना ही नहीं, और भी बहुत कुछ उन्होंने सत्यार्थी जी से ही सीखा। इनमें जीवन जीने के कुछ अनोखे गुर भी हैं, जो किताबों से नहीं, बल्कि सत्यार्थी जी जैसे महान लेखकों की संगत में ही सीखे जा सकते हैं। खुद मनु जी लिखते हैं—
“सो दिल्ली मुझे बेगाना सा शहर लगता था। अंदर कोई कहता था, ‘यहाँ से भाग चलो, प्रकाश मनु। यह शहर तुम्हारे लायक नहीं है या शायद तुम ही इसके लायक नहीं हो...!’ 
“मुझे लगता था, भला कोई सीधा-सादा आदमी दिल्ली में कैसे रह सकता है? पर सत्यार्थी जी से मिला तो लगा, ‘अरे, ये तो मुझसे भी सीधे हैं। बिल्कुल बच्चों की तरह।...अगर ये दिल्ली में रह सकते हैं तो मैं क्यों नहीं?”

इसी तरह पहली बार सत्यार्थी जी ने ही मनु जी को जीना सिखाया। उन्होंने एक मीठी फटकार लगाते हुए कहा, “तुम अपने आनंद में आनंदित क्यों नहीं रहते हो?...खुश रहा करो मनु।...तुमने कोई अपराध थोड़े ही किया है। खुलकर हँसना सीखो, खुलकर जियो।...हमें यह जीवन आनंद से जीने के लिए मिला है। अगर तुम यह सीख लो, तुम्हें कोई मुश्किल नहीं आएगी।”

और सचमुच सत्यार्थी जी के नजदीक आते ही, मनु जी के आगे रास्ते खुलते चले गए थे। और जैसा कि वे कहते भी हैं, उन्हें “जीने का तरीका आ गया था।”

इसी तरह सत्यार्थी जी ने ही पहली बार मनु जी को साहित्य और कला का एक अनोखा गुर बताया था, जिसे वे आज तक नहीं भूले। ऐसे विरल किस्म के साहित्यकार देवेंद्र सत्यार्थी की विलक्षण शख्सियत बारे में मनु जी लिखते हैं, तो उनके शब्द-शब्द से मानो भावनाओं की नदी बहने लगती हैं—
“सच तो यह है कि लोकगीत की खोज करते-करते देवेंद्र सत्यार्थी खुद एक लोकगीत बन गए, जिसकी मार्मिक धुन और करुणा हमारे अंतरतम को बेधती है और हमारे कंधे पर हाथ रखकर हमें कुछ और निर्मल, कुछ और संवेदनशील इनसान बनने को न्योतती है! यहाँ तक कि गौर से सुनें तो समूची बीसवीं सदी के साहित्य और संस्कृति की ‘मर्म-पुकार’ उसमें सुनाई दे सकती है! इससे बड़ा और सार्थक जीवन भला सत्यार्थी जैसे विलक्षण लोकयात्री का और क्या हो सकता था।”

इतने सुंदर और मार्मिक भाव कि पढ़ते हुए आप भी भावनाओं के एक तीव्र आवेग में बहने लगते हैं। अगर आप गंभीरता से पुस्तक का आकलन करेंगे तो पाएँगे इन बड़े-बड़े साहित्यकारों के बहाने, असल में मनु जी खुद को ही लिख रहे है।

लेकिन नहीं, लिख तो वे साहित्यकारों के बारे में ही रहे हैं, और साथ-साथ यह भी रेखांकित करते जाते हैं कि भला इन दिग्गजों में ऐसा क्या है कि वे याद आते हैं और बार-बार याद आते हैं। और कि हम क्यों नहीं भूलते इनको? क्योंकि जिस दिन हम अपने प्रेरणाशील पुरखों और पुरानी जड़ों को भूल जाएँगे, उस दिन हमारा अस्तित्व ही नहीं बचेगा। हम सूखे पेड़ के समान हो जाएँगे, और अपनी हरियाली खो देंगे। इस आमद-रफ्त में आने आप को बचाए रखने के लिए सबसे ज्यादा ज़रूरी है कि हम जितना हो सके, अपने पुरखों से सीखें और उनका आशीर्वाद हम सभी पर बरसता रहे।

ऐसे ही मनु जी बरसों तक रामविलास जी के सान्निध्य में रहे। रामविलास शर्मा का व्यक्तित्व निर्भीक और खासा तेजस्वितापूर्ण है, और उन्होंने अकेले दस आलोचकों के बराबर काम किया है। वे हिंदी के महान साहित्यकार, विचारक, सभ्यता समीक्षक और आलोचक थे। मनु जी ने रामविलास शर्मा सरीखे दिग्गज साहित्यकार के सान्निध्य में क्या कुछ सीखा, और कैसे रामविलास जी बिना कुछ कहे, चुप-चुप उन्हें गढ़ रहे थे, इस बारे में आइए, मनु जी से ही सुनते हैं—
“...पुरस्कार और सम्मानों के लिए उनकी घोर विरक्ति ने मेरी आँखें खोल दीं, और बिन कहे समझा दिया कि एक सच्चा लेखक क्या होता है। एक लेखक का स्वाभिमान क्या होता है! बहुत से लोग और संस्थाएँ उन्हें आदर से बुलाती थीं, सम्मानित करना चाहती थीं। पर रामविलास जी के लिए उनका काम ही सब कुछ था। अपना काम बीच में छोड़कर, यहाँ-वहाँ सम्मानित होने चल देना उन्हें बड़ा ही हेय, बल्कि हास्यास्पद लगता था। उनका मानना था कि किसी लेखक का सच्चा सम्मान तो उसका साहित्य पढ़ना है। इसलिए कोई उन्हें सम्मानित करने के लिए आमंत्रित करता तो उनका जवाब होता था, आप मेरा लिखा हुआ पढ़ लीजिए। बस, यही मेरा सम्मान है!

“कहना न होगा कि रामविलास जी का यह तरीका मुझे बहुत भाया और उसने पुरस्कारों के मायाजाल के साथ-साथ, बहुत तरह के भटकावों से भी मुझे बचाया। एक ऐसे समय में जब युवा लेखकों को ही नहीं, खासे पहुँचे हुए साहित्यकारों को भी मैं पुरस्कारों के लिए लालायित होकर यहाँ-वहाँ दौड़ते देखता हूँ, रामविलास जी की दृढ़ता मुझे राह दिखाती रही है।”

इसी तरह रामविलास जी से प्रकाश मनु ने लोभ और लालच से परे, एक खुद्दार लेखक के रूप में दृढ़ता और निर्भीकता से अपनी बात कहना सीखा। वे लिखते हैं—
“ऐसे बुरे वक्त में जब साहित्य की जमीन पर लोभ-लालच की फिसलन कहीं ज्यादा है, रामविलास जी ने मुझे मजबूती से पैर जमाकर, पूरे स्वाभिमान के साथ सिर उठाकर खड़े होने की ताकत दी। यही मेरी जीवनशक्ति भी है, जो मुझे बुरे से बुरे समय और हालात में भी हारने नहीं देती, और कलम के स्वाभिमान के साथ जीने के लिए प्रेरित करती है, जैसे स्वयं रामविलास जी जिए। वे अंतिम साँसों तक काम करते हुए गए। मैं भी मन ही मन यही प्रार्थना करता हूँ कि अंतिम साँसों तक काम करते हुए खुशी-खुशी इस दुनिया से जाऊँ!” 

ऐसे ही और बहुत से रोचक और सीख देने वाले प्रसंगों से सराबोर है यह पुस्तक, जिसका हर कोना आपको भावनात्मक और वैचारिक रूप से अधिक समृद्ध और उन्नत बनाने का काम करती है। 

अगर मैं पुस्तक में शामिल सभी साहित्यकारों की शख्सियत और उनसे जुड़े रोचक प्रसंगों की चर्चा करूँ,  तो बात बहुत लंबी हो जाएगी। फ़िलहाल मैंने कुछ बानगियाँ ही प्रस्तुत की हैं। अवसर मिला तो आगे फिर कभी इस पर विस्तृत बात होगी। अगर हम सभी साहित्यकारों से जुड़े संस्मरणों के शीर्षक भी पढ़ें तो पुस्तक का जैसे पूरा सार ही सामने आ जाता है। इससे मनु जी की कलम का कमाल और लेखन कला की बारीकी पता चलती है, कि वे किस तरह अपने जीवन में घटित होने वाले छोटे से छोटे प्रसंगों को भी विचारों की अजस्र धारा से जोड़कर उनमें एक नई चमक ले आते हैं।

यों तो पुस्तक पढ़ने के बाद ऐसी बहुत सारी बातें हैं जो अब भी मन में उथल-पुथल सी मचा रही हैं, लेकिन उन सबको लिख पाना शायद कठिन है। उदाहरण के लिए भाषा और शिल्प की बात करें तो मनु जी कविता लिखें या कहानी, उपन्यास, संस्मरण, आत्मकथा, रेखाचित्र, या फिर कोई आलोचनात्मक लेख, वे बहुत ही सहज तरीके से अपनी बात कहते हैं। उन्हें प्रेमचंद की तरह सीधी, सहज और किसी नदी सरीखी बहती हुई भाषा अधिक प्रिय है। अधिक स्पष्ट रूप से कहूँ, तो ‘साहित्य मनीषियों की अद्भुत दास्तानें’ पुस्तक में मनु जी की भाषा बोलचाल की एकदम सादा और खुली भाषा है, जिसमें लोगों और विचारों की आवाजाही निरंतर चलती रहती है।

इसके साथ ही कुछ एकदम ग्राम्य या देहाती शब्द उनके यहाँ आकर एक अलग ही प्रभाव छोड़ते हैं। इसी तरह हमारी रोजमर्रा की बोलचाल में आ गए अंग्रेजी शब्दों का भी वे निस्संकोच प्रयोग करते हैं। फिर एक बात यह बात भी है कि पुस्तक के बहुत से संस्मरणों में लेखकों से मुलाकात या साक्षात्कार की स्मृतियाँ छाई हुई हैं। तो जाहिर है, कि इसमें बतकही की गुंजाइश कहीं ज्यादा है, और मनु जी बड़े अनोखे ढंग से उसे आगे बढ़ाते हैं। यों इन संस्मरणों में संस्मरण और साक्षात्कार, दोनों का ही मिला-जुला रंग मिलेगा। यही इस पुस्तक की खूबसूरती भी है, जो आपको अपनी ओर खींचती है।

एक और उदारहण देखिए। पुस्तक में भीष्म साहनी जी पर एक बड़ा ही सुंदर और भावनात्मक संस्मरण है, जिसका शीर्षक है, ‘वह हँसी बहुत कुछ कहती थी!’ और इस संस्मरण के अंत में देखिए कि मनु जी कितने सुंदर ढंग से लेखक की शख्सियत का बखान करते हैं, और मन पर पड़े उसके प्रभाव को बड़े निर्मल ढंग से सामने रख देते हैं—
“भीष्म जी का समूचा लेखन इस बात के लिए ललकारता है कि हम हिंदीभाषी लोग अपने बड़े लेखकों और समाज के बीच की खाई को पाटें, तो उन बहुत से नैतिक प्रश्नों के उत्तर भी खोज सकते हैं, जो आज पूरे भारतीय समाज में उथल-पुथल मचा रहे हैं। भीष्म जी के साहित्य में वह बहुत कुछ है, जो आज फिर से हमें मनुष्य होने की संवेदना से भरकर अपनी जड़ों की तलाश में मदद देता है और अपनी कमजोरियों से उबरकर भविष्य की ओर देखने की शक्ति देता है। इस लिहाज से भीष्म जी के साहित्य के पुनर्पाठ की चुनौती आज हम सभी के सामने है।”

ठीक ऐसे ही रामदरश मिश्र जी सरलता और सादगी का मनु जी पर बहुत गहरा असर पड़ा। और यह सरलता और सादगी केवल रामदरश जी की शख्सियत का ही हिस्सा नहीं है, बल्कि उनका समूचा लेखन ही इसकी बड़ी ही खूबसूरत मिसाल है। लगता है, जैसे रामदरश जी प्रेमचंद की ही परंपरा को आगे बढ़ रहे हों। इस लिहाज से रामदरश जी की गजल ‘बनाया है मैने यह घर धीरे-धीरे’ एक तरह से रामदरश जी के पूरे जीवन की कहानी कह देती है। मनु जी लिखते हैं—

“‘सहचर है समय’ पढ़कर पता चलता है कि निपट गँवई गाँव का एक अभावों में पलता और थोड़ा-सा झिझका हुआ भयकातर बच्चा कैसे धीरे-धीरे अपनी सीमाओं और अभावों से टकराता है, अपने समय के थपेड़े झेलता है और धीरे-धीरे राह बनाता हुआ आगे निकलता जाता है। इस रास्ते में उसे दुख, अपमान, बार-बार की पराजय, विश्वासघात के धक्के और जख्म, क्या कुछ नहीं मिला। लेकिन सबको वह अपने समय का प्रसाद मानकर ग्रहण करता है। और अपनी ही गति से एक ईमानदार राह पर आगे बढ़ता जाता है। तमाम हैं, जो शॉर्टकट के सहारे आगे निकलना चाहते हैं, बहुत-से उसे टँगड़ी मारकर भी आगे बढ़ जाना चाहते हैं। वह सबको देखता है, समझता है, पर अपनी राह नहीं छोड़ता और एक दिन उसी राह पर चलते-चलते वह हासिल करता है जो किसी भी लेखक का, एक सच्चे और ईमानदार लेखक का प्राप्य है।”

इसी तरह रामदरश जी की आत्मकथा ‘सहचर है समय’ मनु जी को बहुत प्रिय है, जिसमें रामदरश जी ने अपनी आत्मकथा के बहाने अपने पूरे समय की कथा कह दी है। इसे पढ़कर मनु जी ने जो पंक्तियाँ लिखी हैं, उससे उनकी बारीक निगहहानी का पता चलता है—
“खास बात यह है कि आत्मकथा लिखते समय रामदरश जी कैमरे का ‘लेंस’ सिर्फ खुद पर नहीं रखते, उसे लगातार अपने साथियों और सहयात्रियों पर घुमाते रहते हैं।”

और फिर इस संस्मरण का अंत बेहद मार्मिक है, जिससे इसके शीर्षक का औचित्य सामने आ जाता है—
“हालाँकि अपनी लेखकीय उपलब्धियों को हासिल करने के लिए उन्होंने न कभी उतावली दिखाई और न औरों की तरह बढ़-चढ़कर हाथ मारे। उनकी एक बढ़िया और बहुचर्चित गजल के शेर चंद अल्फाज में उनके संघर्ष की पूरी कहानी कह डालते हैं:

बनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरे,
खुले मेरे ख्वाबों के पर धीरे-धीरे।
किसी को गिराया न खुद को उछाला,
कटा जिंदगी का सफर धीरे-धीरे।
जहाँ आप पहुँचे छलाँगें लगाकर,
वहाँ मैं भी आया, मगर धीरे-धीरे।…
जमीं खेत की साथ लेकर चला था,
उगा उसमें कोई शहर धीरे-धीरे।
मिला क्या न मुझको ए दुनिया तुम्हारी,
मोहब्बत मिली, मगर धीरे-धीरे।”

मनु जी आगे बड़े मार्मिक शब्दों में लिखते हैं, “जहाँ छलाँगें लगाने वाले लोगों का ही बोलबाला हो, वहाँ अब भी रास्ते पर धीरे-धीरे मगर दृढ़ता से चलता एक ईमानदार आदमी मिल जाए, यह चीज खुद में क्या आस्था देने वाली नहीं है। क्या यही वजह नहीं है कि रामदरश जी का पूरा साहित्य आदमी पर विश्वास और आस्था का साहित्य है और उन्हें पढ़ना अपने आपसे मिलने जैसा है!”

पुस्तक में ऐसे ही और भी साहित्यकारों के एक से एक रसमग्न कर देने वाले संस्मरण है, जिन्हें आप खुद पढ़ें, तभी उनका पूरा आनंद आएगा। किंतु एक बात का विश्वास मैं ज़रूर दिला सकता हूँ कि इस पुस्तक को पढ़ने के बाद आप अपने आप को भीतर-बाहर से बदला हुआ महसूस करेंगे। इस मानी में यह पुस्तक आपको कहीं अधिक सभ्य और सुसंस्कृत बनाएगी। और बेशक यह आपके अंदर के अदमीपन को हरा कर देने की सामर्थ्य लिए हुए है। 

सच पूछिए तो प्रकाश मनु जी के आत्मीय संस्मरणों की पुस्तक ‘साहित्य मनीषियों की अद्भुत दास्तानें’ इतनी रोचक, रसपूर्ण और किस्सागोई वाले आनंद से लबरेज है कि एक बार पढ़ना शुरू करने के बाद आप इस बातकही की दुनिया से बाहर आना ही नहीं चाहेंगे। कम से कम मैं तो जितनी देर तक इसने डूबा रहा, उतना ही आत्मिक सुख में भीगता रहा। उम्मीद है कि मेरी ये चंद सतरें पाठकों को भी बड़ी ही रसपूर्ण बतकही से निकले रंग-रंग के इन भावनामक संस्मरणों के निर्मल सरोवर में नहा लेने को प्रेरित करेंगी।
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परिचय: अभिषेक मिश्र

सहृदय लेखक और युवा आलोचक अभिषेक मिश्र खासे अध्ययनशील और गुरु गंभीर प्रकृति के हैं। साथ ही बच्चों जैसे सरल भी। बचपन से ही लिखने-पढ़ने में गहरी रुचि। किशोरावस्था में ही प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद और निराला सरीखे बड़े साहित्यकारों को बहुत डूबकर पढ़ा। तब से लेखक होने का सपना ही उनके जीवन का सबसे बड़ा सपना बन गया। 
साहित्यमना युवा लेखक अभिषक की कविताओं में अधिक दिलचस्पी है। खासकर सर्वेश्वरदयाल सक्सेना और उनकी कवि-शख्सियत की खुद्दारी और विद्रोही तेवर उन्हें बेहद आकर्षित करता है, और आगे चलकर वे उन पर बड़ा काम करना चाहते हैं।
अभिषेक एक स्वप्नशील युवक हैं, जो हर क्षण साहित्य में ही साँस लेते हैं, और साहित्य ही उनका ओढ़ना-बिछौना है। हिंदी के बड़े साहित्यकारों के अंतरंग इंटरव्यूज और आत्मीय संस्मरण खोज-खोजकर पढ़ते हैं, ताकि उनकी रचनाओं के साथ मिलाकर एक मुकम्मल मानस छवि निमित कर सकें। फिलवक्त डायमंड बुक्स प्रकाशन समूह में संपादक। साथ ही हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रहे हैं। संपादक बनने के क्रम में ही पढ़ने से अधिक पढ़ जाने की इच्छा होती है। 
अभिषेक का परिवार बरसों पहले मध्य प्रदेश के रीवा से आकर दिल्ली बस गया था। लेकिन रीवा की अद्भुत प्राकृतिक सुषमा और अपार शांति उन्हें अब भी मोहती है। इसलिए बरसों से दिल्ली में रहने के बावजूद कभी पूरी तरह दिल्ली वाले नहीं बने, और न आगे भी ऐसी कोई संभावना है।
जाकिर हुसैन कालेज से स्नातक की पढ़ाई के दौरान काफी नाटक किए। तब से नाटक और अभिनय का नशा भी जीवन से अभिन्न रूप से जुड़ गया। शेक्सपियर के ‘मर्चेंट ऑफ द वेनिस’ का हिंदी रूपांतरण तथा आगा हश्र कश्मीरी के ‘सफेद खून’ नाटक में अभिनय, इस दौर की स्मरणीय घटनाएँ। कुछ दोस्तों के साथ मिलकर ‘ट्रैजिक सिनेमा’ संस्था बनाई, जिसमें फिल्म मेकिंग की जाती है। इधर कुछ अरसे से काफी साहित्यिक लेख, समीक्षा, टिप्पणियाँ, रिपोर्ताज आदि लिखे हैं, जिन्हें अच्छी और ख्यात साहित्यिक पत्रिकाओं में स्थान मिला है।

पता: 148 गली न. 6, ज्वाला नगर, शाहदरा, दिल्ली – 110032
चलभाष: 8178500732,
ईमेल: abhishekdpb@gnail.com

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