कबीर साहित्य में बाल संस्कार

प्रियंका खंडेलवाल

प्रियंका खंडेलवाल


शोध-सारांश:- बच्चे समाज की नींव होते हैं। बच्चों को संस्कारित करने वाला साहित्य नई पीढ़ी की मज़बूत नींव रखता है। श्रेष्ठ साहित्य भी वही होता है जो अपने सुख के लिए नहीं बल्कि परिस्तिथियों और पीढ़ी को सँवारने के लिए लिखा जाए। हमारे देश में अनेक ऐसे संत हुए है जिन्होंने अनेक ग्रन्थों की रचना से साथ ही अपनी वाणी की तेज धार से समाज को बदलने का पूर्ण प्रयत्न किया। जिसमें संत कबीरजी का नाम सर्वोपरि है। जिन्होंने अपनी वाणी के माध्यम से समाज में व्याप्त कुरीतियों पर प्रहार कर समाज को बदलने का प्रयत्न किया। आज के वर्तमान समय में भी कबीरदास जी का साहित्य बालमन को संस्कारित करने एवं यथार्थ से रुबरु कराने की प्रबल प्रवृति रखता है।

बीज शब्द:- कबीर साहित्य, वज्रादपि कठोर, कौंधना, संस्कार, कुरीतियों, उग्र, बैर, आत्म-अनुशासन, लघु-पथ

मूल शोध-पत्र:-
प्रत्येक देश का साहित्य आरम्भ में मौखिक ही रहा है। अपने समय में घट रही सम्पूर्ण घटना से प्रभावित होकर लोग अपने मन के विचारों की अभिव्यक्ति किया करते थे। इस प्रकार विचारों की अभिव्यक्ति अपने एक लम्बे सफर पर निकल जलवायु, भूमि, रहन-सहन, सामजिक आचार -विचार व परम्पराओं से प्रभावित हुई और आगे आने वाली पीढ़ी को विरासत में मिलती रही है। लेकिन लिपि के अविष्कार के बाद विचारों को स्थायी रूप मिला।

वास्तव में पुराने समय में एक व्यक्ति के विचारों को दूसरा व्यक्ति सुनता और फिर उन विचारों को विभिन्न वर्गों के श्रोतागण विभिन्न रूप में ग्रहण करते थे। बड़े लोग इन्हें जीवन के अनुभव के रंगों में रंगकर सुनाते थे और इस तरह एक बड़ा कर्तव्य पूरा करते थे। युवा-श्रोता वर्ग इन अनुभवों को कार्य रूप देता तो बच्चे मनोरंजन के साथ संस्कार रूपी बीज का रोपण अपने भीतर करते।

आज के समय में बाल-मन को संस्कारित करने वाले अनेक साहित्य लिखें जा रहे है। लेकिन आज भी बड़ो और सुबोध बाल-मन को तुलसीदास के बाद सबसे अधिक प्रभावित करने का वाला साहित्य है , कबीर का साहित्य है। कबीर का साहित्य बालक को संस्कार अर्थात् सद्गुणों को सीखने एवं दोषों को कम करने की शिक्षा देता है।
जिस प्रकार एक बच्चा अपने आस-पास के परिवेश से भाषा सीखकर व्यवहार करता है। उसी प्रकार कबीरदास जी ने भी सहज, सरल भाषा का प्रयोग कर समाज में व्याप्त कुरीतियों से समाज को बचाने का प्रयास किया।

डॉ. हजारी प्रसाद चतुर्वेदी जी का अभिमत है कि, “कबीर ने शास्त्रीय भाषा का अध्ययन नहीं किया था। काव्यगत रूढ़ियों के न तो वे जानकार थे और न कायल।

हजारी प्रसाद द्विवेदीजी लिखते हैं, "भाषा पर कबीर का जबरदस्त अधिकार था।" कबीर भी एक बालक की भाँति ही जिज्ञासु व मस्तमौला प्रवृति के संत थे। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने कबीर के स्वभाव के विषय में लिखा है, "सिर से पैर तक मस्त मौला थे-बेपरवाह, उग्र, कोमल, दृढ़, वज्रादपि कठोर।

जिस प्रकार आस-पास में घटित घटनाओं को देख बालक प्रश्न पूछने में भय का अनुभव नहीं करता ठीक उसी प्रकार कबीर भी बिना भय के जो भी विचार उनके मन में कौधता वह उसे बिना लिखें ही अपनी वाणी के माध्यम से व्यक्त कर देते थे। वह स्वयं कहते भी थे-
"मसि-कागद तौ छुओ नहिं, कलम गही ना हाथ।"

एक बालक बिना भेद-भाव के अपनी उम्र के बच्चों के साथ खेलता है। लेकिन बड़े होने पर धीरे-धीरे समाज में फैले भेद-भाव से उसके मन में ऊँच-नीच, धर्म और जाति जैसे भाव पनपने लगते है। कबीर ने समाज को इन कुरीतियों से बालमन को दूर रखते हुए , ज्ञानपथ पर अग्रसर होने का संदेश देते हुए कहा –
"जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।”

कबीर ने अपनी वाणी से बालमन को संस्कारित करते हुए और गुरु के महत्व को बताते हुए कहा है-
”गुरु कुम्हार शिष कुंभ, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै।”

गुरु एक ऐसा कुम्हार है जिसने अपने शिष्य को बाहर से तो चोट की है परन्तु अन्दर से उसके मन को बुराइयों से दूर कर नैतिक-मूल्यों से जोड़ने का प्रयत्न भी किया है। एक गुरु की चोट का ही परिणाम है की ज्ञान-विज्ञान के इस युग में आज हम भारतीय, चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव की सतह को छूकर नित-नये आयाम और इतिहास रचकर अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में अंकित करवाकर विश्व गुरु बनने की दिशा में अग्रसर हो रहे हैं।

समय परिवर्तनशील होता है कबीरदास के समय में व्याप्त समस्याएँ, वर्तमान समय में भीषण रूप लेती नज़र जा रही है। जिसका कारण कहीं न कहीं कबीर की वाणी को कबीर की साहित्यिक पुस्तकों के पृष्ठों तक ही सीमित रखना है। अत: वर्तमान समय में बढती प्रतिस्पर्धा एवं असफलता से तनाव में आकर धैर्य खोती बाल-युवा पीढ़ी को कबीरदास जी के साहित्य से जोड़ना अति-आवश्यक है। कबीर दास जी ने कहा है -
“धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।”

अर्थात् बाल कोमलमन को लक्ष्य प्राप्ति के लिए धीरज , समर्पण व परिश्रम के साथ कार्य करना चाहिए।
रामकुमार वर्मा ने कबीर के विषय में कहते है कि” इसमें कोई संदेह नहीं की कबीर की कल्पना के सारे चित्रों को समझने की शक्ति किसी में आ सकेगी अथवा नहीं। ”

निरंतर जनसंख्या वृद्धि, अत्यधिक उत्पादन व अन्य अनेक माध्यमों से पर्यावरण प्रदूषित होता जा रहा है। देश की बाल-युवा पीढ़ी को हमें प्रकृति के महत्व को समझाने हेतु पुन: कबीर द्वारा दिए सन्देश को समझन होगा।
“वृक्ष कबहुँ नहिं फल भखै.नदी न संचै नीर। ”

अर्थात् जिस प्रकार वृक्ष पर लगे फल और सरोवर का पानी दूसरे जीव-जन्तुओं द्वारा उपयोग किया जाता है। ठीक उसी प्रकार हमें भी अपनी भावी-पीढ़ी को स्वच्छ, हर-भरा और प्रदूषण मुक्त वातावरण देने हेतु प्रयत्नशील रहना होगा। आजकल अधिकांश बच्चे अपना समय सोशल मिडिया पर कार्टून व अन्य मनोरंजक युक्त सामग्री को देखने में व्यर्थ ही नष्ट कर देते हैं। जिसके कारण वह उपयोगी जानकारी समय पर प्राप्त न कर प्रतिस्पर्धा में पीछे रह जाते हैं। वर्तमान समय में कबीर का साहित्य बाल-युवा पीढ़ी को आलस्य का परित्याग करने की शिक्षा देता
है।
“काल करै सो आज कर, आज करै सो अब।
पल में परलै  होयगी, बहुरि करैगो कब॥ ”

अपने देश की संस्कृति और सभ्यता को विस्मरण करने का ही परिणाम है कि आज हम अपनी सभ्यता, नैतिक-मूल्यों को समाप्त होते देख रहे है। आज का बालक छोटी-छोटी बात पर क्रोधित हो जाता है और अपशब्द बोलने लगा है।

ऐसे समय में हमें स्मरण होता है , कबीर के साहित्य का , उनकी वाणी का जो बच्चो को नैतिक मूल्यों से जोड़कर रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
“ऐसी वाणी बोलिये, मन का आपा खोय।
औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय।”

कबीर समाज का हित चाहते थे। उन्होंने खुले पन्नों पर खुली नजर डालकर मानव समाज का यथार्थ रूप देखा और उसी से अपना संबंध जोड़ लिया। देश में बाहरी एवं आंतरिक विवादों के कारण सबसे अधिक प्रभावित होता है, सुलभ बालमन। कबीरदास जी ने अपनी वाणी के माध्यम से कहा भी-
“चलती चक्की देख के , दिया कबीरा रोय।
दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोय॥”

कबीरदास जी का साहित्य बाल कोमल फूलों को संस्कारित करते हुए प्रेम, सद्भावना के साथ रहने व बैर को त्यागने के लिए प्रेरित करता है। कबीरदास जी की वाणी बड़ों को जाग्रत करते हुए बच्चों के कोमल मन को प्रेम से सींचने की बात करती है।
“जग में बैरी कोई नहीं , जो मन शीतल होय।”

हजारी प्रसाद द्विवेदी के मतानुसार, "निर्गुण भाव के साधकों में नि:संदेह कबीरदास प्रमुख श्रेष्ठ हैं।" काशी में अवतरित हुए कबीरदास जी गहरी पैठ वाले पारखी संत थे, वे समाज की दिग्भ्रमित दशा को देख रहे थे।
बाल-युवा मन जब आलोचको द्वारा कहें गए कटु वचनों को सुनता है तब वह हताश एवं निराश हो जाता है। तब कबीर का साहित्य बालकों में आत्मविश्वास जाग्रत करने ओर अर्थ की संकुचित सीमा से ऊपर उठाने के लिये प्रेरित करता है-
"निंदक नियारे राखिए, आँगन कुटी छवाय।”

अर्थात् आलोचक हमारे अंदर व्याप्त अज्ञानता रूपी अंधकार को दूर कर, हमारे अन्दर ज्ञान की लौ को प्रज्वलित करने का प्रयत्न करते है। अत: वह अपनी साखी के माध्यम से आलोचकों के द्वारा कही किसी भी बात से भयभीत न होने का सन्देश देते है हुए आलोचकों की बात पर ध्यान केंद्रित करते हुए अपनी कमियों को दूर करने की बात करते हैं।

आज की युवा पीढ़ी कम समय में सफलता की सीढ़ी पर चल सपनों को पूरा करने पर विश्वास करने लगी है। जबकि जीवन में सफल होने के लिए किसी लघुपथ की नहीं आत्म-अनुशासन व दृढ़ इच्छा शक्ति की आवश्यकता होती है। प्लेटो ने लिखा था, “स्वयं को जीतना प्रथम और सर्वश्रेष्ठ विजय है।
कबीरदास जी ने कहा, “मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।”

अत: हमें कबीर के साहित्य को पढ़कर दृढ़ इच्छा शक्ति को मजबूत करने की आवश्यकता है।

निष्कर्ष:-
आज वर्तमान समय में जितना महत्व कबीर के साहित्य का है , उससे कहीं अधिक महत्व भावी पीढ़ी के लिए है। अत: बंद पुस्तकों के पन्नों को हमे पुन:खोलने की आवश्यकता है जिससे बालरूपी बगियाँ भविष्य में संस्काररूपी पुष्प के साथ अपनी सुगंध से सम्पूर्ण वातावरण को महका सके।

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची:-
1. बाल-साहित्य विशेषांक, नयी दिल्ली: नेशनल बुक ट्रस्ट.इंडिया.अंक 17.वर्ष 2. नवम्बर 1970.पृष्ठ 11
2.शंकर, विवेक. आदिकालीन-भक्तिकालीन काव्य. कोटा:वीणा प्रकाशन. प्रथम संस्करण:2021.पृष्ठ 23
3.सतेंद्र.कबीर: एक विश्लेषण.सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय. 1956.पृष्ठ 38, 19
4.भावक, आगरा:केन्द्रीय हिंदी संस्थान.अंक:4.खंड:3.जुलाई- सितम्बर.2021.पृष्ठ114
5.PRHARYANA.GOV.।N
6.H।ND।.SHABD.।N
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प्रियंका खंडेलवाल (शोधार्थिनी)
किशोरी रमणकन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय (मथुरा), डॉ. भीमराव आंबेड़कर वि.वि, आगरा
पत्राचार पता:-2217/ए संगीत सिनेमा के सामने, एस.बी.आई वृन्दावन गेट शाखा, डीग गेट मथुरा चलभाष:-8279901673

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