रवींद्रनाथ टैगोर का बाल साहित्य - सुरधनुषी कल्पनाओं की मनोहर दुनिया

प्रकाश मनु

प्रकाश मनु

545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008
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रवींद्रनाथ टैगोर एक बड़े और सही मायनों में मुकम्मल साहित्यकार थे, इसकी एक बड़ी कसौटी यह भी है कि उन्होंने बड़ा अद्भुत बाल साहित्य लिखा है। ऐसा बाल साहित्य जिसमें मानो बच्चे का मन खुल पड़ा है, और बड़े भी उसे पढ़ें तो उन्हें अपना बचपन—साथ ही बचपन की अनोखी जिज्ञासाओं और कौतूहल से भरी कुछ-कुछ रहस्यपूर्ण दुनिया के तरह-तरह के खेल और नटखट शरारतें याद न आएँ, ऐसा हो ही नहीं सकता।

सच पूछिए तो बच्चे के मन की इतनी मनोहारी छवियाँ हैं रवींद्रनाथ टैगोर के यहाँ, कि सूर की तरह उनके बारे में भी कहने का मन होता है कि उन्होंने बाल-मन का कोना-कोना छान मारा है। बच्चे का केवल जिज्ञासा-संसार ही नहीं, बल्कि उसके भीतर का गुस्सा, रूठना-मनाना, उसके सपनों और इच्छाओं का संसार, और यहाँ तक कि अचानक कभी किसी बात पर उपजने वाला भावुकता भरा रोष और कुछ कर डालने का निश्चय, सब कुछ वहाँ है। पर शायद इन सबसे बढ़कर है बच्चे के भीतर हमेशा रहने वाला वीर नायक का-सा भाव कि काश, वह कोई ऐसा अनोखा कारनामा कर दे कि सबकी निगाहें बस उसी ओर उठ जाएँ और सारी दुनिया मान ले कि यह छोटा सा लल्ला तो सचमुच बड़ा वीर है, बड़ा हिम्मती और दिलेर है, बड़ा ही बुद्धिमान—इस तरह की सारी छवियाँ और उनसे निर्मित होता रंग-बिरंगा संसार रवींद्रनाथ टैगोर की बाल कविताओं में छलछला रहा है।

रवींद्रनाथ ठाकुर
यही कारण है कि टैगोर की बाल कविताएँ पढ़ते हुए कभी हमारे होंठों पर एक गुपचुप हँसी खेलने लगती है, कभी हम पढ़ते हुए अपने एकांत में ही मुसकरा देते हैं और कभी-कभी तो अचानक ठहाका लगाकर हँसने लगते हैं। यह सब कवींद्र रवींद्र के यहाँ है—उनके बाल साहित्य में, तो यह बाल साहित्य का असली मर्म ही तो है, जिसे महाकवि ने समझा था, और फिर बड़े मन और तल्लीनता से लिखे गए अपने समूचे बाल साहित्य में साकार भी कर दिखाया।
खासकर रवींद्रनाथ टैगोर की कई बाल कविताएँ तो ऐसी हैं, जिनमें बाल मन की इतनी सरल जिज्ञासा और कौतूहल प्रकट हुआ कि उन्हें पढ़ते हुए मानो हम फिर से बच्चे बन जाते हैं। ‘राजा का महल’ उनक ऐसी ही अविस्मरणीय कविता है, जिसे पढ़ते हुए अपने बहुत सारे अनोखे राज़ या रहस्यों वाला बच्चा एकाएक हमारी आँखों के आगे आ खड़ा होता है, और अपनी चपल-चंचल, नटखट क्रीड़ाओं से हमें सम्मोहित कर देता है। जरा देखें तो, अपनी वात्सल्यमयी माँ से उसकी कैसी भेद भरी बातें होती हैं—

नहीं किसी को पता, कहाँ मेरे राजा का राजमहल।
अगर जानते लोग, महल यह टिक पाता क्या एक पल?
इसकी दीवारें चाँदी की, छत सोने की धात की,
पैड़ी-पैड़ी सुंदर सीढ़ी उजले हाथी दाँत की।
उसके सतमहले कोठे पर सूयोरानी का घर-बार,
सात-सात राजाओं का धन, जिनका रतन जड़ा गलहार।
महल कहाँ मेरे राजा का, तू सुन ले माँ कान में,
छत के पास जहाँ तुलसी का चौरा बना मकान में।

जाहिर है, यह बात बच्चा माँ को ही बता पाता है और वह भी कान में। कारण यह है कि वही उसके भीतर सुनहले तारों से बुनी जाती कल्पना की अनोखी दुनिया को उसी प्यार और हमदर्दी के साथ समझ सकती है, जिस प्यार और संवेदना से उसका निर्माण हुआ है।

इसी तरह ‘मेंह बरसता टुपुर-टुपुर’ रवींद्रनाथ टैगोर की बड़ी अद्भुत कविता है, जिसमें बच्चे के मन में बादलों की स्मृति तो है ही, पर उससे भी ज्यादा बादल भरे दिन और सुरमई शामों की स्मृति है जो एक साथ उसे रोमांचित और विह्वल करती है। जरा इऩ पंक्तियों में छिपे कथात्मक परिवेश पर गौर करें, जिनमें माँ या घर में बड़ों से सुनी लोककथाएँ बच्चे को एक अलग ही रहस्य और जिज्ञासाकुल संसार में ले जाती हैं। ऐसे में भला पुराने किस्से-कहानियों वाली सुहागो रानी और दुहागो रानी की याद कैसे न आए? जरा इन पंक्तियों में छिपे एक खास तरह के नास्टेल्जिया पर गौर करें—

आती याद सुहागो रानी और दुहागो रानी की,
आती याद कहानी कंकावती सती अभिमानी की।
आती याद दिए की टिमटिम लौ की मोहन माया की,
एक ओर की भीत पर पड़ी काली-काली छाया की।
हर शब्द एकरस केवल, वर्षाजल का झुप-झुप झुप्प,
हुआ कहानी सुनकर माँ की, नटखट बालक एकदम चुप्प।
चुप-चुप उसका मन जाता है बादल-दिन के गान पर,
मेंह बरसता टुपुर-टुपुर, नदिया का पूर उफान पर।

‘मेंह बरसता टुपुर-टुपुर, नदिया का पूर उफान पर’—मानो कविता की इस पंक्ति में टैगोर ने बच्चे के भीतर घर बनाकर बैठी ढेर सारी कहानियों का रोमांच एक साथ पिरो दिया हो।

जाहिर है, टैगोर को प्रकृति का कल्पनापूर्ण चित्रण, बहुत प्रिय है, पर प्रकृति-चित्रण में उनकी निगाह औरों से अलग है। ‘फूल’ कविता में उनका ध्यान इस बात पर जाता है कि जो डाली कल तक पुष्पविहीन थी, वह आज फूलों से लदी हुई है। क्यों भला! ऐसा क्या चमत्कार हो गया? कविता की शुरुआत इसी जिज्ञासा-भाव से होती है और वह एक अनोखी जादूगरी की तह तक जाती है—
कल तक थी जो डाली खाली, आज फूलों से भरी है,
तू ही भला बता दे माली, यह कैसी जादूगरी है।
पेड़ के भीतर से होता रहता इनका आना-जाना,
कौन कहाँ मुँह ढाँपे सोता, किधर है इनका पता-ठिकाना।
रहते हैं कोने में दुबके, कान खड़े रक्खे हैं जैसे,
हवा बुलाती चुपके-चुपके, उसकी सुन लेते हैं कैसे।

यानी फूलों की दुनिया ऐसी ही रहस्यभरी है, जैसे आँख-मिचौनी खेलते बच्चे, जो एक कोने में छिपे चौकन्ने होकर आने-जाने वालों पर निगाह रखते हैं। यहाँ फूल बच्चे और बच्चे फूल हैं और सच ही दोनों की इससे बेहतर उपमा और हो ही क्या सकती है।

इसी तरह रवींद्र ताड़ के पेड़ की सुंदरता पर रीझकर, उसके बारे में लिखते हैं तो उसकी यह प्रभावात्मक छवि अपने शब्दों में उतार लाते हैं। मानो ताड़ के पेड़ के मन और उसमें छिपी आकांक्षा को उन्होंने बूझ लिया है—

लंबा ताड़ एक टाँग पर खड़ा, सारे पेड़ों से बड़ा,
झाँक रहा आसमान, 
लालसा है काले बादल छेदकर, उड़ जाए बहुत ऊपर,
कौन करे पाँख-दान?
*

प्रकृति की सुंदरता की तरह ही बच्चे के भीतर बार-बार सुनी गई पुराणकथाओँ का प्रभाव भी कुछ कम नहीं होता। उसके मन और अवचेतन के भीतर बहुत सी चीजें मानो जड़ जमाकर बैठ जाती हैं और फिर तमाम-तमाम शक्लों में वे सामने आती हैं। बच्चा राम के वनवास की कथा सुनता है, तो उसके मन में आता है कि कहीं पिता उसे भी उसी तरह वनवास न दे दें, जैसे राम को मिला था। और अगर ऐसा ही वनवास का आदेश उसे मिला, तो भला वह क्या करेगा?

बच्चा हमेशा की तरह यहाँ भी सिर्फ माँ को ही राजदार बनाता है। इसलिए कि इतनी बड़ी बात किसी और से कही भी तो नहीं जा सकती। और मान लीजिए, कह भी दी गई, तो भला कौन उसे समझेगा? कौन उस पर यकीन करेगा? अकेली माँ ही तो है, जो उसे पूरी तरह समझती है। इसीलिए माँ के आगे वह अपनी यह अनोखी इच्छा कह डालता है—

बापू, मुझको राम की तरह अगर भेज दें वन में,
तो क्या मैं जा ही न सकूँगा, सोच रही तू मन में।
चौदह बरस हुए कितने दिन, मुझे नहीं अनुमान,
दंडक वन है कहाँ, जहाँ पर बड़ा खेल-मैदान।
जहाँ कहीं हो, जा सकता हूँ डरने का क्या काम।
यदि भाई लक्ष्मण संग-संग हों, तो वन भी हो धाम।

बच्चे को यह कल्पना बड़ी मजेदार लगती है कि अपने छोटे भाई के साथ वह जंगल में पहुँच गया है। दोनों भाई साथ-साथ हैं तो भला अब डरने का क्या काम? बस, दोनों दिन भर एक से एक बढ़िया खेल-तमाशों में लगे रहेंगे। भला इसमें कितना आनंद आएगा—

माँ, मुझको छोटा सा भाई दे दे यदि तू एक,
दोनों मिल-जुल खूब निभाएँ वन बसने की टेक।
सिखलाएगी मुझे राम की लीला के सब गान,
जटा बाँध देगी, हाथों में देगी तीर-कमान।
चित्रकूट पर बीतेंगी, ये बरसातें अभिराम।
यदि भाई लक्ष्मण संग-संग हो तो वन भी हो धाम।

रवींद्रनाथ टैगोर की एक और कविता ‘दूर वहाँ पोखर के तट पर’ में भी वनवास का बड़ा सुंदर वर्णन है। मगर वनवास भला क्यों? यहाँ फिर से रामकथा का प्रभाव नजर आने लगता है। बच्चा कल्पना करता है कि राम की तरह उसे भी वनवास मिल गया है। तो अब क्या करे वह? यह लंबा वनवास आखिर कटेगा कैसे? लेकिन माँ तो जनकसुता सीता की तरह साथ है ही न। तो फिर भला क्या मुश्किल?

दोनों माँ-बेटा मिलकर जंगल में झाऊ-सरपत की कुटी रचेंगे, और नीचे सूखे पात बिछाकर सो रहेंगे। भला इसमें क्या परेशानी है? अलबत्ता, जरा इस विषय पर उसकी कल्पना के पूरे वितान को भी देख लीजिए—

दूर वहाँ पोखर के तट पर, जीवन की चौवाड़ लगाकर
माँ हम-तुम वनवास करेंगे, होगा कहीं न कोई।
वहीं जुटाकर झाऊ-सरपत, कुटी रचेंगे डाल फूस-छत,
सूखे पात बिछा तू मुझको, लिए रहेगी खोई।

माँ के साथ मिलकर वनवास के दुख बाँटना, इसमें एक जरा अलग से मिजाज वाले भावुक बच्चे की कितनी गहरी संवेदनशीलता पता चलती है। क्या आपको नहीं लगता कि यहाँ रवींद्रनाथ टैगोर खुद अपने बचपन के दिनों में गहरी डुबकी लगाकर, उसकी एक सुमधुर छवि आँक रहे हैं। और यह बचपन ही तो है, जो उन्हें आगे चलकर एक बड़ा कवि, बल्कि कहें, विश्व कवि बनने के लिए जमीन तैयार कर रहा था।

ऐसे में रवींद्रनाथ टैगोर की पूरी शख्सियत को समझने के लिए, उनका बाल साहित्य कितना जरूरी और महत्त्वपूर्ण है, इसे समझा जा सकता है।
*

रवींद्रनाथ टैगोर का बाल साहित्य पढ़ते हुए यह बात बार-बार मन में दर्ज होती है कि उनके यहाँ बचपन एक भोला और जिज्ञासु बचपन है। उदाहरण के लिए, उनकी ऐसी कई कविताएँ हैं जिनमें बच्चा मोटे तौर से जिसे दुनियादारी या सफलतावादी रास्ता कहते हैं—और आज की दुनिया में जिसे ‘करियरिज्म’ कहने का रिवाज है, उससे बहुत घबराता है। 

इसके बजाय उसे सीधा-सरल फेरी लगाने वाला, अपनी सारी परेशानियों, थकान और धूलभरी जिंदगी के बावजूद प्रिय है। वह भोला-भाला मजदूर अच्छा लगता है जो सारे दिन दूसरों का आदेश मानते हुए भागता-दौड़ता रहता है और जिसके माथे का पसीना पोंछने वाला कोई नहीं है। और ऐसे ही जिंदगी की तलछट में पड़े लोग बहुत अच्छे और अपने से लगते हैं जिनका जीवन दुख-अपमान और कष्टों से भरा है, पर वहाँ बड़ी सरलता, बड़ा प्यार है। बच्चे की सहानुभूति हमेशा सीधे-सरल लोगों के साथ ही है, जो ऊपर से भले ही मैले-कुचैले नजर आएँ, पर जिनकी आत्मा बिल्कुल सोने जैसी चमकदार और उजली है।

‘अनोखी चाह’ कविता में टैगोर के मन की की ऐसी ही एक निश्छल इच्छा बड़े सरल और निश्छल शब्दों में ढल गई है— 

अपने घर वाली गली से होकर दस बजे जब जाता हूँ मैं शाला,
रोज देखता मैं झल्ला सिर पर लेकर फेरी करता फेरी वाला।
चिल्लाता—चूड़ियाँ ले, बुत ले, थैली में होते चीनी के पुतले,
फिरता रहता मनमानी राहों पर, जब चाहा घर जा खाना खा डाला,
दस बजे या साढ़े दस या ग्यारह, जल्दी कभी न होती अथवा देरी।
मन करता है, बस्ता पटक-पटककर इसी तरह भटकूँ करता फेरी।

एक और कविता में बच्चे का खेल है, जिसमें वह किसी राजमिस्त्री की तरह बड़े, बहुत बड़े निर्माण में लगा हुआ है और उसकी व्यस्तता का कोई ठिकाना नहीं है। कविता का शीर्षक है, ‘रोज-रोज मैं भोर-पहर को’। जरा देखें तो, बच्चा भला किस काम में इतना व्यस्त है कि उसे और किसी चीज का होश ही नहीं है—

रोज-रोज मैं भोर-पहर को, जाया करता बड़े शहर को।
तमिज मित्र के छकड़े पर होकर सवार,
बड़े सवेरे से दुपहर भर, ईंट-ईंट पर ईट जमाकर
मनभाती दीवारें करता हूँ तैयार।
छतपिटनी मजूरिनें दिन भर, छतें कूटती हैं गा-गाकर,
नीचे घोड़े, ताँगे चलते बेशुमार,
बरतन वाला थाल बजाता, फल वाला आवाज लगाता
मीठे पके शरीफे ले लो—सुर लयदार।

और ‘पराई पीर’ में तो बच्चा ममेतर यानी अपने से भिन्न एक जीव की व्यथा को सिर्फ महसूस ही नहीं करता, बल्कि उसके लिए इतना कातर और व्याकुल हो उठता है कि माँ की गोदी छोड़कर नीचे उतरने की धमकी देता है। और अंदाज भी ऐसा कि भुलाए भूलता नहीं। यह जीव बेशक एक मासूम पिल्ला है, जिसे माँ हमेशा दुरदुराया करती है। पर इससे बालक को कितनी ठेस पहुँचती है, वह नहीं जानती। जरा सुनें एक अजब सा मान ठाने हुए इस बच्चे के दिल की बात—

लल्ला अगर मैं न होता, बल्कि होता पिल्ला,
तो क्या मुँह तेरी थाली में, देता नहीं कि रखवाली में
उठती चिल्ला-चिल्ला।
सच-सच कह दे झट, मुझसे मत कर छल-कपट,
कहती मुझको दुर-दुर-दुर-दुर, मुआ कहाँ से आया कुक्कर!
फिर तो रहने दे दुलार, मुझको गोदी से उतार।
मैं तो तेरे हाथ न खाऊँ, मैं तो तेरे पात न खाऊँ।

जाहिर है, एक बच्चे की संवेदना कितनी बड़ी, कितनी गहरी और व्यापक हो सकती है, इसे बहुत बार बड़े नहीं समझते। अगर वे थोड़ा बच्चों की दुनिया के करीब रहें, या बच्चों के लिए लिखा गया साहित्य पढ़ें, तो वे कहीं अधिक सीधे-सरल और सहृदय इनसान बनेंगे।

इसीलिए बच्चों पर कुछ थोपने के बजाय, उलटा हमें बच्चों और बचपन से बहुत कुछ सीखना चाहिए, रवींद्रनाथ टैगोर बड़े इशारों में यह बात कह देते हैं। लिहाजा उनके बाल साहित्य का मर्म हम समझेंगे, तो न सिर्फ हम किसी बच्चे के मन को अच्छी तरह समझ पाएँगे, बल्कि खुद भी बच्चों जैसे सीधे-सरल बनकर, अपने जीवन की बहुत सारी विरूपताओं और अहंकार से मुक्ति पा लेंगे।
*

मगर इससे आप यह न समझ लीजिए कि बच्चे की शरारती दुनिया और नटखटपन के अक्स रवींद्र के बाल-काव्य में कम हैं। उलटे वे तो भरे पड़े हैं और तमाम रंगों और विविधताओं के साथ सामने भी आ जाते हैं। बच्चे की एक ऐसी ही शरारती छवि और नटखटपन टैगोर की ‘मास्टर साहब’ कविता में है। और ये श्रीमान मास्टर साहब भी तो एक बच्चे ही हैं न। कन्हैया मास्टर बने इस बच्चे की भीषण मुश्किल जरा आप भी जान लीजिए—

आज तो मैं हूँ कन्हैया मास्टर, चटिया मेरा है बिल्ली का छौना,
इस पर थोड़े ही पड़ती है बेंत माँ, डंडा तो यों ही है एक डरौना।
आने में देरी करता है रोज यह, पढ़ने में जी देता नही दिखाई,
बक-बक मरता मैं पर यह तो केवल, दायाँ पाँव उठाकर भरे जम्हाई।
रात-दिन बस खेल, खेल, खेल, पढ़ने-लिखने में है बिल्कुल बैल,
मैं कहता, पढ़ च छ ज झ ञ, वह कहता बस, म्याऊँ-म्याऊँ म्यँ।

और अब जरा इस मूरख के भी दर्शन कर लीजिए, जिसे अपने मूर्ख होने में कोई लाज-शर्म नहीं। बल्कि उसे लगता है कि इस दुनिया में जो भी आनंद, रस-रंग और मनोविनोद हैं, और खुशियों का मेला है, वह इसी कारण है कि यहाँ तथाकथित मूर्ख हैं जो ढोर-डंगर चराते हैं, तैरते हैं, उछलते-कूदते हैं पतंगें उड़ाते हैं और नदी में जाल डालकर मछलियाँ पकड़ते हैं—

क्या हुआ जो मैं न हुआ अंबिका गुसाईं,
पंडित जी तो मुझको बनना ही नहीं है माई।
राजा बेटा यदि न हुआ, खेलता फिरता डूडू-डुआ,
ढूँढ़ता फिरा शहतूतों पर, यदि रेशम के कोये ही।
तो मूरख बनना पड़ेगा, लेकिन मेरा क्या बिगड़ेगा?
मूरख जो हैं चौबीस घंटे मौज मनाते हैं वही।
मूरख जो हैं चरवाहे हैं डंगर-ढोर चराते हैं,
नदी किनारे जंगल-जंगल सारा समय बिताते हैं।
मूरख जो हैं पाल तानकर, नाव चलाकर लहर-लहर पर,
नदी पार के झीलों-झीलों, काटा करते झाऊ,
या चिड़ियाँ ऊँचे मचान में हुशकाते हैं बड़ी शान से,
या दही की बहँगी ले, बनते घर-घर के ताऊ।

अब आप ही बताइए, ऐसे सीधे-सरल लोग न हों, तो यह दुनिया कितनी नीरस, कितनी बदरंग और बेकार लगेगी। ज्यादा चतुर-चिकने, बुद्धिमान तो हमेशा अपने अहंकार में ही खोए रहते हैं और किसी से सीधे मुँह बात तक नहीं करते। इस दुनिया में अनोखा रस और आनंद पैदा करते हैं तो अनपढ़ कहे जाने वाले वे भोले-भाले लोग ही, जिनके चेहरे पर कोई मुलम्मा नहीं है, और वे खुलकर हँसते-गाते हुए, बहुत खुश होकर जीते हैं। ज्यादा चतुर, चालाक लोगों की दुनिया उन्हें मूर्ख कहे तो भला इससे क्या फर्क पड़ता है! 

पर बात तो यहाँ किसिम-किसिम के लोगों और शख्सियतों की हो रही है न। और ऐसे बच्चे भी नहीं होते क्या, जिन्हें डर लगता है और किसी एक चीज से नहीं, हर चीज से डर लगता है। ऐसे बच्चों को दूसरे बच्चे हँसते हुए चिढ़ाते है—‘डिर्रू, एकदम डिर्रू!’ रवींद्र भी ऐसे डिर्रू बच्चे की एक विनोदपूर्ण छवि अपनी कविता ‘चकाचौंध से डर उसको है’ में टाँकते हैं। जरा एक नजर उसे भी देखें—

चकाचौंध से डर उसको है, डर है मद्धिम टिमटिम से,
तोते से जितना डर, उतना डर मीठे से, दाड़िम से।
पूरब से वह भय खाता है, भय खाता है पच्छिम से,
जिधर देखता है डर ही डर, पिंड न छूटता जालिम से।
अपने घर की ईंटों से डर, ज्यों मुजरिम को हाकिम से,
डरे अकारण पर के घर से, थर-थर काँपे ज्यों हिम से।

मगर भई, सारे बच्चे तो डिर्रू नहीं होते न! रवींद्र की बाल कविताओं में हिम्मती बच्चे की छवियाँ भी कम नहीं। हाँ, कभी-कभी उनमें हास्य भी शामिल हो जाता है, तो खासा आनंद उपजता है। उनकी ‘राह भूला’ कविता में एक बच्चा चलते-चलते जंगल में इतनी दूर पहुँच गया कि अपनी राह ही भूल गया। फिर आगे तो और भी रोमांचपूर्ण तमाशे हुए। अब जरा देखिए तो, कि वापस लौटने पर वह माँ के आगे यह पूरा किस्सा सुनाता कैसे है—

जा पहुँचा मैं कहाँ तो बहुत दूर, उस ओर,
जितना भी अनुमान कर भला, उससे और आगे जा निकला।
चाहे जितना कहूँ बात का, बचा रहेगा छोर।

और फिर जंगल में गीदड़ मिला तो उससे राह पूछने पर बड़ा अजब नजारा सामने आया। एकाएक सामने मामू बाघ आ गया और बच्चा जैसे-तैसे घर पहुँचा—

कहता तो कुछ नहीं, हिलाता जाता है वह चुप-चुप सिर,
इतने में औचक आ धमके बाघा मामू गरजे-बमके,
पता नहीं वह गाज गिरी, किस बेचारे की जान पर,
तुझे पता है माँ, तुझ तक फिर लाया मुझको कौन जतन।
मेरे सिवा भला किसे पता, क्यों, दूँ तेरे कान में बता?
सपना मेरा तोड़ गया था, बाघा मामू का गर्जन।
*

अब जरा अनुकूल बाबू से भी मिल लिया जाए। वही अनुकूल बाबू, जो रवींद्र की एक हलकी–फुलकी सी कविता के बड़े अजब-गजब कैरेक्टर हैं। वे इस कदर बड़बोले हैं कि बड़े जोर-शोर से इस बात की घोषणा करते हैं कि—‘घास में होता विटामिन’। लिहाजा वे एक ऐसी दुनिया की कल्पना करते हैं जिसमें किसी को अन्न उपजाने की जरूरत ही नहीं है, क्योंकि घास तो खुद-ब-खुद उग आएगी, और उससे सभी का काम चल जाएगा। भला फिर खाने की क्या चिंता?

इस कविता में सिर्फ एक हास्यपूर्ण कैरीकेचर ही नहीं है, बल्कि रवींद्र का अंदाजेबयाँ कुछ ऐसा है कि कविता को पढ़ते ही इस ‘महान विचार’ को देने वाले अनुकूल बाबू का चेहरा जैसे आँखों के आगे आकर नाचने लगता है। और वे जैसे मस्ती से ठहाके लगाते हुए हमें बता रहे हैं—

घास में होता विटामिन, गायें-भैंसें-घोड़े,
घास खाकर जीते, उनके बावर्ची हैं थोड़े।
कहते हैं अनुकूल बाबू, आदत गलत लगा दी,
कुछ दिन खाओ घास, पेट खुद हो जाएगा आदी।
व्यर्थ नाज की खेती, कोई खेत न जोते-गोड़े।

टैगोर की ऐसी ही एक बड़ी गजब की हास्यपूर्ण कविता है, ‘अग्निकांड’। इसलिए कि इस कविता में ऐसे महान आलसी जी का चित्रण है जिनके घर में आग लगी है, पर उन्हें नींद पूरी करने की चिंता है। नौकर चिल्ला-चिल्ला करके उन्हें उठने के लिए कह रहा है, मगर पहले तो आलसी जी यही सवाल खड़ा करते हैं कि अभी घड़ी का अलार्म कहाँ बजा है! तो भला वे इतनी प्यारी नींद छोड़कर क्यों उठ जाएँ? फिर वे यह शिकायत करने लगते हैं कि अचानक ऐसे नींद से जागने पर उन्हें सिरदर्द होता है। तो भला वे कैसे जाग जाएँ? 

यों बहानों और आलसीपन की तो कोई सीमा नहीं। तब नौकर को आखिर कहना ही पड़ा कि “अजी जनाब, घर तो जलकर राख हो गया। और अब भी आपको नींद पूरी होने की ही चिंता है, तो जाकर फुटपाथ पर लेट जाइए, और मजे में नींद पूरी कीजिए!” 

इस पूरी कविता में एक से एक चुटीले संवाद पिरोए हुए हैं और वही इस कविता की जान हैं। कविता की शुरुआत इन पंक्तियों से होती है—

‘हलचल मची मुहल्ले भर में, लेकिन मालिक सुनें न घर में।
जगिए, जल्दी जगिए।’
‘घड़ी जगोनी तो गुमसुम है, बजी कहाँ, रे उसकी दुम है।’
‘घड़ी बजेगी पीछे, घर में आग लगी, सुगबुगिए।’

और इस दिलचस्प कविता का अंत नौकर की इस टीप के साथ होता है—‘घर तो जलकर राख हो गया, बची नींद अब फुटपाथों पर, पूरी करने लगिए।’

रवींद्रनाथ टैगोर की इसी अंदाज की कविताओं में ‘छोटा-बड़ा’ भी मजेदार है। इसमें बच्चा, बच्चा नहीं रहता, बड़ा हो जाता है। अब बच्चे के बड़े होने में तो कुछ गड़बड़ नहीं है, इसलिए कि एक न एक दिन तो सभी को बड़ा होना होता है, और आज जो बड़े हैं, वे भी कभी न कभी तो बच्चे ही थे। यह दीगर बात है कि ज्यादातर बड़े लोग यह भूल जाते हैं कि हम भी कभी बच्चे थे।...

तो खैर, बच्चा एक दिन अपने बड़े होने की कल्पना करता है और कल्पना क्या करता है, समझिए कि अपनी कल्पना में एकाएक बड़ा हो जाता है। मगर दूसरों के लिए तो अभी वह लल्ला ही है। सो खूब तमाशा होता है और गुल-गपाड़ा मचता है। और फिर क्या-क्या परिवर्तन होते हैं, यह जरा बच्चे से सुनिए—

साढ़े दस बजने पर भी न मचेगा, 
झट से नहा डालने का हो-हल्ला,
छतरी काँधे डाल, पहनकर चप्पल, 
फिर आऊँगा सारा शहर मुहल्ला।
हुक्म करूँगा गुरु जी के आने पर, 
कुरसी डलवाना कमरे के भीतर,
अगर कहेंगे, स्लेट कहाँ है लाओ, 
पहले बैठो, फिक्र नहीं है क्या कुछ।
मैं कह दूँगा बच्चा अब थोड़े हूँ, 
बापू जैसा बड़ा हो गया सचमुच,
सुनकर गुरु जी कह देंगे, हाँ अब,
आज्ञा हो, घर जाऊँ बाबू साहब।

एक महीन सा हास्यबोध है यहाँ, इसलिए कविता पढ़ते ही बरबस होंठों पर मुसकान आ जाती है।
*

रवींद्र की एक बड़ी ही कौतुकपूर्ण कविता कलकत्ते को लेकर है। एक सुंदर और यादगार कविता, जिसमें बड़ा अजूबा भी है। होता यह है कि कलकत्ता जो सदियों से एक ही जगह खड़ा है, अचानक अपनी जगह से उठकर चलने-फिरने लग जाता है। देखने वाले भौचक हैं कि अरे भाई, यह हो क्या रहा है! एकदम अजब और अविश्वसनीय!! यह सच है या तमाशा?

तब लोगों की जो विचित्र हालत होती है, और देखने वालों की आँखों में जो भाव है, उसे रवींद्र की इस बाल कविता में पढ़ने का अपना ही मजा है। जरा आप ही इस कौतुकपूर्ण खेल का मजा लीजिए। कविता का शीर्षक है, ‘चलता-फिरता कलकत्ता’। और ऐसी अजब-गजब कल्पना के बाद, उसे ऐसी जोरदार भाषा में बाँधना भी महाकवि रवींद्रनाथ ठाकुर के ही बस की बात है—

रुक जा, रुक जा अरे, चीखते फिरते लाख जन,
जाना कहाँ, कहाँ जाएगा, यह क्या करता पागलपन?
हावड़ा का पुल चिल्लाता है—अर्र, चल पड़े किधर,
और जरा भी डुला कि गिर जाऊँगा मैं जल के अंदर!
चीना बाजार, मछुआ बाजार और बड़ा बाजार से,
स्थिर हो ले, स्थिर हो ले—नारे उठते आतुर गुबार से।
सोच रहा मैं, जाने भी दो क्या चिंता है, क्या परवाह,
कलकत्ता बंबई जाय या दिल्ली, अपनी वाह-वाह।

कहना न होगा कि कविता में ऐसे ‘खेल’ बच्चों को आनंदमग्न कर देते हैं। बँधे-बँधाए घेरे में कैद उनकी कल्पना एक नई उड़ान पर निकल पड़ती है, और खुद उनके भीतर सृजन की एक नई भावनात्मक हलचल सी पैदा हो जाती है। वे अपने आसपास की चीजों के बारे में कुछ नए ढंग, नए अंदाज में सोचने लगते हैं, और वे जिस दुनिया में जीते हैं, उसे सच ही नए पंख मिल जाते हैं। हर चीज नई-नई या पुनर्नवा हो जाती है, और बच्चे उसमें एक नया खेल, नया आनंद तलाश लेते हैं।

यह कुछ वैसी ही चीज है, जिसे हमारे यहाँ साहित्य के बड़े आचार्य और चिंतक ‘कविता की मुक्ति’ या ‘कल्पना की मुक्ति’ नाम देते हैं।
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रवींद्रनाथ टैगोर की बाल कविताओं की एक बड़ी विशेषता यह भी है कि उनमें कई जगह किस्सागोई का कमाल दिखाई पड़ता है। हालाँकि यह बात थोड़ी विचित्र लग सकती है। इसलिए कि कहानियों में किस्सागोई की बात तो समझ में आती है, मगर कविता में किस्सागोई...! भला यह कैसे संभव है? इसका जवाब यह है कि टैगोर की बहुत सारी कविताएँ ऐसी हैं, जिनमें कविता के साथ-साथ कहानी भी है, बल्कि कविता से कहानी कहीं ज्यादा है। इस तरह की कथात्मक कविताओं में सबसे जोरदार और जबरदस्त नाटकीय कविता है—‘जूता-आविष्कार’। इसका हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल में बड़ा अद्भुत नाट्य-रूपांतरण किया भी है, जिसमें हास्य और किस्सागोई के बड़े अद्भुत नमूने हैं।

कविता की शुरुआत ही जबरदस्त नाटकीय है और उसमें घड़ी-घड़ी उत्सुकता, कौतूहल और रोमांच बढ़ता ही जाता है। बीच-बीच में हास्यविनोद की अनुपम छटाएँ। पढ़ते-पढ़ते चेहरे पर एक मद्धिम सी मुसकान आ जाती है। हबू राजा हैं और वे पूरी राजकीय शान और दर्प के साथ अपने मंत्री गोबू राय से मुखातिब हैं—

बोले हबू, सुनो हे गोबू राय, 
इसी सोच में बीती सारी रात।
धरती पर पग धऱते क्यों लग पाय, 
मलिन धूल पग में—यह कैसी बात।

और फिर जूते का आविष्कार कैसे हुआ, बेचारे गोबू राय की जान कैसे बची और हबू कैसे संतुष्ट हुए, इसे तो कविता में ही पढ़ना चाहिए। मैं बताऊँगा, तो ज्यादा मजा न आएगा। लेकिन यह तय है कि ऐसी कविताएँ सच में ही बच्चों को आनंदित करने वाली कविताएँ हैं। एक बार पढ़ने के बाद वे जीवन भर उन्हें भूल नहीं पाते।

मगर बच्चों में सिर्फ नटखटपना ही नहीं होता, गंभीरता और बड़प्पन भी होता है। यह दीगर बात है कि वह कहीं से थोपा हुआ न होकर बच्चे के सहज-सुलभ चंचल स्वभाव में ही घुला-मिला होता है। और किसी खास क्षण में जब वह प्रकट होता है, तो हम कुछ-कुछ चमत्कृत से रह जाते हैं। रवींद्रनाथ टैगोर की ‘दीदी’ ऐसी ही कविता है जिसमें अपने छोटे भाई को प्यार से सँभालने और उसे अपने प्यार की छाँह में ले चलने वाली एक छोटी सी बच्ची मानो एकाएक जिम्मेदारियों को समझने वाली माँ हो जाती है। रवींद्रनाथ टैगोर केवल दो पंक्तियों में एक बड़ी बात कह देते हैं—

शिशु भाई का हाथ, बालिका लौट चली सादी-सीधी,
जननी की प्रतिनिधि यह, कर्मभार-नत अति छोटी दीदी।

अभी उस नन्ही बालिका की खुद खेलने और शैतानियाँ करने की उम्र है, पर भाई को सँभालने की जिम्मेदारी आ गई, तो छोटी सी उम्र में भी लड़की बहुत बड़ी हो जाती है। यह शायद सदियों का हिंदुस्तानी संस्कार है, जिसे रवींद्रनाथ टैगोर ने समझा है, और बड़ी संजीदगी से उसे इस कविता में ढाल दिया है।

इसके अलावा ‘सार्थक जन्म हुआ’, ‘नकली गढ़’, ‘छोटी सी हमारी नदी’ रवींद्रनाथ टैगोर की बच्चों और किशोर पाठकों के लिए लिखी गई बड़ी सुंदर और बार-बार पढ़ने लायक कविताएँ हैं। कुछ बाल कविताओं में ‘गीतांजलि’ जैसा विनय भाव और प्रार्थना है। ‘जिसे पताका अपनी तुम देते हो’, ‘मेरे मन हे, पुण्य तीर्थ में जागो’, ‘सभी कहीं मेरा घर है’ ऐसी ही बाल कविताएँ हैं, जिनमें बड़ी सहजता और सादगी है। इसलिए सहज ही वे बच्चों और किशोर पाठकों के दिल में उतर जाती हैं। 

हालाँकि रवींद्रनाथ की बाल कविताओं में ‘लोहा कठिन निद्रा में पड़ा था अचेतन’ शायद सबसे अलग सी है, इसलिए कि इसमें अत्यंत विरूप नजर आते कच्चे लोहे के अंदर सो रहे एक विराट स्वप्न को रवींद्र देखते हैं और उसे इसी अंदाज में पेश भी करते हैं। जरा देखें—

लोहा कठिन निद्रा में पड़ा था अचेतन
हमने नींद भगाई रे।
लाख युगों के अंधकार में बंद-बंद था गोपन
उसकी शक्ति जगाई रे।

ऐसे ही रवींद्रनाथ टैगोर की बाल कविताओं में ‘वीर’ भी एकदम अलग और बड़ी अद्भुत बाल कविता है, जिसमें बच्चे के भीतर सो रहे वीर नायक की छवि को मानो शब्द मिले हैं। बच्चा माँ के साथ एक लंबी यात्रा पर निकला है। उसके लिए ये जीवन के बड़े रोमांचक पल हैं—

मान लो कि घूमता विदेश मैं, तुझे लिए दूर-दूर देश में।
ढो रहे हैं तेरी पालकी कहार, जरा-जरा से खुले हैं बंद-द्वार।
और मैं रंगीन घोड़े पर सवार, दुलक चाल चल रहा माँ पास-पास, 
धूल टाप-टाप से उड़ी हुई, रंग रही रंगीले मेघ का लिबास।

और ऐसे में अचानक हल्ला हो जाता है कि ‘डाकू आ गए, डाकू आ गए’। सुनकर सब सिहर उठते हैं, लेकिन छोटा सा लल्ला जरा भी नहीं घबराता। वह किसी वीर नायक की तरह छाती तानकर आगे बढ़ता है और अपनी तलवार निकालकर अकेला उनसे लोहा लेता है। आखिर सब डाकुओं को वह मार भगाता है। इस पर सब हैरान रह जाते हैं और जब वह गर्व से भरकर माँ के पास आता है तो माँ, ‘तू तो मेरा बड़ा वीर बाँकुरा है’—कहकर बलैयाँ लेती है। बाद में बहुत गद्गद होकर वह सबको बताती है कि उस दिन लल्ला मेरे साथ था, वह न होता तो पता नहीं क्या होता! इसे सुनकर बालक को जिस गर्व भाव, संतोष और आनंद की अनुभूति होती है, उसका तो कहना ही क्या। 
सच तो यह है कि कवींद्र रवींद्र की बाल कविताओं में बालक के मन की इतनी छवियाँ, इतने रंग और इससे भी बढ़कर जिंदगी की इतनी ऊर्जा और हलचलें बिखरी पड़ी है कि बच्चों को उन्हें पढ़कर आनंद आता है और उनके साथ-साथ खेल-खेल में बहुत कुछ पा लेने और जी लेने का सुख भी मिलता है। पर साथ ही मुझ सरीखे साहित्य से जुड़े जनों को जिनका बचपन रवींद्र को पढ़ते ही बीता और उन्हीं के सहारे जो बड़े भी हुए—उन्हें आज भी रवींद्रनाथ टैगोर की बाल कविताओं को पढ़ना और बार-बार पढ़ना इसलिए भी अच्छा लगता है कि इनके सहारे हमें बचपन के उन नायाब खजानों को फिर से पा लेने का सुख मिलता है, जिन्होंने हमें सिखाया था कि जिंदगी को भरपूर जी लेना क्या होता है।

इसमें संदेह नहीं कि रवींद्रनाथ टैगोर की बाल कविताओं की यही ऊर्जा आने वाली कई पीढ़ियों को भी इसी तरह एक खिलंदड़ेपन से भरी खुशी देकर प्रकाश-स्नान कराती रहेगी।

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