शशि पाधा कृत "मौन की आहटें"

समीक्षक: सुमन पाल


मौन की आहटें (काव्य संग्रह)
रचनाकार: शशि पाधा
भावना प्रकाशन, दिल्ली
पृष्ठ 151, सजिल्द
आईएसबीएन: 978-81-7667-378-5
प्रकाशन वर्ष: 2020
मूल्य: ₹ 350 रुपये


“मौन की आहटें”शशि पाधा जी की साहित्य जगत को समर्पित सातवीं पुस्तक है और कैसा संयोग है कि इसकी रचना संख्या भी 77 है। ये सारी रचनाएँ पढ़कर मुझे ऐसा लगा जैसे मैं हिंदी विभाग में कोई पाठ्यक्रम की पुस्तक पढ़ रही हूँ।मैं ने इन्हें कई बार पढ़ा और रसास्वादन ऐसा हुआ कि बस गूंगे का गुड़ है मेरे लिए। जितनी आनंद की अनुभूति मुझे पढ़ने में मिली इतनी शायद इस के बारे विवेचना करने में नहीं मिली। अगर मैं इस पुस्तक पर लिखने में कहीं न्याय नहीं कर पाई तो मुझे आप क्षमा कीजिएगा।

शशि पाधा
उत्कृष्ट शब्दावली से सुसज्जित इन कवितायों में भाषा व शब्दों की जादूगरी पढ़ने को मिली।प्रकृति जैसे इनकी सखी सहेली की तरह इन शब्दों के साथ खूब घुल मिल गई हो। इस कृति में काव्य को छंदों में पिरोया गया है। कहीं-कहीं छंदमुक्त रचनाएँ भी हैं जिनका भाव पक्ष सीधा दिल को छूता है। गीतात्मक शैली में बहुत सी रचनाएँ ऐसी हैं जैसे सागर में उठती लहरें कुछ गुनगुना रही हों, जैसे एक अनहद नाद आपके रोम रोम को छू रहा हो ... मन की दलहीज पर बहार की आहटें सुनाई दे रही हों। आप की एक-एक रचना ने मुझे प्रभावित ही नहीं किया बल्कि ऐसा लगा जैसे वह मेरी और आपकी बात कर रही है। ये रचनाएँ हमसे हमको जोड़ती हैं। झकझोरती भी हैं और उसे एक नई दृष्टि भी देती है विषय को परखने की। इनमें संजीदगी के साथ-साथ संवेदनशीलता का अद्भुत मिलन दिखाई देता है। मैंने आप की कलम की चित्रकारी में इन सारी रचनाओं में अपने आप को जिया है भोगा है, इनमें वह सत्य है जिसे आप की कलम ने हमारे तक पहुँचाया है। यह कहते हुए अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इन जीवंत रचनाओं को पढ़ कर ऐसा आभास हुआ जैसे मैंने एक अद्भुत जीवन जी लिया हो, जो आपकी रचनाओं में प्रतिपादित हुआ है-

सुमन पाल
“चलो आज कोई रिश्ता बनायें 
अनजान बस्ती की धूप छाँव सेकें 
किसी अजनवी को गले लगायें 
दिलों से हटा दें उलझन का पहरा 
नेकी की मरहम भरे जख्म गहरा 
बाँहों के घेरे की रीत चलायें।”
रिश्तों में कड़वाहट आ ही जाती है, परन्तु आप कथनी और करनी का अंतर मिटा कर एक घरौंदा ऐसा बनाना चाहती हैं जिस में सभी रिश्ते प्यार से रहें, फलें फूलें, एक दूसरे के ऑंसू नहीं पोंछे बल्कि बाँहों के घेरे की रीत भी चलायें। कितने सुन्दर शब्दों में अपने भावों को व्यक्त कर गयीं हैं और एक मीठा सा संदेश दे गई हैं।
“बाँहों के घेरे की रीत चलायें”
हम सभी ने ज़िंदगी में कभी न कभी कड़वा सच भोगा है। जिन रिश्तों में हम जन्म लेते हैं और जीवन भर उस में जीते हैं, वे कभी भी सामान्य नहीं रह पाते। उन्हें प्यार से सींचना पड़ता है। कहीं पाते हैं, कहीं खोते हैं और कई ज़हर पीने पड़ते हैं तभी परवान चढ़ते हैं। 
शशि पाधा जी उधड़े हुए रिश्तों की तुरपाई करते हुए कहती हैं –
“यूँ ही कितनी उम्र बितायी 
वादों और विवादों में 
सही अर्थ तो समझ न पाए 
शब्दों के अनुवादों में 
संधि की दुहाई बाकी 
तुम कर दो या मैं करूँ?”
इसी मनोभाव को भिन्न शब्दों में दोहराती हुई कहती हैं –
“घाटे का सौदा न होगा 
रूठों को मनाने में 
घड़ी पलों का फर्क ही रहता 
बिगड़ी बात बनाने में 
शिकवों की सुनवाई बाकी 
तुम कर दो या मैं करूँ?” अति सुन्दर व सशक्त अंदाजे बयाँ है आपका। 
बचपन की यादें कभी जाती नहीं। हर किसी के जीवन के इतिहास का ये प्रथम पृष्ठ बन जाती है। शशि जी की संवेदनाएं किस तरह हमारे और आपके बचपन को छू कर मन मस्तिष्क में अपनी अमिट छाप छोड़ जाती है, जरा देखिये –
“वो तुलसी का बिरवा अब कितना बड़ा 
क्या गेंदे का गमला वहीं पर धरा 
जिन खम्भों को बाँहों में भरते रहे 
वो आंगन का खम्भा गिरा कि खड़ा?
इन आँखों की झीलों में झाँके सदा 
वो बचपन कि घड़ियाँ लौटा री हवा 
कुछ पल तो मेरे साथ बिता री हवा।”
हवा संग किया संवाद बहुत ही स्वाभाविक और सरल है। शशि जी बातों-बातों में मन की बातें इतने अनौपचारिक ढंग से कह जाती हैं जैसे अपनी सहेली से बतिया रही हों। 
शशि पाधा जी प्रकृति के अत्यंत करीब हैं, जैसे वो उनके रोम-रोम में बसी हो। बादल, हवा, आकाश, धरती, फूल, पौधे बल्कि सारी कायनात की झलक आपकी रचनाओं में दृष्टिगोचर होती हैं। जब वे जंगलों की जगह भवनों के पर्वत देखती हैं तो उनका मन व्यथित हो उठता है। पर्यावरण के विनाश की वेदना महसूस करते हुए कहती हैं-
“न डाली न कोयल न पंछी बसेरा 
न उत्सव वसंती न पुरवा का फेरा 
चखने लगी हर साँस धूल माटी 
सिकुड़ने लगी है धरा की शिराएँ 
मन की व्यथा आज किसको सुनाएँ?” 
जीवन की डगर पर चलते हुए कभी हाथ छलनी हुए, कभी पैरों में काँटे चुभे पर अपनी पीड़ा किसी को नहीं दिखातीं, बस अपनी राह बनाती हुई बढ़ती जाती हैं-
“थके हैं मगर हारे नहीं 
भीड़ जैसे ही हैं कोई न्यारे नहीं। 
“चौराहे मिले या दोराहे मिले 
हम अपनी ही राहें बनाते रहे 
लाख भटकन लिपटी पड़ी पाँव में 
हर कड़ियों की उलझन हटाते रहे 
कोई बांधे नहीं कोई रोके नहीं 
बहती नदिया हैं हम दो किनारे नहीं।”

इसी रचना में आगे एक सुन्दर संदेश देती हुई कहती हैं-

“हौसलों को हमारी कोई दाद दे 
जिद्दी हैं हम, बेचारे नहीं।”
आपकी एक रचना मुझे भावना के सागर में डुबो देती है। आप भी उसको पढ़ कर अछूते नहीं रहेंगे-
“संयम की मिट्टी ढहने लगी 
नदी आज कोरों से बहने लगी 
किनारों का बंधन टूटा कहीं 
पलकों से नाता रूठा कहीं 
आँखे भी सीलन सहने लगीं।”

 रिश्तों की ऊहापोह को शब्दों में बांधती हुई आगे कहती हैं ....

“एक फ़ांस पैनी चुभती रही 
दलीलों की बाती बुझती रही 
पोरों में पीड़ा दहने लगी ---
“सांसों की सरगम रुकती गई 
संवादों की पूंजी चुक सी गई 
चुप्पी ही हर बात कहने लगी 
नदी आज कोरों से बहने लगी।”
हमारे लिए एक सार्थक संदेश यह है कि कभी-कभी चुप्पी ही समस्या का समाधान है। 
मन की दहलीज पर जब शशि जी बहार की आहट महसूस करती हैं तो नेह की रेशमी डोर से एक सुन्दर ख्वाब बुनती हैं। प्यार के पहले बीज प्रस्फुटित होने पर कहती हैं ....
“मौन में संवाद हुआ, गाँव गली के मोड़ पे 
हामी न प्रतिवाद हुआ गाँव गली के मोड़ पे 
कनखी-कनखी गुपचुप बातें, धड़कन ने कुछ गीत लिखे 
झुके-झुके नैनों के दर्पण, दूर खड़े मनमीत दिखे 
अल्हड़ यौवन पगला भरमाया, गाँव गली के मोड़ पे।” ये है शब्दों की जादूगरी। कितना सुंदर शब्दचित्र, जैसे पूरा दृश्य ही आँखों के सामने हो। 
आपकी रचनात्मक दृष्टि बड़ी पैनी है। आप झुर्रिओं वाली बावली में से कविता खोज लेती हैं। कहीं कसक है, पीड़ा है जिसे आप घूँट-घूँट कर पी लेती हैं और सब्र कर लेती हैं। कभी-कभी जिन्दगी की दौड़ में भागते हुए जीतना भूल जाती है। हार मानने से उदासी होती है पर जल्द ही वे अपनी सकारात्मक दृष्टि से उसे धो देती हैं। 
आप जीवन की किताब से उदास पन्नों को फाड़ फेंकती हैं। बढ़ती उम्र को रोक, जी भर जीना और जीवन पहेली को समझना चाहती हैं और हवा के संग चहकना, धूप किरण की 
मेहन्दी रचना, तितलियों को छूना और पंखुड़ियों को सहलाना चाहती हैं। 
और कहती है ...
“अरी उमरिया! थोड़ा रुक जा, थकी मैं चलते चलते 
चलो अब कहीं पाँव पसारें , थोड़ा दिल बहला लें”
प्रेम में आत्म विभोर हो कहती है ...
“मेरी सूरत अब तेरी तस्वीर हो गई 
ऐसी पूंजी पाई कि अमीर हो गई।”

आपको पीहर की बातें, बचपन की यादें भूली नहीं है, उन्हें तो आपने अपनी कविताओं में संकलित कर लिया है। आप संकल्पों के सेतु बना, साहस के पथ प्रदर्शक के साथ, विश्वास की मौली बाँध स्वच्छंद उड़ना चाहती हैं। आप जीवन के अनुभव और अपनी संवेदन शीलता से भौतिक जीवन की माया और भ्रम से बहुत आगे निकल आईं हैं...
“कोई तो खड़ा है बाँहें फैलाये 
नाता उसी से अब जोड़ना चाहिए 
पराया यह घर अब छोड़ना चाहिए।”
यह जीवन का सत्य है, पर पाठक वर्ग आपको यूँ जाने और अपनी इतनी बड़ी हानि की अनुमति नहीं दे सकता। 
सैनिक पत्नी होने के नाते आप आजीवन भारतीय सैनिक समाज से जुड़ी रहीं और उनकी वीरता की गाथा, उनकी पत्नियों और बच्चों के समर्पण तथा माता पिता का त्याग महसूस करती रही हैं। इसकी चर्चा किए बगैर शशि पाधा का परिचय अधूरा रह जायेगा। आपने अपनी रचनाओं में शहीद नौजवान सैनिकों के माता पिता से साक्षात्कार करने का हृदय विदारक कार्य कर, उनके जीवन का सत्य अपने सशक्त लेखन से समाज के साथ साझा किया। पुत्र खोने की पीड़ा से गुजरते हुए भी पिता, मातृभूमि की रक्षा हेतु अपने पुत्र के जीवन बलिदान से गौरवान्वित भी हैं। माँ अपने पोते को पालती हुई उसमें अपने शहीद बेटे को देखती है। यह सब आसान नहीं है। 
सैनिक नारियों और बच्चों को समर्पित आपके उद्गार हृदय स्पर्शी हैं-
....”बिजली कौंधी होगी... सपनों की दुनिया रौंधी होगी… तिरंगे में लिपटा पाहुन लौटा होगा 
धीर कहाँ से पाया होगा, मन को क्या समझाया होगा!”
“बड़े हो जाते है शहीदों के बच्चे बड़े होने से पहले ही... रोक लेते है आँसू लुढ़कने से पहले ही... समझ लेते है गीता का पाठ समझाने से पहले ही ---”
इन पंक्तियों को पढ़ने मात्र से आँखे नम होती है और शरीर में कम्पन। जो ये वीर जीते है, उनके बलिदान को शशि जी व्यर्थ नहीं जाने देंगी। इसी प्रेरणा से वे अविरल, अथक लिखती जाती हैं। 
“अर्थ सेवा भाव का, सैनिकों से पूछ लो 
संकल्प का विधान क्या, वीरता से पूछ लो।”
किसकी चर्चा करूँ, किसको छोडूँ! ये रचनाएँ कालजयी हैं। अपनी विविध रचनाओं के माध्यम से शशि जी ने हमें जीवन की सार्थकता से रूबरू कराया हैं। 
जीवन के ऊबड़ खाबड़ रास्ते से गुजरते हुए, अनुभवों को सहेजते हुए, अपने को तलाशते हुए शशि जी की कविताओं ने एक लम्बा सफ़र तय किया है। “मौन की आहटें” एक विलक्षण साहित्यिक उपलब्धि है। मेरा विश्वास है कि यह पाठकों को सकारात्मक ऊर्जा और सुखद अनुभूति प्रदान करेगी। 
कलमकार शशि पाधा जी को मेरा शत-शत नमन। 
***

सुमन पाल 
ड्रीम लैंड अपार्टमेंट्स, सेक्टर 1, निकट पंजाब नैशनल बैंक, ब्लाक 1, त्रिकुटा नगर, जम्मू 
चलभाष: 994656 32283
 

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