हिंदी के शिखर साहित्यकारों की अंतरंग बातें

समीक्षक:सुरेश्वर त्रिपाठी


पुस्तक: बड़े साहित्यकारों के साथ
लेखक: प्रकाश मनु
प्रकाशक: लिटिल बर्ड पब्लिकेशंस, नई दिल्ली
संस्करण: 2024
पृष्ठ: 271
मूल्य: ₹ 499 रुपए


प्रकाश मनु हमारे समय के चर्चित कवि-कथाकार हैं। पर इसके साथ ही वे हिंदी में बड़े साहित्यकारों के एकदम अलग ढंग के विशिष्ट साक्षात्कार लेने वाले लेखक के रूप में भी जाने जाते हैं। उनके साक्षात्कार साहित्यिक दुनिया के सूक्ष्म से सूक्ष्म और गंभीर से गंभीर प्रश्नों का उत्तर हमारे सामने प्रस्तुत कर देते हैं। बहुत से भेंटकर्ता बड़े साहित्यकारों से जिन प्रश्नों को पूछने का साहस नहीं कर पाते, प्रकाश मनु गहरे पैठकर उन प्रश्नों का भी उत्तर ले आते हैं। इस पर कभी-कभी विवाद भी हुए हैं, पर मनु जी पर इन बातों का कोई असर नहीं होता। वे धुनी हैं और लेखकों की दुनिया के आत्मीय क्षणों को अपने साक्षात्कारों के जरिए बड़े जीवंत रूप में प्रस्तुत करने का पूरा जतन करते हैं। इसीलिए उनके द्वारा लिए गए साक्षात्कारों की बहुत चर्चा भी हुई है।
प्रकाश मनु
इन विशिष्ट साक्षात्कारों की तरह ही प्रकाश मनु ने कई बड़े साहित्यकारों के साथ बिताए पलों के आधार पर बड़े ही अंतरंग संस्मरण भी लिखे हैं, जिन्हें पढ़ने का अलग आनंद है। उनके ये संस्मरण कुछ इस अंदाज में लिखे गए हैं कि आप उऩ्हें किसी रोचक किस्से-कहानी की तरह पढ़ सकते हैं। साथ ही हिंदी के बड़े साहित्यकारों पर लिखे गए ये संस्मरण पढ़कर आप उनके जीवन, रचनाकर्म और शख्सियत के बारे में कुछ अनजानी बातों को पढ़कर हैरान भी हो सकते हैं। मनु जी के ऐसे ही अंतरंग और आत्मीय संस्मरणों की पुस्तक है, ‘बड़े साहित्यकारों के साथ’। लिटिल बर्ड पब्लिकेशन, दिल्ली ने अभी हाल में ही यह पुस्तक प्रकाशित की है। इसमें हिंदी के ग्यारह शिखर साहित्यकारों के संस्मरण हैं। इस पुस्तक को पढ़ने पर हम इन बड़े साहित्यकारों के अंतरंग जीवन की झाँकी के साथ ही, कुछ ऐसी बातों को भी जान लेते हैं, जिनका उनकी साहित्यिक शख्सियत की बुनावट में बड़ी भूमिका है, लेकिन हम उनसे परिचित न थे।
पुस्तक में प्रकाश मनु सबसे पहले देवेंद्र सत्यार्थी को याद करते हैं, जिन्हें वे अपना कथागुरु मानते हैं और वे उन्हें लोकगीतों का ऐसा फरिश्ता कहते हैं, जिसने उनका जीवन ही बदल दिया। सत्यार्थी जी ने प्रकाश मनु के मन पर कितना प्रभाव छोड़ा था, यह उनके शब्दों से ही पता चल जाता है—
“.....हुआ यह कि कहीं भी जा रहा होऊँ, कदम मुड़ जाते सत्यार्थी जी के घर की ओर। सच कहूँ, उनका जादू चल गया था मुझ पर। जब भी अकेला होता, मैं उनके बारे में सोच रहा होता। वे मेरे लिए एक ऐसे ‘महानायक’ थे, जैसा होना मेरे जीवन का सबसे बड़ा सपना था। बहुत व्यस्त होता तो भी सप्ताह में एक बार तो पहुँच ही जाता। और जाते ही सत्यार्थी जी की मुक्त हँसी का स्पर्श, आ गए, मनु! मैं तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रहा था...।” तात्पर्य यह कि केवल प्रकाश मनु ही सत्यार्थी जी से प्रभावित नहीं थे, बल्कि सत्यार्थी जी भी प्रकाश मनु से प्रभावित थे।
प्रकाश मनु जब सत्यार्थी जी की बात करते हैं, तो वे उनके जीवन के कोने-अंतरे तक प्रवेश करते हैं। सत्यार्थी जी की छाती तक झूलती लंबी सफेद दाढ़ी, सत्यार्थी जी के नंगे पैर, सत्यार्थी जी की घुमक्कड़ी, सत्यार्थी जी की लोकगीतों के प्रति आसक्ति आदि बातें बड़े अनोखे ढंग से सामने आती हैं। इसलिए जो शख्स सत्यार्थी जी से इतनी गहराई से परिचित नहीं होता, वह चौंक जाता है कि ‘अरे वाह! सत्यार्थी जी ऐसे थे....?’ प्रकाश मनु के लिए बड़े साहित्यकार केवल कुछ लिखने के विषय भर नहीं हैं, अपितु वे उन लेखकों से इस तरह जुड़ते हैं कि उन्हें भी बहुत कुछ सीखने को मिल जाता है। पुस्तक की भूमिका में वे लिखते हैं—
“...सत्यार्थी जी ने बहुत कुछ सिखाया। उनकी यह बात नहीं भूलती कि अरे, जिंदगी कोई सजा थोड़े ही है। जिंदगी तो जीने के लिए है भई मनु, पूरी मस्ती से जीने के लिए! इसे डर-डरकर नहीं जीना चाहिए।”
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सुरेश्वर त्रिपाठी
प्रकाश मनु जी ने प्रख्यात आलोचक, चिंतक और ऋषि पुरुष डॉ. रामविलास शर्मा के साथ भी बहुत समय बिताया है। वे जितना रामविलास जी को जानने का प्रयास करते हैं, उतना ही रामविलास जी के साथ-साथ महाकवि निराला के जीवन की भी कुछ और परतें खुलने लगती हैं। रामविलास जी निराला के बहुत करीब थे और निराला के दुख-दर्द और भीषण संघर्ष के दिनों को उन्होंने बहुत पास से देखा है। इसीलिए जब रामविलास जी निराला के बारे में कुछ लिखते या बोलते हैं तो हमें एक अलग ही निराला नजर आते हैं। प्रकाश मनु इस संस्मरण में रामविलास जी से जुड़ी स्मृतियाँ उकेरते हैं, पर साथ ही रामविलास जी के जरिए निराला के जीवन की कुछ महत्वपूर्ण बातें भी सामने लाते हैं—
“....पुत्री सरोज की मृत्यु की सूचना पाकर निराला की अवसन्न हालत! उनका रात-रात भर कमरे में चक्कर लगाना, बड़बड़ाना। फिर कागज की छोटी-छोटी पर्चियों पर ‘सरोज स्मृति’ का लिखा जाना।...उन टुकड़ों को जोड़कर निराला द्वारा उसे एक पूरी कविता का रूप देना। निराला बुरी तरह टूट रहे थे, लेकिन भीतर उन्होंने कहीं अपने आपको बड़ी कठिनाई से साधा भी था।” 
मनु जी लिखते हैं कि “‘सरोज स्मृति’ की यह रचना-प्रक्रिया सुनकर मुझे याद है कि मैं भीतर तक थरथरा गया था।”
इस संस्मरण के बहाने प्रकाश मनु रामविलास जी के जीवन और शख्सियत से जुड़े कुछ अजाने प्रसंगों को भी हमारे सामने लाते हैं, “मैं भूल नहीं पाता कि अपने अंतिम दिनों में जब रामविलास जी हिल-डुल भी नहीं पाते थे, तो भी वे अपनी बीमारी के बारे में नहीं, बल्कि अपनी अधूरी पुस्तक ‘तुलसीदास और उनका सौंदर्य-बोध‘ के बारे में सोचते रहते थे। उन्होंने मुझे बताया था, मैं तो उसे पूरा करने के लिए मन ही मन नक्शे बनाता रहता हूँ।” 
प्रकाश मनु रामविलास जी के असाधारण व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित थे। रामविलास जी ने एक और काम किया, जो शायद ही और कोई कर सकता है। प्रकाश मनु लिखते हैं—
“ऐसे ही पुरस्कार और सम्मानों के लिए उनकी घोर विरक्ति ने मेरी आँखें खोल दीं, और बिन कहे समझा दिया कि एक सच्चा लेखक क्या होता है। एक लेखक का स्वाभिमान क्या होता है! बहुत से लोग और संस्थाएँ उन्हें आदर से बुलाती थीं, सम्मानित करना चाहती थीं। पर रामविलास जी के लिए उनका काम ही सब कुछ था। अपना काम बीच में छोड़कर, यहाँ-वहाँ सम्मानित होने चल देना उन्हें बड़ा ही हेय, बल्कि हास्यास्पद लगता था। उनका मानना था कि किसी लेखक का सच्चा सम्मान तो उसका साहित्य पढ़ना है। इसलिए कोई उन्हें सम्मानित करने के लिए आमंत्रित करता, तो उनका जवाब होता था, आप मेरा लिखा हुआ पढ़ लीजिए। बस, यही मेरा सम्मान है।” 
आज के समय में छोटे-बड़े सभी साहित्यकार इस बात को लेकर लालायित रहते हैं कि उन्हें कोई बड़ा पुरस्कार मिल जाए, जिसके साथ बड़ी धनराशि भी हो, तो शायद जिंदगी सँवर जाए। पर रामविलास जी को पुरस्कारों से और उनके साथ मिलने वाली बड़ी से बड़ी धनराशि से ऐसी विरक्ति थी, जो उन्हें अन्य सभी साहित्यकारों से अलग और महान बनाती है। उनकी इस खुद्दारी के आगे बड़े से बड़ा साहित्यकार भी अपने को छोटा अनुभव करने लगता था। उसके मन में कहीं न कहीं यह बात जरूर आती होगी, कि कितना अच्छा होता, अगर मैं भी रामविलास जी की तरह सम्मान-लालसा और धनराशि से विरक्त हो पाता! 
रामविलास जी से सभी कुछ न कुछ सीखने को तत्पर रहते थे। प्रकाश मनु भी स्वीकार करते हैं कि उन्होंने रामविलास जी से बहुत कुछ प्राप्त किया, उनसे सीखा है, “...आज समझ में आता है कि रामविलास जी केवल मेरे सवाल का जवाब ही नहीं दे रहे थे, बल्कि बड़े बेमालूम ढंग से काम करना क्या होता है, यह भी उन्होंने सिखाया।”
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मनु जी ने पुस्तक में जिन साहित्यकारों के संस्मरण लिखे हैं, उनमें से लगभग सभी साहित्यकारों के बहुत लंबे और विस्तृत साक्षात्कार भी उन्होंने लिए हैं। साक्षात्कार लेते समय उनमें कहीं-कहीं असहमति भी दिखाई देती है। नामवर सिंह वाले संस्मरण में वे लिखते हैं कि रामविलास शर्मा जैसे साहित्यकार का साक्षात्कार लेते समय मुक्तिबोध के प्रसंग पर उनके और रामविलास जी के विचारों में भिन्नता इतनी अधिक थी कि रामविलास जी कुछ क्रोधित भी हो गए—
“यह चर्चा इतनी तीखी हो गई थी कि रामविलास जी कुछ खीज उठे थे। उन्होंने गुस्से में कहा कि अगर आपने अब एक भी सवाल कविता पर पूछा तो मैं आपके किसी सवाल का जवाब नहीं दूँगा। मेरे लिए यह स्तब्धकारी स्थिति थी। इसलिए कि मैं रामविलास जी का बहुत सम्मान करता था। उनसे कोई बहस करने तो मैं गया नहीं था, पर मुक्तिबोध को जिस तरह वे नकारते हैं, वह मुझे स्वीकार्य न था, और इससे इंटरव्यू में स्वभावतः थोड़ी अतिरिक्त गरमी आ गई थी।”
नामवर सिंह की बहुत सी बातों से भी प्रकाश मनु सहमत दिखाई नहीं देते हैं। नामवर जी के बारे में वे बड़े स्पष्ट शब्दों में कहते हैं, “फिर बरसों बाद, दिल्ली आने पर नामवर जी की पुस्तक ‘दूसरी परंपरा की खोज’ पढ़ी, जिसे एक तरह से उन्होंने अपने गुरु आचार्य द्विवेदी को ट्रिब्यूट के तौर पर लिखा था। पर पता नहीं क्यों, इसे पढ़कर मैं ज्यादा प्रभावित नहीं हुआ। शायद पुस्तक मेरी उम्मीदों से कमतर थी। बहुत आश्वस्त करने वाली भी नहीं। मेरे लिए यह बड़े आश्चर्य की बात थी कि एक आलोचक की हैसियत से नामवर जी का कद तो बड़ा था, पर उनकी कृति शायद उस ऊँचाई तक नहीं पहुँच सकी थी, जिसकी मुझ सरीखे पाठक उम्मीद करते हैं। और जाहिर है, ‘दूसरी परंपरा की खोज’ पुस्तक मुझे अपने साथ उस तरह नहीं बहा सकी, जैसे कभी ‘कविता के नए प्रतिमान’ के जादुई आकर्षण में मैं बहता चला गया था।” 
प्रकाश मनु जब साक्षात्कार ले रहे होते हैं तो वे सामने वाले के व्यक्तित्व से प्रभावित तो जरूर होते हैं, पर वे सख्त से सख्त प्रश्न पूछने में कोई संकोच नहीं करते हैं। कई बार उनके प्रश्नों से लेखक असहज हो जाते हैं, चाहे वे रामविलास शर्मा या फिर नामवर सिंह हों। इससे प्रकाश मनु के इंटरव्यूकार की हिम्मत और हौसले को तो समझा ही जा सकता है, जो उनके साक्षात्कारों को भी विशिष्ट बना देता है। 
त्रिलोचन जी पर लिखा गया मनु जी का संस्मरण काफी अलग सा है, जिसमें कहीं-कहीं त्रिलोचन जी का विनोद भाव भी सामने आता है। इस संस्मरण में त्रिलोचन जी के अलावा कई अन्य लोग भी उपस्थित हैं। फिर हरिपाल त्यागी, देवेंद्र सत्यार्थी आदि की चर्चा तो बार-बार की गई है। जिस तरह सत्यार्थी जी वाले संस्मरण मनु जी उनकी दाढ़ी के बारे में बहुत खुलकर बात करते हैं, कुछ उसी तरह त्रिलोचन जी वाले संस्मरण में भी उनकी दाढ़ी बड़े रोचक प्रसंग में ढलकर हमारे सामने आती है। 
इस प्रसंग में प्रकाश मनु ने लिखा है कि कैसे वह जिन सज्जन को त्रिलोचन जी के भाई के रूप में जान रहे थे, वे और कोई नहीं, बल्कि स्वयं त्रिलोचन जी ही थे। यह भ्रम, असल में, उनकी दाढ़ी पैदा कर देती है—
“अब समझ में आया, जिन्हें मैं त्रिलोचन जी का भाई समझ रहा था, वे कला, साहित्य और शास्त्र में इतनी गहरी रुचि और इतना ज्यादा दखल क्यों रखते थे, और उनका बात करने का अंदाज त्रिलोचन जी से इस कदर मिलता क्यों था? और क्यों ‘दाढ़ीदार’ त्रिलोचन जी की जगह सफाचट चेहरे वाले ‘त्रिलोचन जी के भाई’ नाटक की अध्यक्षता कर रहे थे!” 
इस संस्मरण मे सादतपुर में रहने वाले कई अन्य साहित्यकारों की तरह-तरह की गतिविधियों की भी बड़े रोचक ढंग से चर्चा की गई है। इनमें रामकुमार कृषक और विष्णुचंद्र शर्मा जैसे लेखकों का खासकर जिक्र किया जा सकता है, जो इस संस्मरण में बड़े प्रमुख रूप में उपस्थित हैं।
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हिंदी के वरिष्ठतम साहित्यकार रामदरश मिश्र का एक गीत बहुत ही चर्चित हुआ था, ‘जहाँ लोग पहुँचे छलाँगें लगाकर, वहाँ मैं भी पहुँचा, मगर धीरे-धीरे’। इसी गीत की एक पंक्ति को प्रकाश मनु ने उन पर लिखे गए संस्मरण का शीर्षक बनाया गया है, ‘बनाया है मैने यह घर धीरे-धीरे!’ हिंदी का कोई ऐसा पुरस्कार-सम्मान नहीं है, जो अपनी आयु के शतक लगाने जा रहे इस सहज, सरल और गंभीर स्वभाव वाले समर्पित लेखक को न मिला हो। दिल्ली जैसे महानगर में रहने वाले रामदरश जी अपने गाँव, अपनी माटी को कभी नहीं भूलते। उनकी रचनाओं में उनका गाँव भी रहता है और गाँव के लोग भी। प्रकाश मनु लिखते हैं—
“कोई अस्सी बरस पहले जब उन्होंने लिखना शुरू किया था, तो प्रेमचंद की तरह आम आदमी को उन्होंने साहित्य और अपने हृदय के सिंहासन पर बैठाया, जिसके दुख-दर्द, अभाव और मुश्किलों की अनंत कथाएँ उन्होंने अपने गाँव और आसपास देखी, सुनी थीं, भीतर की अफाट विकलता के साथ महसूस की थीं। ये निपट साधारण लगते आम जन उनकी कविता, कहानी, उपन्यासों के नायक थे, और हैं भी। उसे बदलने की आज तक उन्हें जरूरत नहीं महसूस हुई।”
प्रकाश मनु जिन वरिष्ठ साहित्यकारों के बारे में लिखते हैं, उनमे से लगभग सभी को वे अपने मार्गदर्शक और गुरु की तरह देखते हैं। रामदरश जी को भी वे गुरु मानते हैं—
“रामदरश जी मेरे गुरु हैं। उनसे बहुत कुछ सीखा, बहुत कुछ पाया। उनका बहुत निकट सान्निध्य मुझे मिला है। दिल्ली आने पर जिन लेखकों ने अपने स्नेह का संबल देकर मुझे टूटने नहीं दिया और मन में आत्मविश्वास जगाए रखा, उनमें रामदरश जी अन्यतम हैं।” 
सच पूछिए तो प्रकाश मनु रामदरश जी के जीवन के कई नई पन्ने खोलने में सफल हुए हैं। एक बहुत ही गंभीर प्रश्न वे रामदरश जी से पूछते हैं कि अन्य कई साहित्यकारों की तुलना में आप पिछड़ क्यों गए? इस पर रामदरश जी का उत्तर लेखक के रूप में उनके आत्मविश्वास और स्वाभिमान से हमारा परिचय कराता है—
“जो-जो ये तथाकथित बड़े लेखक हैं, उनके साथ कोई न कोई बड़ी पत्रिका या लेखक-संगठन जुड़ा रहा और उनकी जो भी अच्छी रचनाएँ हैं, वे इस कदर उछाले जाने से पहले की हैं। बाद मे तो वे लेखक के रूप में चुक ही गए, जबकि मैं लगातार एक लेखक के आत्मविश्वास के साथ अपनी राह पर आगे बढ़ता गया। और मुझे इस बात का मलाल नहीं है कि मुझे इतना उछाला क्यों नहीं गया। मुझे अपने पाठकों का बहुत प्यार मिला है और वही मेरी शक्ति है। जबकि इस तरह से बहुत उछाले गए लेखकों की रचनाएँ शायद पढ़ी ही नहीं जातीं।”
बाबा नागार्जुन के बारे में प्रकाश मनु लिखते हैं कि बाबा के कारण ही सादतपुर साहित्यकारों की कर्मस्थली बन गया था— 
“....इसीलिए बाबा के होने से सादतपुर एक तरह की साहित्य नगरी या साहित्यपुर ही बन गया था। बाबा केवल सादतपुर में रहते ही न थे, बल्कि वे पूरे सादतपुर में सबके अपने कवि, सबके अपने चहेते कवि बन चुके थे। छोटे-बड़े, स्त्री-पुरुष सबके। वे सादतपुर के हर घर-परिवार के सदस्य और सुख-दुख के सहचर थे। सबके परिवारी कवि भी। इसलिए किसी बड़े से बड़े आदमी के रोब में वे नहीं आते थे। जिसे मिलना हो, वह दौड़-दौड़कर सादतपुर आए और सिर झुकाए उस बीहड़ कवि के आगे, जो सादतपुर के बच्चों-बड़ों सबके अपने बाबा हैं।”
जब भी किसी बड़े साहित्यकार के विषय में प्रकाश मनु लिखते हैं तो उसकी विशेषताओं के बखान के साथ ही उसकी बहुत सी अनुकरणीय बातों की वे भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं। लेकिन यदि कहीं किसी बड़े लेखक की कमजोरी उन्हें दिखाई देती है तो बिना हिचके उसकी भी चर्चा करते हैं। बाबा के बारे में वे खूब अच्छी बातें लिखते हैं, पर एक जगह वे उनकी आलोचना भी करते हैं—
“...हालाँकि आगे चलकर गाँव और गाँव की आंचलिक पृष्ठभूमि पर लिखे गए उपन्यासों में एक गड़बड़ भी हुई। कहीं-कहीं रसमयता के नाम पर रसीलापन इतना बढ़ा कि लगा कि असली आदमी ओट हो गया है और गाँव और गाँव के आदमी के नाम पर कोई और ही लीला रची जा रही है।” 
साहित्यकारों पर लिखे गए अपने कई और संस्मरणों की तरह ही बाबा नागार्जुन के संस्मरणों में भी प्रकाश मनु इस बड़े लेखक के जीवन की कई परतें खोलते नजर आते हैं।
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इन संस्मरणों में प्रकाश मनु के ज्यादातर नायक ऐसे ही लेखक हैं, जिनमें खुद्दारी है और जिन्होंने जीवन में बहुत दंश झेला है। इस लिहाज से जिस लेखक से बेहद प्रभावित दिखाई देते हैं, वे हैं शैलेश मटियानी। यहाँ तक कि एक जगह वे बड़े कद के लेखक शैलेश मटियानी की तुलना महाकवि निराला से करते हैं—
“मैं अपने जीवन में निराला से तो नहीं मिला, पर अगर किसी लेखक में निराला को देखा, निरालापन देखा, तो वे मटियानी जी ही थे। और अफसोस, जैसे इलाहाबाद में रहते निराला के हिस्से उपेक्षा और विक्षिप्तता आई, वैसे ही मटियानी भी अंत में मानसिक विक्षेप और विचलन के शिकार हुए और एक अंतहीन त्रासदी से घिर गए। और अंत में इसी हालत में दिल्ली में उनका निधन हुआ, तो भी उनकी जीवन-त्रासदी का मानो अंत नहीं हुआ। उनकी जीवन-कथा का आखिरी अध्याय तो शायद अभी लिखा जाना बाकी था।” 
मटियानी जैसा लेखक अपने जीवन में जितने उतार-चढ़ाव से गुजरा, शायद ही उनका कोई समकालीन लेखक गुजरा हो। प्रकाश मनु के अनुसार मटियानी जी कभी संकटों से घबराए नहीं, पर कभी-कभी वे इसे अनुभव जरूर करते थे—
“हालाँकि मटियानी जी ने कभी इसकी बहुत ज्यादा परवाह नहीं की, पर कभी-कभी बड़े विषादपूर्ण स्वर में वे इसका जिक्र करते थे, तो मेरे भीतर कहीं कुछ टूटता था। इतना बड़ा लेखक, जिसे पढ़ते हुए गोर्की का सा यथार्थ-चित्रण और तुर्गनेव सी विलक्षण कला, दोनों एक साथ आँखों में कौंधते हैं, हिंदुस्तान के घर-घर में जिसे आज भी इतने प्यार और आदर से पढ़ा जाता हो, उसके हिस्से आई यह अक्षम्य आलोचकीय उपेक्षा क्या यों ही थी? मैं याद करता हूँ तो मर्माकुल हो जाता हूँ।”
प्रकाश मनु ने मटियानी जी के जीवन के कुछ ऐसे पलों को हमारे सामने प्रस्तुत किया है, उन्हें जानकर हम दुख के सागर में डूब जाते हैं। मटियानी जी इतने बड़े लेखक होते हुए भी अपने जीवन में ऐसे संकटों का सामना करते हैं कि उन्हें जानने-पढ़ने वालों को अपने मनुष्य होने पर ही लज्जा आती है। प्रकाश मनु उनके जीवन की कुछ ऐसी ही घटनाओं का वर्णन करते हैं—
“मुबा देवी के मंदिर के सामने भिखारियों की कतार है और अन्न की प्रतीक्षा है। चर्च गेट, बोरिवली या बोरीबंदर से कुरला थाना तक की बिना टिकट यात्राएँ हैं और अन्न की प्रतीक्षा है। और इस अन्न की तलाश में भिखारियों की पंगत में बैठने से लेकर जान-बूझकर ‘दफा चौवन’ में भारत सरकार की शरण में जाना और जूते-चप्पलों तक का चुराना ही शामिल नहीं, राष्ट्रीय बेंतों और सामाजिक जूते-चप्पलों से पिटना भी शामिल है।”
मटियानी जी के आत्मस्वीकार से जुड़ी ये पंक्तियाँ पढ़ते हुए, मन थरथरा उठता है। लेखक बनने के लिए ऐसी कठिन तपस्या भला कितने लेखकों ने की होगी!
मटियानी जी के जीवन में जो दुखों के पहाड़ समय-समय पर अवरोध उत्पन्न करते थे, उनका अंत नहीं था। उनके बेटे की इलाहाबाद में हत्या हो जाना भी एक ऐसी ही मर्मांतक घटना थी। कहा जाता है कि हत्यारे किसी और की हत्या के लिए आए थे और भ्रमवश उन्होंने मटियानी जी के बेटे को मार दिया। पहले से ही कई अन्य विपदाओं को झेल रहे मटियानी जी अपने बेटे की हत्या से एकदम टूट से गए थे।
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रघुवीर सहाय भी प्रकाश मनु के प्रिय लेखकों में रहे। मनु जी अपने संस्मरण में उनके बारे में बहुत विस्तार से लिखते हैं और कई घटनाओं के माध्यम से उन्हें स्मरण करते हैं। सहाय जी हिंदी में अपने ढंग के एक बड़े और खुरदरे लेखक थे। औरों से अलग। बहुत अलग। एक जगह प्रकाश मनु रघुवीर सहाय के बारे में लिखते हैं—
“नहीं-नहीं, रघुवीर सहाय को पाना इतना आसान नहीं। इसलिए कि हर बार वे आपकी बनाई हुई हदों को फलाँग जाते हैं, किसी भी बड़े कवि की तरह। किसी भी भाषा में हर दौर में ऐसे कुछ ही कवि होते हैं जो एक मूर्ति बनाते, एक ढहाते हैं। और जो सिर्फ ‘ढहाते’ हैं या जो सिर्फ बनाए चले जाने का भ्रम पाले बैठे हैं, उनका तो कहना ही क्या। रघुवीर सहाय हमारे युग के उन थोड़े-से लेखको में से थे, जिन्होंने सत्ता के आगे ‘हें-हें’ करने वाले लेखकों से अलग लेखक की इमेज बनाने की चिंता में जीवन भर संघर्ष किया। सत्ताप्रिय ‘गद्गदायमान’ लेखकों की भीड़ में वह ‘एक भयानक बात कहकर बैठ जाने वाले’ लेखक थे। शायद इसीलिए उन्होंने प्यार नहीं, नफरत को भी एक रचनात्मक अर्थ दिया...!”
इसी तरह विष्णु खरे को याद करते हुए प्रकाश मनु उन्हें ‘एक दुर्निवार बेचैनी के कवि’ के रूप में प्रस्तुत करते हैं। वे मानो अभिभूत होकर कहते हैं—
“यों विष्णु खरे हिंदी के दुर्जेय कवि हैं। अद्वितीय, और एक दुर्निवार बेचैनी के कवि, जिनके साथ यात्रा खासी असुविधाजनक हो सकती है। इसलिए भी कि विष्णु खरे सिर्फ कविता लिखते ही नहीं हैं, वे कविता के साथ-साथ बहुत कुछ तोड़ते और रचते हैं। कभी अनायास तो कभी सायास भी। और उनकी कविता कभी कविता होने की कोशिश नहीं करती। बल्कि जैसी वह है, कुछ खुरदरी, सख्त और दूर तक फैली-फैली सी—अपनी असाधारण रुक्षता के बावजूद वह कविता है—वही कविता है, इस धमक के साथ सामने आती है और देखते ही देखते एक पूरी आदमकद शख्सियत हमारे सामने आ खड़ी होती है।”
हिंदी में अकविता और अकवियों की बहुत बात की जाती है। पर प्रकाश मनु का कहना है कि सही मायने में तो विष्णु खरे की कविताओं को ही एंटी-पोएट्री कहा जा सकता है—
“....वह कविता का सरलीकरण था। एक राजकमल चौधरी को छोड़ दें तो अकविता में सचमुच खतरे उठाने वाले कितने कवि थे, जबकि विष्णु खरे इस मानी में मुझे एंटी-पोएट या अकवि लगते हैं कि वे बड़ी से बड़ी सत्ता या राजनीतिक, सांप्रदायिक, फासिस्ट ताकतों के खिलाफ खतरनाक ढंग से कविताएँ लिखने वाले खतरनाक कवि हैं।” 
यही नहीं, प्रकाश मनु के अनुसार, “विष्णु खरे शायद हिंदी के उन विरले कवियों में से हैं, जिनकी कविताओं में काफी ज्यादा आत्मकथा है। हो सकता है, कविता में इतनी आत्मकथा लिख पाने वाला कोई दूसरा कवि हमारे यहाँ हो ही नहीं...!”
इस पुस्तक में शामिल संस्मरण-माला की अगली कड़ी हैं डॉ. माहेश्वर, जिनके साथ बिताए गए पलों के साथ ही, उन्हें बिल्कुल अलग ढंग से जानने-समझने का प्रयास प्रकाश मनु ने किया है। हालाँकि प्रकाश मनु स्वीकार करते हैं कि उन्होंने डॉ. माहेश्वर पर बहुत कम लिखा है और यह बात उन्हें अपराध की तरह लगती है। फिर भी वे पूरे अधिकार के साथ कहते हैं— 
“एक वाक्य में कहूँ तो डॉ. माहेश्वर का होना प्रगतिशील विचारों और प्रगतिशील साहित्य की दुनिया में उस ठोस इनसानी तत्व का होना था, जो उसे विश्वसनीयता और प्रामाणिकता देता है और एक उदार मानवीय चेहरा भी। वे ऐसे लेखकों में थे, जिन पर हमें भरोसा होता था, और फिर वही भरोसा खुद अपने आप पर भी होता। वह हमें हिम्मत और आत्मविश्वास देता था। इसीलिए डॉ. माहेश्वर को पढ़ना और सुनना हमेशा ही अच्छा लगता था। उनकी बातें दिल के करीब लगती थीं और सीधे दिल में उतरती थीं। इस मानी में वे एक सच्चे मनुष्य और सच्चे लेखक थे।”
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लेखकीय स्मृतियों से महकती इस पुस्तक के अंत में प्रकाश मनु ने अपने गहरे मित्र साहित्यकार और चित्रकार हरिपाल त्यागी को याद किया है। त्यागी जी ने वैसे तो बहुत अच्छी कविता और कहानियाँ भी लिखीं, परंतु वे मूल रूप से तो एक चित्रकार ही थे। अनेक उत्कृष्ट कलाकृतियों की सृष्टि के साथ ही उनके रेखाचित्र विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते थे। उनकी अनेक चित्र-प्रदर्शनियाँ भी लग चुकी थीं। उनके चित्रों के बारे में प्रकाश मनु ने लिखा है—
“....त्यागी जी द्वारा बनाई गई चित्र-शृंखला ‘सादतपुर की स्त्रियाँ’, जिसमें सादतपुर के हाट-बाजार और गलियों में बड़े घरेलू लहजे में बतियाती स्त्रियों के चित्र हैं। मैंने बड़े से बड़े चित्रकारों द्वारा निर्मित वीनस....और न जाने कौन-कौन सी जमाने भर की सुंदरियों के बनाए एक से एक कलात्मक चित्र देखे हैं। वसनाएँ भी, निर्वसनाएँ भी।...पर आपसे सच्ची कहता हूँ, जो सुंदरता मुझे त्यागी जी की सादतपुर सीरीज की स्त्रियों में नजर आई, वह कहीं नहीं थी।” 
प्रकाश मनु ने त्यागी जी से पुरानी मित्रता और उनके साथ बड़े ही घरेलू संबंधों की बात तो बताई ही है, पर उन्होंने त्यागी जी को कैंसर हो जाने और फिर शनैः-शनैः उनकी मृत्यु होने का जिक्र बहुत ही मार्मिक ढंग से किया है। जब निगम बोध घाट पर त्यागी जी का अंतिम संस्कार किया जा रहा था, तब प्रकाश मनु के मन में उनके साथ बिताई गई घड़ियाँ उमड़-घुमड़ रही थीं—
“हरिपाल त्यागी, लाल सलाम....! लाल सलाम!! की आवाजें हवा में गूँज रही थीं, और हमारा वह कड़ियल दोस्त, प्यारा साथी—सबसे बाँहें खोल, धधाकर मिलने वाला जन कलाकार अपनी अंतिम विदाई लेकर, प्रयाण कर रहा था।”
पुस्तक में बड़े साहित्यकारों की बड़ी से बड़ी और छोटी से छोटी स्मृतियों को प्रकाश मनु ने बड़े सुंदर ढंग से सजा दिया है। जब भी हम पुस्तक में उपस्थित किसी बड़े साहित्यकार के बारे में पढ़ते हैं तो कई ऐसी बातें भी हमारे सामने आती हैं, जिनसे पहल हम परिचित न थे। या शायद हम उसकी कल्पना ही न कर सकते थे। पर साक्षात्कार लेने में माहिर प्रकाश मनु बड़े आत्मीय लहजे में ऐसे-ऐसे प्रश्न पूछते हैं कि बड़ा साहित्यकार भी अपने जीवन के गूढ़ रहस्य खोलने को बाध्य हो जाता है। 
कुछ मिलाकर प्रकाश मनु के संस्मरणों की पुस्तक ‘बड़े साहित्यकारों के साथ’ हमें कई बड़े साहित्यकारों से मिलवाने के साथ-साथ उनके बारे में छोटी-बड़ी बहुतेरी बातों को भी जानने का अवसर प्रदान करती है। यही कारण है कि इन संस्मरणों को पढ़ते हुए, हिंदी के बड़े और दिग्गज साहित्यकारों की जीवनगाथा के साथ-साथ उनका सृजनकर्म और समूचा व्यक्तित्व एकाएक हमारी आँखों के आगे कौंध जाता है।
***

281, सेक्टर 19, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121002, 
चलभाष: 0987146957

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