कहानी: बहती लोर

श्यामल बिहारी महतो

- श्यामल बिहारी महतो

खैरी गैया की आँख से बहते आँसू देख अचानक से बासु चौंक उठा था। तत्काल उसे समझ में नहीं आया कि वो उसको देख रोने लगी है या पहले से ही रो रही थी। सुबह उसकी श्रीमती जी ने उसे घर के बाहर एक खूँटे से बांध कर थोड़ी सी पुआल उसके सामने डाल दी थी। जिसे खाना तो दूर उसे उसने सूंघा तक नहीं था। पुआल ज्यों का त्यों एक तरफ पड़ा हुआ था। बासु सोच में पड़ गया, यह पुआल खा क्यों नहीं रही है? पहले तो ऐसा नहीं देखा गया। फिर आज इसे क्या हुआ? बार-बार उसकी ओर इस तरह क्यों देख रही है? बासु का मन व्याकुल हो उठा, उसके अंदर सवाल उठना स्वाभाविक ही था। घर आकर उसने पत्नी से कहा, “अरी, सुनती हो, खैरी गैया को बाहर काहे बांध दिया? पुआल खाने की बजाय टपर-टपर आँसू बहा रही है! सीधे-सीधे कहें तो रो रही है। और यहाँ भूतनिया मजे से लपसी (मकई घठा) सना कुटी खा रही है! "
"क्या कहा, ओ रो रही है? नहीं-नहीं, उसकी आँख लोरा रही होगी, तुमको लगा, रो रही है।" पत्नी ने कहा।
"मुझे लगा, बाहर बांध दी है, रूखा-सूखा पुआल खाने दे दी है, सो रो रही है।" 
खैरी गैया की आँख से बहते आँसू देख बासु को अकस्मात अपनी स्वर्गीय माँ की याद आ गई। जिसे गुजरे कई बरस बीत चुके थे। पर बासु को लगता आज भी माँ की वजूद घर के कोने-कोने में मौजूद है और मरने के बावजूद बेटे पर उसकी नजर है। आज भी गाँव में लोग चर्चा करते और कहते हैं कि माँ बेटा दोनों शरीर से भले अलग हुए है, पर मन से आज भी दोनों एक दूसरे से बातें करते है, बतियाते है। माँ की कृपा से ही बासु हर मुसीबत से बचता आ रहा है। माँ की आशिर्वाद से वह उस दिन ट्रक से धक्के खाकर भी सही-सलामत बच गया था। हेल्मेट ने भी सर को फटने से बचा लिया था, वरना ऐसे धक्के से लोग कहाँ बच पाते हैं। ऐसा गाँव में लोग आज भी चर्चा करते हैं। सो आज भी बेटा माँ की पूजा करता है। जब वह जीवित थी तभी एक दिन उसी मैया को बेटे ने चुपके से रोते देख लिया था और वह काँप उठा था। कहाँ कमी हुई सेवा में? किस वेदना ने माँ को रुला दिया? तत्काल उसके मन में कई सवाल उठे थे। तुरन्त माँ के रोने का उसे पता नही चल सका था। बहुत पूछने पर भी माँ ने केवल इतना ही कहा था, "कुछ बात नाय है बेटा आँख में खटिका (तिनका) घुस गया था, उसी से लोरा रहा था।" 
माँ की कही बातों पर बासु को जरा भी यकीन नहीं हुआ था। उसे लगा माँ उससे कुछ छिपा रही है। बासु रोजाना आठ बजे काम पर निकल जाता था। चलकरी के एक ग्रामीण बैंक में वह रोकड़िया था। उसके पीछे घर में क्या कुछ होता था। शाम को घर लौटने पर ही कुछ-कुछ वह जान पाता तो कुछ से अनजान ही रह जाता था। सो महीना-दिन बाद भी वह माँ के आँसू का सही कारण जान नहीं सका जोकि जानना उसके लिए बेहद जरूरी था। तब उसने एक चाल चली। उसको जो अंदेशा था। जिस बात की तरफ उसका मन बार-बार दौड़ लगा रहा था। उसे वह अपनी आँखों देखना चाहता था। पत्नी की भी परख करनी थी। शादी हुए दोनों का दस साल गुजर गया था। परखने का उसे कभी मौका नहीं मिला था। 
 माँ का खाने का समय उसे पता था। बिना नहाए धोए वो अनाज का एक दाना भी मुँह में नहीं डालती थी। यह उसकी बहुत पुरानी आदत थी। उसके जन्म जैसी पुरानी।
 उस दिन वह काम के नाम पर घर से निकला तो जरूर परन्तु काम पर गया नहीं और मोटरसाइकिल गाँव के पोस्ट ऑफिस के सामने खड़ा कर पुनः वापस घर लौट आया और पिछवाड़े वाले रास्ते से घर में चुपके से समा गया। उसका अनुमान और अंदेशा दोनों सही निकला। जब घर के ढाबे में अचानक उसने कदम रखा। और माँ को बासी रोटी-सब्जी खाते देखा तो उसका पूरा वजूद हिल उठा। माँ उसके लिए सारा जहाँ थी। माँ खुश तो उसकी दुनिया खुश। उसका सारा संसार खुश! उसके आगे कोई तीरथ, कोई धाम-वाम नहीं। सारे तीर्थों की धाम उसकी माँ थी। ऐसा वह कहता और मानता भी था। बासु जब आठ-दस साल का था तभी बाहर मजदूरी करने गये बाप को एक ट्रक ने कुचल दिया था। उस दौर को माँ ने कैसे झेला था। बासु उस घटना को याद कर आज भी रो पड़ता है। दूसरों के खेत-खलिहानों में काम कर माँ ने बड़ी उम्मीद से उसे पढ़ाया लिखाया था। बेटे के प्रति माँ की अनजान हसरतें उसे हमेशा कुछ नया करने को उत्प्रेरित करती थी। तब वह अक्सर कहा करती "बस बेटा दुनियादारी के काबिल हो जाए।"
कभी-कभार तो वह खुद नहीं खाती पर बेटे को कभी भूखों सोने नहीं देती थी। बासु जैसे-जैसे बड़ा होता गया, उसकी दिमाग समझदार होता गया। कभी उसने माँ से ऐसी कोई मांग नहीं की, जिसे पूरा करने के लिए माँ सावित्री महतवाईन को किसी के आगे गिड़गिड़ाना पड़े। कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी उसने कभी माँ को रोते हुए नहीं देखा था। सारा गाँव गवाह था। माँ-बेटा, दोनों एक दूसरे के लिए हवा-पानी जैसे थे। उसी माँ को बासी खाना देकर आरती ने जैसे पहाड सा गुनाह कर दिया था। उस दिन अचानक बेटे को सामने पाकर माँ भी मुँह चलाना भूल गई। सब्जी से लिपटी रोटी वाले हाथ, हाथ में ही पकड़ी, एकटक बेटे को देखती रही, उसे भक मार दिया था। भीतर से आवाज आई, "सावित्री, यह तुमने क्या कर लिया? जिस बेटे को पालन-पोषण करने, उसकी पढ़ाई-लिखाई के लिए हर मुसीबत को हँसते-हँसते झेला, पर कभी उफ्फ तक नहीं की और आज एक मामूली सी बासी रोटी-सब्जी ने तुम्हें रुला दिया? तुम बहू से बोल कर साफ मना कर सकती थी। बहू तो तुम्हारी ही पसंद की थी। इसी बहाने उसकी परीक्षा भी हो जाती, वो तुम्हें कितना मानती है? तुम्हारी सेहत का उसे कितना ध्यान है? ऐसा न कर तुम मन ही मन घुटने लगी? 
 
"यह मैंने क्या कर लिया?" सावित्री महतवाईन बुदबुदा उठी थी।
“आरती..आरती..!" उधर बासु चीखा था।
"क्या हुआ ? अरे, आप तो काम पर गये थे। कब लौट आए?"
"मैं पूछता हूँ, रात का बचा हुआ यह खाना कब से माँ को दे रही हो? जबकि तुम्हें मालूम है। इन्हें गठिया रोग है और डॉक्टर ने इसे बासी चीज़ें खाना से मना किया हुआ है।" 
आरती ने कोई जवाब नहीं दिया। उसे तत्काल कोई उत्तर नहीं सूझा। निरुत्तर खड़ी रही। 
बहुत कम को पता था। आरती माँ की पसंद से ही इस घर में बहू बन कर आई थी। और बेटे ने उसे माँ का परसाद समझ ग्रहण कर लिया था। इसके पहले सास-बहू में कभी कोई तकरार हुई हो, घर में क्या, मुहल्ले में भी किसी को पता नहीं था। आरती सास की चहेती बहू थी। इस घर में आकर उसने आज तक ऐसा कोई काम नहीं किया था, जिससे सास-बहू में मुँह ठोना-ठानी हुई हो, या दोनों के बीच कभी मुँह बजा हो। एक स्वाभिमान सास की एक आदर्श बहू के रूप में वह पूरे गाँव में जानी जाती थी। यह बासी सब्जी-रोटी की बात अगर बाहर निकली तो उसकी छवि पर पर दाग लगना निश्चित था, “इकलौती आदर्श बहू सास को बासी खाना देने लगी।" गाँव वालों को मुँह बजाने का सुनहरा मौका मिलना तय था। जो आज तक नहीं मिला था। 
आरती को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसकी आँखों में आँसू आ गए। इससे पहले कि सावित्री महतवाईन कुछ बोले। आरती ने आगे आकर कहा, "सॉरी बासु, मैं डॉक्टर वाली बात भूल गई थी। आगे से ऐसी गलती नहीं होगी। आई प्रॉमिस!"
"आसु, आज भी मैं तुम्हें बहुत चाहता हूँ। लेकिन हमारे प्यार से कहीं अधिक ऊँचा माँ का प्यार है, इसका घर-संसार है। इनके बगैर मैं जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता हूँ। उसी माँ की आँखों में आँसू... मैं देख नहीं सकता हूँ आसु!" 
"बासु क्षमा कर दो। " आरती बासु से लिपट गई थी।
माँ बोली, “रहने दो न बेटा, इसमें बहू का कोई दोष नहीं है। जो बच जाता था, ओ फेंका न जाए सो कभी-कभार खा लेती थी। रोज थोड़े न खाती हूँ।"
"अब रात को उतनी ही रोटी-सब्जी बनाओ जितने में हम तीनों का भोजन पूरा हो जाए।"
इस तरह बासी सब्ज़ी-रोटी का गर्भपात होने से पहले सास-बहू ने मूल घाव का ही इलाज कर दिया था। फिर एक बार गाँव वाले एक चटपटी खबर सुनने से वंचित रह गए थे।
 सावित्री महतवाईन की तरह खैरी गैया भी बासु के जीवन में अहम स्थान रखती थी। दोनों में लगाव ही ऐसा हो गया था। लगातार ढाई साल से वह दूध देती चली आ रही थी। सुबह-शाम, दोनो टाइम। कभी एक किलो तो कभी डेढ़ किलो। दूध देने से कभी उसने मना नहीं की। कभी किसी को लात नहीं मारी, न दुहते वक्त कभी टांग उठाई। कोई भी उसका दूध निकाल ले, उसने कभी कोई आपत्ति नहीं की। गाय का ढ़ाई साल का बेटा मंगरा अब दूसरी गाय-बछियों के पीछे दौड़ने लगा था। उन्हें चाटने-सूंघने लगा था। कभी-कभी उसकी माँ उसका कान-कपार चाटती और शायद समझाने की कोशिश करती, कहती, "अभी से ही इस तरह मत दौड़ा करो, गिर बजर जाओगे, शरीर का नुकसान होगा।"
पर मंगरा माँ की बात नहीं मानता और उल्टे वह माँ की गर्दन पर ही अपने दोनों पैर लाद देता और "ओं! ओं! " करने लगता था। माँ उसे झिड़क देती थी। ठिसुआ कर वह माँ का मुँह चाटने लगता था।
पिछले माह से वही खैरी गैया ने दूध देना बंद कर दिया था और ठीक उसके चार दिन बाद भूतनिया ने एक बछड़े को जन्म दी। भूतनिया खैरी गैया की ही बेटी थी। पर उसका मन-मिजाज बिलकुल ही अलग था। माँ को आँख और सींग दिखाती और दूर-दूर भगाती। बेटी होकर भी माँ को अपने साथ खाने नहीं देती थी। फिर क्या, आरती ने पागहा (जोरंड़) और जगह दोनों का बदल दी। जहाँ पहले खैरी गैया बंध कर लपसी-कुटी खाया करती थी, अब उसकी जगह और खानपान भूतनिया ने हथिया ली और खैरी गैया को बाहर जाना पड़ा था। और यह सब दूध का लेन-देन को लेकर हुआ था। तभी से खैरी गैया उदास-उदास रहने लगी थी। बाहर चरने भी जाती तो बाकियों को उधर ही छोड़कर अकेले घर लौट आती थी। और दरवाजे के बाहर खड़ी होकर टुकुर-टुकुर ताकती रहती और अच्छे दिन को याद कर मन ही मन रोती रहती। परन्तु उसका रोना घर में अब किसी को नहीं दिखता। अगर बासु घर में होता तो तुरंत उसे नमक-पानी पीने को मिल जाता। वह एक ही साँस में सारा पानी पी जाती और तब सामने खड़े बासु के हाथ खुशी-खुशी चाटने लगती थी। यह सब बासु को बहुत अच्छा लगता। खैरी गैया को वह भी बहुत पसंद करता धा। यदा-कदा अपने हाथों उसे कुछ न कुछ खिलाते रहता था। कभी रोटी, कभी जूठन भात। खैरी गैया मजे से खाती। मंगरा की तरह आखिर बासु भी तो उसका दूध कई बरसों से पीता आ रहा था। सो खैरी गैया के प्रति बासु का लगाव माँ जैसा ही था। लेकिन बासु हर वक्त घर में नहीं होता। काम से लौटकर वह संध्या घूमने चला जाता था। ऐसे में घर लौटी खैरी गैया की आँखें अक्सर बासु को ढूंढती, उसकी तलाश करती थी। लेकिन बासु को न पाकर वह यदा कदा निराश भी हो जाती थी।
 थोडी देर बाद आरती भी बाहर गयी और खैरी गैया के झर-झर बहते आँसुओं को देख आयी। फिर घर आकर उसने बासु से कहा " सचमुच खैरी गैया रो रही है! पुआल तो उसने खाया ही नहीं!"
बासु से खड़ा रहा नहीं गया। उसे लगा बाहर खैरी गैया नहीं, माँ रो रही है! माँ की कही बात याद आने लगी "माय और गाय को कभी रूलाना नहीं, बड़का जबर हाय लगेगा!" 
 खैरी गैया में बासु को माँ चेहरा दिखने लगा। वह बाहर की ओर दौड़ पड़ा। खैरी गैया ने ड़बड़बाई आँखों से बासु को आते देखा। वह पूंछ हिलाने लगी और पैर आगे-पीछे करने लगी। बासु दौड़ जाकर गैया से लिपट गया। वह भी रो पड़ा। उसने झट से गैया को बंधन मुक्त कर दिया और घर ले आया। पहले उसने अलग से एक तसले में कुटी डाली, फिर बची हुई मकई लपसी उसमें डाल कर मिला दिया। खैरी गैया मजे से उसे गबर-गबर खाने लगी। उसका बहता लोर (आँसू) और भी बहने लगा। यह खुशी का लोर था। 
बासु अपनी झिलमिलाती आँखों में खैरी गैया के रूप में माँ को देख रहा था।
***

परिचय: श्यामल बिहारी महतो
जन्म: 15 फरवरी 1969, मुंगो ग्राम में बोकारो जिला झारखंड में
शिक्षा: स्नातक
प्रकाशन: बहेलियों के बीच कहानी संग्रह भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित तथा अन्य दो कहानी संग्रह बिजनेस और लतखोर प्रकाशित और कोयला का फूल उपन्यास प्रकाशित और पाँचवीं पुस्तक उबटन प्रेस में
संप्रति: तारमी कोलियरी सीसीएल कार्मिक विभाग में वरीय लिपिक स्पेशल ग्रेड पद पर कार्यरत और मजदूर यूनियन में सक्रिय।
ईमेल: shyamalwriter@gmail.com

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