पाँच कविताएँ: प्रकाश मनु

प्रकाश मनु

प्रकाश मनु


(1) चिड़िया का घर

चिड़िया को घर बनाना है
चिड़िया के पास कुछ खास नहीं,
मगर क्या नहीं है चिड़िया के पास?

तिनके हैं घास है
जरा सी कला-कला ढेर सा उछाह
और एक बड़ी जिजीविषा
धूप और पानियों और सादा आसमानों
की तरह फैली दूर तलक
आखिर क्या नहीं है चिड़िया के पास!

सूतली?
हाँ, सूतली...

चिड़िया परेशान!
महानगर में सूतली...?
मगर डर क्या
अगले ही पल वो उड़ी
और उड़ के गई वहाँ जहाँ ढीली खटिया पर बैठा कवि
लिखने के बाद कविता पढ़ रहा है कोई किताब

चिड़िया देखती है कवि की कविता, किताब, चेहरा
और भरपूर दृष्टि फैला देती है चारपाई पर,
उसकी चौकन्नी नजरें देख लेती हैं
चारपाई का कौन सा कोना है उसके काम का!

एक निर्भीक दृष्टि डाल कवि के चेहरे पर
चिड़िया शुरू करती है अपना काम
आराम से

चोंच की ठूँग मार-मारकर निकालती है
मूँज, निकालती है सूतली
दस मिनट, मुश्किल से दस मिनट
और अब दुनिया उसकी है
उसका है जहान
चिड़िया चोंच में भर लेती है उतना
जितना भी उसके बस में है

और यल्लो, चिड़िया पंखों पर
नहीं, चिड़िया पर-पर है
चिड़िया है घर की रानी, चिड़िया है सोनपरी
बिटिया है लाडली सूरज की
घास, तिनके, धूप, उत्साह के साथ मिलाकर सूतली
अपनी अचूक कला से
रचेगी वह घर
जरूर रच लेगी कल तलक!

कैसा भी हो माहौल
कैसा भी युद्ध या अकाल
चिड़िया को घर बनाने से भला कौन
रोक पाएगा?
***


(2) फतेहपुर सीकरी से लौटकर

धन्यवाद भाई भगवान सिंह
याद रहेगा तुम्हारा हर वक्त कुछ न कुछ कहता
किसी पुरानी खस्ताहाल सुर्री जैसा खिंचा माथा
तुम्हारा उत्साह, तुम्हारी बातें!

पहली बार पत्थरों को जीवित
होकर बोलते सुना तुम्हारी बातों में
पहली बार पत्थरों में देखी एक समूची दुनिया
जो इतिहास के लंबे गलियारे पार कर
सन् अट्ठानबे की जून की लपटदार गरमियों
तक चली गई

यहाँ बादशाह अकबर का आरामकक्ष था साहब
यहाँ बिछती थी उनकी शैया
भीनी-भीनी खुशबुओं वाला पानी छोड़ा जाता था उसके चौगिर्द 
इधर वाले ताल से
यहाँ मंत्रणागृह था यहाँ घुड़साल यहाँ अस्पताल
यहाँ चौसर खेली जाती थी बड़े ही अजीबोगरीब तरीके से
आप गौर करें साहब,
गोटियों की जगह बैठती थीं सजी हुई बाँदियाँ

यहाँ दीवानेखास था जहाँ विराजते थे अगल-बगल बादशाह के
मंत्री सलाहकार अपने-अपने आसन पर
यहाँ दीवाने-आम...आम जनता के लिए
यहाँ जोधाबाई का महल यहाँ रुकैया बेगम
यहाँ मरियम का!

आपको मालूम ही होगा बाबू साहब
अकबर की रानियाँ थीं तीन, तीनों अलग-अलग
धर्मों की
सबसे बड़ी जोधाबाई, सबसे छोटी मरियम—बिचली रुकैया बेगम,
दीने इलाही चलाया था न उसने बाबू साहब!
इस विशाल खंभे का खूबसूरत आर्किटैक्चर देखिए साहब
दंग रह जाएँगे आप
यहाँ हिंदू, मुसलिम, क्रिश्चियन तीनों की झलक
है एक साथ

यह आलीशान हवामहल एक सौ छयत्तर खंभों वाला
देख रहे हैं न,
यह बादशाह और रानियों की हवाखोरी के लिए बना था
यहाँ थी बगल में जोधाबाई की रसोई
यहाँ खाना बनता था बड़े-बड़े कड़ाहों में
और इधर शाही डाइनिंग रूम
पास ही खुशबूदार पानी के फव्वारे चलते थे।

और इधर देखिए, बीरबल का महल
इधर हाथी की समाधि...!
आपको बताया था न किस्सा हाथी का बाबू साहब,
जो आया था अकबर की ससुराल से!
भरी सभा में पाक साफ और गुनहगार का
सही-सही फैसला करता था वही हाथी
बड़ा कमाल का था साहब
क्या खूब था उसका दिमाग,
पैरों से कुचल डालता था देखते ही पापी
अनाचारी को—एक झपाटे से!

यह थी बावड़ी यहाँ गुस्ल करती थीं रानियाँ
और जोधाबाई का मंदिर, जरा गौर फरमाएँ
और यहाँ तुलसी का चौरा हुआ करता था
जी साहब, इसी घेरे में
यहीं हुई थी त्योरस बरस फिल्म की
शूटिंग...

प्यारे भगवान सिंह!
लौटा तो आज कोई हफ्ते भर बाद भी
फतेहपुर सीकरी के पत्थर, खूबसूरत जालियाँ
बेल-बूटे और पुरानी-धुरानी खुशबुओं में लिपटी हवाएँ तक
कर रही हैं रुक-रुककर संवाद

और तुम्हारे मुँह से झर रहे थे जो किस्से
बेशुमार किस्से और आख्यान तब
वे झर रहे हैं अब भी
मेरी स्मृति में टप-टप फूलों की तरह!

वे कितने सही थे, कितने मिथ्या...?
कितने प्रतिशत थी उसमें तुम्हारी अपनी
मौलिक कल्पना की उड़ान—
यह दुनिया जाने!
मगर मैंने तो तुम्हारी आँखों से देखी थी जो फतेहपुर सीकरी
आज भी है मेरा वही अंतिम सत्य
फतेहपुर सीकरी के बारे में।

तीस रुपए...!
कुल तीस रुपए लेकर एक लंबे सलाम
के साथ
तुमने समेट लिया अपना तिलिस्म,
आगे कभी आएँ तो भगवान सिंह को पूछिएगा साहब!

तीस रुपए—और एक पूरी छलछलाकर
जी गई जिंदगी
एक पूरा इतिहास आँखों के आगे...
काल के वक्ष पर वे जो तमाम हैरतअंगेज
चलचित्र देखे मैंने
उनके लिए मेरा झिझकता हुआ सलाम लो भगवान सिंह!
***


(3) विज्ञापन में छपी औरत

वह थी किसी नए ब्लेड की तरह
तेज, खूंखार और नंगधड़ंग
सिर से पैर तक
किसी रंगीन उत्तेजना के तार में पिरोई
बेसबब कसी हुई प्रत्यंचा की तरह 
मुँहफट
लाल-गुलाल और आदिम

वह थी किसी अनहोने अचरज की तरह
पास गया उसके तो उसने समझा वही
जो उसके धंधे की माँग थी
बेहद बाजारू किस्म की गद्देदार मुसकान परोसते
स्वागत किया—आओ!

और फिर उघाड़ा—जिस पर उसे गर्व था
नंगी पीठ का चर्म!
ऊँची एड़ी से कुचलती
मेरा स्वत्व
देखा कनखियों से, कितना नशा!

मेरी आँखों में था शायद कोई झिझकता सवाल
कोई परेशानी भरा आलम
पसंद न था उसे, कतई पसंद न था
उसकी आँखें तरेरती हिंसा को
कोई भी ढीठ सवाल

गुस्से में लाल बगूला हो
वह पलटी मेरे देखते-देखते
बदबूदार बंबइया गाली उगल
इकदम अपने चिकने खोल में जा छिपी
विज्ञापन में छपी औरत!

भौचक मैं
सिर झुका जाने लगा अपने रस्ते
तो लगा है, है कोई इनसानी चीज
जो टनों मैल की परतों के बीच
भी जिंदा है जिंदा
कुड़बड़ा रही

कुछ और कदम चला होऊँगा चार-पाँचेक
तो सुनाई दीं सिसकियाँ
देखा, आह! जार-जार रो रही थी
विज्ञापन में छपी औरत

और उसका नंगधड़ंग जिस्म
गरम आँसुओं के
लिबास
में
छिप गया था!
***


(4) लिखूँ?

कविता लिखूँ, न लिखूँ?
कविता के अलावा और भी हैं बहुत काम
और भी हैं बहुत काम परिणाम कुहराम
उस दुनिया में जिसमें जीता हूँ
जिसमें नहीं है कविता बाकी सब है

रोटी चावल चीनी की पुकार—जवाब में डैश है लंबा
और फटे झोले नदारद जेब की कातरता
हर बार

हर बार प्रश्नास्पद आँखें। क्षमा-याचना। उधार
पत्नी का पीला, उदास अधपका चेहरा
और भूख और भूख और अँधेरे की मार
और दिन और रात का निरंतर अपमान का सौदा
निरंतर रौंदा हुआ सुख जिंदगी का

कागज-पत्तर प्रमाण-पत्रों की निरर्थक उपलब्धि
एक भार—साभार!

दफ्तरों की हिंसक जड़ता दोस्तों की दया
बीते होने का असमय अहसास : मृत्युमय जीवन
और खुर जैसे पैरों रूखे चेहरे की
हास्यास्पदता

तो फिर कविता...
कविता लिखूँ, न लिखूँ?
***


(5) पुरस्कार पाने वाले एक युवा कवि के लिए

तुम तो कहाँ से कहाँ चले गए अखिलेश भादुड़ी
और अभी कहाँ-कहाँ नहीं जाओगे
कि पूरी एक दुनिया पूरा जहाँ तुम्हारे सामने है
तुम्हारे पैर सभा भवनों की सीढ़ियों पर हैं
और रंगमहलों की ओर बढ़ना सीख रहे हैं

और हम तो कुछ भी नहीं
हम तो कहीं भी नहीं
हम तो अभी तक वहीं के वहीं हैं अखिलेश भादुड़ी
उसी घूरे पर
जहाँ हमें देखकर
तुमने कभी तल्खी से चीखती हुई कविता में कहा था
ये सूअरों में आदमी हैं
आदमियों में सूअर...!

किसी नागयज्ञ की चिरचिराती गंध वाली कविता से
यह हमारा पहला परिचय था
घबराए हुए शब्दों वाली कविता
हड़बड़ाए हुए शब्दों वाली कविता
मुट्ठियाँ ताने, लपलपाते शब्दों वाली कविता
और तुम...!

और अब जबकि तुम चले गए हो
हम अकसर तुम्हें याद करते हैं
राजधानी से लौटते हर आदमी से पूछ ही लेते हैं हालचाल
अखबारों में पढ़ते हैं हर साल 
कहाँ से कहाँ चले गए तुम

क्या हुआ अगर तुम्हारी चिट्ठी नहीं आती अखिलेश भादुड़ी
तो क्या हुआ
तुम तो हमारे दिल में हो न
जब चाहा बात कर ली

अकसर कहीं से चोट खाकर आते हैं
तो पहले-पहल तुम्हीं से बतियाते हैं अखिलेश भादुड़ी
पता नहीं हमारी बातें
तुम तक पहुँचती भी हैं या नहीं!

वैसे भी सुना है, काफी व्यस्त रहते हो
सुना है, राजधानी में खासी धाक है तुम्हारी
साहित्यिक जगत के दादा हो माने हुए
सुना है, अकादमी भवन में तुम्हारी कविता पर
बैठकें होती हैं, बहसें होती हैं
कोई पुरस्कार का चक्कर है

सुना है, वहाँ जब भी जाते हो आम आदमी पर
अंग्रेजी में सहानुभूति जताते हो
वे भाषण तुम्हारी आधुनिका बीवी रात-रात भर
जागकर तैयार करती है
सुना है, आजकल गर्दिश के दिनों पर
किताब लिखने में बिजी हो

वो जब भी छपेगी
कम से कम ढाई सौ रुपए में बिकेगी
सभी लाइब्रेरियाँ दस-दस कापियाँ खरीदेंगी
दस-बीस हजार से कम मत छपाना अखिलेश भादुड़ी
रायल्टी तगड़ी मिलेगी

एक किताब तो हमें भी भेजोगे न,
भेजोगे मुफ्त...?
आखिर इतना तो हमारा भी हक है बरखुरदार!

हम तो जब भी सुनते हैं
खुश बहुत होते हैं अखिलेश भादुड़ी
कि चलो अपने बीच से कोई तो उठा
और तुम्हें भी ज्यादा नहीं, तो थोड़ा-बहुत तो गर्व होगा ही
कि चलो बाप के घर से विद्रोह कर
इन मरभुक्खों के बीच गया तो कुछ तो मिला

गर्व हमें भी है
कि हम गरीब सही
मगर हम गरीबों की तकलीफें बेचकर
कमाई तो अच्छी-खासी होती है।

यह कोई अचरज है शायद
कि जब भी तुम याद आते हो
कविता में खोए होते हो
तुम्हारे तमतमाए गाल, होंठों पर पाश की लाइन—
कि दोस्तो, ये कुफ्र हमारे ही वक्त में होना था!

तुम तो चले गए हो तो जाने क्यों
यही एक लाइन छूट गई है
हमारे तुम्हारे बीच किसी पुल की तरह
मगर जाने क्यों इसके अर्थ बदल गए हैं,
इस लाइन के अर्थ क्यों बदल गए हैं अखिलेश भादुड़ी
कि दोस्तो, ये कुफ्र हमारे ही वक्त में होना था!

(दो)

हाँ, एक बात तो छूट ही गई
कल एक लड़का हमारे गाँव आया था
यही कोई बीस-बाईस बरस का
संग में और भी थे दो चार, सभी में जोश, हाहाकार!
उसने भी तुम्हारी तरह नुक्कड़ नाटक किया था
और फिर आखिर में कविता पढ़ी थी सुलगते हुए
बिल्कुल तुम्हारी तरह

और जब वह कविता पढ़ रहा था
मैं पूरे वक्त धुआँ ही निगलता रहा
और सोचता रहा इसका ढंग
तुमसे इतना मिलता-जुलता क्यों है
अचानक उसकी शक्ल में एक काइयाँपन उभरा था
काइयाँपन और तुम्हारा चेहरा एक साथ
और मैं काँप गया था

मैं काँप क्यों गया था अखिलेश भादुड़ी
मैं काँप क्यों गया था अगर उसकी शक्ल तुमसे
मिलती थी तो ऐसी क्या बात थी
लोगों की लोगों से शक्ल मिलती ही है
लोग तो लोगों की तरह ही होते हैं
लोगों के रस्ते ही जाते हैं
चाहे वे लड़ाका मार्क्सवादी हों या गोलमोल
अध्यात्मवादी, गांधी-अरविंदवादी
या तबलावादी चम्मचवादी गिरगिटवादी साँप-छछूँदरवादी
आँसूवादी प्यारवादी लिंगलकारवादी हँसिया तलवारवादी

दरअसल वाद तो सिर्फ वाद होते हैं
ये सब तो लेबल हैं न, सुविधा की मौज-मस्तियाँ
सफल आदमी इन्हें चिपकाता है उतारता है
फिर चिपकाता है ठहर-ठहरकर
असल बात तो यही है न कि
सारे सफलतावादी एक ही राह जाते हैं
कितनी ही विरोधी क्यों न हो यात्राएँ
आखिर वे पहुँचेंगे एक ही धुर!

हमारी छोड़ो...
हमारी भी क्या बात करते हो अखिलेश भादुड़ी?
हम तो कुछ हैं ही नहीं
हम तो कहीं नहीं हैं
तुम्हारे ही शब्दों में—
सूअरों में आदमी
आदमियों में सूअर...!

यह पुरानी कविता
अब भी पढ़ते हो क्या सभामंचों पर?

एक जिज्ञासा है, बुरा मत मानना
पढ़ते हो तो
तुम्हारी आवाज हकला नहीं जाती
और तुम्हारी आधुनिका बीवी कुढ़कर
नाक पर रूमाल नहीं रख लेती...!

अब चलूँगा अखिलेश भादुड़ी
चलता हूँ...
ज्यादा बोलकर तुम्हारे बेशकीमती वक्त की
हत्या क्यों करूँ?
याद आया, तुम तो गर्दिश के दिन
लिखने में बिजी हो न!

वैसे एक बात कहना,
ये कविता और गद्द-पद्द की छोड़ो,
असल में भी कभी हमारी याद आती है
ठीक वैसे जैसे हम पनीली आँखों से
तुम्हें याद करते हैं अखिलेश भादुड़ी
उँगलियों के पोरों पर तुम्हें याद करते हैं...

चलो न भी करो
मगर हम तो तुमसे चिपक ही गए बहुत भीतर तक
और यह कितना दिलचस्प है कि
चाकू से छीलो तो भी छूटेंगे नहीं हम
ठीक वैसे ही जैसे तुम्हारी घरवाली
सेंट की कितनी ही शीशियाँ छिड़के
हम पर लिखी कविता में
हमारे पसीने की बदबू आएगी ही

और अकेले में
तुम्हारी हथेलियों से छूटेगा जो पसीना
उसके पाप-संताप की दुर्गंध तुम्हारे नथुनों में जाएगी ही
क्योंकि वह तुम्हारी जिंदगी का जरूरी हिस्सा है
तुम्हारी रंग-रोगनदार कोठी की तरह
तुम्हारी सस्ती महफिलों की रौनक,
मांस और बोटी की तरह!


(तीन) 

चलते-चलते 
एक-दो छोटी-मोटी सूचनाएँ कहो तो सुनाऊँ
शायद उनमें तुम्हारी दिलचस्पी बची हो
या फिर तुम्हारे किसी काम ही आ जाएँ

याद है अखिलेश भादुड़ी, सरदारीलाल की
अरे वही दीवाना सा लड़का
जो दिन-रात भर तुम्हारे साथ शहरों, कसबों,
जंगलों की खाक छानता था
क्रांति के सपने बाँटता था
सोचता था क्रांति आएगी
तो कहीं न कहीं हाथ भर जमीन उसकी भी होगी
तुम यही तो बार-बार उसे समझाते थे

अब वो नहीं रहा
कल सुबह
भगवानदास की बगीची में लटका देखा गया
था उसका शव...

वैसे भी तो मरगिल्ला हो गया था पूरा, उसे मरना ही था
और सरबतिया
जो पूरी आँखें खोलकर तुम्हें पीती थी
अब तुम बातें करते थे गाँवों के सुधार की
अब गूँगी सी भटकती है
वह किससे बोलती और क्यों,
तुम तो उसके पास अपना पता तक नहीं छोड़ गए।

करीब छह महीने हुए
उसके साथ क्या-क्या हुआ उस बगीची में
सब जानते हैं कोई नहीं कहता
कि फिर कैसे वो फेंकी गई कुएँ में
कैसे निकली
तब से पैर घसीटते चलती है न रोती न हँसती
बस आसमान को घूरती है, घूरे चली जाती है...

खैर, तुम्हें इस सबसे क्या लेना
मैंने तो यों ही चलते-चलते जिक्र किया
शायद इसमें भी तुम्हें कुछ काम का दिख जाए
मोटा उपन्यास बन सकता है
पुरस्कार मिलेगा तो आमदनी भी क्या मोटी न होगी?

हम तो
जो हैं सो है अखिलेश भादुड़ी
सूअर की दुम...गधे की लीद...
जाहिल, अनपढ़ उजबकों की औलाद
बुरा लगा—चलो कामरेड कह लो
यह तो तुम्हारा सिखाया हुआ शब्द है न!
मगर इतना तो हम भी जानते हैं
कि कामरेड और कामरेड भी तो एक नहीं होते
क्यों, मैंने कुछ गलत कहा?

बहरहाल हम तो जो हैं सो हैं
मगर खुशी है
कि चलो कोई तो आगे गया
जिसे हम छूते, पहचानते, नाम ले-लेकर पुकारते थे
और फिर मंजिल तक पहुँचने के लिए
कित्ती तो मेहनत करनी पड़ती है तुम्हें
कित्ती तो मेहनत कर रहे हो
गर्दिश के दिन लिखने के लिए

कुछ हैं जो आगे जाने के लिए ही होते हैं
तुम्हारी मंजिल तो शुरू से तय थी अखिलेश भादुड़ी
गलती हमारी ही थी
जो तुम्हें अपने बीच का आदमी समझे थे
**

545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008,
चलभाष: 09810602327,
ईमेल: prakashmanu333@gmail.com

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