भारतीय संस्कृति: सार्वभौमिक मूल्यों की संस्कृति

पद्मश्री डॉ. रवीन्द्र कुमार

रवीन्द्र कुमार

पद्मश्री और सरदार पटेल राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित डॉ0 रवीन्द्र कुमार भारतीय शिक्षाशास्त्री एवं मेरठ विश्वविद्यलय, मेरठ (उत्तर प्रदेश) के पूर्व कुलपति हैं।

भारतीय संस्कृति सनातन मूल्यों पर आधारित है। सनातन मूल्य शाश्वत हैं। इसीलिए, इन मूल्यों से जुड़े रहना अपरिहार्य है। ये सर्वकालिक और सदा प्रासंगिक हैं। सर्वकल्याणकारी हैं। व्यक्तिगत से सार्वभौमिक स्तर तक व्यवस्था के सुचारु संचालनार्थ इन सनातन-शाश्वत मूल्यों से मानवता अपने को पृथक नहीं कर सकती। हजारों वर्षों से विशुद्धतः सनातन मूल्यों से बंधी भारतीय संस्कृति किसी भी प्रकार के भेदभाव के बिना वृहद् मानव-कल्याण को समर्पित रही है। भारतीय संस्कृति पर बारम्बार आक्रमण हुए। आक्रान्ताओं-आततायियों-धर्मान्धों, आन्तरिक व बाह्य, दोनों, ने हिन्दुस्तान के मूल सांस्कृतिक स्वरूप को छिन्न-भिन्न करने के अनेक प्रयास किए। लेकिन वे सदैव ही विफल हुए। भारतीय संस्कृति का वैभव तथा गौरव अक्षुण्ण है। अपने मूल स्वरूप में भारतीय संस्कृति सारे संसार के लिए आज भी अनुकरणीय है।

             भारतीय संस्कृति जिन आधारभूत सनातन-शाश्वत मूल्यों अथवा प्रमुख विशिष्टताओं पर आधारित है, उनमें एक ही स्रोत से उत्पन्न या प्रकट प्राणिमात्र के प्रति सक्रिय सद्भावना रखना, स्वाभाविक मानव-समानता को स्वीकार करना, वृहद् सजातीय सहयोग और सौहार्द द्वारा नित-नूतन करने के दृढ़ संकल्प के साथ ही समावेशी भावना रखते हुए, अनेकता में एकता के साथ विकास मार्ग पर निरन्तर आगे बढ़ना सम्मिलित है। ये ही सनातन मूल्य भारत की संस्कृति की वे प्रमुख विशेषताएँ भी हैं, अथवा भारतीय संस्कृति के वे आधारभूत गुण हैं, जिसके बल पर वह इस देश की एकता को अक्षुण्ण बनाए रखने का मार्ग प्रशस्त करती है। डॉ0 भीमराव आम्बेडकर जैसे व्यक्तित्व ने भी न केवल भारतीय संस्कृति के इस वास्तविक तथ्य को स्वीकार किया, अपितु भारत की संस्कृति को अद्वितीय और महान मानते हुए हिन्दुस्तान के राष्ट्रवाद को भी इसी के दर्पण में देखा। डॉ0 आम्बेडकर (जीवनकाल: 1991-1956 ईसवीं) ने कहा था, “इस (भारतीय) प्रायद्वीप को छोड़कर संसार का कोई देश ऐसा नहीं है, जिसमें इतनी सांस्कृतिक समरसता हो। हम केवल भौगोलिक दृष्टि से ही सुगठित नहीं हैं, अपितु हमारी सुनिश्चित सांस्कृतिक एकता भी अविच्छिन्न और अटूट है, जो पूरे देश में चारों दिशाओं में व्याप्त है।“

     अति कठिन समय में, जब भारत विदेशी शासनाधीन था, उस समय भी भारतीय संस्कृति ने देश में राष्ट्रवाद की अलख जगाने और देशवासियों को अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष हेतु एकबद्ध करने में अतिमहत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया। 15 अगस्त, 1947 ईसवीं को अँग्रेजी दासता से मुक्ति के उपरान्त सरदार वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व में हिन्दुस्तान के एकीकरण का विशाल कार्य एक बड़ी सीमा तक, जैसा कि मेरा मानना है, देश की साझी सांस्कृतिक विरासत, जो विभिन्न रूपों में भारत की एकता और इसकी आवश्यकता का आह्वान करती है, के कारण ही सम्भव हो सका। इस वास्तविकता को स्वयं सरदार वल्लभभाई पटेल के एक अपील के समान उस वक्तव्य से भली-भाँति समझा जा सकता है, जिसे उन्होंने 5 जुलाई, 1947 ईसवीं को भारत की भौगोलिक-राजनीतिक एकता के महान यज्ञ को प्रारम्भ करते हुए जारी किया था। अपने ऐतिहासिक वक्तव्य में सरदार पटेल ने कहा था कि यह देश अपनी संस्थाओं के साथ यहाँ बसने वाले लोगों की गौरवशाली विरासत है। यह एक दुर्घटना है कि कुछ (देशी) राज्यों में रहते हैं और कुछ ब्रिटिश भारत में, लेकिन सभी समान रूप से इसकी संस्कृति (जो विविधताओं में एकता की प्रतीक है) और चरित्र का भाग हैं। हम सब रक्त और भावनाओं के साथ बंधे हुए हैं...कोई भी हमें खण्डों में विभाजित नहीं कर सकता है; हमारे मध्य कोई अगम्य अवरोध स्थापित नहीं किया जा सकता है...मैं अपने मित्रों, (देशी) राज्यों के शासकों और लोगों को आमंत्रित करता हूँ (कि वे) एक संयुक्त प्रयास हेतु मित्रता और सहयोग की भावना के साथ आगे आएँ...अपनी मातृभूमि (उसकी एकता, अखण्डता, पुनर्निर्माण, सुरक्षा और समृद्धि) हेतु साझी निष्ठा से प्रत्येक की भलाई के लिए कार्य करें।

     साथ ही, विचारों में तालमेल (दृष्टिकोण सामंजस्य), सहनशीलता, शुद्ध हृदयता और प्रत्येक सर्वकल्याणकारी व अच्छे विचार को हर स्रोत से (भले ही वह बाह्य भी हो) स्वीकार करने एवं अपने में समाहित करने की प्रकृति (जो मूल भारतीय दर्शन के केन्द्र में विद्यमान है एवं जिसने हिन्दुस्तानी संस्कृति को भी अत्यधिक प्रभावित किया) भारतीय संस्कृति की प्रमुख विशिष्टताओं में सम्मिलित हैं। यही कारण है कि "वसुधैव कुटुम्बकम्" के साथ ही "सर्वे भवन्तु सुखिनः", "सर्वँ  शान्ति" तथा "लोकानुकम्पाय” जैसे सर्वकल्याणकारी उद्घोष, एवं "जियो और जीने दो" जैसी अद्वितीय कामना भारतीय संस्कृति के प्रमुख सन्देशों के रूप में प्रकट होती है। विशेष रूप से, इन्हीं विशिष्टताओं के कारण भारतीय संस्कृति समस्त संसार के लिए आकर्षण का केन्द्र बनी। विश्वभर के विभिन्न भागों के लोगों ने सहिष्णु, सहनशील और समावेशी संस्कृति के देश भारत में अपना सुरक्षित और विकासोन्मुख भविष्य देखा। गत अनेक शताब्दियों में विश्व के अनेक देशों के वे मानव-समूह समय-समय पर भारत-भूमि पर पहुँचे, जिनके अस्तित्व पर स्वयं उनके अपने ही देशों में प्रश्नचिह्न लगा था; जिन्हें अपनी-अपनी जन्मभूमि पर उत्पीड़ित किया गया और उन्हें गम्भीर रूप से प्रताड़ित होना पड़ा था। ऐसे लोग भारत जब पहुँचे, तो इस देश की संस्कृति ने उन्हें आत्मसात कर लिया। उन्हें भारत-भूमि पर प्रेम और सम्मान मिला। उनकी परम्पराओं, रीतियों और मान्यताओं को पूरी सुरक्षा मिली। उन्हें भी फलने-फूलने के समान अवसर मिले।

सनातन-शाश्वत मूल्यों पर आधारित भारतीय संस्कृति की शक्ति अथाह है। देश की एकता के निर्माण व राष्ट्र के विकास में, और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की प्रतिष्ठा स्थापित करने में इसकी भूमिका अतिमहत्त्वपूर्ण है। भारतीय संस्कृति अपने अनुयाइयों से उक्त उद्घोषों के अनुरूप सनातन-शाश्वत मूल्यों पर अडिग रहने की अपेक्षा रखती रही है। इन मूल्यों की रक्षा के लिए समर्पित होकर व्यवहार-संलग्नता हेतु आह्वान के साथ मार्गदर्शन देती रही है। भारतीय संस्कृति का आज भी विशेष रूप से हिन्दुस्तानियों के लिए प्रबल कामना के साथ यही निर्देश है। भारतीय संस्कृति के आह्वान को हमें अपने हृदयों में उतारना है, इसके मार्गदर्शन में, इसके निर्देशानुसार आगे बढ़ना है, और भारत को विश्वगुरु के रूप में प्रतिष्ठित करना है।

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*पद्मश्री और सरदार पटेल राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित डॉ0 रवीन्द्र कुमार भारतीय शिक्षाशास्त्री एवं मेरठ विश्वविद्यलय, मेरठ (उत्तर प्रदेश) के पूर्व कुलपति हैं।
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