सहज संवेदनाओं से भरी यथार्थ चित्रण करती कहानियों का संकलन ''एक और मंगरा''

विजय कुमार तिवारी


समीक्षित कृति: एक और मंगरा (कहानी संग्रह)
लेखक: अंकुश्री
मूल्य: ₹ 300/-
प्रकाशक: निखिल पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स,आगरा


जीवन की छोटी-छोटी अनुभूतियाँ हृदय को मथने लगती हैं, कोई बेचैनी आकार लेने लगती है तो स्पष्ट है, वहाँ कोई कहानी जन्म ले रही है। केवल कहानी ही नहीं, साहित्य की अन्य विधाओं के साथ भी ऐसा ही होता है और रचनाकार सृजन में लग जाता है। यहाँ सहमति-असहमति जैसा विमर्श नहीं है बल्कि एक भाव-चिन्तन है जो रचना-प्रक्रिया का हिस्सा बनता है। हम समाज में रहते हैं, वहाँ नाना तबके के लोगों से जुड़ते हैं, उनका जीवन देखते हैं और उनके सुख-दुख से प्रभावित होते हैं। उन्हीं अनुभवों को अपनी रचनाओं के माध्यम से हर लेखक उसी समाज को सौंप देता है। इस तरह हमारा लेखन स्वयं की अभिव्यक्ति के साथ-साथ सामाजिक जीवन का यथार्थ चित्रण है। जीवन में नाना तरह के रस, अलंकार, विशेषण आदि घुले-मिले होते हैं और हमारा सृजन भी उन सबसे गहराई से सम्बद्ध होता है। कहानियाँ सशक्त तरीके से यह दायित्व वहन करती हैं, पाठकों को आकर्षित करती हैं और सार्थक संदेश देते हुए प्रभावित करती हैं।

राँची, झारखण्ड में रहने वाले बहुचर्चित साहित्यकार, कथाकार अंकुश्री जी का कहानी संकलन "एक और मंगरा" मेरे सामने है जिसमें संग्रहित कहानियाँ उपरोक्त भाव-दशाओं से ओत-प्रोत हैं। इस संकलन में उनकी छोटी-बड़ी कुल 20 कहानियों को जगह मिली है। उन्होंने लघुकथा, बाल कथा, कहानी, निबंध, हास्य-व्यंग्य, बाल निबंध, बाल कविता व कविता सहित नाना विधाओं में सृजन किया है। लेखन के साथ-साथ उन्होंने सह-संपादन और संपादन कार्य भी किया है।

विजय कुमार तिवारी
मेरे लिए सुखद है, इस कहानी संग्रह के माध्यम से अंकुश्री जी के साहित्य संसार को पढ़ने, समझने का अवसर मिल रहा है। उन्होंने साहित्य में विमर्शों को छुआ है और उनकी कहानियाँ फार्मूलेबाजी से हटकर ठोस धरातल पर खड़ी दिखाई देती हैं। इन कहानियों में जीवन का यथार्थ उभरता है और पात्र अपना भिन्न प्रभाव छोड़ते हैं। उनकी भाषा-शैली कोई विशेष है जो स्वाभाविक तौर पर स्थानीयता से जुड़ती-जोड़ती है। इस तरह उनकी कहानियों के पात्र सचेत करते हैं, गहरे जीवन के संदेश देते हैं और उन्हें महत्वपूर्ण कथाकार की श्रेणी में ला खड़ा करते हैं।

'आजाद पत्नी' ऊँचे आदर्श, नैतिकता व देश-प्रेम की कहानी है। इसमें कथाकार का चिन्तन और सृजन श्रेष्ठ प्रतिमान स्थापित करता हुआ दिखाई देता है। भाषा सहजता लिए हुए है, रहस्य, रोमांच से भरी कहानी विचलित तो करती है परन्तु प्रेम की श्रेष्ठता का परिचय देती है। 'रोटी दे दे माँ--' कंपलसरी रिटायरमेंट के दुष्प्रभाव से विचलित करती मार्मिक कहानी है। हमारा सामाजिक ढांचा, नेतागिरी, सरकारी योजनाओं के पीछे की कुत्सित भावनाओं के दलदल में फँसी मानवता के दृश्य सोचने पर मजबूर करते हैं। पात्रों के मनोविज्ञान का यथार्थ चित्रण कथाकार की पकड़ दर्शाता है और विवरण प्रभावित करते हैं। कथाकार सहज शब्दावली में मनःस्थिति दिखाने में पारंगत है। यहाँ कोई वाद-मतवाद नहीं है बल्कि मर्मस्पर्शी दृश्य झकझोरने वाले हैं और उनकी कहानियाँ विह्वल करती हैं। 'यूनियन' कहानी कम्पनी, कर्मचारी, अधिकारी, यूनियन के नेता आदि के गठजोड़ को लेकर सहज कहानी है। यह वह व्यवस्था है जिसमें सभी के अपने-अपने स्वार्थ और उद्देश्य हैं, सभी अपनी चिंता करते हैं और यह सिलसिला चलता रहता है। अंकुश्री जी ने बहुत करीब से ऐसी अनुभूतियाँ की हैं और यूनियन के दाँव-पेंच को चित्रित किया है। मजदूर यूनियन, संगठन आदि के लिए दुनिया भर में प्रचलित भाषा-शैली व शब्दावली को सशक्त तरीके से लिखा और कहानी के पीछे के मनोविज्ञान को समझाया है। 'हवा में तैरती घड़ी' हमारे मनोचिन्तन में बसे भूत-प्रेत के प्रभाव की कहानी है। बचपन से ही हम ऐसी घटनाएं सुनते रहते हैं और जाने-अनजाने भयभीत होते रहते हैं। जब यथार्थ की जानकारी होती है तो हास्य का पात्र बनना पड़ता है। उन्होंने सशक्त कहानी बुनते हुए उन मनोभावों को जीवन्त किया है। अंकुश्री अपनी कहानियों में बिंब का सहारा लेते हैं और कोई गहरा प्रभाव छोड़ते हैं।

'टुकड़ा-टुकड़ा आदमी' कहानी में विरोधाभास को लेकर पंक्ति देखिए, 'भीतर से त पूरा गाँव खीरा लेखा फाट गइल बा...'। कहने का तात्पर्य है कि उपर-उपर जो एकता दिखाई दे रही है, वह सच नहीं है, यहाँ सब कुछ बँटा हुआ है। सूत्रधार की भूमिका में दूबेजी हैं, अमेरिका में स्पेस साईंटिस्ट हैं, सालों बाद अपने गाँव आए हैं और उन्हें सब-कुछ बदला हुआ दिखाई दे रहा है। कथाकार ने गाँव के बदले हालात के पीछे की पीड़ा को चित्रित किया है और नाना उदाहरणों के द्वारा आपसी वैर, लोगों के बीच के झगड़े, जातियों में विभाजन और व्याप्त बुराइयों का उल्लेख किया है। एक ओर गाँव में प्रगति हुई है, बिजली के खंभे हैं, रात में रोशनी रहती है, लाउडस्पीकर बज रहा है, लोगों के रहन-सहन और पहनावे में बहुत अंतर आ गया है, आवागमन के आधुनिक साधन हैं परन्तु गाँव की एकता खण्डित हुई है और लोग जातियों में बँट गए हैं। अंकुश्री ने हमारे देश, समाज और गाँव के इस जातिगत विभाजन को पूरी सच्चाई के साथ दिखाया है और अपनी संवेदना व्यक्त की है।

'क्रोध' बड़े सम्भ्रान्त लोग और उनके घर में काम करने वाले कमजोर, लाचार व्यक्ति के व्यवहार, विचार और मनोविज्ञान को लेकर सशक्त भावनात्मक कहानी है। शनिचरा बेचैन है, खराब स्वास्थ्य के बावजूद बड़े साहब की सेवा में तत्पर है और उनके लिए भोजन तैयार कर रहा है। उसकी पत्नी भी सहायता कर रही है। उसे उम्मीद है, आज बाल-बच्चों समेत उसे भी स्वादिष्ट भोजन मिलने वाला है। जीवन में कुछ संयोग भी होते हैं। अंततः भाग-दौड़ में शेष भोजन कुत्ता खा जाता है, शनिचरा को मालिक की डाँट खानी पड़ती है। अंकुश्री ने बड़ी मार्मिकता के साथ इस कहानी को बुना है। उसे मालिक पर क्रोध आ रहा है कि जाए और उनका मुँह नोच ले। ऐसा होना संभव नहीं है, उसका सारा क्रोध कुत्ते पर उबलता है और वह उस पर झपट पड़ता है। 'आहुति' कहानी के माध्यम से कथाकार दंगा व सांप्रदायिकता की आड़ में मानवता व धर्म को समझना चाहता है और निष्कर्ष निकालता है कि हत्यारे का धर्म होगा-हत्या, सांप्रदायिक दंगे फैलाना, हत्याएं करना-कराना, लूटना-खसोटना और बहू-बेटियों की इज्जत से खिलवाड़ करना। दंगे में कथा-नायक की पत्नी, बच्चे शिकार हो चुके हैं और उसकी घर की कल्पना खत्म हो चुकी है। अंकुश्री किसी देखे हुए यथार्थ से विचलित हो, नाना प्रश्नों, दृश्यों व परिस्थितियों के सहारे संवेदना में डूबते हैं। यह कहानी पाठकों के मन को झकझोरने वाली है और मानवता पर प्रश्न खड़ी करती है। उनके बिंबों को समझा जा सकता है और उनकी दार्शनिक चिन्तन वाली भाषा-शैली प्रभावित करती है। 'दूसरे का सुख' ज्ञान का संदेश देती सुन्दर कहानी है। जो लोग दूसरों को देखकर अपना जीवन जीना चाहते हैं, उनके लिए यह सीख है और वैसे लोगों को पछताना ही पड़ता है। इसमें हास्य है और किंचित व्यंग्य भी। अंकुश्री ने खूब रोचक कथा का चित्रण किया है।

हमारे साहित्य में दादी या अम्मा के बक्से को लेकर कहानियाँ लिखी जाती रही हैं। अंकुश्री द्वारा रचित यह उसी कड़ी की कहानी है। यहाँ भी दादी हैं, उनका बक्सा है और लोभ-लालच की भावनाओं से भरी बहुएं हैं। अक्सर हमारे घरों में ऐसे दृश्य देखे जाते हैं, लोग स्वार्थ या लालच के वशीभूत अपने वृद्धों की सेवा करते हैं। इस कहानी वाली दादी ने पोटली में संदेश लिख छोड़ा है जो समझने वालों के लिए सबसे बड़ी धरोहर है। यह मार्मिक व रोचक कहानी है। 'नया साहेब' आज के कार्यालयों में अशिक्षित या कम जानकार अधिकारियों की कहानी है। चयन प्रक्रियाओं की खामियाँ, भाई-भतीजावाद, पैरवी आदि के चलते अक्सर अयोग्य व्यक्ति चयनित हो जाते हैं। ऐसे लोगों की समस्या होती है, वे अपनी कमजोरी को छिपाते हैं और अधीनस्थ कर्मचारियों को डांटते-फटकारते रहते हैं। अंकुश्री ने ऐसे हालात को करीब से देखा, समझा है और विस्तार से पंगु होती व्यवस्था का चित्रण किया है। यह कहानी प्रश्न उठाती है, देश की प्रगति को बाधित करती परिस्थितियों का यथार्थ दृश्य दिखाती है और ऐसे लोगों के चयन से हुई हानि को बताती है। कहानी अपना संदेश देने में पूर्णतया सफल है।

'विकल्प' कहानी के माध्यम से कथाकार ने ग्रामीण और शहरी जीवन का अंतर दिखा सबकी आँखें खोलकर रख दी है। हमारे देश के शहरों की सच्चाई यही है और मनुष्य अभिशप्त है ऐसा नारकीय जीवन जीने के लिए। मनजीत जैसे लोगों का बीमार हो जाना स्वाभाविक है। अंकुश्री ने बहुत करीब से ऐसी परिस्थितियाँ देखी हैं और लोगों को बीमार होते, मरते हुए भी देखा है। बीमारी किसी घर को कैसे तबाह करती है, सारा विवरण सही है। पति-पत्नी का यह सोचना सही ही है कि बेटियों की शादी महानगर या नगर में नहीं करेंगे। जल-प्रदूषण, वायु-प्रदूषण, बिजली-पानी की किल्लत और इन सबके बीच पीसता मनुष्य बाध्य है बीमार होने के लिए। अंकुश्री लिखते हैं-बुढ़ापा आने के बाद शरीर अपने नियंत्रण में न रहकर चिकित्सकों के नियंत्रण में चला जाता है। मनजीत को उनका भाई गाँव ले आता है। दवाइयाँ चलती रही, गाय का शुद्ध दूध पीना शुरू हो गया, टहलना, नदी में स्नान करना और शुद्ध हवा-पानी से स्वास्थ्य में सुधार होने लगा। उन्होंने युवाओं को गाँव व शहर का अंतर समझाने का प्रयास किया और गाँव में रोजगार के विकल्प की चर्चा की। लोगों की आँखें खुली और सबने मनजीत को गाँव के लिए मसीहा मान लिया।

अंकुश्री गाँव, नगर और महानगर के जीवन संघर्ष, सुख-दुख आदि को गहराई से समझते हैं। उनकी कहानियों के पात्र नगर-महानगर की त्रासदी झेलते हुए भयभीत दिखाई देते हैं। भयभीत मन सुखी नहीं होता और उसके सामने दुनिया भर के अवरोध-विरोध मुँह बाए खड़े मिलते हैं। 'मंगरी' कहानी की मंगरी हमेशा भयभीत रहती है। उसे सुरक्षा की तलाश है। गाँवों से बिचौलिए किस्म के लोग लड़कियों को शहर लाते हैं और उन्हें घरों में काम करवाते हैं। मंगरी को केवल भोजन मिलता है, पैसे बिचौलिए ले लेते हैं। वह सुरक्षा के साथ वहाँ से मुक्ति चाहती है। उसकी तरकीब सफल होती है और मुक्ति मिलती है। वह अपने संकल्प से सुखद जीवन जीना शुरू करती है और भयमुक्त हो गाँव की लड़कियों के लिए आदर्श प्रस्तुत करती है।

उनकी कहानियाँ देखने में सीधी-सपाट लगती हैं परन्तु उनमें कोई सार्थक संदेश छिपा होता है। 'संकल्प' स्त्री शिक्षा को प्रोत्साहित करने वाली कहानी है। हम गाँवों में रहते हों या शहरों में, करीब आने पर ही एक-दूसरे के विचार-व्यवहार को समझ पाते हैं। रूपा बैजू बाबू की बहू है, पति के गुजर जाने के बाद गाँव आई है। उसे सीढ़ियाँ चढ़ते हुए पहाड़ियों से घिरे गाँव और आसपास का सौन्दर्य दिखाई देता है। वह अनुभव करती है-"सचमुच प्रकृति ने धरती को बहुत कुछ दिया है। लेकिन मनुष्य उसे सहेजना तो दूर, उल्टे विकृत कर देता है।" उसे ज्ञात होता है कि गाँव में लड़कियों की शिक्षा के लिए कोई व्यवस्था नहीं है तो वह संकल्पित होती है और बोल पड़ती है-"मैं गाँव की बच्चियों को पढ़ाऊँगी।" अंकुश्री ने सहज तरीके से सारा विवरण जोड़ा है और गाँव में लड़कियों का स्कूल चलने लगा है। स्त्री शिक्षा को लेकर कहानी में महत्व और जोर देते हुए कहा गया है-'पढ़ना ही बढ़ना है'। वैसे ही 'जगमग उजाला" घर-समाज में नैतिकता को प्रोत्साहित करने वाली कहानी है। अक्सर लोग अपने घरों में ध्यान नहीं देते और बिजली के बल्ब अनावश्यक रूप से जलते रहते हैं। मकान मालिक अपने किरायादारों को यही समझाना चाहते हैं। यहाँ अंकुश्री लोगों का मनोविज्ञान दिखाते हैं और वैचारिक अन्तर्विरोध भी। कहानी छोटी सी है परन्तु बहुत बड़ा संदेश देती है। अंततः लोग ऊर्जा-बचाव की अवधारणा को स्वीकार करते हैं और सहर्ष जीवन में लागू करते हैं। यह उनकी सामाजिक दृष्टि व चेतना है, वे जीवन के इन पहलुओं को अपनी रचना का आधार बनाते हैं और समाज सुधार का गहरा भाव व्यक्त करते हैं। उनका एक संदेश यह भी है कि सुधार करना या बदलना हमें ही है। 

अगली कहानी 'एक और मंगरा' आदिवासी जीवन से जुड़ी बहुत ही मार्मिक कहानी है। कथाकार ने बहुत करीब से इन दृश्यों को देखा और अनुभव किया है। इस शीर्षक को ही अंकुश्री ने अपने इस कहानी संग्रह का नाम दिया है। यहाँ गरीबी है, संघर्ष है और तद्जनित दुख व पीड़ा है। सबसे बुरा है, यहाँ के पुरुषों का शराब पीना। स्त्री श्रम करती है और घर चलाती है। सारा विवरण पूरी सच्चाई के साथ उन्होंने चित्रित किया है। मंगरा का चरित्र चित्रण बिल्कुल यथार्थ है और वह अंत में शराब पीकर मर जाता है। सोमरी का संघर्ष स्त्री-विमर्श के किसी कोण से देखिए अद्भुत है। वह सोच-विचार करती है, श्रम करती है, समस्याओं के लिए रास्ता ढू़ँढ निकालती है, सबके बावजूद मंगरा को प्रेम करती है, बच्चों की शिक्षा के लिए प्रयास करती है और सहजता से अपनी बेटी के प्रेम को भी स्वीकार करती है। अंकुश्री ने इस तरह कोई सशक्त कहानी बुनी है या कहीं, किसी का यथार्थ शब्द-बद्ध किया है। यहाँ भावनाएं, करुणा, प्रेम, संघर्ष और पीड़ा पूरी जीवन्तता के साथ उभरे हैं और प्रभावित करते हैं। पात्रों का चयन व चित्रण आदिवासी जीवन की झलक देता है और यह कहानी झकझोरती है।

उनकी कहानियाँ सहज गति से विस्तार पाती हैं, ग्रामीण जन-जीवन घुला-मिला रहता है और हर कहानी के पीछे हमारे समाज की कोई न कोई सच्चाई छिपी होती है। इन कहानियों में कोई अतिरेक या बनावटीपन नहीं है, बल्कि हमारे गाँवों, वहाँ के लोगों, मजदूरों और उनके घर-परिवार के यथार्थ दृश्य हैं। उनके स्त्री पात्रों में कर्मठता है, संघर्ष है और सभी अपनी परिस्थितियों से हार नहीं मानतीं बल्कि कोई न कोई राह ढू़ँढ लेती हैं और समाधान निकालती हैं। "रोशनी' गाँवों में स्त्री के सुबह-शाम घर से बाहर मल-मूत्र त्याग के लिए जाने की समस्या को रेखांकित करती कहानी है। अनादि काल से स्त्रियाँ इस समस्या से जूझती रही हैं, बीमार होती हैं और कुछ तो व्यभिचार का शिकार भी हो जाती हैं। आज हम जिस विकास का अनुभव कर रहे हैं वह आज से 10-12 साल पहले तक बहुत बड़ी आबादी के लिए सपना था क्योंकि इसकी त्रासदी को गम्भीरता से समझा नहीं गया। अंकुश्री ने इस समस्या को विस्तार से लिखा और रोशनी की सूझ-बूझ से समाधान खोजा है। रोशनी को सम्मान मिलता है और यह कहानी बड़ा संदेश देती है। "डायन" आँखें खोलने वाली कहानी है। हमारे गाँवों में पिछड़ापन है, अशिक्षा है, धूर्त व दुष्ट लोग हैं जो दुष्प्रचार करके समाज में स्त्रियों के प्रति अत्याचार करते हैं। पात्रों का सम्यक चित्रण हुआ है और सम्पूर्ण घटनाएं आज भी गाँवों में देखी जा सकती हैं। अंकुश्री की के पास गाँवों का अनुभव है, उन्होंने अपनी खुली आँखों से देखा है और उनके पास वहाँ की भाषा व शब्दावली है। उनकी सहज शैली प्रभावशाली है और अत्यन्त सहजता से वे कहानी बुनते हैं। जटिल से जटिल दृश्यों को सरलता पूर्वक पाठकों तक पहुँचाते हैं और पात्रों के प्रति सहानुभूति जगा देते हैं। किसी अच्छी-भली स्त्री को डायन बताकर मार-पीट करना और हत्या कर देना जघन्य अपराध है। अंकुश्री की हर कहानी के पीछे समाज सुधार की भावना है और उन्होंने अपनी कहानियों में बड़ा व जरुरी संदेश दिया है। उनकी कहानियाँ केवल समस्या नहीं बतातीं बल्कि समाधान खोजती हैं और समाज में जागृति लाती हैं।

"पूनम' कहानी अंत आते-आते अचम्भित करती है और पाठकों के सामने गहरे प्रश्न खड़ा कर देती है। अंकुश्री अपनी कहानियों में सूक्तियों, मुहावरों के साथ अलंकारिक भाषा का प्रयोग करते हैं और पाठकों को चमत्कृत करते हैं। योग्यता कभी छिपती नहीं है या दोस्ती भावनात्मक संबंधों का परिचायक है, जैसी बातें भिन्न तरीके से ज्ञान देती हैं। पूनम की मां का चरित्र प्रभावित करता है। उसने साहस के साथ अपनी बच्ची को दुनिया से छिपाया है और पढ़ा-लिखाकर अपनी जिम्मेदारी निभा रही है। कथाकार ने पूरी संजीदगी से पात्रों के चरित्र को बुना है और वैसे चरित्र की समस्या को उभारा है। उनमें योग्यता होती है, वे पढ़-लिख सकते हैं और उनमें प्रेम जैसी भावनाएं भी होती है परन्तु उनकी लाचारी है। अंत में पूनम रहस्य खोलती है-"नहीं, मैं न तो लड़की हूँ और न लड़का।"

'कब आएंगे पापा?' कोरोना काल की महामारी को लेकर मजदूरों के पलायन को रेखांकित करती बहुत ही मार्मिक कहानी है। यह जग जाहिर है, मजदूर काम की तलाश में देश के कोने-कोने में भटकते फिरते हैं, पत्नी व बाल-बच्चों से दूर रहते हैं और किसी तरह घर चलाते हैं। अंकुश्री मजदूरों, उनकी समस्याओं व उनके जीवन की कथा बहुत ही मार्मिक तरीके से बुनते हैं और संकेत देते हैं कि सबका जीवन किसी तरह चल रहा है। पात्रों के संघर्ष, पीड़ा, दुख के साथ-साथ उनके बीच प्रेम की कोई फुहार चित्रित करते हैं। खुशी बहुत कम है फिर भी उम्मीद के सहारे जिन्दगी की गाड़ी खींचते रहते हैं। अचानक आई महामारी ने दुनिया को हिलाकर रख दिया और इसकी चपेट से कोई बचा नहीं। इसका सर्वाधिक प्रभाव गरीब मजदूरों पर पड़ा और वे पलायन करने पर मजबूर हुए। अजय तथा उनके साथियों की यात्रा और उनके अंत का हृदय-विदारक चित्रण झकझोरने वाला है। उस समय की हृदयहीनता, लूट और विसंगतियों का जीवन्त चित्रण कथाकार ने किया है और बच्चों के प्रश्न कि कब आएंगे पापा? हर किसी के हृदय को विचलित करने वाला है। कहानी तत्कालीन परिदृश्यों, पुलिस-प्रशासन के व्यवहारों और मजदूरों की जीजिविषा का यथार्थ चित्रण करती है और पाठकों को भावुक कर देती है।

संग्रह की अंतिम कहानी 'अपना घर' हमारे समाज में अपने बुजुर्गों के प्रति अपने ही परिजनों-पुत्र और बहू के द्वारा भोजन न देना, तिरस्कृत करना और वृद्धाश्रम जाने की सलाह देना जैसे कठोर और निन्दनीय व्यवहार के दृश्यों से भरी कहानी है। अंकुश्री लिखते हैं-"शहर की कौन कहे, उन्हें देखने वाला घर में ही कोई नहीं था। बेटा-बहू उन्हें दूध की मक्खी की तरह घर से निकाल फेंकेंगे, ऐसा उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था।" वे घर से निकल पड़ते हैं और स्मृतियों में खोए हुए आँसू बहा रहे हैं। अंकुश्री कहानी में मोड़ देते हैं और महेश बाबू को सुरेन्द्र, राधिका व बेटा रोशन के साथ मिलन का सुखद दृश्य रचते हैं। हालांकि ऐसा होना विरल है फिर भी महेश बाबू को पुत्र-बहू व पोता से भरा परिवार मिल जाता है, वह बच्चों को पढ़ाते हैं और बहुत आदर-सम्मान के साथ जीवन जीना शुरू करते हैं। उनका अपना बेटा मिलता है, कहता है-"अपने घर चलिए," तो महेश बाबू बड़े गर्व से कहते हैं-"अपने घर ही जा रहा हूँ," और सुरेन्द्र, राधिका के साथ कार में बैठ जाते हैं। यह कहानी भी समाज में सुधार का कोई संदेश देती है और आदर्श दृश्य रचती है।

इस तरह देखा जाए तो अंकुश्री बहुत सहजता से हमारे घर-परिवार, गाँवों और शहरों में लोगों के संघर्ष, दुख, हृदयहीनता आदि का चित्रण करते हैं। जो गलत है, उसका दृश्य बुनते हैं, साथ ही उसके निराकरण का भाव जगाते हैं। वे सुधारवादी विचार से ओत-प्रोत हैं, उनकी हर कहानी में यह संदेश है कि इन परिस्थितियों से निकलने की कोशिश होनी चाहिए। उनके पात्र चुपचाप नहीं बैठते बल्कि उद्यम करते हैं और बाहर निकल आते हैं। उनके पास बड़ी प्रभावशाली भाषा व शैली है। उनके लेखन पर सहज-सामान्य लेखन का आरोप लग सकता है परन्तु यही उनकी विशेषता भी है। वैसे भी उन्होंने खूब लिखा है, अनेक पुरस्कारों से सम्मानित हैं और उनकी साहित्य में अपनी सशक्त पहचान बन चुकी है।

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