'हम हशमत' में मियाँ नसीरूद्दीन का चरित्र चित्रण

नाज़िया परवीन

नाज़िया परवीन

शोधार्थी, हिंदी विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम विश्विद्यालय अलीगढ़-202002


हिन्दी कथा साहित्य में कृष्णा सोबती का विशेष स्थान है। उन्होंने अपने रचनात्मक कौशल से हिंदी साहित्य में एक बड़े पाठक वर्ग को प्रभावित किया है। उनका सामाजिक चिंतन जितना प्रखर है, उतना ही उनका साहित्य भी प्रभावशाली है। कृष्णा सोबती की समस्त रचनाओं में उनकी स्पष्ट रचनाशीलता तथा प्रखर सामाजिक चिंतन के दर्शन होते हैं। हिंदी साहित्य में उन्होंने कहानी लेखन से अपनी साहित्यिक यात्रा आरंभ की। उनकी पहली कहानी ‘सिक्का बदल गया है’ अज्ञेय द्वारा संपादित ‘प्रतीक’ पत्रिका में जुलाई, 1948 में प्रकाशित हुई। इसके बाद उनका कहानी संग्रह ‘बादलों के घेरे में’ प्रकाशित हुआ। उपन्यासिका को स्पर्श करती उनकी लंबी कहानियों में ‘डार से बिछुड़ी’, ‘मित्रो मरजानी’, ‘ऐ लड़की’, ‘यारों के यार’, ‘तिन पहाड़’ आदि काफी प्रसिद्ध हुईं। सन् 1958 ई० में प्रकाशित 'डार से बिछुड़ी’ के कलेवर को देखकर अलाचकों में ये प्रश्न उठा कि इसे कहानी कहा जाए या उपन्यास। वस्तुतः गोपाल राय ने इसे उपन्यासिका की संज्ञा दी है। ‘सूरजमुखी अंधेरे के' (1972), 'ज़िन्दगीनामा' (1979), 'दिलो-दानिश' (1993), 'समय सरगम' (2000), गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान (2017) आदि इनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं। इसके अलावा ‘हम हशमत’ (चार भागों में), ‘सोबती एक सोहबत’, ‘शब्दों के आलोक में’, ‘सोबती वैद संवाद’, ‘मुक्तिबोध: एक व्यक्तित्व सही की तलाश में’ (2017), ‘लेखक का जनतंत्र’ (2018), मार्फ़त दिल्ली (2018) आदि रचनाएँ विचार-संवाद-संस्मरण की श्रेणी में आती हैं। यात्रा-आख्यान लेखन में ‘बुद्ध का कमंडल: लद्दाख़’ इनका प्रसिद्ध यात्रा वृत्तांत है।

सोबती ने हिन्दी साहित्य को मित्रो, शाहनी और मियाँ नसीरुद्दीन जैसे प्रभावशाली पात्र प्रदान किए हैं। अपने समकालीन साहित्यकारों के साथ प्रत्यक्ष एवं परोक्ष संबंधों को व्याख्यायित एवं विश्लेषित करने के लिए उन्होंने 'हम हशमत' जैसी कालजयी कृति की रचना की। इस रचना के माध्यम से उन्होने अपने से जुड़े व्यक्तियों एवं साहित्यकारों के साथ वाद-विवाद, संवाद और उनके वैचारिक चिंतन को रेखांकित किया है।

 कृष्णा सोबती ने 'हम हशमत' की रचना चार खंडों में की है। इसका प्रथम भाग सन् 1977 ई० में प्रकाशित हुआ। द्वितीय भाग का प्रकाशन सन् 1999 ई०, तृतीय भाग सन् 2012 ई० और चतुर्थ भाग का प्रकाशन सन् 2019 ई० में हुआ। कृष्णा सोबती ने संस्मरण 'हम हशमत' को शब्द चित्रों के कोलाज़ के रूप में हमारे सम्मुख प्रस्तुत किया है। जो इनके विस्तृत जीवन फलक को प्रदर्शित करता है। इसमें शब्दों के माध्यम से एक के बाद एक साफ और जीवंत चित्र उभरते हैं तथा पाठक के सामने पूरा परिदृश्य जीवंत हो उठता है। इसमें प्रसिद्ध लेखक, पत्रकार, परिचित, टैक्सी चालक और नानबाई जैसे साधारण व्यक्तित्व भी हैं। इसमें हर व्यक्ति को नायक रुप में प्रस्तुत किया गया है। यही व्यक्ति हैं जिनसे 'हशमत' मिलते हैं तथा एक दूसरे से अलग होते हुए भी परस्पर जुड़े हुए हैं। हशमत विभिन्न घटनाओं और व्यक्तियों के माध्यम से जीवन और समाज के मूल्यों की खोज करते हैं। अपने तठस्थ दृष्टिकोण और वार्तालाप के माध्यम से व्यक्ति और समाज के यथार्थ संबंधो को प्रस्तुत करते हैं। वह अपने वैचारिक चिंतन से सामाजिक व्यवस्था की पेचीदगियों को सुलझाते हैं। अंत में हशमत के रूप में कृष्णा सोबती खुद को प्रस्तुत करती हैं।

कृष्णा सोबती
 कृष्णा सोबती ने 'हम हशमत' प्रथम भाग में साधारण पात्र खानदानी नानबाई मियाँ नसीरुद्दीन के व्यक्तित्व का सृजन कर उनके स्वभाव और रूचियों का शब्दचित्र प्रस्तुत किया है। मियाँ नसीरुद्दीन अपने मसीहाई तरीके में रोटी पकाने की कला को पैतृक कुशलता बताते हैं। मियाँ नसीरुद्दीन करके सीखने के सिद्धांत को मान्यता देते हैं। एक दिन लेखिका जामा मस्जिद के मटियामहल के गढ़ैया मोहल्ले की तरफ से गुज़र रहीं थीं तो अंधेरी व मामूली-सी दुकान पर आटे का ढेर सनते हुए देखकर उन्हें कुछ जानने का मन हुआ। पूछताछ करने पर पता चला कि यह दुकान खानदानी नानबाई मियाँ नसीरुद्दीन की है जो छप्पन प्रकार की रोटियाँ बनाने के लिए प्रसिद्ध हैं। लेखिका उनके व्यक्तित्व को इस प्रकार रेखांकित करती हैं कि “हमने जो अंदर झांका तो पाया, मियाँ चारपाई पर बैठे बीड़ी का मजा ले रहे हैं। मौसमों की मार से पका चेहरा, आँखों में काइयाँ भोलापन और पेशानी पर मंजे हुए कारीगर के तेवर। हमें गाहक समझ मियाँ ने नज़र उठाई- 'फरमाइए।' झिझक से कहा- ‘आपसे कुछ सवाल पूछने थे… आपको वक्त हो तो… 'मियाँ नसीरुद्दीन ने पंचहज़ारी अंदाज़ से सिर हिलाया- 'निकाल लेंगे वक्त थोड़ा, पर यह तो कहिए, आपको पूछना क्या है?'”1 लेखिका के प्रश्न पूछने पर वह उनको पत्रकार समझते हैं और अख़बार बनाने वालों और पढ़ने वालों दोनों को ही निठल्ला समझते हैं। अखबार बनाने वालों और छापने वालों के प्रति उनका दृष्टिकोण सही नहीं हैं वह अखबारों की खोजी प्रवृत्ति पर व्यंग्यात्मक शैली में प्रहार करते हैं - “फिर घूरकर देखा और जोड़ा- ' मियां, कहीं आखबारनवीस तो नहीं हो? यह तो खोजियों की खुराफ़ात है। हम तो अखबार बनानेवाले और पढ़नेवाले दोनों को ही निठल्ला समझते हैं।”2 लेखिका उनसे फिर प्रश्न करती हैं। अबकी बार वह उनके कई प्रकार के रोटी पकाने के हुनर के बारे में जानकारी लेना चाहती है लेखिका प्रश्न करती है- “पूछना यह था कि किस्म-किस्म की रोटी पकाने का इल्म आपने कहाँ से हासिल किया?”3 मियाँ नसीरुद्दीन बेपरवाही से उत्तर देते हुए बताते हैं कि यह उनका खानदानी पेशा है- “मियाँ नसीरुद्दीन ने आँखों के कंचे हम पर फेर दिए। फिर तरेरकर बोले- 'क्या मतलब ?’ पूछिए साहब- नानबाई इल्म लेने कहीं और जाएगा ? क्या नगीनासाज़ के पास ? या रफ़ूगर, रंगरेज़ या खानदानी पेशा ठहरा। हाँ, इल्म की बात पूछिए तो जो कुछ भी सीखा, अपने वालिद उस्ताद से ही। मतलब यह की हम घर से न निकले कि कोई पेशा अख्तियार करेंगे। जो बाप-दादा का हुनर था वही उनसे पाया और वालिद मरहूम के उठ जाने के बाद आ बैठे उन्हीं के ठीये पर!”4

 मियाँ नसीरुद्दीन अपने मसीहाई अंदाज से रोटी पकाने की कला और अपने पारंपरिक व्यवसाय को गर्व से बताते हैं। वह ऐसे व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं जो अपने पारंपरिक व्यवसाय को ऊंचा दर्जा प्रदान करते हैं। भट्ठी की ओर इशारा करके लेखिका प्रश्न करती हैं- आपको उन्होंने इस व्यवसाय के कुछ कायदे-कानून के तौर पर कुछ सीख दी होगी वह बताते हैं कि पहले अध्यापक सरल शब्द पढ़ाता है फिर वह कठिन शब्दों को पढ़ाता है। इस प्रकार बच्चा सरल से कठिन की और बढ़ता है। “नसीरूद्दीन साहिब ने जल्दी-जल्दी दो-तीन कश खींचे, फिर गला साफ़ किया और बड़े अंदाज़ से बोले- अगर आपको कुछ कहलवाना ही है तो बताए दिए देते हैं। आप जानो जब बच्चा उस्ताद के यहाँ पढ़ने बैठता है तो उस्ताद कहता है-

कह, ‘अलिफ़'
बच्चा कहता है, 'अलिफ़’
कह, ‘बे’
बच्चा कहता है, ‘बे’
कह, 'जीम’
बच्चा कहता है, ‘जीम’

 इस बीच उस्ताद ज़ोर का एक हाथ सिर पर धरता है और शागिर्द चुपचाप परवान करता है! समझे साहिब, एक तो पढ़ाई ऐसी और दूसरी…। बात बीच में छोड़ सामने से गुज़रते मीर साहिब को आवाज दे डाली- 'कहो भाई मीर साहिब! सुबह ना आना हुआ, पर क्यों?”5

 लेखिका दूसरी पढ़ाई के बारे में पूछने के लिए फिर प्रश्न करती है - “इस बार मियाँ नसीरूद्दीन ने यूं सिर हिलाया कि सुकरात हो- ‘हाँ, एक दूसरी पढ़ाई भी होती है। सुनिए, अगर बच्चे को भेजा मदरसे तो बच्चा-

न कच्ची में बैठा,
न बैठा वह पक्की में
न दूसरी में-
और जा बैठा तीसरी में- हम यह पूछेंगे कि उन तीन जमातों के क्या हुआ ? क्या हुआ उन तीन किलासों का?”6
 मियाँ नसीरुद्दीन लेखिका को बताते हैं कि उन्होंने सब मेहनत से सीखा है जिस प्रकार बच्चा सीखता है। एक किताबों मे पढ़कर और दूसरा व्यावहारिक रूप से। मियाँ नसीरूद्दीन ने व्यावहारिक रूप से सीखा है जैसे उन्होंने पहले भट्ठी बनाना सीखा उसके बाद भट्ठी को आँच देना-

“हम बर्तन धोना ना सीखते
 हम भट्ठी बनाना न सीखते
भट्ठी को आंच देना ना सीखते
तो क्या हम सीधे-साधे नानबाई का हुनर सीख जाते!

 मियाँ नसीरुद्दीन हमारी ओर कुछ ऐसे देखा किए कि उन्हें हमसे जवाब पाना हो। फिर बड़े मंजे अंदाज़ में कहा - 'कहने का मतलब साहिब यह कि तालीम की तालीम भी बड़ी चीज़ होती है।”7 खानदान के बारे में पूछने पर मियाँ नसीरूद्दीन गर्व से फूल उठते हैं और बताते हैं कि - “हमारे बुजुर्गों से बादशाह सलामत ने यूं कहा- मियाँ नानबाई, कोई नई चीज़ खिला सकते हो?' 
हुक्म कीजिए, जहाँपनाह!'
बादशाह सलामत ने फ़रमाया - कोई ऐसी चीज़ बनाओ जो न आग से पके, न पानी से बने।'

'क्या उनसे बनी ऐसी चीज़!’

'क्यों न बनती साहिब! बनी और बादशाह सलामत ने खूब खाई और खूब सराही।”8 वह अपने पारंपरिक व्यवसाय की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि खानदानी नानबाई कुएं में भी रोटी पका सकता है जब लेखिका इस कहावत की सच्चाई पर प्रश्न करती हैं तो वह भड़क जाते हैं। लेखिका यह जानना चाहती थीं कि उनके बुजुर्ग किस बादशाह के यहाँ रोटी पकाने का कार्य करते थे इस पर मियाँ नसीरूद्दीन खीझ उठते हैं- “मियाँ ने खीजकर कहा- फिर अलट-पलट के वही बात। लिख लीजिए बस यही नाम- आपको कौन बादशाह के नाम चिट्ठी-रुक्का भेजना है कि डाकखानेवालों के लिए सही नाम पता ज़रूरी है।”9

 अंत मे लेखिका यह प्रश्न करती है कि भट्ठी पर ज्यादा किस प्रकार की रोटियाँ बनती हैं मियाँ लेखिका से छुटकारा पाने के लिए बोले-
“बाकरखानी-शीरमाल-ताफ़तान-बेसनी-रूमाली-गाव-दीदा-गाज़ेबान-तुनकी।”
फिर तेवर चढ़ा हमें घूरकर कहा-  “तुनकी पापड़ से ज़्यादा महीन होती है, महीन। हाँ। किसी दिन खिलाएंगे, आपको।”

एकाएक मियाँ की आँखों के आगे कुछ कौंध गया। एक लंबी सांस भरी और किसी गुमशुदा याद को ताजा करने को कहा- 'उतर गए वे जमाने। और गए वे कद्रदान जो पकाने-खाने की कद्र करना जानते थे! मियाँ अब क्या रखा है… निकाली तंदूर से- निगली और हजम!”10

 इस प्रकार हम कह सकते हैं कि ‘हम हशमत’ के शब्द चित्रों में परिवेश चित्रण और भाषा की सृजनात्मक शक्ति दोनों का अद्भुत समन्वय दिखाई पढ़ता है। कृष्णा सोबती के संस्मरण का कलापक्ष भी भावपक्ष की भांति मज़बूत है। इसमें अभिव्यक्ति की यथार्थवादी और प्रवाहमयी शैली देखने को मिलती है। कृष्णा जी ने उर्दू, पंजाबी, संस्कृत और मुहावरेदार भाषा के प्रयोग से संस्मरण को नई ताज़गी प्रदान की है तथा परिवेश के अनुसार व्यंग्यात्मक और विवरणात्मक शैली का प्रयोग किया है। इसकी जीवन्त भाषा सर्वाधिक प्रभावशाली और रचनात्मक पक्ष है। वस्तुतः सोबती का रचनात्मक कौशल उनके पात्रों में ऊर्जा तथा जीवंतता का संचार करता है।

 अतः हम कह सकते हैं कि कथ्य, चरित्र-चित्रण, घटनाक्रम, परिवेश की दृष्टि ‘हम हशमत’ विशिष्ट उल्लेखनीय है। निःसंदेह हिन्दी कथा साहित्य में कृष्णा सोबती का विशिष्ट स्थान है।

सन्दर्भ सूची
1- आरोह, भाग-1 राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान परिषद, (2006) श्री अरविन्द मार्ग, नई दिल्ली, (110016), पुनर्मुद्रण- अक्तूबर 2019, पृष्ठ 22
2- वही, पृष्ठ -23
3- वही, पृष्ठ- 23 
4- वही, पृष्ठ- 24
5- वही, पृष्ठ- 24
6- वही, पृष्ठ- 25
7- वही, पृष्ठ- 25
8- वही, पृष्ठ- 26 
9- वही, पृष्ठ- 27
10- वही, पृष्ठ- 28

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