आत्मकथा-अंश: मेरे अध्यापक, जिन्होंने मेरी आँखों को रोशनी दी

प्रकाश मनु

प्रकाश मनु


आज जब कि मैं सत्तर पार कर चुका हूँ, अपने स्कूली जीवन के अध्यापकों के बारे में सोचता हूँ, तो आँखें भीगने लगती हैं। ओह, किस प्यार, किस समर्पण और कैसी लगन और अद्भुत तन्मयता के साथ हमें पढ़ाया था। और पढ़ाया ही नहीं, हमें गढ़ा था। मिट्टी के मामूली ठीकरे से इनसान बनाया था। मेरा पोर-पोर उनका ऋणी है। अगर वे न होते, तो आज प्रकाश मनु क्या होता, कहाँ होता, मैं सोच भी नहीं पाता। और फिर एक बार अपने उन सीधे-सरल और धुनी अध्यापकों के आगे आदर से सिर झुकने लगता है, जिनकी कोई इच्छा, कोई लालसा न थी, सिवाय इसके कि उनके पढ़ाए विद्यार्थी जीवन में आगे निकलें और कुछ कर दिखाएँ। उनके भीतर ज्ञान और अनुभवों का जो अकूत खजाना था, उसका जर्रा-जर्रा वे हमें सौंप देना चाहते थे, ताकि हम योग्य बनें, समर्थ बनें, और जीवन में उनसे भी कहीं आगे निकल जाएँ।
आज सोचता हूँ, क्या जीवन में मैं कभी उनसे उऋण हो सकता हूँ। शायद कभी नहीं। पर उनका स्मरण आज भी मन को शक्ति देता है, आस्था और बल देता है, तो भला यही क्यों न करूँ?  
तो चलिए, शुरुआत मैं अपने बड़े स्कूल यानी पालीवाल इंटर कॉलेज के अध्यापकों के जिक्र से करता हूँ। यह गौरतलब है कि हमारे यहाँ इंटर कॉलेज छठी कक्षा से शुरू हो जाता था, और बारहवीं कक्षा तक हम उसी में पढ़े थे। और विषयों की तुलना में कला हमारे यहाँ एक गौण विषय ही समझी जाती थी। पर मैं अपने कला अध्यापक कृश्नचंद्र मुंदा से ही यह कहानी शुरू करता हूँ, जिन्होंने हमें छठी, सातवीं और आठवीं क्लास में कला और पुस्तक-कला पढ़ाई थी। 
पर शुरुआत मुंदा जी से ही क्यों? इसका कारण संभवतः यह है कि कला में मैं कच्चड़ था, यानी ड्राइंग या चित्रकला मेरी कमजोर नस थी। पुस्तक-कला में तो मैं फिर भी कुछ ठीक-ठाक था, लेकिन कला यानी ड्राइंग में एकदम अनाड़ी सरीखा था। पुस्तक-कला में पोस्टकार्ड, लिफाफा, पुस्तक-चिह्न यानी बुक मार्क आदि बनाने होते थे, दफ्ती का गुलदस्ता या घर वगैरह भी। पर ये चीजें घर से बनवाकर ले जानी होती थीं, इसलिए मुझे ज्यादा मुश्किल नहीं आती थी। सत्ते, मेरा दोस्त जो पड़ोसवाले घर में रहता था, इस मामले में मेरी काफी मदद कर देता था। कुछ श्याम भाईसाहब की भी मदद मिल जाती थी।
मगर ड्राइंग तो वहीं क्लास-रूम में बननी होती थी और मेरी फूहड़ता यहाँ पूरी तरह खुल जाती थी। मेरे आकार असहनीय रूप से भद्दे होते थे, रेखाएँ मोटी-मोटी और बुरी। अगर रबर का इस्तेमाल होता तो कागज की चमड़ी उधड़ जाती। और रंग भरने में तो मैं एकदम माशा अल्लाह था। रंग कुछ इस बेरहमी से बाहर निकले होते थे कि देखने वाले का जी खराब हो जाए। और कोई आश्चर्य नहीं कि किसी कक्षा में—शायद सातवीं में, यों तो मेरे नंबर काफी अच्छे थे, पर ड्राइंग में मैं एक नंबर से फेल था। यानी जैसा कि तब कहने का रिवाज था, मैं कृपांक यानी ‘ग्रेस मार्क्स’ से या तरक्की से पास हुआ था!
मैं रोता हुआ घर आया था। मेरी ममतामयी माँ ने यह सुना तो विगलित हुईं। उन्होंने तत्काल श्याम भाईसाहब को प्रिंसिपल रामगोपाल पालीवाल जी के पास भेजा और प्रिंसिपल साहब ने एक नंबर बढ़ाकर मुझे ‘क्लीयर’ पास कर दिया। हालाँकि इसका अफसोस मुझे आज भी है कि कला में मुझे एक रियायती नंबर लेना पड़ा। मुंदा जी की इस बात के लिए मैं आज कहीं ज्यादा तारीफ करूँगा कि कितना ही होशियार विद्यार्थी हो, अगर उसकी ड्राइंग अच्छी नहीं है, तो उसे फेल करते हुए उन्हें जरा भी संकोच नहीं होता था। अलबत्ता आज मैं जिन चीजों के लिए खुद को शर्मिंदा महसूस करता हूँ, उनमें प्रिंसिपल रामगोपाल पालीवाल की ओर से ड्राइंग में मिला वह एक अदद रियायती नंबर भी है।
हालाँकि खुदा का लाख-लाख शुक्र है कि बाद में मेरे ही दो सहपाठियों ने, जो एक ही गाँव के थे और शायद भाई-भाई थे, दया करके अच्छी ड्राइंग बनाने और खासकर बढ़िया रंग भरने के गुर मुझे बताए और वे मेरे बहुत काम आए। उसके बाद तो यही मुंदा जी थे जिन्होंने खुश होकर कई बार मुझे ‘गुड’ और ‘वेरी गुड’ दिए। तब मुझे अपने जीवन में जो खुशी मिली, एकदम सच्ची और निर्मल खुशी, उसे आज भी बरसों बाद छू और टटोलकर बता सकता हूँ कि देखो, ये थी वो चीज!
मेरे वे भले सहपाठी जिन्होंने मुझे अच्छी कला के कुछ व्यावहारिक गुर बताकर संकट में मेरी मदद की थी, धुर गाँव के थे। साधारण और कुछ-कुछ मैले कपड़े, लेकिन अंतस एक बड़े कलाकार जैसा। शायद उनमें से एक का नाम रामपाल और दूसरे का भीकम था। और यह असाधारण गुण तो उन दोनों भाइयों में था ही कि मुंदा जी जैसा अनुभवी अध्यापक भी जहाँ मेरी मदद नहीं पा रहा था, वहाँ उन्होंने न सिर्फ मेरी मदद की, बल्कि मेरी बीमारी की असल जड़ को भी पहचान लिया। अच्छी कला के ‘मर्म’ को उन्होंने कुछ इतने प्रेक्टीकल ढंग से बताया कि बात तुरंत मेरे पल्ले पड़ गई। उसी दिन से मेरी चित्रकला में अंतर दिखाई पड़ने लगा। 
क्या इससे यह निष्कर्ष न निकाला जाए कि बच्चे अकसर बच्चों से कहीं ज्यादा और बड़े ही सहज रूप में सीखते हैं। हाँ, पर इससे मुंदा जी की यह सीख तो कम अर्थपूर्ण नहीं हो जाती कि बिना कला के, हमारी पढ़ाई और शिक्षा अधूरी है!
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यों पालीवाल इंटर कॉलेज के अध्यापकों में जिनकी सबसे ज्यादा याद आती है और मैं सबसे ज्यादा जिनके प्रभाव की गिरफ्त में था, वे थे हमारे अंग्रेजी के अध्यापक राजनाथ सारस्वत। वे सचमुच ‘महान’ अध्यापक थे। एकदम विलक्षण और अद्वितीय। वैसा कोई दूसरा और हो ही नहीं सकता था। उनके बारे में कोई एक वाक्य कहना हो तो मैं कहना पसंद करूँगा कि पूरी दुनिया में राजनाथ सारस्वत तो सिर्फ एक राजनाथ सारस्वत ही हो सकते थे! उन जैसा कोई दूसरा शख्स बना पाना तो शायद खुद ईश्वर के लिए संभव न हो। पढ़ाते थे तो बिल्कुल डूब जाते थे। और ऐसे नाटकीय अंदाज में पढ़ाते थे कि पूरी क्लास पर उनका जादू तारी हो जाता था। कई बार उनकी नाटकीय मुद्राएँ देख-देखकर हम मानो अवाक् और हक्के-बक्के से रह जाते थे। इसलिए कि हमारे स्कूल की पारंपरिक पढ़ाई से उसका कोई मेल ही नहीं था। उनका पढ़ाया हुआ पाठ ‘अंकल पोजर हैंग्स अ पिक्चर’ अब भी याद है। और ‘अब भी’ क्यों कह रहा हूँ? इसलिए कि इसे तो जनम-जिंदगी तक भूल पाना मेरे बस की बात नहीं है। 
उफ, उन्होंने किस कदर पूरी क्लास में नाच-नाचकर यह पाठ पढ़ाया था, कि किस तरह अंकल पोजर तसवीर टाँगने के लिए एक स्टूल पर चढ़ते हैं और फिर क्या-क्या तमाशे होते हैं। कभी स्टूल नीचे गिरता है तो कभी खुद अंकल पोजर लड़खड़ाकर गिरते हैं, कभी कील दूर जा छिटकती है, कभी हथौड़ा, या फिर हथौड़े की मार से दीवार का पलस्तर ही टूटकर गिर जाता है। पूरे घर में हड़कंप मच जाता है कि देखो, अंकल पोजर तस्वीर टाँग रहे हैं। यों वह स्कूली पाठ तो कम, नाटक में नाटक में नाटक था। ऐसा गजब नाटक कि...तौबा-तौबा! 
याद पड़ता है, क्लासरूम में बिल्कुल असली जैसा प्रभाव लाने के लिए हमारे अलबेले अध्यापक राजनाथ सारस्वत जी ने आवाज और चेहरे की ढेर-ढेर-सी भंगिमाओं का सहारा लिया था। और फिर क्लास में कुछ ऐसा जादुई दृश्य निर्मित हो गया था कि उसकी याद से मैं आज भी चकित और विस्फारित रह जाता हूँ कि क्या यह सचमुच हुआ था? वह भी पालीवाल इंटर कॉलेज के महा दकियानूस वातावरण में...कि एक नाटकीय पाठ को उसके असल और पूरे नाटक के साथ यों पढ़ाया गया कि मानो आप क्लास रूप में नहीं, मंडी हाउस में बैठे हैं! 
यों राजनाथ सारस्वत अलबेले अध्यापक थे। एकदम विलक्षण। उनका यह नाटकीय सुर-ताल पूरे साल भर ही चलता था, जब पढ़ाने के बाद बचे हुए समय को वे जग-आलोचना, पढ़ाई के मौजूदा तौर-तरीकों की आलोचना, और अंततः पालीवाल इंटर कॉलेज की पढ़ाई के तौर-तरीकों की भीषण आलोचना में खर्च करते थे। जी हाँ, उनकी हर फब्ती और यहाँ तक कि तीखी, अभद्र कटूक्ति में भी एक ‘मंडीहाउस’ आप देख सकते थे!
राजनाथ सारस्वत जी की एक खासियत यह थी कि वे बड़े नफीस किस्म के आदमी थे। हमेशा सफेद बेदाग धोती-कुरते में लकदक-लकदक करने वाले। और वे लगभग हर चीज के आलोचक थे। कॉलेज की आलोचना वे जिस साहस और धाकड़ी से करते थे, उससे हम चकित होने के साथ-साथ कुछ आशंकित भी होते थे कि ये सारी बातें पालीवाल इंटर कॉलेज के महाशक्तिशाली प्रिंसिपल रामगोपाल पालीवाल जी तक पहुँचेंगी, तो न जाने क्या गजब हो जाएगा!
राजनाथ सारस्वत जी से जुड़ा एक प्रसंग और है जिसे मैं आज तक नहीं भूल पाया और शायद इस जिंदगी में तो कभी नहीं भूल पाऊँगा। हुआ यह कि सारस्वत जी ने क्लास में ग्रामर का पाठ पढ़ाया और उसी में से कोई काम सब बच्चों को दिया था घर से करके लाने के लिए। उनका काम हम बच्चे सबसे पहले करते थे, इसलिए कि उनके गुस्से और इससे भी अधिक उनके भाषणों से बड़ा डर लगता था। सच पूछो तो कभी-कभी हमें वे अंग्रेजी वाले ‘जाइंट’ लगते थे, दैत्य! लेकिन इस दफा हुआ यह कि उन्होंने होमवर्क दिया, फिर कुछ दिनों की छुट्टियाँ हो गईं। लिहाजा किसी को भी याद नहीं रहा।
छुट्टियों के बाद हम क्लास में आए तो सारस्वत जी ने काम के बारे में पूछा। पूरी क्लास में इक्का-दुक्का को छोड़कर किसी ने होमवर्क नहीं किया था, लिहाजा उनका गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुँचा और उन्होंने पूरी क्लास को ‘मुर्गा’ बनने का आदेश दे दिया।
सभी सन्न! सभी जानते थे कि सारस्वत जी का कहा पत्थर की लकीर है। इसे माने बगैर कोई चारा नहीं। यह भी हो सकता था कि अनखने पर वे गुस्से में सजा और बढ़ा दें। तो एक-एक कर सभी बच्चे सामने आते गए और मुर्गा बनते गए। रह गया मैं जो सारस्वत जी का बहुत सम्मान करता था, पर सोचता था कि ईश्वर ने जब अच्छा खासा बंदा बनाया है, तो मुझे मुर्गा बनाने का हक तो किसी को नहीं है—राजनाथ सारस्वत जी को भी नहीं। अलबत्ता मैं मुर्गा नहीं बना।
सारस्वत जी ने बहुत धमकाया। क्लास से निकल जाने और हफ्ते भर तक क्लासरूम में न आने को कहा। मैं इस पर भी तैयार नहीं था और उनकी हरेक धमकी और भयानक दैत्यनुमा क्रोध का जवाब मेरे पास सिर्फ यही था कि, “सर, आप मार लीजिए। आप कितना ही मारिए मैं चूँ नहीं करूँगा, पर नहीं, मुर्गा मैं न बनूँगा।”
एक पीरियड पूरा निकल गया इसी चक्करबाजी में। सारस्वत जी कभी शांत होकर मुझे समझाते कि “मि. विग, मुर्गा तो तुम्हें बनना पड़ेगा, इसके बगैर कोई चारा नहीं है।” कभी आगबबूला होकर डाँटने लगते। अंत में पीरियड खत्म होने की घंटी बजी, तो मुझे कुछ चैन पड़ा। सारस्वत जी क्लास से जाने लगे तो उन्होंने निर्णायक स्वर में कहा, “देखो विग, तुम्हारी वजह से पूरा पीरियड खराब हो गया। पूरी क्लास का बहुत नुकसान तुमने कराया है। अब अगले पीरियड में या तो मेरे पीरियड में आना मत, या फिर पीरियड शुरू होते ही यहाँ आकर मुर्गा बन जाना। अच्छी तरह सोच लो कि तुम्हें क्या करना है, वरना मुझे सख्त कदम उठाना पड़ेगा।”
उसके बाद एक-एक करके कई पीरियड आए, गए। मुझे कुछ होश नहीं था। मैं तो जैसे कीलित कर दिया गया होऊँ! मेरा सारा ध्यान तो उस कत्ल की घड़ी पर था जो अंग्रेजी के अगले पीरियड यानी आठवें पीरियड में आने वाली थी। तो आखिर, जैसे-तैसे राम-राम करके आठवाँ पीरियड शुरू हुआ। मेरी ऊपर की साँस ऊपर, नीचे की साँस नीचे। डर के मारे प्राण निकले जा रहे थे कि पता नहीं क्या हो? पर मुर्गा मैं न बना। सारस्वत जी ने बहुत डर दिखाया, गुस्से के मारे उनकी भी हालत खराब थी। अपने तरकश के सारे तीर वे चला चुके थे। पर क्या करते? वे मुझे प्यार भी बहुत करते थे। लिहाजा एक बीच का रास्ता उन्होंने यह निकाला कि कहा, “अच्छा, इतना ही तुम कहते हो तो एक तरीका है...कि अगर क्लास के बच्चे कहेंगे कि विग को छोड़ दीजिए, तो हम छोड़ देंगे।”
ओह, ईश्वर का लाख-लाख धन्यवाद! उनकी बात अभी पूरी भी न थी, कि पूरी क्लास एक साथ चीख पड़ी, “छोड़ दीजिए सर, छोड़ दीजिए...छोड़ दीजिए!” और यों मामला बमुश्किल खत्म हुआ। हालाँकि खत्म हुआ तो भी अंतरतम में बुरी तरह ‘थर-थर...थर-थर’ हो रही थी। आँखें जैसे आँसुओं से उमड़ उठना चाहती हों और आँसू निकल भी न रहे हों!
खैर, उस दिन पूरी छुट्टी होने पर स्कूल से निकला, तो मैं क्लास के सारे बच्चों का ‘हीरो’ था, क्योंकि एक बच्चे ने पहली बार किसी नचिकेता की तरह, अपनी विनम्रता से एकदम एक गुस्सैल अध्यापक पर विजय पाई थी...और कहिए कि एक सही मुद्दे पर विजय पाई थी। यह विजय उस अध्यापक पर थी, जिसका गुस्सा हमें यमराज से कम भयानक नहीं लगता था!
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राजनाथ सारस्वत जी से जुड़ा एक प्रसंग और है। पालीवाल इंटरमीडिएट कॉलेज में अध्यापकों के पढ़ाने का जो तयशुदा शेड्यूल था, उसमें सारस्वत जी को ज्यादातर हाईस्कूल की नवीं कक्षा पढ़ाने को दी जाती थी। नवीं कक्षा के ही कई सेक्शन होते थे, जिनमें वे पढ़ाते थे। दसवीं कक्षा में कोई अन्य अध्यापक पढ़ाते थे। पर हमारी कक्षा में नवीं में अंग्रेजी पढ़ाने के बाद सारस्वत जी को हमारी कक्षा से कुछ अतिरिक्त मोह हो गया। खासकर सुबोध और मुझसे तो वे बहुत प्रेम करते थे। तो वे इस बात के लिए अड़ गए कि यह बहुत प्रतिभाशाली बच्चों की क्लास है, जिसकी मैंने नवीं कक्षा में खासी तैयारी करवाई है। अब इस क्लास को दसवीं में भी मैं ही अंग्रेजी पढ़ाऊँगा। और उनकी जिद मान ली गई। सारस्वत जी जब दसवीं में हमें पढ़ाने आए तो उन्होंने खुद इस बात का खुलासा किया कि “मैंने जिद करके यह कक्षा ली है। अब तुम्हें हाईस्कूल की परीक्षा में अच्छे नंबर लाकर मेरी बात को प्रमाणित करना होगा।” 
उनकी यह बात हम सब बच्चों के दिल को छू गई और सचमुच हम सबने बहुत गंभीरता से परीक्षा की तैयारी की। बाद में सुबोध की और मेरी अंग्रेजी में डिस्टिंक्शन आई तो सारस्वत जी बहुत प्रसन्न थे। हम बच्चों ने सचमुच दो डिस्टिंक्शन उन्हें उपहार के रूप में लौटा दी थीं, जिससे कॉलेज में उनका रुतबा और सम्मान बहुत बढ़ गया था। इसलिए कि कॉलेज में पहले कभी किसी विद्यार्थी की अंग्रेजी में डिस्टिंक्शन नहीं आई थी।
राजनाथ सारस्वत जी भी पिछले दिनों मुझ पर छाए रहे और कुछ अरसा पहले ही उन पर एक कहानी ‘जोशी सर’ मैंने लिखी है, जिसे कुछ मित्रों ने बहुत पसंद किया। ‘जनसत्ता’ में इसे पढ़कर बहुत से मित्रों ने कहा कि “आपके जोशी सर तो भूलते नहीं हैं।” तब हँसकर मैंने यही कहा कि “काश, आप असली जोशी सर, उर्फ हमारे राजनाथ सारस्वत जी से मिले होते। तब आपको पता चलता, यह दुनिया कितने अद्भुत लोगों से भरी पड़ी है।”
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पालीवाल इंटर कॉलेज में अंग्रेजी के एक और अध्यापक थे मि. खुराना, जिनकी बड़ी मधुर स्मृति मेरे मन में है। खुराना जी ने इंटरमीडिएट में हमें अंग्रेजी पढ़ाई थी। उनका नाम मैं भूल गया, पर अंग्रेजी पढ़ाने का उनका अंदाज अब भी याद है। वे इस कदर मुसकराते हुए, बहुत अनौपचारिक अंदाज में खुशदिली से अंग्रेजी पढ़ाते थे कि बस मजा आ जाता था। लगता था कि क्या ही मजा आए, अगर हम पूरी जिंदगी बस अंग्रेजी लिटरेचर पढ़ते गुजार दें! अंग्रेजी साहित्य पढ़ने में मुझे इतना मजा कभी नहीं आया, जितना तब आता था।
इंटरमीडिएट में पहले ही दिन जब वे अंग्रेजी पढ़ाने आए, उन्होंने सबसे पूछा, “हाईस्कूल में तुम्हारे अंग्रेजी में कितने नंबर थे?” जब मैंने बताया कि हाईस्कूल में अंग्रेजी में मेरी डिस्टिंक्शन थी तो उन्होंने कुछ हैरान होकर पूछा था, “तुम क्रिश्चियन हो क्या?” मेरे ‘न’ कहने पर वे चौंके। 
उन दिनों हमारे यहाँ अंग्रेजी डिस्टिंक्शन या विशेष योग्यता का रोब कुछ ऐसा ही था। किसी विषय में सौ में से पचहत्तर या उससे अधिक अंक हों तो डिस्टिंक्शन मिलती थी, जबकि मेरे अंग्रेजी में सौ में से अठहत्तर नंबर थे। पालीवाल इंटरमीडिएट कॉलेज के इतिहास में हाईस्कूल में पहली बार मेरी और मेरे एक सहपाठी सुबोध गुप्ता की अंग्रेजी में डिस्टिंक्शन आई थी। वरना गणित और विज्ञान में तो बहुतों की डिस्टिंक्शन आती थी, पर अंग्रेजी में नहीं। 
अलबत्ता पहले दिन से ही खुराना जी न सिर्फ मुझसे परच गए, बल्कि बहुत प्यार भी करने लगे। मुहावरेदार अंग्रेजी बोलने का सुख क्या होता है, यह मैंने उनसे ही जाना। वे ऐसे अध्यापक थे जो अंग्रेजी अच्छी पढ़ाते ही नहीं थे, बल्कि अंग्रेजी में लिखने-पढ़ने को भी प्रेरित करते थे। याद पड़ता है कि उस साल की कॉलेज की पत्रिका में मैंने अंग्रेजी में एक लेख लिखा था। कह सकता हूँ कि शायद उन्हीं के कारण थोड़े समय तक मुझ पर अंग्रेजी का नशा भी तारी रहा था। और फिर उसी बरस वह उतर भी गया और मैं अपने स्वाभाविक तेवर में आ गया कि “इंगलिश इज द ग्रेटेस्ट डेविल विच इज डेस्ट्रॉइंग अवर कंट्री!” जी हाँ, ठीक यही शब्द मैंने अंग्रेजी भाषा को लेकर अंग्रेजी में ही आयोजित एक वाद-विवाद प्रतियोगिता में, तमाम अंग्रेजीदाँ लोगों के बीच कहे थे, सबको हक्का-बक्का करते हुए।
जब मैं इंटरमीडिएट में था, तभी मैंने अंग्रेजी के खिलाफ शिकोहाबाद शहर में आंदोलन किया था और रात-रात भर जागकर नारे लिखे थे। उन दिनों लोहिया जी का अंग्रेजी हटाओ आंदोलन पूरे देश में चल रहा था, और उसने हम किशोरों को भी प्रभावित किया। मैं किसी आँधी की तरह उसके बहाव में था। लेकिन अंग्रेजी साहित्य का आनंद लेना भी मैं न भूला। अपने देश में अंग्रेजी की तानाशाही से हमारा विरोध था, अंग्रेजी साहित्य में हर्गिज नहीं। यह फर्क हम बराबर करते रह सकें, इसका श्रेय उन्हीं खुराना सर को जाता है। 
सच तो यह है कि मेरे मन में आदर्श अध्यापक की जो सुंदर छवि है, वह बहुत कुछ खुराना सर से मिलती-जुलती है। इसका सबसे सुंदर लक्षण यह है कि उनसे हमें डर बिल्कुल नहीं लगता था और मन उनके पढ़ाए हुए में खुद-ब-खुद रमता जाता था। हमेशा एक मंद-मंद मुसकराहट उनके चेहरे पर हमेशा रहती थी और वह मुझे बहुत लुभाती थी। लगता था, एक अच्छे अध्यापक को ऐसा ही होना चाहिए।
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फिर गिरीशचंद्र गहराना, जिन्होंने इंटरमीडिएट में हमें गणित पढ़ाया था। वे सही मायनों में गणित के जादूगर थे। बल्कि कहना चाहिए, गणित उनकी उँगलियों के पोरों पर नाचता था। मुझे लगता है, उन्हें जरूर हवा में अपने चारों ओर गणित की संख्याएँ लिखी हुई नजर आती होंगी। इसीलिए ब्लैकबोर्ड के पास आते ही वे इतनी तेजी से बोलते थे, जैसे कहीं सामने लिखा हुआ पढ़ रहे हों। और फिर उतनी ही तत्परता से उनकी उँगलियाँ तेजी से ब्लैकबोर्ड पर दौड़ने लग जातीं। वे खेल-खेल में गणित के सवाल हल करते थे और हमारी बड़ी से बड़ी समस्याओं को बस एक मामूली इशारे से ही, चुटकी बजाते हवा में उड़ा देते थे। 
यों गिरीश जी अपने ढंग के निराले अध्यापक थे। बेहद मेहनती इनसान। उनसे ज्यादा मेहनती अध्यापक भी कोई हो सकता है, कम से कम मैं इसकी कल्पना करने में खुद को असमर्थ पाता हूँ। उनकी एक खासियत यह थी कि वे क्लास में एक मिनट तो क्या, एक सेकेंड भी बर्बाद नहीं करते थे। क्लास के बाहर से ही जैसे बोलते हुए आते थे और भीतर घुसते ही विषय की थोड़ी प्रस्तावना के बाद, सीधा ब्लैकबोर्ड पर लिखना शुरू कर देते थे। मैंने देखा कि बड़े से बड़े बदमाश और महा ऊधमी लड़के भी उनकी क्लास में चुप और आतंकित होकर बैठे रहते थे। कहीं एक हलकी चूँ भी नहीं। यों तो ऐसे लोग अंग्रेजी पढ़ाने वाले सारस्वत जी से भी डरते थे। पर नहीं, वहाँ तो फिर भी कभी-कभार हँसी-मजाक की भी गुंजाइश थी, पर यहाँ तो निपट गंभीरता थी, जैसे सारा गणित रटा पड़ा हो और मौका आते ही वह उँगलियों की पोरों से फूट पड़ता हो!
मुझे सचमुच इस बात का गर्व है कि मुझे गिरीश जी ने पढ़ाया है। वे सही मायने में पालीवाल इंटर कॉलेज के गौरव थे और शिकोहाबाद के भी। उनकी पत्नी भी अध्यापिका थीं, लड़कियों के कॉलेज बी.डी.एम. में, जिसका पूरा नाम है, भगवतीदेवी म्यूनिसिपल कॉलेज। गिरीश जी ट्यूशन बहुत अधिक पढ़ाते थे। कहना चाहिए कि रात-दिन। कॉलेज से पहले और बाद का उनका पूरा समय इसी में जाता था। सुबह पाँच बजे से सिलसिला शुरू हो जाता और रात दस-ग्यारह बजे के आसपास थमता। यह दीगर बात है कि वे ट्यूशन में एक तो खूब मेहनत कराते थे, दूसरे वहाँ भी उनका खासा रोब चलता था। उनके आगे किसी की भी बोलती बंद हो सकती थी, चाहे वह कितना ही पैसे वाला क्यों न हो। मुझे बहुत बार हैरानी होती है कि इतनी टयूशन क्यों? क्यों इतना पैसा? भला इसकी उन्हें जरूरत क्या थी? पर यह भी एक तरह से तो मनुष्यता की सेवा ही थी, उस राह से जो उनके लिए सबसे सहज थी। और कोई हर्ज नहीं कि आप उन्हें ‘जन्मजात अध्यापक’ कहें!
हाँ, गिरीश जी के बारे में एक विचित्र बात और! गिरीश जी कंजूस बहुत थे। सड़क के किनारे जो नाई बैठते हैं और चार-छह आने में बाल काट देते हैं, वे उनसे कटिंग कराते थे। क्यों भला? हम कई बार राह से गुजरते तो उन्हें पास ही सड़क के किनारे बाल कटवाते देखकर ठिठक जाते थे कि अरे, गिरीश जी यहाँ...? और सच्ची कहूँ, हमें थोड़ी शर्म-सी भी आती थी कि इतने मशहूर अध्यापक और सड़क किनारे बैठकर बाल कटवा रहे हैं! हालाँकि आज सोचता हूँ, तो लगता है, इसमें शर्म की तो कोई बात नहीं। अध्यापकों का वेतन तब बहुत कम होता था। उस सस्ते के जमाने में ट्यूशन पढ़ने वालों से भी वे बहुत अधिक तो न लेते होंगे। तब इतनी मेहनत से अर्जित किए गए धन का एक-एक पैसा वे किफायती ढंग से खर्च करें, इसमें कुछ बुराई तो नहीं। फिर यह तो था ही कि घर के पास ही सड़क किनारे बैठे नाई से बाल बनवाने में समय की बचत होती थी। दूर किसी दुकान पर जाएँगे तो आने-जाने में वक्त तो लगेगा ही।
और हाँ, गिरीश जी के साथ ही याद आते हैं, भौतिक विज्ञान वाले शर्मा जी...! यानी अध्यापक समाज में हमारे धीरोदात्त किस्म के नायक, ‘दिव्य पुरुष’ श्री लक्ष्मणस्वरूप शर्मा! जैसे गिरीश जी कड़ी मेहनत के पर्याय थे, ऐसे ही शर्मा जी सख्त अनुशासन के। वे सच में अपने कई विलक्षण गुणों के कारण ‘किंवदती-पुरुष’ बन चुके थे।
यों हमारे कॉलेज में गिरीश जी और शर्मा जी की जोड़ी थी। बड़ी ही विलक्षण जोड़ी। कॉलेज के ये दो सिरमौर अध्यापक थे, जिनकी दूर-दूर तक कीर्ति थी। पता नहीं, कहाँ-कहाँ तक लोग उनकी अद्भुत शिक्षण कला का बखान किया करते थे, जिसके कारण पढ़ाई और हर वर्ष निकलने वाले परीक्षा-परिणाम को लेकर हमारे कॉलेज का बड़ी दूर-दूर तक नाम था। उनके शिष्य भी ऊँचे-ऊँचे पदों पर थे। 
पर आपको यह जानकर हैरानी होगी कि हमारे अध्यापकों की यह अमर जोड़ी, विभिन्नताओं का एक विचित्र संगम भी थी। इसलिए कि गिरीश जी के विपरीत, भौतिक विज्ञान के हमारे ये धीर-गंभीर अध्यापक शर्मा जी बिल्कुल ट्यूशन नहीं करते थे और इस चीज को कतई पसंद भी नहीं करते थे। बाहर से जो अध्यापक विज्ञान की प्रैक्टीकल परीक्षा लेने आते थे, उनके लालच की अनंत कथाएँ वे हमें सुनाया करते थे। कभी गुस्से में, तो कभी मजाक में भी। उस क्षण उनके पूरे मुखमंडल पर एक आदर्श और स्वाभिमानी अध्यापक की सी उजली कांति देखकर मैं विभोर और कुछ-कुछ गर्वित सा होता था कि सचमुच हम कितने भाग्यशाली हैं, हमारे अध्यापक इतने अच्छे, इतने आदर्श अध्यापक हैं! उनका स्वाभिमान कुछ-कुछ हम शिष्यों का भी अभिमान बन जाता था।
दोनों अध्यापकों में एक फर्क और था। गिरीश जी बोलते ज्यादा थे और बहुत तेज-तेज बोलते थे। अपनी क्लास में काम करके न लाने या फिर त्रिकोणमिति के फार्मूले याद न करने वाले छात्रों को दूर से बस एक कटाक्ष से ही ऐसा काटते कि उनके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लग जातीं। आवाज उनकी तीखी धारदार थी। खड्ग जैसी। उस हिसाब से शर्मा जी बहुत कम बोलते थे। बड़े शांत थे और बहुत धीरे बोलते थे। ज्यादातर थोड़ा-बहुत समझाने के बाद बोर्ड पर सवाल लिख देते थे और फिर चुपचाप अलग खड़े हो जाते थे, ताकि हम अच्छी तरह नोट कर लें। बस, बीच-बीच में जब जरूरी होता था, तभी बोलते थे। कभी-कभी समझाने और व्याख्या करने पर आते थे तो बड़े सरल शब्दों में और बीच-बीच में थोड़ा रुककर, बहुत अच्छी व्याख्या करते थे।
एक हैरानी की बात यह कि गिरीश जी और शर्मा जी दोनों ही एम.एस-सी. थर्ड क्लास थे। मैं गलत नहीं कह रहा। फिर सुन लीजिए, थर्ड क्लास! पर दोनों ही अद्भुत अध्यापक थे। अपने विषय में मास्टरी और एक तरह का आदर्श। बाद में पालीवाल डिगरी कॉलेज खुला तो ये दोनों सिरमौर अध्यापक भी वहाँ गए। पर जाहिर है, वहाँ के भिन्न माहौल में ऐसे विलक्षण अध्यापकों की ख्वारी ही होनी थी। वह हुई। दोनों अपमानित होकर लौटे। असल में उनकी जो अपनी जगह थी, वे वहीं बड़े थे। उन्हें कहीं और जाने की जरूरत ही क्या थी? 
हमारे यहाँ यह गलतफहमी है कि जो बड़ी क्लास में पढ़ाता है, वही बड़ा है। मैं समझता हूँ, इससे बड़ी भ्रांति कोई और हो नहीं सकती। डिगरी क्लासों के अध्यापकों में मुश्किल से एक-दो अध्यापक ही थे जिनसे मैं प्रभावित हुआ। जबकि छोटी कक्षाओं में तमाम ऐसे अध्यापक थे जो तब भी मन में बसे थे और आज तक बसे हैं। फिर उनका महत्त्व भी कुछ कम नहीं! आखिर नींव तैयार करने का काम कोई हँसी-खेल नहीं। आगे का सारा भवन तो उसी पर खड़ा होता है। मैंने सुना है, दुनिया के कई देशों में स्कूली कक्षाओं में पढ़ाने के लिए ऐसे अध्यापकों को चुना जाता है जो सबसे अधिक प्रतिभावान और योग्य हों। 
मैं समझता हूँ, यह कुछ गलत नहीं है। स्कूलों में पढ़ाना सबसे ज्यादा जिम्मेदारी का काम है, इसलिए कि इस समय बच्चे के मन पर पड़े संस्कार दूर तक असर डालते हैं। इस लिहाज से प्राइमरी कक्षाओं के अनाड़ी अध्यापक तो बहुत कुछ बर्बाद कर डालते हैं। नींव रखने का काम कहीं अधिक समर्थ और योग्य अध्यापकों को करना चाहिए। कितना अच्छा हो, अगर अध्यापन के क्षेत्र में हमारी सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाएँ प्राइमरी कक्षाओं में जाकर बच्चों के जरिए देश की नींव रखने का सबसे महत्त्वपूर्ण और बुनियादी काम करें। या फिर स्कूली पढ़ाई में उन्हें सच्ची राह दिखाएँ। पर वहाँ उन्हें अपनी योग्यता के मुताबिक वेतन और सम्मान मिले, बेशक इसकी व्यवस्था भी समाज को करनी होगी।
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पर मेरे प्रिय और विलक्षण अध्यापकों की बात अभी खत्म नहीं हुई। मैंने इंटरमीडिएट में गणित पढ़ाने वाले गिरीश जी का जिक्र किया। पर हाईस्कूल में गणित पढ़ाने वाले लालाराम शाक्य जी को कैसे भूल सकता हूँ? ठीक है, उन्होंने हमें कुछ ही दिनों तक पढ़ाया और फिर चले गए। पर उनके जाने को कितनी उदासी और तकलीफ के साथ हमने झेला, यह भी बताना मुश्किल है। लालाराम शाक्य बड़े ही कलाकार तबीयत के और खुशदिल अध्यापक। थोड़ा श्यामल वर्ण, माथे पर हर वक्त थिरकने वाले गहरे काले बालों के गुच्छे और हर पल होंठों पर नाचती मुसकान। 
ब्लैकबोर्ड पर कुछ लिखते-लिखते अचानक वे पलटकर मुसकराते हुए हमारी ओर देखते तो लगता, जैसे पूरी क्लास को उन्होंने प्यार की डोर से बाँध लिया हो। याद पड़ता है कि बस, कुछ ही दिन उन्होंने पढ़ाया था। फिर वे चले गए। कहाँ, क्यों...? मैं नहीं जानता। पर उनका जाना हमें बेहद अखरा। इसलिए कि गणित को भी वे कविता वाले लास्य के साथ पढ़ाते थे। एकदम सरल, सुबोध बनाकर। इससे अच्छा पढ़ाने का ढंग भला और क्या हो सकता है?
शाक्य जी की कई बातें याद आती हैं। इनमें सबसे बढ़कर है उनकी मोहिनी मुसकान। तुलना करनी हो तो कहूँगा, एकदम कृष्ण कन्हैया की सी मोहक मुसकान थी वह। उन्हें देखकर लगता था, जैसे साहित्य या कला का कोई अध्यापक भूल से गणित पढ़ाने चला आया हो। वे थे भी कुछ कलाकार ही! हाथ में चॉक लेकर ब्लैकबोर्ड पर ऐसी गजब की फुर्ती के साथ गोला खींचते थे कि बस देखते ही बनता था। और वह गोला इतनी पूर्णता लिए हुए होता था, इतना मुकम्मल, इतना सही कि उस पर दोबारा हाथ लगाने की उन्हें जरूरत नहीं थी। जैसे वृत्त खींचने वाला बहुत बड़ा परकार लेकर किसी ने खींचा हो। 
याद है कि एक झटके में ऐसा बढ़िया गोला खींचने के बाद वह पहले एक नजर ब्लैकबोर्ड को देखते थे एक सुरीली मुसकान के साथ, और फिर कुछ आत्ममुग्धता भरी बाँकी अदा से हमारी ओर देखते थे, दाद चाहने वाले अंदाज में! जैसे कवि-सम्मेलन का कोई कवि बढ़िया गीत सुनाने के बाद थोड़ा रुककर बाँकी अदा से श्रोताओं की ओर देखता है, कि अरे भई, अब थोड़ी तारीफ तो करो! 
पूरी क्लास मंत्रमुग्ध। हम सभी कुछ ऐसे चकित से कि जैसे कोई जादू दिखाया जा रहा है! अपने इस जादू पर वे खुद भी मंद-मंद हँसते थे और उनके साथ-साथ हम सब भी हँस पड़ते थे। पूरी क्लास में आनंद और प्रसन्नता की एक लहर दौड़ जाती थी। क्या यह गणित का जादू था? नहीं, शायद गणित और कला का मिला-जुला जादू!
साहित्य में तो यह हो सकता है और सच्ची पूछो तो अकसर होता ही है, पर गणित में भी हो सकता है, यह हमने शाक्य जी से ही सीखा। ऐसे बढ़िया अध्यापक क्यों कॉलेज छोड़ गए? कहाँ गए, कुछ पता नहीं। बाद में उनकी जगह जो अध्यापक आए, वे उतने ही ‘नीरस’ थे जितना कोई गणित का अति साधारण अध्यापक हो सकता है! और यों शाक्य जी के साथ-साथ गणित का आनंद भी चला गया। 
गणित में हाईस्कूल में मेरे सौ में पंचानबे नंबर थे। पर इसका श्रेय अगर किसी को देना हो तो मैं लालाराम शाक्य जी को देना चाहूँगा, जिन्होंने सिर्फ कुछ दिनों के अध्यापन से ही गणित को मेरे लिए कविता सरीखा आनंददायी बना दिया। मैंने जीवन में पहली बार जाना कि “अरे, गणित तो आनंद की वस्तु है। उससे क्या डरना? उससे तो प्यार करना आना चाहिए!” और मेरे भीतर यह बड़ा परिवर्तन हुआ शाक्य जी के कारण, जिन्होंने मुझे बहुत बल दिया और आत्मविश्वास से भर दिया।
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इसी तरह हाईस्कूल में विज्ञान के दो प्यारे अध्यापकों को याद करना भी जरूरी है। इनमें एक का नाम मुझे याद है, सी.पी. कुलश्रेष्ठ। यानी चंद्रप्रकाश कुलश्रेष्ठ। मेरे समान नामधर्मा कुलश्रेष्ठ जी रसायन विज्ञान के जाने-माने अध्यापक थे और मैनपुरी के क्रिश्चियन कॉलेज से हमारे यहाँ आए थे। पर कुलश्रेष्ठ जी थोड़े मनमौजी थे। मूड हो तो पढ़ाते थे, वरना पीरियड खत्म करना उनके लिए कोई मुश्किल काम न था। उनका पढ़ाने का ढंग दिलचस्प था। थोड़ा ही पढ़ाते थे, लेकिन मजेदार ढंग से पढ़ाते थे और जो कुछ पढ़ाते, उसकी एक मोटी सी रूपरेखा हम सारे विद्यार्थियों के मन में उतार देते थे। फिर अगले दिन सभी को पाठ याद करके लाने के लिए कहते थे। 
अगले दिन क्लास में जब वे पूछते तो एक-दो विदयार्थी अटक-अटककर कुछ बताते, कुल भूल जाते, और बाकी सारे सिर झुकाकर खड़े हो जाते। फिर वे मुझसे कहते, “चंद्रप्रकाश, तुम सुनाओ।” मैं पूरा पाठ पढ़कर ही नहीं, अच्छी तरह याद करके ले जाता था। इसलिए जब वे सुनाने के लिए कहते तो मैं पूरा पाठ शुरू से अंत तक सुना देता। ऑकसीजन, नाइट्रोजन या किसी अन्य तत्त्व के बारे में बताना हो तो मैं प्रस्तावना से लेकर उस तत्व की खोज, भौतिक और रासायनिक गुणों और जीवन के विविध क्षेत्रों में उपयोग समेत सब कुछ एक साथ सुनाता चला जाता था। अंत में पूरा पाठ खत्म होने पर ही रुकता था। यहाँ तक कि रासायनिक क्रियाओं के फार्मूले भी मुझे याद हो जाते थे और मैं बिना लिखे, उन्हें मौखिक ही सुना देता था।
कुलश्रेष्ठ जी मेरी इस विचित्र स्मरणशक्ति से प्रभावित थे। इसलिए अकसर दो-चार विद्यार्थियों से पूछने के बाद मुझसे कहते, “हाँ चंदपकाश, अब तुम सुनाओ।” मैं सुनाता तो थोड़ी देर ध्यान से सुनते और फिर कक्षा से बाहर दूसरे अध्यापकों के साथ गपशप में व्यस्त हो जाते थे। उन्हें यकीन था कि मैं जिस लय-गति में बोल रहा हूँ, बोलता ही रहूँगा। क्लास के सारे बच्चे भी तब तक शांत बैठे रहेंगे। और सचमुच ऐसा ही होता था।
कुलश्रेष्ठ जी के कारण मैं अपनी पूरी क्लास में चर्चित हो गया था। पर इसके साथ ही मेरे आगे एक चुनौती भी खड़ी हुई कि मुझे हर पाठ रोजाना याद करके कक्षा में जाना है। वरना कुलश्रेष्ठ जी ने बोलने के लिए खड़ा कर दिया तो मैं क्या सुनाऊँगा? इससे रोज का पाठ रोज पढ़ लेने और साथ ही उसे अच्छी तरह याद कर लेने का अभ्यास हुआ। यह चीज आगे मेरे बहुत काम आई।
कुलश्रेष्ठ जी हमारे कॉलेज में बहुत समय नहीं रहे और छह-आठ महीनों बाद ही वापस मैनपुरी के क्रिश्चियन कॉलेज में चले गए। शायद पालीवाल इंटर कॉलेज का गंभीर और बहुत ज्यादा अनुशासित वातावरण उन्हें पसंद नहीं आया। पर इसे कैसे भूलूँ कि उनके कारण विज्ञान पढ़ने में मेरी गहरी रुचि पैदा हुई। जो कुछ पढ़ता था, उसे मैं अच्छी तरह समझकर याद भी कर लेता था। इससे हाईस्कूल में ही विज्ञान की नींव मजबूत हो गई और चीजों को देखने-समझने का एक वैज्ञानिक दष्टिकोण भी बनना शुरू हुआ। इसके लिए मैं सी.पी. कुलश्रेष्ठ जी का सचमुच आभारी हूँ।
विज्ञान के जिन दूसरे अध्यापक की चर्चा करने जा रहा हूँ, उनका नाम तो इस समय याद नहीं आ रहा, पर इतना जरूर ध्यान आ रहा है कि वे कोई अग्रवाल थे, शायद अनिल अग्रवाल रहे हों। अवस्था अधिक न थी। शायद नई-नई ही बी.एस-सी. या एम.एस-सी. की डिगरी लेकर पढाने आए होंगे। वे सी.पी. कुलश्रेष्ठ की तरह देखने में रोबीले और भारी-भरकम नहीं, बड़े हलके-फुलके और छरहरे शरीर के थे। किसी ताजगी से भरे नवयुवक की तरह। उनके पढ़ाने के ढंग में भी यही ताजगी और नयापन था। इसलिए जो कुछ वे पढ़ाते, हम बहुत ध्यान से सुनते थे और वह उसी समय मन में उतरता जाता था। विज्ञान के ये नवतरुण अध्यापक खास तौर से भौतिक विज्ञान और वनस्पति विज्ञान पढ़ाते थे और इतने जीवंत ढंग से पढ़ाते थे कि हम सारे बच्चे उनके मुरीद थे। 
मुझे याद है कि एक बार फूलों के परागण को समझाने के लिए वे कक्षा में गुड़हल का फूल लेकर आए थे, और फिर उसके अलग-अलग हिस्से दरशाते हुए उन्होंने इतने अच्छे ढंग से फूलों के परागण की बात समझाई थी कि उसे मैं फिर कभी भूल नहीं पाया। हो सकता है कि गुड़हल का लाल सुर्ख फूल मैंने पहले भी कभी देखा हो, पर उस पर मेरा ध्यान न गया हो। पर जिस दिन उन्होंने गुड़हल के जरिए फूलों के परागण का पाठ पढ़ाया, उस दिन से गुड़हल का फूल मेरे लिए बहुत खास फूल बन गया, जिसे भूल पाना मेरे लिए कतई संभव न था। बल्कि सच पूछिए तो आज भी गुड़हल का फूल देखते ही मुझे अपने उन्हीं प्यारे विज्ञान अध्यापक की याद आती है, और मैं मन ही मन आदर से उन्हें नमस्कार कर लेता हूँ।
मेरे ये पसंदीदा विज्ञान अध्यापक कभी-कभी विज्ञान का कोई पाठ पढ़ाते हुए हमें उस सिलसिले में विज्ञान के नई-नई आविष्कारों और आधुनिकतम खोजों के बारे में भी इतने आकर्षक ढंग से पढ़ाते थे कि कई बार अचरज के मारे हमारे मुँह खुले के खुले रह जाते थे। मुझे याद है कि एक बार ध्वनि के बारे में पढ़ाते हुए उन्होंने बताया कि ध्वनि की तरंगें कभी नष्ट नहीं होती और बाद में वे अंतरिक्ष में जाकर सुरक्षित हो जाती हैं। इसलिए ध्वनियों के परीक्षण के ऐसे उपकरण बनाने के बारे में सोचा जा रहा है, जिससे कि बरसों बाद भी हम जान सकेंगे कि फलाँ दिन फलाँ आदमी ने कौन सी बात कही थी और उसके ठीक-ठीक शब्द क्या थे। फिर अपनी बात को और अधिक विस्तार देते हुए वे महाभारत काल तक जा पहुँचे। बोले, “इसी तरह हजारों बरस पीछे जाकर हम यह पता लगा सकते हैं कि महाभारत युद्ध के समय भगवान कष्ण ने अर्जुन को गीता का क्या उपदेश दिया था। उनके ठीक-ठीक शब्द क्या थे, उनका भी पता चलाया जा सकता है।”
कहाँ हजारों बरस पहले का महाभारत और कहाँ विज्ञान की नव्यतर खोजें। पर हमारे विज्ञान अध्यापक ने जिस तरह दोनों को जोड़ा था, उससे हम लोग चकित रह गए। इसी तरह पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत को समझाते हुए उन्होंने कहा कि महाभारत में भीम के बारे में कहा जाता है कि वे हाथियों को उठाकर इतने वेग से फेंकते थे कि वे ऊपर आसमान में ही घूमते रहते थे, नीचे नहीं आते थे। उन्होंने बताया कि पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से कहीं अधिक वेग से कोई चीज आकाश में फेंकी जाए, तो वह आकाश में ही घूमती रहती है, नीचे धरती पर नहीं आती। इसी सिलसिले में उन्होंने रॉकेट आदि के बारे में भी बताया था। हमारे लिए ये सब चीजें इस कदर नई और अचरज भरी थीं कि हम बड़े कौतुक से उन्हें सुना करते थे।
कहना न होगा कि विज्ञान के मेरे ये प्रिय अध्यापक देखने में काफी सुंदर और स्मार्ट थे और उनकी बातें ही नहीं, उनकी अदाएँ भी हमें मोहती थीं। गरमियों में वे अकसर शोख रंग की आधी बाँहों की शर्ट पहने नजर आते, जिसमें वे काफी खिले-खिले से लगते थे। सर्दियों में गहरे रंग की शर्ट पर आधी बाँहों के हलके पीले रंग के स्वेटर में हम उन्हें अकसर देखते थे। हमारे कॉलेज में ही विज्ञान के एक और अध्यापक दीक्षित जी थे, जो उनके मित्र थे। अकसर एक का स्वेटर हम कल किसी दूसरे को पहने हुए देखते तो किंचित उत्सुकता और कौतुक से भर जाते थे। फिर इस बात की चर्चा भी किसी गूढ़ भेद की तरह होती थी कि देखो, आज इन्होंने वही स्वेटर पहना है जो कल दीक्षित जी ने पहना था। 
सचमुच यह वह दौर था, जब अध्यापक ही हमारे सबसे प्रिय हीरो थे और उनसे जुड़ी हर चीज हमें रहस्यपूर्ण और मनोहारी लगती थी। आज मेरे ये प्रिय विज्ञान अध्यापक कहाँ होंगे, नहीं जानता। पर उन्हें याद करते हुए मन सचमुच किशोर वय की अजब सी भूलभुलैया में खो जाता है, जिसे समझ पाना आज भी मेरे लिए बहुत मुश्किल है।
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इसके साथ ही पालीवाल इंटर कॉलेज के हिंदी के दो अध्यापकों का जिक्र तो होना ही चाहिए, जिनके बगैर यह वृत्त पूरा नहीं हो सकता। इनमें एक थे साहित्यप्रकाश दीक्षित और दूसरे जगदीशचंद्र पालीवाल। दोनों कवि-मना व्यक्ति और हम छात्रों में भी साहित्यकार होने की उत्कट कामना जगाने वाले। मुझे याद है कि इन दोनों ही अध्यापकों में कुछ अलग-सी कविताई ठसक थी, जो बाकी के अध्यापकों में न थी। यह चीज मुझे मोहती थी और मैं कुछ-कुछ चकित हुआ-सा, चुपके-चुपके उनके व्यक्तित्व के ऐसे कोणों और रेखाओं का अध्ययन किया करता था। मेरे बड़े भाईसाहब जगननाथ विग, जो हिंद लैंप्स फैक्टरी में इंजीनियर थे, उन दोनों के सहपाठी रहे थे। लिहाजा ये दोनों ही अध्यापक थोड़ी तारीफ और थोड़ी स्पृहा के साथ कहा करते थे, “देखो विग, तुम्हारे भाई तो इंजीनियर हो गए और हम यह फालतू की मास्टरी कर रहे हैं!”
तब उनकी वेदना और बातों के अर्थ समझ में न आते थे, पर आज आते हैं। इनमें से एक यानी जगदीशचंद्र पालीवाल तो विशुद्ध अध्यापक ही बने रहे, पर साहित्यप्रकाश दीक्षित ने अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को आकार देने के लिए राजनीति का रास्ता चुना। उन्होंने दो-एक दल भी बदले। पर राजनीति की अपनी शर्तें होती हैं, वहाँ लेखक या साहित्यकार होने के क्या मानी? दीक्षित जी भाषण-कला में माहिर थे। लिहाजा थोड़े-बहुत गुब्बारे उन्होंने फुलाए, पर आखिर में वही हुआ जो होना था। घाघ और तिकड़मबाज राजनीतिबाजों के आगे उनके सारे गुब्बारे फुस्स हो गए और वे बुहारकर एक कोने में सरका दिए गए। कवि-साहित्यकार होने के नाते उन्होंने जो थोड़ी सामाजिक प्रतिष्ठा कमाई थी, वह भी दाँव पर लग गई।
इसी के साथ शिकोहाबाद में रंग जी, यानी हिंदी के जाने-माने कवि-गजलगो बलबीर सिंह ‘रंग’ का एम.एल.ए. का चुनाव लड़ना भी याद आता है जिसमें कविताई और भाषणों के बड़े अजब-गजब रंग थे। इस चुनाव का काफी कुछ संचालन साहित्यप्रकाश दीक्षित ही करते थे। वे भाषण बड़े जोरदार देते थे। इतने जोशीले कि वीर रस उसके शब्द-शब्द में समाया रहता था। इसी में कई बार बड़ी अजीब सी चूकें हो जाती थीं। जैसे एक भाषण में उन्होंने बार-बार कहा कि “हमारी सीमा पर जवान जान पर हथेली रखकर लड़े...!”
बाद में उनका ध्यान किसी ने मुहावरे के गलत इस्तेमाल की ओर खींचा कि जान पर हथेली नहीं, हथेली पर जान होना चाहिए। इस पर पहले तो वे थोड़ा शर्मिंदा हुए, पर फिर अगले ही क्षण बड़ी मासूमियत के साथ बोले कि “जान पर हथेली हो या हथेली पर जान, इससे क्या फर्क पड़ता है? आप तो एक बात बताइए कि वीर रस प्रकट हुआ कि नहीं!” सुनने वाले को सचमुच मजा आ गया।
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हिंदी के बाद चलिए, अब भूगोल की बात की जाए, जिससे देश-दुनिया का रंग-रूप और मिजाज समझ में आता है। भूगोल के हमारे अध्यापक का नाम क्या था, यह तो अब याद नहीं। पर हाँ, हम सब लोग उन्हें थोड़ा परिहास में ‘श्रीमान मिसिसिपी मिसौरी’, कहकर बुलाते थे। वाह जी, क्या अद्भुत किस्म के अध्यापक थे वे और कितने सक्रिय, बल्कि कहना चाहिए कि ‘अति सक्रिय’ कि लगातार हड़काए रखते थे कि यह पढ़ो, वह पढ़ो वरना ये हो जाएगा, वो हो जाएगा! इससे पहले जो सज्जन हमें भूगोल पढ़ाते थे, वे बेहद निष्क्रिय थे, और उनकी क्लास में हमें उबासियाँ आती थीं। यों हमारी किस्मत, कि भूगोल विषय में मि. निष्क्रिय के बाद हमें मिले मि. अति सक्रिय। इसमें शक नहीं कि भूगोल इनकी साँस-साँस में बसा हुआ था, और भीतर रक्त की जगह भी शायद भूगोल ही बहता था। शायद इसलिए भूगोल के ये हमारे नए अध्यापक पूरा जोर लगाकर, बल्कि कहना चाहिए कि एड़ी से चोटी तक का जोर लगाकर, पढ़ाया करते थे। बड़ी ही गंभीरता से। 
पढ़ाते समय उनकी बड़ी-बड़ी आँखें हमें कुछ और बड़ी लगती थीं और हम पूरी तरह उनके प्रभाव में आ जाते थे। भूगोल के लिए निस्संदेह फिर से उन्होंने हमारे मन में रुचि पैदा कर दी। उनमें बस एक ही गड़बड़ थी कि अपनी अति सक्रियता में वे हमें भी हर वक्त भूगोल में ही लपेटे रहना चाहते थे, जबकि हमारे पास पढ़ने के लिए और विषय भी थे। 
हमारे भूगोल के ये नए अध्यापक चाहते थे कि हम भूगोल पढ़ें, भूगोल पढ़ें और बस भूगोल ही पढ़ें। इसलिए कि भूगोल से अधिक महत्वपूर्ण विषय कोई और हो ही नहीं सकता। रास्ते में आते-जाते हुए कहीं मिलने पर भी वे पास बुलाकर पूछ लिया करते थे कि तुमने यह पाठ याद किया कि नहीं? और हमारे मुँह से न सुनते ही बड़ी गंभीरता से समझाने लगते थे कि अगर हमने यह पाठ याद नहीं किया, तो क्या-क्या अनर्थ हो सकता है। इसलिए आज घर जाकर हमें पहला काम यही करना चाहिए कि भूगोल का वह पाठ हम फौरन याद कर लें। उनके सामने हाँ कहने पर ही मुक्ति मिलती थी। 
इसमें संदेह नहीं कि भूगोल के हमारे नए अध्यापक अद्भुत उत्साही थे और आज भूगोल की जो भी थोड़ी-बहुत समझ मेरे भीतर है, उसका श्रेय उन्हीं को जाता है। हाँ, उनकी एक आदत बड़ी विचित्र थी। संसार की प्रमुख नदियों के बारे में पढ़ाते हुए जब वे शायद अमेरिका की नदी मिसिसिपी और उसकी सहायक नदी मिसोरी के बारे में पढ़ाते थे, तो अपने पूरबी लहजे के कारण इतना जोर लगातार मिसौरी का ‘मिसौs...री’ जैसा उच्चारण करते थे कि बहुत से विद्यार्थियों को अपनी हँसी रोकने के नीचे देखना पड़ता। आखिर हमारी क्लास के बहुत सारे प्रतिभावान बच्चों को विवश होकर उनका नाम ही रखना पड़ा, ‘मि. मिसिसिपी मिसौरी’। वाह, क्या अद्भुत नाम है! में समझता हूँ, आप मुझसे सहमत होंगे।
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प्रकाश मनु
545 सेक्टर-29, फऱीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008
चलभाष: 09810602327
ईमेल: prakashmanu334@gmail.com

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