कहानी: मुखौटालाल के छह तुक्के

विजय कुमार संदेश

विजय कुमार संदेश

प्राध्यापक, पी.जी. हिन्दी विभाग, मार्खम कॉलेज, हजारीबाग, झारखंड,भारत
दूरभाष: +91-943 019 3804
ईमेल: sandesh.vijay@gmail.com


सुबह-सुबह ही गली के नुक्कड़ पर टहलते हुए आशीष को हॉकर अखबार थमा गया। थोड़ी देर में आशीष लौटकर घर आया। वह अखबार खोलने ही वाला था कि नौ वर्षीय पौत्री नीलू ने आकर उसके कान में कहा- दद्दू अपने पड़ोसवाले अंकल जो नागपुर, महाराष्ट्र में रहते हैं, उनका अखबार में फोटो छपा है। आशीष ने आश्चर्यमिश्रित मुद्रा में दैनिक हिन्दुस्तान अखबार का पन्ना पलटा। पहले ही पृष्ठ पर फोटो के साथ शीर्षक था - भूमिपुत्र पुष्परंजन ‘देवल’ विश्वविद्यालय के नये कुलपति बने। फिर दूसरा अखबार भी खोला। उसमें भी फोटो के साथ ब्यौरे में परिचय के साथ लिखा था- ‘मजदूर का बेटा कुलपति।’ स्थानीय सभी अखबारों में अलग-अलग शीर्षकों से एक ही सूचना थी। आशीष खुश था कि उसका बचपन का दोस्त जिसके साथ वह खेला-कूदा और बड़ा हुआ है, आज विश्वविद्यालय का कुलपति बन गया है। दो वर्ष हुए, पुष्परंजन से उसकी भेंट नहीं है। आशीष को थोड़ा आश्चर्य भी हुआ। पढ़ने-लिखने में फिसड्डी पुष्परंजन कुलपति जैसे प्रतिष्ठित पद पर कैसे पहुँच गया? क्योंकि, उसे पता है कि उसे न ठीक से हिंदी आती है और ना ही वह अंग्रेजी बोल पाता है। भाषा के मामले में तो वह शुरू से आखिर तक कंगाल ही रहा है। अक्सर बातचीत करते हुए उसने देखा-सुना है कि हिन्दी बोलते-बालते दो-एक वाक्य अंग्रेजी और अंग्रेजी बोलते हुए अंततः हिन्दी बोलने पर उतर आता है। उसकी हिन्दी में भी अधिकांश शब्द स्थानीय बोली के ही होते हैं। ऊ-परी (उधर) और इ-परी (इधर) तो जैसे उसका तकियाकलाम है। 

आशीष को आज भी याद है कि बचपन में सभी उसे मुखौटालाल कहकर चिढ़ाते थे। उसे तरह-तरह के मुखौटे पसंद थे। प्रायः बंदर-भालू का मुखौटा पहनकर पूरे मुहल्ले में घूम आता था और छोटे-छोटे बच्चों को डराया भी करता था। मुखौटेबाजी में उसका मूल नाम ‘सुखीलाल’ जैसे कहीं पीछे छूट गया और वह मुखौटालाल के नाम से ही जाना जाने लगा। मुखौटेबाज से पुष्परंजन समय के अंतराल में तुक्केबाज भी बन गया था और अपनी सफलता का सारा श्रेय आज भी वह अपनी तुक्केबाजी को ही देता है। अपनी तुक्केबाजी के पक्ष में वह बड़े गर्व से किसी से भी बातचीत में कहता है कि सफलता और सुअवसर के लिए उसने न तो कड़ी मेहनत की है, न ही कोई दृढ़-संकल्प लिया और ना ही उसके पास कोई असाधारण प्रोफाइल रहा है। जब कभी समय आया तुरुप के पत्ते की तरह तुक्के काम कर गए। तुरुप के इस तुक्के ने उसे मंजिल तक पहुँचाने में उसकी काफी सहायता की है। अभी दो दिन पहले एक स्थानीय चैनल को इंटरव्यू देते हुए उसने कहा था कि ताश के तुरुप के पत्ते की तरह तुरुप के तुक्के ने मेरा हमेशा साथ दिया है। मेरी आजतक की सफलता में तुरुप के तुक्कों का बड़ा हाथ रहा है। अपने जीवन की नूरा-कुश्ती में मैंने कभी ताश नहीं खेला है। हाँ, फुटबॉल, हॉकी, बैडमिंटन जरूर खेले हैं। पर, तुरुप के पत्तों के बारे में मैं खूब जानता हूँ। मैंने सुन रखा है कि ताश के पत्तों के खेल में वही जीतता है, जिसके पास तुरुप के पत्ते होते हैं। यदि कोई एक पक्ष तुरुप का एक छोटा पत्ता चले और दूसरा पक्ष उससे बड़ा तुरुप का पत्ता चल दे, तो जीत उसी की होती है, जो बड़ा पत्ता चल देता है। पुष्परंजन सगर्व कहता भी है कि यह संयोग है कि जब-जब मैंने तुरुप के तुक्के फेंके, मेरी जीत होती गयी। उसने आगे यह भी कहा कि यदि किसी के पास जन्मजात प्रतिभा नहीं है तो भी कड़ी मेहनत से सफलता किसी को भी मिल सकती है। वे छात्र जो अपनी पढ़ाई में स्वयं को दिन-रात झोंक देते हैं और अनगिन चुनौतियों का सामना करते हुए भी संघर्षरत रहते हैं, वे अंततः लक्ष्य को प्राप्त कर लेते हैं। किंतु, इनमें से एक भी गुण मुझमें नहीं थे। मेरे पास सफल होने के लिए कुछ था तो वह केवल तुक्का और केवल तुक्का था। एक औसत विद्यार्थी होने के कारण पढ़ाई के प्रति मेरी कभी दिलचस्पी नहीं रही।

पहला तुक्का: आशीष के बचपन का सहपाठी पुष्परंजन की पढ़ाई-लिखाई पहली कक्षा से लेकर मैट्रिक तक साथ-साथ हुई। पुष्परंजन गाँव के स्कूल में जब पढ़ता था तब आम ग्रामीण बच्चों की तरह ही उसका जीवन था। वह अपने सिर के बालों में तेल इतना चुपड़ता था कि कमीज का कॉलर तक काला हो जाता था। एकदम देहाती बच्चों की तरह। उन दिनों सरकारी स्कूलों में बेंच-डेस्क तो थे नहीं, सो वह घर से ही जूट का बोरा लेकर वर्ग-कक्ष में बैठता और वर्ग-शिक्षक को टुकुर-टुकुर हेरता रहता था। वर्ग शिक्षक द्वारा पढ़ाये गए विषय को वह ठीक से समझ नहीं पाता था। इस कारण वर्ग-कक्ष में उसे सबसे पीछे बिठाया जाता था। नामचीन मुखौटाधारी होने के कारण क्लास और पास-पड़ोस के सभी लोग उसे जानते-पहचानते थे। चिढ़ाने के लिए तो उसे मुखौटाधारी बंदर-भालू तक कहा जाता था। उसकी चाल-ढाल में अजीब देहातीपना और गँवारपन था। इसी के साथ नीम पर चढ़े करेले की तरह तीखे मिजाज वाला और गजब का भुक्खड़ भी था। उसकी वाणी में कोई लस नहीं। जब बोलता था तो सुननेवाले को चुभता सा महसूस होता था। आधे सेर चावल का भात तो वह एक बार में ही खा जाता था। शादी-ब्याह हो या कहीं मृत्यु-भोज का अवसर, बिन बुलाये मेहमान की तरह पहुँच जाता था। इस कारण कई बार उसकी किरकिरी भी हो चुकी थी। आशीष को याद है कि एक दिन पड़ोस के गाँव में चल रहे प्रीतिभोज में वह चुपके से पंगत में बैठ गया था। पहला ही कौर उठाया था कि कुछ लोगों ने देखा तो भरी भीड़ में उसे बेइज्जत करके निकाल दिया। दूसरे ही दिन यह खबर उसके क्लास के साथियों को मिली तो बातूनी सुंदर ने पूछ लिया- क्यों रे मुखौटा? सुना है कल तुम्हें प्रीतिभोज में बीच पंगत से उठा दिया गया था? 

सुंदर की बातें सुनकर मुखौटा उर्फ पुष्परंजन थोड़ी देर के लिए झेंप गया। फिर, निर्लज्ज होकर बोला- अरे, वह क्या खिलायेगा? कंजूस जो ठहरा। बेस्वाद भोजन था। मैं स्वयं उठकर चला आया।
सुंदर कहाँ चुप रहने वाला था। वह उसका बाल-सखा जो था। बिना रुके बोल गया- तुम्हारी तो भद्द हो गयी होगी? 
मुखौटा अजीब-सा मुँह बिचकाकर बोला- बेस्वाद भोजन मुझसे खाया ही नहीं गया। कच्ची पूड़ी और सब्जी पत्तल के नीचे दबा दिया।

सुंदर ने मजाकिया लहजे में फिर पूछा- और... वो बूँदी-मिठाई?
मुखौटा ने छूटते ही मुँह तीता करते हुए कहा- वह भी क्या मिठाई थी? मिठास बिल्कुल नहीं थी। न ही चीनी का रस और ना ही सीरे में कोई लस्स। 

मुखौटा की बात सुनकर क्लास के सभी लड़के खिलखिलाकर हँस पड़े थे। समय के अंतराल में कुछ बड़े होने पर जब वह दसवीं कक्षा में पहुँचा तब तक उसके व्यक्तित्व में कुछ सुधार हो गया था। उसके व्यक्तित्व से देहाती और गँवार मुखौटा का चोला उतर चुका था। विद्यालय के एक स्वजातीय शिक्षक को मुखौटा उर्फ पुष्परंजन से थोड़ी-बहुत आत्मीयता हो गयी थी। मुखौटा को सुखीलाल से पुष्परंजन ‘देवल’ नाम भी उसी स्वजातीय शिक्षक ने दिया था। उसके पहले गाँव-ज्वार के लोग उसे मुखौटालाल के नाम से ही जानते थे। प्राइमरी स्कूल की पंजी में भी उसका नाम सुखीलाल ही लिखा हुआ था। मैट्रिक की परीक्षा फार्म भरते हुए उस स्वजातीय शिक्षक ने पहले उसका नाम सुखीलाल से पुष्परंजन ‘देवल’ बदला और फिर एक सेटिंग की और दो मेधावी छात्रों के बीच में उसका परीक्षा फार्म रख दिया। बोर्ड से दोनों मेधावी छात्रों के बीच ही आगे-पीछे मुखौटा का सीट पड़ा। उन दोनों के सहयोग से मुखौटा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हो गया। सेटिंग का यह तुक्का काम कर गया।

दूसरा तुक्का: मैट्रिक की परीक्षा अच्छे अंकों से पास हो जाने  के बाद उसकी इच्छा इंटरमीडिएट में विज्ञान विषय लेकर पढ़ने की हुई। उसने स्थानीय कॉलेज में भौतिकी, रसायन विज्ञान और गणित विषय लेकर विज्ञान संकाय में नामांकन ले लिया। कक्षाएँ शुरू हुईं तो अपनी आदत के अनुसार उसने सबसे पीछे की बेंच पर बैठना पसंद किया। क्लास के सहपाठी उसे ‘बैक बेंचर’ उर्फ ‘मुखौटालाल’ ही कहते थे। पर, उसे इस नाम से पुकारने पर कोई फर्क नहीं पड़ता था। आसान शब्दों में कहें तो वह ‘थेथर’ किस्म का एकबोलिया जीव था। अपनी बात और अपनी हेठी से एक इंच भी इधर से उधर होना नहीं जानता था। अजीब जिद्दी किस्म का किशोर-युवा था। एक बार जो कह दिया सो कह दिया। भले ही वह बात तर्कयुक्त हो या न हो। फिर भी, अपनी जिद नहीं छोड़ता था, उससे कदम भर भी पीछे हटने का सवाल ही नहीं पैदा होता था। झूठी शान का वह जिंदा सबूत था। ऐसा नहीं है कि वह एकदम ईमानदार था। ईमानदार तो वह कतई नहीं था। बाह्य आडम्बर और अहंकार उसके जेहन में नशे की तरह घुले-मिले थे। अपने शिक्षकों और गुरुओं की नजर में तीसरे-चौथे दर्जे का विद्यार्थी था। उसकी योग्यता औसत से भी कम थी। उसमें एक दुर्गुण यह भी था कि विषय को समझे बिना उस पर अपनी राय देता था जिसके कारण विद्यार्थियों के बीच वह अक्सर हँसी का पात्र बन जाता था। विषयों पर कमजोर पकड़ थी, इसलिए उसने विज्ञान के सभी विषयों का ट्यूशन लिया। इसका तत्काल फलित प्रभाव उसे प्रैक्टिकल में अच्छे अंक के रूप में मिला। मुखौटा का यह भी एक तुक्का था, जो काम कर गया और वह प्रथम श्रेणी से इंटरमीडिएट पास कर गया।

तीसरा तुक्का: इंटरमीडिएट में प्रथम श्रेणी आ जाने से उसका उत्साह बढ़ा तो वह स्नातक की पढ़ाई के लिए एक बड़े विश्वविद्यालय में चला गया। पढ़ने में कमजोर था किन्तु, भाग्य का बली था। भाग्य के तुक्कों के सहारे वह यहाँ तक आ गया था। उसने भौतिकी में आनर्स लिया। यद्यपि, उसका रुझान भौतिकी की अपेक्षा रसायनशास्त्र की ओर अधिक था। पर, रसायनशास्त्र की अपेक्षा भौतिकी में दो-चार अंक अधिक आने के कारण उसने भौतिकी पढ़ना ही पसंद किया। पिता मजदूर थे। आर्थिक तंगी तो रहती ही थी। इस कारण एक छोटे से किराये के कमरे में रहकर उसने स्नातक की दो वर्ष की पढ़ाई पूरी की और भोजन प्रायः पास के मंदिर में चलने वाले लंगर में ही किया। परीक्षा में इस बार भी संयोग के तुक्के ने काम किया। प्रायः सभी रटे हुए प्रश्न आ गए जिसका उत्तर उसने रटी-रटायी भाषा में ही दिया। उसका भाग्य प्रबल था। ‘ग्रेस मार्क्स’ लेकर प्रथम श्रेणी से पास भी कर गया। इस बार रट-रटाई का तुक्का काम कर गया था।

चौथा तुक्का: एम॰एस-सी॰ करते ही मुखौटा उर्फ पुष्परंजन देवल की शादी हो गयी। पत्नी साधारण और चुप्पा थी। किसी से बात करना उसे पसंद नहीं था। साधारण और चुप्पा लड़की के कारण उसे दहेज भी अच्छा मिला था। पुष्परंजन को इस बात का गुमान था कि उसे जितना दहेज मिला है, उतना आजतक गाँव में किसी को नहीं मिला। उसकी ससुराल भी दूर नहीं थी। पास के ही एक इंडस्ट्रियल शहर में उसके ससुर जी एकाउन्टेंट थे। उनके पास पैसों की कोई कमी नहीं थी, सो एक तरह से अच्छी खासी रकम देकर उन्होंने पुष्परंजन को खरीद लिया था। पुष्परंजन अपने काम से अक्सर बाहर ही रहता था। इस कारण उसकी पत्नी प्रायः अवसाद में ही रहती थी। यह संयोग था कि एक बेटे के जन्म के बाद उसे मातृत्व-सुख मिला और जीने के लिए एक बड़ा सहारा मिल गया था। एम॰एस-सी॰ करते हुए पुष्परंजन ने प्रतियोगी परीक्षाएँ देनी शुरू की थी। एक-दो तो दे चुका था। सारे प्रश्न चार विकल्प वाले थे और उत्तर-पुस्तिका पर बॉल पेन से गोल बॉक्स को केवल काला करना था। प्रश्न-पत्र देखकर पुष्परंजन का दिमाग झन्ना गया था क्योंकि उसकी जानकारी में सारे प्रश्न अत्यंत कठिन थे। सोचा चलो एक बार फिर तुक्के का प्रयोग करता हूँ और तुक्के से ही गोल-बॉक्स को काला कर देता हूँ। दैवयोग से यदि उत्तर सही हो गया तो ठीक वरना आवे आम या जाय लबेदा। प्रश्न-पत्र देखता गया और अनुमान से उत्तर-पुस्तिका में गोल बॉक्स को काला करता चला गया। बुझे मन से परीक्षा केन्द्र से बाहर आया। पुष्परंजन भूल गया कि उसने कोई प्रतियोगी परीक्षा भी दी है। छह महीने बाद रिजल्ट आया। इस बार भी तुक्के काम कर गए थे। वह सफल अभ्यर्थियों की सूची में अंतिम पायदान पर था। केन्द्र सरकार के अधीन रिसर्च एंड टेक्नोलोजी के क्षेत्र में एक जूनियर रिसर्चर के रूप में उसकी नियुक्ति हो गयी। रिसर्चर के रूप में नियुक्ति के बाद अपनी प्रतिभा से अधिक अपने तुक्कों पर उसे गर्व महसूस हो रहा था। समय के साथ उसकी नौकरी में ‘समयबद्ध प्रोन्नति’ होती गयी। पर, उसकी प्रतिभा में कोई निखार नहीं हुआ। कई बार तो उसे अपने सीनियरों से जलालत भी झेलनी पड़ी थी। किंतु, सीनियरों द्वारा की गयी जलालत का भी उसके सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा। सीनियरों की अनुशंसा पर अंततः उसे एक ऐसे विभाग में ट्रांसफर कर दिया गया, जहाँ कुछ जूनियर रिसर्चरों की सहायता करनी होती थी। एक तरह से यह उसकी पदोन्नति नहीं बल्कि पदावन्नति थी। कहते हैं हर अमंगल के पीछे एक मंगल छिपा होता है। और, सच में पुष्परंजन का यह अमंगल दस वर्षों के बाद मंगल में तब्दील हो गया। चूंकि, वह रिसर्चरों के साथ शोध एवं सर्वेक्षण से जुड़ा रहा था। इस कारण उसे रिसर्चर के पद से अवकाश लेते ही एक विश्वविद्यालय में कुलपति के रूप में नियुक्ति भी हो गयी। यहां भी उसके साथ शोध एवं सर्वेक्षण संस्थान के बड़े नाम का तुक्का काम कर गया था। अखबार में बड़े-बड़े अक्षरों में उसकी प्रशंसा के कसीदे गढ़े गये। पर, पुष्परंजन अपनी प्रतिभा को जानता था। अनायास ही तुक्के का छक्का लग गया था और गेंद आकाशीय मार्ग से बाउंड्री के पार चला गया था।

पाँचवा तुक्का: विश्वविद्यालय में योगदान के बाद दो महीने तक उसने ऐसा शो किया जैसे वह बहुत प्रतिभाशाली और ईमानदार है। लेकिन, उसकी बोल-चाल की भाषा और शैली ने उसकी कलई खोल दी थी। भाषायी-अपंगता के कारण हीन-भावना से ग्रस्त नये कुलपति उर्फ पुष्परंजन ‘देवल’ दो-एक महीने के भीतर ही बौद्धिकों के सवाल-जवाब से कन्नी काटने लगे थे। अपनी इनफीरियरिटी कंपलेक्स से ग्रसित पुष्परंजन अब तेज-तर्रार बौद्धिकों का अपमान करना शुरू कर दिया था जिससे वे उनसे दूर होते गए और तथाकथित कामचोर और चापलूस निकट होते गए। थोड़े ही दिनों में चापलूसों एक बड़ा गुट उन्होंने तैयार कर लिया था, जो उसके आगे-पीछे रहने लगे थे। चापलूसों में एक सुपर चापलूस ने साजिश रची। एक छात्र-नेता को पैसे देकर और भविष्य में अच्छे पद पर बिठाने का लालच देकर विश्वविद्यालय के कुलपति के विरुद्ध छात्र आंदोलन शुरू करवाया। छात्र आंदोलन शुरू हुआ और दो-एक दिनों में ही उग्र रूप लेने लगा। छद्म रूप में यह छात्र आंदोलन उस सुपर चापलूस की सोची-समझी रणनीति थी। उसी रणनीति के तहत परदे के पीछे रहकर उसने एक ओर छात्र नेताओं पर झूठा दबाव दिया कि वे आंदोलन बंद करें और दूसरी ओर पुष्परंजन के बॉडी-गार्ड की तरह उसके आगे-पीछे सुरक्षा घेरा बनाकर रहने लगा। अपनी रणनीति में वे चापलूस सफल हो गये थे। महीना बीतते-बीतते पुष्परंजन देवल के प्रिय-पात्रों में उनकी गिनती होने लगी थी। पुष्परंजन को भी विश्वास हो गया था कि ये काम के आदमी हैं। इसलिए अब हर बात पर चापलूसों की सलाह लेने लगा था। धीरे-धीरे चापलूसों की पकड़ पुष्परंजन पर मजबूत होने लगी थी और वे घर-आंगन का आदमी हो गये थे। जब चापलूसों को विश्वास हो गया कि पुष्परंजन पर उनकी पकड़ मजबूत हो गयी है तब उन्होंने सलाह देनी शुरू की और समझाया कि सर! आप खर्च करके आये होंगे। अतः समय बीतने के पहले अपना खर्च ब्याज सहित निकाल लीजिए। पुष्परंजन को उनकी सलाह अच्छी लगी। भला, लक्ष्मी जी किसे अच्छी नहीं लगतीं? उन्होंने समझाया कि जिसपर लक्ष्मी जी की कृपा हो जाये वह धन-वैभव से परिपूर्ण हो जाता है। यश-गाथाएँ उसके आगे-पीछे चलती हैं। सर! आप पर लक्ष्मीजी की कृपा हुई है, जो आप यहाँ तक बिना किसी व्यवधान के पहुँचे हैं। लक्ष्मीजी की कृपा के सहारे आपको अपने रोजनामचे में आज की परिस्थितियों में कुछ ऐसे काम करने होंगे, जो संभव है वह अनचाहा काम हो। विपरीत परिस्थितियों को अनुकूल बनाने के लिए लेन-देन की आवश्यकता होती है, जिसे सरल भाषा में ‘शुकराना या नजराना’ कहा जाता है। 

चापलूसों की बात सुनकर पुष्परंजन चौंक गया। उसने फटाक से कहा- यह तो चोरी है। सुपर चापलूस ने पलट कर जवाब दिया- सर! चोरी नहीं, ईमानदारी से चोरी। फिर, आगे कहा- सर, चोरी करो लेकिन ईमानदारी से। पुष्परंजन चोरी से ईमानदारी की बात सुनकर अवाक रह गया और एक साँस में कह गया- चोरी और ईमानदारी? उस सुपर चापलूस ने समझाया- हाँ सर! चोरी में ईमानदारी? यह आज की कूटभाषा में पीसी है। आप अपने कार्यालय में आनेवाले ठीकेदार या सामान सप्लाइयर का काम करेंगे। किये गये कामों का आप भुगतान भी करेंगे। यह भुगतान वास्तविक भुगतान से अधिक होगा और इसी अधिक भुगतान को वे फिर नजराना के रूप में आपको भेंट करेंगे। यही पीसी रूपी भेंट चोरी से ईमानदारी की कमाई है। आपको कुछ नहीं करना है। सर! एक कहावत है कि ‘न हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा।’ सुपर चापलूस के संकेत को पुष्परंजन ने समझ लिया और अपनी ओर से हामी भर दी। जिस पुष्परंजन के पिता मजदूरी और मिट्टी खोदकर जीते रहे, उसी के बेटे ने अपने इस छोटे-से कार्य-काल में पीसी के रूप में करोड़ों की कमाई कर ली। सुपर चापलूस और उसके सहयोगियों के श्रम से करोड़ों कमा चुके पुष्परंजन ने अपने लिए बंगला-कार-आभूषण क्या कुछ नहीं खरीदा। उसके पास चोरी से ईमानदारी की कमाई के बदौलत कई बड़े शहरों में जमीन, फ्लैट सब आ गया था। गरीबी से निकला हुआ आदमी अमीरी के चकाचौंध की ओर इस तरह आकर्षित होता है जैसे लैंप-पोस्ट की रोशनी में पतंगे आकर्षित होते हैं। उन पतंगों को यह नहीं मालूम कि इसी रोशनी की चमक में उनका वजूद मिटने वाला है। पुष्परंजन भी अपना स्टेटस बनाने के चक्कर में चकाचौंध रूपी दलदल में निरंतर धंसता गया। दलदल की गीली मिट्टी देखकर भी वह अनभिज्ञ बना रहा। तुक्के में वह करोड़ों का मालिक जो बन गया था।

छठा तुक्का: भाग्य पर भरोसा करनेवाले पुष्परंजन को अपने तुक्कों पर बड़ा गर्व था क्योंकि भाग्य के सहारे जीनेवालों को तुक्कों पर बड़ा विश्वास होता है। यही कारण है कि तुरुप के पत्तों की तरह हर बार वह एक तुक्का फेंक देता था। चापलूस-चमचे जानते थे कि पुष्परंजन ने अपने इस कार्य-काल में करोड़ों की कमाई की है। इस करोड़ों की कमाई पर उनकी भी गिद्ध-दृष्टि थी। उन्होंने पुष्परंजन को मशविरा दिया कि सर! आपको दूसरे टर्म के लिए प्रयास करना चाहिए। हमलोग इस काम में आपको सपोर्ट करेंगे। पुष्परंजन लोभ में पड़ गया। उसने हामी भर दी। अब क्या था, चापलूस-चमचे कपट-पूर्ण जुगाड़ में लग गए। सुपर चापलूस द्वारा एक बिचौलिए की खोज शुरू हुई, जो उसे विभागीय कार्यालय में ही मिल गया। चापलूस-चमचों ने उस बिचौलिए को समझाया कि नियुक्ति वगैरह कुछ नहीं करवाना है। इस आदमी ने बहुत काली कमाई की है। बस, उसे विश्वास में लेकर करोड़-डेढ़ करोड़ खींच लेनी है। इसमें पाँच प्रतिशत की हिस्सेदारी आपकी भी होगी। बिचौलिए ने जब सहमति दे दी तो छल-प्लान शुरू हुआ। पुष्परंजन को उस बिचौलिए से ऑफिस के बाहर मिलवाया गया। बिचौलिए ने ऐसी जादूगरी की कि पुष्परंजन को विश्वास हो गया कि सचमुच यह मेरा काम करवा देगा। दिन-तारीख तय हुआ और तयशुदा दिन को पुष्परंजन के साथ चापलूस-चमचे भी आये। एक होटल के कमरे में रुपयों से भरा ब्रीफकेस बिचौलिए को दिया गया। सभी साथ ऑफिस-परिसर तक गए। बिचौलिया ब्रीफकेस लेकर अंदर गया। ब्रीफकेस अपने सहयोगी को थमाकर बाहर आया और कहा कि पंद्रह दिनों में आपका काम हो जायेगा।

आत्म-मुग्ध पुष्परंजन इस आत्मविश्वास के साथ घर लौटा कि दूसरा टर्म भी उसे मिल जायेगा। पर, समय-चक्र को कौन जानता है? कब किसी को राजा और किसी को रंक बना दे। दुर्योगवश राज्य में इसी समय कई राजनीतिक घटनाएँ हुईं और सरकार बदल गयी। अधिकारियों-कर्मचारियों का भी तबादला हुआ। बिचौलिया यह कहकर फरार हो गया कि एक बार फिर से प्रयास करेंगे। थैली तो आपके सामने ही दी गयी है। उस अधिकारी का भी तबादला यहाँ से दूर किसी छोटे से शहर में हो गया है। वह ज्वाइन करने चला गया है। यह सुनते ही पुष्परंजन को जैसे काठ मार गया। वह बेहोश होते-होते बचा। थोड़े दिनों बाद वह अवसाद में चला गया और पागलों जैसी हरकतें करने लगा। अवसर और नियति भाँपकर चापलूस-चमचे भी धीरे-धीरे किनारे लग गए। इस बार पुष्परंजन का तुक्का सिरे से खारिज हो गया था। उसकी चोरी से ईमानदारी की कमाई एक झटके में लुट चुकी थी। आँखों के आगे दिन में ही तारे दिखने लगे थे। आशीष को जब यह सारा खेल मालूम हुआ, वह पुष्परंजन से मिलने आया। उसने पुष्परंजन को समझाया कि भई, जो बीत गयी, सो बात गयी। नये सिरे से अपना जीवन सादगी से शुरू करो। मैंने सुन रखा है कि काली कमाई की यही अंतिम गति होती है। 

कई महीनों के बाद आशीष ने सुना कि अब फिर से पुष्परंजन मुखौटा पहने गाँव-मुहल्ले में घूमने लगा है और बच्चे उसे मुखौटालाल, मुखौटालाल कहकर चिढ़ाने लगे हैं। वह पत्थर उठाकर कभी बच्चों पर फेंकता है तो कभी अपना सिर पीटने और बाल नोचने लगता है।

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