ब्रज, गौड़ीय संप्रदाय एवं उसकी राधारमणीय प्रणाली: एक अनुशीलन

लक्ष्मी पाण्डेय

लक्ष्मी पाण्डेय

आई. ओ. पी. कॉलेज वृंदावन
डॉ. भीम राव आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा


शोध सारांश- ‘ब्रज’ एक ऐसा नाम है जिसके श्रवणरंध्र में प्रवेश करते ही प्रत्येक सनातनी को अनायास ही दो चित्र दिखाई देने लगते हैं। जिनमें से एक श्री कृष्ण एवं दूसरा श्री राधा किंतु ऐसा कहा संभव कि कृष्ण तो हों किंतु उनके पर्याय उनके सबसे प्रिय पाल्य गौ, गौवत्स न हों, अर्थात ब्रज की पूर्णता का पर्याय हैं राधाकृष्ण और गाय। ये तीनों ही इस धरा धाम पर प्रेम का शाश्वत प्रतीक हैं अर्थात प्रेम भक्ति के निस्वार्थ सेवा के उस भाव का पर्याय है जहाँ समस्त आसक्तियाँ शून्य हो जाती हैं। ब्रजभूमि में जिन संप्रदायों ने अपना स्थापत्य बनाया उनमें से गौड़ीय संप्रदाय ऐसा संप्रदाय है जिसमें न केवल सनातन मान्यता को मानने वालों पर अपनी छाप छोड़ी अपितु विश्व के अनेक धर्मावलंबियों को भी अपना अनुयायी बना लिया है। इसका प्रमाण यह है कि आज संपूर्ण संसार में ‘हरे कृष्ण हरे राम’ नाम संकीर्तन करने वाले साधक देखे जा सकते हैं। यह नाम संकीर्तन ही गौड़ीय संप्रदाय का मूल आधार है परंतु इस संप्रदाय में श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी जी के द्वारा विग्रह सेवा की जो नवीन प्रणाली का प्रादुर्भाव किया गया उसे संप्रदाय की राधारमणीय प्रणाली के नाम से जाना जाता है जिसका इस संप्रदाय में विशेष महत्व है।

बीज शब्द- ब्रज, गौड़ीय संप्रदाय, राधारमणीय प्रणाली, भक्ति, गोलोक, सेवा।

प्रस्तावना- ब्रजभूमि का वैश्विक महत्व उसकी भक्ति परम्परा के कारण है जिसे गौड़ीय संप्रदाय के प्रवर्तक चैतन्य महाप्रभु जी ने वैश्विक पहचान दिलायी है। नाम संकीर्तन से उत्पन्न हुआ यह संप्रदाय आज राधारमणीय प्रणाली के माध्यम से विग्रह सेवा के रूप में भी उतना ही स्वीकार्य है।

मूल शोधपत्र- ‘ब्रज’ अर्थात एक ऐसी धरा जो संपूर्ण भारतवर्ष में प्रेम के भक्ति में स्वरूप का पर्याय मानी जाती है। भगवान श्री कृष्ण की जन्मस्थली और श्री राधा रानी की प्राकट्यस्थली यह ब्रजभूमि समस्त सनातनी परंपरा को जीने वाले भक्त ह्रदयजनों के लिए न केवल हृदयांग है अपितु समस्त आध्यात्मिक चेतना का साकार स्वरूप है। सनातनी जीवनचर्या को जीने वाले व्यक्ति ब्रजभूमि को भूमि का टुकड़ा मात्र ही नहीं मानते बल्कि वह इसे भगवान श्री कृष्ण की लीलास्थली होने के कारण पवित्रता एवं आध्यात्मिक परिणति का प्रतिरूप मानते हैं। इस बात को ऐसे भी कहा जा सकता है कि कृष्णभक्तानुरागी वृंद ब्रजभूमि को बैकुंठ से भी श्रेष्ठ स्वीकार करते हैं। श्रुति परंपरा में एक उदाहरण प्रचलित है– “मुक्ति कहे गोपाल सौं, मेरी मुक्ति बताइ। ब्रजरज उड़ि मस्तक लगे मुक्ति मुक्त है जाइ।।” इस दोहे पर विचार करें तो पहली बात यह स्पष्ट है कि यह दोहा दीर्घकाल से प्रचलित है और इसके लेखक की जानकारी अनुपलब्ध है किंतु यह बात अवश्य है कि यह दोहा किसी भावविभोर संत के श्री मुख से प्रकट हुआ होगा और फिर इस दोहे के अर्थ पर दृष्टिपात करें तो स्पष्ट है की कल्पनाशील संत हृदय ने यह स्वीकार किया है कि ब्रजभूमि की रज का प्रत्येक कण उतना ही पवित्र है कि वह स्वयं मुक्ति को भी मुक्ति प्रदान कर सामर्थ्य रखता है। 

 ‘ब्रज’ शब्द के नामकरण और उसके अभिप्राय की चर्चा करें तो डॉ. प्रभु दयाल मीतल ने ‘ब्रज का सांस्कृतिक इतिहास’ नामक अपने ऐतिहासिक ग्रंथ में बड़ा ही सुंदर वर्णन किया है जो कि इस प्रकार है– “ब्रज अथवा व्रज शब्द संस्कृत धातु व्रज से बना है, जिसका अर्थ ‘गतिशीलता’ है। ‘व्रजन्ति गावो यस्मिन्नति व्रज:’ जहां‌ गायें चलती अथवा चरती हैं, वह स्थान व्रज है। कोशकारों ने ब्रज के तीन अर्थ बतलाए हैं– गोष्ठ (गायों का खिरक), मार्ग और वृंद (झुंड)– गोष्ठाध्वनिवहा व्रज: (अमर कोश) ३–३–३०। इससे भी गायों से संबंधित स्थान का ही बोध होता है। सायण में साइन ने सामान्यतः ‘व्रज’ का अर्थ गोष्ठ किया है। गोष्ठ के दो प्रकार हैं:– १– वह स्थान जहाँ गाय, बैल, बछड़े, बछियों को बांधा जाता है इसे ‘खिरक’ कहते हैं। २– वह भूमि जहां गायेँ चलती अथवा चरती हैं इसे गोचर भूमि कहा जाता है। इन सबसे भी गायों के स्थान का ही बोध होता है। इसी संस्कृत शब्द ‘व्रज’ से हिंदी शब्द ‘ब्रज’ बना है।”¹ इस प्रकार लेखक का आशय स्पष्ट है कि गौ बहुलता के कारण इस क्षेत्र का नाम ‘ब्रज’ हुआ। इस प्रकार ब्रज के शाब्दिक अर्थ की गरिमा का मूल्यांकन करने पर भी यही तथ्य सामने आता है कि ब्रज एक आध्यात्मिक और पवित्र भूमि का नाम है क्योंकि हमारे सनातन वैदिक साहित्य में ऐसी मान्यता है कि गौ–काया में तेतीस कोटि देवताओं का वास होता है। इससे इतर यदि वैज्ञानिक तथ्य को स्वीकारें तो भी यह तथ्य सर्वविदित है कि गाय जैव जगत का ऐसा प्राणी है, जिसके जीवन और मृत्यु दोनों ही उपक्रमों में उसकी प्रत्येक संबंधित सामग्री अनेक प्रकार से लाभप्रद एवं उपयोगी स्वीकृत है। अतः समग्र रूप में गौवंश की अधिकता वाला क्षेत्र गोलोक कहा जाता है और सनातन संस्कृति में गोलोक का अर्थ ईश्वर के लोक से है जहां पहुँचकर जीव समस्त बंधनों से मुक्त हो जाता है। यही कारण है कि संतों ने ब्रजभूमि के रज के स्पर्श को भी मुक्ति का कारण माना है।

 ‘ब्रज का इतिहास’ नामक शीर्षक से ‘ब्रज के रसिकाचार्य’ डॉ. अवध बिहारी लाल कपूर जी ब्रज की महिमा वर्णित करते हुए लिखते हैं– “ब्रज भारत का प्रधान तीर्थ ही नहीं यहां का प्रधान धार्मिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक केंद्र भी है। यह धर्म के आचार्य और संत महात्माओं के प्रचार का प्रमुख केंद्र साहित्य की लेखनी का प्रमुख विषय और कवियों की प्रेरणा का प्रमुख स्रोत रहा है। इसे यहां के रमणीक मंदिरों और नयनाभिराम देवमूर्तियों के रूप में स्थापत्य और शिल्पकलाओं का प्रधान आश्रय–स्थल होने का और रास नृत्य के रूप में नृत्य गीतादी ललित कलाओं की चरम अभिव्यक्ति का एकमात्र स्थान होने का गौरव प्राप्त रहा है।”² अर्थात् लेखक ने ब्रजभूमि के साथ शाश्वत वैभव तथा उसकी वर्तमान गरिमा को स्पष्ट करते हुए उसके महत्व पर प्रकाश डाला है। इसी संदर्भ में ‘रसीली ब्रजयात्रा’ नामक कृति में सुप्रसिद्ध कथा वाचिका बरसाना निवासी मर्मस्पर्शी युवा लेखिका मुरलीका शर्मा लिखती हैं कि– “ब्रजभूमि भारतीय जनमानस के आकर्षण का केंद्र रही है क्योंकि भारत की संस्कृति का यह मूल आधार है। भगवान श्री कृष्णावतरण क्षेत्र व लीलास्थली होने से करोड़ों भक्तों की आस्था भी यहां से जुड़ी है तभी तो भारत वर्ष के ही नहीं अपितु सारे संसार से श्रद्धालु यहां आते हैं, दर्शन करते हैं व इस पवित्र भूमि की परिक्रमा करते हैं परिक्रमा तो जगत–पिता ब्रह्मा ने भी की गौवत्स एवं ग्वाल–बाल हरण के पाप से निवृति के लिए की थी और वह निष्पाप हुए।”³ यह अभिकथन भी ब्रज शब्द के गौ संबंधी अर्थ को अभिव्यक्ति दे रहा है जिसे संतों ने मुक्ति का सहज साधन स्वीकारा है।

 मान्यता यह है कि भारतीय जनमानस जब विविध प्रकार की दुराचारी शक्तियों से पीड़ित था ऐसे में इन सब पीड़ाओं से विरक्ति का एकमात्र साधन ईश्वरीय तत्व चिंतन को स्वीकृति देते हुए तत्कालीन संतों ने भक्ति के मार्ग को अपनाया ऐसी मान्यता है की भक्ति का उदय दक्षिण भारत में हुआ और उसे रामानंद जी उत्तर भारत में लेकर आए इस संदर्भ में एक उक्ति बहुप्रचलित है “भक्ति द्रविड़ उपजी, लाये रामानंद” यह भक्ति जब ब्रज में आयी तो उसे इस उर्वरा भूमि में ऐसा स्नेहा सिंचन मिला कि वह फिर यहीं की होकर रह गई और फिर वृंदावन इसका स्थाई निवास स्थान हो गया। वर्तमान समय में इस तथ्य की प्रमाणिकता हेतु किसी भी प्रमाण को प्रस्तुत करने की आवश्यकता शेष नहीं है। वर्तमान समय में जो भी कोई व्यक्ति एक बार वृंदावन में आ जाए तो उसके बाद उसका शरीर भले ही वापस अपने गंतव्य पर पहुँच जाता हो परंतु हृदय सदा–सदा के लिए वृंदावन में ही छूट जाता है। इस प्रकार वर्तमान समय से ब्रजभूमि का वृंदावन क्षेत्र भक्ति का पर्याय बन चुका है। भक्ति के संदर्भ में आचार्य कृपाशंकर रामायणी श्रीमद् भागवत महापुराण के सप्तम स्कंद की टीका करते हुए ‘भक्ति महिमा’ शीर्षक के अंतर्गत एक श्लोक के अर्थ को अभिव्यक्ति देते हुए लिखते हैं कि– “श्रद्धा विश्वास पूर्वक अनन्य भाव से अपने ईष्टदेव के युगलचरणलिनो में हृदय की गाथा शक्ति को भी भक्ति कहते हैं। भक्ति की महिमा वर्णातीत है। यह भक्ति तो उन्हीं महान सुकृति भक्तों के हत्प्रदेश में अंकुरित होती है, जिनका जन्म-जन्मांतर का पूर्ण फल संचित है।”⁴ यानी कि प्रस्तुत श्लोक में भक्ति के उदय को पुण्यों को प्रताप माना गया है

 भक्ति के संबंध में ‘श्री चैतन्य चिंतन’ नामक आलोचनात्मक ग्रंथ में डॉ. भागवत कृष्ण लिखते हैं– “यह प्रश्न पूछने में जितना सरल लगता है इसका उत्तर उतना ही कठिन है। भक्ति शब्द निष्पन होता है ‘भज्’ धातु से। “भज् धातु सेवायाम” इसके अनुसार भक्ति का अर्थ सेवा है। किंतु किसकी सेवा? इन जिज्ञासाओं के उठने पर विभिन्न सेवाएं सामने आती हैं– जैसे राष्ट्र सेवा, जाति सेवा, दरिद्र सेवा अथवा प्राणी मात्र की सेवा इत्यादि। तो क्या ये सभी भक्ति के अंतर्गत आती है? क्या यही वास्तविक भक्ति है? इसका उत्तर निषेधपरक होगा। क्योंकि इन सभी में स्वार्थ निहित है अथवा मान प्रतिष्ठा की कामना निहित है। यह सेवा तो व्यापार मात्र है। शास्त्र इस ‘काम’ कह कर पुकारते हैं– “आत्मेंद्रिय प्रीति इक्षा तारे बलि काम” (श्री चैतन्य चरितामृत १/४/१४९)”⁵ उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट है की वास्तविकता में भक्ति का आश्रय सेवा से ही है परंतु यह ऐसी सेवा के लिए प्रयुक्त शब्द है जो स्वार्थ से विरत है। ऐसी सेवा केवल ईश्वरीय मार्ग से संदर्भित हो सकती है अर्थात जब एक जीवात्मा ने नि:स्वार्थ भाव से परमात्म चिंतन करता है तो उसकी यही निस्वार्थ सेवा भक्ति के रूप में परिणीत हो जाती है। यही कारण है की गौड़ीय संप्रदाय में हरिनाम संकीर्तन को सर्वोच्च स्थान दिया गया है और यह नाम संकीर्तन सेवा ही है जो गौड़ीय संप्रदाय को वैश्विक पहचान दिलाने में समर्थ हुई है। यहां स्पष्ट है कि गौड़ीय संप्रदाय का मूल नाम संकीर्तन में ही निहित है।

 गौड़ीय संप्रदाय के प्रस्तोता आचार्य श्री निमाई गौर हरि चैतन्य महाप्रभु जी हैं। वे बचपन से ही संगीत के शौकीन थे और नृत्य के भी। जब उनके हृदय में ईश्वर के साक्षात्कार का भाव जागृत हुआ तो उसके लिए भी उन्होंने अपनी इसी अभिरुचि को माध्यम बनाया यही कारण है कि हरि नाम संकीर्तन गौड़ीय संप्रदाय का मूल आधार बन गया। मान्यता यह भी है कि जब कभी चैतन्य महाप्रभु जी किसी कारणवश हरिनाम संकीर्तन से वंचित रह जाते तो वह इस समय को व्यर्थ बहा दिया गया मानते थे। इस संदर्भ में श्री अवध बिहारी लाल कपूर ‘श्री चैतन्य लीलामृत’ नामक ग्रंथ में लिखते हैं “संकीर्तन के समय खोल, करतालदिकी ताल के साथ आनंद से नृत्य करते अन्य लोग भी आनंद से उन्मत्त हो नृत्य करते। सबके पैरों के नूपुर और ‘हरिबोल’ की ध्वनि से आकाश गूंज उठता। कोई परमानंद के कारण मूर्छित हो जाता, कोई भूमि पर लोटपोट होने लगता, कोई भावावेश में हुंकार कर उठता, कोई रोदन करने लगता। घर के भीतर महिलायें कभी शंख-ध्वनि और हुलु-ध्वनि कर उठतीं, कभी उन्मत्त हो ‘हरिबोल हरिबोल’ नृत्य करने लगतीं। बाहर आंगन में जैसा भक्तों को भावावेश होता, वैसा ही भीतर स्त्रियों को होने लगता। सारी रात परमानंद में कब बीत जाती किसी को पता ना चलता” उपर्युक्त अभिकथन से यह स्पष्ट है कि चैतन्य महाप्रभु जी की संकीर्तन लीला कितनी मादक हुआ करती थी इस तथ्य से यह भी स्पष्ट होता है की गौड़ीय संप्रदाय में संकीर्तन सेवा का इतना श्रेष्ठ क्यों माना गया है?

 भक्ति मार्ग को ईश्वर प्राप्ति का माध्यम मानने वाले लोग मूर्ति पूजक होते हैं साथ ही मूर्ति पूजकों में किसी एक ईष्ट को अपना आराध्य मानकर उसकी सेवा में रत रहने की परंपरा का निर्वहन किया जाता है। इस आधार पर देखें तो गौड़ीय संप्रदाय में भी एक ईष्ट देव की आराधना का महत्व है। भक्तिमार्गीय शाखा के विविध संप्रदायों में कई संप्रदाय ऐसे हैं, जिनके ईष्ट देव तो राधा कृष्ण ही हैं किंतु उनके नाम तथा स्वरूपों की भिन्नता को स्वीकार करते हुए अलग-अलग संप्रदायों ने राधा कृष्ण के अलग-अलग स्वरूपों को अपना ईष्ट स्वीकार किया है। यही कारण है की गौड़ीय संप्रदाय के ईष्ट देव राधारमण लाल जु हैं। मूर्ति पूजकों के लिए ‘श्री सनातन शिक्षा’ नामक ग्रंथ में कहा गया है- “श्री मूर्ति के चरण सेवन में विशेष श्रद्धा और प्रीति रखें, नाम संकीर्तन करें एवं श्री मथुरा मंडल (श्री वृंदावन) में वास करें।”7 अर्थात गौड़ीय संप्रदाय इस उक्ति को पूर्ण पूर्ण रूप से आत्मसात करते हुए राधारमण जी के श्री चरणों में अपनी समस्त आत्म चेतना का त्याग कर सदैव हरिनाम संकीर्तन में तल्लीन बना रहता है। इस संप्रदाय के सभी के भक्तों की निष्ठा अपने ईष्ट देव में इस प्रकार निहित रहती है कि उनके लिए संसार की कोई भी वस्तु उनके ईष्ट से सुंदर प्रतीत नहीं होती। उनके ईष्ट के रूप सौंदर्य पर आधारित ‘श्री श्री चैतन्य चरितामृत’ नामक ग्रंथ के 165 वे श्लोक का अनुवाद देखें- “जिन कृष्ण ने अपने नैनों की शोभा से अति सुंदर श्वेत कमल की शोभा का दमन किया है, जिनका नव कुमकुम की ध्युती की विडंबना करने वाला पीतांबर शोभा पा रहा है [अर्थात जिनके पितांबर की शोभा नवकुमकुम की शोभा को भी लज्जित करने वाली है]; जिन्होंने वन के वेश अलंकार आदि द्वारा दिव्य वेश आदि के आदर को दूर कर दिया है [अर्थात जिन्होंने पत्र पुष्प आदि अलंकारों की शोभा में मणि-माणिक्य आदि द्वारा रचित दिव्य-अलंकार आदि वेश के का आदर को पराजित कर दिया है]; ऐसे इंद्र नीलमणि की अपेक्षा अधिक मनोहर अंग कांति से संपन्न-उज्जवल कृष्ण चंद्र शोभा पा रहे हैं।’’8 उपयुक्त अनुवादित अभिकथन में कृष्ण के श्री विग्रह की उस शोभा का वर्णन किया गया है जोकि अपने भक्तों को स्वयं में स्थिर प्रज्ञ बनाए रखने में समर्थ है।

 गौड़ीय संप्रदाय में जिन संतों ने इस संप्रदाय को गगनस्पर्शी स्वरूप प्रदान करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है उनमें से सबसे महत्वपूर्ण संतों की संख्या छ: है इन्हें षड गोस्वामी की संज्ञा दी गई है। इस संदर्भ में डॉ. भागवत कृष्ण नांगिया का निम्नलिखित कथन दृष्टव्य है- “श्री रूप, सनातन, रघुनाथ भट्ट, श्री जीव, श्री गोपाल भट्ट, दास रघुनाथ नामक इन छः गोस्वामियों की मैं चरण वंदना करता हूँ। जिनसे (भगवत प्रेम प्राप्ति में आने वाले) विघ्नों का नाश हो जाता है और (भगवत प्रेम या सेवा रूपी) अभीष्ट प्राप्त हो जाता है।’’9 इस कथन में जिन छः गोस्वामियों के नाम का उल्लेख हुआ है वे ही प्रमुख षड गोस्वामी हैं। मान्यता यह है कि चैतन्य महाप्रभु जी के आदेशानुसार ये सब गोस्वामी श्रीधाम वृंदावन की खोज में निकले तब इन सभी ने वह स्थान खोज लिया जो वर्तमान समय में श्री धाम वृंदावन के नाम से विश्व विख्यात है। यद्यपि इस संप्रदाय की समृद्धि में सभी गोस्वामीजन समान रूप से भागीदार हैं तथापि गौड़ीय संप्रदाय की राधारमणीय पद्धति में श्री गोपाल भट्ट जी की महत्वपूर्ण भूमिका है। जिस प्रकार षड गोस्वामी गौड़ीय संप्रदाय के प्रमुख संत हैं, उसी प्रकार इस संप्रदाय में शब्द देवालयों का भी विशेष महत्व है जो की निम्नलिखित हैं- 
1. श्री राधागोविंद देव जी 
2. श्री राधागोपीनाथ देव जी 
3. श्री राधामदन मोहन देव जी 
4. श्री राधादामोदर देव जी 
5. श्री राधारमण देव जी 
6. श्री राधागोकुलानंद देव जी 
7. श्री राधाश्याम सुंदर जी

उपर्युक्त सभी सप्तदेवालय गौड़ीय संप्रदाय के महत्वपूर्ण अर्चनास्थल हैं। इनमें से भी श्री राधारमण देव जी का महत्व सर्वोपरि है। इसी तथ्य को आधार मानते हुए श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी जी ने गौड़ीय संप्रदाय एक नवीन साधना पद्धति को प्रारंभ किया जिसे राधा रमणीय पद्धति कहा जाता है। इस पद्धति को जानने से पूर्व इस पद्धति के उदय को समझना आवश्यक है। जनश्रुति से ज्ञात होता है कि श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी जी अपने ईष्ट के रूप में शालिग्राम शिला की पूजा किया करते थे इस दौरान किसी धनपति सेठ का आगमन श्री धाम वृंदावन हुआ। उस सेठ ने वृंदावन के सभी देव मंदिरों में स्थित विग्रह के लिए पोशाक एवं भेंट की किंतु गोपाल भट्ट जी के ईष्ट तो शिला रूप में थे अत: वे उन्हें पोशाक धारण न करा सके। इस कारण से श्री गोपाल भट्ट की गहरे शोक में डूब गए किंतु रात बीतने के बाद जब वे सुबह जागे तब उन्होंने जो दृश्य देखा उसे देखकर वे स्तब्ध रह गए, क्योंकि अब शालिग्राम शिला श्री राधारमण जी का त्रिभंगी स्वरूप धारण कर चुकी थी और जब गोस्वामी जी ने इस नवीन विग्रह को वह पोशाक धारण कराई तो वह पोशाक इस प्रकार प्रतीत हुई मानो वह इसी विग्रह के लिए तैयार की गई हो। इस घटना ने गोस्वामीजी का हृदय हर्ष से भर दिया और इसी हर्षातिरेक में वे अपने प्रभु की सेवा में जो बना वही करने लगे। यही उनका सेवाक्रम नित्य हो गया जबकि इससे पूर्व गौड़ीय संप्रदाय में इस प्रकार का सेवा क्रम नहीं था। अतः जो नवीन सेवाक्रम प्रारंभ हुआ वही वर्तमान समय में गौड़ीय संप्रदाय की राधारमणीय पद्धति नाम से जाना जाता है। जो कि निम्नवत है-
1. सूर्योदय से पूर्व मंगला आरती 
2. सूर्य देव पश्चात श्रृंगार आरती 
3. दोपहर में राजभोग आरती 
4. सांय कालीन आरती 
5. श्रृंगार आरती 
6. शयन आरती एवं औलाई दर्शन 

यह राधारमणीय पद्धति का दैनिक विधान है। इसके इसके अतिरिक्त पूरे वर्ष भर विविध अवसरों, ऋतुओं, तिथियों आदि पर जो विशिष्ट अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं वह भी इसी पद्धति के अंतर्गत आते हैं। इन उत्सवों में साँझी महोत्सव, नृत्य, पद गायन आदि का विशिष्ट स्थान है।

निष्कर्ष- संपूर्ण भारतवर्ष में ब्रज क्षेत्र अपनी भक्ति परंपरा के साथ-साथ भक्ति के वैश्विक महत्व के लिए पहचाना जाता है यद्यपि इस क्षेत्र में कृष्ण भक्ति शाखा से संबंधित लगभग प्रत्येक संप्रदाय ने अपना विशेष प्रचार प्रसार किया तथा नाम संकीर्तन सेवा पर आधारित चैतन्य महाप्रभु द्वारा प्रणीत गौड़ीय संप्रदाय ने वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान स्थापित की है। साथ ही श्री विग्रह उपासना की क्रमिक पद्धति को स्वरूप प्रदान कर गौड़ीय संप्रदाय के महनीय संत श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी जी ने गौड़ीय संप्रदाय में जिस नवीन पद्धति का प्रादुर्भाव किया है। वह वर्तमान समय में गौड़ीय संप्रदाय की राधारमणीय पद्धति के नाम से जानी जाती है। निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि यदि ब्रज की विशिष्ट पहचान अपनी भक्ति परंपरा से है तो वही गौड़ीय संप्रदाय की विशिष्ट पहचान उसकी राधारमणीय प्रणाली से स्थापित हुई है।

संदर्भ सूची
1. मीतल, डॉ. प्रभुदयाल. ब्रज का सांस्कृतिक इतिहास: साहित्य संस्थान.द्वितीय संशोधित संस्करण: 2001. पृष्ठ संख्या 01
2. कपूर, डॉ. अवध बिहारी. ब्रज के रसिकाचार्या: श्री राधारमण निवास ट्रस्ट. पंचम संस्करण: 2020. पृष्ठ संख्या 11
3. शर्मा, मुरलिका.रसीली ब्रजयात्रा: श्री मान मंदिर सेवा संस्थान. प्रथम संस्करण: 2013 पृष्ठ संख्या 01
4. रामायणी, आचार्य कृपाशंकर. नवधा भक्ति और उसका महत्व: श्री गंगादास कृपाशंकर सेवा संस्थान. द्वितीय संस्करण: संवत 2080 पृष्ठ संख्या 01
5. कृष्ण, डॉ. भागवत. श्री चैतन्य चिंतन: व्रजगौरव प्रकाशन.प्रथम संस्करण: 1998. पृष्ठ संख्या 135
6. कपूर, श्री अवध बिहारी.श्री चैतन्य लीलामृत: श्री वैजयंती सेवा संस्थान ट्रस्ट (रजि.). प्रथम संस्करण 2021.पृष्ठ संख्या 52
7. नाथ, डॉ. श्री राधागोविंद (टीकाकार). श्री सनातन शिक्षा: श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवासंघ संस्करण: 1976 
8. कविराज, श्री कृष्णदास.श्री चैतन्य चरितामृत: श्री गौड़ीय मठ. प्रथम संस्करण: 2015. पृष्ठ 33
9. श्यामदास (संपादक).ब्रज के छह गोस्वामी एवं सप्तदेवालय: श्री हरिनाम प्रेस. प्रथम संस्करण: 2011. पृष्ठ 1 
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संपर्क- राम नगर कालोनी, वृंदावन 
ईमेल laxmipandey0901@gamil.com
चलभाष: 9548556218

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